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आत्मतत्त्वविवेक_की_घरवापसी.mp4
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- 0:00–0:10आज्के अज्के स्विष्लेशर में आपका स्वागत है, आज्ज हम आज्जार्मी सदी की एक बेहद शान्दार दाशनिक रच्ना के एक हजार साल लंभे और रोमाचक सफर पर बात करने वाले है.
- 0:10–0:13दिक्ये ये कोई आम किताप की बात नहीं है,
- 0:13–0:16ये एक आजे कालजैए गरन्द की कहानी है,
- 0:16–0:20जिस ने भार्ट्ये दर्षन की पूरी दुन्या को हमेशा किलिए बड़ल कर रक्तिया था,
- 0:20–0:24और आज ये अपना एक बिल्कुल नया अद्ध्याए लिक्राहा है.
- 0:24–0:26ज़े बिना किसी देरी के शुरू करते हैं
- 0:27–0:29श्क्रीन पर दिक्रहे इस शान्दार कवर को देखिये
- 0:30–0:33ये पन्नो कोई सादारन गध्ध्धर या सरफ एक अनुवाद नहीं है
- 0:34–0:37ये तो सद्वियों से संसक्रिद भाशा की मजबूड दिवारो में कैद
- 0:37–0:41इक प्रक्धर इतिहासिक यूट आई, जो अब आख्विरकार अपनी जन भूमी,
- 0:41–0:43यानी मित्टला वापस लोट आई आई.
- 0:43–0:48इस सच में एक अँईसा पल है, जा वाँरा इतिहास अर वर्तमान एक दुस्रे सि गले मिल रहे हैं.
- 0:48–0:54ज़रा कलपना कीजीए, एक बहुती बहुंकर, हाजार साल पुराना बोद्धिक महासंग्राम,
- 0:54–0:57जो एक प्राचीन भाशा के अभेद्धिक किले में बंद था.
- 0:57–1:02उस किले के दरवाजों को अनवादक गजेंद्र ताकृर ने अक्छिर कार तोर दिया है.
- 1:02–1:07ये अपने आप में एक बड़ी, मैं तो कहुँगा एक अटिहासिक सांस्क्रतिक गठना है.
- 1:07–1:09जो विचार कभी मिठिला की मिटी में जन में दे,
- 1:09–1:12वे सदियो बाद उसी मिटी की अपनी बाशा,
- 1:12–1:15मैठिली के जर ये अपनी ज़ों तक लोट आए हैं.
- 1:15–1:20तो आईए आते हैं हमारे पहले बहाक पर एक महाकावेई दाशनिक युद
- 1:20–1:25अब इस गरन्त के मूल में एक बहुती जबर्दस्त वैचारिक तक्कर है.
- 1:25–1:27एक तरव है बोद्द दर्षन का खषनिक वाद,
- 1:27–1:31तो दंके के चोट पर केटा है, की अस्तिट्व पल पल बडल रहा है.
- 1:31–1:35सब कुछ ख्षन भंगुर है, और आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती.
- 1:35–1:40और थी किस के सामने, तुस्री तरव है, न्याए वैशेशिक दर्षन का स्थाएत्व,
- 1:40–1:43अर आत्मा के अस्तित्व का मस्वुध सिद्धान्त,
- 1:43–1:46मान कर चलिये की ये कोई चोटी मोटी बहेस नहीं थी,
- 1:46–1:50ये उस दोर का सबसे बड़ा वैचारिक महा संग्राम ता,
- 1:50–1:53जिसने अच्छ अच्छ विचारोकों को जगजोर कर रख दिया था.
- 1:53–2:02इस गरन्त के मुल लेखख महान दार्षनिक उदैना चारे जीने अपने पूरे तारकिक हमले को चार प्रमुक अद्ध्यायो या कھन्डो मे भाटा है.
- 2:02–2:12वो क्या करते हैं के खषनिक्वाद, विग्यान्वाद, गुनुगुनी अभेद, और नेरात्मवाद जैसी बोद धारनाव को एक-े-करके पुरी तार्किक्ता के साथ दूस्त करते हैं.
- 2:12–2:23ये देखना सच्छ्छ्छ गजब का अनुबव है कि कैसे हर एक अद्ध्याय अपने से पिछले अद्ध्याय की नीव पर कड़ा हो कर इतना मस्बूद तरक बनाता है कि विरोदियो किले कोई रास्ता ही नहीं बच्छता.
- 2:23–2:26ये सच में तर्क शास्तर की एक मास्तेक्लास है
- 2:26–2:29अब इतने बहारी बहरकम और आमुर्त विश्यो को
- 2:29–2:30कोई कैसे समजगाए?
- 2:30–2:34इसके उदेना चारे जी एक दम जमीनी उदारनो का इस्तमाल करते है
- 2:34–2:37जैसे बीज और अंकुर के उदारन
- 2:37–2:42उसे बाहर आने किलिए मित्ती और पानी जैसी बाहरी चीजों की जोड़त होती है.
- 2:42–2:45इस आसान से उदारन्चे वह यह साभिद कर देते है कि,
- 2:45–2:49सर्फ चीजों की खषनिक होने से सब कुछ तै नहीं होता.
- 2:49–3:19उदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अ�
- 3:19–3:24दद्त्ये एक्दम सामने खडा है, लेकिन अग्यानता के अंदेरे की वज़ा से वड़िखाई ही नहीं देटा.
- 3:25–3:30अब आगे बड़ते है है हमारे दुस्रे भाग की वर, तर्क और साहिट्ते कलागा संगम.
- 3:30–3:33इस अनुवाद की सबस्थे खुबसुरत बात पते क्या है?
- 3:33–3:38अनुवादक ने मुल गरन्त की लै और उसकी आख्रामक उर्जा को एक दम जिन्दर रख है.
- 3:38–3:44मैठली के नहीं यहने नहीं शब्द का जो प्रभावशाली अग़्ा इस तिमालुवा है वो इसका सबसे वडषवूथ है.
- 3:44–3:51देखे ये कोई आम ना नहीं ये शब्द एक जो़डार प्रहार की तरहें विरोडी तरको को बीस से चीरने के लिए अगा है.
- 3:51–3:54जब आब ये से परते हैं तो उस उर्जा का सीडा है सास अज़ा है.
- 3:54–3:58आखेर दरषन को हमेशा बोरिंग और नीरस क्यो अचाहिये?
- 3:58–4:03यह अनवाद ग्रन्त के रस, यह नी इसकी बोद्धिक विरता और द्वनी,
- 4:03–4:07यह नी मुष्किल तरकों के पीछे चिपे गेरे आर्ठों को बिलकुल सुरक्षित रकता है.
- 4:07–4:37तब आप बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बजद�
- 4:37–4:39अदर बाद़ के बाद़ के बाद़ा है.
- 4:39–4:41पहला है विदेशी करन,
- 4:41–4:43जिसका मतलब है मुल पाड़ के मुष्किल
- 4:43–4:45और बहारी शब्डों को वैसा ही रखना
- 4:45–4:47और दूस्रा है देशी करन,
- 4:47–4:49यान उसे पाध़कों की अपनी संसक्रती
- 4:49–4:51और बाशा के हिसाप से दालना,
- 4:51–4:53अपना पन भी लगे.
- 4:53–4:56और यही पर गजेंद्र ताकृर जीने कमाल कर दिया है.
- 4:56–4:59उनो ने न दोनो के भीच एक जबडदस संटूलन बनाया है.
- 4:59–5:02उनो ने बारी बहरकं दार्षनेख शब्डों से कोई चेर्चार न नहीं की,
- 5:02–5:04ताकी विश्य की गंभीरता बनी रहे.
- 5:04–5:06ताकि विशेए की गंविर्ता बनी रहें.
- 5:06–5:11लेगन इसके साथ ही उनोने मेठली भोल्चाल के मुहावरों और प्रीए भाई
- 5:11–5:14जैसे स्थानिये संबोदनो का इतनी खुबसुर्ती सिस्तमाल किया है,
- 5:14–5:17कि पडने वाला सीधे इस गरन्थ से ज़ावा मैंसुस करता है.
- 5:17–5:20यही तो एक कुशल अनुवाद की अस्ली पह्चान है.
- 5:20–5:23एक और बहुत ही दिल्चस्प बात यह है,
- 5:23–5:26के ग्यार्वी सदी का ये गुड भार्तिय चिन्तन,
- 5:26–5:29आदूनेक पश्च्विमी दर्षन के कितना करीब है.
- 5:29–5:30जब हम यस अनुवाद को,
- 5:30–5:36तो देविड्युम के बंडल सिद्द्ध, या जोर्ज बर्कले के विग्यान वाद के साथ रखकर देकते है,
- 5:36–5:40तो इसे गलोबल पचान मिल जाती है. ये साथ तोर पर साभित करता है,
- 5:40–5:43के भारतिय दरषन अपने समय से कितना आगे ता,
- 5:43–5:47आज भी दुन्या के किसी भी कोने के विचारों को सीदे तक्कर दे सकता है.
- 5:47–5:53तो आब आते हैं हमारे चोथे और अन्तिम भाग पर मैठिली भाशा का उठान.
- 5:53–5:58कुल मिलागर ये अटिहासिक रिती एक बहुत बडी बाज साभित करती है.
- 5:58–6:02वो ये की मेठली बाशा सर्फ मीठे लोग गीतों कहानीों
- 6:02–6:04या आम बाच्ची तकी सीमित नहीं है.
- 6:04–6:07इस बाशा मे इतनी जबर्दस्त शम्ता है,
- 6:07–6:12कि ये अख्ट्यंत गेरे, बारी और जटिल दाशनिक विचारों का बार
- 6:12–6:14बहुत यी आसानी से उथासकती है.
- 6:14–6:17सچ मानिय, ये सिल्फ एक किताब का अनुवाद नहीं है,
- 6:17–6:21बलकि एक पूरी भाशा के अकादमिक पुनर्जागरन का प्रतिक है.
- 6:21–6:24हा, इस गरन्त के समीखषको ने,
- 6:24–6:26तो हाँजार चबीस के इस नहीं संस करन के लिए कुछ
- 6:26–6:29चोटे मोटे रचनात्मक सुजाउ जरूर दिये हैं
- 6:29–6:32जैसे की वाख्यों की क्रियाव में फोडी और एक रुप्ता लाना
- 6:33–6:38या फिर पाटखों की मददत के लिए अंत में एक पारिभाशिक शब्दावल यानी ग्लोसरी जोडना
- 6:38–6:40लेकिन अगर हम बडी तस्वीर को देकें
- 6:56–7:20बवला दिया दिया दाईगा ता आज किसी कषेट्री ये बाशा में इतना शान्दार और दड़ड़क्ता हुए नहाज जीवन मिल सकता है, तो ज़र ज़र शोची ए, इतिहास के पन्नो में आज से और कितने अंगिनत बवडद्धिक खजाने कैद हूँँँँँँँँँँ
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आज्के अज्के स्विष्लेशर में आपका स्वागत है, आज्ज हम आज्जार्मी सदी की एक बेहद शान्दार दाशनिक रच्ना के एक हजार साल लंभे और रोमाचक सफर पर बात करने वाले है. दिक्ये ये कोई आम किताप की बात नहीं है, ये एक आजे कालजैए गरन्द की कहानी है, जिस ने भार्ट्ये दर्षन की पूरी दुन्या को हमेशा किलिए बड़ल कर रक्तिया था, और आज ये अपना एक बिल्कुल नया अद्ध्याए लिक्राहा है. ज़े बिना किसी देरी के शुरू करते हैं श्क्रीन पर दिक्रहे इस शान्दार कवर को देखिये ये पन्नो कोई सादारन गध्ध्धर या सरफ एक अनुवाद नहीं है ये तो सद्वियों से संसक्रिद भाशा की मजबूड दिवारो में कैद इक प्रक्धर इतिहासिक यूट आई, जो अब आख्विरकार अपनी जन भूमी, यानी मित्टला वापस लोट आई आई. इस सच में एक अँईसा पल है, जा वाँरा इतिहास अर वर्तमान एक दुस्रे सि गले मिल रहे हैं. ज़रा कलपना कीजीए, एक बहुती बहुंकर, हाजार साल पुराना बोद्धिक महासंग्राम, जो एक प्राचीन भाशा के अभेद्धिक किले में बंद था. उस किले के दरवाजों को अनवादक गजेंद्र ताकृर ने अक्छिर कार तोर दिया है. ये अपने आप में एक बड़ी, मैं तो कहुँगा एक अटिहासिक सांस्क्रतिक गठना है. जो विचार कभी मिठिला की मिटी में जन में दे, वे सदियो बाद उसी मिटी की अपनी बाशा, मैठिली के जर ये अपनी ज़ों तक लोट आए हैं. तो आईए आते हैं हमारे पहले बहाक पर एक महाकावेई दाशनिक युद अब इस गरन्त के मूल में एक बहुती जबर्दस्त वैचारिक तक्कर है. एक तरव है बोद्द दर्षन का खषनिक वाद, तो दंके के चोट पर केटा है, की अस्तिट्व पल पल बडल रहा है. सब कुछ ख्षन भंगुर है, और आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती. और थी किस के सामने, तुस्री तरव है, न्याए वैशेशिक दर्षन का स्थाएत्व, अर आत्मा के अस्तित्व का मस्वुध सिद्धान्त, मान कर चलिये की ये कोई चोटी मोटी बहेस नहीं थी, ये उस दोर का सबसे बड़ा वैचारिक महा संग्राम ता, जिसने अच्छ अच्छ विचारोकों को जगजोर कर रख दिया था. इस गरन्त के मुल लेखख महान दार्षनिक उदैना चारे जीने अपने पूरे तारकिक हमले को चार प्रमुक अद्ध्यायो या कھन्डो मे भाटा है. वो क्या करते हैं के खषनिक्वाद, विग्यान्वाद, गुनुगुनी अभेद, और नेरात्मवाद जैसी बोद धारनाव को एक-े-करके पुरी तार्किक्ता के साथ दूस्त करते हैं. ये देखना सच्छ्छ्छ गजब का अनुबव है कि कैसे हर एक अद्ध्याय अपने से पिछले अद्ध्याय की नीव पर कड़ा हो कर इतना मस्बूद तरक बनाता है कि विरोदियो किले कोई रास्ता ही नहीं बच्छता. ये सच में तर्क शास्तर की एक मास्तेक्लास है अब इतने बहारी बहरकम और आमुर्त विश्यो को कोई कैसे समजगाए? इसके उदेना चारे जी एक दम जमीनी उदारनो का इस्तमाल करते है जैसे बीज और अंकुर के उदारन उसे बाहर आने किलिए मित्ती और पानी जैसी बाहरी चीजों की जोड़त होती है. इस आसान से उदारन्चे वह यह साभिद कर देते है कि, सर्फ चीजों की खषनिक होने से सब कुछ तै नहीं होता. उदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अदर अ� दद्त्ये एक्दम सामने खडा है, लेकिन अग्यानता के अंदेरे की वज़ा से वड़िखाई ही नहीं देटा. अब आगे बड़ते है है हमारे दुस्रे भाग की वर, तर्क और साहिट्ते कलागा संगम. इस अनुवाद की सबस्थे खुबसुरत बात पते क्या है? अनुवादक ने मुल गरन्त की लै और उसकी आख्रामक उर्जा को एक दम जिन्दर रख है. मैठली के नहीं यहने नहीं शब्द का जो प्रभावशाली अग़्ा इस तिमालुवा है वो इसका सबसे वडषवूथ है. देखे ये कोई आम ना नहीं ये शब्द एक जो़डार प्रहार की तरहें विरोडी तरको को बीस से चीरने के लिए अगा है. जब आब ये से परते हैं तो उस उर्जा का सीडा है सास अज़ा है. आखेर दरषन को हमेशा बोरिंग और नीरस क्यो अचाहिये? यह अनवाद ग्रन्त के रस, यह नी इसकी बोद्धिक विरता और द्वनी, यह नी मुष्किल तरकों के पीछे चिपे गेरे आर्ठों को बिलकुल सुरक्षित रकता है. तब आप बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बज़द बजद� अदर बाद़ के बाद़ के बाद़ा है. पहला है विदेशी करन, जिसका मतलब है मुल पाड़ के मुष्किल और बहारी शब्डों को वैसा ही रखना और दूस्रा है देशी करन, यान उसे पाध़कों की अपनी संसक्रती और बाशा के हिसाप से दालना, अपना पन भी लगे. और यही पर गजेंद्र ताकृर जीने कमाल कर दिया है. उनो ने न दोनो के भीच एक जबडदस संटूलन बनाया है. उनो ने बारी बहरकं दार्षनेख शब्डों से कोई चेर्चार न नहीं की, ताकी विश्य की गंभीरता बनी रहे. ताकि विशेए की गंविर्ता बनी रहें. लेगन इसके साथ ही उनोने मेठली भोल्चाल के मुहावरों और प्रीए भाई जैसे स्थानिये संबोदनो का इतनी खुबसुर्ती सिस्तमाल किया है, कि पडने वाला सीधे इस गरन्थ से ज़ावा मैंसुस करता है. यही तो एक कुशल अनुवाद की अस्ली पह्चान है. एक और बहुत ही दिल्चस्प बात यह है, के ग्यार्वी सदी का ये गुड भार्तिय चिन्तन, आदूनेक पश्च्विमी दर्षन के कितना करीब है. जब हम यस अनुवाद को, तो देविड्युम के बंडल सिद्द्ध, या जोर्ज बर्कले के विग्यान वाद के साथ रखकर देकते है, तो इसे गलोबल पचान मिल जाती है. ये साथ तोर पर साभित करता है, के भारतिय दरषन अपने समय से कितना आगे ता, आज भी दुन्या के किसी भी कोने के विचारों को सीदे तक्कर दे सकता है. तो आब आते हैं हमारे चोथे और अन्तिम भाग पर मैठिली भाशा का उठान. कुल मिलागर ये अटिहासिक रिती एक बहुत बडी बाज साभित करती है. वो ये की मेठली बाशा सर्फ मीठे लोग गीतों कहानीों या आम बाच्ची तकी सीमित नहीं है. इस बाशा मे इतनी जबर्दस्त शम्ता है, कि ये अख्ट्यंत गेरे, बारी और जटिल दाशनिक विचारों का बार बहुत यी आसानी से उथासकती है. सچ मानिय, ये सिल्फ एक किताब का अनुवाद नहीं है, बलकि एक पूरी भाशा के अकादमिक पुनर्जागरन का प्रतिक है. हा, इस गरन्त के समीखषको ने, तो हाँजार चबीस के इस नहीं संस करन के लिए कुछ चोटे मोटे रचनात्मक सुजाउ जरूर दिये हैं जैसे की वाख्यों की क्रियाव में फोडी और एक रुप्ता लाना या फिर पाटखों की मददत के लिए अंत में एक पारिभाशिक शब्दावल यानी ग्लोसरी जोडना लेकिन अगर हम बडी तस्वीर को देकें बवला दिया दिया दाईगा ता आज किसी कषेट्री ये बाशा में इतना शान्दार और दड़ड़क्ता हुए नहाज जीवन मिल सकता है, तो ज़र ज़र शोची ए, इतिहास के पन्नो में आज से और कितने अंगिनत बवडद्धिक खजाने कैद हूँँँँँँँँँँ