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Bhamati_Chatuhsutri_Vada_Maithili_Animated.mp4

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:02शंक्धा रजत उत्तराथ
  2. 0:02–0:05चारी सुत्र
  3. 0:05–0:15वाचस्पती मिष्रक भामतिक चतुह सुत्री भाग, अठातो ब्रहमजिग्यासा सतत्तु समन्वयात दھरी क एक्ता मूलिक नाते रुपान्तरन
  4. 0:15–0:27अग्ता दार्शनिक वादनातक, शास्त्रिय संस्क्रित वादक शाली में, अग्ता प्रस्तावना, चारी अंक आ अग्ता उप्संहार में शंक्हा रजत का अगिला साँज.
  5. 0:27–0:36भामतिक तर्क पर आदारित यी मुल ग्रन्तक अनुवाद नहीं अच्छी, अपितु एक ता स्वतन्त्र स्रिजनात्मक क्रिती थे.
  6. 0:36–0:47एही साजक पात्र, सुत्रदार क्मन्च्सन्चालक, वाचस्पती मिष्रक तीकाकार, वादक यस्मान, सिद्धानती.
  7. 0:47–0:58मी मान सक कर्मकान्டी, जैमिनिय परम्पराक द्रेद विध्वान, जे मानेध छतिजे वेदक एक मात्र प्रयोजन कर्मक विधान थेक, एही साजक मुख्षे पूर्वपक्षी.
  8. 0:58–1:04आख्षेपक, शंकी, पच्छिला साजक वेध संषेस्वर, सबहाक वोर सपुछ्निहार.
  9. 1:04–1:09एक्ता यूवा सन्यासी जे आश्रम क्रमक प्रष्न लाका आयल अची
  10. 1:09–1:12शिष्यक वाचस्पतिक शिष्य
  11. 1:12–1:16परिषद सबहाक काना फूसी
  12. 1:16–1:19स्थान औए वाज्षाला अगिला साज
  13. 1:19–1:23द्वार लगक दोरी आशंक अखन हो अथी पडल अची
  14. 1:23–1:25जेना काल ही चोडल गेल चल
  15. 1:25–1:44मुदा आई मेच पर एक्ता नव वस्तुराखल अची, तार्पत्रक एक्ता पोठी, खूजल, जकर पहिल पन्नापर चारी चोट सूत्र लिखल अची. प्रस्तावना. सूत्रदार प्रवेष कराइत अची, पोठी दिस इशारा करई.
  16. 1:44–1:54खाल ही राती एही सबहामे शंक आचानिक कता भेल, भ्रम की खेख, आव उकर उतर संसारक विष्मे कहेत अची.
  17. 1:54–2:08मुदा काल हिक वाद एक्ता वचन पर समाप्त भेल चल जे अखन दھरी निभाओल नहीं गेल जज समपून ध्रिष्जगत आत्मापर अद्द्यस्त थेक शंख पर चानीजगा, ता उही आत्माक, उही ब्रहमक ज्यान कत्तिसा आउत.
  18. 2:08–2:13आखी उक्रा नहीं देखेत अची, अनुमान उक्रा नहीं आपेट अची.
  19. 2:13–2:17बचल केवल एक ता द्वार, शब्द वेद.
  20. 2:17–2:23प्रस्थान, आंक प्रत्फम, गरद्निक हार,
  21. 2:23–2:29प्रत्फम सुत्र अथा तो ब्रह्मजिग्यासा, तक्हन ते ब्रह्मच्जिग्यासा.
  22. 2:29–2:33वाचस्पति आसीन छत्फी
  23. 2:33–2:38एक्ता यूवा सन्यासी प्रवेष करईत अचीड प्रनाम करई.
  24. 2:38–2:45आचार्य, हम एक्ता प्रश्नला का आयल छीजे हमर गुर्कुल मे आगी जका पस्रल अची.
  25. 2:45–2:49सुत्रक पहल्षव्द अत्त्त्तिक्त्खन्
  26. 2:49–2:53हमर कर्मकान्दी सहपात्ही कहेथ चत्तिक्त्खन्
  27. 2:53–2:58माने दर्मजिग्यासाक बाद पहिने पुरा मीमान्सा पडू
  28. 2:58–3:03सब यग्य सीखो तक्कन् कतुजाक ब्रहमक विचारक अदिकार भितत
  29. 3:03–3:11अम पुच्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्टिक की ब्रहम जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्टक पह्रा अच्टि?
  30. 3:11–3:21एक्ता प्रष्नजे हरेक पीदि में आव आदीजका पस्रैत अच्टि, आज्टि हरेक पीदि में एक ही जल्स मिजा उल्जाइत अच्टि.
  31. 3:21–3:51पहिने अथ कचारू समबव अर्थ कनू जेना शास्त्रिय विधित्ख आनन्तर्य एकर तुरक्बाद अदिकार आब आरम्भ होईत अथ अथ शब्दानुशासन् अथ योगानुशासन् मंगल शुब दूनी जेना शंक्वा नगाडाक आ अपेखषिच पूर्वता जे पहिने
  32. 3:51–4:00जेना कोनो आर काजे आनल जलबरल गयलक दर्षन शुभ मानल जाएत अची, यद्धिपी उ-ोही हे तु आनल नहीगे.
  33. 4:00–4:07आस्ली प्रषन थिक की अथ कर्म मी मान साक आननतरय कहेत अची?
  34. 4:07–4:10कहेत अची आखेबाके चाही.
  35. 4:10–4:19सुनु हमर पक्ष पूरा भल्सर, कि एक तंकाल ही राती आहा हमर सहदर्मी के पुरा भाजई देने रही आहाम उही शिष्टा चारक अदिकारी ची.
  36. 4:19–4:25वेदद्यायन समाप्त कैने विद्यार फीक सोचा दुई मार्ग, धर्म विचार आब्रहम विचार.
  37. 4:25–4:33दर्म विचार पहिने की एक तंकर्म फल्ड़ अची स्वर्क, संतती, सम्रद्दी आप फलक, हे तु प्रव्रित्ती स्वाभ्विक.
  38. 4:33–4:38अब्रहम ज्यान से हो, जब हेतत तंकर्मक शुद्द्दिसक छित निर्मल भेने
  39. 4:38–4:46तने क्रम भान्हल अची पहिने कर्म, तक्हन ज्यान, जेना पहिने केच जोतल जाएत अची तक्हन भीज.
  40. 4:46–4:55खेटक उप्मा हम्रा प्रिय अची ते उक्रे सवुत्तर देप मुदा पहिने एक ताभेद जक्रापर इस सम्पून अंक्तिकत.
  41. 4:55–4:58दर्मा ब्रहम्मे की अंतर
  42. 4:58–5:05दर्म साद्यत्तिक कयल्जाय्वाला भविष्षक वस्तु यग्याई स्वर्काल ही
  43. 5:05–5:10ब्रह्मा सिध्ध्धिक पहिनिस्ऽ सदासध प्राप्त
  44. 5:10–5:15आई एभेद सम्पुन क्रम्वाद के काटी दैत अची
  45. 5:15–5:28जे वस्तु कयल जाएत अची, उकर चारी गती उद्पती, जेना अतासर रोती, विकार, जेना धान्सन चार, संसकार, जेना उख्रिपर जल छिडकभ, प्रापती, जेना गाई दूभ,
  46. 5:28–5:33मोख्ष ब्रहम भाव एही चारुमे सकिचु नहीं.
  47. 5:33–5:43उ उपन्न नही होएत, बदलल नही जाएत, मानजल नही जाएत, आप राप तो नही काएजाएत, की एक तंवो पहिन ही सब राप्त अची.
  48. 5:43–5:49जेना अपन करदनि में पडल हार, जक्रा भिस्रिक लोक गर भरी ताकेत अची.
  49. 5:49–6:19ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  50. 6:19–6:21पर्दा हता उल जाएत आची
  51. 6:21–6:25पर्दा हतेनिहार नाच नहीं कराएत आची
  52. 6:25–6:28मुदा नाच उक्रे बिनु नहीं देखाएत आची
  53. 6:28–6:32आजके उ कहाए जे क्रम अनिवारि आची
  54. 6:32–6:34जे सन्यास के वल्ग रहस्तक बाद
  55. 6:34–6:36तन्जाबाल श्रुती ताड आची
  56. 6:36–6:43यदरेव विर्जेद तदरेव प्रवरजेद जाही दिन वेराग्य उपजई, उही दिन निक्लीजा.
  57. 6:43–6:49ब्रहम्चर येसं सुजे सन्यास, श्रूती स्वया द्वार खोलने अची.
  58. 6:49–6:53आख सहबाथी के कहबनी द्वार पर पहरा नही अची,
  59. 6:53–6:57केवल एक्ता देलीस अची आवकर नाम अची आठहते
  60. 6:59–7:01अतहा सूत्रक तो सर शवत
  61. 7:02–7:03अखर आपत
  62. 7:05–7:14चारी सादन जे बिनु जिग्यासा जिग्यासे नही नित्यानित्यक विवेक लोक पर लोकक बोग सं विरात शम्द्मादी समपती आम उमुख्षा
  63. 7:14–7:22आए ते पूर्वपक्ष एक्ता रस्गर आपती अनैत अची, जे हम पूरा स्वाद्सं सूनाएप वेराग्यकिए.
  64. 7:22–7:27माच में कांत अची तनकी लोक माच छोडी दैत अची,
  65. 7:27–7:30कांत भीचिक मासु खायत अची,
  66. 7:30–7:35दान में भूसी अची, किसान दान नहीं फेकःत अची,
  67. 7:35–7:40भिखारिक दरे के अ भानस बन नहीं कर अची
  68. 7:40–7:46तहिना सन्सार में दूहक मिलल अची तंकी दूहक शोडू शुख भोगु
  69. 7:46–7:49अए कर उत्तर
  70. 7:49–7:55उत्तर एक ही वाख्यमे माचक कांत अलग अची ते भीचल जाएत अची
  71. 7:55–8:25ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  72. 8:25–8:36शम्दमक पल्ट, जेना शान्त आस दाल बाचा हर में जोतै जोग होईत अची, चन्चल मन कोनो जुः नहीं उठासकैत अची.
  73. 8:36–8:41एक ता अन्तिम गिरह, वाचस पती आई शब्दक गिरह थेख.
  74. 8:41–8:46ब्रह्मजिग्यासा एही समास में ब्रह्मना कोन विबखती.
  75. 8:46–8:59किचु प्राज्चीन व्याख्याकार कहत, चति चतुर्ति, ब्रहमक, हेतु जिग्यासा, तक्हन ब्रहमाजिग्यासाक विषै नही, प्रयोजन भेल आधाक समपून विषारक विषै ब्रहमा थिक इभ्हवन खसी पडक.
  76. 8:59–9:11आई एह उस्तान थिक जतै हम अपनासं पहिलुक तीका कार स्खूलिक असहमत फीशास्त्र में इमान्दारी इही में फीख जे मतभेद नुकाोल नहीं जाए.
  77. 9:11–9:18समास शष्ती तत पूरुष्तिक ब्रहमक जिग्यासा कर्मनी शष्ती ब्रहमा विशाय.
  78. 9:18–9:48वो उग़ा वो उग़ावाग, वो उग़ावाग, वो उग़ावाग, वो उग़ावाग, वो उ़वाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ाव
  79. 9:48–9:53अंक दुटिये माला अदहागा
  80. 9:53–9:58दुटिये सुत्रक जन्माद्यस्ययत है जक्रास एही जगत के जन्मादी
  81. 9:58–10:03नीक आचार्यजिग्यासाक अदिकार सिध
  82. 10:03–10:08मुदा जिग्यासाके कर ब्रहमक अब्रहमा की
  83. 10:08–10:12एता हम अहाके कालहिक उही शंक्खपर वापस गीचव
  84. 10:12–10:19वस्गीचव जदेक वस्तू हम जनेच्छी गेल गाच्छ देः सब सीमित ज़द नश्वर
  85. 10:20–10:25ब्रहम के आहा एही सबख्विप्रीट कहेच्छी अनन्त चेतन नित्यः
  86. 10:25–10:27तक्चन वोकर लक्षन की देब
  87. 10:28–10:31वोकर अपन कोनो गुन हम्रा परिच्ट नहीं
  88. 10:31–10:34आपरिच्ट कोनो गुन उही में आपुवे नहीं।
  89. 10:34–10:39बिनु लक्षनक विचार से अनहार में कारी बिलाडि तक नाई।
  90. 10:39–10:44अबाद्राएनक दोसर सुत्र छीक एही अनहार में दीप थेक,
  91. 10:44–10:49जन माद्यस्य यता जक्रास एही जगत्क जन्म, स्ति आबहंग.
  92. 10:49–10:57द्यान दिद लक्षन ब्रह्मक अपन गुन्स नही देल गेल उ देल गेल जगत कद्वारे ततस थ्छिल्षन्सा.
  93. 10:57–11:08जेना सुर्यक गती सोजे नहीं देखाएत अची, मुदा भोर मे पूभ आ साज्ज मे पच्छम, ठाम ठाम वोकर पहुचप, वोकर गतिक चिनह बनी जाएत अची.
  94. 11:08–11:16तहिना जगत जे ब्रहमस उप्जल, ब्रहमक चिनह थेक, यद्यपी ब्रहमा स्वया अखिसन उचल.
  95. 11:16–11:18जन्मादी जन्म आदी
  96. 11:19–11:21की की गनब एही आदी में
  97. 11:22–11:28यासकक निरुक्त चैविकार गन्बैत अची जन्म, अस्तित्व, व्रिद्द्धी परिनाम अपक्षैट नाश
  98. 11:29–11:31सूत्रकार तीनेटा की एक लेलनी
  99. 11:31–11:38की एक तन चहो तीन में समाजाएत अची, आशास्तर फिजूई करची नहीं कराट अची.
  100. 11:38–11:50व्रिद्धी जन्म में कप्रा दूसुछ स्पाग भेल माने दूसुछ तक नव जन्म पर इनाम से हो जन्म में सूना कंगन बनल नव अवस्थाख उदे अपक्षै नाश में.
  101. 11:50–11:59बचल तीन उपत्ती स्त्ति प्रलड़े आ यह तीन श्वृपिमे कहल अची ते यह तीन अभीष्ट
  102. 11:59–12:12वानी लेल हो लक्षन, मुदा आब अस्ली प्रष्ने इशुत्र की फिट, की एक ता अनुमान फिख जगत करता अची कार्य होई बाक कारने ध्यल जगा
  103. 12:12–12:24ज़ह तनकाल हुका बोद फेर बजाँ, उ एही अनुमान्स लडी लेता, आहाए ब्रहमातर कक तराजू पर लटकल रहेत, जताय उद्यन आगंगेषक इश्वर लटकल अची.
  104. 12:24–12:29आए एही अंककक रड़े ख्ट, ते दीरे सा सूनु.
  105. 12:29–12:33नहीं की सुत्र स्वत्ट्ट्र अनुमान नहीं थेग.
  106. 12:33–12:39जगत कर अच्ना देखिक, नाम्रूप्स भान्तल, अंगिनत कर ताबूक तास भरल,
  107. 12:39–12:44देश काल निमित्त साएहन सदलजे मन्स कलपनो कत्हिं कारी हरिन केवल कोनो-कोनो
  108. 12:44–12:55वगलीग गर्ब वर्षाख पहल्गर जन्सम यी सब देखिख बुद्धिमान कारनक अप्कल अवष्षे लगगे अची जेना कुमार भिनु गेल नहीं.
  109. 12:55–13:00मुदा वेदान्त मे उ अप्कल प्रमान नहीं सहायक छिख.
  110. 13:00–13:10वाद्यान्त्वाख्यस्भ्ब्के माला जका दागा में गुतभ, फूल्ष्रूतिक खिक, यतोवा इमानी भुतानी जायनते.
  111. 13:10–13:15तद ब्रहमा भ्रिगुवरुन सम्वाद तैट्तीरीए.
  112. 13:15–13:18सुत्र के वल दागा खिक.
  113. 13:18–13:48ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  114. 13:48–14:18अद्रम् में विकल्क छलगत अची अदिरातर में शोडषी पात्र उठाव वा नहीं उठाव सूर्यो दिस पहिने हों करुवा बाद दूनु विधि तूनु मान्य की एक तंकर्म पुरुष्तन्त्र थेक, कैनिहारक अदिरात्र अदिरात्र अदिरात्र अदिरात्र अदिरात
  115. 14:18–14:26वस्तु वस्तु तन्त्र थेक, उ जेहन अची तेहने अची, हमर इच्छासव उ इमहर-ोमहर नहीं होएद.
  116. 14:26–14:30अब्रहमग्यान वस्तु यान थेक, विदھی नहीं.
  117. 14:30–14:35इवाक्यमोन राखु चारिम अंक मेई तर्वारी बनत.
  118. 14:35–14:39अंक त्रीतिये, नर्टकक दे है.
  119. 14:39–15:10अग, त्रीतिये, नर्तकक दे है, त्रीतिया सुत्र, शास्त्रयोनित्वात, शास्त्रक योनी होई बाक कारने, तेसर सुत्र, चोट अची, आचार्य, मुदा, दुमहा, भुज्यात अची, शास्त्रयोनित्वात, के अपड़्हत अची, ब्रहमा, शास्त्रक योनी खिख, वे
  120. 15:10–15:19तुनु आदुनु के क्रम्सं सुनु कि एक तं तुनु मिलिक एक तुस्राके दारन करैत अची जेना महराबक दूई पाठर.
  121. 15:19–15:34पहल आर्थ रिगवेदादी विशाल शास्त्रराशी अंगिनत विद्याक शाखासव, भरल दीप जकासव वस्तुप प्रकाषक एकर स्रोथ ब्रहमात्धिक, आस्रोथ होईबाक कारने ब्रहमक सर्वगता सिद्ध.
  122. 15:34–15:39निम्सोज आची ग्रन्त्कारक ज्यान द्रन्त्स पैग होएत आची
  123. 15:39–15:45पानेनी व्याकरन रचलनी की पानेनेग ज्यान आच्ताद्याई में अंतागेल
  124. 15:45–15:56नही कुशिलक रस् दूद आगुडक मिठासक भेद जी जनैत अची, वानी नहीं कही पबैत अची, वकताक ज्यान सदा वचन सागु.
  125. 15:56–16:04तनजकर वचन वेद थेक, एही महान सथाक नहीं हष्वास जका, ओकर ज्यानक सीमा के बान हत.
  126. 16:04–16:12आए एती, वाचस्पती, हमर गरक सबस पुरान दीवाल ताड अची, आहम देखः चाहब आहा एक्रा कोना गिराभी.
  127. 16:12–16:14वेदक करता
  128. 16:14–16:16वेद अपारुषे थिक
  129. 16:16–16:18अनादी पाध परमपरा
  130. 16:18–16:26दिवाल गिराएब नहीं मित्र, हम उक्रा सरकाएब आहा देखफ जे सरकलाक बादो उठाद्रे हैत.
  131. 16:26–16:35पहिने एक ता बात जे आहुके माने पडद, आहा वरन के नित्यक है ची गध धूनी सदा एक मानी ले.
  132. 16:35–16:40मुदा वाक्यड, पदको विषेश क्रम को अनुपूर भी,
  133. 16:40–16:44क्रम्तं उच्चारन मे बनेत अच्ची आ उच्चारन अने त्यः
  134. 16:45–16:48तने वेद वाख्यक अभी व्यक्ती हर भेर नव
  135. 16:48–17:03आब सुनु हमर प्रिय उप्मा, नाज सिखनिहार शिष्य गुरुक देहक गती देखहत आचीया आपन देहमे उही क्रमक अनुकरन करहत आची, गुरुक उगती स्वयन शिष्यक देहमे नही चली अबैत आची.
  136. 17:03–17:09तहिना वेद पात, हर पीदी नव उच्चारन, पुरान क्रमक अनुकरन में.
  137. 17:09–17:17तकन प्रष्न प्रल्यत बात, जकन सब कंठ मून, सब स्म्रिति लुप्त, नव स्रिष्टि में हुक्रम के देखाओत.
  138. 17:17–17:30जेमनि कहत चति स्रिष्टिप रलः हो इते नही अची, व्यासक अनुयाई कहत चति सर्वग्य परमात्मा, ध्यार स्रिष्टिमे भेद के पूर्वस्रिष्टिक उही क्रम्मे फेर रचाइत चति.
  139. 17:30–17:40अदूनु में मेल एताय अची अपारुषेएक कवर्त तूनु पक्ष्के स्विकारिय रुक में एध्भे थिक रक्षिताक पूर्न स्वतन्त्रताक अबहां.
  140. 17:40–17:48इश्वरो स्वछ्छन्द नही रचाइत च्छती, उ पूर्वक्रमक अनुगामी च्छती, जेना आहाक पात परमपरा.
  141. 17:48–17:53अन्यम अतर रहेत अची, कोनो स्रिष्ट में ब्रह्महत्या पुन्या नहीं होएत,
  142. 17:53–17:58न अश्वमेध पाप जेना अगिन कहीो नहीं भिज्बैत अची,
  143. 17:58–18:01जल कहीो नहीं जरबैत अची.
  144. 18:01–18:07अदोसर अर्थ, शास्त्र ब्रह्मख योनी प्रमान अर्थ.
  145. 18:07–18:10दोसर आर्थ पहिलुक द्हाल थेक
  146. 18:10–18:24जके अ भुजने हो जे, जन्मादी सुत्र अनुमान चल, तै इसुत्र उकर भ्हम कातैत अची ब्रह्मक असादारन स्वरुपक जान के वल शास्त्रसच ना अख्फिसं नतर्कसा.
  147. 18:24–18:29शास्त्र ब्रहमक योनी ठेक खोकर एक मात्र प्रमान अग्वार
  148. 18:29–18:35आ थीक एताएत मित्र लोकनी इसाज आपन अस्ली रन्भूमी पर पहुचल,
  149. 18:35–18:43कि एक तन जब ब्रहमक एक मात्र प्रमान वेद ठेक ता आब वेदक प्रयोजन पर निरने होएद अनिवार्य.
  150. 18:43–18:51आओी प्रशन पर हमर सोजा भैसल जैमनिक इशिश आपन समप्रदायक समपून सेनाला का ताडचत्छती.
  151. 18:51–18:54आख भारी मित्र.
  152. 18:54–19:04पूरा भल्स आउ काल ही हम नयाएक के कहने रहिनी जे दूर्गक केंद्र चोडनिहार के भाहरी दिवाल समर्पित करबाक आवष्षकता नही.
  153. 19:13–19:17वो तुत सुत्र क्ततु समन्वयात, मुदाओ समन्वयक्कारने
  154. 19:18–19:22मी मान्सक कर्म कान्दी सबहाक मद्यमे आबैट्ख्छती
  155. 19:22–19:27दीपूच कयल जाएत अछी इसाजक सबस्पैक वाध थेग
  156. 19:27–19:32तक्ञन सुनु जमनेक सम्झुन पक्ष्च् भिनु कातल छान्तल
  157. 19:32–19:50वेदक प्रयोजन एक कर्म में प्रव्रिट्ती कराईप आमनायस्य क्रियार्थध्वात वेद क्रियार्थ थेख कि एक तंषब्दक सार्थक्ता प्रयोजन में अची आप रयोजन प्रव्रिट्ति गेहिंग काना फूसी पक्ष पूरा भल्स्ताध भेल अची
  158. 19:50–19:59एक्ता दुर्ग इमान्दारीस बनावल, आहम एक्रा उत्भे इमान्दारीसश, पात्धर-पात्धर उतारव.
  159. 19:59–20:10पहल पातर, सिद्धक, कतनिष्फल, सुत्रक, उत्तर, एक ही शब्द्वे अची समन्वयात, की एक तन सब्धावे दान्तवाक्य एक ही तात्पर्यमे मिलात अची.
  160. 20:10–20:23सदेर सोमेद मगर आसीत है सोमै, आरमभमे सक मात्रच्छल, एक मेवाद्वितियम, एक अद्वितिय, आत्मावा इद्मेक, एवागर आसीत, आरमभमे आत्मे मात्र.
  161. 20:23–20:29उपक्रम्स उच्संहार दھरी एक ही सुर आतात पर्यनिरनयक नियम थिक,
  162. 20:29–20:35जे कहल गेल अछी तक्रा चोडिक, जे नहीं कहल गेल तकर कलपना करभ दोष थिक.
  163. 20:35–20:40सम्फुन उपनिषत ब्रहमा कहेत अछी विधि आहा जोडव छी.
  164. 20:40–21:10ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  165. 21:10–21:17द्रविड्त्त अगा के पुट्रभेल आफी देव्द्तक दे पुल्कित आख्यामो फुलल कमल जका खिलल.
  166. 21:17–21:19द्रविड्त की देख्लक?
  167. 21:19–21:25कोनो क्रिया नहीं देव्द्त उठेक कतू नहीं गेल, किचु नहीं काएलक.
  168. 21:25–21:29उठे कत्फु नहीं गेल, किचु नहीं का इलक.
  169. 21:29–21:35केवल एक्ता सिध समाचार, पुत्र भेल आ आनन्दक जवार.
  170. 21:35–21:40उही पुलक्स द्रविड भूजी गेल, एही वाक्य में कोनो प्री आर्थ चल.
  171. 21:40–21:44तंकहू सिध्ख कत्फन निष्फल.
  172. 21:44–22:02अजज़ पुत्र भेल इछोट सिद्धि एतेक फल दैत अची तन्तो स्वयाउ अबहे अजर आम्रित ब्रहमाचे इजद्धि सुनीजकर अविद्याक गिरहे कटैट चैक, वोकर फल की कम.
  173. 22:02–22:11तक्हन आत्माद्रष्ट्व्या जका विदेरुप वाख्यत की करब, देख बाक चाही इता आगे ठिख.
  174. 22:11–22:19आग्याक रूप ठिख, आग्याक बल नही, जेना पाथर पर चलाओल चूरी, आकार चूरीक दार भोत.
  175. 22:19–22:30इवाके कोनो नव करतविय नहीं लादात अची इकेवल बाहर मोब लोग के जे स्वबहाववष विषय दिस भहेत अची गूमाक भीतर दिस भहभेत अची.
  176. 22:30–22:35नदीक दार के बान हमोड़ात अची नव जल नहीं उपच बै.
  177. 22:35–22:52अस्लिकाज उही वाक्यक थेक जे मोडलाक बात भेटैत अची तत्वम्सी आव वाक्य विधि थेक की सिध्भोदध एकर निने आवाक अपन उही भेट्सा होएत जे हम दो सर अंक में राकने रही आव आब उ तर्वारी म्यान्सा निकलत.
  178. 22:52–23:22ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  179. 23:22–23:29तने ब्रह्मा जानु कहियो विध्ख विषे भहिये नहीं सकैत अची जानव आग्यासन नहीं प्रमान सहोईत अची.
  180. 23:29–23:37अप्रमान उपनि शद्वाक्या सोजा ताड अची चमकैत द्याल जका उजजर इजोट मे.
  181. 23:37–23:42मुदा हमर अनुवा पत्ती अखन हू जीवेट अची.
  182. 23:42–23:46अद्वापत्ती अखन हु जीवेत अची
  183. 23:46–23:51तक्वम्सी सुन्लाक बादो भाइशोग जहनाक तहनाक ताओ ज्यान भेलकत है
  184. 23:51–23:55कि एक तन सुनब अजानब मे उत्वे दूरी अची जत्भे भीज आगाच मे
  185. 23:55–24:10वो तबे दूरी अची जक्भे भीज आगाच में, श्रवन पहिल देग, तकर बाद मनन तर कसा अर्ठक द्रिधि करन, तकर बाद निदिद्यासंद् धारावाहिक भावना.
  186. 24:10–24:22साजक जुर्जुरी में थूथ आकी मनुशे यी संशे जाभे गुर्या रहल अची, ताभे निष्चे नही आशनशे सहित सुनल वाके ज्यान नही ज्यानक आरम्ब्धिग.
  187. 24:22–24:34जेना संगीतक विद्यारती पहल दिंष ज्रिश्भ सूनैत अची, वर्षक अभ्यासक बात चिनहत अची कानुए, स्वरुए, मुदा साख्षाख्षाटकार अभ्यास्सं.
  188. 24:34–24:44अजगन साख्षात्कार होएत अची, तकन की होएत अची से चारी नकार सचुनु की एक तंए है ही अद्ध्यायक शिक्र थिग.
  189. 24:44–24:50मोख्ष उपन्वस्तु नही जे उप्जआत अची से नश्थ होएत अची द्यालजका.
  190. 24:50–24:55विकार नहीक दूद्सन दही भेल वस्तु नित्ये नहीं रहें
  191. 24:55–25:06संसकार नहीं संसकार दूई रंगक गुन जोडब, जेना अदूलर सस्पतिक रंगब दोश हताएप, जेना इंताक चूनस दरपन मानजब,
  192. 25:06–25:15ब्रहम्मे न किचु जोडल जासकेत अची, न औहिमे किचु हते बाजोग अची, दरपन माजने मनी नहीं चमकेत अची,
  193. 25:15–25:23सनानो पन्यनक शुद्दी जीवक अपादेक शुद्दी थेक, जेना नाएकाक सुगन्द होकर सकी पर चडल भुजाएत अची,
  194. 25:23–25:28आप्राप्ती से हो नही आए तै हमर सबस प्रिय उप्मा नाहक यात्री
  195. 25:28–25:29आप्राप्ती से हो नही आए एताय हमर सबस प्रिय उप्मा नाहक यात्री
  196. 25:29–25:31आप्राप्ती से हो नही आए एताय हमर सबस प्रिय उप्मा नाहक यात्री
  197. 25:31–25:41वहात अची किनारा, फेन, लहरि सब पाचु चुतट जाएत अची आयातरी पहुचाइत अची उही निस्तरन, शान्त, स्वच्ष, स्थिर मद्यमे.
  198. 25:42–25:48कि उ मद्यनव भेटल, नहीं जलतन सबतरी चल, उ केवल लहरि सहतल.
  199. 25:48–25:54ब्राह्मा सर्वगत्त्तिक, नित्यप्राब्त, प्राब्तिक भ्रम् केवल लह्रिक छल,
  200. 25:54–26:00चारुगति बन्नेक एही चारिक अद्रिक्त पाचम कोनो भात नहीं जाहिसं
  201. 26:00–26:05कर्म मोक्ष में पैसआए, तने ज्यान के छोडी कर्मक चाहो मोक्ष में नहीं
  202. 26:05–26:10अजे जीववत जागध यी जानिगे
  203. 26:10–26:13अजे जीववत जागध यी जानिगे
  204. 26:13–26:16अजे जीववत जागध यी जानिगे
  205. 26:16–26:19अजे जीववत जागध यी जानिगे
  206. 26:19–26:22अजे जीववत जागध यी जानिगे
  207. 26:22–26:25अजे जीववत जागध यी जानिगे
  208. 26:25–26:34अग्रा चोरक कुंदर अबजार मे चलत अच्छी, खाएख पीबैत अच्छी, आभीतर निस्तरं जी वन्मुक्त.
  209. 26:34–26:41आव उही दिन, मित्र, एक ता आश्चर यहोएट अच्छी जक्रा हम एही साजक अंतिम वाक्य बनाएप,
  210. 26:41–26:56आप रह्मास्मि एही ज्यान में सब विदिया सब प्रमान समाप भाजाईत अची, प्रमान प्रमाता सापेच, जते प्रमाता भाव गलल, उते प्रमान से हो विष्रान्त जेना भोर भेने दीपक काज सदीजाईत अची.
  211. 26:56–27:01दीप जूत नहीं चल त्राती में होए सर्तिचल.
  212. 27:11–27:41ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  213. 27:41–27:43अप्संहार
  214. 27:43–27:45सुट्रदार वापस आबैत आबिद आबिद
  215. 27:45–27:47उमेज परक पोती उट्बैत आबिद आबार लगक शंक्खक बगल मे राखिद आबिद आबिद
  216. 27:47–27:51काल ही शंक, हम्रा सब के सिखहोने चल जे ब्रम की थेख
  217. 27:51–27:58उमेज परक पोठी उठबैत आद्वार लगक शंक्खक बबगल मे राखी दैत आछी
  218. 27:58–28:04काल ही शंक हम्रा सब के सिखाणे चल जे श्वरम की खेख
  219. 28:04–28:12आई इपोठी सिखालक जे श्वरमसन निकल बाक रस्ता कते लिखल आए औरस्ता आग्या नही खेख, समाचार खेख
  220. 28:12–28:20आाके पुत्र भेल एद भे सुनिक देव्ददद देध पूलकित भागेई चल, दूत कोनो काज करए नहीं कहने चल.
  221. 28:20–28:30उपनिषद उहने दूत ख्छ, आा उकर समाचार एहिसम पैग, जक्रा आा जनम भरी ताकेत रहल हूँ से आाक अपन गरदने में पडल हार ख्छ.
  222. 28:30–28:37चारी सुत्र चारी देग चल जिग्यासाक अदिकार, ब्रहमक लक्षन, शास्त्रक प्रामानियक,
  223. 28:37–28:41आतात पर्यक समन्वै आचारू देग एक ही देहलीस दिस,
  224. 28:41–28:46जते सुन्निहार भूजीजाएत अची जे दूत जकर चर्चाका रहेल चल से आन के अनही.
  225. 28:46–28:56ज़हा आई राती पोठी आपन मोन मे लाका जारे है जी, तं उक्रा माला जका राखभ, फूँश्र तिक्ठिक, दागा सुत्रकारक आगुतभ.
  226. 28:56–29:00गुतभ हरेक पदनिहार के अपने पडएक चै.
  227. 29:00–29:04सब पात्र प्रस्थान कर अच्छ फी.
  228. 29:04–29:12दिप सबसा अंत्मे बाहर जाएत अछी, आशंक आपो थी, संगे संग द्वार लक चुटर रही जाएत अछी.
  229. 29:12–29:19एही रूपांतरन पर एक ता टिपपनी, उपर नात्यरू पिट्तरक, संकुचित आप उनहस्वरत रूक मे,
  230. 29:19–29:49अदि पूर्वपक्षिद्रिष्टान्च्छ्रिंख्ला आमदूविश्मिष्रित अन्नकुतर शोमश्रूतिक गूनार्थ बाच्धुव्मा आप प्रश्वाद्द्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्वि
  231. 29:49–29:52ब्रह्मना समास में चतुर्ती पक्षक्ख्ख्ण्द्ण्
  232. 29:52–29:57द्वितिया सुत्र में ततस्त्हलक्ष्ण् सूर्यक्तिक् उप्मा
  233. 29:57–30:02यासकक च्या भ्हाव विकारक्त्रे में अंतर्भाव, जगत्वैच्ट्र्यक्वर्न्न,
  234. 30:02–30:04वज्द्याज़्द्रब्रुष्टन्त्र भेदक्स्तापना
  235. 30:04–30:06त्रेतिया सुत्रमे दुनू व्याख्या, ब्रहमा शास्त्रक कारन,
  236. 30:06–30:08पानेक ध्रिष्तान्त इक्षुक्षिर गुड्रसक अनिर्वच्नियता,
  237. 30:08–30:10शास्त्र ब्रहमक प्रमान आनुपुर विक अनित्यता,
  238. 30:10–30:15त्रेतिया सुत्र में दूनू व्याख्या, ब्रहमा शास्त्र कारन,
  239. 30:15–30:19पानेनेक ध्ष्टान्त इक्षुक्षिर गुद्रसक अनिर्वच्नियता,
  240. 30:19–30:23शास्त्र ब्रहमक प्रमान, आनू पूर वीक अनित्यता,
  241. 30:23–30:32अपारुषे कवव्यसम्मत अर्थ तथा चतुर्थ सुत्र में मीमान्सक् क्रियार्थ तवबक्षक् पूर्नबल् स्तापना प्रतिपत्तिविदि अर्थवाद युपा हवनियक ध्रिष्तान्त, तद्वम्सी सुन्लाक बाधो भ्यशोक अनुभवापत्ति,
  242. 30:32–30:38तत्था चतुर्त् सुत्र में मीमान्सक् क्रियार्त्वबक्षक् पुनबल्स्तापना,
  243. 30:38–30:42प्रतिपक्तिविधि, अर्थ्वाद्, युपा हवनियक्द्रिष्तांत,
  244. 30:42–30:45तत्वम्सी सुन्लाक् बाधो भाएशोकक अनुभवापत्ति,
  245. 30:45–30:52अद्हुलस्पतिक, दर्पन्मनी, नाएकास्की, श्रवन्मन निदिध्यासन आशजजादिक अभ्यास्द्रिष्टान्त,
  246. 30:52–30:58जीवन्मुक्ती, सापक केंचुल, आव आव रह्मास्मी में सर्वप्रमान विष्रानती.
  247. 30:58–31:13नायात्रीक उप्मा, अधहुलस्पतिक, दर्पन्मनी, नायकासकी, श्रवन्मन निदिद्यासन आशजजादिक अभ्यास्द्रिष्तान्त, जीवन्मुक्ती, सापक केंचुल, आँ आभ्रहमास्मी में सर्वप्रमान विष्रान्ती.
  248. 31:13–31:20इसम्वाद ग्रन्तक तरकसन रचनाक चारूकात निर्मित एकता मौलिक स्रिजनात्मक रचनात्ठिक
  249. 31:20–31:40इस्व्क्रत्वा अंग्रेजी अनुवाद जक्रापर इ आदारत अच्छी, उक्रा उद्द्रत नहीं कराइत अच्छी, आमी माशक, आक्षेपक, यूवा सन्याशी, आशिष्ष्य सन्युक्त पात्रत्धिक जे तीका स्वया उठाओल आउप्तरत मतके स्वर दैत अच्छी,

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शंक्धा रजत उत्तराथ चारी सुत्र वाचस्पती मिष्रक भामतिक चतुह सुत्री भाग, अठातो ब्रहमजिग्यासा सतत्तु समन्वयात दھरी क एक्ता मूलिक नाते रुपान्तरन अग्ता दार्शनिक वादनातक, शास्त्रिय संस्क्रित वादक शाली में, अग्ता प्रस्तावना, चारी अंक आ अग्ता उप्संहार में शंक्हा रजत का अगिला साँज. भामतिक तर्क पर आदारित यी मुल ग्रन्तक अनुवाद नहीं अच्छी, अपितु एक ता स्वतन्त्र स्रिजनात्मक क्रिती थे. एही साजक पात्र, सुत्रदार क्मन्च्सन्चालक, वाचस्पती मिष्रक तीकाकार, वादक यस्मान, सिद्धानती. मी मान सक कर्मकान्டी, जैमिनिय परम्पराक द्रेद विध्वान, जे मानेध छतिजे वेदक एक मात्र प्रयोजन कर्मक विधान थेक, एही साजक मुख्षे पूर्वपक्षी. आख्षेपक, शंकी, पच्छिला साजक वेध संषेस्वर, सबहाक वोर सपुछ्निहार. एक्ता यूवा सन्यासी जे आश्रम क्रमक प्रष्न लाका आयल अची शिष्यक वाचस्पतिक शिष्य परिषद सबहाक काना फूसी स्थान औए वाज्षाला अगिला साज द्वार लगक दोरी आशंक अखन हो अथी पडल अची जेना काल ही चोडल गेल चल मुदा आई मेच पर एक्ता नव वस्तुराखल अची, तार्पत्रक एक्ता पोठी, खूजल, जकर पहिल पन्नापर चारी चोट सूत्र लिखल अची. प्रस्तावना. सूत्रदार प्रवेष कराइत अची, पोठी दिस इशारा करई. खाल ही राती एही सबहामे शंक आचानिक कता भेल, भ्रम की खेख, आव उकर उतर संसारक विष्मे कहेत अची. मुदा काल हिक वाद एक्ता वचन पर समाप्त भेल चल जे अखन दھरी निभाओल नहीं गेल जज समपून ध्रिष्जगत आत्मापर अद्द्यस्त थेक शंख पर चानीजगा, ता उही आत्माक, उही ब्रहमक ज्यान कत्तिसा आउत. आखी उक्रा नहीं देखेत अची, अनुमान उक्रा नहीं आपेट अची. बचल केवल एक ता द्वार, शब्द वेद. प्रस्थान, आंक प्रत्फम, गरद्निक हार, प्रत्फम सुत्र अथा तो ब्रह्मजिग्यासा, तक्हन ते ब्रह्मच्जिग्यासा. वाचस्पति आसीन छत्फी एक्ता यूवा सन्यासी प्रवेष करईत अचीड प्रनाम करई. आचार्य, हम एक्ता प्रश्नला का आयल छीजे हमर गुर्कुल मे आगी जका पस्रल अची. सुत्रक पहल्षव्द अत्त्त्तिक्त्खन् हमर कर्मकान्दी सहपात्ही कहेथ चत्तिक्त्खन् माने दर्मजिग्यासाक बाद पहिने पुरा मीमान्सा पडू सब यग्य सीखो तक्कन् कतुजाक ब्रहमक विचारक अदिकार भितत अम पुच्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्टिक की ब्रहम जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्टक पह्रा अच्टि? एक्ता प्रष्नजे हरेक पीदि में आव आदीजका पस्रैत अच्टि, आज्टि हरेक पीदि में एक ही जल्स मिजा उल्जाइत अच्टि. पहिने अथ कचारू समबव अर्थ कनू जेना शास्त्रिय विधित्ख आनन्तर्य एकर तुरक्बाद अदिकार आब आरम्भ होईत अथ अथ शब्दानुशासन् अथ योगानुशासन् मंगल शुब दूनी जेना शंक्वा नगाडाक आ अपेखषिच पूर्वता जे पहिने जेना कोनो आर काजे आनल जलबरल गयलक दर्षन शुभ मानल जाएत अची, यद्धिपी उ-ोही हे तु आनल नहीगे. आस्ली प्रषन थिक की अथ कर्म मी मान साक आननतरय कहेत अची? कहेत अची आखेबाके चाही. सुनु हमर पक्ष पूरा भल्सर, कि एक तंकाल ही राती आहा हमर सहदर्मी के पुरा भाजई देने रही आहाम उही शिष्टा चारक अदिकारी ची. वेदद्यायन समाप्त कैने विद्यार फीक सोचा दुई मार्ग, धर्म विचार आब्रहम विचार. दर्म विचार पहिने की एक तंकर्म फल्ड़ अची स्वर्क, संतती, सम्रद्दी आप फलक, हे तु प्रव्रित्ती स्वाभ्विक. अब्रहम ज्यान से हो, जब हेतत तंकर्मक शुद्द्दिसक छित निर्मल भेने तने क्रम भान्हल अची पहिने कर्म, तक्हन ज्यान, जेना पहिने केच जोतल जाएत अची तक्हन भीज. खेटक उप्मा हम्रा प्रिय अची ते उक्रे सवुत्तर देप मुदा पहिने एक ताभेद जक्रापर इस सम्पून अंक्तिकत. दर्मा ब्रहम्मे की अंतर दर्म साद्यत्तिक कयल्जाय्वाला भविष्षक वस्तु यग्याई स्वर्काल ही ब्रह्मा सिध्ध्धिक पहिनिस्ऽ सदासध प्राप्त आई एभेद सम्पुन क्रम्वाद के काटी दैत अची जे वस्तु कयल जाएत अची, उकर चारी गती उद्पती, जेना अतासर रोती, विकार, जेना धान्सन चार, संसकार, जेना उख्रिपर जल छिडकभ, प्रापती, जेना गाई दूभ, मोख्ष ब्रहम भाव एही चारुमे सकिचु नहीं. उ उपन्न नही होएत, बदलल नही जाएत, मानजल नही जाएत, आप राप तो नही काएजाएत, की एक तंवो पहिन ही सब राप्त अची. जेना अपन करदनि में पडल हार, जक्रा भिस्रिक लोक गर भरी ताकेत अची. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ पर्दा हता उल जाएत आची पर्दा हतेनिहार नाच नहीं कराएत आची मुदा नाच उक्रे बिनु नहीं देखाएत आची आजके उ कहाए जे क्रम अनिवारि आची जे सन्यास के वल्ग रहस्तक बाद तन्जाबाल श्रुती ताड आची यदरेव विर्जेद तदरेव प्रवरजेद जाही दिन वेराग्य उपजई, उही दिन निक्लीजा. ब्रहम्चर येसं सुजे सन्यास, श्रूती स्वया द्वार खोलने अची. आख सहबाथी के कहबनी द्वार पर पहरा नही अची, केवल एक्ता देलीस अची आवकर नाम अची आठहते अतहा सूत्रक तो सर शवत अखर आपत चारी सादन जे बिनु जिग्यासा जिग्यासे नही नित्यानित्यक विवेक लोक पर लोकक बोग सं विरात शम्द्मादी समपती आम उमुख्षा आए ते पूर्वपक्ष एक्ता रस्गर आपती अनैत अची, जे हम पूरा स्वाद्सं सूनाएप वेराग्यकिए. माच में कांत अची तनकी लोक माच छोडी दैत अची, कांत भीचिक मासु खायत अची, दान में भूसी अची, किसान दान नहीं फेकःत अची, भिखारिक दरे के अ भानस बन नहीं कर अची तहिना सन्सार में दूहक मिलल अची तंकी दूहक शोडू शुख भोगु अए कर उत्तर उत्तर एक ही वाख्यमे माचक कांत अलग अची ते भीचल जाएत अची ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ शम्दमक पल्ट, जेना शान्त आस दाल बाचा हर में जोतै जोग होईत अची, चन्चल मन कोनो जुः नहीं उठासकैत अची. एक ता अन्तिम गिरह, वाचस पती आई शब्दक गिरह थेख. ब्रह्मजिग्यासा एही समास में ब्रह्मना कोन विबखती. किचु प्राज्चीन व्याख्याकार कहत, चति चतुर्ति, ब्रहमक, हेतु जिग्यासा, तक्हन ब्रहमाजिग्यासाक विषै नही, प्रयोजन भेल आधाक समपून विषारक विषै ब्रहमा थिक इभ्हवन खसी पडक. आई एह उस्तान थिक जतै हम अपनासं पहिलुक तीका कार स्खूलिक असहमत फीशास्त्र में इमान्दारी इही में फीख जे मतभेद नुकाोल नहीं जाए. समास शष्ती तत पूरुष्तिक ब्रहमक जिग्यासा कर्मनी शष्ती ब्रहमा विशाय. वो उग़ा वो उग़ावाग, वो उग़ावाग, वो उग़ावाग, वो उग़ावाग, वो उ़वाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ावाग, वो ग़ाव अंक दुटिये माला अदहागा दुटिये सुत्रक जन्माद्यस्ययत है जक्रास एही जगत के जन्मादी नीक आचार्यजिग्यासाक अदिकार सिध मुदा जिग्यासाके कर ब्रहमक अब्रहमा की एता हम अहाके कालहिक उही शंक्खपर वापस गीचव वस्गीचव जदेक वस्तू हम जनेच्छी गेल गाच्छ देः सब सीमित ज़द नश्वर ब्रहम के आहा एही सबख्विप्रीट कहेच्छी अनन्त चेतन नित्यः तक्चन वोकर लक्षन की देब वोकर अपन कोनो गुन हम्रा परिच्ट नहीं आपरिच्ट कोनो गुन उही में आपुवे नहीं। बिनु लक्षनक विचार से अनहार में कारी बिलाडि तक नाई। अबाद्राएनक दोसर सुत्र छीक एही अनहार में दीप थेक, जन माद्यस्य यता जक्रास एही जगत्क जन्म, स्ति आबहंग. द्यान दिद लक्षन ब्रह्मक अपन गुन्स नही देल गेल उ देल गेल जगत कद्वारे ततस थ्छिल्षन्सा. जेना सुर्यक गती सोजे नहीं देखाएत अची, मुदा भोर मे पूभ आ साज्ज मे पच्छम, ठाम ठाम वोकर पहुचप, वोकर गतिक चिनह बनी जाएत अची. तहिना जगत जे ब्रहमस उप्जल, ब्रहमक चिनह थेक, यद्यपी ब्रहमा स्वया अखिसन उचल. जन्मादी जन्म आदी की की गनब एही आदी में यासकक निरुक्त चैविकार गन्बैत अची जन्म, अस्तित्व, व्रिद्द्धी परिनाम अपक्षैट नाश सूत्रकार तीनेटा की एक लेलनी की एक तन चहो तीन में समाजाएत अची, आशास्तर फिजूई करची नहीं कराट अची. व्रिद्धी जन्म में कप्रा दूसुछ स्पाग भेल माने दूसुछ तक नव जन्म पर इनाम से हो जन्म में सूना कंगन बनल नव अवस्थाख उदे अपक्षै नाश में. बचल तीन उपत्ती स्त्ति प्रलड़े आ यह तीन श्वृपिमे कहल अची ते यह तीन अभीष्ट वानी लेल हो लक्षन, मुदा आब अस्ली प्रष्ने इशुत्र की फिट, की एक ता अनुमान फिख जगत करता अची कार्य होई बाक कारने ध्यल जगा ज़ह तनकाल हुका बोद फेर बजाँ, उ एही अनुमान्स लडी लेता, आहाए ब्रहमातर कक तराजू पर लटकल रहेत, जताय उद्यन आगंगेषक इश्वर लटकल अची. आए एही अंककक रड़े ख्ट, ते दीरे सा सूनु. नहीं की सुत्र स्वत्ट्ट्र अनुमान नहीं थेग. जगत कर अच्ना देखिक, नाम्रूप्स भान्तल, अंगिनत कर ताबूक तास भरल, देश काल निमित्त साएहन सदलजे मन्स कलपनो कत्हिं कारी हरिन केवल कोनो-कोनो वगलीग गर्ब वर्षाख पहल्गर जन्सम यी सब देखिख बुद्धिमान कारनक अप्कल अवष्षे लगगे अची जेना कुमार भिनु गेल नहीं. मुदा वेदान्त मे उ अप्कल प्रमान नहीं सहायक छिख. वाद्यान्त्वाख्यस्भ्ब्के माला जका दागा में गुतभ, फूल्ष्रूतिक खिक, यतोवा इमानी भुतानी जायनते. तद ब्रहमा भ्रिगुवरुन सम्वाद तैट्तीरीए. सुत्र के वल दागा खिक. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अद्रम् में विकल्क छलगत अची अदिरातर में शोडषी पात्र उठाव वा नहीं उठाव सूर्यो दिस पहिने हों करुवा बाद दूनु विधि तूनु मान्य की एक तंकर्म पुरुष्तन्त्र थेक, कैनिहारक अदिरात्र अदिरात्र अदिरात्र अदिरात्र अदिरात वस्तु वस्तु तन्त्र थेक, उ जेहन अची तेहने अची, हमर इच्छासव उ इमहर-ोमहर नहीं होएद. अब्रहमग्यान वस्तु यान थेक, विदھی नहीं. इवाक्यमोन राखु चारिम अंक मेई तर्वारी बनत. अंक त्रीतिये, नर्टकक दे है. अग, त्रीतिये, नर्तकक दे है, त्रीतिया सुत्र, शास्त्रयोनित्वात, शास्त्रक योनी होई बाक कारने, तेसर सुत्र, चोट अची, आचार्य, मुदा, दुमहा, भुज्यात अची, शास्त्रयोनित्वात, के अपड़्हत अची, ब्रहमा, शास्त्रक योनी खिख, वे तुनु आदुनु के क्रम्सं सुनु कि एक तं तुनु मिलिक एक तुस्राके दारन करैत अची जेना महराबक दूई पाठर. पहल आर्थ रिगवेदादी विशाल शास्त्रराशी अंगिनत विद्याक शाखासव, भरल दीप जकासव वस्तुप प्रकाषक एकर स्रोथ ब्रहमात्धिक, आस्रोथ होईबाक कारने ब्रहमक सर्वगता सिद्ध. निम्सोज आची ग्रन्त्कारक ज्यान द्रन्त्स पैग होएत आची पानेनी व्याकरन रचलनी की पानेनेग ज्यान आच्ताद्याई में अंतागेल नही कुशिलक रस् दूद आगुडक मिठासक भेद जी जनैत अची, वानी नहीं कही पबैत अची, वकताक ज्यान सदा वचन सागु. तनजकर वचन वेद थेक, एही महान सथाक नहीं हष्वास जका, ओकर ज्यानक सीमा के बान हत. आए एती, वाचस्पती, हमर गरक सबस पुरान दीवाल ताड अची, आहम देखः चाहब आहा एक्रा कोना गिराभी. वेदक करता वेद अपारुषे थिक अनादी पाध परमपरा दिवाल गिराएब नहीं मित्र, हम उक्रा सरकाएब आहा देखफ जे सरकलाक बादो उठाद्रे हैत. पहिने एक ता बात जे आहुके माने पडद, आहा वरन के नित्यक है ची गध धूनी सदा एक मानी ले. मुदा वाक्यड, पदको विषेश क्रम को अनुपूर भी, क्रम्तं उच्चारन मे बनेत अच्ची आ उच्चारन अने त्यः तने वेद वाख्यक अभी व्यक्ती हर भेर नव आब सुनु हमर प्रिय उप्मा, नाज सिखनिहार शिष्य गुरुक देहक गती देखहत आचीया आपन देहमे उही क्रमक अनुकरन करहत आची, गुरुक उगती स्वयन शिष्यक देहमे नही चली अबैत आची. तहिना वेद पात, हर पीदी नव उच्चारन, पुरान क्रमक अनुकरन में. तकन प्रष्न प्रल्यत बात, जकन सब कंठ मून, सब स्म्रिति लुप्त, नव स्रिष्टि में हुक्रम के देखाओत. जेमनि कहत चति स्रिष्टिप रलः हो इते नही अची, व्यासक अनुयाई कहत चति सर्वग्य परमात्मा, ध्यार स्रिष्टिमे भेद के पूर्वस्रिष्टिक उही क्रम्मे फेर रचाइत चति. अदूनु में मेल एताय अची अपारुषेएक कवर्त तूनु पक्ष्के स्विकारिय रुक में एध्भे थिक रक्षिताक पूर्न स्वतन्त्रताक अबहां. इश्वरो स्वछ्छन्द नही रचाइत च्छती, उ पूर्वक्रमक अनुगामी च्छती, जेना आहाक पात परमपरा. अन्यम अतर रहेत अची, कोनो स्रिष्ट में ब्रह्महत्या पुन्या नहीं होएत, न अश्वमेध पाप जेना अगिन कहीो नहीं भिज्बैत अची, जल कहीो नहीं जरबैत अची. अदोसर अर्थ, शास्त्र ब्रह्मख योनी प्रमान अर्थ. दोसर आर्थ पहिलुक द्हाल थेक जके अ भुजने हो जे, जन्मादी सुत्र अनुमान चल, तै इसुत्र उकर भ्हम कातैत अची ब्रह्मक असादारन स्वरुपक जान के वल शास्त्रसच ना अख्फिसं नतर्कसा. शास्त्र ब्रहमक योनी ठेक खोकर एक मात्र प्रमान अग्वार आ थीक एताएत मित्र लोकनी इसाज आपन अस्ली रन्भूमी पर पहुचल, कि एक तन जब ब्रहमक एक मात्र प्रमान वेद ठेक ता आब वेदक प्रयोजन पर निरने होएद अनिवार्य. आओी प्रशन पर हमर सोजा भैसल जैमनिक इशिश आपन समप्रदायक समपून सेनाला का ताडचत्छती. आख भारी मित्र. पूरा भल्स आउ काल ही हम नयाएक के कहने रहिनी जे दूर्गक केंद्र चोडनिहार के भाहरी दिवाल समर्पित करबाक आवष्षकता नही. वो तुत सुत्र क्ततु समन्वयात, मुदाओ समन्वयक्कारने मी मान्सक कर्म कान्दी सबहाक मद्यमे आबैट्ख्छती दीपूच कयल जाएत अछी इसाजक सबस्पैक वाध थेग तक्ञन सुनु जमनेक सम्झुन पक्ष्च् भिनु कातल छान्तल वेदक प्रयोजन एक कर्म में प्रव्रिट्ती कराईप आमनायस्य क्रियार्थध्वात वेद क्रियार्थ थेख कि एक तंषब्दक सार्थक्ता प्रयोजन में अची आप रयोजन प्रव्रिट्ति गेहिंग काना फूसी पक्ष पूरा भल्स्ताध भेल अची एक्ता दुर्ग इमान्दारीस बनावल, आहम एक्रा उत्भे इमान्दारीसश, पात्धर-पात्धर उतारव. पहल पातर, सिद्धक, कतनिष्फल, सुत्रक, उत्तर, एक ही शब्द्वे अची समन्वयात, की एक तन सब्धावे दान्तवाक्य एक ही तात्पर्यमे मिलात अची. सदेर सोमेद मगर आसीत है सोमै, आरमभमे सक मात्रच्छल, एक मेवाद्वितियम, एक अद्वितिय, आत्मावा इद्मेक, एवागर आसीत, आरमभमे आत्मे मात्र. उपक्रम्स उच्संहार दھरी एक ही सुर आतात पर्यनिरनयक नियम थिक, जे कहल गेल अछी तक्रा चोडिक, जे नहीं कहल गेल तकर कलपना करभ दोष थिक. सम्फुन उपनिषत ब्रहमा कहेत अछी विधि आहा जोडव छी. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ द्रविड्त्त अगा के पुट्रभेल आफी देव्द्तक दे पुल्कित आख्यामो फुलल कमल जका खिलल. द्रविड्त की देख्लक? कोनो क्रिया नहीं देव्द्त उठेक कतू नहीं गेल, किचु नहीं काएलक. उठे कत्फु नहीं गेल, किचु नहीं का इलक. केवल एक्ता सिध समाचार, पुत्र भेल आ आनन्दक जवार. उही पुलक्स द्रविड भूजी गेल, एही वाक्य में कोनो प्री आर्थ चल. तंकहू सिध्ख कत्फन निष्फल. अजज़ पुत्र भेल इछोट सिद्धि एतेक फल दैत अची तन्तो स्वयाउ अबहे अजर आम्रित ब्रहमाचे इजद्धि सुनीजकर अविद्याक गिरहे कटैट चैक, वोकर फल की कम. तक्हन आत्माद्रष्ट्व्या जका विदेरुप वाख्यत की करब, देख बाक चाही इता आगे ठिख. आग्याक रूप ठिख, आग्याक बल नही, जेना पाथर पर चलाओल चूरी, आकार चूरीक दार भोत. इवाके कोनो नव करतविय नहीं लादात अची इकेवल बाहर मोब लोग के जे स्वबहाववष विषय दिस भहेत अची गूमाक भीतर दिस भहभेत अची. नदीक दार के बान हमोड़ात अची नव जल नहीं उपच बै. अस्लिकाज उही वाक्यक थेक जे मोडलाक बात भेटैत अची तत्वम्सी आव वाक्य विधि थेक की सिध्भोदध एकर निने आवाक अपन उही भेट्सा होएत जे हम दो सर अंक में राकने रही आव आब उ तर्वारी म्यान्सा निकलत. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ तने ब्रह्मा जानु कहियो विध्ख विषे भहिये नहीं सकैत अची जानव आग्यासन नहीं प्रमान सहोईत अची. अप्रमान उपनि शद्वाक्या सोजा ताड अची चमकैत द्याल जका उजजर इजोट मे. मुदा हमर अनुवा पत्ती अखन हू जीवेट अची. अद्वापत्ती अखन हु जीवेत अची तक्वम्सी सुन्लाक बादो भाइशोग जहनाक तहनाक ताओ ज्यान भेलकत है कि एक तन सुनब अजानब मे उत्वे दूरी अची जत्भे भीज आगाच मे वो तबे दूरी अची जक्भे भीज आगाच में, श्रवन पहिल देग, तकर बाद मनन तर कसा अर्ठक द्रिधि करन, तकर बाद निदिद्यासंद् धारावाहिक भावना. साजक जुर्जुरी में थूथ आकी मनुशे यी संशे जाभे गुर्या रहल अची, ताभे निष्चे नही आशनशे सहित सुनल वाके ज्यान नही ज्यानक आरम्ब्धिग. जेना संगीतक विद्यारती पहल दिंष ज्रिश्भ सूनैत अची, वर्षक अभ्यासक बात चिनहत अची कानुए, स्वरुए, मुदा साख्षाख्षाटकार अभ्यास्सं. अजगन साख्षात्कार होएत अची, तकन की होएत अची से चारी नकार सचुनु की एक तंए है ही अद्ध्यायक शिक्र थिग. मोख्ष उपन्वस्तु नही जे उप्जआत अची से नश्थ होएत अची द्यालजका. विकार नहीक दूद्सन दही भेल वस्तु नित्ये नहीं रहें संसकार नहीं संसकार दूई रंगक गुन जोडब, जेना अदूलर सस्पतिक रंगब दोश हताएप, जेना इंताक चूनस दरपन मानजब, ब्रहम्मे न किचु जोडल जासकेत अची, न औहिमे किचु हते बाजोग अची, दरपन माजने मनी नहीं चमकेत अची, सनानो पन्यनक शुद्दी जीवक अपादेक शुद्दी थेक, जेना नाएकाक सुगन्द होकर सकी पर चडल भुजाएत अची, आप्राप्ती से हो नही आए तै हमर सबस प्रिय उप्मा नाहक यात्री आप्राप्ती से हो नही आए एताय हमर सबस प्रिय उप्मा नाहक यात्री आप्राप्ती से हो नही आए एताय हमर सबस प्रिय उप्मा नाहक यात्री वहात अची किनारा, फेन, लहरि सब पाचु चुतट जाएत अची आयातरी पहुचाइत अची उही निस्तरन, शान्त, स्वच्ष, स्थिर मद्यमे. कि उ मद्यनव भेटल, नहीं जलतन सबतरी चल, उ केवल लहरि सहतल. ब्राह्मा सर्वगत्त्तिक, नित्यप्राब्त, प्राब्तिक भ्रम् केवल लह्रिक छल, चारुगति बन्नेक एही चारिक अद्रिक्त पाचम कोनो भात नहीं जाहिसं कर्म मोक्ष में पैसआए, तने ज्यान के छोडी कर्मक चाहो मोक्ष में नहीं अजे जीववत जागध यी जानिगे अजे जीववत जागध यी जानिगे अजे जीववत जागध यी जानिगे अजे जीववत जागध यी जानिगे अजे जीववत जागध यी जानिगे अजे जीववत जागध यी जानिगे अग्रा चोरक कुंदर अबजार मे चलत अच्छी, खाएख पीबैत अच्छी, आभीतर निस्तरं जी वन्मुक्त. आव उही दिन, मित्र, एक ता आश्चर यहोएट अच्छी जक्रा हम एही साजक अंतिम वाक्य बनाएप, आप रह्मास्मि एही ज्यान में सब विदिया सब प्रमान समाप भाजाईत अची, प्रमान प्रमाता सापेच, जते प्रमाता भाव गलल, उते प्रमान से हो विष्रान्त जेना भोर भेने दीपक काज सदीजाईत अची. दीप जूत नहीं चल त्राती में होए सर्तिचल. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अप्संहार सुट्रदार वापस आबैत आबिद आबिद उमेज परक पोती उट्बैत आबिद आबार लगक शंक्खक बगल मे राखिद आबिद आबिद काल ही शंक, हम्रा सब के सिखहोने चल जे ब्रम की थेख उमेज परक पोठी उठबैत आद्वार लगक शंक्खक बबगल मे राखी दैत आछी काल ही शंक हम्रा सब के सिखाणे चल जे श्वरम की खेख आई इपोठी सिखालक जे श्वरमसन निकल बाक रस्ता कते लिखल आए औरस्ता आग्या नही खेख, समाचार खेख आाके पुत्र भेल एद भे सुनिक देव्ददद देध पूलकित भागेई चल, दूत कोनो काज करए नहीं कहने चल. उपनिषद उहने दूत ख्छ, आा उकर समाचार एहिसम पैग, जक्रा आा जनम भरी ताकेत रहल हूँ से आाक अपन गरदने में पडल हार ख्छ. चारी सुत्र चारी देग चल जिग्यासाक अदिकार, ब्रहमक लक्षन, शास्त्रक प्रामानियक, आतात पर्यक समन्वै आचारू देग एक ही देहलीस दिस, जते सुन्निहार भूजीजाएत अची जे दूत जकर चर्चाका रहेल चल से आन के अनही. ज़हा आई राती पोठी आपन मोन मे लाका जारे है जी, तं उक्रा माला जका राखभ, फूँश्र तिक्ठिक, दागा सुत्रकारक आगुतभ. गुतभ हरेक पदनिहार के अपने पडएक चै. सब पात्र प्रस्थान कर अच्छ फी. दिप सबसा अंत्मे बाहर जाएत अछी, आशंक आपो थी, संगे संग द्वार लक चुटर रही जाएत अछी. एही रूपांतरन पर एक ता टिपपनी, उपर नात्यरू पिट्तरक, संकुचित आप उनहस्वरत रूक मे, अदि पूर्वपक्षिद्रिष्टान्च्छ्रिंख्ला आमदूविश्मिष्रित अन्नकुतर शोमश्रूतिक गूनार्थ बाच्धुव्मा आप प्रश्वाद्द्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्विश्वाद्वि ब्रह्मना समास में चतुर्ती पक्षक्ख्ख्ण्द्ण् द्वितिया सुत्र में ततस्त्हलक्ष्ण् सूर्यक्तिक् उप्मा यासकक च्या भ्हाव विकारक्त्रे में अंतर्भाव, जगत्वैच्ट्र्यक्वर्न्न, वज्द्याज़्द्रब्रुष्टन्त्र भेदक्स्तापना त्रेतिया सुत्रमे दुनू व्याख्या, ब्रहमा शास्त्रक कारन, पानेक ध्रिष्तान्त इक्षुक्षिर गुड्रसक अनिर्वच्नियता, शास्त्र ब्रहमक प्रमान आनुपुर विक अनित्यता, त्रेतिया सुत्र में दूनू व्याख्या, ब्रहमा शास्त्र कारन, पानेनेक ध्ष्टान्त इक्षुक्षिर गुद्रसक अनिर्वच्नियता, शास्त्र ब्रहमक प्रमान, आनू पूर वीक अनित्यता, अपारुषे कवव्यसम्मत अर्थ तथा चतुर्थ सुत्र में मीमान्सक् क्रियार्थ तवबक्षक् पूर्नबल् स्तापना प्रतिपत्तिविदि अर्थवाद युपा हवनियक ध्रिष्तान्त, तद्वम्सी सुन्लाक बाधो भ्यशोक अनुभवापत्ति, तत्था चतुर्त् सुत्र में मीमान्सक् क्रियार्त्वबक्षक् पुनबल्स्तापना, प्रतिपक्तिविधि, अर्थ्वाद्, युपा हवनियक्द्रिष्तांत, तत्वम्सी सुन्लाक् बाधो भाएशोकक अनुभवापत्ति, अद्हुलस्पतिक, दर्पन्मनी, नाएकास्की, श्रवन्मन निदिध्यासन आशजजादिक अभ्यास्द्रिष्टान्त, जीवन्मुक्ती, सापक केंचुल, आव आव रह्मास्मी में सर्वप्रमान विष्रानती. नायात्रीक उप्मा, अधहुलस्पतिक, दर्पन्मनी, नायकासकी, श्रवन्मन निदिद्यासन आशजजादिक अभ्यास्द्रिष्तान्त, जीवन्मुक्ती, सापक केंचुल, आँ आभ्रहमास्मी में सर्वप्रमान विष्रान्ती. इसम्वाद ग्रन्तक तरकसन रचनाक चारूकात निर्मित एकता मौलिक स्रिजनात्मक रचनात्ठिक इस्व्क्रत्वा अंग्रेजी अनुवाद जक्रापर इ आदारत अच्छी, उक्रा उद्द्रत नहीं कराइत अच्छी, आमी माशक, आक्षेपक, यूवा सन्याशी, आशिष्ष्य सन्युक्त पात्रत्धिक जे तीका स्वया उठाओल आउप्तरत मतके स्वर दैत अच्छी,

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