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भाट-भाटिन_की_पहेली_और_खूनी_न्याय.m4a
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- 0:00–0:30अगर बजादी बाट बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
- 0:30–0:32तो तराज़ु अचानक तुट जाता है।
- 0:32–0:34तो तराज़ु अचानक तुट जाता है।
- 0:34–0:36तो तराज़ु अचानक तुट जाता है।
- 0:36–0:38तो तराज़ु अचानक तुट जाता है।
- 0:38–0:40तो तराज़ु अचानक तुट जाता है।
- 0:40–0:42तो तराज़ु अचानक तुट जाता है।
- 0:42–0:44वोग कत्हाँ की दुन्या में कदम रकते हैं,
- 0:44–0:50खासकर अंईसानी मनोविग्यान और बदले की उन गेरी अंदेरी गल्यो में,
- 0:50–0:53तो वो तराजु अचानक तुट जाता है.
- 0:53–0:54रही, रही खाए रही है आप.
- 0:54–1:24अगर तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप प्रज़ाज़ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो
- 1:24–1:29अद्रदिए खुनी पहेली के इडगिद बूनी गए खुनी का अंद्द मतलप कुछ यूँ होता है,
- 1:29–1:32की एक बहें अपने मासुम भाई की जान बचाती है।
- 1:32–2:02अगर उसकी जो विश्वाज गाती पतनी है यानी भाटिन उसे उसी की रची हुईची हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 2:02–2:07तो इस चर्चा में मैं इस बात कपक्ष रही हूँ
- 2:07–2:16के ये कहानी पूँन कावियात्मक न्याय या पोईटिक जस्टिस का एक शान्दार उदारन है.
- 2:16–2:19बुराय का अंथ आज़े ही होना चाही है.
- 2:19–2:22और दिक ही है, मैं यह से पिलकुल अलग नजर्ये से देखता हूँ.
- 2:22–2:28मेरा मानना है की बहेंने जो हिंसक तरीका अपनाया वो न्याय नहीं है,
- 2:28–2:31तो तीक उसी क्रुडठा की नकल है, जिसका वो विरोथ कर रही ती.
- 2:31–2:35तो चलिये, मतलब इस विमरच की शुरवात करते हैं.
- 2:35–2:42मेरे नजरये से अगर देखें, तो ये कहानी विषुध्द रूप से न्याए स्थापित करने की कहानी है.
- 2:42–2:49अगर हम भाटन के काम को देखें, तो वो सर्फ एक मामूली दोखानी था.
- 2:49–2:51आचा, तो आप उसे क्या कहेंगी?
- 2:51–2:53वो चरमस्टर की क्रूरता थी.
- 2:53–2:56मतलब सोचिये वो अपने गुप्त प्रेमी को
- 2:56–3:00जो की एक गरहोमन यानी जेहरीला साब था
- 3:00–3:03उसे गर का सबसे बहतरीं काना किलाती ती
- 3:03–3:04हा ये तो है
- 3:04–3:06और अपने ही पती भाट को
- 3:07–3:10वो बास्ये खोस्या यानी गर का बासी
- 3:10–3:11और बचाखुचा काना देती ती
- 3:11–3:15अगर में उसने उसी साप को अपने पती के हत्या करने का सीदा अदेज देदिया
- 3:16–3:22तजब बहन ने कहानी के अंप में भाटिन की ही बनाई हुई उस जानलेवा पहेली को सुलजाया
- 3:23–3:25और भाटिन को उसी की शर्ट पर मारा
- 3:25–3:32तजब भहन ले कहानी के अंत में भाटिन की ही बनाई हुई उस जानलेवा पहेली को सुलजाया
- 3:32–3:34और भाटिन को उसी की शर्ट पर मारा
- 3:34–3:37यानी बखसी जोका के मारना
- 3:37–3:39जिसका सीथा मतलब है गला कातना
- 3:39–3:43तो मेरी नजर में ये कोई सादारन हिंसा नहीं ती
- 3:43–3:44तो फिर क्या थी?
- 3:44–3:48ये ब्रमाड के संटुलन को वापिस लाने जैसा था
- 3:48–3:52मतलब, खलनायक का अंत उसी के बनाय जाल में होना ही सच्चा नया है
- 3:52–3:56बूराई को उसी की बाशा में जबाब देना जरूरी होता है
- 3:56–4:00देख ही, मैं मानता हूँ के कहानी के स्थक्षर के हिसाब से
- 4:00–4:06ये बहुत सन्तोश जनक लकता है, के जिसने गद्ड़ा कोदा वो उसी में गर गया.
- 4:06–4:08हमारे दिमाग को ये पैटन पसंद आता है.
- 4:08–4:09बिलकुल आता है.
- 4:09–4:11लेकिन अगर हम थोडा गेराए में जाए,
- 4:11–4:16तो इसका जो नैतिक द्हरातल है, वो बहुत ही धुंडला है.
- 4:16–4:20नियाए और बदले में बहुत भून्यादी फर्ख होता है
- 4:20–4:22आप आप इसे बदला क्यो मान रहे है?
- 4:22–4:24कुकि आप खुछ शूची ना
- 4:24–4:28जब भाद्ट की बहन को सारी सच्चाई पता चल गगी तुब
- 4:28–4:30उसके पास क्या विकल्ठ थे
- 4:30–4:34वो आपनी बाभी को गाँवालो के सामने बिनाकाप कर सकती थी
- 4:34–4:37उसे समाज से बहार निकलवा सकती थी
- 4:37–4:38हाँ
- 4:38–4:39लेकिन
- 4:39–4:41लेकिन इसके बजाए बहन ने जान भुजकर
- 4:41–4:44उसी खूनी खेल का हिस्सा बनने का फैसला किया
- 4:44–4:45उसने कुट का
- 4:45–4:49यदी हम प्रहेलिका का उतर दे देंगे, तो भोजी को मार देंगे.
- 4:50–4:51मतलब ये नयाए थोडी है.
- 4:51–4:52तो क्या है?
- 4:52–4:57ये तो अपने दुश्मन की पाश्विक प्रव्रतियों को अपना लेना है.
- 4:57–5:02आखिर में नाएका थीक बैसी ही क्रूर हत्यारी बन जाती है जैसी की क्छ नाएका थी
- 5:02–5:07उसने भी तो पुरे होशो हवास में एक दम तन्डे दिमाक से एक अन्सान का गला काटा है ना?
- 5:07–5:10मैं देख री हूँ कि आप आप यह साथ क्यों सुच रहे हैं
- 5:10–5:14लेकिन मैं आप को एक अलग नजर्या देना चात्तियों
- 5:14–5:18अपने दोके की फित्रत और और सजाक के अनुपात को समचना होगा
- 5:18–5:19मतलब
- 5:19–5:24मतलब भार्टिन की क्रूर्टा कोई गुस्से में या अचानक की आप्राद नहीं ता
- 5:24–5:32ज़रा उस द्रिश्य को याद की जे, जब भाट अनजाने में, अपने जूते यानी पनी में, चिपे हुए उस गवूमन साप को मार देता है.
- 5:32–5:44आप बद़न को ये पता चलता है, तो उसका दुक एक बहुत ही विक्रित, मतलब एक तरह का साएकोर्टिक रूप ले लेता है.
- 5:44–5:46उसने साब के तुक्डे की एथे.
- 5:46–5:55अग, उस मरे हुए साप की नाउ तुक्डे करती है, नाउ तुक्डे, और फिर उने चे अलगलग गुप्त जगगों पर चिपाती है.
- 5:55–6:01काटके पाए, मच्या, तेल, नमक, अनाज भंदार, और तोक्री में.
- 6:01–6:05तुब आप ये कैसे कह सकते हैं कि उसे सरफ समाथ से निकाल देना काफी होता.
- 6:05–6:11ये एक चरम मानसिक विक्रती है, ये एक ठदन्डिमाख से रची गई साजिश है,
- 6:11–6:17उसने उन तुक्डों पर एक पहेली गड़ी, सर्फ और सर्फ अपने पती को तदपा तदपा कर मारने के लिए.
- 6:17–6:21दिके, मैं इस बाथ से बलकुल इंकार नहीं कर रहा, कि उसका काम भयानक था.
- 6:21–6:27तो फिर, तो फिर आप ये कैसे कह सकते हैं, की उसे सर्फ समाथ से निकाल देना काफी होता.
- 6:27–6:33इस तरकी गेरी, ज़ो तक समाथ चुकी बुराई को खत्न करने के लिए,
- 6:33–6:36उसी स्टरके कदोर दन्द की जरूरत थी
- 6:36–6:40आप एक मनो रोगी को स्वर्फ उब देश देकर नहीं सुदार सकते
- 6:40–6:43मुझे खेद है, लेकिन मैं अस लोगिक को नहीं मानता
- 6:43–6:44क्यो नहीं
- 6:44–6:46और मैं आप को बताता हो क्यो?
- 6:46–6:48सब से बड़ा सवाल ये उड़ता है
- 6:48–6:51कि क्या एक अप्रादी के मनोडोग का जवाब,
- 6:51–6:53खुद मनोडोगी बनकर दिया जाना जाही है?
- 6:53–6:56आब बैटिंकी मानसेख विक्रती की बात कर रही है.
- 6:56–6:59आब वो शोक और अपने प्रेमी के मोह में आंदी हो गए फी.
- 6:59–7:04उसका अपने प्रेमी के शव को तुक्डो में काटना और गर के रोज मर्रा के समानो में चिपाना,
- 7:04–7:07ये दिखाता है कि उसका मनोविग यान पुरी तरह से तूट चुका था.
- 7:07–7:10वो एक गहरे त्रामा से गुजर रही ती.
- 7:10–7:14लेकिन त्रामा किसी को हत्यारा बनने का लिस्ट तो नहीं देताना?
- 7:14–7:16औरे बिलकुल नहीं देता.
- 7:16–7:19लेकिन अब आप वुब बहन के मनोविग्यान को दिक्ये.
- 7:19–7:22बहन तो किसी त्रामा में अंदी नहीं फीग.
- 7:22–7:24वो पुरी तरह से सचेथ त्फीग.
- 7:24–7:27उसका दिमाग बिलकुल शान्त था
- 7:27–7:28उसका काम पूरी तरहे से
- 7:28–7:29कालकूलेटेद
- 7:29–7:31सोची समजी हत्या थी
- 7:31–7:32मैं आपकी बाद समज रहूं
- 7:32–7:34की बुराई भ्यंकर थी
- 7:34–7:35लेकिन
- 7:35–7:36आँ...
- 7:36–7:37क्या एक ख्रूर खेल को
- 7:37–7:39उसी के खुनी निमो से जीतना
- 7:39–7:41वास्तव में जीत है?
- 7:41–7:42तो फिर क्या है?
- 7:42–7:46या ये खलनायक की हिंसेक विचार दारा के सामने आत्म समरपन करना है
- 7:46–7:48आत्म समरपन कैसे?
- 7:48–7:50मतलब उसने तो खलनायका को खत्म कर दिया
- 7:50–7:51शारेरेक रूप से?
- 7:51–7:53आप, लेकिन वेचारेक रूप से
- 7:53–8:00जब बहन ने पहेली भूजी और भाटिन का गला काटा, तो उसने जाने अनजाने में यह साभित कर दिया,
- 8:00–8:04की बाटिन का नियम ही दून्या चलाने का आस्ली नियम है.
- 8:04–8:08की जो ताकतवर है, उस दूसरे की जान ले सकता है.
- 8:08–8:13उसने बाटिन के सिस्तम को नहीं तोडा, वो बस उस सिस्तम की नहीं बोस बन गई.
- 8:13–8:19ये एक दिल्चस्प पुईंट है, हला की मैं यस दरा से फ्रेम नहीं करूंगी.
- 8:19–8:22आप कहरे हैं कि बहिन ने सचे त्रुब से यह फैसला लिया.
- 8:22–8:27लेकिन हमे इस फैसले के पीचे के कारन और परिनाम को भी देखना होगा.
- 8:27–8:28क्या मतलभ है आपका?
- 8:28–8:33मतलब हम ये बहुल रहे हैं कि बहुन को इस साजिश का पता कैसे चला
- 8:33–8:39ये हमें कहानी के उन जादूई या आलोकिक तत्वों की और लेजाता है
- 8:39–8:44जो मेरी नजर में बहन के काम को सीदे ब्रमान की स्वीक्रती देते हैं
- 8:44–8:46अच्छा अपन दीों की बात करी है ना?
- 8:46–8:50बिलकोल, हमारे सुनने वाले शाएट सुच रहे हूंगे
- 8:50–8:53कि बहन को इतने गेरे रहसे का पता कैसे चला
- 8:53–9:00जब भाट अपनी मुध की दर से दो दिन की महलत मांकर अपनी बहन के पास जाता है,
- 9:00–9:04तो बहन उसकी उम्र या औरा को देक कर चिंटित हो जाती है.
- 9:04–9:08और जब वे लोड रहे होते हैं, तो वे एक दरमशाला में रुकते है.
- 9:08–9:11बहन को नीन नहीं आरे है, और तब क्या होता है,
- 9:11–9:14वाँके दिये आपस में बाते करते हैं.
- 9:14–9:19जो की लोग कतावों का एक बहुत्ती कलासिक मोटीफ है.
- 9:19–9:23आप, प्रक्रती और जादूई शकतिया हुद भीज बचाव करती है.
- 9:23–9:53तो बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब
- 9:53–9:55इक इंस्तूमें ती
- 9:55–9:57देखेए, वो एक समहख तर्क है
- 9:57–10:00लेकिन, क्या आप ने सपर विचार किया है,
- 10:00–10:03किस अलोके ग्यान का वास्तर में आर्थ क्या है?
- 10:03–10:03क्या आर्थ है?
- 10:03–10:06मैं एहा एक नया नजरिया रखना चाूंगा
- 10:06–10:10यह आँज़ तो अज़़ाद की कुटाडी उठाले और अप्रादी का सिर काट दे.
- 10:11–10:15लेकिन लोग कतागो के समाज में अदालते तो हुती नहीं ती.
- 10:16–10:19अदालते नहों. लेकिन समाज तो था पन्चायत थी.
- 10:19–10:21और नयाई वेवस्ता को दरकिनार करके
- 10:21–10:23खुड जल्लात की कुलाडी उठाले
- 10:23–10:25और अप्रादी का सिर काट दे
- 10:25–10:27लेकिन लोग कतागों के समाज में
- 10:27–10:29अदालते तो हुती नहीं ती
- 10:29–10:31अदालते नहों
- 10:31–10:33लेकिन समाज तो था
- 10:33–10:35पनचायत फीए
- 10:35–10:39बाँमान्ड ने या उन दियो ने बहन को सच्चाई बताई दी थी
- 10:39–10:42साप के नाउट तुक्डों का रहेसे कोल दिया था
- 10:42–10:46तो उस पल में बहन के पास निरपेखष शकती आग़ा ग़ी थी
- 10:46–10:51खयते ना ग्यान ही शकती है, वो शकती उसके पास थी
- 10:51–10:54अमारे सुन्नेवाले भी शाएद यही सोज रहे हूंगे
- 10:54–10:57कि अगर भहन के पास इतनी वडी शक्ती ती
- 10:57–11:00तो उसने सीदे पन्चाइत के पास जाने का विकल्त क्यो नी चुना
- 11:00–11:01अहँं
- 11:01–11:05वो अपने भाई को वहाँ से हमेशा के ले सुरक्षित निकाल ले जासकती थी
- 11:05–11:06बाटिन को आज़े जोड़े दी?
- 11:06–11:09वो बाटिन को गामवालों के समने भेनाखाप कर सकती दी
- 11:10–11:11लेकिन उसने क्या किया?
- 11:11–11:15उसने जान बुचकर एक खुनी तमाशे का मनचन किया
- 11:15–11:19उसने खुड जाकर बाटिन को उसी के खेल में चुनाती दी
- 11:19–11:22ताकि उसे मारने का एक नैतिक बहाना मिल सके
- 11:22–11:24मैं इसे बहाना नहीं कोझोंगी
- 11:24–11:27मेरी नजर में ये अलोकिक रस्तक शेप
- 11:27–11:30बहेंके हिंसक फैसले को सही नहीं तहराता
- 11:30–11:35बलकी ये उसकी पसंद को और भी खोफनाग बनाता है
- 11:35–11:39ये आज़ा है जैसे आपके पास किसी महमारी का रहाज हो
- 11:39–11:42लेकिन आप उस रहाज से लोगों को बचाने के बजाए
- 11:42–11:44वाईरस को एक हत्यार के तरे अस्तमाल करने लगें?
- 11:44–11:47ये थोडी आतिशी उकती हो गड़ी
- 11:47–11:47नहीं
- 11:47–11:50उसने उस परम ज्यान का अस्तमाल शमा
- 11:50–11:53या शान्ती के लिए नहीं किया? अद्या के लिए किया?
- 11:53–11:58मुझे लकता है आप एक आदोने कानूनी विवस्ता के चश्मे से
- 11:58–12:01एक सद्यो पुरानी लोक कता को देख रहे हैं.
- 12:01–12:02आशा क्यो?
- 12:02–12:06क्यों कि रहें नयाए की उस परिबाशा को समजना होगा
- 12:06–12:14जो इन कहानियों की ज़़ो में बसी है, न्याय की लोग परिबाशा सम्मिती या बराभरी पर निरभार करती है.
- 12:14–12:18लेकिन बराभरी का मतलप एक जैसी क्रूर्ता तो नहीं हो सकता?
- 12:18–12:23आप इसे क्रूर्ता के रहें है, मैं इसे निवारन दिटरेंस कहती हूँ,
- 12:23–12:53बाटन दे अद्यन्त आपने अपने पाटन देगा पाटन तो बवाटन तो बवाटन तो बवाटन तो बवाटन तो बवाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो
- 12:53–12:58लोग कत्ठाव में ये दोनो एक ही है, समाज मैंसी कहानिया गडी ही जाती है,
- 12:58–13:02ताकि एक सक्त सन्टेश चाए, ये दर पैदा करना बहुत जरूरी है,
- 13:02–13:07ताकि बहुविष्चे में कोई भी अनसान, यैसा ब्यानक विष्वाज कहात करने की हम्मत ना करे.
- 13:07–13:13यदर पड़ा करना बहुत जरूरी है ताकी भविश्छे में कोई भी हिन्सान यसा भ्यानक विष्वाज खाथ करने की हिम्मत ना करे.
- 13:13–13:16मैं समझ राए हूं, लेकिन...
- 13:16–13:20सुच्टिये, अगर भहन उसे सर्फ निर्वासित कर देती, गाँसे निकाल देती.
- 13:20–13:21तु क्या वो न्याय होता?
- 13:21–13:25जिसने आपके बही को तदबा तदबा कर मारने की योजना बनाई
- 13:25–13:27उसरिव गाँउसे निकाल देना?
- 13:27–13:27नहीं
- 13:27–13:29बराबरी की हिंसा ही
- 13:29–13:31यहा वो सन्तुलन लाती है
- 13:31–13:34जो समाज को मनोवग्यानिक रूप से सन्तुष्ट करती है
- 13:34–13:36मैं अस्बाथ से बिलकुल सहमत नहीं हूँ।
- 13:36–13:40मुझे अस्बाख्यान्च न्याय का प्रतिषोद मेही
- 13:40–13:43एक बहुत गेरा विरोदा बास दिखाए देता है
- 13:43–13:44कैसा विरोदा बास?
- 13:44–13:46न्याय का मुल सवबाउ कैसा होना चाहीं?
- 13:46–13:51निश्पक्ष, सुद्धारात्मक, और सिस्टम को तीक करने वाला
- 13:51–13:57जबकी प्रतिषोद, प्रतिषोद हमेशा व्यक्तिगत, अंदा और विनाशकारी होता है
- 13:57–14:00आप सम्मितिया बराभ्री के बात कर रही है
- 14:00–14:02बराभ्री तो आईने में लिए
- 14:02–14:05लेकिन क्या हमे बुराई का आईना बन जाएए?
- 14:05–14:07आईना बनने में हर्ष क्या है,
- 14:07–14:09अगर वो बुराई को कथम कर रहा हो?
- 14:09–14:12हर्ज ये है क्या आप खुद वही बन जाते हैं,
- 14:12–14:14जिस से आप लड़ रहे हैं.
- 14:14–14:15ये आसा है,
- 14:15–14:19आँ जैसे आप किसी मरीस का तूमर निकालने के लिए
- 14:19–14:21कसाई के बड़े चाकू से सरजरी कर रहों
- 14:21–14:28उआप ने तुमर तु निकाल दिया, लेकिन उस तरीके के क्रूड़्ताने मरीस की इंसानियत को इमार डाला.
- 14:29–14:34जब नंद पहली भूजकर एक एक करके उन नाउट तुक्रो के रहसे को उजागर करती है.
- 14:34–14:39जागर करती है, और फिर आपनी प्रतिग्या के अनुसार आपनी भाभी का गला काटती है,
- 14:39–14:45तो उषन में वो क्या लगरी है? वो एक रक्षक नहीं एक शिकारी लगरी है.
- 14:45–14:49वो शिकारी नहीं रक्षक ही ती, उसने अपने बहाई को बचाएा.
- 14:49–14:55लेकिन कल्पना कीजी उस दिश्चकी वो शान्ती से नाम उन खोफनाग जगो का नाम ले रही है.
- 14:55–15:01काथ, मच्विया, तेल, नमक और फिर अचानक वो हिंसक प्रहार करती है.
- 15:01–15:04बौराई का अंत तो हुए, बहाई की जान तो बजगगगी.
- 15:04–15:08लेकिन उसकी कीमद क्या चुकानी पडी, नेटिक्ता की हत्या.
- 15:08–15:12सांगन में जहां कभी भाटन की क्रूर्ता पल रही थी,
- 15:12–15:15वहा अंत में बहन की क्रूर्ताने जन्म लिया.
- 15:15–15:19हिन्सा का चक्र कहतम नहीं हूँँआ, उसने सर्फ अपना रूब बडल लिया.
- 15:19–15:24दिक्ये मैं समज रहुं की आप इस बराभरी के नयाए को एक नैटिक पतन के रुप में देख रहें
- 15:24–15:27लेकिन हमें पीडद के नजर्ये से भी सुचना होगा
- 15:27–15:29जिस के बारे में हम बात ही नहीं कर रहें
- 15:29–15:30भाट के बारे में?
- 15:30–15:31अआ भाट के बारे में सुच्छीए
- 15:31–15:34वहा अपने ही गर में एक अजनबी बन गया था,
- 15:34–15:37उसे रोज भासी खाना दिया जारा था,
- 15:37–15:41और वहा अपनी पतनी के प्रेम प्रसंग की सच्चाईई से बिल्कोल अजन जान था.
- 15:41–15:43ता उसकी इस्तिती वाकई दैनी एत ही.
- 15:43–15:47और जब वो अन्जाने में पनही में खिपे सामप कुमारता है,
- 15:47–15:49तो वो बस आत्म रक्षा कर रहा होता है.
- 15:49–15:53उसे पता ही नहीं ता कि उसने अपनी पतनी के प्रेमी कुमारा है.
- 15:53–15:56बाद पुरी तरषे निर्दोष है.
- 15:56–15:57बलकोल.
- 15:57–15:59उसकी अग्यानता ही उसकी मासुमयत है.
- 15:59–16:04इस मासुम्यत को बचाने के लिए किसी को तो कठोर हूना ही ता
- 16:04–16:06बहन को ये जिम्मेदारी उठानी पडी
- 16:06–16:09आप खेरे हैं कि वो शिकारी बन गगी
- 16:09–16:11लेकिन मैं कहूंगी कि वो एक दाल बनी
- 16:11–16:16एक एसी दाल व्म जिस पर लगे काटे बाटिन को चुब गै
- 16:16–16:19भाद्त की मासुम्यत पर कोई शक्रही है
- 16:19–16:24और निस सन्दे उसका जीवित बचना इस पूरी ट्राज़ी का एक मात्र उजला पक्ष है
- 16:24–16:28लेकिन मेरी चिंता उस द्धाल के इस्तमाल के तरीके पर है
- 16:28–16:37जब बहेंने बाटिन से कहा, अगर में पहेली भूज लूंगी, तो तुमारा गला काट डूंगी, तब उस दाल को एक तलवार में बडल दिया.
- 16:37–16:44अगर हम स्विज्ब इस बाद पर जश्वन वनाए, कि बुराई भार गाई, तो हम ये भूल जाते हैं, कि जीटने वाले ने अपने भीटर क्या कूडिया.
- 16:44–16:48उसने कुछ नहीं कुया, उसने बस नियाए स्थापित किया.
- 16:48–16:50उसने अपनी करूना कूडि.
- 16:50–16:56जब लोग कताये इस तरह के क्रूर अंद को नियाय की जीद के रूप में महिमाम बन्दित करती हैं,
- 16:56–16:59तो वे समाज को एक बहुती खटरनाक सबक सेखाती हैं.
- 16:59–17:03वे सेखाती हैं कि हिन्सा अगर सही वेक्ती तुरा की जाए,
- 17:03–17:05तो वो पवित्र हो जाती हैं.
- 17:05–17:07ये खटरनाक विचार है?
- 17:07–17:10ये बाज शुनने में खटरनाक लक सकती है,
- 17:10–17:13लेकिन ये यतार्थ वादी है, प्रक्तिकल है.
- 17:13–17:15जब आप एक आजी दून्या में होते है,
- 17:15–17:17जब हाँ बुराई निरंकृ हो,
- 17:17–17:18इतनी जान लेवा हो,
- 17:18–17:21के आपके गर के नमक और तेल में मोड शुपी हो,
- 17:21–17:24वहां आपकी आदरश्वादी नेटिक्ता काम नहीं आती.
- 17:25–17:27अगर बहन ने आदूनिक नेटिक्ता दिखाई होती,
- 17:28–17:30तो शहत कहानी का अंद कुछ और होता,
- 17:30–17:32और हो सकता है भाट कभी सुरक्षित न रहा पाता.
- 17:32–17:37बहन का साहस, उसकी बोद्धिक शम्ता और उसका अन्तिम कठोर निनने,
- 17:37–17:41ये सभी चीजे एक मस्वूथ स्त्री चरित्र का निरमान करती है,
- 17:41–17:43जो बुराई के सामने गुतने नहीं टेकती.
- 17:43–17:51जब बुराई को जर से उखार पेकने का एक मात्र तरीका,
- 17:51–17:54उद उसकी ज़ में जाकर उसी के जैसा क्रूर हो जाना है
- 17:55–17:57हा बहें एक मजबूछ चरित्र है
- 17:57–17:58लेकिन अंत में
- 17:58–18:00ये पूरा चक्र देखिये
- 18:00–18:01साप का मारा जाना
- 18:01–18:03भाटिन दवारा उसके नो तुक्डे करना
- 18:04–18:05वो खोफनाक पहेली बनाना
- 18:05–18:11अप्र भीर बहन का हींसक बडला लेना, ये सब क्या चोड़ जाता है? एक नैतिक शून्निता.
- 18:11–18:15मुझे नहीं लकता की ये शून्निता है. ये ख्लोजर है.
- 18:15–18:22इस पूरी कहानी में द्या का एक भी पल नहीं है. नयाय और हत्या की भीच की जो बहुती महीं रेखा होती है.
- 18:22–18:30उब भहन के उस अंतिम प्रहार के साथ हमेशा के लिए मिट जाती है, अप इसे ख्लोजर कै सकती है, लेकिन मिरी नजर में ये नयाय की हार है.
- 18:30–18:35वूँछे लकता ही ये एक यासा बिन्दू है जाहाँ शाएए तोनो पूरी तरसे सहमत नहीं हो सकते.
- 18:35–19:05अदियों का रहसे कोलना इस बात का सबसे बड़ा सबूद है कि प्रक्रिति खुद इस बड़ा सबूद है कि प्रक्रिति खुद इस बड़ा सबूद है कि बड़ा सबूद है कि बड़ा सबूद है कि बड़ा सबूद है कि आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ�
- 19:05–19:07अदियाए के पक्ष्मे थी
- 19:07–19:10और मैं अपने निशकर्ष में यही कहुँँँँँ
- 19:10–19:13की बही के प्रान बच्ना निष्च्च्ट रूप से
- 19:13–19:15बहुत ही सकरात्मक परिनाम है
- 19:15–19:18लेकिन हमें हमें वेशा सादन और साद्ध्धे
- 19:18–19:20दोनो को दिखना चाहीए
- 19:20–19:22अज़िल अच्छी ती लेकिन रास्ता.
- 19:22–19:26अद्याई अद्याई तो दोनो एक शकल में नजराने लकते हैं।
- 19:27–19:31ये लोक कता अपनी मनोविग्यान की जतिलताओं को तो बहुत अच्छीतारा दर्षाती है।
- 19:32–19:36लेकिन ये नेटिक रूप से एक बहुत बडाश शून निवि चोर जाती है।
- 19:36–19:40इंसानी मनोविग्यान की जतिलताउंको तो बहुत अच्छीतरा दर्षाती है,
- 19:40–19:45लेकिन ये नेटिक रूप से एक बहुत बडाजा शून्नी भी चोर जाती है.
- 19:45–19:47मैं इस बाथ से भिलकुद सहमत हूं,
- 19:47–19:50कि ये लोग कता मानविए मनोविग्यान,
- 19:50–19:53प्रतिशोद और नियाय के बहुत्ती जटल चवराहे पर खडी है.
- 19:53–19:56ये उपर से जितनी सरल दिकती है,
- 19:56–19:59विचारों के स्थर पर ये उतनी ही गेरी और उलजी हूँई है.
- 19:59–20:02बलकोल, ये उन कहानियो में से है,
- 20:02–20:04जो हमे ये सुचने पर मजबूर करती है,
- 20:04–20:07कि हम न्याय की किन विवस्त्तों को स्विकार करते हैं
- 20:07–20:08और कियु करते हैं?
- 20:08–20:11और यही इस कता की अस्ली कुबसुरती है
- 20:11–20:15हम यहां किसी एक पक्ष्ट को विजेता गूषित नहीं कर रहे हैं
- 20:15–20:19कियोंकी आसे गेरे नेटिक सवालो का कोई एक सई उटर नहीं होता
- 20:19–20:20सही कहा
- 20:20–20:24अम ये फैस्ला आप पर हमारे सुन्नेवालो पर चोडते हैं
- 20:24–20:27कि आप इस न्याय को किस रूप में देखते हैं
- 20:27–20:31हम आप को प्रीरित करते हैं कि आप खुद इस मुल कता का द्धियन करें
- 20:31–20:33और नई अर्थ ततलाशें
- 20:33–20:36इसी विचार के साथ आज कि लिबस इतना ही
- 20:36–20:38सुन்ते रहीए और विमर्ष करते रहीए
Plain text
अगर बजादी बाट बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद तो तराज़ु अचानक तुट जाता है। तो तराज़ु अचानक तुट जाता है। तो तराज़ु अचानक तुट जाता है। तो तराज़ु अचानक तुट जाता है। तो तराज़ु अचानक तुट जाता है। तो तराज़ु अचानक तुट जाता है। वोग कत्हाँ की दुन्या में कदम रकते हैं, खासकर अंईसानी मनोविग्यान और बदले की उन गेरी अंदेरी गल्यो में, तो वो तराजु अचानक तुट जाता है. रही, रही खाए रही है आप. अगर तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप प्रज़ाज़ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो आप देखाँ तो अद्रदिए खुनी पहेली के इडगिद बूनी गए खुनी का अंद्द मतलप कुछ यूँ होता है, की एक बहें अपने मासुम भाई की जान बचाती है। अगर उसकी जो विश्वाज गाती पतनी है यानी भाटिन उसे उसी की रची हुईची हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� तो इस चर्चा में मैं इस बात कपक्ष रही हूँ के ये कहानी पूँन कावियात्मक न्याय या पोईटिक जस्टिस का एक शान्दार उदारन है. बुराय का अंथ आज़े ही होना चाही है. और दिक ही है, मैं यह से पिलकुल अलग नजर्ये से देखता हूँ. मेरा मानना है की बहेंने जो हिंसक तरीका अपनाया वो न्याय नहीं है, तो तीक उसी क्रुडठा की नकल है, जिसका वो विरोथ कर रही ती. तो चलिये, मतलब इस विमरच की शुरवात करते हैं. मेरे नजरये से अगर देखें, तो ये कहानी विषुध्द रूप से न्याए स्थापित करने की कहानी है. अगर हम भाटन के काम को देखें, तो वो सर्फ एक मामूली दोखानी था. आचा, तो आप उसे क्या कहेंगी? वो चरमस्टर की क्रूरता थी. मतलब सोचिये वो अपने गुप्त प्रेमी को जो की एक गरहोमन यानी जेहरीला साब था उसे गर का सबसे बहतरीं काना किलाती ती हा ये तो है और अपने ही पती भाट को वो बास्ये खोस्या यानी गर का बासी और बचाखुचा काना देती ती अगर में उसने उसी साप को अपने पती के हत्या करने का सीदा अदेज देदिया तजब बहन ने कहानी के अंप में भाटिन की ही बनाई हुई उस जानलेवा पहेली को सुलजाया और भाटिन को उसी की शर्ट पर मारा तजब भहन ले कहानी के अंत में भाटिन की ही बनाई हुई उस जानलेवा पहेली को सुलजाया और भाटिन को उसी की शर्ट पर मारा यानी बखसी जोका के मारना जिसका सीथा मतलब है गला कातना तो मेरी नजर में ये कोई सादारन हिंसा नहीं ती तो फिर क्या थी? ये ब्रमाड के संटुलन को वापिस लाने जैसा था मतलब, खलनायक का अंत उसी के बनाय जाल में होना ही सच्चा नया है बूराई को उसी की बाशा में जबाब देना जरूरी होता है देख ही, मैं मानता हूँ के कहानी के स्थक्षर के हिसाब से ये बहुत सन्तोश जनक लकता है, के जिसने गद्ड़ा कोदा वो उसी में गर गया. हमारे दिमाग को ये पैटन पसंद आता है. बिलकुल आता है. लेकिन अगर हम थोडा गेराए में जाए, तो इसका जो नैतिक द्हरातल है, वो बहुत ही धुंडला है. नियाए और बदले में बहुत भून्यादी फर्ख होता है आप आप इसे बदला क्यो मान रहे है? कुकि आप खुछ शूची ना जब भाद्ट की बहन को सारी सच्चाई पता चल गगी तुब उसके पास क्या विकल्ठ थे वो आपनी बाभी को गाँवालो के सामने बिनाकाप कर सकती थी उसे समाज से बहार निकलवा सकती थी हाँ लेकिन लेकिन इसके बजाए बहन ने जान भुजकर उसी खूनी खेल का हिस्सा बनने का फैसला किया उसने कुट का यदी हम प्रहेलिका का उतर दे देंगे, तो भोजी को मार देंगे. मतलब ये नयाए थोडी है. तो क्या है? ये तो अपने दुश्मन की पाश्विक प्रव्रतियों को अपना लेना है. आखिर में नाएका थीक बैसी ही क्रूर हत्यारी बन जाती है जैसी की क्छ नाएका थी उसने भी तो पुरे होशो हवास में एक दम तन्डे दिमाक से एक अन्सान का गला काटा है ना? मैं देख री हूँ कि आप आप यह साथ क्यों सुच रहे हैं लेकिन मैं आप को एक अलग नजर्या देना चात्तियों अपने दोके की फित्रत और और सजाक के अनुपात को समचना होगा मतलब मतलब भार्टिन की क्रूर्टा कोई गुस्से में या अचानक की आप्राद नहीं ता ज़रा उस द्रिश्य को याद की जे, जब भाट अनजाने में, अपने जूते यानी पनी में, चिपे हुए उस गवूमन साप को मार देता है. आप बद़न को ये पता चलता है, तो उसका दुक एक बहुत ही विक्रित, मतलब एक तरह का साएकोर्टिक रूप ले लेता है. उसने साब के तुक्डे की एथे. अग, उस मरे हुए साप की नाउ तुक्डे करती है, नाउ तुक्डे, और फिर उने चे अलगलग गुप्त जगगों पर चिपाती है. काटके पाए, मच्या, तेल, नमक, अनाज भंदार, और तोक्री में. तुब आप ये कैसे कह सकते हैं कि उसे सरफ समाथ से निकाल देना काफी होता. ये एक चरम मानसिक विक्रती है, ये एक ठदन्डिमाख से रची गई साजिश है, उसने उन तुक्डों पर एक पहेली गड़ी, सर्फ और सर्फ अपने पती को तदपा तदपा कर मारने के लिए. दिके, मैं इस बाथ से बलकुल इंकार नहीं कर रहा, कि उसका काम भयानक था. तो फिर, तो फिर आप ये कैसे कह सकते हैं, की उसे सर्फ समाथ से निकाल देना काफी होता. इस तरकी गेरी, ज़ो तक समाथ चुकी बुराई को खत्न करने के लिए, उसी स्टरके कदोर दन्द की जरूरत थी आप एक मनो रोगी को स्वर्फ उब देश देकर नहीं सुदार सकते मुझे खेद है, लेकिन मैं अस लोगिक को नहीं मानता क्यो नहीं और मैं आप को बताता हो क्यो? सब से बड़ा सवाल ये उड़ता है कि क्या एक अप्रादी के मनोडोग का जवाब, खुद मनोडोगी बनकर दिया जाना जाही है? आब बैटिंकी मानसेख विक्रती की बात कर रही है. आब वो शोक और अपने प्रेमी के मोह में आंदी हो गए फी. उसका अपने प्रेमी के शव को तुक्डो में काटना और गर के रोज मर्रा के समानो में चिपाना, ये दिखाता है कि उसका मनोविग यान पुरी तरह से तूट चुका था. वो एक गहरे त्रामा से गुजर रही ती. लेकिन त्रामा किसी को हत्यारा बनने का लिस्ट तो नहीं देताना? औरे बिलकुल नहीं देता. लेकिन अब आप वुब बहन के मनोविग्यान को दिक्ये. बहन तो किसी त्रामा में अंदी नहीं फीग. वो पुरी तरह से सचेथ त्फीग. उसका दिमाग बिलकुल शान्त था उसका काम पूरी तरहे से कालकूलेटेद सोची समजी हत्या थी मैं आपकी बाद समज रहूं की बुराई भ्यंकर थी लेकिन आँ... क्या एक ख्रूर खेल को उसी के खुनी निमो से जीतना वास्तव में जीत है? तो फिर क्या है? या ये खलनायक की हिंसेक विचार दारा के सामने आत्म समरपन करना है आत्म समरपन कैसे? मतलब उसने तो खलनायका को खत्म कर दिया शारेरेक रूप से? आप, लेकिन वेचारेक रूप से जब बहन ने पहेली भूजी और भाटिन का गला काटा, तो उसने जाने अनजाने में यह साभित कर दिया, की बाटिन का नियम ही दून्या चलाने का आस्ली नियम है. की जो ताकतवर है, उस दूसरे की जान ले सकता है. उसने बाटिन के सिस्तम को नहीं तोडा, वो बस उस सिस्तम की नहीं बोस बन गई. ये एक दिल्चस्प पुईंट है, हला की मैं यस दरा से फ्रेम नहीं करूंगी. आप कहरे हैं कि बहिन ने सचे त्रुब से यह फैसला लिया. लेकिन हमे इस फैसले के पीचे के कारन और परिनाम को भी देखना होगा. क्या मतलभ है आपका? मतलब हम ये बहुल रहे हैं कि बहुन को इस साजिश का पता कैसे चला ये हमें कहानी के उन जादूई या आलोकिक तत्वों की और लेजाता है जो मेरी नजर में बहन के काम को सीदे ब्रमान की स्वीक्रती देते हैं अच्छा अपन दीों की बात करी है ना? बिलकोल, हमारे सुनने वाले शाएट सुच रहे हूंगे कि बहन को इतने गेरे रहसे का पता कैसे चला जब भाट अपनी मुध की दर से दो दिन की महलत मांकर अपनी बहन के पास जाता है, तो बहन उसकी उम्र या औरा को देक कर चिंटित हो जाती है. और जब वे लोड रहे होते हैं, तो वे एक दरमशाला में रुकते है. बहन को नीन नहीं आरे है, और तब क्या होता है, वाँके दिये आपस में बाते करते हैं. जो की लोग कतावों का एक बहुत्ती कलासिक मोटीफ है. आप, प्रक्रती और जादूई शकतिया हुद भीज बचाव करती है. तो बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब इक इंस्तूमें ती देखेए, वो एक समहख तर्क है लेकिन, क्या आप ने सपर विचार किया है, किस अलोके ग्यान का वास्तर में आर्थ क्या है? क्या आर्थ है? मैं एहा एक नया नजरिया रखना चाूंगा यह आँज़ तो अज़़ाद की कुटाडी उठाले और अप्रादी का सिर काट दे. लेकिन लोग कतागो के समाज में अदालते तो हुती नहीं ती. अदालते नहों. लेकिन समाज तो था पन्चायत थी. और नयाई वेवस्ता को दरकिनार करके खुड जल्लात की कुलाडी उठाले और अप्रादी का सिर काट दे लेकिन लोग कतागों के समाज में अदालते तो हुती नहीं ती अदालते नहों लेकिन समाज तो था पनचायत फीए बाँमान्ड ने या उन दियो ने बहन को सच्चाई बताई दी थी साप के नाउट तुक्डों का रहेसे कोल दिया था तो उस पल में बहन के पास निरपेखष शकती आग़ा ग़ी थी खयते ना ग्यान ही शकती है, वो शकती उसके पास थी अमारे सुन्नेवाले भी शाएद यही सोज रहे हूंगे कि अगर भहन के पास इतनी वडी शक्ती ती तो उसने सीदे पन्चाइत के पास जाने का विकल्त क्यो नी चुना अहँं वो अपने भाई को वहाँ से हमेशा के ले सुरक्षित निकाल ले जासकती थी बाटिन को आज़े जोड़े दी? वो बाटिन को गामवालों के समने भेनाखाप कर सकती दी लेकिन उसने क्या किया? उसने जान बुचकर एक खुनी तमाशे का मनचन किया उसने खुड जाकर बाटिन को उसी के खेल में चुनाती दी ताकि उसे मारने का एक नैतिक बहाना मिल सके मैं इसे बहाना नहीं कोझोंगी मेरी नजर में ये अलोकिक रस्तक शेप बहेंके हिंसक फैसले को सही नहीं तहराता बलकी ये उसकी पसंद को और भी खोफनाग बनाता है ये आज़ा है जैसे आपके पास किसी महमारी का रहाज हो लेकिन आप उस रहाज से लोगों को बचाने के बजाए वाईरस को एक हत्यार के तरे अस्तमाल करने लगें? ये थोडी आतिशी उकती हो गड़ी नहीं उसने उस परम ज्यान का अस्तमाल शमा या शान्ती के लिए नहीं किया? अद्या के लिए किया? मुझे लकता है आप एक आदोने कानूनी विवस्ता के चश्मे से एक सद्यो पुरानी लोक कता को देख रहे हैं. आशा क्यो? क्यों कि रहें नयाए की उस परिबाशा को समजना होगा जो इन कहानियों की ज़़ो में बसी है, न्याय की लोग परिबाशा सम्मिती या बराभरी पर निरभार करती है. लेकिन बराभरी का मतलप एक जैसी क्रूर्ता तो नहीं हो सकता? आप इसे क्रूर्ता के रहें है, मैं इसे निवारन दिटरेंस कहती हूँ, बाटन दे अद्यन्त आपने अपने पाटन देगा पाटन तो बवाटन तो बवाटन तो बवाटन तो बवाटन तो बवाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो वाटन तो लोग कत्ठाव में ये दोनो एक ही है, समाज मैंसी कहानिया गडी ही जाती है, ताकि एक सक्त सन्टेश चाए, ये दर पैदा करना बहुत जरूरी है, ताकि बहुविष्चे में कोई भी अनसान, यैसा ब्यानक विष्वाज कहात करने की हम्मत ना करे. यदर पड़ा करना बहुत जरूरी है ताकी भविश्छे में कोई भी हिन्सान यसा भ्यानक विष्वाज खाथ करने की हिम्मत ना करे. मैं समझ राए हूं, लेकिन... सुच्टिये, अगर भहन उसे सर्फ निर्वासित कर देती, गाँसे निकाल देती. तु क्या वो न्याय होता? जिसने आपके बही को तदबा तदबा कर मारने की योजना बनाई उसरिव गाँउसे निकाल देना? नहीं बराबरी की हिंसा ही यहा वो सन्तुलन लाती है जो समाज को मनोवग्यानिक रूप से सन्तुष्ट करती है मैं अस्बाथ से बिलकुल सहमत नहीं हूँ। मुझे अस्बाख्यान्च न्याय का प्रतिषोद मेही एक बहुत गेरा विरोदा बास दिखाए देता है कैसा विरोदा बास? न्याय का मुल सवबाउ कैसा होना चाहीं? निश्पक्ष, सुद्धारात्मक, और सिस्टम को तीक करने वाला जबकी प्रतिषोद, प्रतिषोद हमेशा व्यक्तिगत, अंदा और विनाशकारी होता है आप सम्मितिया बराभ्री के बात कर रही है बराभ्री तो आईने में लिए लेकिन क्या हमे बुराई का आईना बन जाएए? आईना बनने में हर्ष क्या है, अगर वो बुराई को कथम कर रहा हो? हर्ज ये है क्या आप खुद वही बन जाते हैं, जिस से आप लड़ रहे हैं. ये आसा है, आँ जैसे आप किसी मरीस का तूमर निकालने के लिए कसाई के बड़े चाकू से सरजरी कर रहों उआप ने तुमर तु निकाल दिया, लेकिन उस तरीके के क्रूड़्ताने मरीस की इंसानियत को इमार डाला. जब नंद पहली भूजकर एक एक करके उन नाउट तुक्रो के रहसे को उजागर करती है. जागर करती है, और फिर आपनी प्रतिग्या के अनुसार आपनी भाभी का गला काटती है, तो उषन में वो क्या लगरी है? वो एक रक्षक नहीं एक शिकारी लगरी है. वो शिकारी नहीं रक्षक ही ती, उसने अपने बहाई को बचाएा. लेकिन कल्पना कीजी उस दिश्चकी वो शान्ती से नाम उन खोफनाग जगो का नाम ले रही है. काथ, मच्विया, तेल, नमक और फिर अचानक वो हिंसक प्रहार करती है. बौराई का अंत तो हुए, बहाई की जान तो बजगगगी. लेकिन उसकी कीमद क्या चुकानी पडी, नेटिक्ता की हत्या. सांगन में जहां कभी भाटन की क्रूर्ता पल रही थी, वहा अंत में बहन की क्रूर्ताने जन्म लिया. हिन्सा का चक्र कहतम नहीं हूँँआ, उसने सर्फ अपना रूब बडल लिया. दिक्ये मैं समज रहुं की आप इस बराभरी के नयाए को एक नैटिक पतन के रुप में देख रहें लेकिन हमें पीडद के नजर्ये से भी सुचना होगा जिस के बारे में हम बात ही नहीं कर रहें भाट के बारे में? अआ भाट के बारे में सुच्छीए वहा अपने ही गर में एक अजनबी बन गया था, उसे रोज भासी खाना दिया जारा था, और वहा अपनी पतनी के प्रेम प्रसंग की सच्चाईई से बिल्कोल अजन जान था. ता उसकी इस्तिती वाकई दैनी एत ही. और जब वो अन्जाने में पनही में खिपे सामप कुमारता है, तो वो बस आत्म रक्षा कर रहा होता है. उसे पता ही नहीं ता कि उसने अपनी पतनी के प्रेमी कुमारा है. बाद पुरी तरषे निर्दोष है. बलकोल. उसकी अग्यानता ही उसकी मासुमयत है. इस मासुम्यत को बचाने के लिए किसी को तो कठोर हूना ही ता बहन को ये जिम्मेदारी उठानी पडी आप खेरे हैं कि वो शिकारी बन गगी लेकिन मैं कहूंगी कि वो एक दाल बनी एक एसी दाल व्म जिस पर लगे काटे बाटिन को चुब गै भाद्त की मासुम्यत पर कोई शक्रही है और निस सन्दे उसका जीवित बचना इस पूरी ट्राज़ी का एक मात्र उजला पक्ष है लेकिन मेरी चिंता उस द्धाल के इस्तमाल के तरीके पर है जब बहेंने बाटिन से कहा, अगर में पहेली भूज लूंगी, तो तुमारा गला काट डूंगी, तब उस दाल को एक तलवार में बडल दिया. अगर हम स्विज्ब इस बाद पर जश्वन वनाए, कि बुराई भार गाई, तो हम ये भूल जाते हैं, कि जीटने वाले ने अपने भीटर क्या कूडिया. उसने कुछ नहीं कुया, उसने बस नियाए स्थापित किया. उसने अपनी करूना कूडि. जब लोग कताये इस तरह के क्रूर अंद को नियाय की जीद के रूप में महिमाम बन्दित करती हैं, तो वे समाज को एक बहुती खटरनाक सबक सेखाती हैं. वे सेखाती हैं कि हिन्सा अगर सही वेक्ती तुरा की जाए, तो वो पवित्र हो जाती हैं. ये खटरनाक विचार है? ये बाज शुनने में खटरनाक लक सकती है, लेकिन ये यतार्थ वादी है, प्रक्तिकल है. जब आप एक आजी दून्या में होते है, जब हाँ बुराई निरंकृ हो, इतनी जान लेवा हो, के आपके गर के नमक और तेल में मोड शुपी हो, वहां आपकी आदरश्वादी नेटिक्ता काम नहीं आती. अगर बहन ने आदूनिक नेटिक्ता दिखाई होती, तो शहत कहानी का अंद कुछ और होता, और हो सकता है भाट कभी सुरक्षित न रहा पाता. बहन का साहस, उसकी बोद्धिक शम्ता और उसका अन्तिम कठोर निनने, ये सभी चीजे एक मस्वूथ स्त्री चरित्र का निरमान करती है, जो बुराई के सामने गुतने नहीं टेकती. जब बुराई को जर से उखार पेकने का एक मात्र तरीका, उद उसकी ज़ में जाकर उसी के जैसा क्रूर हो जाना है हा बहें एक मजबूछ चरित्र है लेकिन अंत में ये पूरा चक्र देखिये साप का मारा जाना भाटिन दवारा उसके नो तुक्डे करना वो खोफनाक पहेली बनाना अप्र भीर बहन का हींसक बडला लेना, ये सब क्या चोड़ जाता है? एक नैतिक शून्निता. मुझे नहीं लकता की ये शून्निता है. ये ख्लोजर है. इस पूरी कहानी में द्या का एक भी पल नहीं है. नयाय और हत्या की भीच की जो बहुती महीं रेखा होती है. उब भहन के उस अंतिम प्रहार के साथ हमेशा के लिए मिट जाती है, अप इसे ख्लोजर कै सकती है, लेकिन मिरी नजर में ये नयाय की हार है. वूँछे लकता ही ये एक यासा बिन्दू है जाहाँ शाएए तोनो पूरी तरसे सहमत नहीं हो सकते. अदियों का रहसे कोलना इस बात का सबसे बड़ा सबूद है कि प्रक्रिति खुद इस बड़ा सबूद है कि प्रक्रिति खुद इस बड़ा सबूद है कि बड़ा सबूद है कि बड़ा सबूद है कि बड़ा सबूद है कि आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� अदियाए के पक्ष्मे थी और मैं अपने निशकर्ष में यही कहुँँँँँ की बही के प्रान बच्ना निष्च्च्ट रूप से बहुत ही सकरात्मक परिनाम है लेकिन हमें हमें वेशा सादन और साद्ध्धे दोनो को दिखना चाहीए अज़िल अच्छी ती लेकिन रास्ता. अद्याई अद्याई तो दोनो एक शकल में नजराने लकते हैं। ये लोक कता अपनी मनोविग्यान की जतिलताओं को तो बहुत अच्छीतारा दर्षाती है। लेकिन ये नेटिक रूप से एक बहुत बडाश शून निवि चोर जाती है। इंसानी मनोविग्यान की जतिलताउंको तो बहुत अच्छीतरा दर्षाती है, लेकिन ये नेटिक रूप से एक बहुत बडाजा शून्नी भी चोर जाती है. मैं इस बाथ से भिलकुद सहमत हूं, कि ये लोग कता मानविए मनोविग्यान, प्रतिशोद और नियाय के बहुत्ती जटल चवराहे पर खडी है. ये उपर से जितनी सरल दिकती है, विचारों के स्थर पर ये उतनी ही गेरी और उलजी हूँई है. बलकोल, ये उन कहानियो में से है, जो हमे ये सुचने पर मजबूर करती है, कि हम न्याय की किन विवस्त्तों को स्विकार करते हैं और कियु करते हैं? और यही इस कता की अस्ली कुबसुरती है हम यहां किसी एक पक्ष्ट को विजेता गूषित नहीं कर रहे हैं कियोंकी आसे गेरे नेटिक सवालो का कोई एक सई उटर नहीं होता सही कहा अम ये फैस्ला आप पर हमारे सुन्नेवालो पर चोडते हैं कि आप इस न्याय को किस रूप में देखते हैं हम आप को प्रीरित करते हैं कि आप खुद इस मुल कता का द्धियन करें और नई अर्थ ततलाशें इसी विचार के साथ आज कि लिबस इतना ही सुन்ते रहीए और विमर्ष करते रहीए