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गंगेश_उपाध्याय_का_तर्क_और_सामाजिक_संघर्ष.m4a
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- 0:00–0:13आजकी चर्चा में हम गंगेश उपाद्ध्याय के, चोदवी सदी के गरन्त, तत्व चिन्तमनी, के मैठली अनुवाद और नव्व्यन न्याए दर्षन पर आई इस समागरी का विष्लेषन कर रहे हैं.
- 0:13–0:16अर बिना किसी देरी के शुर्वात करते हैं,
- 0:16–0:19किकि पहला मुद्ड़ जो मैं देख रही हूं,
- 0:19–0:22वो यह की परिबाशिक, शब्दावली,
- 0:22–0:25और व्यवाहारिक उदाहरनो के बीच का जो प्रवावाव है,
- 0:25–0:28तोड़ा अचानक सा लकता है.
- 0:28–0:58आप दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन ब
- 0:58–1:00शास्त्रिय परिबाशा देती है
- 1:00–1:01और अगले ही पल
- 1:01–1:05शीदे पहाड और आग वाले उदाहरन पर चलांग डेती है
- 1:05–1:06सही का
- 1:06–1:07मदलब
- 1:07–1:09कल्पना की जे एक आम पाथक
- 1:09–1:11व्याप्ती पन्चक के
- 1:11–1:13उस कतिन जाल में उलजा हूँआ है
- 1:13–1:14अपनी दिशा दून रहा है
- 1:14–1:20अर बिना किसी वाँनिंके उसे आग औवे के उस आदी काल के उदारन पर पटक दिया जाता है.
- 1:20–1:24ये तो पाटक के लिए एक तरे का मानसिक जटका है?
- 1:24–1:26आप एक मानसिक जटका ही है.
- 1:26–1:31आप एक दम से अबस्ट्रक्त लेवल से उटकर फिसिकल दून्या में गिरते है.
- 1:31–1:37अर इस कम्सोरी को दूर करने का सब से अच्छा तरीका ये है कि तकनीकी परिभाशा
- 1:37–1:43और उस शास्त्रिया उदारन के भीच एक आदूनेक माख्रो अनलोगी
- 1:43–1:46यानी एक चोटे रूपक का से तू बनाया जाए.
- 1:46–1:49तो इसका कोई तो सुदारन लेकर देक सकते हैं
- 1:49–1:54जेसे समगरी में जो उपादीवाला प्रसंख समजाया गया है, वहां इसे प्रक्तिकली केसे लागु करेंगे.
- 1:54–2:03आव वही देकते है, अभी समगरी केती है कि उपादी वो है, जो साद्धे के साथ तो हमेशा रहती है, पर हे तू के साथ नहीं.
- 2:03–2:11अटीक इसके बाद वो सीदे गीली लक्डी यान आरद्र, एंदन, सैयोग और दूए वाले उदारन पर आजाती है.
- 2:11–2:14जीली खाल एकजामपल पर.
- 2:14–2:19राइट. मेरा सुजाव ये है की गीली लक्डी का उदारन देने से टीक पहले,
- 2:19–2:24लेकग को इस कोंषेप्त को मोडन साँईंस के हिटन वेरिबल
- 2:24–2:27या प्रच्चन्ना कारग के रुप में थोडा समजाना चाहीए.
- 2:27–2:31पर मैं सोच रहा था की क्या उपादी को
- 2:31–2:35सरफ एक हिटन वेरिबल या एरर के रुप में पेश करने से
- 2:35–2:37अव उसके दार्ष्निक महत्व को कम तो नहींगे
- 2:38–2:41कुकी गांगेश ने इसको सल्फ एक गल्ती तो नहीं माना थाना
- 2:41–2:44ये बहुत ही ज़रूरी सवाल है
- 2:44–2:48और गेही पर लेकख को अपनी व्याक्या में गेराई लानी होगी
- 2:48–2:53उने बताना होगा के, हिट्टन वेरिबल सफ एक मामूली खलती नहीं है,
- 2:53–2:57बलकी देखिये एक एसी चिपी हुई शर्ट है,
- 2:57–3:01जो कारन और प्रभाव के रिष्टे कोही दूशित कर देती है.
- 3:01–3:05जैसे अगर कोई कहे, कोफी पीने से, हाट अग रेक होता है,
- 3:05–3:08तो ये पाक्त इगनोर करते कोफी पीने वाले
- 3:08–3:10अगर लेखा कि यह मोडन लेफरन्स पहले अस्तबलिश कर देना,
- 3:10–3:12तो यहां स्मोकिं एक हिटन वेरिएबल होगया रहीं?
- 3:12–3:16एक दम टीक और लेखख को पाटख को बताना चाहीं
- 3:16–3:21की कांकेश की युपुती टीक इसी टरह काम करती है.
- 3:21–3:23आख से हमेशा दूवा नहीं लिकलता.
- 3:23–3:27दूवा तब निकलता है जब आग के साथ गीली लक्डी मोजुद हो
- 3:27–3:30गीली लक्डी वाईक हिडन कंटिशन है
- 3:30–3:33आगर लेखा कि ए वोड़न रेफ्रिंष पहले अस्टबलिष कर देना
- 3:33–3:40तो पाटक को लगेगा कि वो कोई पूरानी चोद्वी सदी की बोरिंग भहेस नहीं पद्रा है.
- 3:40–3:43बलकि वो लोगिक का एक विनिवर्सल नियम पद्रा है,
- 3:43–3:47जो आज भी रही आईपोटिसिस टेस्टिग में काम आता है.
- 3:47–3:53और पाटक को ये भी महसुस होगा की उसने एक बहुत बडी तार की गुथ्ती सूल्जाली है.
- 3:53–3:57जब पाटक ये शब्डों के पीछे का अस्ली लोगिक समज लेगा,
- 3:57–4:00तब ही वो उन बड़े दार्षनिग वाद विवादो का मजा लेपाएगा,
- 4:00–4:02यो इंच्छ़डो के आसपास रचे गये हैं.
- 4:02–4:05और दीक यही वाद-विवाद
- 4:05–4:08हमें हमारे अगले सबसे एहम मुद्धे पर ले आते हैं.
- 4:08–4:10विरोदीमत जिसे हम पुर्वापक्ष कहते हैं
- 4:10–4:14उसकी प्रस्थुती को और जादा मस्वूद बनाना पडेगा
- 4:14–4:17ता की मुख्य सिद्धान्त का वजन उबहर कर सामने आए।
- 4:17–4:19मैं पूरी तरह सहमत हूँ
- 4:19–4:22यहां लेखख से एक बड़ा अफसर चूट गया है
- 4:22–4:26समागरी न्यायुकों सही साभित करने की जल्द बाजी में
- 4:26–4:28विरोदियों कि साथ तोड़ा अन्याय कर रही है
- 4:28–4:35अपका मतलब है की मेंमान सकों या बवद्धों के तरकों को बहुत हलके में लेकर जल्दी से खारिज कर दिया गया है.
- 4:35–4:36आपका मतलब है की मेंमान सकों या बवद्धों के तरकों को बहुत हलके में लेकर जल्दी से खारिज कर दिया गया है.
- 4:36–4:42जेखेना जेसे आग की दाह सकती का सिद्दान्त या ग्यान का स्वताह प्रमान्निवाद
- 4:42–4:49समगरी इन विरोदी विचारों को इतनी जल्दी और इतने कमजो रूप में पेश करती है
- 4:49–4:52कि गंगेश के खंडन का कोई इंपक्त ही नहीं परता
- 4:52–4:55अज़ा लगग का रूल तो यही बुवडी तो बसे कागजी शेर है
- 4:55–4:58जिसे न्या एक बसे फुख मार कर उडा देतें
- 4:58–5:00पर लोगिक का रूल तो यही है
- 5:00–5:05की आपका जबाब उतना ही मस्वूत लगता है जितना तफ आपका कुश्ट्चन हो
- 5:05–5:10अगर विरोदी का तर्खी बच्काना लगेगा, तो उसे हरानेवाले की क्या महांता हुई?
- 5:10–5:10अगर विरोदी का तर्खी बच्काना लगेगा, तो उसे हरानेवाले की क्या महांता हूँई?
- 5:10–5:12अग्जाएड़, यही पुईंट में कहना चारी थी.
- 5:12–5:15इसी लिए इसको टीक करने किलिए,
- 5:15–5:22लेख़ को विरोदी तर को उसके सबसे मजबुत,
- 5:22–5:24सबसे लोगिकल रूप में पेशकरें.
- 5:24–5:28तो आग और दहा शकती वाली प्रसंग को ही ले लिजे.
- 5:28–5:32इसे कैसे लिख्खा जाना जाहीए, ताकि ये श्टील मैं हो सके?
- 5:32–5:37अभी के द्राफ्ट में इसे लगभग एक अंद विश्वास की तरह पेष की आगा है.
- 5:37–5:41की आग में जलने की कोई अद्रिष्ष्षक्ती होती है.
- 5:41–5:47और कोई विशेश चंद्रकान्त मनी पास रक्ने से वो शक्ती रुग जाती है.
- 5:47–5:52जिसे पदकर एक आज का पाट्ख सोचेगा ये क्या बक्वास है?
- 5:52–5:54आसी कोई माजिक पावर छोडी होती है?
- 5:54–5:56और वो वही पर मिमान सक को दिस्मिस कर देगा.
- 5:56–6:01बिल्कुल और फिर गंगेश का तरक कोई मास्तर स्टोक नहीं लकता.
- 6:01–6:03तो लेक्हक को क्या करना चाहीं?
- 6:03–6:08उसे मिमान सक के तरक को मोडन फिजिक्स की तरा पेश करना चाहीं.
- 6:08–6:12पात्ख से कहें कि, खलपना कीजे आग है.
- 6:12–6:17आपने हाथ पर एक स्पष्यल, हीट रिस्टन्त जल या इंसूलेटर लगालिया
- 6:17–6:20और हाथ आग मे डाला. हाथ नहीं जला.
- 6:20–6:21और वाए.
- 6:21–6:24आप मिमाम सक टीक यही कह रहे थे,
- 6:24–6:28कि वो मनी उस इंसूलेटर की तरह काम करती है.
- 6:28–6:32आग पिस्टिकली वहा है, पर जलने की क्रिया नहीं हो रही.
- 6:32–6:38इसका मतलब उस मनी ने आग के अंदर की किसी शकती को ब्लोक कर दिया है.
- 6:38–6:44ये हुईना बात आप पात्टक सोचेगा कि मिमाम सक कतर क तो एक दं मतलब साँन्टिप्टेख अ रकात्या है.
- 6:44–6:49आग है जल नहीं तो जाहिर है मनी ने उस शक्ती को रोग दिया है
- 6:49–6:53और थीक उस मोमेंट पर जब मिमाम सक अजे लगने लगे
- 6:53–6:57तब लेक्हक को न्याए दरषन का ब्रम्मास्त्र निकालना चाहीए
- 6:57–6:59प्रती बन्धखा बहाव
- 6:59–7:05गंगेश कहते हैं कि आग में किसी शकती की कलपना करना बेकार की जटिलता है
- 7:05–7:08जिसे वो खल्पना गोरव कहते हैं
- 7:08–7:12तो फिर गंगेश इस पूरे फिनोमिनन को सिंपलर वें में
- 7:12–7:15यानी अपने लागव कि सिद्धान्त से कैसे समजाते हैं
- 7:15–7:20गंगेश कहते हैं की जलने के लिए किसी शकती की जरूरत नहीं है.
- 7:20–7:23जलने कारन सर्फ दो चीजे है.
- 7:23–7:31एक आग की मोजुदगी और दूसरा किसी भी मानी या अवरोदख का नहुना.
- 7:31–7:35ये जो मानी का नहुना है ना यही कारन का हिस्सा है.
- 7:35–7:41अच्छा तो जब मानी वहां रक्दी जाती है, तो कारनका वो दुस्रा हिस्सा अटोमेटिकली गायब हो जाता है?
- 7:41–7:51आप, इसलिये जलने कारन नहीं होता. उसके लिये किसी अद्रष्ष्षक्ती को पैडा करने या ब्लोक करने की दरकार ही नहीं है.
- 7:51–8:00अगर लेखख इस तरा लिखेगा तो न्याएकों का पुझंट बहुती नाटकीए और पाववफल लगेगा.
- 8:00–8:08पर मैं सोच रा था कि क्या मिमामसोखों के उस दुसरे सिद्धानत ग्यान के स्वतब्रमान्ने वादा को
- 8:08–8:11भी हम इतनी आसानी से श्टील मैं कर सकते हैं
- 8:11–8:14किकि वो तो फिसिकस का उदारर न नहीं है
- 8:14–8:17वो तो एक दम एपिस्टमोलोगी का अप्स्ट्रक सवाल है
- 8:17–8:20ये बहुत ये अच्छा समाल पूचातने
- 8:20–8:23और यहां लेक्खक को सच्छ में सतर्क रहना होगा
- 8:23–8:25मिमाम सक मानते है
- 8:25–8:30की जब भी कोई ग्यान उत्पन होता है, वो अपनी सत्तिता कुई साभित करता है.
- 8:30–8:33अभी सामगरी इसे बोछ रगके में ले रही है.
- 8:33–8:39जब की मिमाम सक एसा अनावस्ता दोष, यानी अन्पनेत रीगरस से बचने के लिमानते थे.
- 8:39–8:44इक्दम सही लेक्यक को पहले इस अनावस्ता दोश के दर को दिखाना होगा,
- 8:44–8:48की अगर मुझे साभित करना है की मेरा ज्यान सत्ति है,
- 8:48–8:52तो एक तुस्रा ज्यान चाहिये फिर उसे साभित करने किले तीस्रा.
- 8:52–8:54और ये क्रम कभी खत्मी नहीं होगा.
- 8:54–9:00इसी लिए स्वता प्रमान्निवाद एक बोथी तोस फिلिसाफिकल दिफैंस लकता है
- 9:00–9:05आँ और जब पाटख को लगे कि आँ यही एक मात्र रास्ता है
- 9:05–9:09तब गंगेश का परातब्रमान्निवाद सामने लाए
- 9:09–9:12की ज्यान की सत्तिता ग्यान के पैडा होते ही तैने होती
- 9:12–9:18बलकी बहारी सपलता से तैहोती है, जिसे गंगेश प्रव्रिती सामर्त है कैते हैं.
- 9:19–9:23तिकल रिजल्ट पर दिपन्गता है, अगर प्यास बुज गईई, तो पानी का ज्यान सत्ति ता.
- 9:23–9:34अदे ये नाचारये के व्यावाहरेक विरोद का कुन्सेप लाया जा सकता है, की जाहा प्रक्तिकल लाईग नोरमल चलने लगे वहां डाूट करना बंद कर दो.
- 9:34–9:42बिल्कुल, इन बाहासुं को इस दीप लेवल पर लाएंगे, तो चर्चा सच मे एक बोद्धिक युध्धभूमी बन जाएगी.
- 9:42–9:48और इस युध्धभूमी की बात करते हुए, हम अपने तीस्रे और आखरी मुद्धे की तरव बड़ते है.
- 9:48–9:51जो की गंगेश की परस्टल लाइव के बारे में है, रईट?
- 9:51–10:01आँ, गंगेश उपाद्याय के एतिहासिक और समाजिक जीवन को उनके दाशनेक योग्दान के सात गेहराई से जोडने की जगत जरूरत है.
- 10:01–10:04अभी समागरी में दोनो चीजे बिलकल अलक थलग है.
- 10:04–10:34अग आग आग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अ�
- 10:34–11:04तो बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ
- 11:04–11:07जाती नहीं सुफ तुमारा हेतु और लोगिक बोलता है.
- 11:07–11:11अग्जाड, यही पुईंट लेक्ख को सेंटर में रकना है.
- 11:11–11:15गंगेश की कत्होर तबस्स्या, उनका केवल व्यतीरे की अनुमान,
- 11:15–11:19यह सब उनके उस लाइप अप्टिएंस का द्रिफलेक्ष्छन है,
- 11:19–11:24जहां बिना सुलिड़ प्रूप के किसी क्लेम को इकसेप्ती नहीं किया जासकता ता
- 11:24–11:26पर दिके यहां यहां यहां चोटा से रिसक भी है
- 11:26–11:28हमें यह दियान रकना होगा की
- 11:28–11:32नव्या न्याय को सर्फ उनकी परस्ट्श्टर्श्ट्श्व्या
- 11:32–11:34या साएकोलोगिकल रीकश्टमोलगी ना बनादे.
- 11:34–11:37श्री हर्शा जैसे अद्वैद वेदानतीों ने,
- 11:37–11:39जो आपिस्तेमिक क्राइसिस,
- 11:39–11:42यान मेमान्सा का संकत क्हडा किया था,
- 11:42–11:45नव्या न्याए उसी का नतीजा था.
- 11:45–11:46रड.
- 11:46–11:48तो लेखखको बस यह सिंतिसाइस करना है कि
- 11:48–11:50उस क्रिसिस को हैंडल करने किलिए
- 11:51–11:51जो एक
- 11:51–11:54निर्मम और अबज्टिक्टिव नजर चाएए ती
- 11:54–11:55वो नजर गंगेश को
- 11:55–11:58उनके सोचल बोएकोट वाले एकस्पीरिन्से मिली.
- 11:58–12:00जो समाज यूमस पे चलता था
- 12:00–12:03उसके एक अूटकास ने आसी आपिस्टमोलगी लिकि,
- 12:03–12:06जहां सच्छ स्र्फ और स्र्फ प्रमान से तैहोता है, जन्म से नहीं.
- 12:06–12:13एक दम सहीं, ये सिंठसिस इनके दर्षन को पूरी तहासे एक अखहन्द रोप दे देगा.
- 12:13–12:20तो चर्चा को समटते हुए लेक्हक को तीन मुख्छे चीजों पर काम करना है.
- 12:20–12:25पहला जटिल परिभाशिक शब्डों और उदाहरनो के भीच
- 12:25–12:31हेदन वेरीएबल जेसे आदूनिक माख्रो अनलोगीस का इस्तिमाल करना.
- 12:31–12:34दूस्रा पूर्वापक्ष यानी विरोदी मतों को
- 12:34–12:36टील मैं टेक्निक से
- 12:36–12:39उनके सब से श्वाँग रूप में पेश करना
- 12:39–12:41ताकि जब गांगेश उने हराएं
- 12:41–12:42तो उनकी विक्त्री
- 12:42–12:44और उनका लागव सिद्धान तेष्ट में
- 12:44–12:46गलोरियस लगे
- 12:46–12:52और तीस्रा गांगेश के समाजिक भहिष्कार और उनके नव्या न्याए दर्षिन,
- 12:52–12:56के बीच का direct connection establish करना,
- 12:56–13:02ताकी history और logic एक दूस्रे से जुडखर सामगरी को और भी liveli बना दे.
- 13:02–13:22अवर्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
Plain text
आजकी चर्चा में हम गंगेश उपाद्ध्याय के, चोदवी सदी के गरन्त, तत्व चिन्तमनी, के मैठली अनुवाद और नव्व्यन न्याए दर्षन पर आई इस समागरी का विष्लेषन कर रहे हैं. अर बिना किसी देरी के शुर्वात करते हैं, किकि पहला मुद्ड़ जो मैं देख रही हूं, वो यह की परिबाशिक, शब्दावली, और व्यवाहारिक उदाहरनो के बीच का जो प्रवावाव है, तोड़ा अचानक सा लकता है. आप दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन बादिया दर्षन ब शास्त्रिय परिबाशा देती है और अगले ही पल शीदे पहाड और आग वाले उदाहरन पर चलांग डेती है सही का मदलब कल्पना की जे एक आम पाथक व्याप्ती पन्चक के उस कतिन जाल में उलजा हूँआ है अपनी दिशा दून रहा है अर बिना किसी वाँनिंके उसे आग औवे के उस आदी काल के उदारन पर पटक दिया जाता है. ये तो पाटक के लिए एक तरे का मानसिक जटका है? आप एक मानसिक जटका ही है. आप एक दम से अबस्ट्रक्त लेवल से उटकर फिसिकल दून्या में गिरते है. अर इस कम्सोरी को दूर करने का सब से अच्छा तरीका ये है कि तकनीकी परिभाशा और उस शास्त्रिया उदारन के भीच एक आदूनेक माख्रो अनलोगी यानी एक चोटे रूपक का से तू बनाया जाए. तो इसका कोई तो सुदारन लेकर देक सकते हैं जेसे समगरी में जो उपादीवाला प्रसंख समजाया गया है, वहां इसे प्रक्तिकली केसे लागु करेंगे. आव वही देकते है, अभी समगरी केती है कि उपादी वो है, जो साद्धे के साथ तो हमेशा रहती है, पर हे तू के साथ नहीं. अटीक इसके बाद वो सीदे गीली लक्डी यान आरद्र, एंदन, सैयोग और दूए वाले उदारन पर आजाती है. जीली खाल एकजामपल पर. राइट. मेरा सुजाव ये है की गीली लक्डी का उदारन देने से टीक पहले, लेकग को इस कोंषेप्त को मोडन साँईंस के हिटन वेरिबल या प्रच्चन्ना कारग के रुप में थोडा समजाना चाहीए. पर मैं सोच रहा था की क्या उपादी को सरफ एक हिटन वेरिबल या एरर के रुप में पेश करने से अव उसके दार्ष्निक महत्व को कम तो नहींगे कुकी गांगेश ने इसको सल्फ एक गल्ती तो नहीं माना थाना ये बहुत ही ज़रूरी सवाल है और गेही पर लेकख को अपनी व्याक्या में गेराई लानी होगी उने बताना होगा के, हिट्टन वेरिबल सफ एक मामूली खलती नहीं है, बलकी देखिये एक एसी चिपी हुई शर्ट है, जो कारन और प्रभाव के रिष्टे कोही दूशित कर देती है. जैसे अगर कोई कहे, कोफी पीने से, हाट अग रेक होता है, तो ये पाक्त इगनोर करते कोफी पीने वाले अगर लेखा कि यह मोडन लेफरन्स पहले अस्तबलिश कर देना, तो यहां स्मोकिं एक हिटन वेरिएबल होगया रहीं? एक दम टीक और लेखख को पाटख को बताना चाहीं की कांकेश की युपुती टीक इसी टरह काम करती है. आख से हमेशा दूवा नहीं लिकलता. दूवा तब निकलता है जब आग के साथ गीली लक्डी मोजुद हो गीली लक्डी वाईक हिडन कंटिशन है आगर लेखा कि ए वोड़न रेफ्रिंष पहले अस्टबलिष कर देना तो पाटक को लगेगा कि वो कोई पूरानी चोद्वी सदी की बोरिंग भहेस नहीं पद्रा है. बलकि वो लोगिक का एक विनिवर्सल नियम पद्रा है, जो आज भी रही आईपोटिसिस टेस्टिग में काम आता है. और पाटक को ये भी महसुस होगा की उसने एक बहुत बडी तार की गुथ्ती सूल्जाली है. जब पाटक ये शब्डों के पीछे का अस्ली लोगिक समज लेगा, तब ही वो उन बड़े दार्षनिग वाद विवादो का मजा लेपाएगा, यो इंच्छ़डो के आसपास रचे गये हैं. और दीक यही वाद-विवाद हमें हमारे अगले सबसे एहम मुद्धे पर ले आते हैं. विरोदीमत जिसे हम पुर्वापक्ष कहते हैं उसकी प्रस्थुती को और जादा मस्वूद बनाना पडेगा ता की मुख्य सिद्धान्त का वजन उबहर कर सामने आए। मैं पूरी तरह सहमत हूँ यहां लेखख से एक बड़ा अफसर चूट गया है समागरी न्यायुकों सही साभित करने की जल्द बाजी में विरोदियों कि साथ तोड़ा अन्याय कर रही है अपका मतलब है की मेंमान सकों या बवद्धों के तरकों को बहुत हलके में लेकर जल्दी से खारिज कर दिया गया है. आपका मतलब है की मेंमान सकों या बवद्धों के तरकों को बहुत हलके में लेकर जल्दी से खारिज कर दिया गया है. जेखेना जेसे आग की दाह सकती का सिद्दान्त या ग्यान का स्वताह प्रमान्निवाद समगरी इन विरोदी विचारों को इतनी जल्दी और इतने कमजो रूप में पेश करती है कि गंगेश के खंडन का कोई इंपक्त ही नहीं परता अज़ा लगग का रूल तो यही बुवडी तो बसे कागजी शेर है जिसे न्या एक बसे फुख मार कर उडा देतें पर लोगिक का रूल तो यही है की आपका जबाब उतना ही मस्वूत लगता है जितना तफ आपका कुश्ट्चन हो अगर विरोदी का तर्खी बच्काना लगेगा, तो उसे हरानेवाले की क्या महांता हुई? अगर विरोदी का तर्खी बच्काना लगेगा, तो उसे हरानेवाले की क्या महांता हूँई? अग्जाएड़, यही पुईंट में कहना चारी थी. इसी लिए इसको टीक करने किलिए, लेख़ को विरोदी तर को उसके सबसे मजबुत, सबसे लोगिकल रूप में पेशकरें. तो आग और दहा शकती वाली प्रसंग को ही ले लिजे. इसे कैसे लिख्खा जाना जाहीए, ताकि ये श्टील मैं हो सके? अभी के द्राफ्ट में इसे लगभग एक अंद विश्वास की तरह पेष की आगा है. की आग में जलने की कोई अद्रिष्ष्षक्ती होती है. और कोई विशेश चंद्रकान्त मनी पास रक्ने से वो शक्ती रुग जाती है. जिसे पदकर एक आज का पाट्ख सोचेगा ये क्या बक्वास है? आसी कोई माजिक पावर छोडी होती है? और वो वही पर मिमान सक को दिस्मिस कर देगा. बिल्कुल और फिर गंगेश का तरक कोई मास्तर स्टोक नहीं लकता. तो लेक्हक को क्या करना चाहीं? उसे मिमान सक के तरक को मोडन फिजिक्स की तरा पेश करना चाहीं. पात्ख से कहें कि, खलपना कीजे आग है. आपने हाथ पर एक स्पष्यल, हीट रिस्टन्त जल या इंसूलेटर लगालिया और हाथ आग मे डाला. हाथ नहीं जला. और वाए. आप मिमाम सक टीक यही कह रहे थे, कि वो मनी उस इंसूलेटर की तरह काम करती है. आग पिस्टिकली वहा है, पर जलने की क्रिया नहीं हो रही. इसका मतलब उस मनी ने आग के अंदर की किसी शकती को ब्लोक कर दिया है. ये हुईना बात आप पात्टक सोचेगा कि मिमाम सक कतर क तो एक दं मतलब साँन्टिप्टेख अ रकात्या है. आग है जल नहीं तो जाहिर है मनी ने उस शक्ती को रोग दिया है और थीक उस मोमेंट पर जब मिमाम सक अजे लगने लगे तब लेक्हक को न्याए दरषन का ब्रम्मास्त्र निकालना चाहीए प्रती बन्धखा बहाव गंगेश कहते हैं कि आग में किसी शकती की कलपना करना बेकार की जटिलता है जिसे वो खल्पना गोरव कहते हैं तो फिर गंगेश इस पूरे फिनोमिनन को सिंपलर वें में यानी अपने लागव कि सिद्धान्त से कैसे समजाते हैं गंगेश कहते हैं की जलने के लिए किसी शकती की जरूरत नहीं है. जलने कारन सर्फ दो चीजे है. एक आग की मोजुदगी और दूसरा किसी भी मानी या अवरोदख का नहुना. ये जो मानी का नहुना है ना यही कारन का हिस्सा है. अच्छा तो जब मानी वहां रक्दी जाती है, तो कारनका वो दुस्रा हिस्सा अटोमेटिकली गायब हो जाता है? आप, इसलिये जलने कारन नहीं होता. उसके लिये किसी अद्रष्ष्षक्ती को पैडा करने या ब्लोक करने की दरकार ही नहीं है. अगर लेखख इस तरा लिखेगा तो न्याएकों का पुझंट बहुती नाटकीए और पाववफल लगेगा. पर मैं सोच रा था कि क्या मिमामसोखों के उस दुसरे सिद्धानत ग्यान के स्वतब्रमान्ने वादा को भी हम इतनी आसानी से श्टील मैं कर सकते हैं किकि वो तो फिसिकस का उदारर न नहीं है वो तो एक दम एपिस्टमोलोगी का अप्स्ट्रक सवाल है ये बहुत ये अच्छा समाल पूचातने और यहां लेक्खक को सच्छ में सतर्क रहना होगा मिमाम सक मानते है की जब भी कोई ग्यान उत्पन होता है, वो अपनी सत्तिता कुई साभित करता है. अभी सामगरी इसे बोछ रगके में ले रही है. जब की मिमाम सक एसा अनावस्ता दोष, यानी अन्पनेत रीगरस से बचने के लिमानते थे. इक्दम सही लेक्यक को पहले इस अनावस्ता दोश के दर को दिखाना होगा, की अगर मुझे साभित करना है की मेरा ज्यान सत्ति है, तो एक तुस्रा ज्यान चाहिये फिर उसे साभित करने किले तीस्रा. और ये क्रम कभी खत्मी नहीं होगा. इसी लिए स्वता प्रमान्निवाद एक बोथी तोस फिلिसाफिकल दिफैंस लकता है आँ और जब पाटख को लगे कि आँ यही एक मात्र रास्ता है तब गंगेश का परातब्रमान्निवाद सामने लाए की ज्यान की सत्तिता ग्यान के पैडा होते ही तैने होती बलकी बहारी सपलता से तैहोती है, जिसे गंगेश प्रव्रिती सामर्त है कैते हैं. तिकल रिजल्ट पर दिपन्गता है, अगर प्यास बुज गईई, तो पानी का ज्यान सत्ति ता. अदे ये नाचारये के व्यावाहरेक विरोद का कुन्सेप लाया जा सकता है, की जाहा प्रक्तिकल लाईग नोरमल चलने लगे वहां डाूट करना बंद कर दो. बिल्कुल, इन बाहासुं को इस दीप लेवल पर लाएंगे, तो चर्चा सच मे एक बोद्धिक युध्धभूमी बन जाएगी. और इस युध्धभूमी की बात करते हुए, हम अपने तीस्रे और आखरी मुद्धे की तरव बड़ते है. जो की गंगेश की परस्टल लाइव के बारे में है, रईट? आँ, गंगेश उपाद्याय के एतिहासिक और समाजिक जीवन को उनके दाशनेक योग्दान के सात गेहराई से जोडने की जगत जरूरत है. अभी समागरी में दोनो चीजे बिलकल अलक थलग है. अग आग आग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अग अ� तो बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ बज़्ाँ जाती नहीं सुफ तुमारा हेतु और लोगिक बोलता है. अग्जाड, यही पुईंट लेक्ख को सेंटर में रकना है. गंगेश की कत्होर तबस्स्या, उनका केवल व्यतीरे की अनुमान, यह सब उनके उस लाइप अप्टिएंस का द्रिफलेक्ष्छन है, जहां बिना सुलिड़ प्रूप के किसी क्लेम को इकसेप्ती नहीं किया जासकता ता पर दिके यहां यहां यहां चोटा से रिसक भी है हमें यह दियान रकना होगा की नव्या न्याय को सर्फ उनकी परस्ट्श्टर्श्ट्श्व्या या साएकोलोगिकल रीकश्टमोलगी ना बनादे. श्री हर्शा जैसे अद्वैद वेदानतीों ने, जो आपिस्तेमिक क्राइसिस, यान मेमान्सा का संकत क्हडा किया था, नव्या न्याए उसी का नतीजा था. रड. तो लेखखको बस यह सिंतिसाइस करना है कि उस क्रिसिस को हैंडल करने किलिए जो एक निर्मम और अबज्टिक्टिव नजर चाएए ती वो नजर गंगेश को उनके सोचल बोएकोट वाले एकस्पीरिन्से मिली. जो समाज यूमस पे चलता था उसके एक अूटकास ने आसी आपिस्टमोलगी लिकि, जहां सच्छ स्र्फ और स्र्फ प्रमान से तैहोता है, जन्म से नहीं. एक दम सहीं, ये सिंठसिस इनके दर्षन को पूरी तहासे एक अखहन्द रोप दे देगा. तो चर्चा को समटते हुए लेक्हक को तीन मुख्छे चीजों पर काम करना है. पहला जटिल परिभाशिक शब्डों और उदाहरनो के भीच हेदन वेरीएबल जेसे आदूनिक माख्रो अनलोगीस का इस्तिमाल करना. दूस्रा पूर्वापक्ष यानी विरोदी मतों को टील मैं टेक्निक से उनके सब से श्वाँग रूप में पेश करना ताकि जब गांगेश उने हराएं तो उनकी विक्त्री और उनका लागव सिद्धान तेष्ट में गलोरियस लगे और तीस्रा गांगेश के समाजिक भहिष्कार और उनके नव्या न्याए दर्षिन, के बीच का direct connection establish करना, ताकी history और logic एक दूस्रे से जुडखर सामगरी को और भी liveli बना दे. अवर्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�