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आब_मैथिलीमे_वाचस्पति_मिश्रक_भामती.m4a

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Collection
Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
Status
asr-draft
Human verified
No
Editorial review
not-reviewed
ASR model
small
Detected language
hi (0.68514)
Duration
1:45
Source
Open preserved recording

Timestamped machine output

  1. 0:00–0:05आज्क इट्वरित साराव्ष, वाज्ष्पती मिश्र रचित प्रसिद संस्क्रित ग्रन्त,
  2. 0:05–0:10बहामती कगजेंद्र ताकूर द्वारा केल नवु मैठ्ली अनुवाद पर अची.
  3. 0:10–0:17नवम शताबदिक इजटिल अदवेदान्त ग्रन्त अब आपन मात्री भाशा में सुलब हैगल अची,
  4. 0:17–0:23जे मित्लाक महान दार्षनेक परमपरा के आम पाथक कलिल एक दम जीवन्त बनादे तचे.
  5. 0:23–0:27पहल ये मित्लाक बोध्धिक दरोहरेक गर वाप्सी थेक,
  6. 0:27–0:31जे बामती समप्रदाय कमोल सिद्धान्त सपष्ट करे तचे
  7. 0:31–0:36जे अग्यान वा अविद्या हम्रा आहाजका सादारन जीव में होई तचे
  8. 0:36–0:39पोई ब्रम्ह मिन नहीं के आहा कही यो सोचल हूँ
  9. 0:39–0:43जे इती बारी वेदान्त अपन भाशा में पडल जासके तचे
  10. 0:43–0:48इत बुज्यों साख्शात कोनो भिस्रल खजानाग अपन गर गूमावाजगा आची.
  11. 0:48–0:52दो सर एकर अनुवाज शेली बड थेट आर रोचक अची.
  12. 0:52–0:58गजेंद्र ताकूर अद्ध्यास अद्धात ब्रमजगाग जटल दाशनिक तर्क के बुज्यवाक लेल
  13. 0:58–1:03बूजेवाकलेल गाव कचापालग गपषव अखेती किसानिक उप्माकः प्रेुखकेने चथीन
  14. 1:04–1:09जाई सब भारी भरकम संसक्रित अब मैठलिक मुहावरा में एक दम नीगजका कखबी गेल अची
  15. 1:10–1:14अन्त में एक गरन्त मोक्ष कवास्तविक सुरुब सबष्ट करे तची
  16. 1:14–1:18की आँके लगगे तचे जे मोक्ष कोनो नाव कर्म से भिटद नहीं
  17. 1:18–1:23एते कर्म केवल चित शुद्दी अर्ठात मुन साव कर्बाक ले लची
  18. 1:23–1:25मोक्ष तप पहले ही सप्रापतची
  19. 1:25–1:28मुदा मात्र अग्यान सच्पल अची
  20. 1:28–1:34तीक उहिना जेना कोनो लोक आपन गला में पहरल हारके चारो दिस खूजी रहो होए.
  21. 1:34–1:38निशकर्षता इपुस्तक मात्र एक्ता भाशान्तरन नहीं,
  22. 1:38–1:41बलकी अदवैत विदान्क कंभीर मंठन दरी पहुच्वाक लिल,
  23. 1:41–1:45मित्हिलाकर राजपत पर बनल एक ता सुन्दर पूलची

Plain text

आज्क इट्वरित साराव्ष, वाज्ष्पती मिश्र रचित प्रसिद संस्क्रित ग्रन्त, बहामती कगजेंद्र ताकूर द्वारा केल नवु मैठ्ली अनुवाद पर अची. नवम शताबदिक इजटिल अदवेदान्त ग्रन्त अब आपन मात्री भाशा में सुलब हैगल अची, जे मित्लाक महान दार्षनेक परमपरा के आम पाथक कलिल एक दम जीवन्त बनादे तचे. पहल ये मित्लाक बोध्धिक दरोहरेक गर वाप्सी थेक, जे बामती समप्रदाय कमोल सिद्धान्त सपष्ट करे तचे जे अग्यान वा अविद्या हम्रा आहाजका सादारन जीव में होई तचे पोई ब्रम्ह मिन नहीं के आहा कही यो सोचल हूँ जे इती बारी वेदान्त अपन भाशा में पडल जासके तचे इत बुज्यों साख्शात कोनो भिस्रल खजानाग अपन गर गूमावाजगा आची. दो सर एकर अनुवाज शेली बड थेट आर रोचक अची. गजेंद्र ताकूर अद्ध्यास अद्धात ब्रमजगाग जटल दाशनिक तर्क के बुज्यवाक लेल बूजेवाकलेल गाव कचापालग गपषव अखेती किसानिक उप्माकः प्रेुखकेने चथीन जाई सब भारी भरकम संसक्रित अब मैठलिक मुहावरा में एक दम नीगजका कखबी गेल अची अन्त में एक गरन्त मोक्ष कवास्तविक सुरुब सबष्ट करे तची की आँके लगगे तचे जे मोक्ष कोनो नाव कर्म से भिटद नहीं एते कर्म केवल चित शुद्दी अर्ठात मुन साव कर्बाक ले लची मोक्ष तप पहले ही सप्रापतची मुदा मात्र अग्यान सच्पल अची तीक उहिना जेना कोनो लोक आपन गला में पहरल हारके चारो दिस खूजी रहो होए. निशकर्षता इपुस्तक मात्र एक्ता भाशान्तरन नहीं, बलकी अदवैत विदान्क कंभीर मंठन दरी पहुच्वाक लिल, मित्हिलाकर राजपत पर बनल एक ता सुन्दर पूलची

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