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मैथिली_में__भामती_.mp4

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:06नमशकार, इस खास एकस्पलेनर में हम एक बहुत ही दिल्चस्प और गेहरे विष्यापर बात करने वाले है.
  2. 0:06–0:09आज हम सीदे नावी शताबदी में चलेंगे,
  3. 0:09–0:14महां दार्षनिक वाचस्पती मिष्ष्र के एक एतिहासिक ग्रन्द भामती की दुन्या में.
  4. 0:14–0:20अर सिल्फ इतना ही नहीं हम इसके उस बिल्कु नहीं शुद्द मैठली अनुवाद पर भी चर्चा करेंगे,
  5. 0:20–0:23जिस ने इस भेहद जटल संसक्रित दर्षन को,
  6. 0:23–0:26हमारी और आपकी रोज मर्रा की समचके एक दंगे एक दंगे बला दिया है.
  7. 0:26–0:29तो जल्ये बिना किसी देरी के शुरू करते हैं
  8. 0:29–0:32जरा इस कमाल के वाख्या पर गूर की जीए
  9. 0:32–0:35हजार शास्त मिलकर भी गड़े को कपडा नहीं बना सकते
  10. 0:35–0:37क्या बात है ना ये सरफ एक कहावत नहीं है
  11. 0:37–0:40बलकी मूल पाट का एक येसा तारकिक प्रहार है
  12. 0:40–0:42जो तुरन तमारा द्यान किच लेता है,
  13. 0:42–0:44ये साथ तोर पर बताता है,
  14. 0:44–0:47की भारती दरषन का तरक कितना आचुक और अनम्म्मे है.
  15. 0:47–0:51मतलब, अगर कोई सिद्दान्तिक बात आपके सीदे अनुबवव के किलाव है,
  16. 0:51–0:54तो उसे स्थ इस इसलिये सच नहीं माना जासकता,
  17. 0:54–0:56कुकि वो किसी किताब या शास्टर में लिखिए है
  18. 0:57–0:58और यही वो तारके खनीव है
  19. 0:58–1:00जिस पर ये पुरा दर्षन तेका है
  20. 1:01–1:03आगे बडने से पहले जल्दी से देक लेते हैं
  21. 1:03–1:05की आज हम किन-किन एहम पहलूए पर बात करेंगे
  22. 1:06–1:08पहला अदवेत की विरासत
  23. 1:08–1:12दूस्रा भामती और विव्रन्प्रस्थान के भीच के दिल्चस्प भहेस
  24. 1:12–1:16तीस्रा अद्ध्यास कवो ब्रम जिस में हम सब जी रहे हैं
  25. 1:16–1:19चोथा चतृर सुत्री का रहेस से और अखर में
  26. 1:19–1:22में बाशा में इस दर्षन की खुबसुरती
  27. 1:22–1:26तो चलिये अपने पहले बाख से शुवात करते हैं अद्वैइत की विरासत,
  28. 1:26–1:30जो असल में सद्यों के विचारो का एक अदबूथ संगम है.
  29. 1:30–1:32और इस पूरी चर्चा का जो मुख्य आदार है,
  30. 1:32–1:36वो है गजेंद्र ताकृर जी दोरा विदे हिमें प्रकाशित,
  31. 1:36–1:40बहामती का ये 2026 का परीवर्दित संसकरन
  32. 1:40–1:44सच कहों तो ये एक बहुड बडी एते हासे कुपलप्दी है
  33. 1:44–1:47क्यो? क्यो कि ये अनुवाद नहीं सर्फ वुस भारी भरकम
  34. 1:47–1:50जटिल्ट संसकरत को हमारे लिए सुलब बनाता है
  35. 1:50–1:55बलकी ये शाब्दिक अनुवाद से कही आगे जागर अद्वैत दर्षन की गेराई को,
  36. 1:55–1:58हमारी अपनी लोक्वाणी में पिरो देता है.
  37. 1:58–2:02अब बात करते है इसके मुल रचेता वाचस पती मिष्र जी की.
  38. 2:02–2:05देही, वो कोई आम विद्वान नहीं ते,
  39. 2:05–2:35उई उई उई चच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च
  40. 2:35–2:43अब आतें दुस्रे बाग पर भामती बनाम विवरन ये दरसल दो अलग अलग दार्षनेक नजर्यों के कहानी है.
  41. 2:43–2:50अद्वैट वेदान्त के अंदर ही भामती और विवरन प्रस्थान के भीज्ग की यबहेस सच्छ में बहुती दिल्च्छप है.
  42. 2:50–3:20सब से बड़ा जो विवाद हैं तो इस बाद पर है कि अविद्ध्या यान अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अ
  43. 3:20–3:24अग्यान स्र्फ एक है जो इस पूरे प्रपंज का मुल कारन है
  44. 3:24–3:27चलिये अब तीस्रे बहाग की योर बडते है
  45. 3:27–3:30चो शाएद हमारे और आपके जीवन से सबसे ज्यादा जुडा है
  46. 3:30–3:34अद्द्यास का ब्रम यानी वो देखना जो असल में है ही नहीं
  47. 3:34–3:42तो आखिर ये अद्ध्यास है क्या? आसान बाशा में कहें तो ये एक बून्यादी गलती है. सत्ते पर असत्ते का आरोपन करना.
  48. 3:42–3:51सोचकर देखें, जब हम अपने शरीर, मन और प्यद्वीगे बहुतिक गुनो को उस शुद्दद चेटना से बहरी आत्मापर तूब देते हैं, तब अद्ध्यास पेदा होता है.
  49. 3:51–3:55अर पता है, यही वो ब्रम है, जो हमे ये मानने पर मजबूर कर देता है,
  50. 3:55–3:57कि हमें खीमित और नश्वर अईन्सान है.
  51. 3:57–4:00हम वो मान बेटते है, जो हम असल में है ही नहीं.
  52. 4:00–4:03इस मुषकिल से कुन्सेप्ट को समजाने कि लिए,
  53. 4:03–4:06बहुत्ती शान्दार स्थानी उपमाव का इस्तमाल की आगया है.
  54. 4:06–4:10हमारे इस जूथे सच की दूलना रेगिस्तान की म्रिक्त्रषना से की गगे है.
  55. 4:10–4:13अब वो पानी ना तो पुरी टरा सच है,
  56. 4:13–4:16कुकी पास चाने पर वहां कुछ नहीं मिलता,
  57. 4:16–4:20उर नहीं पूरी तरज जूथ है, क्योंकी दूर से तो वो साफ दिखाई देही रहा है.
  58. 4:20–4:25इस यह इसे अनिरवच्निया काहा गया है, जिसे शब्डो में नहीं बान्धा जासकता.
  59. 4:25–4:31और दूसी तरव, एक और कमाल का उदारन है, अंद परंपरा, यानी अंदो की कतार.
  60. 4:31–4:36इसका मतलब है कि अगर अपनी आत्मा को ज़़ शरीर मान लें, तो यह भिलकल वैसा ही होगा,
  61. 4:36–4:40जैसे एक आन्दा वेकती किसी तुस्रे आन्दे का हाथ पकड़ कर चल रहो,
  62. 4:40–4:43और दोनो का हर कदम पर गिरना तै है.
  63. 4:43–4:48इसी के साथ हम पहुट गये हैं अपने चोथे हिस से पर चतुष सुत्री को समजना.
  64. 4:48–4:53ये इस गरन्द के वो शुर्वाती चार सुत्र हैं जो मुखति का पुरा रास्ता खोल देते हैं.
  65. 4:53–4:57ये चार सुत्र एक बहुती लोगिकल सीकवेंस में आगे बरते हैं.
  66. 4:57–5:01बहुट आदे बदते हैं. पहली सीटी है अठातो ब्रम्मजिग्यासा.
  67. 5:01–5:06यानी सब से पहले तो उस परम्सत्यव को जानने की एक गेरी इच्छा होनी चाही है.
  68. 5:06–5:09तुस्री है जन्माद्द्यश से यतः,
  69. 5:09–5:14यो ये बताती है के वही परम सत्तिः इस पूरे ब्रम्मान्ड के बनने और मिटने का कारन है.
  70. 5:14–5:16फिर आता है शास्त्र योनित्वात,
  71. 5:16–5:21जिस का मतलब है के उस परम सत्तिः को आप केवल शास्तरों की मददत से ही जान सकते हैं.
  72. 5:21–5:23और आखिर में तत्तु समनवयात,
  73. 5:23–5:29जो हमे ये एह अजास कर आता है, के दुन्या के सबी शास्तरों का जो अंतिम लक्ष्या या निचोड है,
  74. 5:29–5:32वो स्र्फ और स्र्फ उस ब्रहम्व मेही समाहित है.
  75. 5:32–5:35यह पर एक बहुती जबर्दस्त दार्षनिक तर्ग ती आगया है.
  76. 5:35–5:40मोख्शा मुक्ती कोई आसी नहीं चीज नहीं हैं जिसे आप अपने करमोजे पेडा कर लेंगे.
  77. 5:40–5:44ये कोई मिटी के गड़े या देही जैसी चीज नहीं हैं जिसे बनाया जा सके.
  78. 5:44–5:48भिलकल नहीं. ये तो एक शाष्ववत सते हैं जो पहले से ही वहा मोखुद है,
  79. 5:48–5:51बस बवारे अग्यान के पड़े के पीछे चिपा हूँःःः
  80. 5:51–5:54इसे एसे समजीए, जैसे नाव से नदीपार करने वाले
  81. 5:54–5:57किसी नाविक को लकता है कि किरारे के पेड चल रहे हैं
  82. 5:57–6:00लेकिन असल में वो अपनी जगा एक दम स्तिर हैं
  83. 6:00–6:04शान्ती हमेशा वही है, बसुस पर पडे अग्यान के पडदे को हथाना है.
  84. 6:04–6:08और आब हम आते हैं आख्री और सबसे खाज बाग पर,
  85. 6:08–6:12मैठिली में दर्षन. ये देखना वाखई दिल्च्छप है,
  86. 6:12–6:16कैसे एक अनवाद अपने आप में एक दर्षनिक विजे बन सकता है.
  87. 6:16–6:22इतने सगन और गेरे गरन्द कानुबाद करना सच में बहुत बडी बाद्धे कुपलप्दी है.
  88. 6:22–6:25गजंद्द्धाकुर जी ने इसके लिए एक खास तींस तर यर रननीती अपनाई.
  89. 6:25–6:28सब से बहले तकनी की शुद्धता को बनाई रकना.
  90. 6:28–6:30मदलब अद्ध्यास या अप्छेदवाद
  91. 6:30–6:34जैसे जो भारी पारिभाशिक शब्ध थे उनके साथ कोई चेडचाड नहीं की गगी.
  92. 6:34–6:39तुस्रा, संसक्रित के लंभे-लंभे उल्जे हुई वाख्य ते उने तोडगर
  93. 6:39–6:45मेतली के एक दम प्राक्रतिक और सहज प्रवावे था लिए दिया लिए तीस्रा सबसे आह्म काम स्तानी मुहावरो का बर्पूर प्रेयोग
  94. 6:46–6:50इस से हुए गे इतना आमुर्थ और कठेन ज्यान आम लोगों की समच से सीधे जोड गया
  95. 6:50–6:55इं स्थानी कहावतों का उप्योग करना ही सनुवाद को एक कला बना देता है.
  96. 6:55–6:58जब इं जटिल तर्कों को समजानी के लिए,
  97. 6:58–7:01हसार शास्त्र मिलकर भी गडे को कप़ा नहीं बना सकते,
  98. 7:01–7:04या फिर जोग की खीर नमकीन नहीं होती,
  99. 7:04–7:07ज़ेसे टेट देसी मुहावरे अस्तिमाल होते हैं,
  100. 7:07–7:10तो अदवैत वेदान्त का वो कठोर तरक भी,
  101. 7:10–7:12हमारी अपनीक शित्री ये बाशा में,
  102. 7:12–7:14किसी मीठे संगीद की तरा गूँजने प्च्छा है.
  103. 7:14–7:17सब कुछ बहुत अपनासा लगने प्च्छा है.
  104. 7:17–7:24अंत में ये पूरा का पूरा गरन्त हमें वास्तविक्ता और सच्चाई के बारे में गहराई से सोचने पर मजबूर कर देता है।
  105. 7:24–7:28और जाते जाते ये ये एक बहुती बड़ा सवाल चोड जाता है।
  106. 7:28–7:32अगर हमारा ये पूरा सनसारे कनुबाव ये सिर्फ एक ब्रम है।
  107. 7:32–7:37इक अद्यास है, तो हम जो भाशा रोज बोलते है, वो इस ब्रम को कितना बड़ावा देती है.
  108. 7:37–7:43या फिर क्या यही भाशा बामती जैसे अद्बूद गरन्तो के माद्धिम से उस परम सत्ते को समझने,
  109. 7:43–7:56अब नहीं तो वो वो बज़ाई बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद �

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नमशकार, इस खास एकस्पलेनर में हम एक बहुत ही दिल्चस्प और गेहरे विष्यापर बात करने वाले है. आज हम सीदे नावी शताबदी में चलेंगे, महां दार्षनिक वाचस्पती मिष्ष्र के एक एतिहासिक ग्रन्द भामती की दुन्या में. अर सिल्फ इतना ही नहीं हम इसके उस बिल्कु नहीं शुद्द मैठली अनुवाद पर भी चर्चा करेंगे, जिस ने इस भेहद जटल संसक्रित दर्षन को, हमारी और आपकी रोज मर्रा की समचके एक दंगे एक दंगे बला दिया है. तो जल्ये बिना किसी देरी के शुरू करते हैं जरा इस कमाल के वाख्या पर गूर की जीए हजार शास्त मिलकर भी गड़े को कपडा नहीं बना सकते क्या बात है ना ये सरफ एक कहावत नहीं है बलकी मूल पाट का एक येसा तारकिक प्रहार है जो तुरन तमारा द्यान किच लेता है, ये साथ तोर पर बताता है, की भारती दरषन का तरक कितना आचुक और अनम्म्मे है. मतलब, अगर कोई सिद्दान्तिक बात आपके सीदे अनुबवव के किलाव है, तो उसे स्थ इस इसलिये सच नहीं माना जासकता, कुकि वो किसी किताब या शास्टर में लिखिए है और यही वो तारके खनीव है जिस पर ये पुरा दर्षन तेका है आगे बडने से पहले जल्दी से देक लेते हैं की आज हम किन-किन एहम पहलूए पर बात करेंगे पहला अदवेत की विरासत दूस्रा भामती और विव्रन्प्रस्थान के भीच के दिल्चस्प भहेस तीस्रा अद्ध्यास कवो ब्रम जिस में हम सब जी रहे हैं चोथा चतृर सुत्री का रहेस से और अखर में में बाशा में इस दर्षन की खुबसुरती तो चलिये अपने पहले बाख से शुवात करते हैं अद्वैइत की विरासत, जो असल में सद्यों के विचारो का एक अदबूथ संगम है. और इस पूरी चर्चा का जो मुख्य आदार है, वो है गजेंद्र ताकृर जी दोरा विदे हिमें प्रकाशित, बहामती का ये 2026 का परीवर्दित संसकरन सच कहों तो ये एक बहुड बडी एते हासे कुपलप्दी है क्यो? क्यो कि ये अनुवाद नहीं सर्फ वुस भारी भरकम जटिल्ट संसकरत को हमारे लिए सुलब बनाता है बलकी ये शाब्दिक अनुवाद से कही आगे जागर अद्वैत दर्षन की गेराई को, हमारी अपनी लोक्वाणी में पिरो देता है. अब बात करते है इसके मुल रचेता वाचस पती मिष्र जी की. देही, वो कोई आम विद्वान नहीं ते, उई उई उई चच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च अब आतें दुस्रे बाग पर भामती बनाम विवरन ये दरसल दो अलग अलग दार्षनेक नजर्यों के कहानी है. अद्वैट वेदान्त के अंदर ही भामती और विवरन प्रस्थान के भीज्ग की यबहेस सच्छ में बहुती दिल्च्छप है. सब से बड़ा जो विवाद हैं तो इस बाद पर है कि अविद्ध्या यान अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अग्विण अ अग्यान स्र्फ एक है जो इस पूरे प्रपंज का मुल कारन है चलिये अब तीस्रे बहाग की योर बडते है चो शाएद हमारे और आपके जीवन से सबसे ज्यादा जुडा है अद्द्यास का ब्रम यानी वो देखना जो असल में है ही नहीं तो आखिर ये अद्ध्यास है क्या? आसान बाशा में कहें तो ये एक बून्यादी गलती है. सत्ते पर असत्ते का आरोपन करना. सोचकर देखें, जब हम अपने शरीर, मन और प्यद्वीगे बहुतिक गुनो को उस शुद्दद चेटना से बहरी आत्मापर तूब देते हैं, तब अद्ध्यास पेदा होता है. अर पता है, यही वो ब्रम है, जो हमे ये मानने पर मजबूर कर देता है, कि हमें खीमित और नश्वर अईन्सान है. हम वो मान बेटते है, जो हम असल में है ही नहीं. इस मुषकिल से कुन्सेप्ट को समजाने कि लिए, बहुत्ती शान्दार स्थानी उपमाव का इस्तमाल की आगया है. हमारे इस जूथे सच की दूलना रेगिस्तान की म्रिक्त्रषना से की गगे है. अब वो पानी ना तो पुरी टरा सच है, कुकी पास चाने पर वहां कुछ नहीं मिलता, उर नहीं पूरी तरज जूथ है, क्योंकी दूर से तो वो साफ दिखाई देही रहा है. इस यह इसे अनिरवच्निया काहा गया है, जिसे शब्डो में नहीं बान्धा जासकता. और दूसी तरव, एक और कमाल का उदारन है, अंद परंपरा, यानी अंदो की कतार. इसका मतलब है कि अगर अपनी आत्मा को ज़़ शरीर मान लें, तो यह भिलकल वैसा ही होगा, जैसे एक आन्दा वेकती किसी तुस्रे आन्दे का हाथ पकड़ कर चल रहो, और दोनो का हर कदम पर गिरना तै है. इसी के साथ हम पहुट गये हैं अपने चोथे हिस से पर चतुष सुत्री को समजना. ये इस गरन्द के वो शुर्वाती चार सुत्र हैं जो मुखति का पुरा रास्ता खोल देते हैं. ये चार सुत्र एक बहुती लोगिकल सीकवेंस में आगे बरते हैं. बहुट आदे बदते हैं. पहली सीटी है अठातो ब्रम्मजिग्यासा. यानी सब से पहले तो उस परम्सत्यव को जानने की एक गेरी इच्छा होनी चाही है. तुस्री है जन्माद्द्यश से यतः, यो ये बताती है के वही परम सत्तिः इस पूरे ब्रम्मान्ड के बनने और मिटने का कारन है. फिर आता है शास्त्र योनित्वात, जिस का मतलब है के उस परम सत्तिः को आप केवल शास्तरों की मददत से ही जान सकते हैं. और आखिर में तत्तु समनवयात, जो हमे ये एह अजास कर आता है, के दुन्या के सबी शास्तरों का जो अंतिम लक्ष्या या निचोड है, वो स्र्फ और स्र्फ उस ब्रहम्व मेही समाहित है. यह पर एक बहुती जबर्दस्त दार्षनिक तर्ग ती आगया है. मोख्शा मुक्ती कोई आसी नहीं चीज नहीं हैं जिसे आप अपने करमोजे पेडा कर लेंगे. ये कोई मिटी के गड़े या देही जैसी चीज नहीं हैं जिसे बनाया जा सके. भिलकल नहीं. ये तो एक शाष्ववत सते हैं जो पहले से ही वहा मोखुद है, बस बवारे अग्यान के पड़े के पीछे चिपा हूँःःः इसे एसे समजीए, जैसे नाव से नदीपार करने वाले किसी नाविक को लकता है कि किरारे के पेड चल रहे हैं लेकिन असल में वो अपनी जगा एक दम स्तिर हैं शान्ती हमेशा वही है, बसुस पर पडे अग्यान के पडदे को हथाना है. और आब हम आते हैं आख्री और सबसे खाज बाग पर, मैठिली में दर्षन. ये देखना वाखई दिल्च्छप है, कैसे एक अनवाद अपने आप में एक दर्षनिक विजे बन सकता है. इतने सगन और गेरे गरन्द कानुबाद करना सच में बहुत बडी बाद्धे कुपलप्दी है. गजंद्द्धाकुर जी ने इसके लिए एक खास तींस तर यर रननीती अपनाई. सब से बहले तकनी की शुद्धता को बनाई रकना. मदलब अद्ध्यास या अप्छेदवाद जैसे जो भारी पारिभाशिक शब्ध थे उनके साथ कोई चेडचाड नहीं की गगी. तुस्रा, संसक्रित के लंभे-लंभे उल्जे हुई वाख्य ते उने तोडगर मेतली के एक दम प्राक्रतिक और सहज प्रवावे था लिए दिया लिए तीस्रा सबसे आह्म काम स्तानी मुहावरो का बर्पूर प्रेयोग इस से हुए गे इतना आमुर्थ और कठेन ज्यान आम लोगों की समच से सीधे जोड गया इं स्थानी कहावतों का उप्योग करना ही सनुवाद को एक कला बना देता है. जब इं जटिल तर्कों को समजानी के लिए, हसार शास्त्र मिलकर भी गडे को कप़ा नहीं बना सकते, या फिर जोग की खीर नमकीन नहीं होती, ज़ेसे टेट देसी मुहावरे अस्तिमाल होते हैं, तो अदवैत वेदान्त का वो कठोर तरक भी, हमारी अपनीक शित्री ये बाशा में, किसी मीठे संगीद की तरा गूँजने प्च्छा है. सब कुछ बहुत अपनासा लगने प्च्छा है. अंत में ये पूरा का पूरा गरन्त हमें वास्तविक्ता और सच्चाई के बारे में गहराई से सोचने पर मजबूर कर देता है। और जाते जाते ये ये एक बहुती बड़ा सवाल चोड जाता है। अगर हमारा ये पूरा सनसारे कनुबाव ये सिर्फ एक ब्रम है। इक अद्यास है, तो हम जो भाशा रोज बोलते है, वो इस ब्रम को कितना बड़ावा देती है. या फिर क्या यही भाशा बामती जैसे अद्बूद गरन्तो के माद्धिम से उस परम सत्ते को समझने, अब नहीं तो वो वो बज़ाई बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद �

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