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लालमैन_बाबा_और_विश्वासघात_का_खौफनाक_प्रतिशोध.m4a

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:30विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्�
  2. 0:30–0:35तो आजके इस गेहन चर्चा में आ, हम एक बहुती खास विशेः पे बात करने वाले हैं
  3. 0:35–0:37आ, और ये कोई आम कहानी नहीं है?
  4. 0:37–0:43जी, हम गजेंद्र ताकुर दूरा रचित एक बिहद मार्मिक और रुंक्ते कडे कर देने वाली
  5. 0:43–0:45मैत्छिली लोग कता में उतरने वाले हैं
  6. 0:45–0:51जो के विदे ही पत्रिका में संकलत है है आँ बलकोल और इस कता का नाम है लाल मैं बाबा
  7. 0:51–0:55मतलब ये सुन्ने में तो एक सादार आन चरवाही की कहानी लकती है
  8. 0:55–0:58लेकिन इसके अंदर जो गेराए है वो हेरान करने वाली है
  9. 0:58–1:02बलकोल, इसके भी कर नेतिकता, खफनाक, विष्वाजग हाद
  10. 1:02–1:06और एक असी अलोकिक रिनवसूली का ताना बाना है ना
  11. 1:06–1:11जो मतलब अईन्सानी फित्रत के सबसे अंदेरे कोनो को बेनखाप कर देता है
  12. 1:11–1:15अगर मैं इस लोक कता के सबसे बडी खासित के बारे में बताओना
  13. 1:15–1:18तो ये सर्फ सही और गलत के बीच के लडाई नहीं है
  14. 1:18–1:19आचा तो ये क्या है?
  15. 1:19–1:23ये आसल में मानव मनो विग्यान की एक बहुत इग गेरी के स्टडी है
  16. 1:23–1:25दिलच्यस पे
  17. 1:25–1:55आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आप आ� आ� आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
  18. 1:55–1:57तो ज़ी एस पूरी गटना की ज़ड़ पहुजतें
  19. 1:57–2:01तो सब से पहले हमें नहाथ गाँई गाँई गाँई प्रिष्ट फुमी को समजना होगा
  20. 2:01–2:03आँँई बहुत जरूरी है
  21. 2:03–2:06तो लाल मैं और मनसाराम ये दोनो चमार जाती के यूवा है
  22. 2:06–2:08यह गाँई की प्रिष्ट पूमी को समजना होगा
  23. 2:08–2:10आँ वो बहुत जरूरी है
  24. 2:10–2:13तो लाल मैं और मनसाराम यह दोनो चमार जाती के यूवा है
  25. 2:13–2:16और बच्पन के बेहत करीबी दोस था नहीं
  26. 2:16–2:17मतलब लंगोटी आ या यारे है
  27. 2:17–2:19और उनका काम क्या है
  28. 2:19–2:21उनका रूस का काम है गाँए की बहेंसों को चराना
  29. 2:22–2:24लेकिन यहां एक कैच है
  30. 2:24–2:25कैच कैसा कैच
  31. 2:25–2:29ये काम किसी शान्त यह रहे भरे पारक में होता है
  32. 2:29–2:30नहुड़ा का जंगल ना
  33. 2:31–2:33पुईई सादारन जंगल नहीं है
  34. 2:33–2:33बाप्रे
  35. 2:33–2:35रहा ये एक विशाल
  36. 2:36–2:36अंद्कार मैं
  37. 2:36–2:41और बहुत ही खुंकार जगा है, जगा है और रग कदम पर मुद्का साया मन्ड राता है ता है.
  38. 2:41–2:46मतलब नोहट्टा के जंगल को महेज जगा समजना बहुत बडई भूल होगी है ना?
  39. 2:46–2:47बिलकुल
  40. 2:47–2:54इस कता मेंना वो जंगल एक सक्वरिय, खतरनाक और मनोवेग्यानिक दमाव बनाने बाली शकती की तरा है.
  41. 2:54–2:59उगर दो इन्सान रडन आजी जगापड़ जाते हैं
  42. 2:59–3:02जगागा मनुश्व खाद्दिय श्रिंकला में सब से उपर नहीं है
  43. 3:02–3:06मतलव जगागा कोई भी जंगली जान्वर उने खाँ सकता है
  44. 3:06–3:07आव उतो है
  45. 3:07–3:10तो उनका आपसी रिष्ता सिथ दोस्ती तक सीमित नहीं रहेता
  46. 3:10–3:12तो फिर वो क्या बन जाता है?
  47. 3:12–3:18वो एक सवाईवल पैक्त या जीवन रक्षक समजोते में बड़ल जाता है.
  48. 3:18–3:26जंगल की उस भ्याव अठा के भीच लाल मैं और मनसा रामता एक दूसरे पर जो अंदा विष्वास ताना
  49. 3:26–3:30वो आसल में उनकी जिन्दा रहने की सबसे बडी शर्थ थी
  50. 3:30–3:32मड़ब अगर इसे आजके समय से जोडग कर देखें
  51. 3:32–3:40तो ये दीप सी डाइविंग या बिना सेझ्टी रोप के उचे पह़ों पर चड़ने वाले परवतारोहींगो जैसा है
  52. 3:40–3:44अगर एक का पैर फिसला, तो दूसरा ही उसकी एक मातर लाइप्लाईन होता है.
  53. 3:45–3:47इस हत्तक का ब्रोसा था दोनो के भीचु.
  54. 3:48–3:51अगर अगर एक का पैर फिसला, तो दूसरा ही उसकी एक मातर लाइप्लाईन होता है.
  55. 3:52–3:54इस हत्तक का ब्रोसा था दोनो के भीचु.
  56. 3:54–4:24तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
  57. 4:24–4:27ज़ाहर सी बात है कोई भी आपनी जान बचाएगा पहले
  58. 4:27–4:31लेकिन यहां लाल्मिन की प्रतिक्रिया पूरी तरा से अप्रत्याषित है
  59. 4:31–4:32आच्छा वो क्या गरता है
  60. 4:32–4:37वो अकनी भहेस को बचाने के लिए उस बागेन से बहिरतो जाता है
  61. 4:37–4:39अप्रत्याशित है. अच्छा वो क्या गरता है?
  62. 4:39–4:43वो अखनी भेएस को बचाने के लिए उस बागें से भिर्थो जाता है
  63. 4:43–4:45यह दरपोग अगा तो ता दानी
  64. 4:45–4:48लेकिन वो अपनी पूरी ताकत इसली अपनी पूरी ताकत नहीं करता
  65. 4:48–4:50वो अपनी शकती को रोक लेता है
  66. 4:50–4:52आप वो पूरी ताकत नहीं लगाता
  67. 4:52–4:54लेकिन यहां कहानी वास्तमे बेहत दिलचस पोजाती है
  68. 4:54–4:57यहां कहानी वास्तमे बेहत दिल्चस बोजाती है
  69. 4:57–5:00मतलब एक बड़ा सवाल क़ा होता है कि लाल में अजा क्यूं करता है
  70. 5:00–5:01बलकुल
  71. 5:01–5:03वो कोई दरपोख अजान तो ता नी
  72. 5:03–5:06लेकिं वो अपनी पुडी ताकत इसली अजा नहीं कर राथा
  73. 5:06–5:08कि वो कि सामने जो हमलावर है
  74. 5:08–5:11वो एक मादा है, एक बागेन है
  75. 5:11–5:13वुझ, ये बहुत गेरा पूझट है
  76. 5:13–5:18तुछ, उसके मन में नारी जाती के प्रती इतना गेरा सम्मान बसा हुए
  77. 5:18–5:22कि वो एक हिनसत जानवर के स्त्री रूप को देख कर भी
  78. 5:22–5:25एक तराके नेटिक संकोच में पर जाता है
  79. 5:25–5:30अर मैं कहुंगी के ये संकोच यस कहानी का सब से गेहरा दार्षनिक बिन्दू है.
  80. 5:30–5:31वो कैसे?
  81. 5:31–5:37क्योंकि लाल मैं के लिये वो बागें सिर्फ मास और खुन का एक भूखा जान्वर नही है.
  82. 5:37–5:37अच्छा.
  83. 5:37–5:41उसके लिए वो उस ब्रम्हांडिय और सामाजिक धानचे का हिस्सा है,
  84. 5:41–5:46जाहास त्री पर हाथ उठाना सबसे बडा पाप माना जाता है.
  85. 5:46–5:50वूँँ, मलग वो अपनी नेटिक्ता को अपनी जीवन से भी उपर रकता है.
  86. 5:50–5:51बलक्ल.
  87. 5:51–5:54लिकिन अगर मैं थवादी नजर्ये से सोचों
  88. 5:54–5:57तो क्या ये एक आत्मगाती मुर्ख्ता नहीं ती
  89. 5:57–6:00खईलोग आसा सोथ सकते है
  90. 6:00–6:03मडब जँब एक जंगली जान्वर आपको चीरने पारने आगा हो
  91. 6:03–6:07तब लिंग भेद देखना या अपनी उसुलो की किताब खोल कर बडजाना
  92. 6:07–6:10ये तो व्यवावारिक रूप से बहुत बवूल लकती है
  93. 6:10–6:15आप ये तो वैसे ही होगया ना जैसे कोई युद्ध के मेडान में जान्मुच कर अपनी तलवार पेग दे
  94. 6:15–6:19आदूनेक और व्यवारेक नजर्ये से ये मुर्खता लग सकती है, ये बज़ से ये.
  95. 6:19–6:20आप.
  96. 6:20–6:24लेकिन अगर हम ग्रामीन मित्खों और लोक कताटागों के दाचे में देखें,
  97. 6:24–6:26तो ये से बिलकल अलकतरह से देखा जाता है.
  98. 6:26–6:27वो कैसे?
  99. 6:27–6:31वहां बहुत इक जीवन का बचना उतना महत्वपोन नहीं माना जाता
  100. 6:31–6:35जितना की आद्यात्मिक और नेटिक पवित्रता का बचना होता है
  101. 6:35–6:37ये बहुत गेरी बात के यापने
  102. 6:37–6:38आपने
  103. 6:38–6:40लाल्बान का वो कदम इस बात का प्रमान है
  104. 6:40–6:44अदर लाल मान ने वो कीमट चुकाई बिल्खुल अपने उस नेटिक संकोच के कारन वो हार गया अदतता उस बागिन का शिकार बन गया अपनी जान गवा बैठा अद.
  105. 6:44–6:53बाब्रे अग़्ोग कताए अकसर इस बाद पर जोर देती हैं, कि सरवोच आदरश्वाद की हमेशा एक भ्याना कीमट चुकानी परती है.
  106. 6:53–6:55और लाल्मान ने वो कीमट चुकाए.
  107. 6:55–7:02अपने उस नेटिक संकोच के कारन वो हार गया और अदतता उस बागिन का शिकार बन गया अपनी जान गवा बैटा
  108. 7:02–7:09उस खोफनाक हमले कि बाद जब लाल मान जमीन पर पडा अपनी अख्री साँसे गिन्रा होता है
  109. 7:09–7:13तब कहनी एक ओर भी गेरे मान्विस्तर पर उतर अतिये
  110. 7:25–7:27मरतेवे लाल मैंने अपने दोस्त मनसाराम से
  111. 7:28–7:30जो शाएद वहां अकेला गवाथ हो स्पूरी गटना का
  112. 7:30–7:31आ, मनसारामी ता वहां
  113. 7:32–7:33तो वो उस से कहता है
  114. 7:33–7:34मैठिली मेहे है ये लाईन
  115. 7:35–7:37मूहिलाग बाद हमर दाह संसकार निकस सिंक किल जाएग
  116. 7:38–7:39जिसका मतलव है
  117. 7:39–7:42मेरे मरने के बाड मेरा दाह संसकार अच्छे से किया जाएई.
  118. 7:42–7:46और ये मागना कोई बहड बढी वसीहत
  119. 7:46–7:48या कोई महान वचन नहीं ता.
  120. 7:48–7:50बलकल नहीं बहुट चोटी सी बाद थी.
  121. 7:50–7:53ये एक अईन सान की अपने सब से करीबी डोस से की गई बसे
  122. 7:53–7:58अगरी उम्मीद थी कि वो उसे कम से कम एक समवन जनक विदाई दे सके.
  123. 7:58–7:58सही बात है.
  124. 7:58–8:04किंकि ग्रामेंट समाज में दा संसकार सर्फ एक शरीर को तिकाने लगाने की प्रक्रिया नहीं होती है.
  125. 8:04–8:07तो इसका और क्या महत्वो होता है?
  126. 8:07–8:11ये एक अट्यंत पवित्र समाजिक और अद्यात्मिक अनुश्धान है
  127. 8:11–8:16इसके बिना ये माना जाता है कि आत्मा दो दूडन्याउ के भीच बवद्टकती रहती है
  128. 8:16–8:18उसे मुक्ती नी मिलती
  129. 8:18–8:20आचा मतलब उसकी आत्मा को शान्तिए रहीं मिलेगी
  130. 8:20–8:24अग, लाल मैं अपनी मोथ को तो स्विकार कर चुका ता,
  131. 8:24–8:28लेकिन वो अपनी आत्मा की अप्मान को स्विकार नहीं करना चाहता ता.
  132. 8:28–8:31लेकिन इसके बाज जो मनसाराम करता है ना,
  133. 8:31–8:33वो मतलप सच्छ में खुन जमा देने वाला है.
  134. 8:33–8:35अग, वो बहुत शोकिंग है.
  135. 8:35–8:36वो गाँ वापस लोटता है
  136. 8:37–8:38और पुरी तरा खमोश रता है
  137. 8:38–8:39भिलकोल चुप
  138. 8:39–8:41वो किसी को एक शबद नहीं बताता
  139. 8:41–8:43के लाल मैं के साथ जंगल में क्या हूँँँँँ
  140. 8:43–8:43भिलकोल
  141. 8:43–8:45वो अपने दोस्त की उस अंते मिछ्छा को
  142. 8:45–8:47उस आखरी गुहार को
  143. 8:47–8:49उसी अंदेरे जंगल में दफन कर देता है
  144. 8:49–8:52कोई शोर नी मचाता, कोई साजच नी करता
  145. 8:52–8:54बस एक खोफनाक चुप्पी साथ लेता है
  146. 8:54–8:58अब इस चुप्पी के पीचे के मनोविग्यान को समजना बहुत जरूरी है हमारे लें
  147. 8:58–9:00आ, कुई आप यह साँई कुई कुई करेगा?
  148. 9:17–9:19विवाबना पने सातिके जंगल से गाँ लोटता है
  149. 9:19–9:23अगर वो कहता है के लाल मिन को बागिन ने मार डाला
  150. 9:23–9:26तो क्या गाँ की पन्चाएत उस पे यकीन करेगी
  151. 9:26–9:28यह तो सोचने वाड है
  152. 9:28–9:31क्या वे यह नहीं सोचने के कि शाइत किसी आपसी विवाद में
  153. 9:31–9:32यकीन करेगी?
  154. 9:32–9:34यह तो सोचने वात है.
  155. 9:34–9:37यह वे ये नहीं सोचने के शाइत किसी आपसी विवाद में
  156. 9:37–9:39मनसाराम नहीं उसकी हत्या कर दी हो.
  157. 9:39–9:42बाप रे हाँ शकतो सीदा मनसाराम पी जाएगा.
  158. 9:42–9:45बिलकुल इसी शक और समाजिक कलंके दरने
  159. 9:45–9:47शायद उसे लक्वा ग्रस्त कर दिया
  160. 9:47–9:49ये बहुती सचक्त द्रिष्टि कोण है
  161. 9:49–9:51मतलब इस से ये समज आता है कि विश्वास गात
  162. 9:51–9:53हमेशा पीट में चूरा गुपना है नहीं होता है
  163. 9:53–9:54ये सही कहा
  164. 9:54–9:56कभी-कभी खुद को बचाने के लिए
  165. 9:56–9:58सथ से मों मोड लेना
  166. 9:58–10:01या अपनी जिम्यदारी से बाग जानाई ना दुईगा का सबसे बड़़़गा बन जाता है
  167. 10:01–10:02बलकुल
  168. 10:02–10:05मनसराम की कायरता, कोई शैतानी काम नहीं ती
  169. 10:05–10:07बलकी ये बस इक दर से अबजी प्रतिकरीया थी
  170. 10:07–10:10जसने लाल मिन की आत्मा के साथ सबसे बड़ान नया कर दिया
  171. 10:10–10:15और यही से ना ये लोक कता एक नया और बहुती दरावना मोड लेती है.
  172. 10:15–10:17बूतिया हिस्चा शुरूट है.
  173. 10:17–10:21आप जब जीवित समाज के कानून या पन्चाइते विफल हो जाती है.
  174. 10:21–10:26और जब एक म्रित व्यक्ति का सब से बुन्यादी अदिकार भी उसे चीन लिया जाता है ना
  175. 10:26–10:30तब प्रक्रिती अपने तरीके सिन्तुलन बनाती है
  176. 10:30–10:32मतलव अब लाल मैं की बारी ती
  177. 10:32–10:35भिल्कुल लाल मैं की आत्मा को शान्ती नहीं मिलती
  178. 10:35–10:38वो अद्यंत ग्रोदित और अशान्त होडती है
  179. 10:38–10:39जाईर है
  180. 10:39–10:42जिस असन्सान ने जीवन बर अपनी नेतिक्ता नेचोडी
  181. 10:42–10:46उसकी आत्मा मतला वे देख्तीवॉज्यो अला बन जाती है
  182. 10:46–10:49और फिर शुरूगती है वो वो अलोकि करन वसुली
  183. 10:49–10:51जिसके बारे मैं ने चर्चा की शिर्वाद में बात की थी.
  184. 10:51–10:52जि.
  185. 10:52–10:57लाल मैं की आत्मा लोट कर आती हैं और मन्सा राम को बका माडाल दी है.
  186. 10:57–10:59ये बहुत ही क्झोफनाग है.
  187. 10:59–11:03अई मदला उसका गला गोट कर और उसे बूरी तरा दबोच कर उसकी जान ले लेती है.
  188. 11:03–11:09ये जो बखा मारना है ना ये बहुत ये विक्तिगत और शारीरिक रूप से हिंसक तरीका है
  189. 11:09–11:12ये सर्फ एक भूद्या बडला नहीं है
  190. 11:12–11:18ये असल में उस गुटन का प्रतीक है जो मन्सा राम की चुप्प्पी ने लाल मैं की आत्मा को दी थी
  191. 11:18–11:22बडल ये क्ड़़का कर्मा का बूम रहंगे, जिसे मुद की सीमाए भी नी रोग पाई.
  192. 11:22–11:26बिलकुल. अगर अगर मिसे व्यापक संदरप से जोडकर देखेना,
  193. 11:26–11:33तो जैसा हम ने पहले का ये कथा ग्रामीन समाच की एक नेथक नियाई प्रनाली की तरा काम करती है.
  194. 11:33–11:36ये समाज को एक बहुती सबष्ट सन्देश देती हैं
  195. 11:36–11:37क्या सन्देश
  196. 11:37–11:41यही के आप जीवित लोगो को दूका दे सकते हैं
  197. 11:41–11:43आप पन्चाएथ से सच्छिपा सकते हैं
  198. 11:43–11:48लेकिन मरे हुए अन्सान की अन्तिम इच्छा का नादर करने की सजा
  199. 11:48–11:53अलोकिख होगी और अपरिहार यह होगी उसे आप टाल नी सकते बापरे
  200. 11:53–11:56ये एक आँसा समाजिक नीम स्थापित करता है
  201. 11:56–11:59जगा मरे हुए लोगों के प्रती हमारे जो करतव्या है
  202. 11:59–12:02वो जीवित नोगों के प्रती करतव्यों से भी जाधा सकत हो जाते हैं
  203. 12:02–12:04ये तो बहुती गेरा विचार है
  204. 12:05–12:07तो अब जब दो यूवा
  205. 12:07–12:08हट्टे कटे दूस्त
  206. 12:08–12:10रहस्यमए तरीके सिम्रित पाय जातें
  207. 12:10–12:13आँ गाँ में तो भवाल मज क्या होगा
  208. 12:13–12:13बलकोल
  209. 12:14–12:16गाँ में जो सननाटा पसरता है
  210. 12:16–12:19वो किसी भी तुफान से ज्यादा बहयानक होता है
  211. 12:19–12:20अग!
  212. 12:20–12:23लेकिन फिर दिरे-दिरे सच्चाई परद-दरपरद खुलती है
  213. 12:23–12:27गाम वालों को उस भयानक जंगल की गडना का पता चलता है
  214. 12:27–12:30आद लाल मैं कि उस नेटिक भलेदान का
  215. 12:30–12:31जी!
  216. 12:31–12:33और मन्सा राम कि उस काएर तापोंड चुप्पी
  217. 12:33–12:36और आत्मा के उस खफनाक प्रतिषोद के बारे में भी सब को पता चल जाता है.
  218. 12:36–12:42और ये वो बिन्दू है जहाए खाहनीना प्रतिषोद की आग से बाहर निकलकर,
  219. 12:42–12:45सामोहेक प्रायष्चित की तरव बडने लकती है.
  220. 12:45–12:47सामुहिक प्रायश्चित
  221. 12:47–12:49मदला पुरा गाँ मापी माँखता है
  222. 12:49–12:49हाँ
  223. 12:49–12:51गाँँवालों को यह अजास होता है
  224. 12:51–12:54कि उनके समाज का एक अंग, मनसराम
  225. 12:54–12:56अपने करतवे में विफल रहा
  226. 12:56–12:59लिकिं जब एक विफल होता है तोसका
  227. 12:59–13:01बोज पुरे समुदाए को अथाना परता है
  228. 13:01–13:06समाज को स्टूटे होई विष्वास को उस असन्तुलन को फिर से टीक करना होता है.
  229. 13:06–13:09और इसी लिए, पूरा गाँएक साथ आता है?
  230. 13:09–13:10बिलक्कुल.
  231. 13:10–13:13विस भाँ सब मिलक्र लाल मैं का पूरे विदिविदान
  232. 13:13–13:16और अपार सम्मान के साथ समोहिक दाह संखार करतें.
  233. 13:16–13:20वे सर्फ एक शरीर का अंतिम संचार नहीं कर रही रही वाँ
  234. 13:21–13:24वे असल में अपनी सामोहिक विपलता का प्राएसचिट कर रहे थे
  235. 13:25–13:26आप वो अपनी गलती सुदार रहे थे
  236. 13:27–13:31वे उस आत्मा से शमा मांग रहे थे जिसे उसके अपने ही दोस ने दूखा दिया था
  237. 13:31–13:39अद ये माना जाता है कि उस समहोईक समान के बाद ही लाल मैन की उस अशान्त आत्मा को अंततः शान्ती मिलती है.
  238. 13:39–13:44लेकिन यहा शान्ती का मतलब यह रिलकुल नहीं है के लाल मैन का वजुद ही मित गया.
  239. 13:44–13:46कहानी यहां कतम नहीं होती.
  240. 13:46–13:51यही से इस कता का सब से चमतकारी रूपान्तरन होता है
  241. 13:51–13:52वो क्या है?
  242. 13:52–13:56दाहा संसकार के बाद लाल मैं सरफ एक शान्त आत्मा नहीं रहता
  243. 13:56–13:59वो समाज के लिए एक लोक देवता बन जाता है
  244. 13:59–14:00मददब लाल मैं बाबा?
  245. 14:00–14:02राल मैं बाबा
  246. 14:02–14:32अज़े बाभा पर बग़ाई बाबा बग़ाई बाबाबा बग़ाई बाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबा
  247. 14:32–14:39आज भी ज़सा की इन स्रोतों से पता चलता है, लाल मैं बाबा के बगत या भखतो ते हैं.
  248. 14:39–14:43और ये माना जाता है कि लाल मैं बाबा की शकती उन भखतो के शरीर में प्रवेश करती है,
  249. 14:43–14:47अगर वे गाँवालों को आशिर्वाद देते हैं उनकी तक्लीफें दूर करते हैं
  250. 14:47–14:52इस तरा का जो देवड्त वे हैं ना, मतलब अगर अजन्द कर देवता बन जाना
  251. 14:52–14:56ये असल में समाज का अपना एक खोपिंग मेकनिजम है
  252. 14:56–14:58मतलब अपने गिल्ट से बाहर आने का तरीका
  253. 15:13–15:20वे लोग आज भी नारी जाती के सम्मान औस्ती के उसुलों को जिन्दा रख्ये हैं।
  254. 15:20–15:27वो सर्फ एक भग्वान नहीं है, वो असल में उस गाउ की सामहेक अंतर आत्मा के रक्षक बन गय है।
  255. 15:27–15:31क्या बाद है। मड़ब एक सादारन से चरवाहे का एक यह सफरना
  256. 15:31–16:01अग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उ�
  257. 16:01–16:31अदिया बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद �
  258. 16:31–16:35यावे किसी प्राची इंकाल के अचुते रहेस से हैं।
  259. 16:35–16:37आम तोर पे यही दारना होती है।
  260. 16:37–16:40तो सामान ने मान्विये पीडाओ से बहुत उपर होते हैं
  261. 16:40–16:43लाल्मन बाबा की ये कठा सुन्ने वालों किलिये
  262. 16:43–16:46एक पहुत थी गहरा विचार सामने लादेती है।
  263. 16:46–16:49ये इस बात पर एक बहुत बड़ा प्रष्नचिन लगाता है,
  264. 16:49–16:53कि हमारे मिठकों और हमारी आस्तावों का वास्तविक उद्गम क्या है?
  265. 16:53–16:57हां! मडलप क्या ये संबव है कि हमारे कईई सबसे पुजने देवता,
  266. 16:57–17:00जिने हम आज बड़बगए मनदिरों और देव स्थानों में पुछते हैं
  267. 17:00–17:03वे वास्थव में कोई वालोकिक शक्तिया ना होकर
  268. 17:03–17:05सर्फ सादारन अंसानी थे
  269. 17:05–17:08बाप रे ये तो बहुत गेरा सवाल है
  270. 17:08–17:09है ना?
  271. 17:09–17:11आजे अईसे अंसान जिनका दर्थ, जिनका भलीदान
  272. 17:11–17:14और जिनके उसुल इतने विशाल और अटूट थे
  273. 17:14–17:16कि उनके जाने के बाज समाज उस अप्राध बोद
  274. 17:17–17:19और उस खाली पन को बरदाश्ती नी कर सका.
  275. 17:20–17:21आज समाज का गिल्ट इतना बडाट आद.
  276. 17:21–17:24और मजबूर होकर अपने कुद के सुकून के लिए
  277. 17:24–17:26समाज को उने बवागवान का दरजा देना ही पडा
  278. 17:26–17:27वुँ
  279. 17:27–17:30क्या हमारी मिठक कता है, वास्तो में
  280. 17:30–17:34आँ प्यशानो के साद्दारन दर्द
  281. 17:34–17:36और उसुलो के समारक है?
  282. 17:36–17:39ये एक अईसा विचार है, जो लंभे समे तक सोचने पे
  283. 17:39–17:41मजवोर करता है, सच्छ मे.
  284. 17:41–17:42बिल्कोल
  285. 17:42–17:45एक आँ सवाल, जो मिल्त्तियों के पार भी गुजता रहता है
  286. 17:45–17:46जी
  287. 17:46–17:50तो, आज की इस गेहन चर्चा में जुडने किलिए,
  288. 17:50–17:54और स्रोतो की इस यात्रा का हिस्व बन निक लिए बहुत दहने वात
  289. 17:54–17:56बहुत अच्छा लगा इस विष्यपे बात कर के
  290. 17:56–18:00और और बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ
  291. 18:00–18:03बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ
  292. 18:03–18:06बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ
  293. 18:06–18:09बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ
  294. 18:09–18:12बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ

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विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्टा विश्� तो आजके इस गेहन चर्चा में आ, हम एक बहुती खास विशेः पे बात करने वाले हैं आ, और ये कोई आम कहानी नहीं है? जी, हम गजेंद्र ताकुर दूरा रचित एक बिहद मार्मिक और रुंक्ते कडे कर देने वाली मैत्छिली लोग कता में उतरने वाले हैं जो के विदे ही पत्रिका में संकलत है है आँ बलकोल और इस कता का नाम है लाल मैं बाबा मतलब ये सुन्ने में तो एक सादार आन चरवाही की कहानी लकती है लेकिन इसके अंदर जो गेराए है वो हेरान करने वाली है बलकोल, इसके भी कर नेतिकता, खफनाक, विष्वाजग हाद और एक असी अलोकिक रिनवसूली का ताना बाना है ना जो मतलब अईन्सानी फित्रत के सबसे अंदेरे कोनो को बेनखाप कर देता है अगर मैं इस लोक कता के सबसे बडी खासित के बारे में बताओना तो ये सर्फ सही और गलत के बीच के लडाई नहीं है आचा तो ये क्या है? ये आसल में मानव मनो विग्यान की एक बहुत इग गेरी के स्टडी है दिलच्यस पे आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आप आ� आ� आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ तो ज़ी एस पूरी गटना की ज़ड़ पहुजतें तो सब से पहले हमें नहाथ गाँई गाँई गाँई प्रिष्ट फुमी को समजना होगा आँँई बहुत जरूरी है तो लाल मैं और मनसाराम ये दोनो चमार जाती के यूवा है यह गाँई की प्रिष्ट पूमी को समजना होगा आँ वो बहुत जरूरी है तो लाल मैं और मनसाराम यह दोनो चमार जाती के यूवा है और बच्पन के बेहत करीबी दोस था नहीं मतलब लंगोटी आ या यारे है और उनका काम क्या है उनका रूस का काम है गाँए की बहेंसों को चराना लेकिन यहां एक कैच है कैच कैसा कैच ये काम किसी शान्त यह रहे भरे पारक में होता है नहुड़ा का जंगल ना पुईई सादारन जंगल नहीं है बाप्रे रहा ये एक विशाल अंद्कार मैं और बहुत ही खुंकार जगा है, जगा है और रग कदम पर मुद्का साया मन्ड राता है ता है. मतलब नोहट्टा के जंगल को महेज जगा समजना बहुत बडई भूल होगी है ना? बिलकुल इस कता मेंना वो जंगल एक सक्वरिय, खतरनाक और मनोवेग्यानिक दमाव बनाने बाली शकती की तरा है. उगर दो इन्सान रडन आजी जगापड़ जाते हैं जगागा मनुश्व खाद्दिय श्रिंकला में सब से उपर नहीं है मतलव जगागा कोई भी जंगली जान्वर उने खाँ सकता है आव उतो है तो उनका आपसी रिष्ता सिथ दोस्ती तक सीमित नहीं रहेता तो फिर वो क्या बन जाता है? वो एक सवाईवल पैक्त या जीवन रक्षक समजोते में बड़ल जाता है. जंगल की उस भ्याव अठा के भीच लाल मैं और मनसा रामता एक दूसरे पर जो अंदा विष्वास ताना वो आसल में उनकी जिन्दा रहने की सबसे बडी शर्थ थी मड़ब अगर इसे आजके समय से जोडग कर देखें तो ये दीप सी डाइविंग या बिना सेझ्टी रोप के उचे पह़ों पर चड़ने वाले परवतारोहींगो जैसा है अगर एक का पैर फिसला, तो दूसरा ही उसकी एक मातर लाइप्लाईन होता है. इस हत्तक का ब्रोसा था दोनो के भीचु. अगर अगर एक का पैर फिसला, तो दूसरा ही उसकी एक मातर लाइप्लाईन होता है. इस हत्तक का ब्रोसा था दोनो के भीचु. तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � ज़ाहर सी बात है कोई भी आपनी जान बचाएगा पहले लेकिन यहां लाल्मिन की प्रतिक्रिया पूरी तरा से अप्रत्याषित है आच्छा वो क्या गरता है वो अकनी भहेस को बचाने के लिए उस बागेन से बहिरतो जाता है अप्रत्याशित है. अच्छा वो क्या गरता है? वो अखनी भेएस को बचाने के लिए उस बागें से भिर्थो जाता है यह दरपोग अगा तो ता दानी लेकिन वो अपनी पूरी ताकत इसली अपनी पूरी ताकत नहीं करता वो अपनी शकती को रोक लेता है आप वो पूरी ताकत नहीं लगाता लेकिन यहां कहानी वास्तमे बेहत दिलचस पोजाती है यहां कहानी वास्तमे बेहत दिल्चस बोजाती है मतलब एक बड़ा सवाल क़ा होता है कि लाल में अजा क्यूं करता है बलकुल वो कोई दरपोख अजान तो ता नी लेकिं वो अपनी पुडी ताकत इसली अजा नहीं कर राथा कि वो कि सामने जो हमलावर है वो एक मादा है, एक बागेन है वुझ, ये बहुत गेरा पूझट है तुछ, उसके मन में नारी जाती के प्रती इतना गेरा सम्मान बसा हुए कि वो एक हिनसत जानवर के स्त्री रूप को देख कर भी एक तराके नेटिक संकोच में पर जाता है अर मैं कहुंगी के ये संकोच यस कहानी का सब से गेहरा दार्षनिक बिन्दू है. वो कैसे? क्योंकि लाल मैं के लिये वो बागें सिर्फ मास और खुन का एक भूखा जान्वर नही है. अच्छा. उसके लिए वो उस ब्रम्हांडिय और सामाजिक धानचे का हिस्सा है, जाहास त्री पर हाथ उठाना सबसे बडा पाप माना जाता है. वूँँ, मलग वो अपनी नेटिक्ता को अपनी जीवन से भी उपर रकता है. बलक्ल. लिकिन अगर मैं थवादी नजर्ये से सोचों तो क्या ये एक आत्मगाती मुर्ख्ता नहीं ती खईलोग आसा सोथ सकते है मडब जँब एक जंगली जान्वर आपको चीरने पारने आगा हो तब लिंग भेद देखना या अपनी उसुलो की किताब खोल कर बडजाना ये तो व्यवावारिक रूप से बहुत बवूल लकती है आप ये तो वैसे ही होगया ना जैसे कोई युद्ध के मेडान में जान्मुच कर अपनी तलवार पेग दे आदूनेक और व्यवारेक नजर्ये से ये मुर्खता लग सकती है, ये बज़ से ये. आप. लेकिन अगर हम ग्रामीन मित्खों और लोक कताटागों के दाचे में देखें, तो ये से बिलकल अलकतरह से देखा जाता है. वो कैसे? वहां बहुत इक जीवन का बचना उतना महत्वपोन नहीं माना जाता जितना की आद्यात्मिक और नेटिक पवित्रता का बचना होता है ये बहुत गेरी बात के यापने आपने लाल्बान का वो कदम इस बात का प्रमान है अदर लाल मान ने वो कीमट चुकाई बिल्खुल अपने उस नेटिक संकोच के कारन वो हार गया अदतता उस बागिन का शिकार बन गया अपनी जान गवा बैठा अद. बाब्रे अग़्ोग कताए अकसर इस बाद पर जोर देती हैं, कि सरवोच आदरश्वाद की हमेशा एक भ्याना कीमट चुकानी परती है. और लाल्मान ने वो कीमट चुकाए. अपने उस नेटिक संकोच के कारन वो हार गया और अदतता उस बागिन का शिकार बन गया अपनी जान गवा बैटा उस खोफनाक हमले कि बाद जब लाल मान जमीन पर पडा अपनी अख्री साँसे गिन्रा होता है तब कहनी एक ओर भी गेरे मान्विस्तर पर उतर अतिये मरतेवे लाल मैंने अपने दोस्त मनसाराम से जो शाएद वहां अकेला गवाथ हो स्पूरी गटना का आ, मनसारामी ता वहां तो वो उस से कहता है मैठिली मेहे है ये लाईन मूहिलाग बाद हमर दाह संसकार निकस सिंक किल जाएग जिसका मतलव है मेरे मरने के बाड मेरा दाह संसकार अच्छे से किया जाएई. और ये मागना कोई बहड बढी वसीहत या कोई महान वचन नहीं ता. बलकल नहीं बहुट चोटी सी बाद थी. ये एक अईन सान की अपने सब से करीबी डोस से की गई बसे अगरी उम्मीद थी कि वो उसे कम से कम एक समवन जनक विदाई दे सके. सही बात है. किंकि ग्रामेंट समाज में दा संसकार सर्फ एक शरीर को तिकाने लगाने की प्रक्रिया नहीं होती है. तो इसका और क्या महत्वो होता है? ये एक अट्यंत पवित्र समाजिक और अद्यात्मिक अनुश्धान है इसके बिना ये माना जाता है कि आत्मा दो दूडन्याउ के भीच बवद्टकती रहती है उसे मुक्ती नी मिलती आचा मतलब उसकी आत्मा को शान्तिए रहीं मिलेगी अग, लाल मैं अपनी मोथ को तो स्विकार कर चुका ता, लेकिन वो अपनी आत्मा की अप्मान को स्विकार नहीं करना चाहता ता. लेकिन इसके बाज जो मनसाराम करता है ना, वो मतलप सच्छ में खुन जमा देने वाला है. अग, वो बहुत शोकिंग है. वो गाँ वापस लोटता है और पुरी तरा खमोश रता है भिलकोल चुप वो किसी को एक शबद नहीं बताता के लाल मैं के साथ जंगल में क्या हूँँँँँ भिलकोल वो अपने दोस्त की उस अंते मिछ्छा को उस आखरी गुहार को उसी अंदेरे जंगल में दफन कर देता है कोई शोर नी मचाता, कोई साजच नी करता बस एक खोफनाक चुप्पी साथ लेता है अब इस चुप्पी के पीचे के मनोविग्यान को समजना बहुत जरूरी है हमारे लें आ, कुई आप यह साँई कुई कुई करेगा? विवाबना पने सातिके जंगल से गाँ लोटता है अगर वो कहता है के लाल मिन को बागिन ने मार डाला तो क्या गाँ की पन्चाएत उस पे यकीन करेगी यह तो सोचने वाड है क्या वे यह नहीं सोचने के कि शाइत किसी आपसी विवाद में यकीन करेगी? यह तो सोचने वात है. यह वे ये नहीं सोचने के शाइत किसी आपसी विवाद में मनसाराम नहीं उसकी हत्या कर दी हो. बाप रे हाँ शकतो सीदा मनसाराम पी जाएगा. बिलकुल इसी शक और समाजिक कलंके दरने शायद उसे लक्वा ग्रस्त कर दिया ये बहुती सचक्त द्रिष्टि कोण है मतलब इस से ये समज आता है कि विश्वास गात हमेशा पीट में चूरा गुपना है नहीं होता है ये सही कहा कभी-कभी खुद को बचाने के लिए सथ से मों मोड लेना या अपनी जिम्यदारी से बाग जानाई ना दुईगा का सबसे बड़़़गा बन जाता है बलकुल मनसराम की कायरता, कोई शैतानी काम नहीं ती बलकी ये बस इक दर से अबजी प्रतिकरीया थी जसने लाल मिन की आत्मा के साथ सबसे बड़ान नया कर दिया और यही से ना ये लोक कता एक नया और बहुती दरावना मोड लेती है. बूतिया हिस्चा शुरूट है. आप जब जीवित समाज के कानून या पन्चाइते विफल हो जाती है. और जब एक म्रित व्यक्ति का सब से बुन्यादी अदिकार भी उसे चीन लिया जाता है ना तब प्रक्रिती अपने तरीके सिन्तुलन बनाती है मतलव अब लाल मैं की बारी ती भिल्कुल लाल मैं की आत्मा को शान्ती नहीं मिलती वो अद्यंत ग्रोदित और अशान्त होडती है जाईर है जिस असन्सान ने जीवन बर अपनी नेतिक्ता नेचोडी उसकी आत्मा मतला वे देख्तीवॉज्यो अला बन जाती है और फिर शुरूगती है वो वो अलोकि करन वसुली जिसके बारे मैं ने चर्चा की शिर्वाद में बात की थी. जि. लाल मैं की आत्मा लोट कर आती हैं और मन्सा राम को बका माडाल दी है. ये बहुत ही क्झोफनाग है. अई मदला उसका गला गोट कर और उसे बूरी तरा दबोच कर उसकी जान ले लेती है. ये जो बखा मारना है ना ये बहुत ये विक्तिगत और शारीरिक रूप से हिंसक तरीका है ये सर्फ एक भूद्या बडला नहीं है ये असल में उस गुटन का प्रतीक है जो मन्सा राम की चुप्प्पी ने लाल मैं की आत्मा को दी थी बडल ये क्ड़़का कर्मा का बूम रहंगे, जिसे मुद की सीमाए भी नी रोग पाई. बिलकुल. अगर अगर मिसे व्यापक संदरप से जोडकर देखेना, तो जैसा हम ने पहले का ये कथा ग्रामीन समाच की एक नेथक नियाई प्रनाली की तरा काम करती है. ये समाज को एक बहुती सबष्ट सन्देश देती हैं क्या सन्देश यही के आप जीवित लोगो को दूका दे सकते हैं आप पन्चाएथ से सच्छिपा सकते हैं लेकिन मरे हुए अन्सान की अन्तिम इच्छा का नादर करने की सजा अलोकिख होगी और अपरिहार यह होगी उसे आप टाल नी सकते बापरे ये एक आँसा समाजिक नीम स्थापित करता है जगा मरे हुए लोगों के प्रती हमारे जो करतव्या है वो जीवित नोगों के प्रती करतव्यों से भी जाधा सकत हो जाते हैं ये तो बहुती गेरा विचार है तो अब जब दो यूवा हट्टे कटे दूस्त रहस्यमए तरीके सिम्रित पाय जातें आँ गाँ में तो भवाल मज क्या होगा बलकोल गाँ में जो सननाटा पसरता है वो किसी भी तुफान से ज्यादा बहयानक होता है अग! लेकिन फिर दिरे-दिरे सच्चाई परद-दरपरद खुलती है गाम वालों को उस भयानक जंगल की गडना का पता चलता है आद लाल मैं कि उस नेटिक भलेदान का जी! और मन्सा राम कि उस काएर तापोंड चुप्पी और आत्मा के उस खफनाक प्रतिषोद के बारे में भी सब को पता चल जाता है. और ये वो बिन्दू है जहाए खाहनीना प्रतिषोद की आग से बाहर निकलकर, सामोहेक प्रायष्चित की तरव बडने लकती है. सामुहिक प्रायश्चित मदला पुरा गाँ मापी माँखता है हाँ गाँँवालों को यह अजास होता है कि उनके समाज का एक अंग, मनसराम अपने करतवे में विफल रहा लिकिं जब एक विफल होता है तोसका बोज पुरे समुदाए को अथाना परता है समाज को स्टूटे होई विष्वास को उस असन्तुलन को फिर से टीक करना होता है. और इसी लिए, पूरा गाँएक साथ आता है? बिलक्कुल. विस भाँ सब मिलक्र लाल मैं का पूरे विदिविदान और अपार सम्मान के साथ समोहिक दाह संखार करतें. वे सर्फ एक शरीर का अंतिम संचार नहीं कर रही रही वाँ वे असल में अपनी सामोहिक विपलता का प्राएसचिट कर रहे थे आप वो अपनी गलती सुदार रहे थे वे उस आत्मा से शमा मांग रहे थे जिसे उसके अपने ही दोस ने दूखा दिया था अद ये माना जाता है कि उस समहोईक समान के बाद ही लाल मैन की उस अशान्त आत्मा को अंततः शान्ती मिलती है. लेकिन यहा शान्ती का मतलब यह रिलकुल नहीं है के लाल मैन का वजुद ही मित गया. कहानी यहां कतम नहीं होती. यही से इस कता का सब से चमतकारी रूपान्तरन होता है वो क्या है? दाहा संसकार के बाद लाल मैं सरफ एक शान्त आत्मा नहीं रहता वो समाज के लिए एक लोक देवता बन जाता है मददब लाल मैं बाबा? राल मैं बाबा अज़े बाभा पर बग़ाई बाबा बग़ाई बाबाबा बग़ाई बाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबाबा आज भी ज़सा की इन स्रोतों से पता चलता है, लाल मैं बाबा के बगत या भखतो ते हैं. और ये माना जाता है कि लाल मैं बाबा की शकती उन भखतो के शरीर में प्रवेश करती है, अगर वे गाँवालों को आशिर्वाद देते हैं उनकी तक्लीफें दूर करते हैं इस तरा का जो देवड्त वे हैं ना, मतलब अगर अजन्द कर देवता बन जाना ये असल में समाज का अपना एक खोपिंग मेकनिजम है मतलब अपने गिल्ट से बाहर आने का तरीका वे लोग आज भी नारी जाती के सम्मान औस्ती के उसुलों को जिन्दा रख्ये हैं। वो सर्फ एक भग्वान नहीं है, वो असल में उस गाउ की सामहेक अंतर आत्मा के रक्षक बन गय है। क्या बाद है। मड़ब एक सादारन से चरवाहे का एक यह सफरना अग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उ� अदिया बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद � यावे किसी प्राची इंकाल के अचुते रहेस से हैं। आम तोर पे यही दारना होती है। तो सामान ने मान्विये पीडाओ से बहुत उपर होते हैं लाल्मन बाबा की ये कठा सुन्ने वालों किलिये एक पहुत थी गहरा विचार सामने लादेती है। ये इस बात पर एक बहुत बड़ा प्रष्नचिन लगाता है, कि हमारे मिठकों और हमारी आस्तावों का वास्तविक उद्गम क्या है? हां! मडलप क्या ये संबव है कि हमारे कईई सबसे पुजने देवता, जिने हम आज बड़बगए मनदिरों और देव स्थानों में पुछते हैं वे वास्थव में कोई वालोकिक शक्तिया ना होकर सर्फ सादारन अंसानी थे बाप रे ये तो बहुत गेरा सवाल है है ना? आजे अईसे अंसान जिनका दर्थ, जिनका भलीदान और जिनके उसुल इतने विशाल और अटूट थे कि उनके जाने के बाज समाज उस अप्राध बोद और उस खाली पन को बरदाश्ती नी कर सका. आज समाज का गिल्ट इतना बडाट आद. और मजबूर होकर अपने कुद के सुकून के लिए समाज को उने बवागवान का दरजा देना ही पडा वुँ क्या हमारी मिठक कता है, वास्तो में आँ प्यशानो के साद्दारन दर्द और उसुलो के समारक है? ये एक अईसा विचार है, जो लंभे समे तक सोचने पे मजवोर करता है, सच्छ मे. बिल्कोल एक आँ सवाल, जो मिल्त्तियों के पार भी गुजता रहता है जी तो, आज की इस गेहन चर्चा में जुडने किलिए, और स्रोतो की इस यात्रा का हिस्व बन निक लिए बहुत दहने वात बहुत अच्छा लगा इस विष्यपे बात कर के और और बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ बच्छाँ

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