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वाचस्पति_मिश्र_की_भामती_का_मैथिली_अनुवाद.m4a
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- 0:00–0:03ज़र आजिए जब हम किसी मेटिकल डाएक्नोसिस की बात करते हैं,
- 0:03–0:07तो हम एक हाज्ट्टरा की सतिक्ता की उमीट करते हैं,
- 0:07–0:10मतलब अईमाजन की जी आप एक एक एक स्वरी फिल्न देख्डे हैं.
- 0:10–0:14बलकुल, हद्टी तूटी है, या नहीं, ये साव दिख जाता हैं.
- 0:14–0:16आई, एक साफ सफेट लाईन दिख जाएगी
- 0:16–0:18ये बलकल बाईनरी है, है ना
- 0:18–0:21या तो हड़ी तूटी है, या फिर नहीं तूटी है, एक दं बलाक औग़ वाइट
- 0:21–0:25और सच को हूँट तो ये बहुत सुकुन देता है
- 0:25–0:28हमें आफी चीजे पसंद हैं, जिने हम आसानी से
- 0:28–0:31अलग गलग बोक्स में डाल सकें
- 0:31–0:32सईबात है
- 0:32–0:34कुकि जब चीजने स्पष्ट होती हैं
- 0:34–0:36तो हमार दिमाक सुरक्षित मैंसुस करता है
- 0:36–0:39हम हर चीजन को मापना चाते हैं तोलना चाते हैं
- 0:39–0:43लेकिन खाँब हो अगर हम शरीर की इन हड़्यों को चोडगर
- 0:43–0:47मानव चेतना और वास्तविक्ता की दुन्या में कदम रक्छे,
- 0:47–0:52आचानक से वो एकस्च्रे मशीन काम करना बन्गर देती है?
- 0:52–0:55हाँ, वाईनरी काम नहीं करता. बिलकुन नहीं.
- 0:55–0:56क्या सच है?
- 0:56–1:02और क्या हमारा अपना ब्रम, इसके भीच की लकीरे सुव दून्डली नहीं होती,
- 1:02–1:04बलकी पूरी तरह से गायब हो जाती हैं.
- 1:04–1:09और आज हम इसी दून्डली दून्या की एक बहुत गेहरी चर्चा करने वाले हैं.
- 1:09–1:12और ये चर्चा बहुत दिल्चास फोने वाली है.
- 1:12–1:18आँ, हम नोवी सदीके एक महान दाशनिक के विशारो में गोता लगारे है,
- 1:18–1:22जिनों ने वास्तविक्ता और ब्रम के भीज के फरक को देफाईन क्या,
- 1:22–1:26वाचस्पती मिष्र, और सबसे दिल्चस बात यहे है,
- 1:26–1:29कि हम उनके सबसे जटिल संस्क्रिद ग्रन्त
- 1:29–1:31भामती को समजेंगे
- 1:31–1:34वो भी गजेंद्र ताक्कृर दूरा किये गये
- 1:34–1:36एक मैठलिय अनुवाद के जर्ये
- 1:36–1:37ये कोई मामुली बात नहीं है
- 1:37–1:41दिके भामती असल में आदी शंक्राचार्ये के
- 1:41–2:11ब्रम्म्सुत्र भाश्व्यपार लिखिगगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेईग
- 2:11–2:15अद्वेद्वेदान्त का इक स्वतन्त्र और इत्ना व्यवस्तित निर्मान है,
- 2:16–2:19कि इसके आदार पर अद्वेदान्त के भीतर है,
- 2:19–2:26लिकिन ये जो गरन्त है बहामती ये उनकी जिन्गी की अन्तिम और सबसे परिपक्त व्रच्ना मानी जाती है
- 2:26–2:30ये सर्फ शंक्राचारे के विचारों की एक और व्याख्या नहीं है
- 2:30–2:31अच्छ! तो ये कुछ अलाग है
- 2:31–2:37बलकुल, ये अपने आप में अद्वैद्वेदान्त का एक स्वतन्त्र और इतना व्यवस्तित निर्मान है,
- 2:37–2:43के इसके आदार पर अद्वैद्वेदान्त के भीतर ही एक पूरा का पूरा नया संप्रुदाए बन गया,
- 2:43–2:45जिसे बहामती सकूल कहाजाता है.
- 2:45–2:50अर यही पर गजेंदर चाकुर के इस मेठली अनुवाद की अहमीद समझ में आती है
- 2:50–2:55मतलब सद्वियोंता कि ये बारी बरकं, फिलोस्टी सर्फ संस्क्रित की दिवारो में कैद रही है आगा
- 2:55–2:59आगा, इसे समझना किबल कुछ विद्वानो तक ही सीमिद ता
- 2:59–3:03बही तो, लेकिन इस गरन्त को वापिस मैठली मिलाना,
- 3:03–3:07जो की वाचस्पती मिष्र की अपनी जमीन की मित्ला की बाशा है,
- 3:08–3:09ये सर्व गिताप चापना नहीं है,
- 3:10–3:13मुझे लकता है, ये दरशन को आम लोगो की रसोई,
- 3:13–3:17उनके केट, खल्यानों की बाशा में वापिस लोटाना है
- 3:17–3:21सही का अपने, किसी भी बोद्दिक समपदा का उसकी अपनी लोग बाशा में लोटना
- 3:21–3:24एक तराकी एतिहासिक वापसी है
- 3:24–3:29ये फिलोऽपी को अक्कादमिक कमरो से आजाद करने जैसा है
- 3:29–3:35बिल्कुल! तो चलिए, इस आजाद हुई फिलोस्टिपी के सबसे एहम हिस से पर बात करते हैं.
- 3:35–3:38अगर हम दून्या को समजने की कोशिष कर रहे हैं,
- 3:38–3:43तो सबसे पहली समस्या यह आई कि हम चीजों को अकसर गलत समचते हैं.
- 3:43–3:46वाचस पती मिश्र अद्यास की बात करते हैं
- 3:46–3:48अद्यास
- 3:48–3:51अद्यास मतलब सुपर्म्पुजिशन
- 3:51–3:54किसी एक चीस पर किसी दुस्री चीस का अखस
- 3:54–3:56या गोड �theb dena
- 3:56–3:59आजे से अंदेरे में पडीवी रस्सी को साम् समज लेना
- 3:59–4:02ये आम अँईन्सानो की बहुत भून्यादी फित्रत है,
- 4:02–4:08अपने पिछले अनुबहों की रील को, हमेशा वर्तमान की सक्रीन पर पलेकरते रहते हैं.
- 4:08–4:13और अनुवाद में इसे जिस तरह ग्रामीन जीवन से जोडा गय, वो कमाल है.
- 4:13–4:15चानवरों का एक उदारन आता है अस में.
- 4:15–4:23अगर कोई जान्वर किसी इन्सान को हात में दन्डा लिये देकता है, तो वो तुरन्त वहां से बहाक खडा होता है.
- 4:23–4:24तुरन्त वहां से बहाक खडा होता है.
- 4:24–4:25तुरन्त वहां से बहाक खडा होता है.
- 4:25–4:26आप दर के मारे.
- 4:26–4:31अन्सान हाथ में हरी गास लेकर ख़ा हो, तो जान्वर पास आजाता है. ये क्या है?
- 4:31–4:34ये सर्फ जान्वर कर रिफलेक्स नहीं है. ये अद्ध्यास है.
- 4:34–4:40एक दम सतीक बात पक्डी आपने. जान्वर अपने पिछले अनबभमो के आदार पर उस्पल को जजज कर रहा है.
- 4:40–4:43उसे दन्दे से चोटक रानुबव है और गाज से काने का
- 4:44–4:46और सचकों तो हम अपने नसान भी हर वकती यही कर रहे हैं
- 4:46–4:48हम भी तो यही करते हैं
- 4:48–4:52जैसे अगर हमारा किसी पिछले रिष्ते में दिल तूता हो
- 4:52–4:54तो हम उस पुराने ट्राूमा
- 4:54–5:24या दर को अपने किसी नहीं अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई
- 5:24–5:28अद्वाइत्वेदान्त का जो सिद्धान्त विस्तापित करते है,
- 5:28–5:31उसे अनिर्वच्नीया ख्याती कहाथी कहाथा है.
- 5:31–5:33अनिर्वच्नीया,
- 5:33–5:37मतलब जिसे शब्डो में बयान ना किया जासके.
- 5:37–5:41जो नहापूरी तरा सच है, नहापूरी तरा जूट.
- 5:41–5:42जी.
- 5:42–5:45मतलब जिसे शब्डो में बयान ना किया जा सके
- 5:46–5:49जो ना पूरी तरा सच है ना पूरी तरा जूट
- 5:49–5:50जी
- 5:50–5:52लिकिन एक मिनेट रुक्ये
- 5:52–5:54ये तोडा गोल्मोल जवाब ने लग्रा
- 5:55–5:57कोई भी चीज या तो सच होती है या जूट
- 5:57–5:58वो दोनो के भीच की
- 5:58–6:01या दोनो से परे कैसे हो सकती है?
- 6:01–6:03ये गोल मोल नहीं है
- 6:03–6:04यह यह यादारत है
- 6:04–6:06देके इसे म्रिगत्रिष्ना
- 6:06–6:10यानी रेगिस्तान में दिकने वाले पानी के उदारन्से समचते हैं
- 6:10–6:12मिराज
- 6:12–6:13आप मिराज
- 6:13–6:16चिल चलाती दूप में दूर रेगिस्तान में पानी दिकता है
- 6:16–6:18अगर वो पानी पूरी तरा से सत्ते होता
- 6:18–6:20तो कोई भी प्यासा आदमी जाकर
- 6:20–6:22उस लेहरे मारते पानी को पीलेता
- 6:22–6:24भिलकुल अपनी प्यास भुजा लेता
- 6:24–6:26लेकिन वो आपसा नहीं कर सकता
- 6:26–6:28कुकि पानी वाह आई है नहीं
- 6:28–6:30इसलिये वो पानी सत्ते न न नहीं है
- 6:30–6:32तीके, पानी सत्ते नहीं है, मान लिया
- 6:33–6:36लेकिन क्या वो पानी पूरी तरान से असत्ते या शून्न्य है
- 6:37–6:40अगर वो एक दम जूट है, जैसे गदे के सींग होते हैं
- 6:40–6:42तो वो हमें साथ साथ दिखाए ही क्यो देरा है
- 6:42–6:43हम, पोईंट है
- 6:43–6:45कम से कम उस पल के लिए
- 6:45–6:48देखने वाले को तो वहां पानी होने का पुरा अनुबहो रा है
- 6:48–6:51इसलिये उसे पुरी तरा असचते भी नहीं कया सकतें
- 6:52–6:55तो कुंकि वो काम नहीं आता वो सच नहीं है
- 6:55–6:57और कुंकि वो दिखाए देता है
- 6:57–6:59इसलिये वो जूज भी नहीं है
- 6:59–7:01तो भी ब्रम दोनों के बीचका एक ब्रम है,
- 7:01–7:04जिसे दिफाईन नहीं किया जासकता.
- 7:04–7:05बिलकुल.
- 7:05–7:08लेकिन, अगर ब्रम इतना हावी है,
- 7:08–7:10तो मैं विरोदी दार्षनिकों,
- 7:10–7:12जिने पूर्व पक्ष कहाथा है,
- 7:12–7:42उनकी तरव से एक बहुती विवहारिक सवाल पुचना चाहूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 7:42–7:44तो बज़े सामने रखखवा गडा साफ दिख़ा है
- 7:45–7:46तो मैं उसपे संदेइ है कियों करूं?
- 7:47–7:50अनुबहव से बड़ी कोई किताः फोडी होती है?
- 7:50–7:52विरोदी पकष्ष का सबसे बड़ा हत्यार यही है
- 7:52–7:56उनका भी यही कैना ता के जब हमारा अनुबहव एतना साफ है
- 7:56–7:58तो तमहरे शास्त्र और फिलोस्वी क्या कर लिंगे?
- 7:58–7:59आ, बिलकुल
- 7:59–8:01एक बहुती मशुर तन्स है
- 8:01–8:03के हाजारो शास्तर मिलकर भी
- 8:03–8:05गड़े को कप्रा नहीं बना सकतें
- 8:05–8:07यहनी जो प्रत्टक्ष दिख्रा है
- 8:07–8:09उसे तमहरी किताबे नहीं चुतला सकती
- 8:09–8:11तो वाच्यस्पती मिश्रस का जवाब कैसे देते हैं?
- 8:11–8:14कि योंकी ये तर्क तो बहुत मस्वूथ है?
- 8:14–8:17वरे यसका जवाब बहुत ही शान्दार वेंगिसे देते हैं.
- 8:17–8:21वे नयाएकों के इस बरोसे पर तंज कसते हुए कहते हैं.
- 8:21–8:23बेचारे ज्यान की कि खिस्मत है?
- 8:23–8:26कि वो जूट के सहरे भी सच तक पहुट जाते है.
- 8:26–8:28मतलब ये तोडा गेरा हो गया.
- 8:28–8:31मतलब ये कि जो हमें प्रत्टक्ष अनुबहव लकता है,
- 8:31–8:34वो अकसर हमारी सीमित बुद्दी का दोखा होता है.
- 8:34–8:37वाचस पती मिष्र सिद्द करते है,
- 8:37–8:40ये जो मैं का अनुबहव है, जिस पर हम इतना इत्राते है,
- 8:40–8:44वो असल में शरीर और आतमा का एक ब्रमित मिष्रन है.
- 8:44–8:47शरीर जो जजड है, और आतमा जो चेतन है.
- 8:47–8:51भिल्कुल, आतमा कभी विश्य, यान अबज्यक नहीं हो सकती,
- 8:51–8:52अब बहार देक सकें
- 8:52–8:54आत्मा हमेशा गयाता है
- 8:54–8:55देखने वाली है
- 8:55–8:56तो अगर यह मैं
- 8:57–8:58एक ब्रहम है
- 8:58–9:01और दून्या में आग्यान या अविद्या का पर्दा पडा हुए
- 9:02–9:05तो एक बहुत बडा लोगिकल सवाल क़डा होता है
- 9:05–9:05क्या?
- 9:05–9:07यह आग्यान अखिर है किसको?
- 9:07–9:10मडलव, इस ब्रम का शिकार कोन है?
- 9:10–9:15और इसी एक सवाल ने अद्वाइत वेदान्तो को दो बरी शाक्फाँ में बाट दिया था.
- 9:15–9:19एक है विव्रन स्कूल और दूसर है हमारा भामती स्कूल.
- 9:19–9:20अच्छा.
- 9:20–9:23विव्रन् स्कूल केता है के ये जो आग्यान है,
- 9:23–9:26इसका आश्रे सीथा ब्रम्हे.
- 9:26–9:28मदल ब्रम्ह मेही आग्यान है.
- 9:28–9:30लेकिन अग्यान ब्रम्ह मेहे,
- 9:30–9:33तो ब्रम्ह पुरन और शुद्ध कैसे रहा?
- 9:33–9:35ये तो विरोदधा भास होगया है ना?
- 9:35–9:39और भामती स्कूल इसी कमी को दूर करता है.
- 9:39–9:44वातिस पती मिष्र कहते हैं, के अग्ज्यान का निवास्तान जीव में है.
- 9:44–9:46यानी हम और आप.
- 9:46–9:47जीव में.
- 9:47–9:50अग्ज्यान जीव के अंदर रहता है.
- 9:50–9:53और वो अग्ज्यान ब्रम्म को एक विषेए के रूप में,
- 9:53–9:55इक अब्ज्यक्त के रूप में देखता है.
- 9:56–9:59बामती स्कूल इसे अववच्छेदवाद कहता है.
- 9:59–10:00अववच्छेदवाद का मतलब है,
- 10:00–10:04के जीव असल में अग्ज्यान दवारा सीमित किया ब्रम है.
- 10:04–10:06इसे तोडा और आसान करते है.
- 10:06–10:11मुजे वो गधाकाश और महाकाश भाला उदारन बहत सतीक लकता है अस पर.
- 10:11–10:12आप वो बहत प्रसिध दे.
- 10:12–10:17इसे ऐसे समजजे एक अनन्त विशाल अकाश है वो महाकाश है.
- 10:17–10:20अब अब अगर आप एक खाली मिट्टी का ग़ा लेकर आए,
- 10:20–10:27तो उस गड़े के अंदर भी अकाश है, हमें लकता है कि गड़े के अंदर का अकाश, गड़े के अकार का है,
- 10:27–10:31चोटा है, सीमित है, लेकिन सच्छ्मे क्या अकाश सीमित हूए है?
- 10:31–10:36नहीं, अकाश तो वैसा ही है, पस हमें उस गड़े की वजेखे वो सीमित लग रहा है.
- 10:36–10:40बहुत उम्दा उदारन, पूगड़ा हमारा शरीर मन और बुद्दी है.
- 10:40–11:10अगर कोई चोटा बच्चा खुले आस्मान को देखे और कहें कि ये तो नीले रंके नीलम पत्धर का एग बहुत बच्चा कर अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे
- 11:10–11:40अगर दोगा बाद करेंगे तो जोगा दोगा थो जोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा द
- 11:40–11:42तुब आप दोगार बादा था वोडारन यहां के से पिट बड़ता है?
- 11:42–11:44वोडारन बताता है कि जब नाविक नाव चलाता है,
- 11:44–11:46तो किनारे पिछे चुटते है,
- 11:46–11:48वोडारन बादा वोडारन यहां के से पिट बड़ता है.
- 11:48–11:52नहीं ये कोई आजी चीजे जिसे अनुश्टानो से शुद्ध किया जा सकें
- 11:52–11:55और सबसे बडी बात मोखष कोई मनजल नहीं है
- 11:55–11:56जहां आप चलकर पहुट सकें
- 11:56–11:58मोखष कोई मनजल नहीं है
- 11:58–12:01ये तो बहुत ही ये खुन्टर इंटूटिओटिव है
- 12:01–12:05तुब नाव और नाविक भाला वो उदारन यहा कैसे फिट बट बट था है?
- 12:05–12:09वो उदारन बताता है कि जब नाविक नाव चलाता है,
- 12:09–12:12तु किनारे पीछे चूटते है, लेहरे बडलती है,
- 12:12–12:15और नाव नदी के भीचो भी चान्त हिस्थे में पाँईजाती है.
- 12:15–12:16अग!
- 12:16–12:19अगर नाविक ने उस शान्त हिस्से को बनाया है
- 12:19–12:21नहीं वो हमेशा से वही ता
- 12:21–12:24नाव चलाने का करम सर्फ आप को वहातक ले गया
- 12:24–12:26उसने उस जगे को पैडा नहीं किया
- 12:26–12:29अग या वो गले के हार वाला उदारन
- 12:29–12:32किसी वियक्ती के गले में उसका कीमती हार पहले से है
- 12:32–12:38बूल गया है. बलकुल ये बूथ से टीक है. वो पागलों की तरा पूरी दून्या में
- 12:38–12:40उसे दून्डा है. फिर को यह खर उसे बताता है कि आरा,
- 12:40–12:44हार तो तुमारे गले में है. जब वो हार उसे मिलता है,
- 12:44–12:48तो क्या वो हार नया है. नहीं, हार तो हमेशा वही ता,
- 12:48–12:50बस उसका अग्यान दूर हूँआ है
- 12:50–12:54यही कारन है के आत्मा पर आपके किसी भी कर्म का सीदा असर नहीं होता
- 12:54–12:58देकि आप किसी आईने को इप के चूरे से रग़ कर साफ कर सकते हैं
- 12:58–12:59उसे चमका सकते हैं
- 12:59–13:03आप किसी सपेट फुल पर रंग च़ाकर उसे लाल कर सकते हैं
- 13:03–13:05कुकि उन्कि उन्मे बडलाव समबव है
- 13:05–13:09लेकिन आत्मा तो पहले से यह थो शो प्रतीषत शुद और पूरन है
- 13:09–13:11आप उस में कुई नया गुन जोडी नी सकतें?
- 13:11–13:12रूकिए रूकिए
- 13:12–13:14अगर आत्मा पहले से शुद द है
- 13:14–13:17और मेरे कर्वो से मोख्ष पयदा नहीं हो सकता
- 13:33–13:35अपका ये गुस्सा और सवाल बहुत सवावेक है.
- 13:35–13:39लेकिन वाचस्पति मिश्र ये नहीं के रहीं के कर्म भेकार है.
- 13:39–13:42वे बस कर्म की जग़ तैकर रहीं है.
- 13:42–13:45वे कहते है के कर्म मोखष का सीथा कारन नहीं है.
- 13:45–13:49बलकि वे एक दूरस्त सहायक, याने रिमोट आद है.
- 13:49–13:52रिमोट आद, मतलव उ पीचे से काम करते हैं
- 13:52–13:56जी, कर्म आपके मन को आपकी बुद्दी को साफ करते हैं
- 13:56–13:59वे ग्यान के उगने के लिए एक उपजाउ जमीन तगयार करते हैं
- 13:59–14:02बिना केछ जोते आब भीज नहीं बो सकते
- 14:02–14:03आप, ये तो है
- 14:03–14:05खेदिका ही एक बहुत सुन्दर उदारड है,
- 14:05–14:08खेद जोतने से पहले एक बच्च्ड़े को शांथ करना परता है,
- 14:08–14:11उसे प्रषिक्षिट करना परता है ताकि वो हल कीच सके.
- 14:11–14:13अचा, तो हमारे जो अच्चे कर्म है,
- 14:13–14:18वे हमारे चंचल मन्रूपी बच्छडे को शान्त करते हैं
- 14:18–14:20ताकि वो ग्यान का हल कीच सके.
- 14:20–14:21भिलकुल सही.
- 14:21–14:23आप जब जबने अच्छे करम करेंगे,
- 14:23–14:25अपके मन की अषुद्दिया उतनी कम हूंगी,
- 14:25–14:26आपके अंदर वेराग जयाएगा,
- 14:26–14:28आपका मन शान्त होगा.
- 14:28–14:32उस शान्त मन रूपी साफ आइने मेही ग्यान का अख्स दिखाई देगा.
- 14:32–14:34अग, समज रही हूँ
- 14:34–14:36मोखश किवल और किवल ग्यान से ही मिलेगा
- 14:37–14:39कर्म सर्फ उस ग्यान के लिया आपको तग्यार करते है
- 14:39–14:41या बहुत ही गेरा विचार है
- 14:41–14:44कर्म आपको मन्जिल नहीं देते
- 14:44–14:47लेकिन वे आपकी आखो से वेह पट्टी कोल देते हैं
- 14:47–14:49जिस से आप मनजल को देक सकें
- 14:49–14:52अब ये सब फिलोस्टी तो बहारी है
- 14:52–14:57लेकिन मैं वहपिस गजेंदर ताकूर के उस मेठली अनुवाद पर आना चाहूंगी
- 14:57–14:58जी बलकुट!
- 14:58–15:01विंकी इस पूरी चर्चा का अस्ली हीरो वो अनुवाद ही है
- 15:01–15:04इतनी जेटल तारकिग बहसों को
- 15:04–15:06उनोने आम भाशा में कैसे उतारा?
- 15:06–15:08यही इस अनुवाद का जादू है
- 15:08–15:11उनोने अद्ध्यास या आनिरवच्नी एंगे से
- 15:11–15:16पारिभाशिक शब्डों को जस्कातस रखा, ताके दर्षन की गंभीरता कम नहो.
- 15:16–15:21लेकिन उनोने संसक्रित के लंग में उल्जे हुए वाख्यों को,
- 15:21–15:24चोटे स्वाबहावेक मेठली वाख्यों में तोर दिया.
- 15:24–15:24आँ.
- 15:24–15:27और सबसे कमाल की बात है, मूहावरों का प्रेजोग.
- 15:27–15:29आप ने भी मूहावरों पर द्यान दिया.
- 15:29–15:32जैसे जोग सत्तू में नमक नहीं.
- 15:32–15:33बिलकुल.
- 15:33–15:36मतलप किसी काम में बहुती कम प्रेआस लगना.
- 15:36–15:38ये मूहावरा किसी मठ में नहीं,
- 15:38–15:41सीदे गाँ की च्वापाल पर बोला जाता है
- 15:41–15:43और वो आंदों की कतार वाला मुहावरा?
- 15:43–15:46आगर आब गलत गयान के पीछे बाग रहे हैं
- 15:46–15:50तो ये वैसा ही है जैसे एक आंदा दूसरे आंदे का हाद पकल कर चल रहा हो
- 15:50–15:51और दूनो गद्धे में गरें
- 15:51–15:56या जब कोई विरोदी कोई अईसा तरक देता है जिसका कोई सर पैर ना हो
- 15:56–15:59तो उसे खारिच करने के लिए मुहावराई स्तमाल होता है
- 15:59–16:02तीर के दांत गिनने जैसी बेकार की पुच्ताच
- 16:02–16:04आप ये बहुती मजदार है
- 16:04–16:08ये दिखाता है कि फिलोस्टिफी को हमेशा बोरिंग और सीरिस होने कि ज़रूरत नहीं है
- 16:08–16:12इस में इक स्थानिये गंद है, इक स्वाद है
- 16:12–16:15बाशा और दरशन का एक बहुत इंदिल्चस्प किस्था भी है इस में
- 16:15–16:19इक द्रविडव्यक्ति की कहानी है, जिसे आर्यों की भाशा नहीं आती थे
- 16:19–16:20आ, वो कहानी
- 16:20–16:23एक दूट आकर एक पिता को खबर देता है
- 16:23–16:26देव्दद तुमारे हैं पुत्र पैदा हूँँँँँँ
- 16:26–16:28वो द्रविडव्यक्ति वो बाशा बिलकुल नहीं समचता
- 16:28–16:35लेकिन वो उस पिता का खिला हुए चेहरा देकता है, उसकी खुषी से ख़डे हुए रोंग्टे देकता है,
- 16:35–16:39और बिना एक बी शब्द समजे वो पुरी कहानी समच जाता है.
- 16:39–16:42ये कहानी दर्षन के एक बहुत गेरे सिद्दान्त को समजाती है,
- 16:42–16:46ये बताती है के शब्दों का काम सरफ आदेज देना या कोई काम करवाना नहीं
- 16:46–16:47तो और क्या है?
- 16:47–16:51शब्द उस सत्ट्या को उस वास्त्विक्ता को भी उजागर कर सकते है
- 16:51–16:52जो पहले से वहा मोगजुद है
- 16:52–16:55यानी ब्रहम शब्द सर्फ इषारे है
- 16:55–16:57सथते तो अपने आप में अनुबहव किया जाने अला है
- 16:57–17:00तो अगर हम इस पूरी चर्चा को समेटें
- 17:00–17:03तो ये अनुवाद हमे ये बताता है
- 17:03–17:05कि मैठली जैसी को एक शेट्री अबहाशा
- 17:05–17:08सरफ लोग गीतों, विवाह के गानों
- 17:08–17:11या पुरानी कत्छाँ तक सीमित रहने किले नहीं बनी है
- 17:11–17:12बलकुल नहीं
- 17:12–17:13बिसक्षम है
- 17:13–17:17वाचस पती मिष्च्र ने जो ज्यान संसक्रित के उचे महलो में रख्खा ता
- 17:17–17:22इस अनुवाद ने उस ज्यान की गंगा को मित्फिला के आम राजपत तक लाग दिया है
- 17:22–17:25ज़हां कोई बी आम अंसान उस में दुपकी लगा सकता है
- 17:25–17:28और यही से बहुती गेरा सवाल पडा होता है
- 17:28–17:29जिस पिशाए दम सब को सुचना चाहिये
- 17:29–17:30वो क्या?
- 17:30–17:32हम जानते है कि हमारी भाशा
- 17:32–17:35हमारी सुचने के तरीके को गेराई से प्रभविद करती है
- 17:35–17:41तु क्या सद्यों पुराने किसी दर्षन को, किसी फिलोस्टी को अपनी मात्र भाशा मे पनना?
- 17:41–17:44तु क्या सद्यों पुराने किसी दर्षन को, किसी फिलोस्टी को अपनी मात्र भाशा मे पनना?
- 17:44–17:47या फिर अपनी खुद की मिट्टी की भाशा
- 17:47–17:50उस दर्षन को एक सुक्छी किताभी तियोरी से निकाल कर
- 17:50–17:54हमारे जीवन का एक जीता जागता सच बना देती है
- 17:54–17:56क्या हमारी अपनी लोग भाशा ही
- 17:56–17:58असल में वो चाभी है
- 17:58–18:00जो हमारे भीतर मोजुद अग्यान किताले को
- 18:00–18:02अदाले को हमेशा के लेग रहाग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग लेग रहाग लेग लेग रहाग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग �
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ज़र आजिए जब हम किसी मेटिकल डाएक्नोसिस की बात करते हैं, तो हम एक हाज्ट्टरा की सतिक्ता की उमीट करते हैं, मतलब अईमाजन की जी आप एक एक एक स्वरी फिल्न देख्डे हैं. बलकुल, हद्टी तूटी है, या नहीं, ये साव दिख जाता हैं. आई, एक साफ सफेट लाईन दिख जाएगी ये बलकल बाईनरी है, है ना या तो हड़ी तूटी है, या फिर नहीं तूटी है, एक दं बलाक औग़ वाइट और सच को हूँट तो ये बहुत सुकुन देता है हमें आफी चीजे पसंद हैं, जिने हम आसानी से अलग गलग बोक्स में डाल सकें सईबात है कुकि जब चीजने स्पष्ट होती हैं तो हमार दिमाक सुरक्षित मैंसुस करता है हम हर चीजन को मापना चाते हैं तोलना चाते हैं लेकिन खाँब हो अगर हम शरीर की इन हड़्यों को चोडगर मानव चेतना और वास्तविक्ता की दुन्या में कदम रक्छे, आचानक से वो एकस्च्रे मशीन काम करना बन्गर देती है? हाँ, वाईनरी काम नहीं करता. बिलकुन नहीं. क्या सच है? और क्या हमारा अपना ब्रम, इसके भीच की लकीरे सुव दून्डली नहीं होती, बलकी पूरी तरह से गायब हो जाती हैं. और आज हम इसी दून्डली दून्या की एक बहुत गेहरी चर्चा करने वाले हैं. और ये चर्चा बहुत दिल्चास फोने वाली है. आँ, हम नोवी सदीके एक महान दाशनिक के विशारो में गोता लगारे है, जिनों ने वास्तविक्ता और ब्रम के भीज के फरक को देफाईन क्या, वाचस्पती मिष्र, और सबसे दिल्चस बात यहे है, कि हम उनके सबसे जटिल संस्क्रिद ग्रन्त भामती को समजेंगे वो भी गजेंद्र ताक्कृर दूरा किये गये एक मैठलिय अनुवाद के जर्ये ये कोई मामुली बात नहीं है दिके भामती असल में आदी शंक्राचार्ये के ब्रम्म्सुत्र भाश्व्यपार लिखिगगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेईग अद्वेद्वेदान्त का इक स्वतन्त्र और इत्ना व्यवस्तित निर्मान है, कि इसके आदार पर अद्वेदान्त के भीतर है, लिकिन ये जो गरन्त है बहामती ये उनकी जिन्गी की अन्तिम और सबसे परिपक्त व्रच्ना मानी जाती है ये सर्फ शंक्राचारे के विचारों की एक और व्याख्या नहीं है अच्छ! तो ये कुछ अलाग है बलकुल, ये अपने आप में अद्वैद्वेदान्त का एक स्वतन्त्र और इतना व्यवस्तित निर्मान है, के इसके आदार पर अद्वैद्वेदान्त के भीतर ही एक पूरा का पूरा नया संप्रुदाए बन गया, जिसे बहामती सकूल कहाजाता है. अर यही पर गजेंदर चाकुर के इस मेठली अनुवाद की अहमीद समझ में आती है मतलब सद्वियोंता कि ये बारी बरकं, फिलोस्टी सर्फ संस्क्रित की दिवारो में कैद रही है आगा आगा, इसे समझना किबल कुछ विद्वानो तक ही सीमिद ता बही तो, लेकिन इस गरन्त को वापिस मैठली मिलाना, जो की वाचस्पती मिष्र की अपनी जमीन की मित्ला की बाशा है, ये सर्व गिताप चापना नहीं है, मुझे लकता है, ये दरशन को आम लोगो की रसोई, उनके केट, खल्यानों की बाशा में वापिस लोटाना है सही का अपने, किसी भी बोद्दिक समपदा का उसकी अपनी लोग बाशा में लोटना एक तराकी एतिहासिक वापसी है ये फिलोऽपी को अक्कादमिक कमरो से आजाद करने जैसा है बिल्कुल! तो चलिए, इस आजाद हुई फिलोस्टिपी के सबसे एहम हिस से पर बात करते हैं. अगर हम दून्या को समजने की कोशिष कर रहे हैं, तो सबसे पहली समस्या यह आई कि हम चीजों को अकसर गलत समचते हैं. वाचस पती मिश्र अद्यास की बात करते हैं अद्यास अद्यास मतलब सुपर्म्पुजिशन किसी एक चीस पर किसी दुस्री चीस का अखस या गोड �theb dena आजे से अंदेरे में पडीवी रस्सी को साम् समज लेना ये आम अँईन्सानो की बहुत भून्यादी फित्रत है, अपने पिछले अनुबहों की रील को, हमेशा वर्तमान की सक्रीन पर पलेकरते रहते हैं. और अनुवाद में इसे जिस तरह ग्रामीन जीवन से जोडा गय, वो कमाल है. चानवरों का एक उदारन आता है अस में. अगर कोई जान्वर किसी इन्सान को हात में दन्डा लिये देकता है, तो वो तुरन्त वहां से बहाक खडा होता है. तुरन्त वहां से बहाक खडा होता है. तुरन्त वहां से बहाक खडा होता है. आप दर के मारे. अन्सान हाथ में हरी गास लेकर ख़ा हो, तो जान्वर पास आजाता है. ये क्या है? ये सर्फ जान्वर कर रिफलेक्स नहीं है. ये अद्ध्यास है. एक दम सतीक बात पक्डी आपने. जान्वर अपने पिछले अनबभमो के आदार पर उस्पल को जजज कर रहा है. उसे दन्दे से चोटक रानुबव है और गाज से काने का और सचकों तो हम अपने नसान भी हर वकती यही कर रहे हैं हम भी तो यही करते हैं जैसे अगर हमारा किसी पिछले रिष्ते में दिल तूता हो तो हम उस पुराने ट्राूमा या दर को अपने किसी नहीं अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अई अद्वाइत्वेदान्त का जो सिद्धान्त विस्तापित करते है, उसे अनिर्वच्नीया ख्याती कहाथी कहाथा है. अनिर्वच्नीया, मतलब जिसे शब्डो में बयान ना किया जासके. जो नहापूरी तरा सच है, नहापूरी तरा जूट. जी. मतलब जिसे शब्डो में बयान ना किया जा सके जो ना पूरी तरा सच है ना पूरी तरा जूट जी लिकिन एक मिनेट रुक्ये ये तोडा गोल्मोल जवाब ने लग्रा कोई भी चीज या तो सच होती है या जूट वो दोनो के भीच की या दोनो से परे कैसे हो सकती है? ये गोल मोल नहीं है यह यह यादारत है देके इसे म्रिगत्रिष्ना यानी रेगिस्तान में दिकने वाले पानी के उदारन्से समचते हैं मिराज आप मिराज चिल चलाती दूप में दूर रेगिस्तान में पानी दिकता है अगर वो पानी पूरी तरा से सत्ते होता तो कोई भी प्यासा आदमी जाकर उस लेहरे मारते पानी को पीलेता भिलकुल अपनी प्यास भुजा लेता लेकिन वो आपसा नहीं कर सकता कुकि पानी वाह आई है नहीं इसलिये वो पानी सत्ते न न नहीं है तीके, पानी सत्ते नहीं है, मान लिया लेकिन क्या वो पानी पूरी तरान से असत्ते या शून्न्य है अगर वो एक दम जूट है, जैसे गदे के सींग होते हैं तो वो हमें साथ साथ दिखाए ही क्यो देरा है हम, पोईंट है कम से कम उस पल के लिए देखने वाले को तो वहां पानी होने का पुरा अनुबहो रा है इसलिये उसे पुरी तरा असचते भी नहीं कया सकतें तो कुंकि वो काम नहीं आता वो सच नहीं है और कुंकि वो दिखाए देता है इसलिये वो जूज भी नहीं है तो भी ब्रम दोनों के बीचका एक ब्रम है, जिसे दिफाईन नहीं किया जासकता. बिलकुल. लेकिन, अगर ब्रम इतना हावी है, तो मैं विरोदी दार्षनिकों, जिने पूर्व पक्ष कहाथा है, उनकी तरव से एक बहुती विवहारिक सवाल पुचना चाहूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ तो बज़े सामने रखखवा गडा साफ दिख़ा है तो मैं उसपे संदेइ है कियों करूं? अनुबहव से बड़ी कोई किताः फोडी होती है? विरोदी पकष्ष का सबसे बड़ा हत्यार यही है उनका भी यही कैना ता के जब हमारा अनुबहव एतना साफ है तो तमहरे शास्त्र और फिलोस्वी क्या कर लिंगे? आ, बिलकुल एक बहुती मशुर तन्स है के हाजारो शास्तर मिलकर भी गड़े को कप्रा नहीं बना सकतें यहनी जो प्रत्टक्ष दिख्रा है उसे तमहरी किताबे नहीं चुतला सकती तो वाच्यस्पती मिश्रस का जवाब कैसे देते हैं? कि योंकी ये तर्क तो बहुत मस्वूथ है? वरे यसका जवाब बहुत ही शान्दार वेंगिसे देते हैं. वे नयाएकों के इस बरोसे पर तंज कसते हुए कहते हैं. बेचारे ज्यान की कि खिस्मत है? कि वो जूट के सहरे भी सच तक पहुट जाते है. मतलब ये तोडा गेरा हो गया. मतलब ये कि जो हमें प्रत्टक्ष अनुबहव लकता है, वो अकसर हमारी सीमित बुद्दी का दोखा होता है. वाचस पती मिष्र सिद्द करते है, ये जो मैं का अनुबहव है, जिस पर हम इतना इत्राते है, वो असल में शरीर और आतमा का एक ब्रमित मिष्रन है. शरीर जो जजड है, और आतमा जो चेतन है. भिल्कुल, आतमा कभी विश्य, यान अबज्यक नहीं हो सकती, अब बहार देक सकें आत्मा हमेशा गयाता है देखने वाली है तो अगर यह मैं एक ब्रहम है और दून्या में आग्यान या अविद्या का पर्दा पडा हुए तो एक बहुत बडा लोगिकल सवाल क़डा होता है क्या? यह आग्यान अखिर है किसको? मडलव, इस ब्रम का शिकार कोन है? और इसी एक सवाल ने अद्वाइत वेदान्तो को दो बरी शाक्फाँ में बाट दिया था. एक है विव्रन स्कूल और दूसर है हमारा भामती स्कूल. अच्छा. विव्रन् स्कूल केता है के ये जो आग्यान है, इसका आश्रे सीथा ब्रम्हे. मदल ब्रम्ह मेही आग्यान है. लेकिन अग्यान ब्रम्ह मेहे, तो ब्रम्ह पुरन और शुद्ध कैसे रहा? ये तो विरोदधा भास होगया है ना? और भामती स्कूल इसी कमी को दूर करता है. वातिस पती मिष्र कहते हैं, के अग्ज्यान का निवास्तान जीव में है. यानी हम और आप. जीव में. अग्ज्यान जीव के अंदर रहता है. और वो अग्ज्यान ब्रम्म को एक विषेए के रूप में, इक अब्ज्यक्त के रूप में देखता है. बामती स्कूल इसे अववच्छेदवाद कहता है. अववच्छेदवाद का मतलब है, के जीव असल में अग्ज्यान दवारा सीमित किया ब्रम है. इसे तोडा और आसान करते है. मुजे वो गधाकाश और महाकाश भाला उदारन बहत सतीक लकता है अस पर. आप वो बहत प्रसिध दे. इसे ऐसे समजजे एक अनन्त विशाल अकाश है वो महाकाश है. अब अब अगर आप एक खाली मिट्टी का ग़ा लेकर आए, तो उस गड़े के अंदर भी अकाश है, हमें लकता है कि गड़े के अंदर का अकाश, गड़े के अकार का है, चोटा है, सीमित है, लेकिन सच्छ्मे क्या अकाश सीमित हूए है? नहीं, अकाश तो वैसा ही है, पस हमें उस गड़े की वजेखे वो सीमित लग रहा है. बहुत उम्दा उदारन, पूगड़ा हमारा शरीर मन और बुद्दी है. अगर कोई चोटा बच्चा खुले आस्मान को देखे और कहें कि ये तो नीले रंके नीलम पत्धर का एग बहुत बच्चा कर अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अप देखे अगर दोगा बाद करेंगे तो जोगा दोगा थो जोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा दोगा द तुब आप दोगार बादा था वोडारन यहां के से पिट बड़ता है? वोडारन बताता है कि जब नाविक नाव चलाता है, तो किनारे पिछे चुटते है, वोडारन बादा वोडारन यहां के से पिट बड़ता है. नहीं ये कोई आजी चीजे जिसे अनुश्टानो से शुद्ध किया जा सकें और सबसे बडी बात मोखष कोई मनजल नहीं है जहां आप चलकर पहुट सकें मोखष कोई मनजल नहीं है ये तो बहुत ही ये खुन्टर इंटूटिओटिव है तुब नाव और नाविक भाला वो उदारन यहा कैसे फिट बट बट था है? वो उदारन बताता है कि जब नाविक नाव चलाता है, तु किनारे पीछे चूटते है, लेहरे बडलती है, और नाव नदी के भीचो भी चान्त हिस्थे में पाँईजाती है. अग! अगर नाविक ने उस शान्त हिस्से को बनाया है नहीं वो हमेशा से वही ता नाव चलाने का करम सर्फ आप को वहातक ले गया उसने उस जगे को पैडा नहीं किया अग या वो गले के हार वाला उदारन किसी वियक्ती के गले में उसका कीमती हार पहले से है बूल गया है. बलकुल ये बूथ से टीक है. वो पागलों की तरा पूरी दून्या में उसे दून्डा है. फिर को यह खर उसे बताता है कि आरा, हार तो तुमारे गले में है. जब वो हार उसे मिलता है, तो क्या वो हार नया है. नहीं, हार तो हमेशा वही ता, बस उसका अग्यान दूर हूँआ है यही कारन है के आत्मा पर आपके किसी भी कर्म का सीदा असर नहीं होता देकि आप किसी आईने को इप के चूरे से रग़ कर साफ कर सकते हैं उसे चमका सकते हैं आप किसी सपेट फुल पर रंग च़ाकर उसे लाल कर सकते हैं कुकि उन्कि उन्मे बडलाव समबव है लेकिन आत्मा तो पहले से यह थो शो प्रतीषत शुद और पूरन है आप उस में कुई नया गुन जोडी नी सकतें? रूकिए रूकिए अगर आत्मा पहले से शुद द है और मेरे कर्वो से मोख्ष पयदा नहीं हो सकता अपका ये गुस्सा और सवाल बहुत सवावेक है. लेकिन वाचस्पति मिश्र ये नहीं के रहीं के कर्म भेकार है. वे बस कर्म की जग़ तैकर रहीं है. वे कहते है के कर्म मोखष का सीथा कारन नहीं है. बलकि वे एक दूरस्त सहायक, याने रिमोट आद है. रिमोट आद, मतलव उ पीचे से काम करते हैं जी, कर्म आपके मन को आपकी बुद्दी को साफ करते हैं वे ग्यान के उगने के लिए एक उपजाउ जमीन तगयार करते हैं बिना केछ जोते आब भीज नहीं बो सकते आप, ये तो है खेदिका ही एक बहुत सुन्दर उदारड है, खेद जोतने से पहले एक बच्च्ड़े को शांथ करना परता है, उसे प्रषिक्षिट करना परता है ताकि वो हल कीच सके. अचा, तो हमारे जो अच्चे कर्म है, वे हमारे चंचल मन्रूपी बच्छडे को शान्त करते हैं ताकि वो ग्यान का हल कीच सके. भिलकुल सही. आप जब जबने अच्छे करम करेंगे, अपके मन की अषुद्दिया उतनी कम हूंगी, आपके अंदर वेराग जयाएगा, आपका मन शान्त होगा. उस शान्त मन रूपी साफ आइने मेही ग्यान का अख्स दिखाई देगा. अग, समज रही हूँ मोखश किवल और किवल ग्यान से ही मिलेगा कर्म सर्फ उस ग्यान के लिया आपको तग्यार करते है या बहुत ही गेरा विचार है कर्म आपको मन्जिल नहीं देते लेकिन वे आपकी आखो से वेह पट्टी कोल देते हैं जिस से आप मनजल को देक सकें अब ये सब फिलोस्टी तो बहारी है लेकिन मैं वहपिस गजेंदर ताकूर के उस मेठली अनुवाद पर आना चाहूंगी जी बलकुट! विंकी इस पूरी चर्चा का अस्ली हीरो वो अनुवाद ही है इतनी जेटल तारकिग बहसों को उनोने आम भाशा में कैसे उतारा? यही इस अनुवाद का जादू है उनोने अद्ध्यास या आनिरवच्नी एंगे से पारिभाशिक शब्डों को जस्कातस रखा, ताके दर्षन की गंभीरता कम नहो. लेकिन उनोने संसक्रित के लंग में उल्जे हुए वाख्यों को, चोटे स्वाबहावेक मेठली वाख्यों में तोर दिया. आँ. और सबसे कमाल की बात है, मूहावरों का प्रेजोग. आप ने भी मूहावरों पर द्यान दिया. जैसे जोग सत्तू में नमक नहीं. बिलकुल. मतलप किसी काम में बहुती कम प्रेआस लगना. ये मूहावरा किसी मठ में नहीं, सीदे गाँ की च्वापाल पर बोला जाता है और वो आंदों की कतार वाला मुहावरा? आगर आब गलत गयान के पीछे बाग रहे हैं तो ये वैसा ही है जैसे एक आंदा दूसरे आंदे का हाद पकल कर चल रहा हो और दूनो गद्धे में गरें या जब कोई विरोदी कोई अईसा तरक देता है जिसका कोई सर पैर ना हो तो उसे खारिच करने के लिए मुहावराई स्तमाल होता है तीर के दांत गिनने जैसी बेकार की पुच्ताच आप ये बहुती मजदार है ये दिखाता है कि फिलोस्टिफी को हमेशा बोरिंग और सीरिस होने कि ज़रूरत नहीं है इस में इक स्थानिये गंद है, इक स्वाद है बाशा और दरशन का एक बहुत इंदिल्चस्प किस्था भी है इस में इक द्रविडव्यक्ति की कहानी है, जिसे आर्यों की भाशा नहीं आती थे आ, वो कहानी एक दूट आकर एक पिता को खबर देता है देव्दद तुमारे हैं पुत्र पैदा हूँँँँँँ वो द्रविडव्यक्ति वो बाशा बिलकुल नहीं समचता लेकिन वो उस पिता का खिला हुए चेहरा देकता है, उसकी खुषी से ख़डे हुए रोंग्टे देकता है, और बिना एक बी शब्द समजे वो पुरी कहानी समच जाता है. ये कहानी दर्षन के एक बहुत गेरे सिद्दान्त को समजाती है, ये बताती है के शब्दों का काम सरफ आदेज देना या कोई काम करवाना नहीं तो और क्या है? शब्द उस सत्ट्या को उस वास्त्विक्ता को भी उजागर कर सकते है जो पहले से वहा मोगजुद है यानी ब्रहम शब्द सर्फ इषारे है सथते तो अपने आप में अनुबहव किया जाने अला है तो अगर हम इस पूरी चर्चा को समेटें तो ये अनुवाद हमे ये बताता है कि मैठली जैसी को एक शेट्री अबहाशा सरफ लोग गीतों, विवाह के गानों या पुरानी कत्छाँ तक सीमित रहने किले नहीं बनी है बलकुल नहीं बिसक्षम है वाचस पती मिष्च्र ने जो ज्यान संसक्रित के उचे महलो में रख्खा ता इस अनुवाद ने उस ज्यान की गंगा को मित्फिला के आम राजपत तक लाग दिया है ज़हां कोई बी आम अंसान उस में दुपकी लगा सकता है और यही से बहुती गेरा सवाल पडा होता है जिस पिशाए दम सब को सुचना चाहिये वो क्या? हम जानते है कि हमारी भाशा हमारी सुचने के तरीके को गेराई से प्रभविद करती है तु क्या सद्यों पुराने किसी दर्षन को, किसी फिलोस्टी को अपनी मात्र भाशा मे पनना? तु क्या सद्यों पुराने किसी दर्षन को, किसी फिलोस्टी को अपनी मात्र भाशा मे पनना? या फिर अपनी खुद की मिट्टी की भाशा उस दर्षन को एक सुक्छी किताभी तियोरी से निकाल कर हमारे जीवन का एक जीता जागता सच बना देती है क्या हमारी अपनी लोग भाशा ही असल में वो चाभी है जो हमारे भीतर मोजुद अग्यान किताले को अदाले को हमेशा के लेग रहाग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग रहाग लेग लेग रहाग लेग लेग रहाग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग लेग �