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लालमैन_बाबा_की_कथा.mp4
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- 0:00–0:10स्वागत है आपका आजके सक्ष विष्छलेषन में, आज हम लोगना, मितलाक शेत्र की एक बेहदी दिल्चस्प और करीब आट्ट्शो साल पुरानी लोग कता के बारे में बात करने वाले है.
- 0:10–0:12ये कोई आज़्ी वैसी आज़्ी आम कहानी नहीं है,
- 0:12–0:14बलकी ये एक आज़्ी गाथा है,
- 0:14–0:17जो सद्यों से वहांके लोगों को मंत्र मुगद करती आरही है.
- 0:17–0:21अगर में कहुए कहानी बलेदान, गेहरी दोस्ती,
- 0:21–0:22दिल तोर देने वाले दोखे,
- 0:22–0:28और एक आजे लोगक नयाएकी है, जिसकी गूँँज आज तक सूनाई देती है, तो बलकल गलत नहीं होगा.
- 0:28–0:33तो चल्टिए, बिरा किसी देरी के इस अटिहासक और रहस्सिमए ऽपर की शुवात करते हैं.
- 0:33–0:37कहानी में आगे बड़ने से पहले सरा एक पल के लीज सुचकर दिखई.
- 0:37–0:41क्या होगा अगर कोई अगर पने फर्ज और अपने पश्वों की रक्षा करते- करते
- 0:41–0:45अपनी जान तक दाउपर लगा दे? क्या अईसे में उसका सबसे करीभी
- 0:45–0:48बच्छपन का जिगरी डोस्त उसकी आखरी इच्च्चा का सम्मान करेगा.
- 0:48–0:50ये सवाल सवट सोचने के ले नहीं है,
- 0:50–0:53बलकी सच कहुतो यही वो बून्याद है,
- 0:53–0:55जिस पर हमारी आज की पूरी कहानी,
- 0:55–0:58वाफादारी और दोके के भीच जूलती है.
- 0:58–1:03तो चल्ये कहानी शिरू होती है पहले अद्याय से नहबता के दो मित्र
- 1:03–1:06कल्पना की जी ए नहवब भव की
- 1:06–1:10विशाल, गनी, जंगल और एक दम शानत ग्रामेड जीवन
- 1:10–1:14इसी गव में दो डोस तरहते दे लाल मैं और पनसाराम
- 1:14–1:19दोनो चमार जाती से दे, और बिल्कोल बच्पन के पक्के साथी दे.
- 1:19–1:23इनका हर दिन एक साथी गुजरता ता, जंगलो में अपनी भहेंसो को चराते हुए.
- 1:23–1:26और पता है, ये सरफ एक रोस का काम नहीं ता,
- 1:26–1:31बलकी ये वो वकत थ ता जिस ने तोनो के भीज एक अज़्ा मस्बूछ रिष्टा बना दिया था
- 1:31–1:34जिसे दिक्र लकता था कि ये कभी नहीं तूटेगा.
- 1:34–1:38सालो पुरानी दोस्ती वो रोज रोज का सात,
- 1:38–1:40सब कुछ बहुत ही शांती से चल राथा.
- 1:40–1:43उन दोनो के भीज गजब कब रहुसा था.
- 1:43–1:48लेकिन किसे पता था कि ये शान्ती बस कुछी पलों की महमान है.
- 1:48–1:52कुछी बस कुछी मिन्तो में एक आईसी भयानक गतना गतने वाली ती
- 1:52–1:56जो नकी विजिन्दगी को हमेशा के लिए पलड़कर रग देने वाली ती.
- 1:56–2:02और यही से शिरू होता है हमारा दूस्रा बाग, बागिन से वो खोफनाक संगर्ष.
- 2:02–2:11जंगल में एक दम सननाता था और तभी अचानक से एक जंगली बागिन ने उनके पष्वो के जुन्ट पर खात लगाकर हमला कर दिया.
- 2:11–2:14स्तिती एक्दम से बेकाबू और खफनाक होगगग.
- 2:14–2:16लेकिन लाल मैं दरा नहीं,
- 2:16–2:18वो एक कदम भी पीचे नहीं हदा.
- 2:18–2:21अपनी जान की परवाज की ए बना,
- 2:21–2:23वो तुरन्त अपने जानवरों को बचाने के लिए,
- 2:23–2:25उस खुंकार बागिन से बगवे रहा.
- 2:25–2:29अब यहाना एक बहुती हैरान कर देने वाली बाज सामने आती है
- 2:29–2:33लायल मैं पूरी ताकत से लग सकता ता उस में वो दम ता
- 2:33–2:35लेकिन उसने एसा नहीं किया
- 2:35–2:38जी हाँ इस जान लेवा लडाए के भीच भी
- 2:38–2:41लायल मैं ने जान भूचकर अपनी पूरी ताकत नहीं लगाए
- 2:41–2:46आप ज़ान्वर बहली ही हिन्सक्ती लेकिन वे एक मादा थी.
- 2:47–2:51लाल मैं के उसुलो में स्त्री जाती के प्रती इतना गेरा सम्मान ता,
- 2:51–2:54कि उसने खुद को अपनी पुरी शक्ती का अईस्तमाल करने से रोक लिया.
- 2:54–3:02अद़ाने से रोक लिया और सच कहुतो इसी नेटेक संकुच की उसे बहुत बडी कीमट चुकानी पडी अपनी जान देकर.
- 3:02–3:08एक बेहद भीषन और �theka denewali ladaai ke baad, लाल मैं वही गिर पडा और वीर गती को प्राप्थ हूँँ.
- 3:08–3:11ये स्व्व किसी जंगली जान्वर का हम्ला नहीं था.
- 3:11–3:15ये लाल मैं का एक बहुत ही सचेट नैटिग बलीदान था.
- 3:15–3:17उसने अपने आदर्शो के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी.
- 3:17–3:21और यही बात इस गटना को और भी जाडदद दर्दनाग बना देती है.
- 3:21–3:27अब आते हैं कहानी के सब से मार मिक मोड पर अनसुनी अन्तिम इच्छा.
- 3:27–3:30जमीन पर गिरे हुए अपनी आखरी सासे गिनते हुए,
- 3:30–3:37लाल मैंने अपने उसी जिगरी डोस्त पनसराम से एक बहुती चोटी लेकिन भेहद एहम गोहार लगाई.
- 3:37–3:42उस्छने कहा, मेरे मरने के बाद, बस ये सूनिष्षित करना कि मेरा दाह संसकार थीक से हो.
- 3:42–3:44बस इतनी सी बाद.
- 3:44–3:47मिरित्यो के समः सम्मान की ये चोटी सी पुकार,
- 3:47–3:51असल में पनसराम की दोस्ती और उसके चरित्र की सबसे बडी परिक्षा थी.
- 3:51–3:53अपको क्या लगता है पन्सराम ने क्या क्या होगा?
- 3:53–3:56दर की बजासे, या शायद अपने स्वार्ठ में
- 3:56–4:01उसने अपने बच्पन के डोस्त की उस अख्च्छा को पूरी तरहासे नजर अंदास कर दिया.
- 4:01–4:03वो चुप चाएप वहासे खिसव गया.
- 4:03–4:33दर की बज़ा से या शायद अपने स्वार्त में, उसने अपने बच्पन के दोस्त की उस अख्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
- 4:33–4:37या होता है जब यतने बड़े बरोसे को यस तरहे से तोड दिया जाए.
- 4:38–4:41जब मुअद के मुहाने पर मागे गय एक आक्फरी वचन को
- 4:42–4:44आज़े पैरो तले रोंद दिया जाए,
- 4:44–4:47तो आद्धियाद मिक रूप से इसके क्या परिनाम हो सकते है?
- 4:47–4:56अन्तिम संखार थीक से नहोने और अपने सबसे करीबी दोस से मिले इस गोर दोखे के कारन लाल मैं की आत्मा को मुक्ती नहीं मिल पाए.
- 4:56–5:03ये विश्वाज खात इतना जादा गेरा था कि उसकी आत्मा बेहद अश्वान्त होगए और भ्याना क्रोद से बहरुती.
- 5:03–5:10जिस दोस्त के लिये उसे अपनी जान की बाजी लगा दी उसी ने मुझ्त के बाद उसे दोगगद सम्मान तक नहीं दिया.
- 5:10–5:15और फिर वो हुआ जिसकी पन्सराम ने शायत सपने मे भी कलपना नहीं की होगी.
- 5:15–5:20बदले की आग में जलतीवी लाल में की उसक्वुद आत्माने मुद्खी सरहत को ही पार कर लिया.
- 5:20–5:25उसने पनसराम को दून निकाला और इस कभीना माप की एजाने वाले दूके किलिए
- 5:25–5:27उसे मुद्खे गाट उतार दिया.
- 5:27–5:34ये गटना इस बात का सीथा सीथा सबूत है, कि नयाय का पहीरा गुंता जरूर है, फिर चाहे वो किसी अलोकिक रूप मेही क्यो नहों.
- 5:34–5:39कहानी के अन्तिम पडाव की वर बड़ते है, लाल मैं भाभा की विरा सब.
- 5:39–5:46जब नहाथ गाँउंके लोगों को इस पूरी खफनाक सच्चाई का पता चला तो वो एक दम सन रहे गए.
- 5:46–5:50जंगल मे दोनो दोस्तों के शव पडे थे एक को जानवर ने मारा था
- 5:50–5:54और दूस्रे को एक अलोकिक न्याए ने.
- 5:54–5:57गाँवालो के लिए ये सर्फ एक ज़दका नहीं ता,
- 5:57–6:01बलकी ये बहुड बड़ी और खोफनाक चितावनी भी थी.
- 6:01–6:05आखिर कार जो जिमदारी पनसाराम ने भीच में चोड़ दी थी,
- 6:05–6:07उसे पुरे समवडायने उठाया.
- 6:07–6:14गाँवालो ने मिलकर पूरे विदिदिदान के सात उन दोनो दोस्तों का उसी जंगल में सामूहिग दहा संसकार किया.
- 6:14–6:20और इस दरह बहले ही बहुत देर से सही, लाल मैन की वो आखरी इच्छा पूरी हुई,
- 6:20–6:26तो असल में इस आट्सु साल पुरानी गाता से हमें तीन बहुत गेरी बाते सीखने को मिलती हैं.
- 6:26–6:31पहला, लाल मैं का बागिन पर पुरी ताकत से प्रहार ना करना,
- 6:31–6:34जो हमें स्त्री जीवों के प्रती सरवोच सम्मान सिखाता है.
- 6:34–6:41तुस्रा किसी की अंतिम इच्छा की पवित्रता, जिसे कभी भी किसी भी हाल में नजर अंदाज नहीं करना जाहीं.
- 6:41–6:50और तीस्रा कर्म और नयाय का वो चक्र, जो ये तैकरता है, कि दोखा देने वाला कभी भी अपने की एकी सचासे बच नहीं सकता.
- 6:50–7:02आज इतने सद्यों बाद भी लाल मैं को लोग बूले नहीं है, वो आज सर्फ एक कहानी के पात्र नहीं है, बलकी मित्ला की लोग परम्पलाओ में उने लाल मैं भाबा के रूप में पूजा जाता है.
- 7:02–7:07आज भी लोग उनके मन्दिर जाते है, मन्नते मागते है, और उनका आशीवार लेते है.
- 7:07–7:14उनका वो महान बलिदान और उनके पक्के उसुल आज भी वहां के लोगों के दिलो में दड़कते है.
- 7:14–7:19आजकिस विष्लेशन को खटम करने से पहले मैं आपके लिए एक विचार चोडगे जाना चाहता हूँ।
- 7:19–7:23क्या एक तोडगया वादा अनन्त काल तक गुजता रहता है?
- 7:23–7:26लाल मिन भाबा कि ये कहानी हमें हमें शहायात दिलाती रहेगी
- 7:26–7:29कि वफ़दारी, सम्मान और सचका जो वजन होता है ना
- 7:29–7:31वो स्व्रफ इस जनम तक सीमित नहीं रहाता
- 7:31–7:34बल कि ये समय और मोद की सीमाव को पार कर के भी
- 7:34–7:36अपना असर ज़ोर दिखाता है
- 7:36–7:39हमारे सात इस सफर में जुडने के लिए आपका बहुत बहुत द्श्यवाद
- 7:39–7:43आज़े ही सीकते रहें और कहानियों के पीछे चिपे इन गेरे अड़्फों को समचते रहें.
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स्वागत है आपका आजके सक्ष विष्छलेषन में, आज हम लोगना, मितलाक शेत्र की एक बेहदी दिल्चस्प और करीब आट्ट्शो साल पुरानी लोग कता के बारे में बात करने वाले है. ये कोई आज़्ी वैसी आज़्ी आम कहानी नहीं है, बलकी ये एक आज़्ी गाथा है, जो सद्यों से वहांके लोगों को मंत्र मुगद करती आरही है. अगर में कहुए कहानी बलेदान, गेहरी दोस्ती, दिल तोर देने वाले दोखे, और एक आजे लोगक नयाएकी है, जिसकी गूँँज आज तक सूनाई देती है, तो बलकल गलत नहीं होगा. तो चल्टिए, बिरा किसी देरी के इस अटिहासक और रहस्सिमए ऽपर की शुवात करते हैं. कहानी में आगे बड़ने से पहले सरा एक पल के लीज सुचकर दिखई. क्या होगा अगर कोई अगर पने फर्ज और अपने पश्वों की रक्षा करते- करते अपनी जान तक दाउपर लगा दे? क्या अईसे में उसका सबसे करीभी बच्छपन का जिगरी डोस्त उसकी आखरी इच्च्चा का सम्मान करेगा. ये सवाल सवट सोचने के ले नहीं है, बलकी सच कहुतो यही वो बून्याद है, जिस पर हमारी आज की पूरी कहानी, वाफादारी और दोके के भीच जूलती है. तो चल्ये कहानी शिरू होती है पहले अद्याय से नहबता के दो मित्र कल्पना की जी ए नहवब भव की विशाल, गनी, जंगल और एक दम शानत ग्रामेड जीवन इसी गव में दो डोस तरहते दे लाल मैं और पनसाराम दोनो चमार जाती से दे, और बिल्कोल बच्पन के पक्के साथी दे. इनका हर दिन एक साथी गुजरता ता, जंगलो में अपनी भहेंसो को चराते हुए. और पता है, ये सरफ एक रोस का काम नहीं ता, बलकी ये वो वकत थ ता जिस ने तोनो के भीज एक अज़्ा मस्बूछ रिष्टा बना दिया था जिसे दिक्र लकता था कि ये कभी नहीं तूटेगा. सालो पुरानी दोस्ती वो रोज रोज का सात, सब कुछ बहुत ही शांती से चल राथा. उन दोनो के भीज गजब कब रहुसा था. लेकिन किसे पता था कि ये शान्ती बस कुछी पलों की महमान है. कुछी बस कुछी मिन्तो में एक आईसी भयानक गतना गतने वाली ती जो नकी विजिन्दगी को हमेशा के लिए पलड़कर रग देने वाली ती. और यही से शिरू होता है हमारा दूस्रा बाग, बागिन से वो खोफनाक संगर्ष. जंगल में एक दम सननाता था और तभी अचानक से एक जंगली बागिन ने उनके पष्वो के जुन्ट पर खात लगाकर हमला कर दिया. स्तिती एक्दम से बेकाबू और खफनाक होगगग. लेकिन लाल मैं दरा नहीं, वो एक कदम भी पीचे नहीं हदा. अपनी जान की परवाज की ए बना, वो तुरन्त अपने जानवरों को बचाने के लिए, उस खुंकार बागिन से बगवे रहा. अब यहाना एक बहुती हैरान कर देने वाली बाज सामने आती है लायल मैं पूरी ताकत से लग सकता ता उस में वो दम ता लेकिन उसने एसा नहीं किया जी हाँ इस जान लेवा लडाए के भीच भी लायल मैं ने जान भूचकर अपनी पूरी ताकत नहीं लगाए आप ज़ान्वर बहली ही हिन्सक्ती लेकिन वे एक मादा थी. लाल मैं के उसुलो में स्त्री जाती के प्रती इतना गेरा सम्मान ता, कि उसने खुद को अपनी पुरी शक्ती का अईस्तमाल करने से रोक लिया. अद़ाने से रोक लिया और सच कहुतो इसी नेटेक संकुच की उसे बहुत बडी कीमट चुकानी पडी अपनी जान देकर. एक बेहद भीषन और �theka denewali ladaai ke baad, लाल मैं वही गिर पडा और वीर गती को प्राप्थ हूँँ. ये स्व्व किसी जंगली जान्वर का हम्ला नहीं था. ये लाल मैं का एक बहुत ही सचेट नैटिग बलीदान था. उसने अपने आदर्शो के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. और यही बात इस गटना को और भी जाडदद दर्दनाग बना देती है. अब आते हैं कहानी के सब से मार मिक मोड पर अनसुनी अन्तिम इच्छा. जमीन पर गिरे हुए अपनी आखरी सासे गिनते हुए, लाल मैंने अपने उसी जिगरी डोस्त पनसराम से एक बहुती चोटी लेकिन भेहद एहम गोहार लगाई. उस्छने कहा, मेरे मरने के बाद, बस ये सूनिष्षित करना कि मेरा दाह संसकार थीक से हो. बस इतनी सी बाद. मिरित्यो के समः सम्मान की ये चोटी सी पुकार, असल में पनसराम की दोस्ती और उसके चरित्र की सबसे बडी परिक्षा थी. अपको क्या लगता है पन्सराम ने क्या क्या होगा? दर की बजासे, या शायद अपने स्वार्ठ में उसने अपने बच्पन के डोस्त की उस अख्च्छा को पूरी तरहासे नजर अंदास कर दिया. वो चुप चाएप वहासे खिसव गया. दर की बज़ा से या शायद अपने स्वार्त में, उसने अपने बच्पन के दोस्त की उस अख्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्� या होता है जब यतने बड़े बरोसे को यस तरहे से तोड दिया जाए. जब मुअद के मुहाने पर मागे गय एक आक्फरी वचन को आज़े पैरो तले रोंद दिया जाए, तो आद्धियाद मिक रूप से इसके क्या परिनाम हो सकते है? अन्तिम संखार थीक से नहोने और अपने सबसे करीबी दोस से मिले इस गोर दोखे के कारन लाल मैं की आत्मा को मुक्ती नहीं मिल पाए. ये विश्वाज खात इतना जादा गेरा था कि उसकी आत्मा बेहद अश्वान्त होगए और भ्याना क्रोद से बहरुती. जिस दोस्त के लिये उसे अपनी जान की बाजी लगा दी उसी ने मुझ्त के बाद उसे दोगगद सम्मान तक नहीं दिया. और फिर वो हुआ जिसकी पन्सराम ने शायत सपने मे भी कलपना नहीं की होगी. बदले की आग में जलतीवी लाल में की उसक्वुद आत्माने मुद्खी सरहत को ही पार कर लिया. उसने पनसराम को दून निकाला और इस कभीना माप की एजाने वाले दूके किलिए उसे मुद्खे गाट उतार दिया. ये गटना इस बात का सीथा सीथा सबूत है, कि नयाय का पहीरा गुंता जरूर है, फिर चाहे वो किसी अलोकिक रूप मेही क्यो नहों. कहानी के अन्तिम पडाव की वर बड़ते है, लाल मैं भाभा की विरा सब. जब नहाथ गाँउंके लोगों को इस पूरी खफनाक सच्चाई का पता चला तो वो एक दम सन रहे गए. जंगल मे दोनो दोस्तों के शव पडे थे एक को जानवर ने मारा था और दूस्रे को एक अलोकिक न्याए ने. गाँवालो के लिए ये सर्फ एक ज़दका नहीं ता, बलकी ये बहुड बड़ी और खोफनाक चितावनी भी थी. आखिर कार जो जिमदारी पनसाराम ने भीच में चोड़ दी थी, उसे पुरे समवडायने उठाया. गाँवालो ने मिलकर पूरे विदिदिदान के सात उन दोनो दोस्तों का उसी जंगल में सामूहिग दहा संसकार किया. और इस दरह बहले ही बहुत देर से सही, लाल मैन की वो आखरी इच्छा पूरी हुई, तो असल में इस आट्सु साल पुरानी गाता से हमें तीन बहुत गेरी बाते सीखने को मिलती हैं. पहला, लाल मैं का बागिन पर पुरी ताकत से प्रहार ना करना, जो हमें स्त्री जीवों के प्रती सरवोच सम्मान सिखाता है. तुस्रा किसी की अंतिम इच्छा की पवित्रता, जिसे कभी भी किसी भी हाल में नजर अंदाज नहीं करना जाहीं. और तीस्रा कर्म और नयाय का वो चक्र, जो ये तैकरता है, कि दोखा देने वाला कभी भी अपने की एकी सचासे बच नहीं सकता. आज इतने सद्यों बाद भी लाल मैं को लोग बूले नहीं है, वो आज सर्फ एक कहानी के पात्र नहीं है, बलकी मित्ला की लोग परम्पलाओ में उने लाल मैं भाबा के रूप में पूजा जाता है. आज भी लोग उनके मन्दिर जाते है, मन्नते मागते है, और उनका आशीवार लेते है. उनका वो महान बलिदान और उनके पक्के उसुल आज भी वहां के लोगों के दिलो में दड़कते है. आजकिस विष्लेशन को खटम करने से पहले मैं आपके लिए एक विचार चोडगे जाना चाहता हूँ। क्या एक तोडगया वादा अनन्त काल तक गुजता रहता है? लाल मिन भाबा कि ये कहानी हमें हमें शहायात दिलाती रहेगी कि वफ़दारी, सम्मान और सचका जो वजन होता है ना वो स्व्रफ इस जनम तक सीमित नहीं रहाता बल कि ये समय और मोद की सीमाव को पार कर के भी अपना असर ज़ोर दिखाता है हमारे सात इस सफर में जुडने के लिए आपका बहुत बहुत द्श्यवाद आज़े ही सीकते रहें और कहानियों के पीछे चिपे इन गेरे अड़्फों को समचते रहें.