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गङ्गेश_उपाध्याय_का_सच_पहचानने_वाला_कोड.m4a
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- 0:00–0:30अगर बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा ब�
- 0:30–0:32आप यह थे श्क्रींज पर दोरतेवे नमवर
- 0:32–0:36एक दम सई, लिकिम ख्या हो अगर में कहु के अईन्सान के दिमाग का
- 0:36–0:38मतलब उसकी तर्क शम्ता का
- 0:38–0:41एक अँसाई लोगिकल कोड आज से लगबभग
- 0:41–0:44साथ सो साल पहले लिखा गया था
- 0:44–0:45और वाआ
- 0:45–0:50और वो भी केसी आदूनिक रिश्व्ट्ड़््ड्ड्लाब में बलकी चोडवी शताबदी के मिठला में
- 0:50–0:55यो वाखि सूछने वाद है और में बतावगा कि ये कोई मदप कोई अती शुक्ती जा मेटाफर नहीं है
- 0:55–0:58हम यहां जिस तारकिग भाशा की बात कर रहे है, वो है
- 0:58–1:02गंगे शुपाद्याय का लिखावा युगान्तर कारी ग्रन्त तत्व चिंतमनी
- 1:02–1:03जी, बलकु.
- 1:03–1:05आज के इस गेहन विष्लेशन में,
- 1:05–1:09हम मूल संट्सक्रित से मैठिली में गजंट्र ताकृर दुरा किये गे,
- 1:09–1:11इसके अनुवाद के जर्ये,
- 1:11–1:16इंसान के सचको पहचानने की इसी वैग्यानिक पद्दती को समजने की कोशिष करेंगे
- 1:16–1:20आँ, क्योंकी ये सरफ कोई पुरानी दाश्टने किताब नहीं है ना?
- 1:20–1:25ये नव्व्य न्याय नाम की एक अईसी जबर्दस प्रनाली है,
- 1:25–1:27जिसने बारती ए ग्यानमी मान्सा की
- 1:27–1:32यानी हम ग्यान कैसे प्राथ करते हैं, उसकी पुरी दिशा ही बडल कर रगदी थी.
- 1:32–1:38और मैं यहे सोच रही ती, के इस ग्रन्त के लिखे जाने के पीचे की कहानी भी किसी त्रिलर से कम नहीं है.
- 1:38–1:42मतलव, उस समः एक बहुत बडा संकत कडा अगया ता ना.
- 1:42–1:49अआ, दार्षनिक दुन्या में एक तरह का हाँकार मचावा वा जिसे हम एक ज्याना मिमान सक संकत कैसकते हैं.
- 1:49–1:54भोडद दार्षनिकों और अदवेत विदान्त के श्री हर्ष के कारन.
- 1:54–1:56भिल्कुल सही कहा आपने.
- 1:56–1:58श्री हर्ष एक बहुती प्रकर विद्वान हुएं.
- 1:58–2:01इनलोग ने पुराने नियाय दर्षन की बून्यात को ही रहा दिया था
- 2:01–2:04श्रीहर्ष का तरक बहुत टीखा था
- 2:04–2:06मतलब उनहु ने कहा क्या था अखिर
- 2:06–2:09उनका कहना ता किस दुनिया में किसी भी चीस के
- 2:09–2:10मतलब किसी भी सच्चाए की
- 2:10–2:12कोई पर्फेट्ट परिबाशा हुई निसक्ती
- 2:12–2:13अच्छ?
- 2:13–2:15अगर परिबाशा नहीं हो सक्ती
- 2:15–2:16तो सच क्या है
- 2:16–2:18ये कभी साभित नहीं किया जा सकता
- 2:18–2:19बाप्रे
- 2:19–2:23तो जला सुच ये अगर हम ये साभित ही ना कर सकें की सच क्या है
- 2:23–2:25तो फिर तर्क करने का
- 2:25–2:26विग्यान का
- 2:26–2:30या किसी बितरार के ग्यान का कोई मतलबी नहीं रहे जाता?
- 2:30–2:34बिलकल, अदवैत विदान्त के अनुसारतो दून्या माया है,
- 2:34–2:36इसलिये किसी तोस परिबाशा की जरुरती नहीं है,
- 2:36–2:39लेकि न्यादर्षन या तार्ट्वादी है,
- 2:39–2:41वो मानता है कि ये दून्या सच है?
- 2:41–2:42और इसे जाना जासकता है
- 2:42–2:46तो दर्षन को इस बहुत बड़े संकत से बचाने के लिए ही
- 2:46–2:48गंगेश वौपाद्ध्याने आंट्री ली
- 2:48–2:50और यह नहीं विष्लेशना द्मक पद्धी गडी
- 2:50–2:52अगर आम पुराने ने आए दर्षन को देखेना
- 2:52–2:55तो उस्मे सोला रगलग विश्यो या पदार्थो पर चर्चा हूती थी
- 2:55–2:58जैसे आत्मा, शरीर और भी बहुत कुच
- 2:58–3:02आप, लिकिन गंगेश ने एक बहुत बड़ाव किया, है ना?
- 3:02–3:04उनो आप पूरी सोला की लिस्ट को किनारे कर दिया
- 3:04–3:08उन्हु आपना पुरा द्यान स्रिएव चार चीजों पर किंद्रित कर दिया
- 3:08–3:13उन्हु आपना पहले हमें ये समजना होगा कि हम कोई चीज जानते कैसे हैं
- 3:13–3:16मतलब जान प्राप्त करने के सादन क्या है
- 3:16–3:19अपना उन्हु आपना पुर चीजों चार अचुक सादन बताए
- 3:19–3:22अप ब़हला प्रक्तिक्ष यहनी जो हम देकते यह महसुज करते हैं
- 3:22–3:25दुस्रा अनुमान यहनी जो हम लोगिक से निकालते हैं
- 3:26–3:27और तीस्रा उपमान
- 3:27–3:30बलक्ल उपमान यहनी जब हम तुल्ना करके कुछ सीकते हैं
- 3:31–3:32और चोथा है शबद
- 3:32–3:35यानी किसी विष्वस्नी अवेक्ती की कही हुई बात
- 3:35–3:38गंगेश का मनन था कि अगर हमरी तूल्स ही खराब हैं
- 3:38–3:40तो हम कभी किसी सच्चाई तक नहीं पूँच्चकते
- 3:40–3:43तो चली है, हम भी अपनी इस्टार की क्यात्रा को वही से शूरू करते हैं
- 3:43–3:45ज़हां से कोई भी बड़ा काम शुरू होता है
- 3:46–3:48जब भी हम कोई नेया काम शुरू करते हैं
- 3:48–3:50तो सब से पहले क्या करते हैं
- 3:50–3:52अकसर लोग कोई प्रार्ठना करते हैं
- 3:52–3:54या शुर्वात अच्छी हो यस की कामना करते हैं
- 3:54–3:55आँ
- 3:55–3:57इस गरन्त मे भी शुर्वात
- 3:57–4:00मंगल वाद की अवद्धारना से होती है
- 4:00–4:03मैंने पड़ा था के पुराने मीमान सक विद्वान ये मानते थे
- 4:03–4:08कि किसी भी गरन्त की शुर्वात में मंगल या प्रार्थना करने का सीदा नतीजा ये होता है
- 4:09–4:11की गरन्त बिना किसी रुकावद के पूरा हो जाता है
- 4:11–4:13अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है
- 4:13–4:15अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है
- 4:15–4:17अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है
- 4:17–4:19अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है
- 4:19–4:21अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है
- 4:21–4:51तो आप यह था प्रज़ा तो बवाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद �
- 4:51–4:55जगया दी जारी है. अगर मैं से आजके संदरप में समचूँ,
- 4:55–4:57तो मुझे एक आनालजी यादारी है.
- 4:57–4:59बता एए कुँसी आनलोगी?
- 4:59–5:03ये कुछ कुछ वैसा यहे जेसे हम किसी एकसप्रस वेपर अपनी गाडी दोडा रहे हो.
- 5:03–5:08अब मंगल या प्रार्थना काम हमारी गाडी को द्राइव करके,
- 5:08–5:10मंजल तक पहचाना नहीं है.
- 5:10–5:12मंगल का काम सिर्फ इतना है,
- 5:12–5:16कि वो सड़क पर पडेवे पट़रों और गद्डों को रड़ा दें
- 5:16–5:17क्या बाद है?
- 5:17–5:20आप मतलब अगर सड़क पहले से ही साफ है
- 5:20–5:24यानी किसी नास्तिक की सड़क पर पहले से ही कोई बादा नहीं है
- 5:24–5:27तो बिना मंगल की ये भी अपनी मनजल तक पहुची जाएगा
- 5:27–5:30आपने बहुत ही सती कुदारन दिया
- 5:30–5:31गंगेश का तरक भी थीक यही है
- 5:31–5:33वे कैते हैं के मंगल का सीथा पल
- 5:33–5:35विगन नाश है
- 5:35–5:37यानी लास्ते की बादहाँ को नश्ट करना
- 5:37–5:38वं
- 5:38–5:41और गरन्त का पूरा होना तो सर्फ एक बाई प्रड़क्त है
- 5:41–5:42बिलकुल
- 5:42–5:47गरन्त पूरा होगा या नहीं, ये लेक्हक की अपनी महनत और सानसारिक प्रयासो पर निरभर करता है.
- 5:47–5:49तो रास्ते की बाद है, तो हदगें.
- 5:49–5:53अब सवाल आता है ग्यान की सच्चाई पर.
- 5:53–5:57मतलव, हम कैसे माने की जो ग्यान हमें मिल रहा है, वो सच है.
- 5:57–6:00इस पर मी मान्सको का एक बडा अजीब सा सिद्धानत है ना?
- 6:00–6:02आँ, स्वतब प्रामाणने का सद्धियानत.
- 6:02–6:05वे कैतेंगे गियान जैसे ही आमारे दिमाग में पैडा होता है,
- 6:05–6:06वो अपने आपी सिथ दो जाता है.
- 6:06–6:10अगर हमारा हर गयान पैडा होते ही खुदबा खुदबा सच्चा साभबत हो जाता
- 6:10–6:12तो हमें कभी किसी बात पर शक्कियो होता
- 6:12–6:14मान लीजे मैं सुबे सोकर उडी हूँ
- 6:14–6:16कम्रे में अंदेरा है
- 6:16–6:19और मुझे जमीन पर रस्सी का एक तुक्डा साप जैसा लकता है
- 6:19–6:22तो हमें कभी किसी बात पर शक्च क्यो होता
- 6:22–6:24मान लीजे मैं सुबे सोकर उडिही हूं
- 6:24–6:26कमरे में अंदेरा है
- 6:26–6:29और मुझे जमीन पर रस्सी का एक तुक्डा साप जैसा लकता है
- 6:29–6:31बहुत इक लासे कुदारा न है
- 6:31–6:33तो अगर ग्यान तुरन सच्चा होता
- 6:33–6:36तो उसी वक दरके मारे बेसुद हो जाती
- 6:36–6:37लेकिन अन्सान रुकता है
- 6:37–6:39रोश्नी जलाता है
- 6:39–6:41और फिर देकता है कि आस्लियत क्या है
- 6:41–6:44ये जो हमारे मन में शक पैडा होता है
- 6:44–6:46वो तो इस अटमाटिक सच्चाई वाले
- 6:46–6:47सिद्धान्त को ही खारिज कर देता है ना
- 6:47–6:50अपने बिल्कुल न्याये दर्षन की तरक किया है
- 6:50–6:52गंगेश भी यही कहते हैं
- 6:52–6:54विमी मान्सकों के सिद्दान्त को नहीं मानते
- 6:54–6:57उनका कहना है की ज्यान की सच्चाई हमेशा
- 6:57–6:59किसी तुसरी चीज से साभित होती है
- 6:59–7:00अच्छा
- 7:00–7:01इसी क्या कहते है
- 7:01–7:03इसे वे परत्टा हप रमाने वाद केते हैं
- 7:04–7:06जब भी हमे पहली बार कुई नया गयान मिलता है
- 7:06–7:09तो हम तोब उस पर आंदा विष्वास नहीं करते है
- 7:09–7:10हम उसे टेस्ट करते हैं
- 7:10–7:12तो ये टेस्टिंग होती कैसे हैं
- 7:13–7:15मतलम रान लीजे मैं रेगिस्टान में हों
- 7:15–7:45अब भी बाग ग़ाई बाग गाई बाग गाई बाग गाई बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बा�
- 7:45–8:15बब्रव्द्ती का मतलब है आपका आक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
- 8:15–8:17और वो दिमागी हमारे साथ खेल खेल रहा है?
- 8:17–8:21आप का मतलव है, जब आम आख्छन लेने से पहले एक इसी भ्रहम में पस जाएं?
- 8:21–8:23आप, बलकल वाई.
- 8:23–8:28ये बहुत यी गेरा सवाल है, दर्षन शास्तर में इसे ख्याती वाद की बहेस कहाजाता है.
- 8:28–8:33इस में सब से मशुर उदारन आता है, समद्र किनारे पडी सीप को चान्दी समज लेना.
- 8:33–8:35चान्दी चान्दी चान्दी समज लेना.
- 8:35–8:38इक इनसान समद्र के किनारे चल रहा है,
- 8:38–8:41सूरच की रोषनी में एक सीप चमक रही है.
- 8:41–8:43वह उसे अस्ली चान्दी समचता है,
- 8:43–8:45और उठाने दोड़ परता है.
- 8:45–8:47आँ, लेकिन इस ब्रम को रग रग रग दाशने क
- 8:47–8:49रग रग रग रग तरीके से समजाते है ना.
- 8:49–8:52प्राभाकर मीमान्सक तो शाएद इसे सर्फ एक
- 8:52–8:54बूलने की बिमारी मानते है.
- 8:54–8:56प्राभाकर मीमान्सक इसे अख्ख्याती वाद
- 8:56–9:01या बेदा गरह केते हैं. उनका तरक है, यहां अई अई नहीं गलती नहीं कर रहा है.
- 9:01–9:05वो सामने पुडी सीप को देख रहा है, और उसके दिमाग में
- 9:05–9:08पहले से मुझुद चान्दी की याद ताजा हो गी है.
- 9:08–9:10अचा तो वो बस दोनो को मिखस कर रहा है.
- 9:10–9:16आप बज़ सामने की चीज और अपनी याद्दाश्ट इन दोनो के भीच का भेद यानी अंपर नहीं समझ बारा है.
- 9:16–9:19रूके रूकी ए, ये व्याख्या मुझे पूरी नहीं लगरी.
- 9:19–9:23बलकी हम सामने वाली चीस को सच्छ में कुछ अर देख्रे होतें।
- 9:24–9:25आप बहुत सही पौईंट पेजारीं है।
- 9:26–9:29क्या अप अप मतलब यह ज़ारीं के हमारा दिमाग आस्लियत में
- 9:30–9:32एक तरा का मैंटल फोटो एडितिंग कर रहा है
- 9:32–9:36तो अगर दिमाग अस्लियत में एक तरा का मेंटल फोटो अदिटिटिंग कर रहें
- 9:37–9:43जैसे वो सामने पडी सीप की तस्वीर पर एक चान्दी पन का चमकत होगा रहा है
- 9:43–9:44जो असल में वहां है ही नहीं
- 9:45–9:46आप बलकुल सही दिशा में सोच रही हैं
- 9:46–9:50गंगेश उपाद्ध्याय का न्याई दर्षन थी की यही बात कैता है
- 9:50–9:52इसे अन्यता ख्याती कहाथा है
- 9:52–9:55अन्यता ख्याती मतलब दूस्री चीस खोपना
- 9:55–10:00बलकल, न्याई दर्षन केता है कि ये सर्फ या दाश्ट की कमजोरी नही है
- 10:00–10:07इंसान का दिमाग बहुत अक्तिवली उस्टीप पर चान्दी के गुड यानी रजत्व को ठोप रहा है.
- 10:07–10:11अमेग चीज को किसी दुस्री चीज के रुप में गडर रहे हैं.
- 10:11–10:13न्चोचिये जरा ये कितनी गेहरी बात है,
- 10:13–10:18हमारा दिमाग हमारी वास्तविक्ता को अपने हिसाप से गड़ लेता है
- 10:18–10:23अगर हम इसे आजके जीवन से जोडखर देखें, तो हम रोज आसा करते हैं
- 10:23–10:25हा, सोषल मीट्या को अदारन ले ले लिजे?
- 10:25–10:28बलकल, हम सोषल मीट्यापर कोई खबर देखते है
- 10:28–10:58और ख़ादा बग़ा था बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़
- 10:58–11:03जो हमे पता है, उसके आदार पर उस चीस को जानना जो चुपी हूँई है.
- 11:03–11:06जैसे अगर हम किसी पहाड़ पे दूए उड़ते वे देकते हैं,
- 11:06–11:09तो हम अनुमान लगाते हैं कि वहां आग जरूर होगी.
- 11:09–11:12आख, कि वहां हैं, तो आग होगी ही.
- 11:12–11:17और ये अनुमान एक नियम पर तिका होता है, जिसे व्याप्ती कैते हैं.
- 11:17–11:21व्याप्ती का मतलप है, जगा ज़ा दूवा है, वहां महां आग है.
- 11:21–11:25लिकिन एक मिनेट, व्या ये नियम हमेशा काम करता है?
- 11:25–11:27मतलप हर आग से तो दूवा नहीं उडटाना?
- 11:27–11:29उदारन के लिया.
- 11:42–11:47अपने बिल्कुल सब यहाँ तब है कि अपने वहाग तब हैं
- 11:47–11:51अपने बिल्कुल सब यहाँ तब हैं अपने वहाग तब हैं
- 11:51–11:55अपने बिल्कुल सब यहाँ तब हैं अपने वहाग तब हैं
- 11:55–11:59अपने बिल्कुल सब यहाँ तब हैं अपने वहाग तब हैं
- 11:59–12:29अदर उपादि बदा दूए चुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए श�
- 12:29–12:31उप्मान यानी तुल्ना कर के सिक्ना
- 12:31–12:35इस गरन्त में इस इस एक बहुती कलासिक उदारन से समजाय गया है
- 12:35–12:38जंगल में गवे यानी नील गय को पहचान ना
- 12:38–12:40अच्छ नील गय वाला उदारन
- 12:40–12:42अच्छ नील गय वाला उदारन
- 12:42–12:46इसके ले गंगेश तीस्रा प्रमान लाते है, जिसे उपमान कहा जाता है.
- 12:47–12:49उपमान, यानी तुल्ना करके सीकना.
- 12:50–12:53इस गरन्त में इसे एक बहुती कलासिक उदारन से समजाय गया है.
- 12:54–12:56जंगल में गवे, यानी नीलगाय को पहचानना.
- 12:56–13:26अगर बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई �
- 13:26–13:29वेरा सवाल ये है किस में नया क्या है?
- 13:29–13:32आपका मतलब है कि ये तो बस प्रत्यक्ष्श्व शब्द का जोड है?
- 13:32–13:35आना! उसने जान्वर को आखों से देखा
- 13:35–13:37और गावूबाले की बात याद की
- 13:37–13:39इस ये कि अलग प्रमान क्यो माना जाए?
- 13:39–13:43यह तो वो बिन्दू है जाहां मिमान्सक और नेयाई कापस में बवड़ जाते हैं.
- 13:43–13:48मिमान्सक भी यही कैते हैं के अई अई तो तोनो के भीच की समान्ता को देखा है.
- 13:48–13:51लेकिन गंगेश इस बात को खारिज करते हैं.
- 13:51–13:52गंगेश का क्या तरक है फिर?
- 13:52–13:55विसमज्टाते हैं के उप्मान का अस्ली प्ल,
- 13:55–13:58सर्फ उस एक सामने कडे जानवर को पहचानना नहीं है.
- 13:58–14:02ये एक बड़ी कोगनेटिव च्वलांग है, मतलब दिमागिस तरप एक बड़ा जंब है.
- 14:02–14:03कैसे जंप है?
- 14:03–14:07क्योंकि वो अन्सान सर्फ उस एक जानवर का नाम नहीं सीख रहा है.
- 14:07–14:11वो उस पूरे वर्ग, उस पूरी जाती के अद्थ को दिकोट कर रहा है.
- 14:11–14:19जिसे एक गवएयत्व कैते हैं, वो ये समच रहा है, कि नील गाय शब्द का अर्द बविश्ष्व में दिखने वाले एसे हर जानवर पर लागो होगा.
- 14:19–14:23वाँ, मतलब हम सुझफ एक अबजेक्त को नहीं पहचान रहें
- 14:23–14:27हम एक पूरे विश्वर कुन्सेप्त को अपने दिमाग में डाउन्लोड कर रहें
- 14:27–14:30बलकुल सही ये वाखगी ये अलगी लेवल की समच है
- 14:30–15:00तो अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर
- 15:00–15:30अगर में से आज की बाशा में कहुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 15:30–15:32भी बज़ा किसी नहीं जादूई शक्ती किकलपना क्यूँ करना
- 15:32–15:34बहुत ही शान्दार तूलनाय आपकी
- 15:34–15:36और नयाई दरशन इसी प्लग निकाल दिने को
- 15:36–15:38तकनी की बाशा में प्रती बन्धखा बहाँ गठा है
- 15:38–15:40प्रती बन्धखा भाओ
- 15:40–15:42मडलब रुकावट कना होना
- 15:42–15:45किसी ने बस बीचे से प्लग निकाल दिया है
- 15:45–15:48बेवजा किसी नहीं जादूई शक्ती की कलपना क्यों करना
- 15:48–15:50बहुत ही शांदार तुलनाय आपकी
- 15:50–15:52और नयाए दरशन इसी प्लग निकाल दिने को
- 15:52–15:55तकनी की बाशा में प्रती बंदखा बहाँ गठा है
- 15:55–15:58प्रती बन्दखा भाव, मदलब रुकावध का ना होना?
- 15:58–16:02आप वे कहते हैं, कि जलने की प्रक्रिया के लिए
- 16:02–16:04किसी जादूई शक्ती की जरूरत नहीं है.
- 16:04–16:07जलना तब होता है, जब आग मोजुद हो,
- 16:07–16:09और उसे रोकने वाला कोई प्रती बन्दख,
- 16:09–16:11यानी रूकाववत मोजुद ना हो
- 16:11–16:13तो मनी बसे एक रूकाववत है?
- 16:13–16:15बलकुल, जब आप मनी रकते है,
- 16:15–16:17तो मनी ही एक बहुते खुकाववत है.
- 16:17–16:20जब मनी हता लेते है, तो रूकाववत हद जाती है,
- 16:20–16:22और आख पिर जलाने लकती है.
- 16:22–16:24यह लिए किसी नई शक्तिकी क्या जरूरात है?
- 16:24–16:27गंगेश कैते है, कि तारकिक स्पष्टी करन,
- 16:27–16:30जिनना सरल होगा, उसचके उतना ही करीब होगा.
- 16:30–16:34ये सब तो बहुत ही जबर्दस्त बोध्धिक कस्रत है.
- 16:34–16:37लेकिन अब आब एक बुन्यादी सवाल,
- 16:37–17:07तो जो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़
- 17:07–17:11ये तो सच है, हम रोज मर राके कितने ही काम सर्फ अनुमान पर करते है,
- 17:11–17:15हम खाना काते है, ये अनुमान लगा कर किस में जेहर नहीं होगा,
- 17:15–17:16और ये उर्जा देगा.
- 17:16–17:17बलकुल.
- 17:17–17:19हम बस या ट्रेन में बैटते है,
- 17:19–17:24इस अनुमान के सात के द्राईवर हमें सही सलामत हमारी मनजल तक पहुटादेगा.
- 17:25–17:31अगर हम हर चीस पर शक करने लगें, कि जब दक मैं आखों से बस को मनजल तक पहुटे नहीं देख लूंगी,
- 17:31–17:33तब दक में बस में नहीं बैट हूंगी,
- 17:33–17:36तब फिर तो जीवन जीना ही असमबवो जाएगा.
- 17:36–17:37एक दम सई बात है,
- 17:37–17:40और गंगेशा इसी अनुमान के सद्दान्त को
- 17:40–17:44अनसानी जीवन से उठाकर एक बहुत बड़े दार्षनिक स्थर पर लेजाते हैं.
- 17:44–17:47वे ये से इश्वर आनुमान में बडलते हैं
- 17:47–17:48इश्वर आनुमान
- 17:48–17:51यानी इश्वर के होने कानुमान लगाना
- 17:51–17:54रूक ये ये तोड़ा पेचीदा लगरा है
- 17:54–17:58क्या गंगेशा इसी लोगिक क्या आदार पर ये साभित करते है
- 17:58–18:00कि इस दून्या का कोई रचाइता है
- 18:00–18:03मतलब वे दुन्या को एक कारे मान लेते है,
- 18:03–18:05लेकिन विरोदी तो यही कहींगे न,
- 18:05–18:08कि अगर दुन्या को बनानेवाला कोई है,
- 18:08–18:09तो उसका शरीर होना चाहिये.
- 18:09–18:11आप, यह बहुती सवहविख सबाल है.
- 18:11–18:14मतलब विना हात पैर, विना बहुतिक शरीर के,
- 18:14–18:17वो भी ब़दी दुन्या कैसे गर सकता है?
- 18:17–18:21यह बहुती सतिक तर्क है, जो उस वमें के विरुद्यों ने भी दिया था.
- 18:21–18:25वे कहते ते के जैसे गड़े को बनाने किलिए कुमार का शरीर होना जरूरी है,
- 18:25–18:29वैसी ही दुन्या बनाने वाले का भी शरीर होना चाहीे.
- 18:29–18:31तो गंगेश इसका क्या जबाब देते हैं?
- 18:31–18:34गंगेश इसका बहुत इसका सुक्ष्म जबाब देते हैं.
- 18:34–18:37वे कहते हैं के, किसी भी कारे को करने किलिए,
- 18:37–18:40शरीर का होना सबसे ज़रूरी शर्थ नहीं हैं.
- 18:40–18:42सबसे जरूरी हैं तीं चीजें.
- 18:42–18:44ज्यान, इच्छा, और प्रेद्न.
- 18:44–18:47अच्छा, मतलप करता को ये पता हो ना चाहीए,
- 18:47–18:48कि वो क्या बना रहा है,
- 18:48–18:51उसके अंदर उसे बनाने की इच्छा होनी चाहीए,
- 18:51–18:53और फिर वो कोशिष करे.
- 18:53–18:54इग्दम सहीए.
- 18:54–18:55गंगेष कहते हैं,
- 18:55–18:59इश्वर में इच्छा और प्रेट्न रहाँ अजुद हैं
- 18:59–19:02इश्वर को किसी बहुतिक शरीर के अविष्च्च्ता नहीं है
- 19:02–19:06वो सर्फ अपनी इच्छा और प्रेट्न से इस जगत की रष्च्ना करता है
- 19:06–19:07उं।
- 19:08–19:10ये तो एक विष्च्छ्द तारकिक इश्वर हूँँ
- 19:10–19:13नकी कोई पुरानेक कताम वाला शरीए़दारी इश्वर.
- 19:13–19:16बलकुल. ये प्योर लोचिक पटिकावा विचार है.
- 19:16–19:22और ये सब हमें आखिर कार नयाए दर्षन के सब पबसे अन्तिम और सबसे बड़े लक्षिक्योर लेजाता है.
- 19:22–19:23और वो लक्षिक्या है?
- 19:23–19:25यानी दुखों का हमेशा के लिए अंथ
- 19:25–19:27मतलब ये सारा लोगिक दुखों को खतम करने के लिए
- 19:27–19:29नियाए दर्षन दुखों की एक पुरी चेन या श्रिंक्ला समजगता है
- 19:29–19:31वे कहते हैं कि सब कुष शुरू होता है
- 19:31–19:33मित्थ्या ज्यान से
- 19:33–19:35दुखो को खटम करने के लिए
- 19:35–19:39नियाई दर्षन दुखो की एक पुरी चेन या श्रिंख्ला समजदाता है
- 19:39–19:41वे कैते हैं कि सब कुछ शुरू होता है
- 19:41–19:43मित्या ज्यान से
- 19:43–19:45यानी जब हमें दून्या की जुटी समच होती है
- 19:45–19:47अग्यान से
- 19:47–19:50इस अग्यान से हमारे अंदर दोष पयदा होते हैं
- 19:50–19:54जैसे किसी चीची से बहुत जाड़ लगा होना या नफ्रत होना
- 19:54–19:58इन राग और दूएश के कारन अच्छे बूरे कर्म करता हैं
- 19:58–20:01करमों का प्ल भुगतने गिलिए उसे बार बार जनम लिना परता हैं
- 20:01–20:04और ज़ाजनम है, वहां दुक तो होगगाई
- 20:04–20:07तो फिर इस दुकों की चेन को तोडा कैसे जाए?
- 20:07–20:10अगर मैं बोद्द दर्षन की बात करूं,
- 20:10–20:12तो वी कहते हैं की अपनी इच्छाँ को खतम कर दो,
- 20:12–20:14तो दुक खतम हो जाएंगे.
- 20:14–20:17लेकि न्याय दर्षन का तरीका इसे अलग लकता है
- 20:17–20:18आप ने बिलकुल सही अंटर पक्डा है
- 20:18–20:20न्याय दर्षन कहता है
- 20:20–20:23कि स्र्फ इच्छाँ को दबाने से काम नहीं चलेगा
- 20:23–20:25किंकि अगर भीमारी की ज़ मोजुद है
- 20:25–20:27तो इच्छाँ ये वापस लोट आगी
- 20:27–20:29और वो ज़ड है, मित्थ्या गयान.
- 20:29–20:32बलकल, जब तक आप इस अग्यान को तत्व गयान,
- 20:32–20:35यहनी सच्ची नोलेज नाम की तलवार से नहीं काटेंगे,
- 20:35–20:36तब तक खुच नहीं होगा.
- 20:36–20:38जब अब अप अज़ी लोगिक लिए तब लेता है,
- 20:38–20:41अद्खों की वो पूरी चेन वही भिखर जाती है
- 20:41–20:45एक दम सही, असली आजादी हमें सर्फ सही गयान से ही मिल सकती है
- 20:45–20:49वाज, आजकी इस ग़राई बहरी चर्चा को समेट ते हुए
- 20:49–20:53मुझे लकता है, हमें गंगेश उपाद्ध्याए की
- 20:53–20:57वाजग की इस ग़ेराई भरी चर्चा को समेटते हुए
- 20:57–20:58आम...
- 20:58–21:01मुझे लकता है हमें गंगेश उपाद्ध्धयाए की
- 21:01–21:04वक्तिगद जन्गी के बारे में भी बात करनी चाहीगे
- 21:04–21:05जो बहुत प्रेना दायक है
- 21:05–21:35अगर जीवन बुत संगरष्मूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 21:35–21:38यही पर उनकी कहानी हमें एक बड़ बडी सीक देती है
- 21:39–21:41कि ग्यान किसी बादा को नहीं मानता?
- 21:41–21:42बिलकुल!
- 21:42–21:46गंगेश की बड़दिक प्रतिबा किसी सामाजिक तरसकार की मोटाज नहीं
- 21:47–21:49उनहोंने अकेले अपने दंपर,
- 21:49–21:52नव्वे न्याए की जो पद्दती गडी उतनी अचुक ती
- 21:52–21:56के आने वाली कई सद्यों तक पूरे भारत के विद्वानों को
- 21:56–21:58गंगेश की ही बाशा सीकनी पडी
- 21:58–22:02ये वाखगे इस बात का प्रमाण है कि ज्यान और तरक की ताकत
- 22:02–22:05समाजिक प्रतिष्टा से कही उपर होती है.
- 22:05–22:06बलकुल सही बात है.
- 22:06–22:10और इसी विचार के साथ हम अपनी आजके इस चर्चा को विराम देंगे.
- 22:10–22:14लेकिन श्रोताउ के लिए एक बहुत इस रोरी सवाल चोडगे जाएंगे.
- 22:14–22:19चोडवी शताबदी में गंगेश उपाद्धयायने ब्रहम और फेख नुज,
- 22:19–22:22जिसे वे अप्रमा यानी जुटा ग्यान कहते थे,
- 22:22–22:26उसे बचने के लिए एक अच्छुक तारकिख भाशा का निरमान किया था.
- 22:26–22:29ताकी लोग उपादी को प्यचान सके.
- 22:29–22:36आँ ज़रा आज के समय के बारे में सुचीए आज हम आलगुरिदम अडीप फेख के युग में जी रहे हैं.
- 22:36–22:40इंटनेट हमारा नया प्रत्यक्ष प्रमान बन गया है.
- 22:40–22:43लेकिन यहा हमें आखसर वही सच दिखाया जाता है,
- 22:43–22:45जो हम देखना चाहते है.
- 22:45–22:48या जो कोई और हमे दिखाना चाहता है
- 22:48–22:49ये एक बड़ बड़ा क्यत्रा है
- 22:49–22:52चाहम सभ भी किसी बड़ बड़ी उपादी
- 22:52–22:55यानी किसी चुपी हुई कहराब शर्थ के शिकार तो नहीं हो गगे है
- 22:55–22:58क्या हमारे दिजिटल सच को परगने के लिए
- 22:58–23:02आप आप फिर मुलाकात होगी आसी ही एक और गेहरी तारकी क्यात्रापर
Plain text
अगर बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा बदा ब� आप यह थे श्क्रींज पर दोरतेवे नमवर एक दम सई, लिकिम ख्या हो अगर में कहु के अईन्सान के दिमाग का मतलब उसकी तर्क शम्ता का एक अँसाई लोगिकल कोड आज से लगबभग साथ सो साल पहले लिखा गया था और वाआ और वो भी केसी आदूनिक रिश्व्ट्ड़््ड्ड्लाब में बलकी चोडवी शताबदी के मिठला में यो वाखि सूछने वाद है और में बतावगा कि ये कोई मदप कोई अती शुक्ती जा मेटाफर नहीं है हम यहां जिस तारकिग भाशा की बात कर रहे है, वो है गंगे शुपाद्याय का लिखावा युगान्तर कारी ग्रन्त तत्व चिंतमनी जी, बलकु. आज के इस गेहन विष्लेशन में, हम मूल संट्सक्रित से मैठिली में गजंट्र ताकृर दुरा किये गे, इसके अनुवाद के जर्ये, इंसान के सचको पहचानने की इसी वैग्यानिक पद्दती को समजने की कोशिष करेंगे आँ, क्योंकी ये सरफ कोई पुरानी दाश्टने किताब नहीं है ना? ये नव्व्य न्याय नाम की एक अईसी जबर्दस प्रनाली है, जिसने बारती ए ग्यानमी मान्सा की यानी हम ग्यान कैसे प्राथ करते हैं, उसकी पुरी दिशा ही बडल कर रगदी थी. और मैं यहे सोच रही ती, के इस ग्रन्त के लिखे जाने के पीचे की कहानी भी किसी त्रिलर से कम नहीं है. मतलव, उस समः एक बहुत बडा संकत कडा अगया ता ना. अआ, दार्षनिक दुन्या में एक तरह का हाँकार मचावा वा जिसे हम एक ज्याना मिमान सक संकत कैसकते हैं. भोडद दार्षनिकों और अदवेत विदान्त के श्री हर्ष के कारन. भिल्कुल सही कहा आपने. श्री हर्ष एक बहुती प्रकर विद्वान हुएं. इनलोग ने पुराने नियाय दर्षन की बून्यात को ही रहा दिया था श्रीहर्ष का तरक बहुत टीखा था मतलब उनहु ने कहा क्या था अखिर उनका कहना ता किस दुनिया में किसी भी चीस के मतलब किसी भी सच्चाए की कोई पर्फेट्ट परिबाशा हुई निसक्ती अच्छ? अगर परिबाशा नहीं हो सक्ती तो सच क्या है ये कभी साभित नहीं किया जा सकता बाप्रे तो जला सुच ये अगर हम ये साभित ही ना कर सकें की सच क्या है तो फिर तर्क करने का विग्यान का या किसी बितरार के ग्यान का कोई मतलबी नहीं रहे जाता? बिलकल, अदवैत विदान्त के अनुसारतो दून्या माया है, इसलिये किसी तोस परिबाशा की जरुरती नहीं है, लेकि न्यादर्षन या तार्ट्वादी है, वो मानता है कि ये दून्या सच है? और इसे जाना जासकता है तो दर्षन को इस बहुत बड़े संकत से बचाने के लिए ही गंगेश वौपाद्ध्याने आंट्री ली और यह नहीं विष्लेशना द्मक पद्धी गडी अगर आम पुराने ने आए दर्षन को देखेना तो उस्मे सोला रगलग विश्यो या पदार्थो पर चर्चा हूती थी जैसे आत्मा, शरीर और भी बहुत कुच आप, लिकिन गंगेश ने एक बहुत बड़ाव किया, है ना? उनो आप पूरी सोला की लिस्ट को किनारे कर दिया उन्हु आपना पुरा द्यान स्रिएव चार चीजों पर किंद्रित कर दिया उन्हु आपना पहले हमें ये समजना होगा कि हम कोई चीज जानते कैसे हैं मतलब जान प्राप्त करने के सादन क्या है अपना उन्हु आपना पुर चीजों चार अचुक सादन बताए अप ब़हला प्रक्तिक्ष यहनी जो हम देकते यह महसुज करते हैं दुस्रा अनुमान यहनी जो हम लोगिक से निकालते हैं और तीस्रा उपमान बलक्ल उपमान यहनी जब हम तुल्ना करके कुछ सीकते हैं और चोथा है शबद यानी किसी विष्वस्नी अवेक्ती की कही हुई बात गंगेश का मनन था कि अगर हमरी तूल्स ही खराब हैं तो हम कभी किसी सच्चाई तक नहीं पूँच्चकते तो चली है, हम भी अपनी इस्टार की क्यात्रा को वही से शूरू करते हैं ज़हां से कोई भी बड़ा काम शुरू होता है जब भी हम कोई नेया काम शुरू करते हैं तो सब से पहले क्या करते हैं अकसर लोग कोई प्रार्ठना करते हैं या शुर्वात अच्छी हो यस की कामना करते हैं आँ इस गरन्त मे भी शुर्वात मंगल वाद की अवद्धारना से होती है मैंने पड़ा था के पुराने मीमान सक विद्वान ये मानते थे कि किसी भी गरन्त की शुर्वात में मंगल या प्रार्थना करने का सीदा नतीजा ये होता है की गरन्त बिना किसी रुकावद के पूरा हो जाता है अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है अगर मंगल ही गरन्त पूरा हूने कारने कारने है तो आप यह था प्रज़ा तो बवाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद � जगया दी जारी है. अगर मैं से आजके संदरप में समचूँ, तो मुझे एक आनालजी यादारी है. बता एए कुँसी आनलोगी? ये कुछ कुछ वैसा यहे जेसे हम किसी एकसप्रस वेपर अपनी गाडी दोडा रहे हो. अब मंगल या प्रार्थना काम हमारी गाडी को द्राइव करके, मंजल तक पहचाना नहीं है. मंगल का काम सिर्फ इतना है, कि वो सड़क पर पडेवे पट़रों और गद्डों को रड़ा दें क्या बाद है? आप मतलब अगर सड़क पहले से ही साफ है यानी किसी नास्तिक की सड़क पर पहले से ही कोई बादा नहीं है तो बिना मंगल की ये भी अपनी मनजल तक पहुची जाएगा आपने बहुत ही सती कुदारन दिया गंगेश का तरक भी थीक यही है वे कैते हैं के मंगल का सीथा पल विगन नाश है यानी लास्ते की बादहाँ को नश्ट करना वं और गरन्त का पूरा होना तो सर्फ एक बाई प्रड़क्त है बिलकुल गरन्त पूरा होगा या नहीं, ये लेक्हक की अपनी महनत और सानसारिक प्रयासो पर निरभर करता है. तो रास्ते की बाद है, तो हदगें. अब सवाल आता है ग्यान की सच्चाई पर. मतलव, हम कैसे माने की जो ग्यान हमें मिल रहा है, वो सच है. इस पर मी मान्सको का एक बडा अजीब सा सिद्धानत है ना? आँ, स्वतब प्रामाणने का सद्धियानत. वे कैतेंगे गियान जैसे ही आमारे दिमाग में पैडा होता है, वो अपने आपी सिथ दो जाता है. अगर हमारा हर गयान पैडा होते ही खुदबा खुदबा सच्चा साभबत हो जाता तो हमें कभी किसी बात पर शक्कियो होता मान लीजे मैं सुबे सोकर उडी हूँ कम्रे में अंदेरा है और मुझे जमीन पर रस्सी का एक तुक्डा साप जैसा लकता है तो हमें कभी किसी बात पर शक्च क्यो होता मान लीजे मैं सुबे सोकर उडिही हूं कमरे में अंदेरा है और मुझे जमीन पर रस्सी का एक तुक्डा साप जैसा लकता है बहुत इक लासे कुदारा न है तो अगर ग्यान तुरन सच्चा होता तो उसी वक दरके मारे बेसुद हो जाती लेकिन अन्सान रुकता है रोश्नी जलाता है और फिर देकता है कि आस्लियत क्या है ये जो हमारे मन में शक पैडा होता है वो तो इस अटमाटिक सच्चाई वाले सिद्धान्त को ही खारिज कर देता है ना अपने बिल्कुल न्याये दर्षन की तरक किया है गंगेश भी यही कहते हैं विमी मान्सकों के सिद्दान्त को नहीं मानते उनका कहना है की ज्यान की सच्चाई हमेशा किसी तुसरी चीज से साभित होती है अच्छा इसी क्या कहते है इसे वे परत्टा हप रमाने वाद केते हैं जब भी हमे पहली बार कुई नया गयान मिलता है तो हम तोब उस पर आंदा विष्वास नहीं करते है हम उसे टेस्ट करते हैं तो ये टेस्टिंग होती कैसे हैं मतलम रान लीजे मैं रेगिस्टान में हों अब भी बाग ग़ाई बाग गाई बाग गाई बाग गाई बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बा� बब्रव्द्ती का मतलब है आपका आक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� और वो दिमागी हमारे साथ खेल खेल रहा है? आप का मतलव है, जब आम आख्छन लेने से पहले एक इसी भ्रहम में पस जाएं? आप, बलकल वाई. ये बहुत यी गेरा सवाल है, दर्षन शास्तर में इसे ख्याती वाद की बहेस कहाजाता है. इस में सब से मशुर उदारन आता है, समद्र किनारे पडी सीप को चान्दी समज लेना. चान्दी चान्दी चान्दी समज लेना. इक इनसान समद्र के किनारे चल रहा है, सूरच की रोषनी में एक सीप चमक रही है. वह उसे अस्ली चान्दी समचता है, और उठाने दोड़ परता है. आँ, लेकिन इस ब्रम को रग रग रग दाशने क रग रग रग रग तरीके से समजाते है ना. प्राभाकर मीमान्सक तो शाएद इसे सर्फ एक बूलने की बिमारी मानते है. प्राभाकर मीमान्सक इसे अख्ख्याती वाद या बेदा गरह केते हैं. उनका तरक है, यहां अई अई नहीं गलती नहीं कर रहा है. वो सामने पुडी सीप को देख रहा है, और उसके दिमाग में पहले से मुझुद चान्दी की याद ताजा हो गी है. अचा तो वो बस दोनो को मिखस कर रहा है. आप बज़ सामने की चीज और अपनी याद्दाश्ट इन दोनो के भीच का भेद यानी अंपर नहीं समझ बारा है. रूके रूकी ए, ये व्याख्या मुझे पूरी नहीं लगरी. बलकी हम सामने वाली चीस को सच्छ में कुछ अर देख्रे होतें। आप बहुत सही पौईंट पेजारीं है। क्या अप अप मतलब यह ज़ारीं के हमारा दिमाग आस्लियत में एक तरा का मैंटल फोटो एडितिंग कर रहा है तो अगर दिमाग अस्लियत में एक तरा का मेंटल फोटो अदिटिटिंग कर रहें जैसे वो सामने पडी सीप की तस्वीर पर एक चान्दी पन का चमकत होगा रहा है जो असल में वहां है ही नहीं आप बलकुल सही दिशा में सोच रही हैं गंगेश उपाद्ध्याय का न्याई दर्षन थी की यही बात कैता है इसे अन्यता ख्याती कहाथा है अन्यता ख्याती मतलब दूस्री चीस खोपना बलकल, न्याई दर्षन केता है कि ये सर्फ या दाश्ट की कमजोरी नही है इंसान का दिमाग बहुत अक्तिवली उस्टीप पर चान्दी के गुड यानी रजत्व को ठोप रहा है. अमेग चीज को किसी दुस्री चीज के रुप में गडर रहे हैं. न्चोचिये जरा ये कितनी गेहरी बात है, हमारा दिमाग हमारी वास्तविक्ता को अपने हिसाप से गड़ लेता है अगर हम इसे आजके जीवन से जोडखर देखें, तो हम रोज आसा करते हैं हा, सोषल मीट्या को अदारन ले ले लिजे? बलकल, हम सोषल मीट्यापर कोई खबर देखते है और ख़ादा बग़ा था बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ा बग़ जो हमे पता है, उसके आदार पर उस चीस को जानना जो चुपी हूँई है. जैसे अगर हम किसी पहाड़ पे दूए उड़ते वे देकते हैं, तो हम अनुमान लगाते हैं कि वहां आग जरूर होगी. आख, कि वहां हैं, तो आग होगी ही. और ये अनुमान एक नियम पर तिका होता है, जिसे व्याप्ती कैते हैं. व्याप्ती का मतलप है, जगा ज़ा दूवा है, वहां महां आग है. लिकिन एक मिनेट, व्या ये नियम हमेशा काम करता है? मतलप हर आग से तो दूवा नहीं उडटाना? उदारन के लिया. अपने बिल्कुल सब यहाँ तब है कि अपने वहाग तब हैं अपने बिल्कुल सब यहाँ तब हैं अपने वहाग तब हैं अपने बिल्कुल सब यहाँ तब हैं अपने वहाग तब हैं अपने बिल्कुल सब यहाँ तब हैं अपने वहाग तब हैं अदर उपादि बदा दूए चुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए शुपी हूँए श� उप्मान यानी तुल्ना कर के सिक्ना इस गरन्त में इस इस एक बहुती कलासिक उदारन से समजाय गया है जंगल में गवे यानी नील गय को पहचान ना अच्छ नील गय वाला उदारन अच्छ नील गय वाला उदारन इसके ले गंगेश तीस्रा प्रमान लाते है, जिसे उपमान कहा जाता है. उपमान, यानी तुल्ना करके सीकना. इस गरन्त में इसे एक बहुती कलासिक उदारन से समजाय गया है. जंगल में गवे, यानी नीलगाय को पहचानना. अगर बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई बवाई � वेरा सवाल ये है किस में नया क्या है? आपका मतलब है कि ये तो बस प्रत्यक्ष्श्व शब्द का जोड है? आना! उसने जान्वर को आखों से देखा और गावूबाले की बात याद की इस ये कि अलग प्रमान क्यो माना जाए? यह तो वो बिन्दू है जाहां मिमान्सक और नेयाई कापस में बवड़ जाते हैं. मिमान्सक भी यही कैते हैं के अई अई तो तोनो के भीच की समान्ता को देखा है. लेकिन गंगेश इस बात को खारिज करते हैं. गंगेश का क्या तरक है फिर? विसमज्टाते हैं के उप्मान का अस्ली प्ल, सर्फ उस एक सामने कडे जानवर को पहचानना नहीं है. ये एक बड़ी कोगनेटिव च्वलांग है, मतलब दिमागिस तरप एक बड़ा जंब है. कैसे जंप है? क्योंकि वो अन्सान सर्फ उस एक जानवर का नाम नहीं सीख रहा है. वो उस पूरे वर्ग, उस पूरी जाती के अद्थ को दिकोट कर रहा है. जिसे एक गवएयत्व कैते हैं, वो ये समच रहा है, कि नील गाय शब्द का अर्द बविश्ष्व में दिखने वाले एसे हर जानवर पर लागो होगा. वाँ, मतलब हम सुझफ एक अबजेक्त को नहीं पहचान रहें हम एक पूरे विश्वर कुन्सेप्त को अपने दिमाग में डाउन्लोड कर रहें बलकुल सही ये वाखगी ये अलगी लेवल की समच है तो अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर में से आज की बाशा में कहुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ भी बज़ा किसी नहीं जादूई शक्ती किकलपना क्यूँ करना बहुत ही शान्दार तूलनाय आपकी और नयाई दरशन इसी प्लग निकाल दिने को तकनी की बाशा में प्रती बन्धखा बहाँ गठा है प्रती बन्धखा भाओ मडलब रुकावट कना होना किसी ने बस बीचे से प्लग निकाल दिया है बेवजा किसी नहीं जादूई शक्ती की कलपना क्यों करना बहुत ही शांदार तुलनाय आपकी और नयाए दरशन इसी प्लग निकाल दिने को तकनी की बाशा में प्रती बंदखा बहाँ गठा है प्रती बन्दखा भाव, मदलब रुकावध का ना होना? आप वे कहते हैं, कि जलने की प्रक्रिया के लिए किसी जादूई शक्ती की जरूरत नहीं है. जलना तब होता है, जब आग मोजुद हो, और उसे रोकने वाला कोई प्रती बन्दख, यानी रूकाववत मोजुद ना हो तो मनी बसे एक रूकाववत है? बलकुल, जब आप मनी रकते है, तो मनी ही एक बहुते खुकाववत है. जब मनी हता लेते है, तो रूकाववत हद जाती है, और आख पिर जलाने लकती है. यह लिए किसी नई शक्तिकी क्या जरूरात है? गंगेश कैते है, कि तारकिक स्पष्टी करन, जिनना सरल होगा, उसचके उतना ही करीब होगा. ये सब तो बहुत ही जबर्दस्त बोध्धिक कस्रत है. लेकिन अब आब एक बुन्यादी सवाल, तो जो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ा तो बगाड़ ये तो सच है, हम रोज मर राके कितने ही काम सर्फ अनुमान पर करते है, हम खाना काते है, ये अनुमान लगा कर किस में जेहर नहीं होगा, और ये उर्जा देगा. बलकुल. हम बस या ट्रेन में बैटते है, इस अनुमान के सात के द्राईवर हमें सही सलामत हमारी मनजल तक पहुटादेगा. अगर हम हर चीस पर शक करने लगें, कि जब दक मैं आखों से बस को मनजल तक पहुटे नहीं देख लूंगी, तब दक में बस में नहीं बैट हूंगी, तब फिर तो जीवन जीना ही असमबवो जाएगा. एक दम सई बात है, और गंगेशा इसी अनुमान के सद्दान्त को अनसानी जीवन से उठाकर एक बहुत बड़े दार्षनिक स्थर पर लेजाते हैं. वे ये से इश्वर आनुमान में बडलते हैं इश्वर आनुमान यानी इश्वर के होने कानुमान लगाना रूक ये ये तोड़ा पेचीदा लगरा है क्या गंगेशा इसी लोगिक क्या आदार पर ये साभित करते है कि इस दून्या का कोई रचाइता है मतलब वे दुन्या को एक कारे मान लेते है, लेकिन विरोदी तो यही कहींगे न, कि अगर दुन्या को बनानेवाला कोई है, तो उसका शरीर होना चाहिये. आप, यह बहुती सवहविख सबाल है. मतलब विना हात पैर, विना बहुतिक शरीर के, वो भी ब़दी दुन्या कैसे गर सकता है? यह बहुती सतिक तर्क है, जो उस वमें के विरुद्यों ने भी दिया था. वे कहते ते के जैसे गड़े को बनाने किलिए कुमार का शरीर होना जरूरी है, वैसी ही दुन्या बनाने वाले का भी शरीर होना चाहीे. तो गंगेश इसका क्या जबाब देते हैं? गंगेश इसका बहुत इसका सुक्ष्म जबाब देते हैं. वे कहते हैं के, किसी भी कारे को करने किलिए, शरीर का होना सबसे ज़रूरी शर्थ नहीं हैं. सबसे जरूरी हैं तीं चीजें. ज्यान, इच्छा, और प्रेद्न. अच्छा, मतलप करता को ये पता हो ना चाहीए, कि वो क्या बना रहा है, उसके अंदर उसे बनाने की इच्छा होनी चाहीए, और फिर वो कोशिष करे. इग्दम सहीए. गंगेष कहते हैं, इश्वर में इच्छा और प्रेट्न रहाँ अजुद हैं इश्वर को किसी बहुतिक शरीर के अविष्च्च्ता नहीं है वो सर्फ अपनी इच्छा और प्रेट्न से इस जगत की रष्च्ना करता है उं। ये तो एक विष्च्छ्द तारकिक इश्वर हूँँ नकी कोई पुरानेक कताम वाला शरीए़दारी इश्वर. बलकुल. ये प्योर लोचिक पटिकावा विचार है. और ये सब हमें आखिर कार नयाए दर्षन के सब पबसे अन्तिम और सबसे बड़े लक्षिक्योर लेजाता है. और वो लक्षिक्या है? यानी दुखों का हमेशा के लिए अंथ मतलब ये सारा लोगिक दुखों को खतम करने के लिए नियाए दर्षन दुखों की एक पुरी चेन या श्रिंक्ला समजगता है वे कहते हैं कि सब कुष शुरू होता है मित्थ्या ज्यान से दुखो को खटम करने के लिए नियाई दर्षन दुखो की एक पुरी चेन या श्रिंख्ला समजदाता है वे कैते हैं कि सब कुछ शुरू होता है मित्या ज्यान से यानी जब हमें दून्या की जुटी समच होती है अग्यान से इस अग्यान से हमारे अंदर दोष पयदा होते हैं जैसे किसी चीची से बहुत जाड़ लगा होना या नफ्रत होना इन राग और दूएश के कारन अच्छे बूरे कर्म करता हैं करमों का प्ल भुगतने गिलिए उसे बार बार जनम लिना परता हैं और ज़ाजनम है, वहां दुक तो होगगाई तो फिर इस दुकों की चेन को तोडा कैसे जाए? अगर मैं बोद्द दर्षन की बात करूं, तो वी कहते हैं की अपनी इच्छाँ को खतम कर दो, तो दुक खतम हो जाएंगे. लेकि न्याय दर्षन का तरीका इसे अलग लकता है आप ने बिलकुल सही अंटर पक्डा है न्याय दर्षन कहता है कि स्र्फ इच्छाँ को दबाने से काम नहीं चलेगा किंकि अगर भीमारी की ज़ मोजुद है तो इच्छाँ ये वापस लोट आगी और वो ज़ड है, मित्थ्या गयान. बलकल, जब तक आप इस अग्यान को तत्व गयान, यहनी सच्ची नोलेज नाम की तलवार से नहीं काटेंगे, तब तक खुच नहीं होगा. जब अब अप अज़ी लोगिक लिए तब लेता है, अद्खों की वो पूरी चेन वही भिखर जाती है एक दम सही, असली आजादी हमें सर्फ सही गयान से ही मिल सकती है वाज, आजकी इस ग़राई बहरी चर्चा को समेट ते हुए मुझे लकता है, हमें गंगेश उपाद्ध्याए की वाजग की इस ग़ेराई भरी चर्चा को समेटते हुए आम... मुझे लकता है हमें गंगेश उपाद्ध्धयाए की वक्तिगद जन्गी के बारे में भी बात करनी चाहीगे जो बहुत प्रेना दायक है अगर जीवन बुत संगरष्मूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ यही पर उनकी कहानी हमें एक बड़ बडी सीक देती है कि ग्यान किसी बादा को नहीं मानता? बिलकुल! गंगेश की बड़दिक प्रतिबा किसी सामाजिक तरसकार की मोटाज नहीं उनहोंने अकेले अपने दंपर, नव्वे न्याए की जो पद्दती गडी उतनी अचुक ती के आने वाली कई सद्यों तक पूरे भारत के विद्वानों को गंगेश की ही बाशा सीकनी पडी ये वाखगे इस बात का प्रमाण है कि ज्यान और तरक की ताकत समाजिक प्रतिष्टा से कही उपर होती है. बलकुल सही बात है. और इसी विचार के साथ हम अपनी आजके इस चर्चा को विराम देंगे. लेकिन श्रोताउ के लिए एक बहुत इस रोरी सवाल चोडगे जाएंगे. चोडवी शताबदी में गंगेश उपाद्धयायने ब्रहम और फेख नुज, जिसे वे अप्रमा यानी जुटा ग्यान कहते थे, उसे बचने के लिए एक अच्छुक तारकिख भाशा का निरमान किया था. ताकी लोग उपादी को प्यचान सके. आँ ज़रा आज के समय के बारे में सुचीए आज हम आलगुरिदम अडीप फेख के युग में जी रहे हैं. इंटनेट हमारा नया प्रत्यक्ष प्रमान बन गया है. लेकिन यहा हमें आखसर वही सच दिखाया जाता है, जो हम देखना चाहते है. या जो कोई और हमे दिखाना चाहता है ये एक बड़ बड़ा क्यत्रा है चाहम सभ भी किसी बड़ बड़ी उपादी यानी किसी चुपी हुई कहराब शर्थ के शिकार तो नहीं हो गगे है क्या हमारे दिजिटल सच को परगने के लिए आप आप फिर मुलाकात होगी आसी ही एक और गेहरी तारकी क्यात्रापर