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लालमैन_का_देवत्व_या_समाज_का_खौफ.m4a
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- 0:00–0:05तो देबेट मे आप का स्वागत है, आम जरा एक एक विरोदा भास की कलपना की जिए,
- 0:05–0:13एक इन्सान जो एक हुंकार बागिन को स्व्फ इसलिये जीवन दान दे देता है, क्योंकी, क्योंकी वे एक मादा है,
- 0:13–0:20लेकिन, लेकिन वही अन्सान मरने के बाद अपने ही बच्च्पन के जिगरी दोस्त को बे रह्मी से मार दालता है.
- 0:21–0:28बिलकुल, और हम बात करे है गजेंद्र ताकुर दवारा संकलित उस मेतली लोग कता के लाल मैन की.
- 0:28–0:34सही कहा अपने, नोहत्ता गाँके दो चमार मित्रों लाल मैं और मनसराम की ये कहनी
- 0:34–0:40एक एक अँसा चरित्र हमारे सामने कहडा करती है, जो ये सवाल उठाने पर मजबोर कर देता है,
- 0:40–0:42की देवता अखिर बनते कैसे है?
- 0:42–1:12अगर बवागता बागता था बागता था था बागता था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था थ
- 1:12–1:15भी महान आदर्ष्का परिणाम कतः नहीं था
- 1:15–1:17बलकी ये एक आतंकित समाज दवारा
- 1:17–1:20अपने सामोहिक अप्राद बोद
- 1:20–1:23और प्रानो के भहें से बचने के लिए खोजा गया
- 1:23–1:25एक मनोवेग्यानिक तन्त्र है
- 1:25–1:28तो जल्ये सीधे बागिन वाले प्रसंख पर आते हैं
- 1:28–1:35दिकिये जब नहाथटा के जंगल में बागिन ने हमला किया तो लाल मैं का अपनी पुरी शकती से प्रहार ना करना
- 1:35–1:37जो के एक बहुत अजीप फैसला था
- 1:37–1:40अजीप लक सकता है लेकिन वो कोई काएर ता या बूल नहीं ती
- 1:40–1:43वो उनकी चारित्रिक दड़ेता ती
- 1:43–1:53मेरे मतलबे मर्ट्यों के मों में कھڑे होकर भी उनो अपने सिदान्त को नहीं चोडा कि वे नारी जाती पर चाहे वो जंगली पशु ही किवना हो पुन्बल प्रियोग नहींगे.
- 1:53–1:58लेकिन लेकिन क्या हम वास्तव में लाल में के उस फैसले को नेटिक महन्दा कै सकते हैं?
- 1:58–2:02मेरा मतलबे ज़र नहाथ ता के उस गने निरजन जंगल की कलपना की जे
- 2:02–2:07आपके सामने एक हिंसक बूकी बागिन कहडी है
- 2:07–2:12उसका एक मातर उदेश आपको या आपके पशु को अपना निवाला बनाना है
- 2:12–2:19उसक श़ में एक खुंखार परभकषी और एक मानवी क्रिट्स्त्री के भीज का ये क्रिट्रिम भेद प्यद करना,
- 2:19–2:22क्या ये एक अव्यावारेक और आत्मगाती निरने नहीं ता?
- 2:22–2:29अब व्यवारिक शाएद लेकिन नेटिक्ता अकसर अप्योगिता वाद के विरुदख़ग़ी होती है
- 2:29–2:30कैसे?
- 2:30–2:33अगर हम के वल लाब हो रानी देखकर अपने सिद्धान्त तैग करेंगे
- 2:33–2:36तो फिर सिद्धान्तो का अरती क्या रहे जाएगा
- 2:36–2:39लाल मैं का वो क्रित्त एक एक एक असे स्पाही की तरा ता,
- 2:39–2:43जो जानता है के अपनी पोस्पा दटे रहने से उसकी जान जासकती है.
- 2:43–2:47मैं, मैं आप की यस स्पाही वाली उप्मा से सहमत नहीं हूं.
- 2:47–2:48क्यो नहीं?
- 2:48–2:51कियों कि सिपावी अपनी पोस्ट पर इसलीए ड़ा रहता है
- 2:51–2:53ताकि वो दूसरों की जान बचा सके.
- 2:53–2:58लाल मैं के इस तथा कठित इस ब्रामित आदर्ष्वादने किस की जान बचाई?
- 2:58–2:59किसी की नहीं?
- 2:59–3:00देखे.
- 3:00–3:06इस नेटिक संकोच ने नकेवल उनके खुटके प्रान लिए बलकी बलकी उनो ने उस पशुदन को
- 3:06–3:11और अपने सबसे करीभी मित्र मन्सराम को भी उसी बहयाना कच्तरे में दھकेल दिया.
- 3:11–3:15ये ये तर्क के उनोंने मनसराम को खत्रे में डाला
- 3:15–3:18मुझे पुरी तर से उचित नहीं लकता
- 3:18–3:21लाल मैं स्वयम उस बागें से बविड़गाय ते
- 3:21–3:23उनोंने अपने मित्र को डाल नहीं बनाया था
- 3:23–3:24वे खुद डाल बने
- 3:24–3:27लेकिन परिनाम तो विनाशकारी ता ना
- 3:27–3:33आप परना विनाशकारी ता, लेकिन हम किसी क्रिट्ते की महांता को केवल उसके परनाम से नहीं तोल सकते.
- 3:33–3:35उसके पीचे की मन्शा क्या थी?
- 3:35–3:42मन्शा थी एक आफी मर्यादा का पालन करना, जोने एक सादारन मनुश्या से बहुत उपर उप़ाती है.
- 3:42–3:43आच्छा.
- 3:43–3:44और इसके बाद क्या होता है?
- 3:44–3:46मरना सन च्थिती मैं,
- 3:46–3:48अपने खून से लत्पत लाल मैं,
- 3:48–3:49कोई बदला नहीं मागते.
- 3:49–3:52वे मन्सराम से एक बहुती बून्यादी,
- 3:52–3:54बहुती मानविय अनुरोद करते हैं,
- 3:54–3:56की उनके मरने के बाद,
- 3:56–3:59उनका अंतिम संसकार विदिवत की आजाई
- 3:59–4:00और?
- 4:00–4:02और यही से कहानी का
- 4:02–4:04अस्ली मनो विग्यानिक पहलो शुरू होता है
- 4:04–4:06आप खेते हैं के वें क सादारन अनुरोद था
- 4:06–4:07बलकोल था
- 4:07–4:09लेकिन क्या अपने सोचा है
- 4:09–4:12के मनसाराम ने उस अनुरोद को क्यो नहीं माना
- 4:12–4:14उसने गाओ जाएकर सच क्यो चुपाया?
- 4:14–4:16क्या वो जन्मजा दुष्त था?
- 4:16–4:20दुष्त नहीं, लेकिन वो लाल मैं का बच्पन का दुस्त था.
- 4:20–4:23तोनो ने साथ में बहेंस चराए ती.
- 4:23–4:25मेरा विष्लेशन यहेग,
- 4:25–4:29कि जब कोई अपने बच्पन के दुस्त को
- 4:29–4:33इक खुंकार जान्वर दूरा चिर्ते पार्टे देकता है,
- 4:33–4:36तो उसका मस्तिष्क सुन्न पर जाता है.
- 4:36–4:38तुब आप याप याप याप.
- 4:38–4:39आप.
- 4:39–4:42इसे मनोविग्यान में ज़वड हो जाना कहते हैं.
- 4:42–4:46वो उस हिंसक गतना के सद्मे से बाहरी नहीं आप आया होगा.
- 4:46–4:51अट्यतिख भ्यर की स्तिती में वो समजी नी पाया क्यो से क्या करना चाईये?
- 4:51–4:55मैं, मैं यस सद्मेवाले तर्क को एक सीमा तक समथ सकता हूँ.
- 4:55–4:58गठना के तुरन्त बाज ज़वबत हो जाना स्वबाविक है.
- 4:58–5:00लेकिन क्या यह सुन्नपन अदले दिन भी जारी दा?
- 5:00–5:04गाँ लोटकर सच ना बोलना ये सर्व सद्मा था?
- 5:04–5:06ये त्रामा का गेरा असर हो सकता है
- 5:06–5:10या फिर ये अपनी जिम्मदारी से बागने की कायरता और स्वार्फ था
- 5:10–5:15दिखिये मित्रता एक अलिकित सामाजेक और नेपिक अनुबंद होती है
- 5:15–5:17विरोदा बास की गेराई को देखेए
- 5:17–5:19विरोदा बास क्या सा
- 5:19–5:22लाल मैन एक बागिन के प्रती असीम दया दिखाते है
- 5:22–5:24इक अच्छम्या बूल हूँए
- 5:24–5:26या उस अब वार्थवाश यासा किया
- 5:26–5:28लिकिन फिर उस महान लाल मैन की आत्माने क्या
- 5:28–5:34उपने आप बच्पन के दोस्ट की जान लिली जराए इस विरोदा भास की गेराई को देखिए.
- 5:34–5:36विरोदा भास क्या सा?
- 5:36–5:40लाल मैन एक बागिन के प्रती आसीम दया दिए दिखाते है.
- 5:40–5:45एक आफ्टा जान्वर जो बिना किसी हिचके चाहत के उने पाड कार अद.
- 5:45–5:49जो बिना किसी हिचकी चाहत के उने पार खार रहा था.
- 5:49–5:50लेकिन वही लाल मैं,
- 5:50–5:55अपने मित्र को एक अनसान को बिना किसी शमा के मार डालते है.
- 5:55–6:00ये शाश्वत नयाए कम और एक अदिम प्रतिषोद अदिक लकता है.
- 6:00–6:03ये तुल्ना सुन्ने में आकरषक लकती है,
- 6:03–6:08लेकिन हमे बागिन और मन्साराम के भीच के बुन्यादी अंपर को समजना होगा
- 6:08–6:12बागिन अपने प्रक्रतिक सबहाव के अदीन काम कर रही थी
- 6:12–6:15उसका कोई नेटिक दाईत्वा नहीं ता
- 6:15–6:16आव उ जानवर है
- 6:16–6:17बिलकुल
- 6:17–6:19लेकिन मन्साराम एक मनुष्षि ता
- 6:19–6:49उग़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़�
- 6:49–6:51तूटे हुए विश्वास की स्वाबाविक प्रतिक्रीया थी
- 6:52–6:55ये ब्रम्मान्डिय सन्तुलन को स्थापित करने का तरीका ता
- 6:55–6:59प्राक्रतिक न्याय और प्रतिषोद के भीच की रेक्षा बहुत बारी कोती है
- 6:59–7:07खेर, हम इस गटना के तीस्रे और सबसे महतुपून हिसे पर आते हैं, लाल में का बखक्ता बन्ना.
- 7:07–7:10आप, गाँवालों का समूहिक आच्रन.
- 7:10–7:17बिलकुल, मनसाराम की बयानाक म्रत्यों के बाद, पूरा गाँ बक्षा नहीं जाता. विस सभी भीतर तक प्यल जाते हैं.
- 7:17–7:22इसके बाद जो समोहिक दाज संसकार होता है, उसे आप कैसे देखते है?
- 7:22–7:28मैं, मैं इसे एक समाज के रूप में समोहिक पष्टाप की प्रक्रिया के तोर पर देखता हो.
- 7:28–7:33जब गाँवालों को इस पूरी तरास्ती का पता चला, तो वे सभी एक साथ है.
- 7:33–7:37उनो अने अंतता लाल्में का विदिवत और सम्मान पुरन दहा संसकार किया.
- 7:38–7:41इसके बाद ही लाल्में की आत्मा को शान्ती मिली.
- 7:41–7:46वै एक बगता के रूप में आमर होगए जो लोगों की मनोकामनाए पुरन करते हैं.
- 7:46–7:51ये सिद करता है कि लाल मैं मूल रूप से एक परुपकारी और क्रपालु शकती है.
- 7:51–7:55माझग की जगा, लेकिन मैं इस व्याक्या को पुरी तरहे से नकारती हूं.
- 7:55–7:56क्यो?
- 7:56–8:00अगर हम इसे समाज शास्च्टर के नजर्ये से देखें, तो ये वैसा ही है,
- 8:00–8:02ज़ेसे...
- 8:02–8:07ज़ेसे कोई गाँ किसी क्रूर बाहुबली या माफ्या को अपना सन्रक्षक मान लेता है
- 8:07–8:11आप आप लाल मैं बाबा के तुलना एक माफ्या से कर रही हैं
- 8:11–8:13ये एक बहुती अती शयोगती पून तरक है
- 8:13–8:15मेरे बात को पूरा होने दीजे
- 8:15–8:19लोग किसी बाहुबली की पुजा इसलिये नहीं करते, कि वो महान है.
- 8:19–8:24वे उसे सम्मान इसलिये देते हैं, ताकि वो उनके ही गर नजला दे.
- 8:24–8:28जरा नोहता गाँँके उस महाल की कलपना कीजे.
- 8:28–8:32सरोट सामगरी सपष्ट कहती है कि गाँँके लोग स्थब्द दब्दे.
- 8:32–8:41जंगल मे एक क्रूर बागेन है, और अब गाँँके भीतर एक उसे भी क्रूर क्रोदित आत्मा गूम रही है, ये शुद रद्दी कंपा देने वाला बहै था.
- 8:41–8:47आप खेरही हैं के उनके मन में लाल मैं के पती कोई समान नही था, केवल खोण था.
- 8:47–8:57शद प्रतिषट उन्हों ने महिसुस किया कि अगर एक दोस दवारा केवल अंतिम संसकार नह करने पर यात्मा जान ले सकती है, तो पुरे गाउंका क्या अश्रो होगा.
- 8:58–9:02लेल मैं का बगता बन्ना उसी खोव का संस्तागत रूप है.
- 9:02–9:08समाज ने एक खटरनाक शक्ती को शान्त रखने किलिए उसे देवता का चोला पैना दिया
- 9:08–9:16ये समाज का अपने आप को याद दिलाने का एक तरीका है कि कि म्रिता की इच्छा की उपेख्षा के गंभीर परडाम हो सकते है
- 9:16–9:22देखे, मैं बानता हों कि बहाई अकसर किसी नहीं माननेता के शुर्वाती चरनो में इक उप्रेरक की भूमिका निबाता है
- 9:22–9:25शुर्वात में गाँवाले दरे हूँए हो सकते हैं
- 9:25–9:26भिलकुल दरे हूए थ है
- 9:26–9:32लेकिन लेकिन आप जो बहुबली वाला उदारन देरे ही है, वो यहां विफल हो जाता है.
- 9:32–9:34खौफ समय के साथ फीका पडजाता है.
- 9:34–9:39आप किसी को देरा कर एक आ दो पीडी तक अपनी पुजा करवासकते है, सद्दियों तक नहीं.
- 9:39–9:40अच्छा.
- 9:40–9:46आप लाल में बाबा आज भी लोगों की मनो कामनाय पूरी करते हैं वे अपना आशिर्वाद प्रदान करते हैं
- 9:46–9:52यवी ये पूरी तरह से बहें पर आदहरित होता तो क्या वो एक वर्दान देने वाली शकती के रूप में पुजे जाते
- 9:52–9:54खौफ आप को आशिर्वाद नहीं देता
- 9:54–9:56उनका ये क्रिपालु सुरूब दिखाता है
- 9:56–9:59कि समाज ने उनके बलडान को प्यचाना है
- 10:00–10:03ये एक बहुत इ आदच्वादी नजर्या है
- 10:03–10:05लिकिन मानवितिहास गवा है
- 10:05–10:07के हमने हमेशा प्राक्रते काब्दाओ
- 10:07–10:10यह विनाशकारी शक्तियों को देव्ता कर रुब दिया है,
- 10:10–10:12ताकि हम उनसे बज सकें.
- 10:12–10:14हम जिसे आशिर्वाद कहते है,
- 10:14–10:19वो अकसर एक शक्तिशाली अस्तित्वो को खृष रक्ने का हमारा तरीका मात्र होता है.
- 10:19–10:22गाता का यतार्त कही अदिक से आजे.
- 10:22–10:32ये दिखाता है के कैसे मान्विय स्वार्त, म्रुत्तियो कब है, और एक ग्रुद्द आस्त्मा का प्रतिषोद मिलकर एक नहीं दार्मिक मान्नेता को जन्म दे सकते है।
- 10:32–10:37ये कैसा बिन्दू है जहां हमारे द्रिष्टिकों सब श्प्रुष्ट रूप से तक्राते है।
- 10:37–10:41लेकिन ये तक्राव ही इस गाता की असल गेराई को सामने लाता है.
- 10:42–10:45हम दोनो कमसे कम इस बात पर पुरी तरह सहमत हो सकते है,
- 10:45–10:49के लाल मैन और मनसराम की ये कता कोई सादारन लोग कता नहीं है.
- 10:50–10:52बिलकुल, ये मानव सवबहाव,
- 10:53–10:55हमारे करमों के अप्रत्याषित परनाम,
- 11:07–11:16अजकी इस गेहन चर्चा के बाद हम अपने श्रोताउ के समक्ष ये विचार चोडते हैं कि वे स्वयम इस लोक कता के निशकरष को तब तभी करें.
- 11:16–11:18या प्रद बीद़ बीद़ अबी भी ख़े हैं।
- 11:18–11:20और जितनी बार आप इस पर विचार करेंगे कुछ नया ही कुछ नया ही कुछगेंगे
- 11:20–11:22तो आज कि लिए बस इतना ही
- 11:22–11:24या विचार करते रही है
- 11:24–11:26या विचार करते रही है
- 11:26–11:28या विचार करते रही है
- 11:28–11:31अद्र उत्नाही जटिल है जितना की नहाथ ता का वो कना जंगल
- 11:31–11:34इस लोग कता के भीटर अभी भी कई परते हैं
- 11:34–11:37और जितनी बार आप इस पर विचार करेंगे
- 11:37–11:38कुछ नया ही कोजेंगे
- 11:38–11:40तो आज कि लिए बस इतना ही
- 11:40–11:42सुन्ते रही ए और विचार करते रही है
Plain text
तो देबेट मे आप का स्वागत है, आम जरा एक एक विरोदा भास की कलपना की जिए, एक इन्सान जो एक हुंकार बागिन को स्व्फ इसलिये जीवन दान दे देता है, क्योंकी, क्योंकी वे एक मादा है, लेकिन, लेकिन वही अन्सान मरने के बाद अपने ही बच्च्पन के जिगरी दोस्त को बे रह्मी से मार दालता है. बिलकुल, और हम बात करे है गजेंद्र ताकुर दवारा संकलित उस मेतली लोग कता के लाल मैन की. सही कहा अपने, नोहत्ता गाँके दो चमार मित्रों लाल मैं और मनसराम की ये कहनी एक एक अँसा चरित्र हमारे सामने कहडा करती है, जो ये सवाल उठाने पर मजबोर कर देता है, की देवता अखिर बनते कैसे है? अगर बवागता बागता था बागता था था बागता था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था थ भी महान आदर्ष्का परिणाम कतः नहीं था बलकी ये एक आतंकित समाज दवारा अपने सामोहिक अप्राद बोद और प्रानो के भहें से बचने के लिए खोजा गया एक मनोवेग्यानिक तन्त्र है तो जल्ये सीधे बागिन वाले प्रसंख पर आते हैं दिकिये जब नहाथटा के जंगल में बागिन ने हमला किया तो लाल मैं का अपनी पुरी शकती से प्रहार ना करना जो के एक बहुत अजीप फैसला था अजीप लक सकता है लेकिन वो कोई काएर ता या बूल नहीं ती वो उनकी चारित्रिक दड़ेता ती मेरे मतलबे मर्ट्यों के मों में कھڑे होकर भी उनो अपने सिदान्त को नहीं चोडा कि वे नारी जाती पर चाहे वो जंगली पशु ही किवना हो पुन्बल प्रियोग नहींगे. लेकिन लेकिन क्या हम वास्तव में लाल में के उस फैसले को नेटिक महन्दा कै सकते हैं? मेरा मतलबे ज़र नहाथ ता के उस गने निरजन जंगल की कलपना की जे आपके सामने एक हिंसक बूकी बागिन कहडी है उसका एक मातर उदेश आपको या आपके पशु को अपना निवाला बनाना है उसक श़ में एक खुंखार परभकषी और एक मानवी क्रिट्स्त्री के भीज का ये क्रिट्रिम भेद प्यद करना, क्या ये एक अव्यावारेक और आत्मगाती निरने नहीं ता? अब व्यवारिक शाएद लेकिन नेटिक्ता अकसर अप्योगिता वाद के विरुदख़ग़ी होती है कैसे? अगर हम के वल लाब हो रानी देखकर अपने सिद्धान्त तैग करेंगे तो फिर सिद्धान्तो का अरती क्या रहे जाएगा लाल मैं का वो क्रित्त एक एक एक असे स्पाही की तरा ता, जो जानता है के अपनी पोस्पा दटे रहने से उसकी जान जासकती है. मैं, मैं आप की यस स्पाही वाली उप्मा से सहमत नहीं हूं. क्यो नहीं? कियों कि सिपावी अपनी पोस्ट पर इसलीए ड़ा रहता है ताकि वो दूसरों की जान बचा सके. लाल मैं के इस तथा कठित इस ब्रामित आदर्ष्वादने किस की जान बचाई? किसी की नहीं? देखे. इस नेटिक संकोच ने नकेवल उनके खुटके प्रान लिए बलकी बलकी उनो ने उस पशुदन को और अपने सबसे करीभी मित्र मन्सराम को भी उसी बहयाना कच्तरे में दھकेल दिया. ये ये तर्क के उनोंने मनसराम को खत्रे में डाला मुझे पुरी तर से उचित नहीं लकता लाल मैं स्वयम उस बागें से बविड़गाय ते उनोंने अपने मित्र को डाल नहीं बनाया था वे खुद डाल बने लेकिन परिनाम तो विनाशकारी ता ना आप परना विनाशकारी ता, लेकिन हम किसी क्रिट्ते की महांता को केवल उसके परनाम से नहीं तोल सकते. उसके पीचे की मन्शा क्या थी? मन्शा थी एक आफी मर्यादा का पालन करना, जोने एक सादारन मनुश्या से बहुत उपर उप़ाती है. आच्छा. और इसके बाद क्या होता है? मरना सन च्थिती मैं, अपने खून से लत्पत लाल मैं, कोई बदला नहीं मागते. वे मन्सराम से एक बहुती बून्यादी, बहुती मानविय अनुरोद करते हैं, की उनके मरने के बाद, उनका अंतिम संसकार विदिवत की आजाई और? और यही से कहानी का अस्ली मनो विग्यानिक पहलो शुरू होता है आप खेते हैं के वें क सादारन अनुरोद था बलकोल था लेकिन क्या अपने सोचा है के मनसाराम ने उस अनुरोद को क्यो नहीं माना उसने गाओ जाएकर सच क्यो चुपाया? क्या वो जन्मजा दुष्त था? दुष्त नहीं, लेकिन वो लाल मैं का बच्पन का दुस्त था. तोनो ने साथ में बहेंस चराए ती. मेरा विष्लेशन यहेग, कि जब कोई अपने बच्पन के दुस्त को इक खुंकार जान्वर दूरा चिर्ते पार्टे देकता है, तो उसका मस्तिष्क सुन्न पर जाता है. तुब आप याप याप याप. आप. इसे मनोविग्यान में ज़वड हो जाना कहते हैं. वो उस हिंसक गतना के सद्मे से बाहरी नहीं आप आया होगा. अट्यतिख भ्यर की स्तिती में वो समजी नी पाया क्यो से क्या करना चाईये? मैं, मैं यस सद्मेवाले तर्क को एक सीमा तक समथ सकता हूँ. गठना के तुरन्त बाज ज़वबत हो जाना स्वबाविक है. लेकिन क्या यह सुन्नपन अदले दिन भी जारी दा? गाँ लोटकर सच ना बोलना ये सर्व सद्मा था? ये त्रामा का गेरा असर हो सकता है या फिर ये अपनी जिम्मदारी से बागने की कायरता और स्वार्फ था दिखिये मित्रता एक अलिकित सामाजेक और नेपिक अनुबंद होती है विरोदा बास की गेराई को देखेए विरोदा बास क्या सा लाल मैन एक बागिन के प्रती असीम दया दिखाते है इक अच्छम्या बूल हूँए या उस अब वार्थवाश यासा किया लिकिन फिर उस महान लाल मैन की आत्माने क्या उपने आप बच्पन के दोस्ट की जान लिली जराए इस विरोदा भास की गेराई को देखिए. विरोदा भास क्या सा? लाल मैन एक बागिन के प्रती आसीम दया दिए दिखाते है. एक आफ्टा जान्वर जो बिना किसी हिचके चाहत के उने पाड कार अद. जो बिना किसी हिचकी चाहत के उने पार खार रहा था. लेकिन वही लाल मैं, अपने मित्र को एक अनसान को बिना किसी शमा के मार डालते है. ये शाश्वत नयाए कम और एक अदिम प्रतिषोद अदिक लकता है. ये तुल्ना सुन्ने में आकरषक लकती है, लेकिन हमे बागिन और मन्साराम के भीच के बुन्यादी अंपर को समजना होगा बागिन अपने प्रक्रतिक सबहाव के अदीन काम कर रही थी उसका कोई नेटिक दाईत्वा नहीं ता आव उ जानवर है बिलकुल लेकिन मन्साराम एक मनुष्षि ता उग़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़� तूटे हुए विश्वास की स्वाबाविक प्रतिक्रीया थी ये ब्रम्मान्डिय सन्तुलन को स्थापित करने का तरीका ता प्राक्रतिक न्याय और प्रतिषोद के भीच की रेक्षा बहुत बारी कोती है खेर, हम इस गटना के तीस्रे और सबसे महतुपून हिसे पर आते हैं, लाल में का बखक्ता बन्ना. आप, गाँवालों का समूहिक आच्रन. बिलकुल, मनसाराम की बयानाक म्रत्यों के बाद, पूरा गाँ बक्षा नहीं जाता. विस सभी भीतर तक प्यल जाते हैं. इसके बाद जो समोहिक दाज संसकार होता है, उसे आप कैसे देखते है? मैं, मैं इसे एक समाज के रूप में समोहिक पष्टाप की प्रक्रिया के तोर पर देखता हो. जब गाँवालों को इस पूरी तरास्ती का पता चला, तो वे सभी एक साथ है. उनो अने अंतता लाल्में का विदिवत और सम्मान पुरन दहा संसकार किया. इसके बाद ही लाल्में की आत्मा को शान्ती मिली. वै एक बगता के रूप में आमर होगए जो लोगों की मनोकामनाए पुरन करते हैं. ये सिद करता है कि लाल मैं मूल रूप से एक परुपकारी और क्रपालु शकती है. माझग की जगा, लेकिन मैं इस व्याक्या को पुरी तरहे से नकारती हूं. क्यो? अगर हम इसे समाज शास्च्टर के नजर्ये से देखें, तो ये वैसा ही है, ज़ेसे... ज़ेसे कोई गाँ किसी क्रूर बाहुबली या माफ्या को अपना सन्रक्षक मान लेता है आप आप लाल मैं बाबा के तुलना एक माफ्या से कर रही हैं ये एक बहुती अती शयोगती पून तरक है मेरे बात को पूरा होने दीजे लोग किसी बाहुबली की पुजा इसलिये नहीं करते, कि वो महान है. वे उसे सम्मान इसलिये देते हैं, ताकि वो उनके ही गर नजला दे. जरा नोहता गाँँके उस महाल की कलपना कीजे. सरोट सामगरी सपष्ट कहती है कि गाँँके लोग स्थब्द दब्दे. जंगल मे एक क्रूर बागेन है, और अब गाँँके भीतर एक उसे भी क्रूर क्रोदित आत्मा गूम रही है, ये शुद रद्दी कंपा देने वाला बहै था. आप खेरही हैं के उनके मन में लाल मैं के पती कोई समान नही था, केवल खोण था. शद प्रतिषट उन्हों ने महिसुस किया कि अगर एक दोस दवारा केवल अंतिम संसकार नह करने पर यात्मा जान ले सकती है, तो पुरे गाउंका क्या अश्रो होगा. लेल मैं का बगता बन्ना उसी खोव का संस्तागत रूप है. समाज ने एक खटरनाक शक्ती को शान्त रखने किलिए उसे देवता का चोला पैना दिया ये समाज का अपने आप को याद दिलाने का एक तरीका है कि कि म्रिता की इच्छा की उपेख्षा के गंभीर परडाम हो सकते है देखे, मैं बानता हों कि बहाई अकसर किसी नहीं माननेता के शुर्वाती चरनो में इक उप्रेरक की भूमिका निबाता है शुर्वात में गाँवाले दरे हूँए हो सकते हैं भिलकुल दरे हूए थ है लेकिन लेकिन आप जो बहुबली वाला उदारन देरे ही है, वो यहां विफल हो जाता है. खौफ समय के साथ फीका पडजाता है. आप किसी को देरा कर एक आ दो पीडी तक अपनी पुजा करवासकते है, सद्दियों तक नहीं. अच्छा. आप लाल में बाबा आज भी लोगों की मनो कामनाय पूरी करते हैं वे अपना आशिर्वाद प्रदान करते हैं यवी ये पूरी तरह से बहें पर आदहरित होता तो क्या वो एक वर्दान देने वाली शकती के रूप में पुजे जाते खौफ आप को आशिर्वाद नहीं देता उनका ये क्रिपालु सुरूब दिखाता है कि समाज ने उनके बलडान को प्यचाना है ये एक बहुत इ आदच्वादी नजर्या है लिकिन मानवितिहास गवा है के हमने हमेशा प्राक्रते काब्दाओ यह विनाशकारी शक्तियों को देव्ता कर रुब दिया है, ताकि हम उनसे बज सकें. हम जिसे आशिर्वाद कहते है, वो अकसर एक शक्तिशाली अस्तित्वो को खृष रक्ने का हमारा तरीका मात्र होता है. गाता का यतार्त कही अदिक से आजे. ये दिखाता है के कैसे मान्विय स्वार्त, म्रुत्तियो कब है, और एक ग्रुद्द आस्त्मा का प्रतिषोद मिलकर एक नहीं दार्मिक मान्नेता को जन्म दे सकते है। ये कैसा बिन्दू है जहां हमारे द्रिष्टिकों सब श्प्रुष्ट रूप से तक्राते है। लेकिन ये तक्राव ही इस गाता की असल गेराई को सामने लाता है. हम दोनो कमसे कम इस बात पर पुरी तरह सहमत हो सकते है, के लाल मैन और मनसराम की ये कता कोई सादारन लोग कता नहीं है. बिलकुल, ये मानव सवबहाव, हमारे करमों के अप्रत्याषित परनाम, अजकी इस गेहन चर्चा के बाद हम अपने श्रोताउ के समक्ष ये विचार चोडते हैं कि वे स्वयम इस लोक कता के निशकरष को तब तभी करें. या प्रद बीद़ बीद़ अबी भी ख़े हैं। और जितनी बार आप इस पर विचार करेंगे कुछ नया ही कुछ नया ही कुछगेंगे तो आज कि लिए बस इतना ही या विचार करते रही है या विचार करते रही है या विचार करते रही है अद्र उत्नाही जटिल है जितना की नहाथ ता का वो कना जंगल इस लोग कता के भीटर अभी भी कई परते हैं और जितनी बार आप इस पर विचार करेंगे कुछ नया ही कोजेंगे तो आज कि लिए बस इतना ही सुन्ते रही ए और विचार करते रही है