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तत्त्वचिन्तामणि__नव्य-न्याय.mp4
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- 0:00–0:05कचनो विचार केने ची, जे हमरा लोकने जे किच देखाई ची वास्तब में सत्या ची?
- 0:05–0:10वा कोन व्रम, मतलब, कोन ग्यान, विचार, वद्द्रिष्य सत्या ची?
- 0:10–0:14एकर प्रमान की ची? सत्यके प्रमानित कोना के लेजाई ची?
- 0:14–0:19देखु, ये एक ता एहन प्रष्नत ची, जिस सदिक हन से मानव मस्तिष्ट के जगजोरित रहा ला ची.
- 0:19–0:23और सत्ते की ये सुरुप छी, उक्रा हम्रा लोकनी कोना ग्रहे ची.
- 0:23–0:28एही पर विचार के नहीं बूजुजे वास्तिविकता के एक द्याडी दरी पहुचव अची.
- 0:44–0:46उपुर्न विश्लेशन हम्रा लोक्निकर रहिल ची,
- 0:46–0:49उपुर्न रुपें गजिंद्र तहाकुर जी दवारा कैल गेल,
- 0:49–0:53तत्व चिन्ता मनिक मेठिली अनुवाद पर आदारी तची.
- 0:53–0:57हुंकर इबवगीरत प्र्यास प्राजीन संस्क्रित के गुड,
- 0:57–1:02दार्श्निक तत्तोकें हम्रा लोक्निक अपन मात्रिबाशा में अद्यन्त सहज्टा सुलब करवाईता ची
- 1:02–1:08उहो दार्श्निक गंविर्ता के बिना कोनो आज पहुचाईने इआपने आपने एक तपएग काज अची
- 1:08–1:12तीखछे तों आव एव विशाय में गेराई से प्रवेश करेएच्छी.
- 1:12–1:17आएक हम्रा लोकिनी यात्रा मुक्हे रूब से चोब भाग में विबखत चे.
- 1:17–1:26प्राचीन ग्यानक संकत, गंगेशक नव्वेन्याई, प्रत्यक्ष अनुमान, उप्मान आश्व्द, आ अन्त्मे एकर एतिहासिक प्रभाव.
- 1:26–1:33त, आरम्ब करएच फहिल्ख्ण्षा प्राचीन य्यानक संकत दर्षन पर प्रार.
- 1:33–1:42इटेरहम अ च्वदाहम शताबदिक मिठलाक समय चल, उही समय प्राचीन नयए दर्षन पर बुजुजे चारो काछ से हमलाबही रहल चल.
- 1:43–1:49एक दिस बोध्धार किक लोकनी नयए दर्षनक प्रत्यक्ष अनुमानक परिबाशाषा पर तिखषन प्रहार कै रहल चला.
- 1:49–2:19तब आप अग़े तब वाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक वाद्दान तक बाद्दान तक वाद्दान तक वाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक वाद्दान तक बाद्दा
- 2:19–2:25न्याय दर्षन के बचेबाग लेल एक ता बवद्दिक नायक के उदेब हिल, गंगेश उपाद्याए.
- 2:25–2:32उखोनो सामान न्य उत्तर नहीं दिलने, बलकी एक ता एहन्त रूतिहीन अग गन्डितिया तर्क प्रनाली कलिषकार किलने,
- 2:32–2:39यक्रा नव्या न्याय कहल गेल, गंगेश प्राचीन न्याय दर्षनक जे सोला पदार्थक परमपरा चल,
- 2:39–2:44उक्रा त्यागी का आपन समपुन द्यान केवल चारी प्रमान पर केंद्रित किलने.
- 2:44–2:48इचारी प्रमान चल, प्रत्यक्ष अन्मान उपमान अश्व्द.
- 2:48–2:54ये दम सतीक द्रिष्टिकोंड, तेसर्खंड आजे प्रत्यक्ष्खंड यानक प्रात्मेक स्त्रोथ.
- 2:54–3:01अब अब अदे जे सबसा रोचक बात आची से ईई जे गंगेश का अमसार प्रत्यक्ष् मात्र एंद्रिय सबहल यान नही आची
- 3:01–3:05बलकी इद तथ्यात्मक वा फैक्तेव होईताची
- 3:05–3:11इते मिमान्सक अन न्याय कबीज के एक तब हैंकर प्रामाना वाद कविवाद देखाईताची
- 3:11–3:17मिमान्सक मानच्चरा जगन कोनो ग्यान उपन होईताची ता ओ सुत्धाः प्रमानेद भोजाईताची
- 3:17–3:19मुदा गंगेश एकर खंदन किलनी,
- 3:19–3:22उ परता प्रमाना वाद के वकालत किलनी.
- 3:22–3:25माने एतें सब समहत पून बाती आची,
- 3:25–3:29जे कुनो ग्यान असत्या आची, वा असत्या एकर निरने,
- 3:29–3:32उकर सफल कार्या प्रविती से बाद में होईता ची.
- 3:32–3:37जना जाहा पानी देखी का पीभाई लेल प्रव्रुत भेलू आवागा का प्याज भुजगेल,
- 3:37–3:40तकहन ने उ ग्यान प्रमा अर्ठात सत्याची.
- 3:40–3:45एक रनीख जगा भुजबाख लेल, सीप आ चानीख का इप्रसिद्ध उदारन लिया.
- 3:45–3:54जखन कोनो व्यक्ती सीप के देखी का उक्रा भूल सच्चानी भूजी लेई ताची गंगेशक के अनुसार इई अन्यता ख्याती अची.
- 3:54–4:03इते व्यक्ती सचेत रूपेन सोजा रक्या सीप में चानी के एक ता विसिस्ट गुन आरोपित कलेत आची जे वास्तब में उते आची नहीं.
- 4:03–4:09इविसुध ब्रमवची आग गंगेषक एक रा बहुत तारकिग जंख्सा समजे चथेन.
- 4:09–4:15अब हम्रा लोकनी बड़ाई ची चोथिम्क्हन्द कदेस, अनुमान्क्हन्द अचुक तारकिक प्रक्रिया.
- 4:16–4:23साज कही तआ अब हम्रा लोकनी तत्व चिन्तामनी कषबसद जतील आम्मेधावी आंगमे प्रवेश करहल ची.
- 4:23–4:30प्रत्यक्ष्ग्यान के बाद नव सत्ते दरी पहुच्बाक जे आचुक प्रक्रिया आची, उक्रे अन्मान कहल जाई तची.
- 4:30–4:34आच्सम्पुण अन्मानक जे प्रान आची, उआची ब्याप्ती.
- 4:34–4:43याप्ती, याप्ती हे तु आ साद्ध्यक भीजक वो शाष्वत, अचर, आस्वभाविक समवन्द है जी ककनु तूटी नहीं सकेत आजी.
- 4:43–4:49इी मानिक चलू जे बिना एह याप्ती मैं समवन्दध कोनो तारकिक निषकर्ष समववे नहीं आजी.
- 4:49–5:02इकरा एही प्रक्यात उदारन्स समजबाक प्रयास करे ची, अनुमान का मुखे रुबसा तीन अव्यव अची, पहल अची पक्ष जेना परवत, जते हम्रालोकनी सत्यके सद्ध करे चाहे ची,
- 5:02–5:32तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 5:32–6:02अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र �
- 6:02–6:10तो उग़ार्गा पूल का आदूनिक उदारन्सा इना समजू, जो कुनो वेक्ती आल तकने मारपीट करे तची, जगन उते बेले उपस्तित रही तची.
- 6:10–6:17अगरे के उपस्तिति एक तचपाल श्र्ट वा उपादि अच्छी, बिना इही श्र्ट के पहचान ने आहा सथे निसकर्स दरी नाई पहुची सकव.
- 6:17–6:23गंगे स्तारकिक दोश अर्थात हित्वाबास का पाज प्रकारक सुख्श्मवर्गी करन केलनि अच्छी,
- 6:23–6:36सव्यविचार, जे औनश्छित हेतू अची, जे भद्कादईत अची, विरुद, जे साद्धिग बदला, ओक्रे अबहाव के सिद्धगडईत, सत्प्रतिपक्ष, जते दूता समान भल्वान हेतु आपस में तक्राजाए, मतलप ताई भाजाए.
- 6:36–7:06अज़़ ज़ग ज़ग पाँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 7:06–7:09अथात शब्द कबीच तारकिक समजस्स्स,
- 7:09–7:11दो सर अकांख्षा,
- 7:11–7:14अथात पद कबीच अथक अपेख्षा,
- 7:14–7:16ते सर तात्पर्र,
- 7:16–7:18अथात वक्ता का अस्ली मन्तवे किच्छे,
- 7:18–7:20अच्चारिम लक्षना,
- 7:20–7:23अथात जखन मुख्य अथ सबात सपष्ट नहीं होत,
- 7:23–7:26तो उकर अप्रत्यक्ष अद्बुजनाई
- 7:26–7:28इचारू भले पर भात बनेच्छा
- 7:28–7:32एकर एक्टा बहुत सुन्दर आर रोचक आशेए य आछी
- 7:32–7:35जे केवल शब्दक उचारन का देला सां
- 7:35–7:37प्रमान नई भजजाई तची
- 7:37–7:42जेना जे कोनो सुगा राम राम भाजी रहे लची
- 7:42–7:44तो उ शब्द प्रमान नहीं आची.
- 7:44–7:48सत्ट्य ज्यानक लेल एक ता आप्ट पुर्ष चाही.
- 7:48–7:52मतलब एक ता एहन वकता जकर नीवत एक दम साफ हो.
- 7:52–7:57जे सत्ट्य जने थो आब बिना कोन दोखा दिल सत्ट्य बजेत हो.
- 7:57–8:00सुगा में उ तात्पर्यवा मन्तव कते साथ.
- 8:00–8:09आब हम्रालोकनी अंतिम क्हन्द दिस बडद्ध ची, खन्डो चो, अदिहासिक प्रभाव, ज्यानक अदबुत्यात्रा
- 8:09–8:13आओ, आब दिखच्छी जे इप पोठी कोना एक ता पैग परमपरा बनल,
- 8:13–8:17गंगेषक इप तत्व छिन्ता मडी केवल एक ता पोठी नहीं रहल,
- 8:17–8:47अगर बाद पन्द्राजम शताभदी में पक्षदर मेश्र एक्रापर आलोक नाम सा तीका लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिख
- 8:47–9:17तब आप उद्वाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई
- 9:17–9:22आवश्ख करु. एही विष्छलेशन में हमरा लोकनिक से ज़वा के लेल बहुत-बहुत दश्नवाद.
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कचनो विचार केने ची, जे हमरा लोकने जे किच देखाई ची वास्तब में सत्या ची? वा कोन व्रम, मतलब, कोन ग्यान, विचार, वद्द्रिष्य सत्या ची? एकर प्रमान की ची? सत्यके प्रमानित कोना के लेजाई ची? देखु, ये एक ता एहन प्रष्नत ची, जिस सदिक हन से मानव मस्तिष्ट के जगजोरित रहा ला ची. और सत्ते की ये सुरुप छी, उक्रा हम्रा लोकनी कोना ग्रहे ची. एही पर विचार के नहीं बूजुजे वास्तिविकता के एक द्याडी दरी पहुचव अची. उपुर्न विश्लेशन हम्रा लोक्निकर रहिल ची, उपुर्न रुपें गजिंद्र तहाकुर जी दवारा कैल गेल, तत्व चिन्ता मनिक मेठिली अनुवाद पर आदारी तची. हुंकर इबवगीरत प्र्यास प्राजीन संस्क्रित के गुड, दार्श्निक तत्तोकें हम्रा लोक्निक अपन मात्रिबाशा में अद्यन्त सहज्टा सुलब करवाईता ची उहो दार्श्निक गंविर्ता के बिना कोनो आज पहुचाईने इआपने आपने एक तपएग काज अची तीखछे तों आव एव विशाय में गेराई से प्रवेश करेएच्छी. आएक हम्रा लोकिनी यात्रा मुक्हे रूब से चोब भाग में विबखत चे. प्राचीन ग्यानक संकत, गंगेशक नव्वेन्याई, प्रत्यक्ष अनुमान, उप्मान आश्व्द, आ अन्त्मे एकर एतिहासिक प्रभाव. त, आरम्ब करएच फहिल्ख्ण्षा प्राचीन य्यानक संकत दर्षन पर प्रार. इटेरहम अ च्वदाहम शताबदिक मिठलाक समय चल, उही समय प्राचीन नयए दर्षन पर बुजुजे चारो काछ से हमलाबही रहल चल. एक दिस बोध्धार किक लोकनी नयए दर्षनक प्रत्यक्ष अनुमानक परिबाशाषा पर तिखषन प्रहार कै रहल चला. तब आप अग़े तब वाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक वाद्दान तक बाद्दान तक वाद्दान तक वाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक बाद्दान तक वाद्दान तक बाद्दा न्याय दर्षन के बचेबाग लेल एक ता बवद्दिक नायक के उदेब हिल, गंगेश उपाद्याए. उखोनो सामान न्य उत्तर नहीं दिलने, बलकी एक ता एहन्त रूतिहीन अग गन्डितिया तर्क प्रनाली कलिषकार किलने, यक्रा नव्या न्याय कहल गेल, गंगेश प्राचीन न्याय दर्षनक जे सोला पदार्थक परमपरा चल, उक्रा त्यागी का आपन समपुन द्यान केवल चारी प्रमान पर केंद्रित किलने. इचारी प्रमान चल, प्रत्यक्ष अन्मान उपमान अश्व्द. ये दम सतीक द्रिष्टिकोंड, तेसर्खंड आजे प्रत्यक्ष्खंड यानक प्रात्मेक स्त्रोथ. अब अब अदे जे सबसा रोचक बात आची से ईई जे गंगेश का अमसार प्रत्यक्ष् मात्र एंद्रिय सबहल यान नही आची बलकी इद तथ्यात्मक वा फैक्तेव होईताची इते मिमान्सक अन न्याय कबीज के एक तब हैंकर प्रामाना वाद कविवाद देखाईताची मिमान्सक मानच्चरा जगन कोनो ग्यान उपन होईताची ता ओ सुत्धाः प्रमानेद भोजाईताची मुदा गंगेश एकर खंदन किलनी, उ परता प्रमाना वाद के वकालत किलनी. माने एतें सब समहत पून बाती आची, जे कुनो ग्यान असत्या आची, वा असत्या एकर निरने, उकर सफल कार्या प्रविती से बाद में होईता ची. जना जाहा पानी देखी का पीभाई लेल प्रव्रुत भेलू आवागा का प्याज भुजगेल, तकहन ने उ ग्यान प्रमा अर्ठात सत्याची. एक रनीख जगा भुजबाख लेल, सीप आ चानीख का इप्रसिद्ध उदारन लिया. जखन कोनो व्यक्ती सीप के देखी का उक्रा भूल सच्चानी भूजी लेई ताची गंगेशक के अनुसार इई अन्यता ख्याती अची. इते व्यक्ती सचेत रूपेन सोजा रक्या सीप में चानी के एक ता विसिस्ट गुन आरोपित कलेत आची जे वास्तब में उते आची नहीं. इविसुध ब्रमवची आग गंगेषक एक रा बहुत तारकिग जंख्सा समजे चथेन. अब हम्रा लोकनी बड़ाई ची चोथिम्क्हन्द कदेस, अनुमान्क्हन्द अचुक तारकिक प्रक्रिया. साज कही तआ अब हम्रा लोकनी तत्व चिन्तामनी कषबसद जतील आम्मेधावी आंगमे प्रवेश करहल ची. प्रत्यक्ष्ग्यान के बाद नव सत्ते दरी पहुच्बाक जे आचुक प्रक्रिया आची, उक्रे अन्मान कहल जाई तची. आच्सम्पुण अन्मानक जे प्रान आची, उआची ब्याप्ती. याप्ती, याप्ती हे तु आ साद्ध्यक भीजक वो शाष्वत, अचर, आस्वभाविक समवन्द है जी ककनु तूटी नहीं सकेत आजी. इी मानिक चलू जे बिना एह याप्ती मैं समवन्दध कोनो तारकिक निषकर्ष समववे नहीं आजी. इकरा एही प्रक्यात उदारन्स समजबाक प्रयास करे ची, अनुमान का मुखे रुबसा तीन अव्यव अची, पहल अची पक्ष जेना परवत, जते हम्रालोकनी सत्यके सद्ध करे चाहे ची, तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र अद्र � तो उग़ार्गा पूल का आदूनिक उदारन्सा इना समजू, जो कुनो वेक्ती आल तकने मारपीट करे तची, जगन उते बेले उपस्तित रही तची. अगरे के उपस्तिति एक तचपाल श्र्ट वा उपादि अच्छी, बिना इही श्र्ट के पहचान ने आहा सथे निसकर्स दरी नाई पहुची सकव. गंगे स्तारकिक दोश अर्थात हित्वाबास का पाज प्रकारक सुख्श्मवर्गी करन केलनि अच्छी, सव्यविचार, जे औनश्छित हेतू अची, जे भद्कादईत अची, विरुद, जे साद्धिग बदला, ओक्रे अबहाव के सिद्धगडईत, सत्प्रतिपक्ष, जते दूता समान भल्वान हेतु आपस में तक्राजाए, मतलप ताई भाजाए. अज़़ ज़ग ज़ग पाँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अथात शब्द कबीच तारकिक समजस्स्स, दो सर अकांख्षा, अथात पद कबीच अथक अपेख्षा, ते सर तात्पर्र, अथात वक्ता का अस्ली मन्तवे किच्छे, अच्चारिम लक्षना, अथात जखन मुख्य अथ सबात सपष्ट नहीं होत, तो उकर अप्रत्यक्ष अद्बुजनाई इचारू भले पर भात बनेच्छा एकर एक्टा बहुत सुन्दर आर रोचक आशेए य आछी जे केवल शब्दक उचारन का देला सां प्रमान नई भजजाई तची जेना जे कोनो सुगा राम राम भाजी रहे लची तो उ शब्द प्रमान नहीं आची. सत्ट्य ज्यानक लेल एक ता आप्ट पुर्ष चाही. मतलब एक ता एहन वकता जकर नीवत एक दम साफ हो. जे सत्ट्य जने थो आब बिना कोन दोखा दिल सत्ट्य बजेत हो. सुगा में उ तात्पर्यवा मन्तव कते साथ. आब हम्रालोकनी अंतिम क्हन्द दिस बडद्ध ची, खन्डो चो, अदिहासिक प्रभाव, ज्यानक अदबुत्यात्रा आओ, आब दिखच्छी जे इप पोठी कोना एक ता पैग परमपरा बनल, गंगेषक इप तत्व छिन्ता मडी केवल एक ता पोठी नहीं रहल, अगर बाद पन्द्राजम शताभदी में पक्षदर मेश्र एक्रापर आलोक नाम सा तीका लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिखा लिख तब आप उद्वाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई बाँई आवश्ख करु. एही विष्छलेशन में हमरा लोकनिक से ज़वा के लेल बहुत-बहुत दश्नवाद.