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भामती_दर्शन_का_मैथिली_अनुवाद.m4a
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- 0:00–0:07अख्सर यह माना जाता है, के जब बाद किसी हाजार साल पुरानी अद्यन्त गेहरी डाशनिक किताप की होती है,
- 0:07–0:11तो वो किसी इंक्रिठ्टेट कोट जैसी होती है.
- 0:11–0:41आप बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ ब�
- 0:41–0:45गेहन चर्चा के किंदर में, तीक यही एतिहासिक गटना है.
- 0:45–0:47सुरोत के रूप में हमारे सामने,
- 0:47–0:50नवी सताब्दी का एक महान संसक्रित गरन्त है, भामती.
- 0:51–0:53जो की आदिश शंकर आचार्ये के,
- 0:53–0:55ब्रम्म सुत्र भाश्च्य पर,
- 0:55–0:57एक अत्यंत प्रमानिक टीका है.
- 0:57–0:58बिल्कुल!
- 0:58–1:00और सबसे रोमाचक बात यहे है,
- 1:00–1:03के हम दो हजार चब्विस में आए,
- 1:03–1:05इसके एक एतिहासिक
- 1:05–1:09और शुध मेठिली अनुवाद का विष्लेशन कर रहे है,
- 1:09–1:11जिसे गजंद्र ताकृगी ने किया है.
- 1:11–1:14ये सरफ एक बाशा से तुस्री बाशा का सफर नहीं है.
- 1:27–1:33बारी बोच तले दबे बना जदिल विष्यों के उन उन आहा पलों कानन लेना चाते हैं.
- 1:33–1:39तीके चलीए इसके हर पहलू को खोल कर देकते हैं और सब से पहले अनुवाद से पीचे हटकर
- 1:39–1:41उस असादारन मस्तिष्क की योर रुख करते है,
- 1:42–1:45जिसने इस मूल संसक्रत गरन्त की रचना की ती.
- 1:45–1:46वाचस्पती मिष्र
- 1:46–1:48बहारते दर्षन के इतिहास में,
- 1:49–1:52उम ये नाम किसी बोद्धिक चमतकार से कम नहीं है.
- 1:53–1:55मैं बतार रही थीना की वाचस्पती मिष्र,
- 1:55–2:25नोवी शताबदी करिब आप्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 2:25–2:33योग या पुर्व मिमान्सा रडशन के मुल सिद्धान्तो पर इतनी गडराई से टीकाई लिखी,
- 2:33–2:36कि वे आपने आप में स्वतन्त्र ग्रन्त बन गय.
- 2:36–2:42और इंसब के बाद अपने दाशनिक सफर के एक दम चरम पर उनो आपना अन्तिम
- 2:42–2:45अर सब से महान कारे रचा बहामती
- 2:45–2:47ये तो कुछ यह जैसे
- 2:47–2:50आज के समय का कोई एकी सोफ़र अंजन्यर
- 2:50–2:52आपल, विन्डोज और लेनिक्स
- 2:52–2:55तीनो अलग-गलग अप्रेटिंग सिस्तम्स का
- 2:55–2:57सब से बहत्रीं, सब से जटिल-कोर-कोर
- 2:57–2:58अकेले ही लिग दे
- 2:58–2:59बहुत लिए सटी कुदारन है
- 2:59–3:02मतलव, हर सिस्तम का अखिटेक्च्छर अलगे है आगा
- 3:02–3:03असकी बाशा अलगे है
- 3:03–3:05लेकिन वो एक ही अन्सान
- 3:05–3:08उन सब के सोर्स कोड को उसकी अपनी शर्टों पर मास्टर कर चुका है
- 3:08–3:10मैं तो सुच रहाता की
- 3:10–3:12ये सच में अविश्वस निये लकता है.
- 3:12–3:12बिलकुल.
- 3:12–3:15और अगर अम इसे व्यापक नजर्ये से जोड कर देखें,
- 3:15–3:19तो उनो अगर सच में हर दाशनिक शाखा के कोर-कोर,
- 3:19–3:21बिना किसी पूर्वाग रहे के समझा.
- 3:21–3:25लेकिन भामती केवल एक व्याख्याया ट्रान्सलेशन नी फीटुग अच्छा
- 3:25–3:31मा इस गरन्त ने अद्वैट्वेदान्त के भीतर एक पूरी नईवेचारिग दारा को जन दिया
- 3:31–3:34अगर अद्वैट्वेदान्त के इतिहास के पन्नो को पल्तें
- 3:34–3:37तो 2 मुख्य स्कूल या प्रस्थान दिखाई देते हैं
- 3:37–3:39एक है विव्रन्प्रस्थान
- 3:39–3:43और दुस्रा है स्वयम वाच्वस्पती मिष्रका बामती प्रस्थान
- 3:43–3:46तो इं दोनो के भीच मुख्य फर्क क्या था?
- 3:46–3:49बामती की सबसे बढ़ी खास्यत ये स्तापित करना है
- 3:49–3:54कि अविद्ध्या, यानी अग्यान का जु मुल आश्ड़े अस्टान है वो जीव है
- 3:54–3:56यानी विक्तिगत आत्मा
- 3:56–3:58जब की विव्रन प्रस्थान का तरक ता,
- 3:58–4:02कि अविद्ध्या का आश्ड़े स्वयम ब्रम्व है
- 4:02–4:04आहा, मतलब अग्यान किस के भीतर बटा है,
- 4:04–4:34बवाड़िए में बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बा�
- 4:34–4:37अब अगर अविद्या और अग्यान की बात होगी रही ए,
- 4:37–4:40तो उस मुद्दे कियोर बडना सबभगिक हो जाता है
- 4:40–4:43जो भामती कषबसे चुनोती पून और
- 4:43–4:44मूल दाशनिक सवाल है
- 4:45–4:45अद्दियास
- 4:46–4:48जिसे हम सुपर इमपोजेशन
- 4:48–4:50या आम भाशा में ब्रहम कहते हैं
- 4:50–4:51हाँ, ब्रहम
- 4:51–4:53जब मैं सुरतों का दिन कर रहा आता
- 4:53–4:55तो एक चीजने मुझे बहुत हैरान किया
- 4:55–4:59वो ता पूरू पक्ष यहनी विरोदी विचार का रवएया
- 4:59–5:03प्राचीन भारतिय शास्ट्रारत में जो विरोदी विचार होता था
- 5:03–5:05उसकी आक्रामकता कमाल की ती
- 5:05–5:35यहां विरोदी सर्फ विनम्रता से सवाल नहीं पूच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्
- 5:35–5:37उद्वाल उठाना पुरी तरहे से भेवगूफी है
- 5:37–5:40उसने तरक दिया कि मैं का अनुबव तो
- 5:40–5:43इतना सपष्ट है कि हर कोई अपना स्तित्व जानता है
- 5:43–5:46तो इस मैंपर शक करना तो
- 5:46–5:49कववे के दाद गिनने जैसा निरर्थक काम हो गया
- 5:49–5:50एक दम सही
- 5:50–6:20अदियान बाद नबबव बाद नबबव बाद नबबव बाद नबबबव बाद नबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब
- 6:20–6:24वाचस्पति मिश्र अद्वेद का एक बलकुल अनोखा सिद्धान स्थापित करते है,
- 6:24–6:28जिसे अनिर वच्निया ख्याति कहाजाता है.
- 6:28–6:31वाचस्पति मिश्र अद्वेद का एक बलकुल अनोखा सिद्धान स्थापित करते है,
- 6:31–6:34जिसे अनिर वच्निया ख्याति कहाजाता है.
- 6:50–7:20उआद बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए �
- 7:20–7:22उस्पानी से अपनी प्यास बुजा लेता
- 7:22–7:24जो कि वो कर नहीं सकता
- 7:24–7:26आप ये तो लोगिकल है
- 7:26–7:29और दूसी तरफ अगर वो पानी पुरी तरहा असत्या जुट होता
- 7:29–7:31जैसे आस्मान का भूल
- 7:31–7:33जिसका कोई अस्तित वही नहीं है
- 7:33–7:35पानियागो को दिक्हाई ही नहीं देता.
- 7:35–7:36अहू..
- 7:36–7:39मलप कियों कि तो दिक्हरा है, इसलिये पुरी तरा जूट नहीं.
- 7:39–7:42बिलकुल, दिक्हरा है एसलिये जूट नहीं है,
- 7:42–7:45और प्यास नहीं भूजासकता इसलिये सच नहीं है.
- 7:45–7:47वो नतो सत है न असत है.
- 7:47–7:49इसी ले उसे अन्निरवच्निया कहागया
- 7:49–7:52यहनी जिसे सत्तिया असत्तिय की श्रेनियो में
- 7:52–7:54पारी भाशित ही ना किया जासके.
- 7:54–7:56मरिक्त्रिष्ना का तरक तो बहुत सतिक बट्ता है.
- 7:56–8:00लिकने या मेरे मन में पूर्वपक्ष की तरही गेरा सवालोक रहा है.
- 8:00–8:03ज़े रेगिस्तान का पानी ब्रम है, यह वान लिया.
- 8:03–8:07लेकिने जो मैं का अनुबव है, वो म्रिक्त्रिष्ना कैसे हो सकता है.
- 8:07–8:08अच्छा कैसे?
- 8:08–8:11मलग, बच्पन में जो मैं अपने माता पिता के साथ खिलता था.
- 8:11–8:15वाचस्पती मिश्र इसी बिन्दो को स्पष्ट करते वे कहते है,
- 8:15–8:19कि ये जो निरन्तर बनावा मैं का अनुबहव है ना,
- 8:19–8:23यही तो सबसे बड़ा और सबसे गेरा अद्ध्यास है.
- 8:23–8:26वाचस्पती मिश्र इसी बिन्दो को स्पष्ट करते है,
- 8:26–8:30वाचस्पती मिष्र इसी बिन्दो को सबष्ट करते वे कहते हैं,
- 8:30–8:34कि ये जु निरन्तर बनावा मैं का अनुबव हैं आ,
- 8:34–8:38यही तो सबसे बडा और सबसे गेरा अद्ध्यास है।
- 8:38–8:39वाखए ये?
- 8:39–8:42आद्वैट के अनुसार जो अस्ली आत्मा है,
- 8:42–8:47अदवेट के अनुसार जो अस्ली आत्मा है विषुधद चेतना है
- 8:47–8:50वो कभी भी किसी चीस का अबजेक्त नहीं बन सकती
- 8:50–8:53लेकिन रोज मर्रा की जिन्दगी में हम क्या कहते है
- 8:53–8:57मैं अंदा हू, मैं खृष हू, या मैं मोटा हू
- 8:57–9:00अब आमिशा एक अप जरा सुच्ये अंदापनाखों का बून है,
- 9:00–9:02खृषी या दुख मन का गून है,
- 9:02–9:04और मोटापा शरीर का गून है,
- 9:04–9:09लेकिन हम इं ज़ड चीजों के गूनों को उष्चुद द आत्मापर थोप रहे है,
- 9:09–9:14अपने चेतना और ज़़ शरीर का एक असा मिश्रन तगयार कर लिया है
- 9:14–9:16जिसे हम मैं कहते है
- 9:16–9:20अहो! मतलप जिस मैं को हम अपना सबसे सच्चा अनुबह मानते है
- 9:20–9:25वो असल में शुद आत्मा और इस भहोतिक शरीर का एक मिलाजुला उल्जावा ब्रहम है
- 9:25–9:28यह दरशन में अंदों की कतार कहागाया है
- 9:28–9:29अंदों की कतार
- 9:29–9:32यह एक अन्द चकर का दोश प्यदा करेगा
- 9:32–9:36जहां एक अंददा दूस्रे अंदे का हाथ पक्डे हुए है
- 9:36–9:38अद्द अद्द अद्द अद्द
- 9:38–9:40अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द
- 9:40–9:44तो ग्यान की एक आजी भ्यानक श्रिंक्ला बन जाएगी
- 9:44–9:47जिसे दर्षन में आंदों की कतार कहागाएगे.
- 9:47–9:48आंदों की कतार?
- 9:48–9:51आप, ये एक अनन्त चकर का दोष पेदा करेगा.
- 9:51–9:55जगान एक आंदा दूस्रे आंदे का हात पक्डे हुए हैं
- 9:55–9:59और सब के सब हर कदम पर खाई में गिर रहे हैं
- 9:59–10:01गजेंद्र खाकृर जी के मेठली अनुवाद में
- 10:01–10:06इस भ्रम की प्रक्रिती को लोग जीवन के उदारनो से बहुत जीवन्त कर दिया गया है
- 10:06–10:08आप नहीं बदा था
- 10:08–10:11जैसे पशों की मुल प्रव्रित्ती का उदारन
- 10:11–10:13जब को अईन्सान दन्डा उटाता है
- 10:13–10:15तो जान्वर उसे देकखर दूर बाखता है
- 10:15–10:17और जब हरी गास दिखाता है
- 10:17–10:19तो जान्वर पास आता है
- 10:19–10:21ये जो अनुकुल को पाना
- 10:21–10:23अर प्रतिकुल से बहागना है,
- 10:23–10:27यही पशोग जैसी बुन्यादी व्रित्ती अद्यास का अस्ली परिनाम है.
- 10:27–10:30हम अन्सान भी जीवन बहर इसी के गुलाम रहते है.
- 10:30–10:33इतु सच्मे इद्माक नसे खूल दिने वाला विचार है.
- 10:33–10:35अगर हमारा पूरा अस्तित्व,
- 10:35–10:41अमारा ये मैं और हमारी सारी बाग दोड इसी बुन्यादी ब्रम से पैडा हुई है,
- 10:41–10:44तो फिर इस ब्रम के चक्रवियों को तोडा कैसे जाए?
- 10:44–10:48और ये सवाल हमें इस गरन्त के सबसे महतुपों हिस्से कि यों ले जाता है,
- 10:48–10:51यहां से आस्ली ब्रमजग्यासा शुग।
- 10:51–10:53बलकु यही वो मोड है
- 10:53–10:56जहां दर्शन सर्फ सोचने की चीज नहीं रहेता
- 10:56–10:58बलकी एक प्रक्रिया बन जाता है
- 10:58–11:00पहला सुत्र ही एक गूशना करता है
- 11:00–11:02अथा तो ब्रमजग्यासा
- 11:02–11:06पहला सुत्र ही एक गूशना करता है, अठा तो ब्रम्मजिग्यासा.
- 11:06–11:09अब इसली एक ब्रम्म को जानने की इच्छा?
- 11:09–11:14आँ, और इसके साथ ही कर्म बनाम गयान की बहुत बडी बहिज्छ चरू हो जाती है.
- 11:14–11:18मीमान सक्दाष्निकों का पूरा जोर कर्म कांडपर था.
- 11:18–11:24उनका मानना दा की अनुश्टान और दर्म का पालन करना ही मुक्ती का एक मात्रर रास्ता है.
- 11:25–11:29लेकिन वाचुस पती मिश्ष्र इस दारना को बहुत ही तारकिग दंग से खारइज करते हैं.
- 11:29–11:33मिमानच्खो का तरक तो आज के समय में भी बहुत हावी है.
- 11:33–11:37ज़हा लोग सुचते हैं कि कुछ अच्छे काम कर लेने से मोख्ष मिल जाएगा.
- 11:37–11:39लेकिन वाचुस पती मिश्रने इसे कैसे काटा?
- 11:39–11:42उनहों ने एक बहुती तकनी की तर्क दिया.
- 11:42–11:46वे कहती हैं कि दून्या में कोई भी कर्म सुर्फ चार ही चीजे कर सकता है.
- 11:46–11:53वो किसी चीस को पेडा कर सकता है, विकार ला सकता है, प्राप्त करा सकता है, या शुद कर सकता है.
- 11:53–11:55जैसे आईना पोचना.
- 11:55–11:59बलकल, लेकिन ब्रम्या मुक्ती इंचारों इसे कुछ भी नहीं है.
- 11:59–12:04वो तो पहले से ही है, असीम है, तो कर्म उस तक कैसे पूझाएगा.
- 12:04–12:34इस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 12:34–12:38विश्को दूनिया का कोई भी बहतरीन रसोया �alag nahi kar sakta
- 12:38–12:39ये एक अचुक तर्क है
- 12:40–12:42अगर दूनिया के तताखत अत सुखों के सात
- 12:42–12:45दूख्रूपी जेहर गेराए से गूलावा है
- 12:46–12:49तो आप अप अपनी किसी भी चलाकी से स्वर्षेद नहीं चाट सकते
- 12:49–12:55जेहर तो अंदर जाएगा ही, इसलिये समपुड ग्यान ही एक मात्रे रास्ता बच्टा है.
- 12:55–12:58इसके बाद तुस्रे और तीस्रे सुट्र पर जो भहेस हुई है,
- 12:58–13:01वो प्रक्रती और ब्रम्हांड के नियमों पर सवाल उठाती है.
- 13:01–13:05ये दुन्या के जत्ल वेवस्ता कैसे बनी, क्या ये सब सयोग है?
- 13:05–13:11वाच्छस्पती मिष्र इसे सयोग नहीं मानते, वे प्रक्रिति के बहुत फीशिष्ट उदारन चुनते है,
- 13:11–13:16जैसे एक काले हिरन का किसी विषेष्क शेट्र मेही जन में लेना,
- 13:16–13:19या वसंद के मोसम मेही कोयल की बोली का फुटना
- 13:19–13:21आँ, सब कुछ एक रिदम मेहें
- 13:21–13:24बलकु, ये जो सदहवा रिदम है,
- 13:24–13:28वो किसी अचेतन कारन से अपने आप पेडा नहीं हो सकता
- 13:28–13:33इसके पीचे एक सरवग ये चेतन कारन होना ही चाहीे
- 13:33–13:34और वही ब्रम है
- 13:34–13:36और ये ग्यान हम तक कैसे पूँचता है?
- 13:36–13:39तीस्रे सुट्र में शास्त्रों के निरन्तरता पर बाथ होती है.
- 13:39–13:42प्रले के बाद वेदों का ग्यान कैसे वाप्षाथा है?
- 13:42–13:45इसे समजाने किलिए एक बहुती सुन्दर उदारन है,
- 13:45–13:48यक नित्य गुरु और उनके शिष्षे का
- 13:48–13:50आ, ये मेरे पसन्दीदा उदारन है
- 13:50–13:53जब शिष्षे सीकता है, तो वो गुरु के बहुतिक शरीर की नहीं
- 13:53–13:55बलके उनके कद्मो के क्रम की नकल करता है
- 13:55–13:58ती कि सीत्टरा, शिष्टी की शुर्वात में
- 13:58–14:01वेद अपने उसी सीक्वेंस में प्रकत होते हैं,
- 14:01–14:02जिसे इश्वर याद रकता है.
- 14:02–14:04ये बहुत ही सुख्श्म विचार है.
- 14:04–14:08और यही ले हमें चोथे सुत्र तक ले जाती है.
- 14:08–14:10तत्तुस समन वयात.
- 14:10–14:12यहां अद्वायत वेदान्त स्तापित करता है,
- 14:12–14:17कि ब्रम्गा ग्यान किसी उपाद या प्रुड्ट की तरह नहीं है
- 14:17–14:19जिसे बनाया या सुदारा जासके
- 14:19–14:22सहेर है, अगर मुक्ती कोई अजी चीज होती
- 14:22–14:24जिसे हम अपने प्रियतनो से बना सकते
- 14:24–14:26तो उगना एक दे नश्ट भी हो जाती
- 14:26–14:28मुक्ति की को एक सपारी देट नहीं हो सकती?
- 14:28–14:29इक दम सही.
- 14:29–14:31इसी बात को समजाने के लिए,
- 14:31–14:35वाचस पती मिष्र ने नाविक और नाव का एक उदारन दिया है.
- 14:35–14:37एक नाविक की कलपना की जे,
- 14:37–14:39जो नदी के किनारे कडा है.
- 14:39–14:40किनारे पर लेहरे है,
- 14:40–14:44तो इस सब का असल मतलप क्या है, यह सब हम क्यों दिसकस कर रहें।
- 14:44–14:48तो इस सब का असल मतलप क्या है, यह सब हम क्यों दिसकस कर रहें।
- 14:48–14:51ज़हां पानी इक्दम शान्त और स्तिर हैं
- 14:51–14:54इसी तरा ब्रम कोई आजी चीज नहीं है
- 14:54–14:56जिसे बाहर से लाना है
- 14:56–14:58उतो हमेशा से प्राप्त है
- 14:58–15:00हमारे भीतर का शान्त केंदर है
- 15:00–15:03बसमें किनारे के लेरो से नजर हतानी है
- 15:03–15:07यहांकर सारी दार्षने गुट्तिया सुलजने लकती हैं
- 15:07–15:09तो इस सब का असल मतलप क्या है
- 15:09–15:10यह सब हम क्यों दिसकस कर रहें
- 15:10–15:14क्यों की बाशा का असर समजना बहुत जरूरी है
- 15:14–15:19रहां जब यह भारी बरकं संसक्रत के सिद्दानत गजंद्र ताकृर जी के अनवाद में
- 15:19–15:21तेट मेठली मुहावरो में बड़लते हैं,
- 15:21–15:23तो असर ही अलग होता है.
- 15:23–15:27जैसे, बहुत कम प्रयास को दर्षाने के लिए मेठली की कहावत है,
- 15:27–15:29जोग का हल्वा नमकी नहीं होता,
- 15:29–15:32और एंदरियो के सझम को समजाने के लिए,
- 15:32–15:33खेती से ज़ुडा उदारन है,
- 15:33–15:35शान्त और सदह वाबच्व्राही
- 15:35–15:38हल या गाली कीचने के योग्ये होता है
- 15:38–15:41इस से एक बहुती मह्झवूप्पून सवाल कडा होता है
- 15:41–15:45क्या ये अनुवाज सर्फ शब्डो का स्थानान्तरन है
- 15:45–15:46बिल्कुल नहीं
- 15:46–15:52ये मित्ला की अपनी बवध्धिक विरासत को वापस उसकी अपनी माप्रबाशा मे लाने का प्रयास है.
- 15:52–15:55ये ग्यान का लोक तन्त्री करन है.
- 15:55–15:57ये सच में एक पूल बनाने जैसा काम है.
- 15:57–16:01जो हसार साल पूरानी बहेस को आजकी चोपाल पर लाक ख़ाग करता है.
- 16:01–16:14अज़ की अज़ी गें चर्चा को समझट्टेवे मैं यही खोंगा कि सथ यह जाटिछा है जिदना भी जटिलो, जब उसे अपनी मिट्टी की बाशा में पिरोया जाता है, तो वो सीडे दिल तक पूछता है.
- 16:14–16:44भी ब़द़ागा आप प्रजाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो
- 16:44–16:49अगर आईना पहले से ही साफ है, तो उसे रग़ते रहने की ये अनन ठखान कैसी?
- 16:50–16:56क्या बात है, एक साफ आईने को रग़ने की ठखान, ये सवाल यकीनन बहुत दिनो तक गुचता रहेगा.
- 16:57–17:01अपनी खुद की माननिताओ की पड़ाल करने की इस नहीं प्रेरना के साथ,
- 17:01–17:05अपनी खुद की माननिताव की पटाल करनी की इस नहीं प्रेरना के साथ
- 17:05–17:08हम आजकी इस गहन चरचा को यही विराम देते हैं
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अख्सर यह माना जाता है, के जब बाद किसी हाजार साल पुरानी अद्यन्त गेहरी डाशनिक किताप की होती है, तो वो किसी इंक्रिठ्टेट कोट जैसी होती है. आप बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ बग़ ब� गेहन चर्चा के किंदर में, तीक यही एतिहासिक गटना है. सुरोत के रूप में हमारे सामने, नवी सताब्दी का एक महान संसक्रित गरन्त है, भामती. जो की आदिश शंकर आचार्ये के, ब्रम्म सुत्र भाश्च्य पर, एक अत्यंत प्रमानिक टीका है. बिल्कुल! और सबसे रोमाचक बात यहे है, के हम दो हजार चब्विस में आए, इसके एक एतिहासिक और शुध मेठिली अनुवाद का विष्लेशन कर रहे है, जिसे गजंद्र ताकृगी ने किया है. ये सरफ एक बाशा से तुस्री बाशा का सफर नहीं है. बारी बोच तले दबे बना जदिल विष्यों के उन उन आहा पलों कानन लेना चाते हैं. तीके चलीए इसके हर पहलू को खोल कर देकते हैं और सब से पहले अनुवाद से पीचे हटकर उस असादारन मस्तिष्क की योर रुख करते है, जिसने इस मूल संसक्रत गरन्त की रचना की ती. वाचस्पती मिष्र बहारते दर्षन के इतिहास में, उम ये नाम किसी बोद्धिक चमतकार से कम नहीं है. मैं बतार रही थीना की वाचस्पती मिष्र, नोवी शताबदी करिब आप्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् योग या पुर्व मिमान्सा रडशन के मुल सिद्धान्तो पर इतनी गडराई से टीकाई लिखी, कि वे आपने आप में स्वतन्त्र ग्रन्त बन गय. और इंसब के बाद अपने दाशनिक सफर के एक दम चरम पर उनो आपना अन्तिम अर सब से महान कारे रचा बहामती ये तो कुछ यह जैसे आज के समय का कोई एकी सोफ़र अंजन्यर आपल, विन्डोज और लेनिक्स तीनो अलग-गलग अप्रेटिंग सिस्तम्स का सब से बहत्रीं, सब से जटिल-कोर-कोर अकेले ही लिग दे बहुत लिए सटी कुदारन है मतलव, हर सिस्तम का अखिटेक्च्छर अलगे है आगा असकी बाशा अलगे है लेकिन वो एक ही अन्सान उन सब के सोर्स कोड को उसकी अपनी शर्टों पर मास्टर कर चुका है मैं तो सुच रहाता की ये सच में अविश्वस निये लकता है. बिलकुल. और अगर अम इसे व्यापक नजर्ये से जोड कर देखें, तो उनो अगर सच में हर दाशनिक शाखा के कोर-कोर, बिना किसी पूर्वाग रहे के समझा. लेकिन भामती केवल एक व्याख्याया ट्रान्सलेशन नी फीटुग अच्छा मा इस गरन्त ने अद्वैट्वेदान्त के भीतर एक पूरी नईवेचारिग दारा को जन दिया अगर अद्वैट्वेदान्त के इतिहास के पन्नो को पल्तें तो 2 मुख्य स्कूल या प्रस्थान दिखाई देते हैं एक है विव्रन्प्रस्थान और दुस्रा है स्वयम वाच्वस्पती मिष्रका बामती प्रस्थान तो इं दोनो के भीच मुख्य फर्क क्या था? बामती की सबसे बढ़ी खास्यत ये स्तापित करना है कि अविद्ध्या, यानी अग्यान का जु मुल आश्ड़े अस्टान है वो जीव है यानी विक्तिगत आत्मा जब की विव्रन प्रस्थान का तरक ता, कि अविद्ध्या का आश्ड़े स्वयम ब्रम्व है आहा, मतलब अग्यान किस के भीतर बटा है, बवाड़िए में बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बा� अब अगर अविद्या और अग्यान की बात होगी रही ए, तो उस मुद्दे कियोर बडना सबभगिक हो जाता है जो भामती कषबसे चुनोती पून और मूल दाशनिक सवाल है अद्दियास जिसे हम सुपर इमपोजेशन या आम भाशा में ब्रहम कहते हैं हाँ, ब्रहम जब मैं सुरतों का दिन कर रहा आता तो एक चीजने मुझे बहुत हैरान किया वो ता पूरू पक्ष यहनी विरोदी विचार का रवएया प्राचीन भारतिय शास्ट्रारत में जो विरोदी विचार होता था उसकी आक्रामकता कमाल की ती यहां विरोदी सर्फ विनम्रता से सवाल नहीं पूच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च् उद्वाल उठाना पुरी तरहे से भेवगूफी है उसने तरक दिया कि मैं का अनुबव तो इतना सपष्ट है कि हर कोई अपना स्तित्व जानता है तो इस मैंपर शक करना तो कववे के दाद गिनने जैसा निरर्थक काम हो गया एक दम सही अदियान बाद नबबव बाद नबबव बाद नबबव बाद नबबबव बाद नबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब वाचस्पति मिश्र अद्वेद का एक बलकुल अनोखा सिद्धान स्थापित करते है, जिसे अनिर वच्निया ख्याति कहाजाता है. वाचस्पति मिश्र अद्वेद का एक बलकुल अनोखा सिद्धान स्थापित करते है, जिसे अनिर वच्निया ख्याति कहाजाता है. उआद बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए बादिए � उस्पानी से अपनी प्यास बुजा लेता जो कि वो कर नहीं सकता आप ये तो लोगिकल है और दूसी तरफ अगर वो पानी पुरी तरहा असत्या जुट होता जैसे आस्मान का भूल जिसका कोई अस्तित वही नहीं है पानियागो को दिक्हाई ही नहीं देता. अहू.. मलप कियों कि तो दिक्हरा है, इसलिये पुरी तरा जूट नहीं. बिलकुल, दिक्हरा है एसलिये जूट नहीं है, और प्यास नहीं भूजासकता इसलिये सच नहीं है. वो नतो सत है न असत है. इसी ले उसे अन्निरवच्निया कहागया यहनी जिसे सत्तिया असत्तिय की श्रेनियो में पारी भाशित ही ना किया जासके. मरिक्त्रिष्ना का तरक तो बहुत सतिक बट्ता है. लिकने या मेरे मन में पूर्वपक्ष की तरही गेरा सवालोक रहा है. ज़े रेगिस्तान का पानी ब्रम है, यह वान लिया. लेकिने जो मैं का अनुबव है, वो म्रिक्त्रिष्ना कैसे हो सकता है. अच्छा कैसे? मलग, बच्पन में जो मैं अपने माता पिता के साथ खिलता था. वाचस्पती मिश्र इसी बिन्दो को स्पष्ट करते वे कहते है, कि ये जो निरन्तर बनावा मैं का अनुबहव है ना, यही तो सबसे बड़ा और सबसे गेरा अद्ध्यास है. वाचस्पती मिश्र इसी बिन्दो को स्पष्ट करते है, वाचस्पती मिष्र इसी बिन्दो को सबष्ट करते वे कहते हैं, कि ये जु निरन्तर बनावा मैं का अनुबव हैं आ, यही तो सबसे बडा और सबसे गेरा अद्ध्यास है। वाखए ये? आद्वैट के अनुसार जो अस्ली आत्मा है, अदवेट के अनुसार जो अस्ली आत्मा है विषुधद चेतना है वो कभी भी किसी चीस का अबजेक्त नहीं बन सकती लेकिन रोज मर्रा की जिन्दगी में हम क्या कहते है मैं अंदा हू, मैं खृष हू, या मैं मोटा हू अब आमिशा एक अप जरा सुच्ये अंदापनाखों का बून है, खृषी या दुख मन का गून है, और मोटापा शरीर का गून है, लेकिन हम इं ज़ड चीजों के गूनों को उष्चुद द आत्मापर थोप रहे है, अपने चेतना और ज़़ शरीर का एक असा मिश्रन तगयार कर लिया है जिसे हम मैं कहते है अहो! मतलप जिस मैं को हम अपना सबसे सच्चा अनुबह मानते है वो असल में शुद आत्मा और इस भहोतिक शरीर का एक मिलाजुला उल्जावा ब्रहम है यह दरशन में अंदों की कतार कहागाया है अंदों की कतार यह एक अन्द चकर का दोश प्यदा करेगा जहां एक अंददा दूस्रे अंदे का हाथ पक्डे हुए है अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द अद्द तो ग्यान की एक आजी भ्यानक श्रिंक्ला बन जाएगी जिसे दर्षन में आंदों की कतार कहागाएगे. आंदों की कतार? आप, ये एक अनन्त चकर का दोष पेदा करेगा. जगान एक आंदा दूस्रे आंदे का हात पक्डे हुए हैं और सब के सब हर कदम पर खाई में गिर रहे हैं गजेंद्र खाकृर जी के मेठली अनुवाद में इस भ्रम की प्रक्रिती को लोग जीवन के उदारनो से बहुत जीवन्त कर दिया गया है आप नहीं बदा था जैसे पशों की मुल प्रव्रित्ती का उदारन जब को अईन्सान दन्डा उटाता है तो जान्वर उसे देकखर दूर बाखता है और जब हरी गास दिखाता है तो जान्वर पास आता है ये जो अनुकुल को पाना अर प्रतिकुल से बहागना है, यही पशोग जैसी बुन्यादी व्रित्ती अद्यास का अस्ली परिनाम है. हम अन्सान भी जीवन बहर इसी के गुलाम रहते है. इतु सच्मे इद्माक नसे खूल दिने वाला विचार है. अगर हमारा पूरा अस्तित्व, अमारा ये मैं और हमारी सारी बाग दोड इसी बुन्यादी ब्रम से पैडा हुई है, तो फिर इस ब्रम के चक्रवियों को तोडा कैसे जाए? और ये सवाल हमें इस गरन्त के सबसे महतुपों हिस्से कि यों ले जाता है, यहां से आस्ली ब्रमजग्यासा शुग। बलकु यही वो मोड है जहां दर्शन सर्फ सोचने की चीज नहीं रहेता बलकी एक प्रक्रिया बन जाता है पहला सुत्र ही एक गूशना करता है अथा तो ब्रमजग्यासा पहला सुत्र ही एक गूशना करता है, अठा तो ब्रम्मजिग्यासा. अब इसली एक ब्रम्म को जानने की इच्छा? आँ, और इसके साथ ही कर्म बनाम गयान की बहुत बडी बहिज्छ चरू हो जाती है. मीमान सक्दाष्निकों का पूरा जोर कर्म कांडपर था. उनका मानना दा की अनुश्टान और दर्म का पालन करना ही मुक्ती का एक मात्रर रास्ता है. लेकिन वाचुस पती मिश्ष्र इस दारना को बहुत ही तारकिग दंग से खारइज करते हैं. मिमानच्खो का तरक तो आज के समय में भी बहुत हावी है. ज़हा लोग सुचते हैं कि कुछ अच्छे काम कर लेने से मोख्ष मिल जाएगा. लेकिन वाचुस पती मिश्रने इसे कैसे काटा? उनहों ने एक बहुती तकनी की तर्क दिया. वे कहती हैं कि दून्या में कोई भी कर्म सुर्फ चार ही चीजे कर सकता है. वो किसी चीस को पेडा कर सकता है, विकार ला सकता है, प्राप्त करा सकता है, या शुद कर सकता है. जैसे आईना पोचना. बलकल, लेकिन ब्रम्या मुक्ती इंचारों इसे कुछ भी नहीं है. वो तो पहले से ही है, असीम है, तो कर्म उस तक कैसे पूझाएगा. इस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् विश्को दूनिया का कोई भी बहतरीन रसोया �alag nahi kar sakta ये एक अचुक तर्क है अगर दूनिया के तताखत अत सुखों के सात दूख्रूपी जेहर गेराए से गूलावा है तो आप अप अपनी किसी भी चलाकी से स्वर्षेद नहीं चाट सकते जेहर तो अंदर जाएगा ही, इसलिये समपुड ग्यान ही एक मात्रे रास्ता बच्टा है. इसके बाद तुस्रे और तीस्रे सुट्र पर जो भहेस हुई है, वो प्रक्रती और ब्रम्हांड के नियमों पर सवाल उठाती है. ये दुन्या के जत्ल वेवस्ता कैसे बनी, क्या ये सब सयोग है? वाच्छस्पती मिष्र इसे सयोग नहीं मानते, वे प्रक्रिति के बहुत फीशिष्ट उदारन चुनते है, जैसे एक काले हिरन का किसी विषेष्क शेट्र मेही जन में लेना, या वसंद के मोसम मेही कोयल की बोली का फुटना आँ, सब कुछ एक रिदम मेहें बलकु, ये जो सदहवा रिदम है, वो किसी अचेतन कारन से अपने आप पेडा नहीं हो सकता इसके पीचे एक सरवग ये चेतन कारन होना ही चाहीे और वही ब्रम है और ये ग्यान हम तक कैसे पूँचता है? तीस्रे सुट्र में शास्त्रों के निरन्तरता पर बाथ होती है. प्रले के बाद वेदों का ग्यान कैसे वाप्षाथा है? इसे समजाने किलिए एक बहुती सुन्दर उदारन है, यक नित्य गुरु और उनके शिष्षे का आ, ये मेरे पसन्दीदा उदारन है जब शिष्षे सीकता है, तो वो गुरु के बहुतिक शरीर की नहीं बलके उनके कद्मो के क्रम की नकल करता है ती कि सीत्टरा, शिष्टी की शुर्वात में वेद अपने उसी सीक्वेंस में प्रकत होते हैं, जिसे इश्वर याद रकता है. ये बहुत ही सुख्श्म विचार है. और यही ले हमें चोथे सुत्र तक ले जाती है. तत्तुस समन वयात. यहां अद्वायत वेदान्त स्तापित करता है, कि ब्रम्गा ग्यान किसी उपाद या प्रुड्ट की तरह नहीं है जिसे बनाया या सुदारा जासके सहेर है, अगर मुक्ती कोई अजी चीज होती जिसे हम अपने प्रियतनो से बना सकते तो उगना एक दे नश्ट भी हो जाती मुक्ति की को एक सपारी देट नहीं हो सकती? इक दम सही. इसी बात को समजाने के लिए, वाचस पती मिष्र ने नाविक और नाव का एक उदारन दिया है. एक नाविक की कलपना की जे, जो नदी के किनारे कडा है. किनारे पर लेहरे है, तो इस सब का असल मतलप क्या है, यह सब हम क्यों दिसकस कर रहें। तो इस सब का असल मतलप क्या है, यह सब हम क्यों दिसकस कर रहें। ज़हां पानी इक्दम शान्त और स्तिर हैं इसी तरा ब्रम कोई आजी चीज नहीं है जिसे बाहर से लाना है उतो हमेशा से प्राप्त है हमारे भीतर का शान्त केंदर है बसमें किनारे के लेरो से नजर हतानी है यहांकर सारी दार्षने गुट्तिया सुलजने लकती हैं तो इस सब का असल मतलप क्या है यह सब हम क्यों दिसकस कर रहें क्यों की बाशा का असर समजना बहुत जरूरी है रहां जब यह भारी बरकं संसक्रत के सिद्दानत गजंद्र ताकृर जी के अनवाद में तेट मेठली मुहावरो में बड़लते हैं, तो असर ही अलग होता है. जैसे, बहुत कम प्रयास को दर्षाने के लिए मेठली की कहावत है, जोग का हल्वा नमकी नहीं होता, और एंदरियो के सझम को समजाने के लिए, खेती से ज़ुडा उदारन है, शान्त और सदह वाबच्व्राही हल या गाली कीचने के योग्ये होता है इस से एक बहुती मह्झवूप्पून सवाल कडा होता है क्या ये अनुवाज सर्फ शब्डो का स्थानान्तरन है बिल्कुल नहीं ये मित्ला की अपनी बवध्धिक विरासत को वापस उसकी अपनी माप्रबाशा मे लाने का प्रयास है. ये ग्यान का लोक तन्त्री करन है. ये सच में एक पूल बनाने जैसा काम है. जो हसार साल पूरानी बहेस को आजकी चोपाल पर लाक ख़ाग करता है. अज़ की अज़ी गें चर्चा को समझट्टेवे मैं यही खोंगा कि सथ यह जाटिछा है जिदना भी जटिलो, जब उसे अपनी मिट्टी की बाशा में पिरोया जाता है, तो वो सीडे दिल तक पूछता है. भी ब़द़ागा आप प्रजाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो बज़ाए नहीं तो अगर आईना पहले से ही साफ है, तो उसे रग़ते रहने की ये अनन ठखान कैसी? क्या बात है, एक साफ आईने को रग़ने की ठखान, ये सवाल यकीनन बहुत दिनो तक गुचता रहेगा. अपनी खुद की माननिताओ की पड़ाल करने की इस नहीं प्रेरना के साथ, अपनी खुद की माननिताव की पटाल करनी की इस नहीं प्रेरना के साथ हम आजकी इस गहन चरचा को यही विराम देते हैं