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बोधि_कायस्थक_गंगा-लाभ_आ_विद्यापतिक_गीत.m4a

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:05आए हम सब गजिंद्र ताकुर द्रा समपादित बोदि कायस्त का गंगालाब़,
  2. 0:05–0:09और विद्यापतीक क आमर गीत पर आदारिद समग्रीक समिक्षा कै रहल छिं.
  3. 0:09–0:16प्रस्तुद समग्रीक के अटिहासिक और साहितिक संदर्द के आर नीग जगा स्थापित क्यल जासकईत अची.
  4. 0:16–0:46आप आप दख के याबहास नहीं बहाँ परच्छा अगर प्रसिध गीत बडसुक सार पावल तु अतीरे कओलेक नहीं अगर अगर प्रसिध गीत बडसुक सार पावल तु अतीरे कओलेक अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर �
  5. 0:46–0:52अब आब ये च्छाए जे यी कता मने मित्छला कतेख पएग साहित्टिक द्रोहर का अदार थिक
  6. 0:52–1:02ता एकर सुदाराक लेल सुजाव यी अची जे विद्द्यापतिक संदर्ब के एक ता फ्रेमिंग दिवाईस करुप में एक दम शूरूए में स्तापित कैल जाए
  7. 1:02–1:06अदारन के लेल आहा अद्याय एक के शुर्वात विद्यापतिक गीतक कोनो पाती सकर सके ची.
  8. 1:06–1:09आचा जाएन सब आपात्ख के पहिल वाख्य सर गंभीरता आए आटिहासिक महत्वक भान भान भजाए.
  9. 1:09–1:13एक दम देखु अगा विद्यापतिक गीतक कोनो पाती सकर सके ची.
  10. 1:13–1:17अद्यापतिक गीतक कोनो पाती सक ज़ाईची
  11. 1:17–1:21जाईईच़ पात्ख के पहिल वाख्ख्य सर गंभीरता
  12. 1:21–1:24आए टियापतिक महत्वक भान भान भाईजाई
  13. 1:24–1:28एक दम देखु जखन कोनो पात्ख कोनो आटियाचिक
  14. 1:28–1:31या आद्याटमिक आख्यान पडनाई शुरु करे तची
  15. 1:31–1:45देखु, जखन कोनो पाथक, कोनो अटिहासिक या अदियात्मिक आख्यान पडनाई शुरू करे तची, ता, उकर मस्तिष्क मद्धे एक तच्वाल रहे थच्छे, जे एक ता हमरक खी पडबाक चाही.
  16. 1:45–1:47आँ उसो वाट्वला प्रश्न
  17. 1:47–1:52आजा हम सब उई एतियासिक प्रमाड के अंत्दरी नुका कर अगब
  18. 1:52–1:56ता हम सब पाथक सव उई गेराई में जुडबाक अवसर छीनी रहल चीग
  19. 1:56–2:00माने, नोट सजत्वा हम भूजी रहल चीग, एते मुल बात इए चीग
  20. 2:00–2:04जब बूदि कायस्त्तक कता विद्यपती सब पहलुक थिख
  21. 2:04–2:06आवक्रा एतिहासिक मानिता प्रापतची
  22. 2:06–2:10सही अजा अद्याय एक सचाचारी दरी
  23. 2:10–2:11पाथक की इबुजल नहीं चे
  24. 2:11–2:13जे सादारन लोग कता नहीं
  25. 2:13–2:16बलकी उई बूदि कायस्त्तक कता थिख
  26. 2:16–2:19जक्रापर विद्यापती सन महागगी रच्ना काई लच्छी
  27. 2:19–2:23तब पट्हन की जे अनुबाव अची उ बहुत हल्का भवजाई तची
  28. 2:23–2:26तक इए कोनो सिनेमाक उई सस्पैंस जका नहीं भागे ला
  29. 2:26–2:29जब दर्षक के अंथ में पता चले चे
  30. 2:29–2:31जे यी सत्तिय गटना पर अदारे तची?
  31. 2:31–2:38नहीं, साहित यमे विषेश कडगन बाद सांस्क्रतिक द़ोहरक हो,
  32. 2:38–2:42तर रहास्य से बेशी महत्व बाथख के बाईंद कर अखे तची.
  33. 2:42–2:46एक रह कुनो सस्पैंस ध्रिलर जका नहीं लेल जासके तची,
  34. 2:46–2:48जता इ अंत मे सत्ते उजागर हो
  35. 2:49–2:50बुजलिये
  36. 2:50–2:52मुदा हम सोची रहल ची
  37. 2:52–2:52जे
  38. 2:53–2:56की एह सकतव एजोखिम त नहीं आची
  39. 2:57–2:58जे विद्यापतिक नाम
  40. 2:58–3:00एक दम शुरु मे देला सां
  41. 3:01–3:03मूल पात्र बोदिख यास्त्सां
  42. 3:03–3:05पात्क ध्यान हेथ नहीं जैदे
  43. 3:05–3:12इएक्ता बहुत नीक प्रश्ना ची आए जोखिम के संथूलित करब आवश्षक अची
  44. 3:12–3:21हम सब इए नहीं चहे ची जे बोदिक आयस्थक जीवन यात्रा मात्र विद्यापति गीतक एक्ता प्रस्तावना बनिकर अगी जाए
  45. 3:21–3:26जा शुरुए में विद्यापतिक गुन्गान बाजाए, तब आथख विद्यापतिक कुजे लागत.
  46. 3:26–3:29जखन की कता तब वोदि कायस्त्ख अची.
  47. 3:29–3:37तएक्रा संथुलित करबाक लेल हम सब विद्यापतिके मात्र एक ता सुत्रदार के रुप में प्रयोग कर सकै ची.
  48. 3:37–3:41सुत्रदार माने जे बोदि कायस तक महिमा गाभी रहल चती
  49. 3:41–3:46आँ जनन नाटक सब में सुत्रदार आए ककतक मर्म बता देख चती
  50. 3:46–3:49आप फेर निपठ्ध्य में चली जाएक चती
  51. 3:49–3:52आपे ये तब बगड बडया विचार चे
  52. 3:52–3:59कल्पना करुजे पोथी कष्वर्वात बर्स्सुखसार पावल्त्वे तीरे का एक ता पाती सहोई जाएत.
  53. 3:59–4:05उकरे थीक नीचा एी लिखल होए, चे एी उही महान आत्माक गाता थेक,
  54. 4:05–4:11जकर सत्यनिष्था से प्रेरित भए विद्यापती के यी पाडी लिखवागल बाद्धियोई परल.
  55. 4:11–4:15हो, हो, एहे से बोदी कायस्त का महत्वा कम नहीं है ते,
  56. 4:15–4:21बलकी विद्यापतिक शब्दक लेंस सं, हुंकर कता आर भेसी विशाल बहजाएत.
  57. 4:21–4:27इक दम, एकर बाद विद्यापतिक उलेक पुर्न रूपें निपपत्यमे चलीजाएत.
  58. 4:27–4:34आ, हम सब सीथा बोदिकायस्त कबाल्यकाल यह उनकर राज दर्बारक जीवन में प्रवेश कर जाएब.
  59. 4:34–4:39इस सन्रचनात्मक बदलाव वास्तो मे बहुत प्रभाव शाली भो सके तची
  60. 4:39–4:43एक रासा पाथक कद्रिष्टिकों पुरनत बदली जैत
  61. 4:43–4:48आप जकन पाथक पहल अद्धय सा बोदिकायस्त कजीवन देखत
  62. 4:48–4:51तवुक्रम वस्तिष्क मद्यय यआ बात रहो ते
  63. 4:51–4:56जे इस समान्य काज नहीं भरहल जी, इत इतिहास गड़ारहल जी.
  64. 4:56–5:00आप जकन हम सब भोदी कायस्त कजीवना गप करहल जी,
  65. 5:00–5:02तहुनकर जीवनक जी प्रस्तुती करना जी,
  66. 5:03–5:05उईपर द्यान्देवा अवश्षक अची.
  67. 5:05–5:07भोदी कायस्त कचरित्र चित्रन में,
  68. 5:07–5:11कही देनाई से बेसी दिक्हाईनाई पर जोर देलजिवा कवस्ष्च्ता आची
  69. 5:11–5:15आईजी शो डोंटेल्वला सिद्धान्त ची
  70. 5:15–5:17और एते बहुत काजकरत
  71. 5:17–5:20माने एही सामगरी किक्त दूबलता ही आची
  72. 5:20–5:23जे अद्द्धाई एक में बोदी कायस्त का गुन
  73. 5:23–5:30जिना हुंकर निशकलंकता प्रलोबंस दूरी अदनक लाल्सा स मुक्त हूनाई मात्र बतादे ले ले लची.
  74. 5:30–5:35आप मुदा उकरा कोनो गधनाक माद्ध्यम से प्रमानित नी कल गे लची.
  75. 5:35–5:40एक दम, राजाग दरबार में रहाइत प्रलोबंस बचव कते कते अची,
  76. 5:40–5:43इं मात्र लिखिदेनाई पर्याप्त नहीं चे,
  77. 5:43–5:45एक्र अनुबहुत करेना यावश्यक अची.
  78. 5:45–5:48ते एकर सुदारक लेल सुजाव इं अची,
  79. 5:48–5:53जे बोदि कायस्त्क राजदर्बार कर जीवन कग खोनो एक चोट सन द्रिष्यः,
  80. 5:53–5:55या विशिष्ट द्र्ष्टान्त जोडल जाए,
  81. 5:55–5:59जते हुणकर सत्य निष्टाक साख्षात परिक्षन भेरहल हो.
  82. 5:59–6:00सही बात आची.
  83. 6:00–6:02हमरात यी अश्पडी का एहन लागल,
  84. 6:02–6:04जेना हम कुनो रेज्यु में पडी रहल ची,
  85. 6:04–6:07जते मात्र गुन सबक सुची देल गेल आची.
  86. 6:07–6:11आप पाथक दावा सब पर तुरन्त विश्वास नहीं करेताची
  87. 6:11–6:13राज्दरबार्त शड्यन्त्र, स्वार्थ और सथ्ता केल केंड्र होईताची
  88. 6:13–6:16उही पंक्मे रही का, कमलजका नहीं करेताची
  89. 6:16–6:24तब द्राफ्ट में इलिखल आची जे बोदि कायस्त बहुत निष्छल चला अहुनक दनक कोनो लोब नहीं चल, तब इी मात्रेक्त डावा थिक.
  90. 6:24–6:29आप पाथक डावा सब पर तुरन्त विष्वास नहीं करे तची.
  91. 6:29–6:34राज्दर्बार्त, शड्यन्त्र, स्वार्थ, और सत्ता केल केंद्र होई तची.
  92. 6:34–6:40उही पंख में रही का, कमलजका निरलेप रहभ, कोनो सादारन बात नहीं थेख.
  93. 6:40–6:45एकरा केवल एक ता वाख्क्यमे समेटी देनाए कता कसंद अन्याय ची.
  94. 6:45–6:50ता हम सव एक जीवन्त कता गडी रहल ची, कोनो विव्रनिका नहीं.
  95. 6:50–6:56मुदा एक रा लिखभ कते कते न ची, इसोचु, हम सव कही तरहल ची, जे द्रिष्ष दिखाओ.
  96. 6:56–7:02मुदा उद्रिष्ष कोहें बहासा के तची, जैही सब कता कमुख्य सुर से हो नभी गडी.
  97. 7:02–7:09इबहुत सहज अची, जे आहा सब पात्र का सामने कोनो चोट मुदा अर्थ पुरन संकत ताड कदी.
  98. 7:09–7:11अच्छ? कोनो उदारन?
  99. 7:11–7:15उदारन कले ल, आहा एक ता एहंद रिष्छ गडी सके ची,
  100. 7:15–7:20जते कोनो पैग सामन्त वा व्यापारी बोदिकायस्त लगाए तची.
  101. 7:20–7:23अव्यापारी राजा लग पहुच बनावाक ले
  102. 7:23–7:25या कुनो कर माव करे बाक ले
  103. 7:25–7:29बोदिकायस्त के एक ता अद्यंत मुल्यवान आबूषन
  104. 7:29–7:32वा जागीर गूस करूप में दोरहल अचे
  105. 7:32–7:35अवही चन में बोदिकायस्त कप्रतिक्रिया की होई तची
  106. 7:35–7:38एक के बेर की उक्रुदित होए च्छती
  107. 7:38–7:42वा उ अ अ अत्यंत शान्त भाँसों उक्रा अश्विकार कर इच्छती
  108. 7:42–7:47जो लेक्ख इदेखावे जे बोदि कायस्त बिना कोनो आंकारक
  109. 7:47–7:51अट्यंत सहजता सों उही प्रस्ताव के तुक्रादेज च्छती
  110. 7:51–7:54अगी ब्यापारी के द्रमक मार्ग भुज्वेद चती,
  111. 7:54–7:58तब पाथक के इग कहबाक आवष्षकता नहीं परत,
  112. 7:58–7:59जे उ लोब मुख्छला.
  113. 7:59–8:01एक दम सही.
  114. 8:01–8:03पाथक इद्रिष्छ देखी का,
  115. 8:03–8:05स्वेम इइ निशकर्ष निकालत,
  116. 8:05–8:08जे इग व्यक्ती सानसारिक मोग सा
  117. 8:08–8:10भगत उपर उठी चुकल आची
  118. 8:10–8:14इद्रिश्छ निश्छित रूपसा रूपनकर चरीट्र के गड्राई देट
  119. 8:14–8:18मुदा हमरा मस्तिष्क मद्धे एक ता आर बिचार आभी रहे लची
  120. 8:18–8:19की?
  121. 8:19–8:23की इदरभार में भेल चोट-चोट संगर्ष
  122. 8:23–8:29उनका अंतता हं उही परम वेराग्यक दिस लोग जाय में सायक नवबह सकेता ची
  123. 8:29–8:31इब बहुत निक बात कहलू आँ
  124. 8:31–8:36जिना लेक्खडष मात्र हुंकर अद्धियात्मिक यात्रा पर केंद्रित रहाव अची
  125. 8:36–8:39मुदा की हम सव इविचार को सकेता ची
  126. 8:39–8:43जि दर्बार मे हुनका पर भेल कुनो चोट सं चारित्रिक आगात
  127. 8:43–8:48हुनकर गंगा लावकर निरने के आर भेसी तारकिक आस्ववाविक बनादेत.
  128. 8:48–8:51आआ, अद्ध्याए दूवला जिन निरने आची,
  129. 8:51–8:55जे उ दर्बार मे एहन कुनो गतना देखिच थिन,
  130. 8:55–9:00जतै दन्वा सत्ता के कारने कोनो निर्दोशक के संग अन्याई भार रहाल अची.
  131. 9:00–9:06आ उएक शन उनका इस सम्पुडन वेवस्ता सब वित्रिष्ना बहजाएचनी.
  132. 9:06–9:11तकन जकनो गर द्वार चोडी गंगा लाब के लेल प्रस्थान करे चतिन,
  133. 9:11–9:14तो मात्र एक्ता तीर्त्यात्रा ना लागत.
  134. 9:14–9:19नाई, बलकी एक्ता जाग्रत आत्माक परम सत्यके दिस,
  135. 9:19–9:22उठल बहुत स्प्ष्ट कदम लागत.
  136. 9:22–9:24हमहा के ही बाथ सपूनता सहमत छी,
  137. 9:24–9:29जे आहन्तरह के दिश्य कताक बहावनात्मक वकर के मस्वुति प्रदान करत.
  138. 9:29–9:35वर्त्मान स्वरूप में तवूनरकर गंगा लाब के निरने किचु हद्धरी अचानक लागत अची
  139. 9:35–9:43राव पाथक के इबुजवाक लेल समय नहीं भेटेच जे आखिर एहन की भेल जेगता व्यकती सब किच्त्यागी देलक
  140. 9:43–9:56जो हम सब हुनका सानसारिक प्रलोबन आ अन्न्याय सजुजे देखभ, तो हुनकर उही कोलाहल सनिकल कर गंगाक सान्त तत्पर जिवाग जे तड़ा पची उ पाधख महसुस कषकत.
  141. 9:56–10:02आ राज दर्बार खलग आ श्रिगेंत्रक वाता वरन जतेक विषेला देखा आजएद.
  142. 10:02–10:08गगगा के तत, उत्बे पवित्र, आम्मोग्ष्खस्तान जकान अनुबहुत हे तै,
  143. 10:08–10:15इवही मनो वैग्यानिक आदार के मजबूत करत चाई जाहे पर समपून कता टिकलाची.
  144. 10:15–10:45अप जक्यक्न बोदि का इस्त बहुतिक सन्सार से दूर भ्या अद्यात्मिक सन्सार दिस बड़ी रहल चती, तहम्रा सब के एही समगरी के एक ता आर महत्तुपून पहलु दिस द्यान देबाख चाही. चित्रात्मक तत्व अग्कता के बीच का संबंद के और भेसी विस्प�
  145. 10:45–10:48अपात्त्ते भीच्कोनो सीथा समवाद नहीं आची
  146. 10:48–10:56चित्र सब में जे जामितिया आकार, माच, नाव, सुरे चन्द्र, आमानव अक्रतिक विषिष्ट शैली आचे
  147. 10:56–10:58उकर पात्त सकुनो मेल ने चे
  148. 10:58–11:02एक दम नहीं, पात्त्तून रूपेन पारंपरिक अवननात्मक आचे
  149. 11:15–11:20तरेच्चर एक संगा बेत ज़े ता उक्रा एक दोस्रा से बात करे के चाही
  150. 11:20–11:26वर्त्मान द्राफ्ट मेता ये दोनो जेना दूता अलग-लक कम्रा में बैसलची
  151. 11:26–11:31सही कहला जे आमुर्त चित्र सब अचे उ बहुत जीवन्त आ उर्जावान आचे
  152. 11:31–11:37उही में त्रिबोज़च़े, व्रितचचे, अरण्भिरंगक माची सब का जामित्ये आकार आचे.
  153. 11:37–11:41इस सब मात्र प्रिष्ट के सुन्दर बनेबाक सजावद नहीं थिक,
  154. 11:41–11:46इह उही अद्ध्यात्मिक उड्जाग प्रतिक थि, जक्रा बोदिकायस्त महसुस कर रहल्चति.
  155. 11:46–11:55मुता जखन हम पात पड़ेद ची, तो ही में उ पारमपलिक भाशा ची, माने नदी बहेत ची, हवाचलत ची, एही सेक्ता दिसकनेक पड़ा बरे लग ची.
  156. 11:55–11:57अगर उदारन्द थे बुजावैंची
  157. 11:57–12:00जक्शन हम कोनु नदीक परमपरागत वनन पड़एची
  158. 12:00–12:03ता हमरा मस्तिष्क मदधे नीचा भेहत पानी
  159. 12:03–12:06अगर तमे गाच व्रिख्षक सामाने चित्र बैटची
  160. 12:06–12:08राए, एक ता आम नदीक द्रुष्य
  161. 12:08–12:10परम्परागत वनन पड़ेई ची
  162. 12:10–12:11ता हमरा मस्तिष्क मद्धे
  163. 12:12–12:13नीचा बहेत पानी
  164. 12:13–12:15अगकात में गाज व्रिख्षक
  165. 12:15–12:16सामान निच्ट्र बैत आची
  166. 12:16–12:19हा एक ता आम नदीक द्रुश्यड
  167. 12:19–12:20मुदा जखन हम
  168. 12:21–12:22पीटीएपक चित्र
  169. 12:22–12:24पाच या चो देखाएच ची
  170. 12:24–12:24तते
  171. 12:38–12:44जिस सुर्यक तेज अ विकिरान देखाल गेल अख्रा पाथ में उतारब अद्टन्त अबश्ष्ष्य कचे
  172. 12:44–12:48मुदा रूक। कि हम सब यह नहीं सोची सके ची
  173. 12:48–12:52जिट्ट्र कार जानी भूजी का अमुर्ट शेली चूनला कचे
  174. 12:52–12:56ताकि इगटना कोनो एक ता एतिहासि कालखन्द धरी सीमित नहीं जाए?
  175. 12:56–12:58आँ, यो भो सके ताछी
  176. 12:58–13:03माने अमुर्त कलाक उदेश्षता पाथक का कल्पना के स्वतन्त्र चोरनाई होई ताछे
  177. 13:03–13:06जो हम सब पाथसा उक्रा बहत भेसी बान्दी देभ
  178. 13:06–13:10तकि उ कलाक जे आमुर्तता आचे, उ कथम नहीं भाजाते.
  179. 13:10–13:15इटर्क आपन ताम पर सही आचे, जे कल्पना के सुत्टर चोडवाख चाही.
  180. 13:15–13:20मुदा जो हम सब पात अच्टर कबीचक समवंद के पुन रुप से स्तापित नहीं करभ,
  181. 13:20–13:22तब पातख भडगी जाही तै.
  182. 13:22–13:25अग, माने एक्दम सा लग नहीं रवाख चाही.
  183. 13:25–13:29अग, हम ए नहीं कही लहल ची, जे पात्फ में लिखल जाए,
  184. 13:29–13:33जे चित्र पाच में बनल त्रिबुज गंगाग प्रतिक खिल,
  185. 13:33–13:35उतर बहुत बच्काना बहुज़ाई तै.
  186. 13:35–13:38अदर टेक्स्ट्बूक्जा का बहजगता है
  187. 13:38–13:40हमर कहबाक तात्पर ए आची
  188. 13:40–13:43जे पाथ में औहन शब्दावलिक प्रियोग हो जाए
  189. 13:43–13:47जाही से पाथक अव चेतन रूप से औही चित्र से जुडी जाए
  190. 13:47–13:49एक ता पुल बने बाक आवश्चता ची
  191. 13:49–13:50तिक कहलों
  192. 13:50–13:55मतलब पात्खक के पुर्नरूपन सुत्टन्द्र नहीं चोडी देनाई चे
  193. 13:55–13:58बलकी उक्रा एक ता सुख्ष्म दिशा देनाई चे
  194. 13:58–13:59अग, सतल क्यूज
  195. 13:59–14:06उदारन के लिल, जगन अद्ध्याय तीन में बोदि कायस्त दूर से गंगा के समभोदित करे चती
  196. 14:06–14:09तो उ कोनो सादारन पुकार नहीं आची,
  197. 14:09–14:12उ ब्रम्हांद का शक्ती सब के जगजोरी रहल चती.
  198. 14:12–14:15एक दम जो लेक्खपाथ में नाव,
  199. 14:15–14:16जलक लेहरी,
  200. 14:16–14:20वा माचक शान्त प्रवाख ऊहन विव्रन दशके चती,
  201. 14:20–14:21जे चित्र में आची,
  202. 14:21–14:23तो बहुत प्रभावी ही ते.
  203. 14:23–14:29जो पाथ मे इई लिखल जाए जे हुंकर पुकार से जहना प्रक्रतिक अकार बदली रहल चल
  204. 14:29–14:33या गंगा के लेहरी मे माचा सब कषान्त प्रवाह
  205. 14:33–14:36एक तनवव जामित्ये उगर्जा से बहरी उचल
  206. 14:36–14:39तपाथक तुरन्त उई आमुर्त चित्र से जुडी जैइते.
  207. 14:39–14:47बिल्कुल, आजगन गंगातट चोडी हूंका लोग अबेद चती मने अद्याय चार में तो चमत कारिक अनशा ची.
  208. 14:47–14:55औही समें चित्र में प्रयुक्त सूर्यक तेज या उर्जा मैं आक्रतिक वरनन कता में कहल जासके तची.
  209. 14:55–15:11जब पाथ में कत हो यावीजाई जे सूर्रे आपन परमपरिक आकार चोडी एक तेज विकिरन जका चारो दिस पसारी राल चल, तपाथक जखन औई पना पर जाक अच्छित्र दिखठ, तोक्रा लागल जज़ शब्द अच्छित्र एक दोस्रा सन्डित कोरो हलाची.
  210. 15:11–15:17अमुर्त अमुर्त कबीचक चितनाव अची ओएक्त सुन्दर काव्यात्मक लैई में बड़ल जाई तैई.
  211. 15:17–15:20अब बोदिक आयस्थ कई गातातम मुलता द्यान अब भक्तिकी गातातिक
  212. 15:20–15:24विद्यापती को पाती बड सुखसार पावल्तुव तीरे
  213. 15:24–15:26एहे पूनताक बखान करे तची
  214. 15:26–15:30एकदम जखन गंगाक लहरी हूनका अपना में समहित करे तची
  215. 15:30–15:39विद्यापति को पाति बड़ सुखसार पावल्तु अतीरे एह पूनताक बखान करे तची.
  216. 15:39–15:43एक दम जखन गंगाक लहरी हुनका अपना में समाहित करे तची,
  217. 15:43–15:51उही समय चित्रक जामिती कुर्जा पात्ध, कोस्मिक वरनन अविद्यापति क आमर पातिग जे संगम हित है,
  218. 15:51–15:53उ अगल्पनी आप्रवाव चोडद
  219. 15:53–15:56इटीन। द्हागा अलग-गल्ग नहीं अच्छे
  220. 15:56–16:00विद्यापती के संदर भे कताखे इतिहासिक गहराई देताची
  221. 16:00–16:04दर्वारक के द्रिश्छ पात्रके मानवी आदार देताची
  222. 16:04–16:09अच्छित्र पाथक समझस्य एक्रा पारलोकिक उचाई देटची.
  223. 16:09–16:13जखन यी तीनू द्हागा एक संग गुत्ठार जाए तै,
  224. 16:13–16:17तई पोठी मात्र एक ता समपादित लोक कता नहीं जाए तै.
  225. 16:17–16:23बलकी, मित्हिलाक साहित्तिक द़ोहरक एक ता उत्क्रिष्ट प्रतिरूब बनी जाए तै.
  226. 16:23–16:30इब बहुत आवश्यक छे जे कोनो भी समपादित अट्यासिक समगरी अपन मूल आत्माके नहीं चोडग,
  227. 16:30–16:36उद्या इच्टा चोटा चोटा बडलाउ कलजाई तब पडख अज्दाख के ओज्टर पर गरहन कपावत जे कर इवास्तम में अदिकारी अची
  228. 16:36–16:41लेखख के द्रिष्टी बहुत स्पष्ट अची, हुनकर काज प्रशन्स निय अची,
  229. 16:41–16:49बस उक्रा प्रस्टूती करन कर स्टर्पर किचु सन्रचनात्मक कसावत अग कलात्मक सामन्जस्यक आविश्षक्ता अचे.
  230. 16:49–17:19जा इ छोटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटट�
  231. 17:19–17:22अगर उद्रित्रेख शुद्था केन मात्र कहबाक बद्ला,
  232. 17:22–17:25दर्बारक कोनो चोट गतनाक माद्यम सा,
  233. 17:25–17:27साख्षा दिखाई नाई.
  234. 17:27–17:31जायसा उनकर गंगा लावकर निरने आर स्वबाबिक लागे.
  235. 17:31–17:33आते सर,
  236. 17:33–17:59ॐू।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

Plain text

आए हम सब गजिंद्र ताकुर द्रा समपादित बोदि कायस्त का गंगालाब़, और विद्यापतीक क आमर गीत पर आदारिद समग्रीक समिक्षा कै रहल छिं. प्रस्तुद समग्रीक के अटिहासिक और साहितिक संदर्द के आर नीग जगा स्थापित क्यल जासकईत अची. आप आप दख के याबहास नहीं बहाँ परच्छा अगर प्रसिध गीत बडसुक सार पावल तु अतीरे कओलेक नहीं अगर अगर प्रसिध गीत बडसुक सार पावल तु अतीरे कओलेक अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर � अब आब ये च्छाए जे यी कता मने मित्छला कतेख पएग साहित्टिक द्रोहर का अदार थिक ता एकर सुदाराक लेल सुजाव यी अची जे विद्द्यापतिक संदर्ब के एक ता फ्रेमिंग दिवाईस करुप में एक दम शूरूए में स्तापित कैल जाए अदारन के लेल आहा अद्याय एक के शुर्वात विद्यापतिक गीतक कोनो पाती सकर सके ची. आचा जाएन सब आपात्ख के पहिल वाख्य सर गंभीरता आए आटिहासिक महत्वक भान भान भजाए. एक दम देखु अगा विद्यापतिक गीतक कोनो पाती सकर सके ची. अद्यापतिक गीतक कोनो पाती सक ज़ाईची जाईईच़ पात्ख के पहिल वाख्ख्य सर गंभीरता आए टियापतिक महत्वक भान भान भाईजाई एक दम देखु जखन कोनो पात्ख कोनो आटियाचिक या आद्याटमिक आख्यान पडनाई शुरु करे तची देखु, जखन कोनो पाथक, कोनो अटिहासिक या अदियात्मिक आख्यान पडनाई शुरू करे तची, ता, उकर मस्तिष्क मद्धे एक तच्वाल रहे थच्छे, जे एक ता हमरक खी पडबाक चाही. आँ उसो वाट्वला प्रश्न आजा हम सब उई एतियासिक प्रमाड के अंत्दरी नुका कर अगब ता हम सब पाथक सव उई गेराई में जुडबाक अवसर छीनी रहल चीग माने, नोट सजत्वा हम भूजी रहल चीग, एते मुल बात इए चीग जब बूदि कायस्त्तक कता विद्यपती सब पहलुक थिख आवक्रा एतिहासिक मानिता प्रापतची सही अजा अद्याय एक सचाचारी दरी पाथक की इबुजल नहीं चे जे सादारन लोग कता नहीं बलकी उई बूदि कायस्त्तक कता थिख जक्रापर विद्यापती सन महागगी रच्ना काई लच्छी तब पट्हन की जे अनुबाव अची उ बहुत हल्का भवजाई तची तक इए कोनो सिनेमाक उई सस्पैंस जका नहीं भागे ला जब दर्षक के अंथ में पता चले चे जे यी सत्तिय गटना पर अदारे तची? नहीं, साहित यमे विषेश कडगन बाद सांस्क्रतिक द़ोहरक हो, तर रहास्य से बेशी महत्व बाथख के बाईंद कर अखे तची. एक रह कुनो सस्पैंस ध्रिलर जका नहीं लेल जासके तची, जता इ अंत मे सत्ते उजागर हो बुजलिये मुदा हम सोची रहल ची जे की एह सकतव एजोखिम त नहीं आची जे विद्यापतिक नाम एक दम शुरु मे देला सां मूल पात्र बोदिख यास्त्सां पात्क ध्यान हेथ नहीं जैदे इएक्ता बहुत नीक प्रश्ना ची आए जोखिम के संथूलित करब आवश्षक अची हम सब इए नहीं चहे ची जे बोदिक आयस्थक जीवन यात्रा मात्र विद्यापति गीतक एक्ता प्रस्तावना बनिकर अगी जाए जा शुरुए में विद्यापतिक गुन्गान बाजाए, तब आथख विद्यापतिक कुजे लागत. जखन की कता तब वोदि कायस्त्ख अची. तएक्रा संथुलित करबाक लेल हम सब विद्यापतिके मात्र एक ता सुत्रदार के रुप में प्रयोग कर सकै ची. सुत्रदार माने जे बोदि कायस तक महिमा गाभी रहल चती आँ जनन नाटक सब में सुत्रदार आए ककतक मर्म बता देख चती आप फेर निपठ्ध्य में चली जाएक चती आपे ये तब बगड बडया विचार चे कल्पना करुजे पोथी कष्वर्वात बर्स्सुखसार पावल्त्वे तीरे का एक ता पाती सहोई जाएत. उकरे थीक नीचा एी लिखल होए, चे एी उही महान आत्माक गाता थेक, जकर सत्यनिष्था से प्रेरित भए विद्यापती के यी पाडी लिखवागल बाद्धियोई परल. हो, हो, एहे से बोदी कायस्त का महत्वा कम नहीं है ते, बलकी विद्यापतिक शब्दक लेंस सं, हुंकर कता आर भेसी विशाल बहजाएत. इक दम, एकर बाद विद्यापतिक उलेक पुर्न रूपें निपपत्यमे चलीजाएत. आ, हम सब सीथा बोदिकायस्त कबाल्यकाल यह उनकर राज दर्बारक जीवन में प्रवेश कर जाएब. इस सन्रचनात्मक बदलाव वास्तो मे बहुत प्रभाव शाली भो सके तची एक रासा पाथक कद्रिष्टिकों पुरनत बदली जैत आप जकन पाथक पहल अद्धय सा बोदिकायस्त कजीवन देखत तवुक्रम वस्तिष्क मद्यय यआ बात रहो ते जे इस समान्य काज नहीं भरहल जी, इत इतिहास गड़ारहल जी. आप जकन हम सब भोदी कायस्त कजीवना गप करहल जी, तहुनकर जीवनक जी प्रस्तुती करना जी, उईपर द्यान्देवा अवश्षक अची. भोदी कायस्त कचरित्र चित्रन में, कही देनाई से बेसी दिक्हाईनाई पर जोर देलजिवा कवस्ष्च्ता आची आईजी शो डोंटेल्वला सिद्धान्त ची और एते बहुत काजकरत माने एही सामगरी किक्त दूबलता ही आची जे अद्द्धाई एक में बोदी कायस्त का गुन जिना हुंकर निशकलंकता प्रलोबंस दूरी अदनक लाल्सा स मुक्त हूनाई मात्र बतादे ले ले लची. आप मुदा उकरा कोनो गधनाक माद्ध्यम से प्रमानित नी कल गे लची. एक दम, राजाग दरबार में रहाइत प्रलोबंस बचव कते कते अची, इं मात्र लिखिदेनाई पर्याप्त नहीं चे, एक्र अनुबहुत करेना यावश्यक अची. ते एकर सुदारक लेल सुजाव इं अची, जे बोदि कायस्त्क राजदर्बार कर जीवन कग खोनो एक चोट सन द्रिष्यः, या विशिष्ट द्र्ष्टान्त जोडल जाए, जते हुणकर सत्य निष्टाक साख्षात परिक्षन भेरहल हो. सही बात आची. हमरात यी अश्पडी का एहन लागल, जेना हम कुनो रेज्यु में पडी रहल ची, जते मात्र गुन सबक सुची देल गेल आची. आप पाथक दावा सब पर तुरन्त विश्वास नहीं करेताची राज्दरबार्त शड्यन्त्र, स्वार्थ और सथ्ता केल केंड्र होईताची उही पंक्मे रही का, कमलजका नहीं करेताची तब द्राफ्ट में इलिखल आची जे बोदि कायस्त बहुत निष्छल चला अहुनक दनक कोनो लोब नहीं चल, तब इी मात्रेक्त डावा थिक. आप पाथक डावा सब पर तुरन्त विष्वास नहीं करे तची. राज्दर्बार्त, शड्यन्त्र, स्वार्थ, और सत्ता केल केंद्र होई तची. उही पंख में रही का, कमलजका निरलेप रहभ, कोनो सादारन बात नहीं थेख. एकरा केवल एक ता वाख्क्यमे समेटी देनाए कता कसंद अन्याय ची. ता हम सव एक जीवन्त कता गडी रहल ची, कोनो विव्रनिका नहीं. मुदा एक रा लिखभ कते कते न ची, इसोचु, हम सव कही तरहल ची, जे द्रिष्ष दिखाओ. मुदा उद्रिष्ष कोहें बहासा के तची, जैही सब कता कमुख्य सुर से हो नभी गडी. इबहुत सहज अची, जे आहा सब पात्र का सामने कोनो चोट मुदा अर्थ पुरन संकत ताड कदी. अच्छ? कोनो उदारन? उदारन कले ल, आहा एक ता एहंद रिष्छ गडी सके ची, जते कोनो पैग सामन्त वा व्यापारी बोदिकायस्त लगाए तची. अव्यापारी राजा लग पहुच बनावाक ले या कुनो कर माव करे बाक ले बोदिकायस्त के एक ता अद्यंत मुल्यवान आबूषन वा जागीर गूस करूप में दोरहल अचे अवही चन में बोदिकायस्त कप्रतिक्रिया की होई तची एक के बेर की उक्रुदित होए च्छती वा उ अ अ अत्यंत शान्त भाँसों उक्रा अश्विकार कर इच्छती जो लेक्ख इदेखावे जे बोदि कायस्त बिना कोनो आंकारक अट्यंत सहजता सों उही प्रस्ताव के तुक्रादेज च्छती अगी ब्यापारी के द्रमक मार्ग भुज्वेद चती, तब पाथक के इग कहबाक आवष्षकता नहीं परत, जे उ लोब मुख्छला. एक दम सही. पाथक इद्रिष्छ देखी का, स्वेम इइ निशकर्ष निकालत, जे इग व्यक्ती सानसारिक मोग सा भगत उपर उठी चुकल आची इद्रिश्छ निश्छित रूपसा रूपनकर चरीट्र के गड्राई देट मुदा हमरा मस्तिष्क मद्धे एक ता आर बिचार आभी रहे लची की? की इदरभार में भेल चोट-चोट संगर्ष उनका अंतता हं उही परम वेराग्यक दिस लोग जाय में सायक नवबह सकेता ची इब बहुत निक बात कहलू आँ जिना लेक्खडष मात्र हुंकर अद्धियात्मिक यात्रा पर केंद्रित रहाव अची मुदा की हम सव इविचार को सकेता ची जि दर्बार मे हुनका पर भेल कुनो चोट सं चारित्रिक आगात हुनकर गंगा लावकर निरने के आर भेसी तारकिक आस्ववाविक बनादेत. आआ, अद्ध्याए दूवला जिन निरने आची, जे उ दर्बार मे एहन कुनो गतना देखिच थिन, जतै दन्वा सत्ता के कारने कोनो निर्दोशक के संग अन्याई भार रहाल अची. आ उएक शन उनका इस सम्पुडन वेवस्ता सब वित्रिष्ना बहजाएचनी. तकन जकनो गर द्वार चोडी गंगा लाब के लेल प्रस्थान करे चतिन, तो मात्र एक्ता तीर्त्यात्रा ना लागत. नाई, बलकी एक्ता जाग्रत आत्माक परम सत्यके दिस, उठल बहुत स्प्ष्ट कदम लागत. हमहा के ही बाथ सपूनता सहमत छी, जे आहन्तरह के दिश्य कताक बहावनात्मक वकर के मस्वुति प्रदान करत. वर्त्मान स्वरूप में तवूनरकर गंगा लाब के निरने किचु हद्धरी अचानक लागत अची राव पाथक के इबुजवाक लेल समय नहीं भेटेच जे आखिर एहन की भेल जेगता व्यकती सब किच्त्यागी देलक जो हम सब हुनका सानसारिक प्रलोबन आ अन्न्याय सजुजे देखभ, तो हुनकर उही कोलाहल सनिकल कर गंगाक सान्त तत्पर जिवाग जे तड़ा पची उ पाधख महसुस कषकत. आ राज दर्बार खलग आ श्रिगेंत्रक वाता वरन जतेक विषेला देखा आजएद. गगगा के तत, उत्बे पवित्र, आम्मोग्ष्खस्तान जकान अनुबहुत हे तै, इवही मनो वैग्यानिक आदार के मजबूत करत चाई जाहे पर समपून कता टिकलाची. अप जक्यक्न बोदि का इस्त बहुतिक सन्सार से दूर भ्या अद्यात्मिक सन्सार दिस बड़ी रहल चती, तहम्रा सब के एही समगरी के एक ता आर महत्तुपून पहलु दिस द्यान देबाख चाही. चित्रात्मक तत्व अग्कता के बीच का संबंद के और भेसी विस्प� अपात्त्ते भीच्कोनो सीथा समवाद नहीं आची चित्र सब में जे जामितिया आकार, माच, नाव, सुरे चन्द्र, आमानव अक्रतिक विषिष्ट शैली आचे उकर पात्त सकुनो मेल ने चे एक दम नहीं, पात्त्तून रूपेन पारंपरिक अवननात्मक आचे तरेच्चर एक संगा बेत ज़े ता उक्रा एक दोस्रा से बात करे के चाही वर्त्मान द्राफ्ट मेता ये दोनो जेना दूता अलग-लक कम्रा में बैसलची सही कहला जे आमुर्त चित्र सब अचे उ बहुत जीवन्त आ उर्जावान आचे उही में त्रिबोज़च़े, व्रितचचे, अरण्भिरंगक माची सब का जामित्ये आकार आचे. इस सब मात्र प्रिष्ट के सुन्दर बनेबाक सजावद नहीं थिक, इह उही अद्ध्यात्मिक उड्जाग प्रतिक थि, जक्रा बोदिकायस्त महसुस कर रहल्चति. मुता जखन हम पात पड़ेद ची, तो ही में उ पारमपलिक भाशा ची, माने नदी बहेत ची, हवाचलत ची, एही सेक्ता दिसकनेक पड़ा बरे लग ची. अगर उदारन्द थे बुजावैंची जक्शन हम कोनु नदीक परमपरागत वनन पड़एची ता हमरा मस्तिष्क मदधे नीचा भेहत पानी अगर तमे गाच व्रिख्षक सामाने चित्र बैटची राए, एक ता आम नदीक द्रुष्य परम्परागत वनन पड़ेई ची ता हमरा मस्तिष्क मद्धे नीचा बहेत पानी अगकात में गाज व्रिख्षक सामान निच्ट्र बैत आची हा एक ता आम नदीक द्रुश्यड मुदा जखन हम पीटीएपक चित्र पाच या चो देखाएच ची तते जिस सुर्यक तेज अ विकिरान देखाल गेल अख्रा पाथ में उतारब अद्टन्त अबश्ष्ष्य कचे मुदा रूक। कि हम सब यह नहीं सोची सके ची जिट्ट्र कार जानी भूजी का अमुर्ट शेली चूनला कचे ताकि इगटना कोनो एक ता एतिहासि कालखन्द धरी सीमित नहीं जाए? आँ, यो भो सके ताछी माने अमुर्त कलाक उदेश्षता पाथक का कल्पना के स्वतन्त्र चोरनाई होई ताछे जो हम सब पाथसा उक्रा बहत भेसी बान्दी देभ तकि उ कलाक जे आमुर्तता आचे, उ कथम नहीं भाजाते. इटर्क आपन ताम पर सही आचे, जे कल्पना के सुत्टर चोडवाख चाही. मुदा जो हम सब पात अच्टर कबीचक समवंद के पुन रुप से स्तापित नहीं करभ, तब पातख भडगी जाही तै. अग, माने एक्दम सा लग नहीं रवाख चाही. अग, हम ए नहीं कही लहल ची, जे पात्फ में लिखल जाए, जे चित्र पाच में बनल त्रिबुज गंगाग प्रतिक खिल, उतर बहुत बच्काना बहुज़ाई तै. अदर टेक्स्ट्बूक्जा का बहजगता है हमर कहबाक तात्पर ए आची जे पाथ में औहन शब्दावलिक प्रियोग हो जाए जाही से पाथक अव चेतन रूप से औही चित्र से जुडी जाए एक ता पुल बने बाक आवश्चता ची तिक कहलों मतलब पात्खक के पुर्नरूपन सुत्टन्द्र नहीं चोडी देनाई चे बलकी उक्रा एक ता सुख्ष्म दिशा देनाई चे अग, सतल क्यूज उदारन के लिल, जगन अद्ध्याय तीन में बोदि कायस्त दूर से गंगा के समभोदित करे चती तो उ कोनो सादारन पुकार नहीं आची, उ ब्रम्हांद का शक्ती सब के जगजोरी रहल चती. एक दम जो लेक्खपाथ में नाव, जलक लेहरी, वा माचक शान्त प्रवाख ऊहन विव्रन दशके चती, जे चित्र में आची, तो बहुत प्रभावी ही ते. जो पाथ मे इई लिखल जाए जे हुंकर पुकार से जहना प्रक्रतिक अकार बदली रहल चल या गंगा के लेहरी मे माचा सब कषान्त प्रवाह एक तनवव जामित्ये उगर्जा से बहरी उचल तपाथक तुरन्त उई आमुर्त चित्र से जुडी जैइते. बिल्कुल, आजगन गंगातट चोडी हूंका लोग अबेद चती मने अद्याय चार में तो चमत कारिक अनशा ची. औही समें चित्र में प्रयुक्त सूर्यक तेज या उर्जा मैं आक्रतिक वरनन कता में कहल जासके तची. जब पाथ में कत हो यावीजाई जे सूर्रे आपन परमपरिक आकार चोडी एक तेज विकिरन जका चारो दिस पसारी राल चल, तपाथक जखन औई पना पर जाक अच्छित्र दिखठ, तोक्रा लागल जज़ शब्द अच्छित्र एक दोस्रा सन्डित कोरो हलाची. अमुर्त अमुर्त कबीचक चितनाव अची ओएक्त सुन्दर काव्यात्मक लैई में बड़ल जाई तैई. अब बोदिक आयस्थ कई गातातम मुलता द्यान अब भक्तिकी गातातिक विद्यापती को पाती बड सुखसार पावल्तुव तीरे एहे पूनताक बखान करे तची एकदम जखन गंगाक लहरी हूनका अपना में समहित करे तची विद्यापति को पाति बड़ सुखसार पावल्तु अतीरे एह पूनताक बखान करे तची. एक दम जखन गंगाक लहरी हुनका अपना में समाहित करे तची, उही समय चित्रक जामिती कुर्जा पात्ध, कोस्मिक वरनन अविद्यापति क आमर पातिग जे संगम हित है, उ अगल्पनी आप्रवाव चोडद इटीन। द्हागा अलग-गल्ग नहीं अच्छे विद्यापती के संदर भे कताखे इतिहासिक गहराई देताची दर्वारक के द्रिश्छ पात्रके मानवी आदार देताची अच्छित्र पाथक समझस्य एक्रा पारलोकिक उचाई देटची. जखन यी तीनू द्हागा एक संग गुत्ठार जाए तै, तई पोठी मात्र एक ता समपादित लोक कता नहीं जाए तै. बलकी, मित्हिलाक साहित्तिक द़ोहरक एक ता उत्क्रिष्ट प्रतिरूब बनी जाए तै. इब बहुत आवश्यक छे जे कोनो भी समपादित अट्यासिक समगरी अपन मूल आत्माके नहीं चोडग, उद्या इच्टा चोटा चोटा बडलाउ कलजाई तब पडख अज्दाख के ओज्टर पर गरहन कपावत जे कर इवास्तम में अदिकारी अची लेखख के द्रिष्टी बहुत स्पष्ट अची, हुनकर काज प्रशन्स निय अची, बस उक्रा प्रस्टूती करन कर स्टर्पर किचु सन्रचनात्मक कसावत अग कलात्मक सामन्जस्यक आविश्षक्ता अचे. जा इ छोटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटटट� अगर उद्रित्रेख शुद्था केन मात्र कहबाक बद्ला, दर्बारक कोनो चोट गतनाक माद्यम सा, साख्षा दिखाई नाई. जायसा उनकर गंगा लावकर निरने आर स्वबाबिक लागे. आते सर, ॐू।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

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