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Bodhi_Kayastha_ki_imandari_aur_mudi_Ganga.m4a
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- 0:00–0:06दिके, भूगोल, यान जोगरफी किताबों में हम अकसर पडा है, कि नदिया अपना रास्ता बडलती है.
- 0:06–0:11मदलब कभी किसी बड़े भूखम की वजज़े, या तेक्तोनिक प्लेट्स किसकने से,
- 0:11–0:14आप यह थी आप यह पह पह बहानाग बाड की वज़े से
- 0:14–0:15यह दम नाच्चर प्रोसेस है.
- 0:15–0:16बलकुल.
- 0:16–0:20विज्यान भी यह यह गता है कि यह पूरी तरह से एक भोगोलेग गटना है.
- 0:20–0:24लेकिन आजकी एस गेहन चर्चा में हम जिस विषेः पर बाथ करने वाले है,
- 0:24–0:27वहां एक बहुती च्वंका दिने वाला दावा किया गय है
- 0:27–0:28एक दम सही
- 0:28–0:29और वो भावा ये है
- 0:29–0:32कि प्रक्रती के ये जो कठोर नियम है
- 0:32–0:35वो हमेशा पत्धर की लकीर नहीं होते
- 0:35–0:37वह से ये सुन्ने में थो अजीप लकता है
- 0:37–0:39पर सुरोथ के मुताबिक
- 0:39–0:42एक अकेले अन्सान की निस्वार्त इमान्दारी
- 0:42–0:43मतलब उसकी पवित्रता
- 0:43–0:45और उसकी एक असाहाई पुकार ने
- 0:45–0:47एक पूरी कि पूरी नदी को
- 0:47–0:50अपनी जगासे देड किलोमिटर किसकने पर मजबूर कर दिया.
- 0:51–0:53देखे पहली बार सुन्ने में ये दवा
- 0:53–0:56किसी पुरानी कता या मित जैसा लक सकता है
- 0:56–1:00बर आज हमारे पास जो स्रोत समगरी है
- 1:00–1:02गजिंद्र ताकुर जी दुरा संपादित
- 1:02–1:06विदेहा इपत्र का एक मेठिली आलेक
- 1:06–1:09जिसका शीर्षक है, बड़ा सुकुसार पाूल तोती रे
- 1:09–1:10हा, वही
- 1:10–1:14तो ये आलेक इस खटना को बहुत फीगमविरता से दिखता है.
- 1:14–1:17ये सरफ कोई पुरानी कठा नहीं है.
- 1:17–1:20इसके साज चित्रिया एल्ट्रेशिस दिये गया है ना,
- 1:20–1:25वो अपने आप में बहुत दीप चाएकलोगिल स्टर्टी है.
- 1:25–1:27अच्छा, मड़ब चिट्रो में आज़ा क्या कहासियत है?
- 1:27–1:30उन में पारमपर एक मदुभनी कला को
- 1:30–2:00आदूनिक जोमेट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
- 2:00–2:06महान कवी विद्ध्वती को अपनी सबसे मशुर रच्ना लिखने किलिए प्रेरिद कर दिया.
- 2:06–2:11इक आमसा दर्बारी इतना बडा लेजिन्ट कैसे बन गया आए देकते हैं.
- 2:11–2:16मुझे लगता इस पूरी कठा में इतिहास, अद्द्यात्म और कला का जो कोमपिनेशन है,
- 2:16–2:19उ उस दोर के समाज को समजने के बहुत बढ़ी क्रिकी कुलता है.
- 2:19–2:22तो चलिये थोड़ा विस्तार से समझते,
- 2:22–2:26कहानी के शुर्वात में चलते है कि ये बहुदिक अयस था अकिर थे कोन?
- 2:26–2:28और आप श्टोतों के अनुसार,
- 2:28–2:32बहुडिक आयस था मित्ला के राजा के दरबार में एक सेवक थे
- 2:32–2:36उने राजा के तरफ से एक तैवेटन मिलताता जिसे दरमाहा कहा जाता था
- 2:36–2:41अब देख्य दरबारी होने का सीथा सा मतलब है कि वो हमेशा पावर पैसे
- 2:41–2:45और उन सारी राजनीतिक साजचों के बिल्कुल पास थे
- 2:45–2:45बिल्कुल
- 2:46–2:49उस दोर के राज्दरबारों का माहाल अगर हम सोचें
- 2:50–2:53तो वहां हमेशा एक होड मची रहती थी
- 2:53–2:55कि कों राजा के जीआदा करीब हैं आगा
- 2:55–2:57या किस के पास जीआदा जमीने हैं
- 2:57–3:02कायास्ता होने के नाते उनका काम प्रशासन या हिसाब किताब से जुडा रहा होगा
- 3:02–3:06मतलव उद्धन और सन्सादनो के सीदे समपरक में दे
- 3:06–3:09मतलव ब्रष्टाचार के तो अनगिनत मोगे ते उनके पास
- 3:09–3:10एकदम
- 3:10–3:14आजसे माहोल में एक सादहरन वेतन पर काम करना
- 3:14–3:16उसी में पुरी तर सन्तुष्त रहना
- 3:16–3:19ये लगबभग असमभव माना जाता था
- 3:19–3:21अगर मैं आजके काईम सिसकी तुलना करूना
- 3:21–3:22तो ये कुछ वैसा ही है
- 3:22–3:25जैसे किसी बहुत्ही कट्फृत कोप्रिट कमपनी में
- 3:25–3:26कोई अडिटर हो
- 3:26–3:28रहना चाही एकजामपल है
- 3:28–3:32जो करोडों के गुटालों के भीज बेटकर भी अपना काम पुरी इमान्दारी से कर रहो
- 3:32–3:36और वो भी बिना किसी की आख में कष्टके या पनी नाकरी गवाए.
- 3:36–3:37सहीका.
- 3:37–3:41पर जब अजन दिनबर पैसे और पावर के भीच हैता है तो मन का फिसलना नैच्ट्रल है.
- 3:41–3:45स्रोट में क्या बताया गय है कि उन्होंने कुद को इस करठ्ष्यन से बचाया कै से?
- 3:45–3:48इसका सबसे बड़ा कारन उनकी मान्सिक्ता में चिपा है.
- 3:48–3:56स्रोट बहुत क्लिली बताते है कि वो इर्श्या लालज या दूसों की समपती की चाह से पूरी तरा मुक्त थ �the.
- 3:56–3:59मदलब उने और जादाई कट्था करने का शौक नी ता?
- 3:59–4:02बलकल नहीं. उनो ने कभी दन संजे नहीं किया.
- 4:02–4:07अपने सादारन वेतन पर गुजारा करते और जो भी एकस्ट्रा एंकम होती
- 4:07–4:09उसे दान पुन्यमे लगा देते.
- 4:09–4:10औरे वाज.
- 4:10–4:15इसके पीछे सबसे बड़ा फक्तर थी, उनकी भगवान शिव के प्रती असी मास था.
- 4:15–4:19मित्फिला में शिव को बहुला बाभा भी कहाजाता है.
- 4:19–4:23यहां जो बात सबसे अदिक रोचक है, वैसे एक सबाल भी उड़ता है में बन में.
- 4:23–4:24आप भता एए.
- 4:24–4:54दिके पूजा पाथ तो दरबार में और लोग भी करते हुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 4:54–4:59उनके लिए स्पिरिष्वालिती का मतलप था अपने रिदै की निलन्तर शुद्दी
- 4:59–5:06जब आप आन्दर से मान लेते हैं की बाहर का मतेरिल वोल आपको परमनेंट सिक्योरती नहीं दे सकता
- 5:06–5:08तो लालगच खडिए खटम हो जाता है
- 5:08–5:09सईई बात है
- 5:09–5:14उनो ले उस दुन्या की सुक्सेस देफनेशन को ही रेजट कर दिया ता जो दर्बार में चलती थी.
- 5:14–5:19उने पता दा की अस्ली पावर अपने मन पर कंट्रोल रह्ँने में है.
- 5:19–5:20बिलकल.
- 5:20–5:50अगर उगाँबा आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
- 5:50–5:55गगगा के तटपर जाकर सुईच्छा से आपनी देहित त्यागने का संकलप था
- 5:55–5:57एक तरह से मोख्ष प्राप्ति का सबसे कठेन रास्ता
- 5:57–6:03आप बलकुल अपनी सारी पहचान परवार सब कुछ सुईच्छा से पीचे चोडगर
- 6:03–6:06उस परम तत्वो में विलीन हुने निकल परता था.
- 6:06–6:10पर अगर में अस्वे आशके एक तारकिक नजर्ये से देखूं
- 6:10–6:11अपना ब्रापुरा पर्वार चोड देना
- 6:11–6:16कैसे एक तरका पलायान या रिस्पोंसबिल्रती से बहगना नहीं का जा सकता?
- 6:16–6:19आज हमे लख सकता है कि ये इस्केपिज्म है
- 6:19–6:22लेकिन उस सम्वे की जो आश्रम विवस था ती
- 6:22–6:26उस में इसे जीवन का नाट्रल आख्री चरन माना जाता ता
- 6:26–6:27चन्यास आश्रम
- 6:27–6:29सही ये बहागना नहीं ता
- 6:29–6:34बलकी उस मों हो और अटेच्मिन को तोडने का एक बहुत फींस टेकिंग प्रोसेस था
- 6:34–6:40एक प्रतिक था कि अईन्सान खाली हाथ आया था और खाली हाथ लोड रहा है
- 6:40–6:46पिसिकली ठखाडेने वाला पर मेंटली शाइत और भी जादा इंटेंस जी एक दम ये बहुत बडी मान से कुतल पुतल ती
- 6:46–6:51और श्रोत में जो अलक तरे के चित्र दिये गएं मुझे लकते है वो इसी श्टेट को दिखारें
- 6:51–6:55लेके उन चित्रो को लेकर मुझे थोडा सा दाूट है
- 6:55–6:56अच्छा कैसा दाूट?
- 6:56–6:58देके एक तरफ तो मदूबनी स्टायल में
- 6:58–7:01जोपनिया नाव नदिया मच्लिया बनी है
- 7:01–7:02ये तो समझाते है
- 7:02–7:05लेके उनही परम परागद दिष्चों के तीग भीच में
- 7:05–7:35वावा में तेर्तिवटवे रंगीं जोमेट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
- 7:35–7:37अच्छा उनकी मानसिक्त स्तिती को?
- 7:37–7:40अग, जो लोग कलावाला हिस्चा है,
- 7:40–7:41जो प्रीया लोग,
- 7:41–7:44वो मतेरिल वोल्ट का प्रतीक है.
- 7:44–7:46वो दूनिया जिसे हम चूए सकते है.
- 7:46–7:48जो वो पीचे चोड रहे थे.
- 7:48–7:50वुश्वाद रीयालेटी.
- 7:50–7:50बिल्कुल.
- 7:50–8:20और दूस्री तरव जब उब उपन्का कनेक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 8:20–8:27तो एकी कनवस पे बड़ी फिसिकल वोल्ड में स्थब रगल कर रहे है, पर आत्मा उन शेप्स की तरा फ्री हो चुकी है.
- 8:27–8:31ये अनलिसिस्स वाखे बागे ग़ार है. बड़़ वो सिझ चल कर नदिया तक नहीं जारे थे,
- 8:31–8:35तो अगर बग आदा कोस यानी करीब देड किलोमिटर दूर तो
- 8:35–8:39उनकी हमत जबाब देगागी. पैर आगे नहीं बडपारे थे.
- 8:39–8:43बलकल, मंजिल सामने ती, पर शरीर साथ नहीं देडाखा.
- 8:43–8:45तब उनो ने वही रुखकर गंगा महीया को पुकारा
- 8:45–8:48यही मिरिकल जिसकी वजे से आज हम ये चर्चा कर रहे हैं
- 8:48–8:51जब वो गंगा के टट से लगबबग आदा कोस
- 8:51–8:53यानी करीब देड किलमिटर दूर थे
- 8:53–8:55तो उनकी हिम्मत जवाब देगाई
- 8:55–8:57पैर आगे नी बद पारे थे
- 8:57–8:58भिल्कुल
- 8:58–8:59मनजिल सामने ती
- 8:59–9:01अपर श़ीर साथ ने देरा दा.
- 9:01–9:04तब उनो ने वही रुख कर गंगा महीया को पुकारा.
- 9:04–9:07और फिर स्रोथ बताता है कि एक चमतकार हूँँँँँँ
- 9:07–9:11एक अईसा चमतकार जुस सदीों तक याद रखा गया
- 9:11–9:12गंगा नदीने अपना तद तोड दिया
- 9:12–9:15वो अपनी नट्रल निमित लांगकर
- 9:15–9:18देड किलमिटर आगे आगर खुद बोदि का इस था के पास आई
- 9:18–9:20और उने अपने अंदर समहित कर लिया
- 9:20–9:24इसे स्रोथ में एक बहुत्ती खुबसुरत चार पैनल वाले चित्रके तुग दिखाया एक.
- 9:24–9:26उस चित्र में क्या सा दिष्चे है?
- 9:26–9:30उस में दिखाया है कि बख्त असा हाई होकर गुटनो के बल बैट्टा है.
- 9:30–9:34और देवी गंगा साख्षात एक कमल के पूल के साथ
- 9:34–9:36नदी से प्रकत होगर उन्न तक पहुट रही हैं
- 9:36–9:40वाओ, ये बहुत ही अलोकिक सीन हैं
- 9:40–9:43पर दिकि यहां बाध सच्मे थोडे कोंप्लिकेट रहाती है
- 9:43–9:45मेरे माझन में के सवाल आरा है
- 9:45–9:46कैसा सवाल?
- 9:46–9:49ये तो एसा हुआ के चुमबक इतना पावर्फल हो गया
- 9:49–9:50कि लोहे कि तुक्डे के बजाय
- 9:50–9:53पूरी एर्थ को ही अपने तरफ खीच लिया
- 9:53–9:54अंग
- 9:54–9:55अनलोगी तो टीक है
- 9:55–9:57लिकिन बिना नदी तक पहोचे
- 9:57–10:00उसे इतनी दूर से अपने पास आने को कहना
- 10:00–10:03किया इसे किसी का अहंकार नहीं माना जासकता
- 10:03–10:04अहंकार?
- 10:04–10:05किस तरा से?
- 10:05–10:08मतलब मैं इतना बड़ा बवगत हूं, मैं क्यो चलूं?
- 10:08–10:10नदी को आना पड़ेगा मेरे पास.
- 10:10–10:13क्या इस में थोडा से अरोगिंस या अडासिती नी लकती?
- 10:13–10:16ये बहुत ही शाप अपजवेश्वेश्झन है.
- 10:16–10:18अगर हम पावो अग ख्लेम के लेंच से देखें,
- 10:18–10:20तो ये आंकार लक सकता है.
- 10:20–10:23लेकिन यहां हमें कहानी के कोंटेक्स्ट को समचना होगा.
- 10:23–10:25अके, तो कोंटेक्स्ट क्या तहावा?
- 10:25–10:29स्रोथ के मुताबिक उनोंने नदी को कोई आदेश यह अडर नहीं दिया था.
- 10:29–10:31वो कोई जिद नहीं फीटी.
- 10:31–10:33तो फिर वो पुकार कैसी ती?
- 10:33–10:37वो एक आसे अनसान की आक्फरी और पूरी तरा सहाय याचना ती
- 10:37–10:40जिसने सारी उमर साद्गी से जी जी ती
- 10:40–10:44उनका बहाव ये ता की अब मेरा शरीर पूरी तरा असमरत है
- 10:44–10:46मेरा कोई अस्तित्वा नहीं बचा
- 10:46–10:49मतलव उनका मैं या एगो पुरी तरा से खटम हो चुका था
- 10:49–10:50बलकुड
- 10:50–10:55जब एगो बलकुड जीरो होजाता है तब ही आबसलुट सरंडर होता है
- 10:55–10:57वो ये नहीं केरे थे कि वो इसके हक्दार है
- 10:57–11:02बलकी वो ये मान रहे ते की अब उन में वहातक पहुट्टने की शम्ता ही नहीं बची.
- 11:02–11:07आचा तो ये आदेश की पावर नहीं, बलकी उनकी सच्चाएई और निरभल ता की पावर थी.
- 11:07–11:10एक दम सही. और यहां यही संदेश मिलता है,
- 11:10–11:14भी बदी कायस था कोई राजा दो थे नहीं, नहीं नाँ उनके नाम का कोई सिक्का चला,
- 11:14–11:18ना कोई बडा मनदिर बना, उई खिल रोर राइग दरबारी थे,
- 11:18–11:23तो फिर सेक्रो साल बाद आज हम उनकी इग कता पड़ के से रहे हैं।
- 11:23–11:25पर एक बात और सुचने वाली है.
- 11:25–11:25बताईए.
- 11:25–11:28बोदी कायस था कुई राजा दो ते नहीं,
- 11:28–11:30नहीं नाम का कुई सिखक चला,
- 11:30–11:31ना कुई बडा मंदिर बना,
- 11:31–11:34वो एक सिंपल लो रांक दरबारी थे.
- 11:34–11:37तो फिर सेक्रों साल बाद,
- 11:37–11:39आज हम उनकी ये कथा पड़ के से रहे हैं?
- 11:39–11:42ये भी श्रोथ में काफी दितेल में बताया गया है.
- 11:42–11:46और यही आंट्री होती है हमारे लिट्रिच्यो, यानी साहिट्यों की.
- 11:46–11:52खुई भी समाज आसी एकस्ट्रोडनरी इवेंच को हवा में नहीं चोड देता.
- 11:52–11:56ये गटना महान कवी विद्यापती के दोर से पहले की ती
- 11:56–11:58पर जब विद्यापती को इसका पता चला
- 11:58–12:01तो वो इस सादारन्ट से दरबारी की कहानी से
- 12:01–12:03बहुत दीप लेवल पर इन्फ्लूएज़
- 12:03–12:06विद्यापती जैसे महान विद्वान का दियान
- 12:06–12:11इक मामुली दरबारी पर जाना ये अपने आप में बहुत बडी स्टेटमेंट है.
- 12:11–12:18बिलकुल. और उनहोंने सुना नहीं विद्द्यापती ने इस कता को अपने फेमल संसक्रित गरन्त पुरुशा परीक्षा में जगाती.
- 12:18–12:22पूरुशा परीक्षा, नाम काफी न्ट्रीण्गें लगराए, इसका कोंटेक्स्ट क्या है
- 12:22–12:27इसका लिट्रली मतलब है मनुश्ष्य की परीक्षा या तेस्ट तो फाम आन
- 12:27–12:33इस गरन्त में विद्ध्यापती ने अलग �alak-tara ke logon ke human qualities ko analise किया है
- 12:33–12:34अच्छा
- 12:34–13:04इस्टाब्टी इस्टाब्टी ना जाए बादे ना जाए बादे ना जाए बादे ना जाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे �
- 13:04–13:08ये भी तो जिक्र है कि विद्यापती ने एक मैठली पद्बी लिखा ता इस अंसरन्द पर
- 13:09–13:11जिसका ताइटल हमार इस आलेख का शीर्षक भी है
- 13:11–13:14रहा बड़ा सुक सार पाओ तुवा तीरे
- 13:15–13:20और इस मैठली कविता की मिट्हास ने इस कहानी को प्रक्तिकली आमर कर दिया
- 13:20–13:22इस लैंका एकशक मीनिंग क्या निकलता है?
- 13:22–13:28इसका अर्थ है, तुमहारे तटपर मैंने महां सुक और जीवन का सार पाया.
- 13:28–13:32विद्यापती ने बोदि कायस था के उस अख्री मोमिन्त को,
- 13:32–13:35इक्तम परफेक्टी काप्चटर लिया ता इंशब्टो में.
- 13:35–13:38की जीवन का अस्ली सार किसी राजदरबार में नहीं
- 13:38–13:40बलकी उस नदी के किनारे मोखष में मिला.
- 13:40–13:41एक दम सही.
- 13:41–13:43इक सिंपल अन्सान की अनस्टी ने
- 13:43–13:45एक महागवी की कलम को एक नहीं दिशा देदी.
- 13:45–13:49अदिसका इंपैक्त इतना स्वागली सुस्टाइती में इंबेटेड है,
- 13:49–13:51की आज तक मिखला में वहवरा यूज होता है.
- 13:51–13:53बोदी कायस्ताजे का गंगा लापकर्व.
- 13:53–13:58राप, जिसका बेसिक मीनिए वहा, की बोदी कायस्ताजे की तरही,
- 13:58–14:00किसी को अखरी विधाई मिले.
- 14:00–14:03यह उनके समाज में एक आदर्ष म्रित्तिओ का स्थन्टर बन गया.
- 14:04–14:07यह साथ दिखाता है, किसी का एक दं स्पोटलेश चरित्र,
- 14:08–14:11कैसे पुरी सुसाइती के क्योंच्यास्नस का हिस्सा बन जाता है.
- 14:11–14:14वैसे, स्रोथ के लास चित्र का अगर हम रेफरेंस लें,
- 14:14–14:19तो वहां उं सरे सींज के तीक सेंटर में एक बड़ासा पीला सितारा,
- 14:19–14:20यानी स्तार बनावाए.
- 14:20–14:24अगर यस सारी चर्चा को हम उस चित्र से जोडें,
- 14:24–14:29तो शाएद वो स्तार इसी आमरता या इमम्माटलेती का प्रतीक है.
- 14:29–14:30बहुत सुन्दर इनालिसस है यह.
- 14:30–14:32सहीटे और कलाने मिलकर
- 14:32–14:35सچ मे एक अडनरी अन्सान को
- 14:35–14:37एक इम्मार्टल लेजन्ट मे बड़ड़ दिया
- 14:37–14:40तो इस पूरे दीब डाईव को अगर लेप अप करना हो
- 14:40–14:42इसके कोल टेकवे क्या निकलता है
- 14:42–14:45दिक है अगर हम इसे आम जिन्दिगी से जोड़ें
- 14:45–14:49तो सबसे बड़ा लेसन यही है, कि पूजा पाट के बाहरी दिखावे
- 14:49–14:53या पावर के शोवफ से, कही जआदा मैटर करती है,
- 14:53–14:55आपकी लाइप्टाएम की अंटेगरती.
- 14:55–14:56सईभात है?
- 14:56–15:00ये कहानी बताती है, कि ब्रष्टाचार और लालगच के भीच रहेकर भी,
- 15:00–15:03अगर आप आप अपने मन की पवित्रता बचाख कर रकते है,
- 15:03–15:08तो प्रक्रिती और आने वाला समाज दोनो आपका सम्मान करते हैं।
- 15:08–15:12एक दम! ये कैसा नजरी आया जो हमारी मर्टीरेल सक्सेस की रेच से बहुत उपर की चीजा हैं।
- 15:12–15:18अग, विद्यापती का वो पद आज भी इसी आमर सत्ते की गवाही दिता है.
- 15:18–15:20वो आप्स्ट्ट्रक जोमेट्रिक आख जूट सित्रो में ती,
- 15:20–15:22वो सिर्फ देकूरेशन नहीं है,
- 15:22–15:24वो सच में अनसान को ये सोचने पर मजबूर करती है,
- 15:24–15:26की सब हमारी बाहरी पैचान,
- 15:26–15:30अवरा ना च्टेट अस चीन जाएगा, तो हमारी आत्मा का असल अकार क्या बचेगा?
- 15:30–15:35बिलकुल, इंटेगरती अर त्याग का ये प्रिष्पल सिफ उस दोर के लें नहीं
- 15:35–15:38बलकी हर जनरेशन के लिए उतना ही रेलगेंट है.
- 15:38–15:42तो आजके इस चर्चा के अंथ में बस एक ठाट है, जो श्रोताएं के लिए चोडना चाँँगा.
- 15:42–15:42आजके इस चर्चा के अंथ में बस एक ठाट है, जो श्रोताएं के लिए चोडना चाँँगा.
- 15:42–15:43आजके जर्चा अरुट.
- 15:43–15:49अगर पूरी सच्चाई और पवित्रता से जीआ गया एक अकेला जीवन बिना किसी शोर या प्यार के
- 15:49–15:52सद्यो तक असी लेजिन्स को जनन दे सकता है
- 15:52–15:54महान कवियों से असी रषनाय लिखवा सकता है
- 15:54–15:56और नदियों के कोर्स तक बडल सकता है
- 15:56–15:59तो यह ज़ें की आजके इस मड़न दोर में,
- 15:59–16:16ज़हां इतना शोर्गुल है, इतने दिस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
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दिके, भूगोल, यान जोगरफी किताबों में हम अकसर पडा है, कि नदिया अपना रास्ता बडलती है. मदलब कभी किसी बड़े भूखम की वजज़े, या तेक्तोनिक प्लेट्स किसकने से, आप यह थी आप यह पह पह बहानाग बाड की वज़े से यह दम नाच्चर प्रोसेस है. बलकुल. विज्यान भी यह यह गता है कि यह पूरी तरह से एक भोगोलेग गटना है. लेकिन आजकी एस गेहन चर्चा में हम जिस विषेः पर बाथ करने वाले है, वहां एक बहुती च्वंका दिने वाला दावा किया गय है एक दम सही और वो भावा ये है कि प्रक्रती के ये जो कठोर नियम है वो हमेशा पत्धर की लकीर नहीं होते वह से ये सुन्ने में थो अजीप लकता है पर सुरोथ के मुताबिक एक अकेले अन्सान की निस्वार्त इमान्दारी मतलब उसकी पवित्रता और उसकी एक असाहाई पुकार ने एक पूरी कि पूरी नदी को अपनी जगासे देड किलोमिटर किसकने पर मजबूर कर दिया. देखे पहली बार सुन्ने में ये दवा किसी पुरानी कता या मित जैसा लक सकता है बर आज हमारे पास जो स्रोत समगरी है गजिंद्र ताकुर जी दुरा संपादित विदेहा इपत्र का एक मेठिली आलेक जिसका शीर्षक है, बड़ा सुकुसार पाूल तोती रे हा, वही तो ये आलेक इस खटना को बहुत फीगमविरता से दिखता है. ये सरफ कोई पुरानी कठा नहीं है. इसके साज चित्रिया एल्ट्रेशिस दिये गया है ना, वो अपने आप में बहुत दीप चाएकलोगिल स्टर्टी है. अच्छा, मड़ब चिट्रो में आज़ा क्या कहासियत है? उन में पारमपर एक मदुभनी कला को आदूनिक जोमेट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट महान कवी विद्ध्वती को अपनी सबसे मशुर रच्ना लिखने किलिए प्रेरिद कर दिया. इक आमसा दर्बारी इतना बडा लेजिन्ट कैसे बन गया आए देकते हैं. मुझे लगता इस पूरी कठा में इतिहास, अद्द्यात्म और कला का जो कोमपिनेशन है, उ उस दोर के समाज को समजने के बहुत बढ़ी क्रिकी कुलता है. तो चलिये थोड़ा विस्तार से समझते, कहानी के शुर्वात में चलते है कि ये बहुदिक अयस था अकिर थे कोन? और आप श्टोतों के अनुसार, बहुडिक आयस था मित्ला के राजा के दरबार में एक सेवक थे उने राजा के तरफ से एक तैवेटन मिलताता जिसे दरमाहा कहा जाता था अब देख्य दरबारी होने का सीथा सा मतलब है कि वो हमेशा पावर पैसे और उन सारी राजनीतिक साजचों के बिल्कुल पास थे बिल्कुल उस दोर के राज्दरबारों का माहाल अगर हम सोचें तो वहां हमेशा एक होड मची रहती थी कि कों राजा के जीआदा करीब हैं आगा या किस के पास जीआदा जमीने हैं कायास्ता होने के नाते उनका काम प्रशासन या हिसाब किताब से जुडा रहा होगा मतलव उद्धन और सन्सादनो के सीदे समपरक में दे मतलव ब्रष्टाचार के तो अनगिनत मोगे ते उनके पास एकदम आजसे माहोल में एक सादहरन वेतन पर काम करना उसी में पुरी तर सन्तुष्त रहना ये लगबभग असमभव माना जाता था अगर मैं आजके काईम सिसकी तुलना करूना तो ये कुछ वैसा ही है जैसे किसी बहुत्ही कट्फृत कोप्रिट कमपनी में कोई अडिटर हो रहना चाही एकजामपल है जो करोडों के गुटालों के भीज बेटकर भी अपना काम पुरी इमान्दारी से कर रहो और वो भी बिना किसी की आख में कष्टके या पनी नाकरी गवाए. सहीका. पर जब अजन दिनबर पैसे और पावर के भीच हैता है तो मन का फिसलना नैच्ट्रल है. स्रोट में क्या बताया गय है कि उन्होंने कुद को इस करठ्ष्यन से बचाया कै से? इसका सबसे बड़ा कारन उनकी मान्सिक्ता में चिपा है. स्रोट बहुत क्लिली बताते है कि वो इर्श्या लालज या दूसों की समपती की चाह से पूरी तरा मुक्त थ �the. मदलब उने और जादाई कट्था करने का शौक नी ता? बलकल नहीं. उनो ने कभी दन संजे नहीं किया. अपने सादारन वेतन पर गुजारा करते और जो भी एकस्ट्रा एंकम होती उसे दान पुन्यमे लगा देते. औरे वाज. इसके पीछे सबसे बड़ा फक्तर थी, उनकी भगवान शिव के प्रती असी मास था. मित्फिला में शिव को बहुला बाभा भी कहाजाता है. यहां जो बात सबसे अदिक रोचक है, वैसे एक सबाल भी उड़ता है में बन में. आप भता एए. दिके पूजा पाथ तो दरबार में और लोग भी करते हुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� उनके लिए स्पिरिष्वालिती का मतलप था अपने रिदै की निलन्तर शुद्दी जब आप आन्दर से मान लेते हैं की बाहर का मतेरिल वोल आपको परमनेंट सिक्योरती नहीं दे सकता तो लालगच खडिए खटम हो जाता है सईई बात है उनो ले उस दुन्या की सुक्सेस देफनेशन को ही रेजट कर दिया ता जो दर्बार में चलती थी. उने पता दा की अस्ली पावर अपने मन पर कंट्रोल रह्ँने में है. बिलकल. अगर उगाँबा आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ गगगा के तटपर जाकर सुईच्छा से आपनी देहित त्यागने का संकलप था एक तरह से मोख्ष प्राप्ति का सबसे कठेन रास्ता आप बलकुल अपनी सारी पहचान परवार सब कुछ सुईच्छा से पीचे चोडगर उस परम तत्वो में विलीन हुने निकल परता था. पर अगर में अस्वे आशके एक तारकिक नजर्ये से देखूं अपना ब्रापुरा पर्वार चोड देना कैसे एक तरका पलायान या रिस्पोंसबिल्रती से बहगना नहीं का जा सकता? आज हमे लख सकता है कि ये इस्केपिज्म है लेकिन उस सम्वे की जो आश्रम विवस था ती उस में इसे जीवन का नाट्रल आख्री चरन माना जाता ता चन्यास आश्रम सही ये बहागना नहीं ता बलकी उस मों हो और अटेच्मिन को तोडने का एक बहुत फींस टेकिंग प्रोसेस था एक प्रतिक था कि अईन्सान खाली हाथ आया था और खाली हाथ लोड रहा है पिसिकली ठखाडेने वाला पर मेंटली शाइत और भी जादा इंटेंस जी एक दम ये बहुत बडी मान से कुतल पुतल ती और श्रोत में जो अलक तरे के चित्र दिये गएं मुझे लकते है वो इसी श्टेट को दिखारें लेके उन चित्रो को लेकर मुझे थोडा सा दाूट है अच्छा कैसा दाूट? देके एक तरफ तो मदूबनी स्टायल में जोपनिया नाव नदिया मच्लिया बनी है ये तो समझाते है लेके उनही परम परागद दिष्चों के तीग भीच में वावा में तेर्तिवटवे रंगीं जोमेट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट अच्छा उनकी मानसिक्त स्तिती को? अग, जो लोग कलावाला हिस्चा है, जो प्रीया लोग, वो मतेरिल वोल्ट का प्रतीक है. वो दूनिया जिसे हम चूए सकते है. जो वो पीचे चोड रहे थे. वुश्वाद रीयालेटी. बिल्कुल. और दूस्री तरव जब उब उपन्का कनेक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् तो एकी कनवस पे बड़ी फिसिकल वोल्ड में स्थब रगल कर रहे है, पर आत्मा उन शेप्स की तरा फ्री हो चुकी है. ये अनलिसिस्स वाखे बागे ग़ार है. बड़़ वो सिझ चल कर नदिया तक नहीं जारे थे, तो अगर बग आदा कोस यानी करीब देड किलोमिटर दूर तो उनकी हमत जबाब देगागी. पैर आगे नहीं बडपारे थे. बलकल, मंजिल सामने ती, पर शरीर साथ नहीं देडाखा. तब उनो ने वही रुखकर गंगा महीया को पुकारा यही मिरिकल जिसकी वजे से आज हम ये चर्चा कर रहे हैं जब वो गंगा के टट से लगबबग आदा कोस यानी करीब देड किलमिटर दूर थे तो उनकी हिम्मत जवाब देगाई पैर आगे नी बद पारे थे भिल्कुल मनजिल सामने ती अपर श़ीर साथ ने देरा दा. तब उनो ने वही रुख कर गंगा महीया को पुकारा. और फिर स्रोथ बताता है कि एक चमतकार हूँँँँँँ एक अईसा चमतकार जुस सदीों तक याद रखा गया गंगा नदीने अपना तद तोड दिया वो अपनी नट्रल निमित लांगकर देड किलमिटर आगे आगर खुद बोदि का इस था के पास आई और उने अपने अंदर समहित कर लिया इसे स्रोथ में एक बहुत्ती खुबसुरत चार पैनल वाले चित्रके तुग दिखाया एक. उस चित्र में क्या सा दिष्चे है? उस में दिखाया है कि बख्त असा हाई होकर गुटनो के बल बैट्टा है. और देवी गंगा साख्षात एक कमल के पूल के साथ नदी से प्रकत होगर उन्न तक पहुट रही हैं वाओ, ये बहुत ही अलोकिक सीन हैं पर दिकि यहां बाध सच्मे थोडे कोंप्लिकेट रहाती है मेरे माझन में के सवाल आरा है कैसा सवाल? ये तो एसा हुआ के चुमबक इतना पावर्फल हो गया कि लोहे कि तुक्डे के बजाय पूरी एर्थ को ही अपने तरफ खीच लिया अंग अनलोगी तो टीक है लिकिन बिना नदी तक पहोचे उसे इतनी दूर से अपने पास आने को कहना किया इसे किसी का अहंकार नहीं माना जासकता अहंकार? किस तरा से? मतलब मैं इतना बड़ा बवगत हूं, मैं क्यो चलूं? नदी को आना पड़ेगा मेरे पास. क्या इस में थोडा से अरोगिंस या अडासिती नी लकती? ये बहुत ही शाप अपजवेश्वेश्झन है. अगर हम पावो अग ख्लेम के लेंच से देखें, तो ये आंकार लक सकता है. लेकिन यहां हमें कहानी के कोंटेक्स्ट को समचना होगा. अके, तो कोंटेक्स्ट क्या तहावा? स्रोथ के मुताबिक उनोंने नदी को कोई आदेश यह अडर नहीं दिया था. वो कोई जिद नहीं फीटी. तो फिर वो पुकार कैसी ती? वो एक आसे अनसान की आक्फरी और पूरी तरा सहाय याचना ती जिसने सारी उमर साद्गी से जी जी ती उनका बहाव ये ता की अब मेरा शरीर पूरी तरा असमरत है मेरा कोई अस्तित्वा नहीं बचा मतलव उनका मैं या एगो पुरी तरा से खटम हो चुका था बलकुड जब एगो बलकुड जीरो होजाता है तब ही आबसलुट सरंडर होता है वो ये नहीं केरे थे कि वो इसके हक्दार है बलकी वो ये मान रहे ते की अब उन में वहातक पहुट्टने की शम्ता ही नहीं बची. आचा तो ये आदेश की पावर नहीं, बलकी उनकी सच्चाएई और निरभल ता की पावर थी. एक दम सही. और यहां यही संदेश मिलता है, भी बदी कायस था कोई राजा दो थे नहीं, नहीं नाँ उनके नाम का कोई सिक्का चला, ना कोई बडा मनदिर बना, उई खिल रोर राइग दरबारी थे, तो फिर सेक्रो साल बाद आज हम उनकी इग कता पड़ के से रहे हैं। पर एक बात और सुचने वाली है. बताईए. बोदी कायस था कुई राजा दो ते नहीं, नहीं नाम का कुई सिखक चला, ना कुई बडा मंदिर बना, वो एक सिंपल लो रांक दरबारी थे. तो फिर सेक्रों साल बाद, आज हम उनकी ये कथा पड़ के से रहे हैं? ये भी श्रोथ में काफी दितेल में बताया गया है. और यही आंट्री होती है हमारे लिट्रिच्यो, यानी साहिट्यों की. खुई भी समाज आसी एकस्ट्रोडनरी इवेंच को हवा में नहीं चोड देता. ये गटना महान कवी विद्यापती के दोर से पहले की ती पर जब विद्यापती को इसका पता चला तो वो इस सादारन्ट से दरबारी की कहानी से बहुत दीप लेवल पर इन्फ्लूएज़ विद्यापती जैसे महान विद्वान का दियान इक मामुली दरबारी पर जाना ये अपने आप में बहुत बडी स्टेटमेंट है. बिलकुल. और उनहोंने सुना नहीं विद्द्यापती ने इस कता को अपने फेमल संसक्रित गरन्त पुरुशा परीक्षा में जगाती. पूरुशा परीक्षा, नाम काफी न्ट्रीण्गें लगराए, इसका कोंटेक्स्ट क्या है इसका लिट्रली मतलब है मनुश्ष्य की परीक्षा या तेस्ट तो फाम आन इस गरन्त में विद्ध्यापती ने अलग �alak-tara ke logon ke human qualities ko analise किया है अच्छा इस्टाब्टी इस्टाब्टी ना जाए बादे ना जाए बादे ना जाए बादे ना जाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे नाजाए बादे � ये भी तो जिक्र है कि विद्यापती ने एक मैठली पद्बी लिखा ता इस अंसरन्द पर जिसका ताइटल हमार इस आलेख का शीर्षक भी है रहा बड़ा सुक सार पाओ तुवा तीरे और इस मैठली कविता की मिट्हास ने इस कहानी को प्रक्तिकली आमर कर दिया इस लैंका एकशक मीनिंग क्या निकलता है? इसका अर्थ है, तुमहारे तटपर मैंने महां सुक और जीवन का सार पाया. विद्यापती ने बोदि कायस था के उस अख्री मोमिन्त को, इक्तम परफेक्टी काप्चटर लिया ता इंशब्टो में. की जीवन का अस्ली सार किसी राजदरबार में नहीं बलकी उस नदी के किनारे मोखष में मिला. एक दम सही. इक सिंपल अन्सान की अनस्टी ने एक महागवी की कलम को एक नहीं दिशा देदी. अदिसका इंपैक्त इतना स्वागली सुस्टाइती में इंबेटेड है, की आज तक मिखला में वहवरा यूज होता है. बोदी कायस्ताजे का गंगा लापकर्व. राप, जिसका बेसिक मीनिए वहा, की बोदी कायस्ताजे की तरही, किसी को अखरी विधाई मिले. यह उनके समाज में एक आदर्ष म्रित्तिओ का स्थन्टर बन गया. यह साथ दिखाता है, किसी का एक दं स्पोटलेश चरित्र, कैसे पुरी सुसाइती के क्योंच्यास्नस का हिस्सा बन जाता है. वैसे, स्रोथ के लास चित्र का अगर हम रेफरेंस लें, तो वहां उं सरे सींज के तीक सेंटर में एक बड़ासा पीला सितारा, यानी स्तार बनावाए. अगर यस सारी चर्चा को हम उस चित्र से जोडें, तो शाएद वो स्तार इसी आमरता या इमम्माटलेती का प्रतीक है. बहुत सुन्दर इनालिसस है यह. सहीटे और कलाने मिलकर सچ मे एक अडनरी अन्सान को एक इम्मार्टल लेजन्ट मे बड़ड़ दिया तो इस पूरे दीब डाईव को अगर लेप अप करना हो इसके कोल टेकवे क्या निकलता है दिक है अगर हम इसे आम जिन्दिगी से जोड़ें तो सबसे बड़ा लेसन यही है, कि पूजा पाट के बाहरी दिखावे या पावर के शोवफ से, कही जआदा मैटर करती है, आपकी लाइप्टाएम की अंटेगरती. सईभात है? ये कहानी बताती है, कि ब्रष्टाचार और लालगच के भीच रहेकर भी, अगर आप आप अपने मन की पवित्रता बचाख कर रकते है, तो प्रक्रिती और आने वाला समाज दोनो आपका सम्मान करते हैं। एक दम! ये कैसा नजरी आया जो हमारी मर्टीरेल सक्सेस की रेच से बहुत उपर की चीजा हैं। अग, विद्यापती का वो पद आज भी इसी आमर सत्ते की गवाही दिता है. वो आप्स्ट्ट्रक जोमेट्रिक आख जूट सित्रो में ती, वो सिर्फ देकूरेशन नहीं है, वो सच में अनसान को ये सोचने पर मजबूर करती है, की सब हमारी बाहरी पैचान, अवरा ना च्टेट अस चीन जाएगा, तो हमारी आत्मा का असल अकार क्या बचेगा? बिलकुल, इंटेगरती अर त्याग का ये प्रिष्पल सिफ उस दोर के लें नहीं बलकी हर जनरेशन के लिए उतना ही रेलगेंट है. तो आजके इस चर्चा के अंथ में बस एक ठाट है, जो श्रोताएं के लिए चोडना चाँँगा. आजके इस चर्चा के अंथ में बस एक ठाट है, जो श्रोताएं के लिए चोडना चाँँगा. आजके जर्चा अरुट. अगर पूरी सच्चाई और पवित्रता से जीआ गया एक अकेला जीवन बिना किसी शोर या प्यार के सद्यो तक असी लेजिन्स को जनन दे सकता है महान कवियों से असी रषनाय लिखवा सकता है और नदियों के कोर्स तक बडल सकता है तो यह ज़ें की आजके इस मड़न दोर में, ज़हां इतना शोर्गुल है, इतने दिस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट