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भाट-भाटिन_की_कथा.mp4

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:02चल ये सीथा आज की कहानी में चलते हैं.
  2. 0:02–0:05आज हम मैथिली लोग कतावो के खजाने से,
  3. 0:05–0:09बहात-बहातिन की बेहत दिल्चस्प कहानी का विष्लेषन करने वाले हैं.
  4. 0:10–0:11ये सर्फ एक कहानी नहीं है,
  5. 0:12–0:13बलकी इस में बेवफाई,
  6. 0:13–0:14रहस्यमए जादू,
  7. 0:14–0:19अर अंतिम नियाय का एक अईसा रोंटे कडे कर देने वाला खेल है,
  8. 0:19–0:22जो सद्यों से लोगों को मंत्र मुध्ध करता आरा है.
  9. 0:22–0:26जरा सोची ए, क्या हो अगर कोई बहयानक रहेस्यव,
  10. 0:26–0:30सच्छ में एक विश्शेले साप कर रूप ले ले?
  11. 0:30–0:33इस कहानी में जो रहेस से हैं वो सुफ दराने वाले नहीं हैं
  12. 0:33–0:36बलकी वो सच्छ्मुच जान लिवा हैं
  13. 0:36–0:39जब विश्वाजगात अपनी सारी हदे पार कर जाएं
  14. 0:39–0:42तो अन्जाम कितना बहयंकर हो सकता है
  15. 0:42–0:44यही इस कता की अस्ली ज़ है
  16. 0:44–0:50तो कहानी के पहले बाख की वर बड़ते हैं. एक विश्शेला गुप्त प्रेम प्रसंग.
  17. 0:50–0:56कहानी के शुर्वात मेही हमें पता चलता है, के भाटन का जो ये दूका है, वो कोई आम दूका नहीं है.
  18. 0:56–1:02उसका चकर किसी इनसान से नहीं चल रहा था, बलकी एक गहु मन से था.
  19. 1:14–1:20और ये बाथ सबसे ज़ादद तब कष्टकती है, जब हम देकते हैं कि वो दोनो के साथ कैसा बरताव करती ती.
  20. 1:21–1:26एक तरफ वो उस भयानक साब किलिए, पूरी लगन से एक दम स्वाध्दिष्ट कहना बनाती है,
  21. 1:26–1:32और दूस्री तरव आपने ही पती भाट को भासी और फैकागावा खाना परूस देती है.
  22. 1:32–1:36ये सच्मे ख्रूर्ता की सारी हदे पार करने बात है.
  23. 1:36–1:39लेकिन भाट सर्फ बूरे बरताव तक ही नहीं रूकी.
  24. 1:39–1:43बाटिन अब अपने पती को पुरी तरः से अपने रास्ते से हथाना जाती जाती ती.
  25. 1:43–1:47उस सीदे अपने उस साप प्रेमी को आधेज देती है,
  26. 1:47–1:49के वो बाट को दस ले और उसे मार डाले,
  27. 1:49–1:53ताकि वो दोनो बिना किसी रुकावट के साथ रहे सकें.
  28. 1:53–2:01अब आते है कहानी के दुसरे हिसे पर, अन जाने में साप का वड, देकते है कि किस्मत का पासा कैसे पलडता है?
  29. 2:01–2:05तो होता क्या है कि वो साप भार्टिन के आदेश का पालन करते हुए,
  30. 2:05–2:10चुप चाप भार्ट के उतारे गय जूते के अंदर जाकर चिप जाता है,
  31. 2:10–2:12अर गात लगाकर बैट चाता है.
  32. 2:12–2:15इदर भाध नदी के किनारे अपने पैर दूरा होता है.
  33. 2:15–2:18उसे इस खतरे की कोई भनक तक नहीं होती.
  34. 2:18–2:21वो मोथ से बस चंद इंच की दूरी पर होता है.
  35. 2:21–2:27लेकिन यही पर एक बहुत ही आमसी आदत भाध की जान बचालेती है.
  36. 2:27–2:34वो क्या करता है के पैर दोने के बाद दूल ज़ारने के लिए अपने जूते को जोर से जधकता है
  37. 2:34–2:36और वो साप अचानक से बाहर गिर परता है
  38. 2:36–2:41गब राकर आत्मरक्षा मे बार्द तुरर्थ उस साप को मार डालता है
  39. 2:41–2:47अर उसे जरा भी अंदाजा नहीं होता, के उसने अभी अभी अपनी के प्रेमी का ही काम तमाम कर दिया है.
  40. 2:47–2:52अभ ये पल देख्छिए, किना नाटकी है, एक तरव एक पती है,
  41. 2:52–2:58जो खुशी खुशी पूरे उच्साह के सात अपनी जान बचने की बहादुरी भरी कहानी सूना रहा है.
  42. 2:58–3:02और तीक उसी के सामने उसकी पतनी कडी है,
  43. 3:02–3:08जो बरगत के पेड पर तंगे अपने म्रिद साप प्रेमी को देख कर गेहरे सद में से बेहुष हो रही है.
  44. 3:08–3:14चल ये अब तीस्रे और सबसे कहोफनाक इस्टे की तरव बड़ते हैं. एक नो हिस्सो वाली पहेली.
  45. 3:14–3:22फोश्वे आने के बाद भाटेन अपने गेहरे दुख को एक बहुत ही खहोफनाक और सोची समजी साजिष में बबड़ल देती है.
  46. 3:22–3:26उसे बहुत फीज़ाणी से पूरे नाउ तुक्रो में कार देती है.
  47. 3:26–3:33ये सुन्ने में जितना बयानक लकता है, उसकी आगे की जानलेवा योजना के लिए ये उतना ही जरूरी था.
  48. 3:33–3:38अप ज़रा इन छिपने की जगहों पर गवर कर ये चार तुक्डे खाट के पायों के नीचे,
  49. 3:38–3:43एक मच्वया के नीचे, एक तेल में, एक नमक में, एक अनाज भंदार में,
  50. 3:43–3:48और एक तोकरी में. ये जगहे इतनी अजीब है कि कोई सपने में नहीं
  51. 3:48–3:51ये जगग़े इतनी अजीब है कि कोई सबने मे भी नहीं सुट सकता
  52. 3:52–3:55और इसी आदार पर वो अपने पती को चुनाती देती है
  53. 3:55–4:01कि अगर वो इं जगगोंगोंग़ पर शिपी चीस का सही सही अनुमान नहीं लगा पाया तो उसे मुझत की सजाएगी.
  54. 4:01–4:05ये एक आज्सा खेल ता जिसे जीतने का कोई चानसी नहीं दा.
  55. 4:05–4:10इस ना मुंकिन सी पहेली में बूरी तराव फसकर भाध पूरी तराशे निराश हो जाता है.
  56. 4:11–4:15मौद्स सामने देखकर वो अपनी पतनी से बस इतनी भीख मागता है,
  57. 4:15–4:19कि उसे आखरी भार अपनी बहन्न से मिलने के लिए दो दिन की मोलत दे दी जाए.
  58. 4:19–4:26और उसकी पतनी वो अपने एहंकार और जीद के नशे मे इतनी चूर थी की वो तुरन्त इस बात के लिए राजी हो जाती है.
  59. 4:26–4:31और अब हम पहुचते है कहानी के चोथे हिस्से में. बात करने वाले दीएएँगा रहेस्सिय.
  60. 4:31–4:35यही से कहानी में एक जादूई मोड आता है.
  61. 4:35–4:41बाद की बहन जो पहले से ही आपने बहाई की जन्म कुणली देख कर उसकी जान को लेकर बहुत परेशान थी.
  62. 4:41–4:45वो उसके साथ वापस गाँ लोटने का फैसला करती है.
  63. 4:45–4:48रास्ते में वो दोनो एक द्रमशाला में रुकते है.
  64. 4:48–4:50रात कापी बेचाण करने वाली होती है,
  65. 4:50–4:57लेकिन तब ही वहा एक आईसी अविश्वसनी आग जादूई गधना गधती है, जो सब कुछ पलड़ कर रग देती है.
  66. 4:57–5:03होता यह है कि उस दरमशाला मे रख्य मिट्टी के दिय अच्छानक से जीवित होडते है,
  67. 5:03–5:05अर आपस में बाते करने लकते हैं.
  68. 5:05–5:08जी हैं दीए बाते करने लकते हैं.
  69. 5:08–5:11और इस जादुई बाच्चीत में वो बता देते हैं,
  70. 5:11–5:13कैसे बहातें अपने पती को मारना चाती है.
  71. 5:13–5:18और वो जूटी पहेली असल में उसके म्रित साप प्रेमी के तुक्रों के बारे में है.
  72. 5:18–5:25भाट की बहन चिपकर ये सब सुन लेती है, और इस तरा पतनी की पुरी खोफनाक साजिश का परदा पाष हो जाता है.
  73. 5:25–5:33अब आते है, कहानी के आक्री और सबसे रोमानचक भाग पर, शाह और मात, तथा अन्तिम न्याए.
  74. 5:33–5:35सस्पैंस इग्दम चरम पह पहवज जाता है,
  75. 5:35–5:39चब वो बहें पुरे आत्मविष्वास के साथ गाँ लोडती है,
  76. 5:39–5:44और सीथा माग करती है, कि वो जान लेवा पहेली वाला खेल अब वो खुड खेलेगी.
  77. 5:44–5:49ये एक आँजा दाव चिसकी उमीद उस दोके बास भाटिन को बिलकुल नहीं ती.
  78. 5:49–5:54शर्ट ये रख्खी जाती है, अगर बहन पहली सुलजाने में नाकाम रही,
  79. 5:54–5:59तो उसकी जान जाएगी, लेकिन अगर वो जीद गए, तो भाटिन की मुझ पक्की.
  80. 5:59–6:05पक्की और किवकि भाटन को पुरा यकीन ता कि उसकी बनाई पहली को कोई सुजाही नहीं सकता,
  81. 6:05–6:11वो अपने ही गमन्ड में बिना कुछ सोचे समजे इस भ्यानक शर्थ के लिए हाग देती है.
  82. 6:11–6:13फिर जो होता है वो देखने लायक है.
  83. 6:13–6:18बहें बवोड़ी पूर्ती से और बिना एक भी गल्ती किये
  84. 6:18–6:22साप के चिपेवें सब ही नाट तुक्रों को एक-गे करके बाहर निकाल देती है.
  85. 6:22–6:26वो उस नामुमकिंसी पहेली को चुटकियो में हलकर देती है.
  86. 6:26–6:31और शर्ट के मुताबिक उस दोखेबास पतनी को उसी वक्त मुध के गार्ट उतार दिया जाता है.
  87. 6:31–6:35पूल मिलाकर इस विष्लेश्टन से ये बात बिलकल साफ हुजाती है,
  88. 6:35–6:39कि कैसे एक बहें की बहादुरी और उसकी तेस बुद्दीने
  89. 6:39–6:42अपने बहाई को दोखे के एक आजे जाल से बचालिया,
  90. 6:42–6:45जिस से निकलना लग भग ना मुमकिन ता.
  91. 6:45–6:49बौराई ने जो चाल चली ती, उसी परभारी पड़गगगग.
  92. 6:49–6:53ये कहानी जाते-जाते सच्चाई और वफादारी के बारे में
  93. 6:53–6:55सोचने पर मजबोर कर देती है.
  94. 6:55–6:58ये दिखाती है कि दोखा चाहे कितना भी गेरा किवनहो,
  95. 6:58–7:00कितना भी चबाया किवनजाए,
  96. 7:00–7:02वो कभी नकभी सामने आही जाता है,
  97. 7:02–7:06बस सही समय और सही नजरिये कि जारूरत होती है.
  98. 7:06–7:07तो ज़र सूची ए,
  99. 7:07–7:09हमारी अपनी जिन्दगी में एसे कोन से सच हैं,
  100. 7:09–7:12तो बस तोड़े से प्रकाष में आने का अंतिजार कर रहे हैं।
  101. 7:12–7:16इसी विचार के साथ आजका ये विष्लेषन हम यही समाबत करते हैं।

Plain text

चल ये सीथा आज की कहानी में चलते हैं. आज हम मैथिली लोग कतावो के खजाने से, बहात-बहातिन की बेहत दिल्चस्प कहानी का विष्लेषन करने वाले हैं. ये सर्फ एक कहानी नहीं है, बलकी इस में बेवफाई, रहस्यमए जादू, अर अंतिम नियाय का एक अईसा रोंटे कडे कर देने वाला खेल है, जो सद्यों से लोगों को मंत्र मुध्ध करता आरा है. जरा सोची ए, क्या हो अगर कोई बहयानक रहेस्यव, सच्छ में एक विश्शेले साप कर रूप ले ले? इस कहानी में जो रहेस से हैं वो सुफ दराने वाले नहीं हैं बलकी वो सच्छ्मुच जान लिवा हैं जब विश्वाजगात अपनी सारी हदे पार कर जाएं तो अन्जाम कितना बहयंकर हो सकता है यही इस कता की अस्ली ज़ है तो कहानी के पहले बाख की वर बड़ते हैं. एक विश्शेला गुप्त प्रेम प्रसंग. कहानी के शुर्वात मेही हमें पता चलता है, के भाटन का जो ये दूका है, वो कोई आम दूका नहीं है. उसका चकर किसी इनसान से नहीं चल रहा था, बलकी एक गहु मन से था. और ये बाथ सबसे ज़ादद तब कष्टकती है, जब हम देकते हैं कि वो दोनो के साथ कैसा बरताव करती ती. एक तरफ वो उस भयानक साब किलिए, पूरी लगन से एक दम स्वाध्दिष्ट कहना बनाती है, और दूस्री तरव आपने ही पती भाट को भासी और फैकागावा खाना परूस देती है. ये सच्मे ख्रूर्ता की सारी हदे पार करने बात है. लेकिन भाट सर्फ बूरे बरताव तक ही नहीं रूकी. बाटिन अब अपने पती को पुरी तरः से अपने रास्ते से हथाना जाती जाती ती. उस सीदे अपने उस साप प्रेमी को आधेज देती है, के वो बाट को दस ले और उसे मार डाले, ताकि वो दोनो बिना किसी रुकावट के साथ रहे सकें. अब आते है कहानी के दुसरे हिसे पर, अन जाने में साप का वड, देकते है कि किस्मत का पासा कैसे पलडता है? तो होता क्या है कि वो साप भार्टिन के आदेश का पालन करते हुए, चुप चाप भार्ट के उतारे गय जूते के अंदर जाकर चिप जाता है, अर गात लगाकर बैट चाता है. इदर भाध नदी के किनारे अपने पैर दूरा होता है. उसे इस खतरे की कोई भनक तक नहीं होती. वो मोथ से बस चंद इंच की दूरी पर होता है. लेकिन यही पर एक बहुत ही आमसी आदत भाध की जान बचालेती है. वो क्या करता है के पैर दोने के बाद दूल ज़ारने के लिए अपने जूते को जोर से जधकता है और वो साप अचानक से बाहर गिर परता है गब राकर आत्मरक्षा मे बार्द तुरर्थ उस साप को मार डालता है अर उसे जरा भी अंदाजा नहीं होता, के उसने अभी अभी अपनी के प्रेमी का ही काम तमाम कर दिया है. अभ ये पल देख्छिए, किना नाटकी है, एक तरव एक पती है, जो खुशी खुशी पूरे उच्साह के सात अपनी जान बचने की बहादुरी भरी कहानी सूना रहा है. और तीक उसी के सामने उसकी पतनी कडी है, जो बरगत के पेड पर तंगे अपने म्रिद साप प्रेमी को देख कर गेहरे सद में से बेहुष हो रही है. चल ये अब तीस्रे और सबसे कहोफनाक इस्टे की तरव बड़ते हैं. एक नो हिस्सो वाली पहेली. फोश्वे आने के बाद भाटेन अपने गेहरे दुख को एक बहुत ही खहोफनाक और सोची समजी साजिष में बबड़ल देती है. उसे बहुत फीज़ाणी से पूरे नाउ तुक्रो में कार देती है. ये सुन्ने में जितना बयानक लकता है, उसकी आगे की जानलेवा योजना के लिए ये उतना ही जरूरी था. अप ज़रा इन छिपने की जगहों पर गवर कर ये चार तुक्डे खाट के पायों के नीचे, एक मच्वया के नीचे, एक तेल में, एक नमक में, एक अनाज भंदार में, और एक तोकरी में. ये जगहे इतनी अजीब है कि कोई सपने में नहीं ये जगग़े इतनी अजीब है कि कोई सबने मे भी नहीं सुट सकता और इसी आदार पर वो अपने पती को चुनाती देती है कि अगर वो इं जगगोंगोंग़ पर शिपी चीस का सही सही अनुमान नहीं लगा पाया तो उसे मुझत की सजाएगी. ये एक आज्सा खेल ता जिसे जीतने का कोई चानसी नहीं दा. इस ना मुंकिन सी पहेली में बूरी तराव फसकर भाध पूरी तराशे निराश हो जाता है. मौद्स सामने देखकर वो अपनी पतनी से बस इतनी भीख मागता है, कि उसे आखरी भार अपनी बहन्न से मिलने के लिए दो दिन की मोलत दे दी जाए. और उसकी पतनी वो अपने एहंकार और जीद के नशे मे इतनी चूर थी की वो तुरन्त इस बात के लिए राजी हो जाती है. और अब हम पहुचते है कहानी के चोथे हिस्से में. बात करने वाले दीएएँगा रहेस्सिय. यही से कहानी में एक जादूई मोड आता है. बाद की बहन जो पहले से ही आपने बहाई की जन्म कुणली देख कर उसकी जान को लेकर बहुत परेशान थी. वो उसके साथ वापस गाँ लोटने का फैसला करती है. रास्ते में वो दोनो एक द्रमशाला में रुकते है. रात कापी बेचाण करने वाली होती है, लेकिन तब ही वहा एक आईसी अविश्वसनी आग जादूई गधना गधती है, जो सब कुछ पलड़ कर रग देती है. होता यह है कि उस दरमशाला मे रख्य मिट्टी के दिय अच्छानक से जीवित होडते है, अर आपस में बाते करने लकते हैं. जी हैं दीए बाते करने लकते हैं. और इस जादुई बाच्चीत में वो बता देते हैं, कैसे बहातें अपने पती को मारना चाती है. और वो जूटी पहेली असल में उसके म्रित साप प्रेमी के तुक्रों के बारे में है. भाट की बहन चिपकर ये सब सुन लेती है, और इस तरा पतनी की पुरी खोफनाक साजिश का परदा पाष हो जाता है. अब आते है, कहानी के आक्री और सबसे रोमानचक भाग पर, शाह और मात, तथा अन्तिम न्याए. सस्पैंस इग्दम चरम पह पहवज जाता है, चब वो बहें पुरे आत्मविष्वास के साथ गाँ लोडती है, और सीथा माग करती है, कि वो जान लेवा पहेली वाला खेल अब वो खुड खेलेगी. ये एक आँजा दाव चिसकी उमीद उस दोके बास भाटिन को बिलकुल नहीं ती. शर्ट ये रख्खी जाती है, अगर बहन पहली सुलजाने में नाकाम रही, तो उसकी जान जाएगी, लेकिन अगर वो जीद गए, तो भाटिन की मुझ पक्की. पक्की और किवकि भाटन को पुरा यकीन ता कि उसकी बनाई पहली को कोई सुजाही नहीं सकता, वो अपने ही गमन्ड में बिना कुछ सोचे समजे इस भ्यानक शर्थ के लिए हाग देती है. फिर जो होता है वो देखने लायक है. बहें बवोड़ी पूर्ती से और बिना एक भी गल्ती किये साप के चिपेवें सब ही नाट तुक्रों को एक-गे करके बाहर निकाल देती है. वो उस नामुमकिंसी पहेली को चुटकियो में हलकर देती है. और शर्ट के मुताबिक उस दोखेबास पतनी को उसी वक्त मुध के गार्ट उतार दिया जाता है. पूल मिलाकर इस विष्लेश्टन से ये बात बिलकल साफ हुजाती है, कि कैसे एक बहें की बहादुरी और उसकी तेस बुद्दीने अपने बहाई को दोखे के एक आजे जाल से बचालिया, जिस से निकलना लग भग ना मुमकिन ता. बौराई ने जो चाल चली ती, उसी परभारी पड़गगगग. ये कहानी जाते-जाते सच्चाई और वफादारी के बारे में सोचने पर मजबोर कर देती है. ये दिखाती है कि दोखा चाहे कितना भी गेरा किवनहो, कितना भी चबाया किवनजाए, वो कभी नकभी सामने आही जाता है, बस सही समय और सही नजरिये कि जारूरत होती है. तो ज़र सूची ए, हमारी अपनी जिन्दगी में एसे कोन से सच हैं, तो बस तोड़े से प्रकाष में आने का अंतिजार कर रहे हैं। इसी विचार के साथ आजका ये विष्लेषन हम यही समाबत करते हैं।

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