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बोधि_कायस्थक_भक्ति_आ_गंगाक_चमत्कार.m4a

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:12दा दिबेट में आहांक स्वागत आजि, आई हमरा सब एक ता एहन वैचारिक विमर्ष्द दिस बड़ी रहल ची, जताई कोनो विश्वे के मने विविनन द्रिष्टी कों सदेखाल जाते इच।
  2. 0:12–0:18आई, आई हमर सब के विमर्षक आदार अची मित्लाक एक्ता बहुत प्रसिद गाता.
  3. 0:18–0:27एक्दम, गजेंद्र ताकुर दूरा सम्पादित असंकलित एक्ता अछ्तिन्त महत्व पुन सहित्तिक संदर बची बजद सुक्सार पाँलतु तीरे.
  4. 0:27–0:28सत्तिबात
  5. 0:28–0:31इवास्तमे एक्ता एहन गाता अची
  6. 0:31–0:33जे मित्लाग जन मानस में
  7. 0:33–0:35गहीर पैट बनावने आचे
  8. 0:35–0:37एक अची बोदि कायस थक
  9. 0:37–0:40जे मित्लाग राजाग दरवार में
  10. 0:40–0:42एक ता सादारन सेवक चला
  11. 0:42–0:43बुजली
  12. 0:43–0:46आहुनक जीवनाक इ अन्तिम गतना
  13. 0:46–0:49अगरा हमरा सब गंगा लाब के रूप में जाने ची
  14. 0:49–0:53महाकवी विद्यापतिक उत्क्रिष्ट रचनाक मुल प्रेणा बनल
  15. 0:53–0:58मुदा प्रष्न इए ची जी विद्यापती एकरा कोना देखल नहीं
  16. 0:58–1:01अगरा सब के ने एकरा कोना देखबाक चाही
  17. 1:01–1:05आदाईशा हमर सबक आए दिनक मुख्य प्रष्न उत्पन होई तची
  18. 1:05–1:05जी आप
  19. 1:05–1:09विद्यापती द़ारा आपन प्रसिद ग्रन्त प्रुष परिक्षा
  20. 1:09–1:14आब आब आपन आमर मैठ्ली पदे में इगता लिखबाक मुख्य उदेश की आची
  21. 1:14–1:44अग, उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वा
  22. 1:44–1:49जे ये कता अटूट भक्ती आप पूर्ण समरपनक भूधिक विजैक गाता आची
  23. 1:50–1:52मने आईक रा पूर्नता चमतकार माने ची
  24. 1:53–1:57आईक दम बोदि कायस थक शिवजीक प्रती गही रास्ता चल
  25. 1:57–2:02मुदा हुंकर महानताक वास्तविक प्रमान हुंकर जीवनक अंतिम शन मे भीतेत आची.
  26. 2:02–2:05जगन उगगा ततिक दिस चारहल चला.
  27. 2:05–2:10सत्य, गंगा से अर्दाकोस दूर रहिक, साख्षात गंगा माई के पुकारब,
  28. 2:10–2:16अगग्वा माने गंगा के अपन तट्ट तोडी कहुन का अपनामे समाहित कलेब इकुनो रूपक नहां ची.
  29. 2:16–2:20इपोच रूपेन स्रदामए समर पन माची.
  30. 2:20–2:24विद्यापती इगधना के एतिये लेल आमर्केलने
  31. 2:24–2:26जे इप्रमानित कराईता ची
  32. 2:26–2:31जे साच भक्ती प्रक्रतिक अचल नियमक के से हो जुका सके टाची
  33. 2:31–2:36हमरा लगाईता ची जजक्हन हम्रासव चमतकार पर भेसी केंध्रित भोजाए चीना
  34. 2:36–2:40तक्हन हम्रा सब उही गाताक वास्तविक मानवियसार गमा देच।
  35. 2:40–2:41मद्वियसार कोना?
  36. 2:41–2:46देखो, चमतकार तमातर एक्ता प्रतिकात्मक परिनाम अचे
  37. 2:46–2:48मूल सन्देश बहुत प्रासंगी कचे
  38. 2:48–2:51बोदि कायस्त राज्दर्बार में काच करे चला
  39. 2:51–2:52भूँजलिये?
  40. 2:52–2:54अदर्बारी चला हो
  41. 2:54–2:56दर्बारी जीवनक अर्थ भुज़े च्या है
  42. 2:56–2:58उशक्ति के केंदर में चला
  43. 2:58–3:00जताई प्रलोबन चारो दिस्सा चनी
  44. 3:00–3:02मुदश्रोथ समगरी श्पष्ट करे तचे
  45. 3:02–3:04जे उपरस्त्री अद्धनक लाल्सा सचर्वदा मुक्त चला
  46. 3:04–3:06उद्चला हो
  47. 3:06–3:11अद तु चलाओ उ आपन आएके दान पुन्यम करच करच करच खला
  48. 3:11–3:16एक दम, विद्यापती आईगी कथाए एती लेल चुनननी कारन इसिद करे तचे
  49. 3:16–3:22जे यए आच्रन शुद आचे, तब मोक्षक लेल कुनो भाउतिक अनुश्ठान अनिवार्य नही आचे
  50. 3:22–3:24अदा हुनक अपन नेतिकता च्यल
  51. 3:24–3:28नहीं नहीं, अही दरबारी जीवन पर गेहीर द्रिष्टी दी
  52. 3:28–3:30संदर्व समगरी स्पाष्ट करे तची
  53. 3:30–3:33जे बोदी कायस्त्थ अप दोगा प्रती कची
  54. 3:33–3:35जे गंगा कप्रत्यक्ष जल्द हरी पहुचव आवश्षक नहीं च्यल
  55. 3:35–3:37यह कोनो आर्थ नहीं रख्छ है ताछी
  56. 3:37–3:41आँ, मुदातनिक सोचु जे उशुद चरित्र आयल कते सा
  57. 3:41–3:44अदा हूँनक आपन ने दिकता च्छल
  58. 3:44–3:48नहीं नहीं, उही दरबारी जीवन पर गहीर द्रिष्टी दी
  59. 3:48–3:50संदर्व समगरी सपाष्ट करे ताछी
  60. 3:50–3:54जे बोदि कायस्त राजाग दर्बार में एक्ता सादारन दर्माहा
  61. 3:54–3:57माने वेतन पर काजकर अच्छला
  62. 3:57–3:57हाँ
  63. 3:57–4:03उनक जीवन केंद्र में भोला बाबाक, न्यमित, पुजा, अच्चना, आ अनन्ने भक्ती चल
  64. 4:03–4:05इजे हुनक आद्धियात्मिक शक्ती चलना
  65. 4:05–4:08उही सा हुंकर चरित्रक निरमाद भेल
  66. 4:08–4:10आहा हुनक नेतिकता किन
  67. 4:10–4:13उनकर दार्मिक्तासा �alag nahi ka sakachi.
  68. 4:13–4:13मुदा?
  69. 4:13–4:17सूनु, यदि उश्व का अनन्ने भक्त नहीं होईता,
  70. 4:17–4:20उही इश्वर्ये शक्ती पर हुनको विष्वास नहीं होईते,
  71. 4:20–4:23तकि उनकर चरित्र एतेक निष्कलंक भासक अच्छल,
  72. 4:23–4:26भक्ती ही उग कवछ च्छल,
  73. 4:26–4:28जे हुनका प्रलोबहन सा बचेलक
  74. 4:28–4:32आब, ख्षमा करभ, मुदा हम इबात नहीं मानी रहल ची
  75. 4:32–4:34हम बतावे ची जी की एक
  76. 4:34–4:35कहु?
  77. 4:35–4:38पूजा पात निष्चही महत्वपून चल
  78. 4:38–4:40मुदा हुनक महानता हुनकर सामाजिक
  79. 4:40–4:43आनेते क आच्रनक तन्तर में चूपल आची
  80. 4:43–4:46आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची
  81. 4:46–4:48कारन तो उही चलने
  82. 4:48–4:50आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची
  83. 4:50–4:51कारन तो उही चलने
  84. 4:51–4:53आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची
  85. 4:53–4:55कारन तो उही चलने
  86. 4:55–4:57आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची
  87. 4:57–4:59कारन तो उही चलने
  88. 4:59–5:03राजदर्बार में रहेब तैना आची जना कोनो पेख कारपरेट हूस में
  89. 5:03–5:05कजानाग चाभिक संथाडरहेब
  90. 5:05–5:06आखा
  91. 5:06–5:08सत्ताक दलाल वकोशा द्यक्ष्छी
  92. 5:09–5:11उते प्रलोबन के वलुपस्तित नहीं रहेता ची
  93. 5:11–5:14बलकी उओई ताम का मुद्डरा होईता ची
  94. 5:14–5:20उते बिना एक्ता पाई आपन जेभी में रख्खे, जीवित रहेप एक्ता यान्त्रिक असमबवता जगा जगा जगा जगा जगा
  95. 5:20–5:22मने एक्ता करपरेत लोबिस्ट जगा
  96. 5:22–5:25एक दम, मुदा बोदिकायस्त एके लनी
  97. 5:25–5:29उ आपन आवश्वक्ता सबेशी समपती समाजक सेवा में लगवेत चला
  98. 5:29–5:32सुईच्छा सर लालसा मुक्त रहा भूंकर अस्ली तपस्या चल
  99. 5:32–5:36इख्रपूरेट लाभियस्ट्फला द्रिश्टान तब द्रोच्षक अचे
  100. 5:36–5:42मुदा महम्रा लगाई तचीजे इब उदिक आयस्ताक युगग मान्सिक्ताके आदूनिक चस्मा सदेखा बहल.
  101. 5:42–5:43कोना?
  102. 5:43–5:49देखो, उई समझ में राज दरबार में सेवार द्रहत, दर्म आनेटिक्ता दूता अलग वस्तू नहीं चल.
  103. 5:49–5:57उनकर इज सचेत निरने चल, जे दहन के लाल सा नहीं करब, उसीबे सीदे उनकर इश्वर ये भाई आप्रेम सजुडल चल.
  104. 5:57–6:06कर जा आम्रा सा पोली तरबारी जीवन से आगु बड़ाई, तो उनकर जीवनक दो सर आँ सब सब महत्व पुन पड़ाउ परवे च्छें.
  105. 6:06–6:08आप गंगा लाप कर निरनेः
  106. 6:08–6:09सत्या
  107. 6:09–6:12आप स्वतागन के लेल हमेंकरा स्पस्ट कर दी
  108. 6:12–6:17जी उही काल कन में गंगा लाप कोनो सादारन पिकनिक वाद तीर थ्याद्रा ने चल
  109. 6:17–6:20एक ता सरवोच अद्यात्मिक लक्ष्मानल जाए चल
  110. 6:20–6:27जद वेक्ती बुड़ापा में आपन गर परिवार त्यागी का गंगा के तपर मरनान तक प्रतिक्षा लेल जाई चल.
  111. 6:27–6:34एक दम एक ता कत्हुर शारेरेक अनुश्टान चल, आईहे ताम हमर तरक सबसा भेशी मुखर होईता चे.
  112. 6:34–6:35आँ.
  113. 6:35–6:39आप ख़े ची जे एहूंकर भक्ती कच्रम वस्ता चल
  114. 6:39–6:43मुदग जखन उ गंगा सा अद्दाकोस दूर चला हा
  115. 6:43–6:45तकन जी गतन भेल उक्राहा कुना देखे ची
  116. 6:45–6:48हम उक्रा पुरन समरपना क्रुप में देखे ची
  117. 6:48–6:48समरपन
  118. 6:48–6:51आप जखन एक ता व्रिद्धवेक्ती
  119. 6:51–6:54जही में आप आगु बदबाक तनिक समवर्ध नहीं बचाले जे
  120. 6:54–6:56उओह उही आदाकोस के दूरी सा
  121. 6:56–6:58आपन समपुरन प्रानद पेने सा
  122. 6:58–7:00गंगा केन पुकारे तची
  123. 7:00–7:01मुद अदा
  124. 7:01–7:03तव उ आहनकार नहीं आच
  125. 7:03–7:06उ आसाहाय अवस्ताक अंतिम पुकार आचे
  126. 7:06–7:09उ साख्शात गंगा से याचना करहल चला,
  127. 7:09–7:12करन उनका पुरन विश्वाश चल,
  128. 7:12–7:16जे गंगा उनका सुन्ती आप प्रक्रतिक उ नियम तुटल.
  129. 7:16–7:20गंगा अपन तद तोडके उनका लग हायल,
  130. 7:20–7:23इब भक्तिक बहुतिक प्रमान आचे,
  131. 7:23–7:30यबी केवल नेतिक्ताक बात रहित, ता प्रक्रती के एक बहवे रूपेन आपन निम बदलवाग के आँ सकता चल?
  132. 7:30–7:35एक ता प्रभाव साली तर्क आची, बुदा की आए विचार के ने ची,
  133. 7:35–7:39जे यदी मात्र एश्वर्य ये सकती आब भकती ही सरवो परी आची,
  134. 7:39–7:42तव उनका इशाररिक कष्ट की एक भोगे पडल?
  135. 7:42–7:45आँ खष्ट तद तीरत की हिसा जे
  136. 7:45–7:49यदि प्रक्रिति उनका पहिने येसे निष्कलंक मानच्चल
  137. 7:49–7:51तव उनका उयात्रा की ख करे देलेगेल
  138. 7:51–7:54हम्रा ले, बोदेक आयस थाक औही ताम
  139. 7:54–7:56आदा कोस पहिने रुक जे बाक
  140. 7:56–8:00जे अद आजी उबहे करमा कान्द के एक ता बहुत पेग क्शंगान चे
  141. 8:00–8:01खंदन कोना?
  142. 8:01–8:06उगखतना प्रक्रिति वा इश्वरक इगोशना आजे आव ओर नहीं
  143. 8:06–8:14इक ता सन्देश जे आहाक जीवन भरेक सतकर्म, आहाक दरबारी जीवन कनिष्छलता, इस सबता आहाके पहने ये पार लगा चुकाला चे.
  144. 8:14–8:15मुदा?
  145. 8:15–8:36उगरा प्रक्रती स्वायम क्हन्दित कर रहाल चे बिना कोनो अत्रेक्त तपस्या केन हूना मोक्ष भेटब इस पष्ट रूपे भुजावेत आची जे तीर्त स्वायम आँलक चल के आजेत यादि आजरन शुद्दाची.
  146. 8:36–8:42बुज्राल ची जे आहा एक रा कर्म कान्डक विरोद में एक तप प्रतीक क्रूप में देखे राल ची
  147. 8:42–8:45मुदा हम्रा एठम आग बात काटे परत
  148. 8:45–8:45कहो?
  149. 8:46–8:50यदी प्रकरती वा एश्वर कें के वल इशन्देश देवाक रहेद
  150. 8:50–8:52जे आहा खसत कर्म पर्यापत ची
  151. 8:52–8:58तब बोदि कायस्त केन अपन गर पा अपन भिच्छोन पर शान्तिपुन म्रित्य। भेटी सकई चलन,
  152. 8:58–9:01विद्यापती उक्रा से हो महान मानी सकच्छला.
  153. 9:01–9:02मुदा औण नहीं भेल.
  154. 9:02–9:03नहीं भेल.
  155. 9:03–9:05उनका गर चोई परल,
  156. 9:05–9:07उनका उयात्रा करे परल,
  157. 9:07–9:13क्यक करन बोद्टिक अनुश्टान, औजे तीर त्यात्रा कष्ट ची, उ बबक्तिक प्रक्रियाक हिसा आची.
  158. 9:13–9:14अआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ
  159. 9:14–9:20उ अर्दा कोस दूर कहसे परव, कोनु रूपक नहीं उ शारीडिक यतार्थ चल,
  160. 9:20–9:26अ गंगा कोही तट्सब बाहर आईप, उनका सपर्ष्करव, इवही कष्टक पूरुसकार चल,
  161. 9:26–9:28यदि हम्रा सब एक रा मात्र रूपक मानी लेव,
  162. 9:28–9:32तो उही आसीम चमत्कारक भव्यता समाप्त बहुजाईता ची
  163. 9:32–9:35जक्रा विद्यापती आपन काव्यमे स्थान दिलानी
  164. 9:35–9:37आप जक्ण विद्यापती काव्या पर आहा आँल ची
  165. 9:37–9:41तो हम्रा सब उही तीसर विन्दुदिस बड़ी जते
  166. 9:41–9:43इगता सहित्यमे आमर भेल
  167. 9:43–9:45आद सुक सार वाला पद
  168. 9:45–9:47नहीं, उक्रा सा पहने
  169. 9:47–9:49गजेंद्र ताकूराक समपादे ती संदर्प
  170. 9:49–9:51अप श्पाष्ट करे तची
  171. 9:51–9:53जे विद्यापती एक्रा कताई संकल इत्केलनी
  172. 9:53–9:55औएक्रा अपन प्रसिद्द संष्क्वित ग्रन्त
  173. 9:55–9:57अगटम इक ता इक नीती गरन्त चल,
  174. 9:57–9:59जे नव्युवक राज्कुमार सबहकें,
  175. 9:59–10:01इस शिकाएबक ले लिखल गल चल,
  176. 10:01–10:04जे एक ता आदर्ष प्रशासक कोना बनल जाए.
  177. 10:04–10:06इस पूरुशार तक परिक्षा अची.
  178. 10:06–10:08हम माने ची जे नीती गरन्त अची.
  179. 10:08–10:09मुदा?
  180. 10:09–10:14अक्तम इप मुलता एक ता नीति गरन्त चल, जे नव्यूग राज्कुमार सबहकें
  181. 10:14–10:19इस शिकाएबक ले लिखल गल चल, जे एक ता अदर्ष प्रशासक कोना बनल जाए.
  182. 10:19–10:21इस पूरुशार तक परिक्षा अची.
  183. 10:21–10:24हम माने ची जे नीति गरन्त अची. मुदा?
  184. 10:24–10:28तनिक सुनु हम्रा, जखेन आहा भविष्षक राजा सबके प्रषक्षिट करो रहल ची,
  185. 10:28–10:31तक टक टक आहा हुंका इशिख्भाएब,
  186. 10:31–10:35जे जहा प्हस जाएची, तब भग्वान आबी करो आहाखलि चमतकार को देता.
  187. 10:35–10:43अहा उनका इशिखाए जे एक ता प्रशासक अस्ली शक्ती उकर चरीट्र में आचे
  188. 10:43–10:49विद्यापतिक लेल इग अथा कोनो जादूई चमतकारक दस्तावेजि करन नहीं चल
  189. 10:49–10:52बलकी मानव आच्रनक सर्वोच तक प्रमान चल
  190. 10:52–10:54आख बात गईही रचे
  191. 10:54–10:56मुदा हम एक हब जे
  192. 10:56–11:00आहां पूरुश परिक्षाक के बहुत सीमित करो हल ची
  193. 11:00–11:01सीमित
  194. 11:01–11:02आप
  195. 11:02–11:05एक ता आदर्ष पूरुश केवल उ नहीं आचे
  196. 11:05–11:07जे नीतिगत रूपे सही हो
  197. 11:07–11:09बलकी उ से हो आची
  198. 11:09–11:13जहां में इश्वरीय सत्ताक प्रती पुरन नत्मस्तक होबाक शम्ता होई
  199. 11:13–11:14उत आचे मुदा
  200. 11:14–11:19आजा आहा विद्यापतिक उदेशक के के वल उही पोथिक सीमादरी रखेच ची
  201. 11:19–11:25तो हुनक रचत उआमर मेठली पद बल सुक्सार पावल तो तीरे के कोना दिखवया
  202. 11:25–11:26उपड तसार अचे
  203. 11:27–11:31इपड अस्पर्ष्ट रूप से गंगा तपर भेटल उही भूटिक अनुबहव
  204. 11:31–11:35उही जलग अस्पर्ष, उही भालुक संदर्यक वनन करे तची
  205. 11:35–11:37विद्या पती जहन महागवी
  206. 11:37–11:39एक राक केवल उपडेशक रूप में
  207. 11:39–11:44नहीं बलके एक ता इश्वर्य चमत्कारक आमरत्तो क्रूप में प्रस्तुत का रहल चतिन.
  208. 11:44–11:47बड सुखसार पावल तु इतीरे.
  209. 11:47–11:51इपंक्ति आपने आपने उही अस्थानक भूटिक तक महीमा गाभी रहल च्छी.
  210. 11:51–11:54जखन गंगा पन तत तोडे चतिन,
  211. 11:54–11:57तो उ एक ता बहुतिक सत्याक रूप में जन मानस में स्तापी तची.
  212. 11:57–11:59इक ता बहावुक द्रिष्टी कों चे?
  213. 11:59–12:03मुदा हम एह ताम सबद पर द्याना कर्षन करप जाहब.
  214. 12:03–12:05आहा सुएम कहलू, सार.
  215. 12:05–12:06आह, सार.
  216. 12:06–12:08बध सुख सार.
  217. 12:08–12:10सार शबदक अर्थ की होई तची?
  218. 12:10–12:16इकोनो भूटिक वस्तू नहीं बंके कोनो वस्तूक निचोड अकर तत्व अकर दाशनिक अदार ची
  219. 12:17–12:21विद्यापतिक तद औही सार तत्व के काव्यात्मक रूभ देता ची
  220. 12:21–12:23मुदा अव भूटिक ता कहा नकारी नहीं सके ची?
  221. 12:23–12:26अग, उ प्रक्रितिक सुन्दर एक चित्रन कराहल जतिन,
  222. 12:26–12:29मुदा उहे रूपक के वेवार कराहल जतिन,
  223. 12:29–12:32जाही से सादारन जन मानस इ भुजे सके,
  224. 12:32–12:36जीवन बरेक सत्निष्टाक अन्तिम्पल कतेक मदूर होगे तची.
  225. 12:36–12:41यदि हम्रा सो मात्र प्रक्रतिक नेम तुट्बा गठना कर ताली बजावे लगव,
  226. 12:41–12:49तो हम्रा सब उही नेटिक सन्देशक के कमजोर का देप जी विद्द्यापती समाजक के देभई चाहत चला.
  227. 12:49–12:56कताक आसली अलोकिकता ता एक तसादारन दरबारी सेवकक असादारन सत्ते निष्टा में आची
  228. 12:56–13:05मुदा की हम्रा सब के आदूनिक उप्योगिता वादक के लेल उही गाताक मुल चमतकारक के नकारी देवाग चाही
  229. 13:05–13:12नकारबाक बात नही आची मुदा अनुक करनिया की आची की ओगंगा तटपर जाएके पुकारव शुरूक अदाई
  230. 13:12–13:19अनुक करनिया की आची उएक आलक प्रष्न आची मुदा सत्ति की आची उब हिन आची
  231. 13:19–13:27विद्याखपती और उही समय के मितलाक समाजक लेल इचमतकार सत्तेचल, उजल कस परष सत्तेचल.
  232. 13:27–13:30वहातिक परिनाम से इनकार नहीं कारहल ची.
  233. 13:30–13:33यदी आहा चमतकारग के केवल एक ता अवरन मानी लेब,
  234. 13:33–13:37ता आहा बोदी कायस थक उही आतनाद के,
  235. 13:37–13:39उही पुकारक के से हो कमतर कर रहल ची,
  236. 13:39–13:42जे ओए आर्दा कोस के दूरी सकेने चला,
  237. 13:42–13:44उपुकार रूप के नैचल,
  238. 13:44–13:48उचाभित करी दची, जे मानविय प्रयासक जते अंत होई दची,
  239. 13:48–13:50उते से इश्वर्य करिपा प्रारम ब होई दची.
  240. 13:50–13:53देखु हम केवल इगगेही रहल ची,
  241. 13:53–13:57जे ओ परिनामक करमकान्दक मोबंग करबाक लिलचल,
  242. 13:57–14:00जे लोग जीवन भर इस सोचे तरहे चतिन,
  243. 14:00–14:02जे मात्र गंगा नहालेला सब पाप दूजे तै,
  244. 14:02–14:05हुनका लेल इगगखा इक टामाचाच.
  245. 14:05–14:06इगगेही तखी,
  246. 14:06–14:10ज़े ये ये एडि आख जीवन बोदिकायस जका नहीं आची
  247. 14:10–14:14ता आजा गंगाक भीतर रही कषे हो अपवित्र ची
  248. 14:14–14:16और ये एडि आजाग जीवन निष्चल आची
  249. 14:16–14:18ता आजाग आजाख अरदा कोस दूर
  250. 14:18–14:22दूर कादो में कसी कसो हो पुन मुख्षक अदिकारी ची
  251. 14:22–14:52रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब र�
  252. 14:52–15:05जखन की हम माने ची जे भक्ती एई कताक एक तत्व अची, मुदा हमर अस्पस्ट मानबची, जे एई गाताक वास्तविक शकती एकर नेतिक आदार्षनिक सन्देश में नहीत ची.
  253. 15:05–15:11विद्यापती जगन एक राप पुरुष परिक्षामे रक्फलन, ता ओ हम्रा सब की सिखार रहल चला,
  254. 15:11–15:16जे सत्तिनिष्ठा परोपकार आश्वक्ती के के खेंद्र में रहत सो,
  255. 15:16–15:21लाल सा मुक्त आच्रन कोनो भी बहाई धारमिक अनुश्धान से बहुत उप्पर आची.
  256. 15:21–15:33दोनो द्रिष्टी कों से ये सपष्ट आची जे बोदिकायस्त का अख्यान अ विद्ध्यापतिक आमर पद मितलाक संस्क्रितिक आ अद्द्दात्मिक दरोब्रक आमुल्लिर रत्न आची
  257. 15:33–15:37एक दम सही, श्रोद सामगरी में अकनो बहुत की चु अची,
  258. 15:37–15:39जे कर गहराई से समजल जासके तचे,
  259. 15:39–15:42की इस शाख्षात बहुतिक चमत कार चल,
  260. 15:42–15:46वा कर्मकान्द पर अंतरिक आच्रनक रूपकात्मक विजे,
  261. 15:46–15:50एकर अंतिम निरने हम श्रोता गनक विवेक पर चोडिचची.
  262. 15:50–15:54जे ना जे हम्रा सब काजिक्रमक प्रारंभ में चर्चा केने रही,
  263. 15:54–15:56कल्पना करु उही अंतिम छनक,
  264. 15:56–15:59की उपुकार भूतिक या थार्थ छेल,
  265. 15:59–16:02वा जीवनक उही शुद सारक प्रक्ति करन.
  266. 16:02–16:09तक्हन की, आहा आपन जीवनक के केवल करमकान्डक एक ता लंभा बही खाता बनवे चाहब,
  267. 16:09–16:14वा उही में बोदि कायस्त जकां कोनो आहन निशकलंक आच्रनक प्रविष्टी करव.
  268. 16:14–16:18जक्रा देखी प्रक्रती से हो आहा लग आवेले विवष भोजाए.
  269. 16:18–16:20विचार ज़रुर करव।

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दा दिबेट में आहांक स्वागत आजि, आई हमरा सब एक ता एहन वैचारिक विमर्ष्द दिस बड़ी रहल ची, जताई कोनो विश्वे के मने विविनन द्रिष्टी कों सदेखाल जाते इच। आई, आई हमर सब के विमर्षक आदार अची मित्लाक एक्ता बहुत प्रसिद गाता. एक्दम, गजेंद्र ताकुर दूरा सम्पादित असंकलित एक्ता अछ्तिन्त महत्व पुन सहित्तिक संदर बची बजद सुक्सार पाँलतु तीरे. सत्तिबात इवास्तमे एक्ता एहन गाता अची जे मित्लाग जन मानस में गहीर पैट बनावने आचे एक अची बोदि कायस थक जे मित्लाग राजाग दरवार में एक ता सादारन सेवक चला बुजली आहुनक जीवनाक इ अन्तिम गतना अगरा हमरा सब गंगा लाब के रूप में जाने ची महाकवी विद्यापतिक उत्क्रिष्ट रचनाक मुल प्रेणा बनल मुदा प्रष्न इए ची जी विद्यापती एकरा कोना देखल नहीं अगरा सब के ने एकरा कोना देखबाक चाही आदाईशा हमर सबक आए दिनक मुख्य प्रष्न उत्पन होई तची जी आप विद्यापती द़ारा आपन प्रसिद ग्रन्त प्रुष परिक्षा आब आब आपन आमर मैठ्ली पदे में इगता लिखबाक मुख्य उदेश की आची अग, उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वाँ उद्वा जे ये कता अटूट भक्ती आप पूर्ण समरपनक भूधिक विजैक गाता आची मने आईक रा पूर्नता चमतकार माने ची आईक दम बोदि कायस थक शिवजीक प्रती गही रास्ता चल मुदा हुंकर महानताक वास्तविक प्रमान हुंकर जीवनक अंतिम शन मे भीतेत आची. जगन उगगा ततिक दिस चारहल चला. सत्य, गंगा से अर्दाकोस दूर रहिक, साख्षात गंगा माई के पुकारब, अगग्वा माने गंगा के अपन तट्ट तोडी कहुन का अपनामे समाहित कलेब इकुनो रूपक नहां ची. इपोच रूपेन स्रदामए समर पन माची. विद्यापती इगधना के एतिये लेल आमर्केलने जे इप्रमानित कराईता ची जे साच भक्ती प्रक्रतिक अचल नियमक के से हो जुका सके टाची हमरा लगाईता ची जजक्हन हम्रासव चमतकार पर भेसी केंध्रित भोजाए चीना तक्हन हम्रा सब उही गाताक वास्तविक मानवियसार गमा देच। मद्वियसार कोना? देखो, चमतकार तमातर एक्ता प्रतिकात्मक परिनाम अचे मूल सन्देश बहुत प्रासंगी कचे बोदि कायस्त राज्दर्बार में काच करे चला भूँजलिये? अदर्बारी चला हो दर्बारी जीवनक अर्थ भुज़े च्या है उशक्ति के केंदर में चला जताई प्रलोबन चारो दिस्सा चनी मुदश्रोथ समगरी श्पष्ट करे तचे जे उपरस्त्री अद्धनक लाल्सा सचर्वदा मुक्त चला उद्चला हो अद तु चलाओ उ आपन आएके दान पुन्यम करच करच करच खला एक दम, विद्यापती आईगी कथाए एती लेल चुनननी कारन इसिद करे तचे जे यए आच्रन शुद आचे, तब मोक्षक लेल कुनो भाउतिक अनुश्ठान अनिवार्य नही आचे अदा हुनक अपन नेतिकता च्यल नहीं नहीं, अही दरबारी जीवन पर गेहीर द्रिष्टी दी संदर्व समगरी स्पाष्ट करे तची जे बोदी कायस्त्थ अप दोगा प्रती कची जे गंगा कप्रत्यक्ष जल्द हरी पहुचव आवश्षक नहीं च्यल यह कोनो आर्थ नहीं रख्छ है ताछी आँ, मुदातनिक सोचु जे उशुद चरित्र आयल कते सा अदा हूँनक आपन ने दिकता च्छल नहीं नहीं, उही दरबारी जीवन पर गहीर द्रिष्टी दी संदर्व समगरी सपाष्ट करे ताछी जे बोदि कायस्त राजाग दर्बार में एक्ता सादारन दर्माहा माने वेतन पर काजकर अच्छला हाँ उनक जीवन केंद्र में भोला बाबाक, न्यमित, पुजा, अच्चना, आ अनन्ने भक्ती चल इजे हुनक आद्धियात्मिक शक्ती चलना उही सा हुंकर चरित्रक निरमाद भेल आहा हुनक नेतिकता किन उनकर दार्मिक्तासा �alag nahi ka sakachi. मुदा? सूनु, यदि उश्व का अनन्ने भक्त नहीं होईता, उही इश्वर्ये शक्ती पर हुनको विष्वास नहीं होईते, तकि उनकर चरित्र एतेक निष्कलंक भासक अच्छल, भक्ती ही उग कवछ च्छल, जे हुनका प्रलोबहन सा बचेलक आब, ख्षमा करभ, मुदा हम इबात नहीं मानी रहल ची हम बतावे ची जी की एक कहु? पूजा पात निष्चही महत्वपून चल मुदा हुनक महानता हुनकर सामाजिक आनेते क आच्रनक तन्तर में चूपल आची आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची कारन तो उही चलने आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची कारन तो उही चलने आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची कारन तो उही चलने आपुजा पात्ख के कारन मानी रहल ची कारन तो उही चलने राजदर्बार में रहेब तैना आची जना कोनो पेख कारपरेट हूस में कजानाग चाभिक संथाडरहेब आखा सत्ताक दलाल वकोशा द्यक्ष्छी उते प्रलोबन के वलुपस्तित नहीं रहेता ची बलकी उओई ताम का मुद्डरा होईता ची उते बिना एक्ता पाई आपन जेभी में रख्खे, जीवित रहेप एक्ता यान्त्रिक असमबवता जगा जगा जगा जगा जगा मने एक्ता करपरेत लोबिस्ट जगा एक दम, मुदा बोदिकायस्त एके लनी उ आपन आवश्वक्ता सबेशी समपती समाजक सेवा में लगवेत चला सुईच्छा सर लालसा मुक्त रहा भूंकर अस्ली तपस्या चल इख्रपूरेट लाभियस्ट्फला द्रिश्टान तब द्रोच्षक अचे मुदा महम्रा लगाई तचीजे इब उदिक आयस्ताक युगग मान्सिक्ताके आदूनिक चस्मा सदेखा बहल. कोना? देखो, उई समझ में राज दरबार में सेवार द्रहत, दर्म आनेटिक्ता दूता अलग वस्तू नहीं चल. उनकर इज सचेत निरने चल, जे दहन के लाल सा नहीं करब, उसीबे सीदे उनकर इश्वर ये भाई आप्रेम सजुडल चल. कर जा आम्रा सा पोली तरबारी जीवन से आगु बड़ाई, तो उनकर जीवनक दो सर आँ सब सब महत्व पुन पड़ाउ परवे च्छें. आप गंगा लाप कर निरनेः सत्या आप स्वतागन के लेल हमेंकरा स्पस्ट कर दी जी उही काल कन में गंगा लाप कोनो सादारन पिकनिक वाद तीर थ्याद्रा ने चल एक ता सरवोच अद्यात्मिक लक्ष्मानल जाए चल जद वेक्ती बुड़ापा में आपन गर परिवार त्यागी का गंगा के तपर मरनान तक प्रतिक्षा लेल जाई चल. एक दम एक ता कत्हुर शारेरेक अनुश्टान चल, आईहे ताम हमर तरक सबसा भेशी मुखर होईता चे. आँ. आप ख़े ची जे एहूंकर भक्ती कच्रम वस्ता चल मुदग जखन उ गंगा सा अद्दाकोस दूर चला हा तकन जी गतन भेल उक्राहा कुना देखे ची हम उक्रा पुरन समरपना क्रुप में देखे ची समरपन आप जखन एक ता व्रिद्धवेक्ती जही में आप आगु बदबाक तनिक समवर्ध नहीं बचाले जे उओह उही आदाकोस के दूरी सा आपन समपुरन प्रानद पेने सा गंगा केन पुकारे तची मुद अदा तव उ आहनकार नहीं आच उ आसाहाय अवस्ताक अंतिम पुकार आचे उ साख्शात गंगा से याचना करहल चला, करन उनका पुरन विश्वाश चल, जे गंगा उनका सुन्ती आप प्रक्रतिक उ नियम तुटल. गंगा अपन तद तोडके उनका लग हायल, इब भक्तिक बहुतिक प्रमान आचे, यबी केवल नेतिक्ताक बात रहित, ता प्रक्रती के एक बहवे रूपेन आपन निम बदलवाग के आँ सकता चल? एक ता प्रभाव साली तर्क आची, बुदा की आए विचार के ने ची, जे यदी मात्र एश्वर्य ये सकती आब भकती ही सरवो परी आची, तव उनका इशाररिक कष्ट की एक भोगे पडल? आँ खष्ट तद तीरत की हिसा जे यदि प्रक्रिति उनका पहिने येसे निष्कलंक मानच्चल तव उनका उयात्रा की ख करे देलेगेल हम्रा ले, बोदेक आयस थाक औही ताम आदा कोस पहिने रुक जे बाक जे अद आजी उबहे करमा कान्द के एक ता बहुत पेग क्शंगान चे खंदन कोना? उगखतना प्रक्रिति वा इश्वरक इगोशना आजे आव ओर नहीं इक ता सन्देश जे आहाक जीवन भरेक सतकर्म, आहाक दरबारी जीवन कनिष्छलता, इस सबता आहाके पहने ये पार लगा चुकाला चे. मुदा? उगरा प्रक्रती स्वायम क्हन्दित कर रहाल चे बिना कोनो अत्रेक्त तपस्या केन हूना मोक्ष भेटब इस पष्ट रूपे भुजावेत आची जे तीर्त स्वायम आँलक चल के आजेत यादि आजरन शुद्दाची. बुज्राल ची जे आहा एक रा कर्म कान्डक विरोद में एक तप प्रतीक क्रूप में देखे राल ची मुदा हम्रा एठम आग बात काटे परत कहो? यदी प्रकरती वा एश्वर कें के वल इशन्देश देवाक रहेद जे आहा खसत कर्म पर्यापत ची तब बोदि कायस्त केन अपन गर पा अपन भिच्छोन पर शान्तिपुन म्रित्य। भेटी सकई चलन, विद्यापती उक्रा से हो महान मानी सकच्छला. मुदा औण नहीं भेल. नहीं भेल. उनका गर चोई परल, उनका उयात्रा करे परल, क्यक करन बोद्टिक अनुश्टान, औजे तीर त्यात्रा कष्ट ची, उ बबक्तिक प्रक्रियाक हिसा आची. अआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ उ अर्दा कोस दूर कहसे परव, कोनु रूपक नहीं उ शारीडिक यतार्थ चल, अ गंगा कोही तट्सब बाहर आईप, उनका सपर्ष्करव, इवही कष्टक पूरुसकार चल, यदि हम्रा सब एक रा मात्र रूपक मानी लेव, तो उही आसीम चमत्कारक भव्यता समाप्त बहुजाईता ची जक्रा विद्यापती आपन काव्यमे स्थान दिलानी आप जक्ण विद्यापती काव्या पर आहा आँल ची तो हम्रा सब उही तीसर विन्दुदिस बड़ी जते इगता सहित्यमे आमर भेल आद सुक सार वाला पद नहीं, उक्रा सा पहने गजेंद्र ताकूराक समपादे ती संदर्प अप श्पाष्ट करे तची जे विद्यापती एक्रा कताई संकल इत्केलनी औएक्रा अपन प्रसिद्द संष्क्वित ग्रन्त अगटम इक ता इक नीती गरन्त चल, जे नव्युवक राज्कुमार सबहकें, इस शिकाएबक ले लिखल गल चल, जे एक ता आदर्ष प्रशासक कोना बनल जाए. इस पूरुशार तक परिक्षा अची. हम माने ची जे नीती गरन्त अची. मुदा? अक्तम इप मुलता एक ता नीति गरन्त चल, जे नव्यूग राज्कुमार सबहकें इस शिकाएबक ले लिखल गल चल, जे एक ता अदर्ष प्रशासक कोना बनल जाए. इस पूरुशार तक परिक्षा अची. हम माने ची जे नीति गरन्त अची. मुदा? तनिक सुनु हम्रा, जखेन आहा भविष्षक राजा सबके प्रषक्षिट करो रहल ची, तक टक टक आहा हुंका इशिख्भाएब, जे जहा प्हस जाएची, तब भग्वान आबी करो आहाखलि चमतकार को देता. अहा उनका इशिखाए जे एक ता प्रशासक अस्ली शक्ती उकर चरीट्र में आचे विद्यापतिक लेल इग अथा कोनो जादूई चमतकारक दस्तावेजि करन नहीं चल बलकी मानव आच्रनक सर्वोच तक प्रमान चल आख बात गईही रचे मुदा हम एक हब जे आहां पूरुश परिक्षाक के बहुत सीमित करो हल ची सीमित आप एक ता आदर्ष पूरुश केवल उ नहीं आचे जे नीतिगत रूपे सही हो बलकी उ से हो आची जहां में इश्वरीय सत्ताक प्रती पुरन नत्मस्तक होबाक शम्ता होई उत आचे मुदा आजा आहा विद्यापतिक उदेशक के के वल उही पोथिक सीमादरी रखेच ची तो हुनक रचत उआमर मेठली पद बल सुक्सार पावल तो तीरे के कोना दिखवया उपड तसार अचे इपड अस्पर्ष्ट रूप से गंगा तपर भेटल उही भूटिक अनुबहव उही जलग अस्पर्ष, उही भालुक संदर्यक वनन करे तची विद्या पती जहन महागवी एक राक केवल उपडेशक रूप में नहीं बलके एक ता इश्वर्य चमत्कारक आमरत्तो क्रूप में प्रस्तुत का रहल चतिन. बड सुखसार पावल तु इतीरे. इपंक्ति आपने आपने उही अस्थानक भूटिक तक महीमा गाभी रहल च्छी. जखन गंगा पन तत तोडे चतिन, तो उ एक ता बहुतिक सत्याक रूप में जन मानस में स्तापी तची. इक ता बहावुक द्रिष्टी कों चे? मुदा हम एह ताम सबद पर द्याना कर्षन करप जाहब. आहा सुएम कहलू, सार. आह, सार. बध सुख सार. सार शबदक अर्थ की होई तची? इकोनो भूटिक वस्तू नहीं बंके कोनो वस्तूक निचोड अकर तत्व अकर दाशनिक अदार ची विद्यापतिक तद औही सार तत्व के काव्यात्मक रूभ देता ची मुदा अव भूटिक ता कहा नकारी नहीं सके ची? अग, उ प्रक्रितिक सुन्दर एक चित्रन कराहल जतिन, मुदा उहे रूपक के वेवार कराहल जतिन, जाही से सादारन जन मानस इ भुजे सके, जीवन बरेक सत्निष्टाक अन्तिम्पल कतेक मदूर होगे तची. यदि हम्रा सो मात्र प्रक्रतिक नेम तुट्बा गठना कर ताली बजावे लगव, तो हम्रा सब उही नेटिक सन्देशक के कमजोर का देप जी विद्द्यापती समाजक के देभई चाहत चला. कताक आसली अलोकिकता ता एक तसादारन दरबारी सेवकक असादारन सत्ते निष्टा में आची मुदा की हम्रा सब के आदूनिक उप्योगिता वादक के लेल उही गाताक मुल चमतकारक के नकारी देवाग चाही नकारबाक बात नही आची मुदा अनुक करनिया की आची की ओगंगा तटपर जाएके पुकारव शुरूक अदाई अनुक करनिया की आची उएक आलक प्रष्न आची मुदा सत्ति की आची उब हिन आची विद्याखपती और उही समय के मितलाक समाजक लेल इचमतकार सत्तेचल, उजल कस परष सत्तेचल. वहातिक परिनाम से इनकार नहीं कारहल ची. यदी आहा चमतकारग के केवल एक ता अवरन मानी लेब, ता आहा बोदी कायस थक उही आतनाद के, उही पुकारक के से हो कमतर कर रहल ची, जे ओए आर्दा कोस के दूरी सकेने चला, उपुकार रूप के नैचल, उचाभित करी दची, जे मानविय प्रयासक जते अंत होई दची, उते से इश्वर्य करिपा प्रारम ब होई दची. देखु हम केवल इगगेही रहल ची, जे ओ परिनामक करमकान्दक मोबंग करबाक लिलचल, जे लोग जीवन भर इस सोचे तरहे चतिन, जे मात्र गंगा नहालेला सब पाप दूजे तै, हुनका लेल इगगखा इक टामाचाच. इगगेही तखी, ज़े ये ये एडि आख जीवन बोदिकायस जका नहीं आची ता आजा गंगाक भीतर रही कषे हो अपवित्र ची और ये एडि आजाग जीवन निष्चल आची ता आजाग आजाख अरदा कोस दूर दूर कादो में कसी कसो हो पुन मुख्षक अदिकारी ची रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब रब र� जखन की हम माने ची जे भक्ती एई कताक एक तत्व अची, मुदा हमर अस्पस्ट मानबची, जे एई गाताक वास्तविक शकती एकर नेतिक आदार्षनिक सन्देश में नहीत ची. विद्यापती जगन एक राप पुरुष परिक्षामे रक्फलन, ता ओ हम्रा सब की सिखार रहल चला, जे सत्तिनिष्ठा परोपकार आश्वक्ती के के खेंद्र में रहत सो, लाल सा मुक्त आच्रन कोनो भी बहाई धारमिक अनुश्धान से बहुत उप्पर आची. दोनो द्रिष्टी कों से ये सपष्ट आची जे बोदिकायस्त का अख्यान अ विद्ध्यापतिक आमर पद मितलाक संस्क्रितिक आ अद्द्दात्मिक दरोब्रक आमुल्लिर रत्न आची एक दम सही, श्रोद सामगरी में अकनो बहुत की चु अची, जे कर गहराई से समजल जासके तचे, की इस शाख्षात बहुतिक चमत कार चल, वा कर्मकान्द पर अंतरिक आच्रनक रूपकात्मक विजे, एकर अंतिम निरने हम श्रोता गनक विवेक पर चोडिचची. जे ना जे हम्रा सब काजिक्रमक प्रारंभ में चर्चा केने रही, कल्पना करु उही अंतिम छनक, की उपुकार भूतिक या थार्थ छेल, वा जीवनक उही शुद सारक प्रक्ति करन. तक्हन की, आहा आपन जीवनक के केवल करमकान्डक एक ता लंभा बही खाता बनवे चाहब, वा उही में बोदि कायस्त जकां कोनो आहन निशकलंक आच्रनक प्रविष्टी करव. जक्रा देखी प्रक्रती से हो आहा लग आवेले विवष भोजाए. विचार ज़रुर करव।

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