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भामती_के_मैथिली_अनुवाद_की_समीक्षा.m4a

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:05आज्छ की चर्चा में हम वाचस्पती मिश्र की जतिल दार्षनिक रचना भामती,
  2. 0:05–0:12के गजेंद्र ताकुर दूरा किये गय उतक्रिष्ट मैठिली अनुवाद के एक अत्यंत गहन विष्लेशन पर बाथ कर रहे हैं.
  3. 0:12–0:16बलकुल, और ये स्रोट समगरी सच्छ में बहुत दीप और विद्वतापोन है.
  4. 0:16–0:19तो चलिये सीदा अपने पहले फीट्बाक पर आते हैं.
  5. 0:19–0:26प्रस्तुट समगरी में मूल अद्वेद्वेदान्त की दार्षनेग जटिल्ताओं का अद्बुत और विस्त्रत वरनन है.
  6. 0:26–0:30किन்तु कभी कभी यह अनुवाद की कला की समिक्षा होने के बजाए
  7. 0:30–0:34सीदे तोर पर दर्षन शास्तर का मुल पाट लगने लकता है
  8. 0:34–0:40आप मतलब यह एक आँसा जाल है जिस में कोई भी गंभीर समिक्षक बहुत आसानी से पहस्सकता है
  9. 0:40–0:47जब आब भामती ज़ेसे किसी अट्यन्त गूड संस्क्रित क्रन्त के अनुवाद का विष्लेशन कर रहे होतेना,
  10. 0:47–0:51तो उसकी दार्ष्निग गेराई इतनी समोहक होती है,
  11. 0:51–0:54कि उसे दीकोड करना ही अपने अपने कुपलब्दि लगने लकता है.
  12. 0:54–0:56बिल्को लिग्दम सही कहा आपने.
  13. 0:56–0:59दिके, इस सामगरी को परते समें,
  14. 0:59–1:01ये एक दम सपष्ट होता है,
  15. 1:01–1:04कि लेक्हक ने अदवेट वेदान्त की ज्यान मेंमान्सा,
  16. 1:04–1:07उनक अद्ध्यास यानी ब्रहम की स्तिती,
  17. 1:07–1:11और ख्यातिवाज जटल सिद्दान्तो पर बहुत गेरी पकड बनाली है.
  18. 1:13–1:16लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जो मूल उदेश्ठ है,
  19. 1:17–1:19यहनी एक अनुवाद की समिक्षा करना,
  20. 1:19–1:21वो कही न कही पीछे चूट जाता है.
  21. 1:21–1:22वही तो.
  22. 1:22–1:34तो इसका परनाम यह ता है कि पाटख मुल संस्क्रित दरशन के सद्दान्तो में इतना दुब जाता है कि गजेंदर ताकर के विषिष्ट योग्दान और उनकी मेठिली भाशा के प्रियोग की चर्चा पूरी तरा से प्रिष्टबूमी में चले जाती है.
  23. 1:34–1:38भिलकुल आँप्ताने जैसे अनुवादक गायब हो गया हो
  24. 1:38–1:39आँ, मतलब हम ये बूलने लकते हैं,
  25. 1:39–1:42कि हम सीदे वाचसपती मिश्र को नहीं पड़रे हैं
  26. 1:42–1:47बलकी हम ताकृर जी की दिष्टी से चन कर आए वाचसपती मिश्र को पड़रे हैं
  27. 1:47–1:51ये कुछ वैसा ही है जैसे हम किसी सिमफनी औरकेस्ट्रा की समिक्षा कर रहे हों
  28. 1:51–1:54लेकन हमारा पुरा ध्यान केवल संगीत कार के लिखे नोट्स पर हो.
  29. 1:54–1:56और आई हम भड़या उदारन है ये.
  30. 1:56–1:59और मतलब हम ये बताना ही बहुल जाएं
  31. 1:59–2:02कि वादकोंने उसे अपने वाद्यन्तरों पर कैसा बजाया?
  32. 2:02–2:05एक दम सतिक बात कही आपने.
  33. 2:05–2:08उस सिमफनी वाले उदारन को अगर हम थोडा और आगे बड़ाये.
  34. 2:08–2:12तो हम कै सकते है, कि यहां समीखषक हमे ये तो बतारा है,
  35. 2:12–2:15कि संगीट कि दून कितनी जटिल है,
  36. 2:15–2:20लेकिन ये नहीं बतारा के जव वही दून मैठली भाशा के वादी अंट्र पर बच्टी है,
  37. 2:20–2:22तो उसकी अनुगुच कैसी होती है.
  38. 2:22–2:25सही बाद है, तो इसका सुजाओ क्या हो सकता है?
  39. 2:25–2:29इसका सीथा सा समथान यह है के दार्षनिक सिद्धान्तो की
  40. 2:29–2:34अगर एक गेरी व्यक्या को तोरन्त मैठली अनुवाद के किसी विषिछ्ट निरनें
  41. 2:34–2:40या शब्द चयन किसाद जोडना होगा. मतलब दर्षन केवल उस कैन्वास के रूप में
  42. 2:40–2:44इसतमाल किया जाना जाहिए जिस पर अनुवादक की सपल्ता को उकेरा जासके.
  43. 2:44–2:50बिल्कुल और इसे जमीन पर उतारने किलिए, हम स्रोथ सामगरी के उस हिससे को देक सकते हैं,
  44. 2:50–2:54जहां नियाएक मत यान्नेता ख्याती के कचन्डन की चर्चा की गगे है.
  45. 2:54–2:56आवो हिससा कापी दिल्चस्प है.
  46. 2:56–3:04अबि जिस रूप में से लिखा गया है, वह अन्निता ख्याती का एक बहुत ही शान्दार और अकाद में दाशनिक साराव्च है,
  47. 3:04–3:08लिकिन अगर हम केवल दाशनिक तरक को समजाने तक सीमित न रहें,
  48. 3:08–3:12तो हम पातक को वह आहा मोमन्त दे सकते हैं
  49. 3:12–3:14जो केवल एक सफल अनुवाद ही दे सकता हैं
  50. 3:14–3:18और यही पर गजेंदर ताकृर की आस्ली कला उबरकर सामने आती है
  51. 3:18–3:22जब हम अन्निता ख्याती का कंडन पडते हैं
  52. 3:22–3:27तो समीख्षक को सीदे तोर पर थाकुरजी के उस मैठली वाख्के को सामने लाना जाहीए.
  53. 3:27–3:34जहाँ वो लिकते है आहा बिचारा ग्यानेक इखेहन महान सबहाग अची
  54. 3:34–3:38जे असत्यक तवारा से हो निष्षितता प्राथकर लेत अची.
  55. 3:38–3:40या बात है, बहुत थीखख कटाक्ष है
  56. 3:40–3:42है ना, अब यहां दियान देने बात ये है
  57. 3:42–3:45कि यह एक शब्दे कनुवाद नहीं है
  58. 3:45–3:47यह संसक्रित के एक बोद्धिक प्रहार का
  59. 3:47–3:51एक एक गेरे संसक्रित टिग वियंगे में रुपान्तरन है
  60. 3:51–3:54बिल्कुल ये वास्तमे एक बहुत फीज़ सती कवलोकन है
  61. 3:54–3:58संस्क्रत कमुल कताएक्ष बहुत फीज़क और अकादमिक हो सकता है
  62. 3:58–4:03लेकिन मेठली में आफ़े कहने से इस में एक थेट लोक समवाद का पोता जाता है
  63. 4:03–4:06आआ, एक दम लोकल फलेवर आजाता है
  64. 4:06–4:10आँद बाद को समगरी में सपष्ट रुप से रेख हंकित किया जाना जाएगे.
  65. 4:10–4:13बिल्कुल पाटख को ये बताया जाना जाना जाएगे,
  66. 4:13–4:18कैसे ये आनुवाद उस दरशन को आम आदमी की पहुच में ले आता है.
  67. 4:18–4:48पात्ख को ये बताया जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना
  68. 4:48–4:52भिल्कुल, एक आंदा दुस्रे आंदे का हात पकड़कर हर कदम पर गिर रहा है.
  69. 4:53–4:56हा, ये चित्र इतना सजीव और दिश्टी गोचर है,
  70. 4:56–5:01कि ये तुरन्त आंद परमपरा के पुरे दार्ष्निक कुन्सेप्त को पाटग के दिमाग में उकेर देता है.
  71. 5:01–5:02सही कहा.
  72. 5:02–5:07तो बेसेक्ली इन बाशाई और सान्स्क्रितिक उदारनों को
  73. 5:07–5:10दार्षनेक व्याख्या के बिल्कुल समनान्तर रखना हुगा
  74. 5:10–5:12नाकी कि खिसी अलग द्ध्ध्याय में
  75. 5:12–5:16और इसी से हम अपने दूस्रे फीट्बैक पर आते हैं
  76. 5:16–5:18जो की स्ट्रक्चर के बारे में हैं हैं आ?
  77. 5:18–5:19जी.
  78. 5:19–5:21अनुवाद की देशज मुहावरा
  79. 5:21–5:24और तीन स्टरो वाली बाशाई रननीती का विष्लेशन
  80. 5:24–5:26अथ्यनत उतक्रिष्ट है.
  81. 5:26–5:29लेकिन इसे ग्रन्त के अन्त में
  82. 5:29–5:31इक �alagakhand के रूप में रक्ने से
  83. 5:31–5:33इसका समग्र प्रभाव कमजोर होजाता है
  84. 5:33–5:36अग, मैं इस भाथ से पूरी तरा सैमथ हूँ
  85. 5:36–5:40अगर दर्षन और अनुवाद के उदारन साथ साथ चलेंगे
  86. 5:40–5:42तो इसका सीथा आसर इस बात पर पडेगा
  87. 5:42–5:45की पूरी समिक्षा को कैसे स्ट्रक्षर की आगया है
  88. 5:45–5:45बिलकुल
  89. 5:45–5:50वर्तमान में अनुवाद सिद्धान्त, बाशा रन्निती, अदेशज मुहावरा,
  90. 5:50–5:54नामक एक पूरा का पूरा क्हन्द, समिक्ष्या के बिल्कुल अंतिम हिस्से में
  91. 5:54–5:56एक अपिंटेक्स या परिषिष्ट की तरा रख्खा गया है.
  92. 5:56–6:01अर सच कहुं तो ये पाटकों के अनुबहव के लिए एक बहुत बडी संज्यानात्मक बादा
  93. 6:02–6:04मदला बे कोगनेटिप ब्लोक क्ड़ा कर देता है
  94. 6:04–6:04वो के से?
  95. 6:05–6:10आप खुद कलपना की जिए की एक पाटक लगभक चारसो पन्नो तक
  96. 6:10–6:14अट्तिंत सगन दार्षनिक अद्यायों से गुजरता है,
  97. 6:14–6:16जब विल्कुल अन्त में पूछता है,
  98. 6:16–6:19तब उसे मुसकी, यानी मुसकान,
  99. 6:19–6:21इजोथ, यानी प्रकाश,
  100. 6:21–6:23दूंदल का, या चुट्याला,
  101. 6:23–6:28जैसे तेट और खुबसुरत मैठली शब्डों की रननीती के बारे में बताया जाता है
  102. 6:28–6:30आप, तब तक तो वो सब बूल चुका होगा
  103. 6:30–6:36वही तो, तब तक वो पाथक उन मूल दार्षनिक अद्यायों को बहुत पीछे चोर चुका होता है
  104. 6:36–6:39यह ज़ाह इन शब्डों का वास्तम में उप्योग हूँ आता
  105. 6:39–6:44उसे आब यादी नहीं कि मुस्की शब्द किस विष्च्ट श्लोग या प्रसंग में आया आता
  106. 6:44–6:47तो पाटख को बार बार पीचे मुडकर देखने क्यों बाज्बूर हूँना परता है
  107. 6:47–6:49जो पडने के फ्लो को पुरी तरह तोर देता है
  108. 6:49–6:51एक दम सही
  109. 6:51–6:53तो इसका एक बहतर तरीका यह जो सकता है
  110. 6:53–6:54कि इस भाशाई रनीती को
  111. 6:54–6:56जिस में पारिभाशिक, शुद्द्रता,
  112. 6:56–6:58वाख के संदचना का सर्ली करन
  113. 6:58–7:00और देशज महावरो का प्रुक्षामिल है
  114. 7:00–7:04उसे एक �alag khana mein kayaat karne ke bhajai, पूरे पाथ में कालानुक्रमें गुब से,
  115. 7:04–7:07यहनी क्रनोलोगिकली प्रवाइत क्या जाए.
  116. 7:07–7:08आ, बलकुल.
  117. 7:08–7:11मतलब इन सिद्दान्तो को वही स्पष्ट किया जाना जाए,
  118. 7:11–7:13जहावे किताब में पहली बार प्रकत होते हैं.
  119. 7:13–7:17लिकिन एक मिनेट यहा मेरे मन में एक सवाल उत्रा है
  120. 7:17–7:18आब दाई एक
  121. 7:18–7:22मैं यहा ये सोच रहा हूं की यह यह दी हम भाशाई समिक्षा को
  122. 7:22–7:25दार्षनिक साराज के सात पूरी तरा मिला देंगे
  123. 7:25–7:28तो क्या ये खत्रानी है कि पाथख गजंदर ताकृ की
  124. 7:28–7:31उस व्यापक और सून्योजित कारे प्रनाली को देखने से चूक जाए,
  125. 7:31–7:33जो उनोने अनूवाद किले बनाई है?
  126. 7:33–7:35उंज, ये एक अच्छा point है.
  127. 7:35–7:38मतलब क्या वे तीनोस्तर पारिभाशिक, शुद्द्दथा,
  128. 7:38–7:42वाख के सन्रच्ना और मूहावरे दार्षनिक चर्चा के
  129. 7:42–7:44उसे उस भारी शोर में कही दब नहीं जाएंगे?
  130. 7:44–7:47देखे ये एक बहुत ही वाजब चिनता है.
  131. 7:47–7:52कि सन रच्ना को तोडने से कही मुल दाचा ही न बेखर जाएं.
  132. 7:52–7:55लेके अगर अगर अज़े एक तूल किट की तरा देखें,
  133. 7:55–7:57तो ये समस्याल हो सकती है.
  134. 7:57–8:04मैंगा बाशाई रननीतियो को एक पर शुरूात में संखषेत में बता सकते हैं
  135. 8:04–8:12और फिर उने पूरी समीख्षा में दर्षन के हर एक पडाव पर एक तूल की तराँग काम करते होई प्रदर्षित कर सकते हैं
  136. 8:12–8:16औ, अच्छा? आ, ये तरीका जाडा कारगर होगा
  137. 8:16–8:21इसे अनुवादक की रननीती केवल एक थ्योरी बनकर नहींगाएगी
  138. 8:21–8:24बलकी वो हर पनने पर अपना प्रभाव सावित करेगी.
  139. 8:24–8:25दिलकल
  140. 8:25–8:31उदाहरन के लिए, जब समीखषक दूस्रे मंगलाचरन श्लोक की चर्चा कर रहा हो,
  141. 8:31–8:36तो उसे उसीक शण मुस्की शब्द के प्रयोग का विष्लेशन करना चाहीए.
  142. 8:36–8:41क्योंकी देखे, मंगला चरन में ब्रम्हांड्ये, लीला, महाप्रलै
  143. 8:41–8:46और स्रिष्टी के निर्मान जैसे अथ्यंत गंभीर और भारी विष्षों की बात होती है.
  144. 8:46–8:51आज़े में अनुवादक दवारा मुसकी, यहनी एक हलकी सी मुसकान
  145. 8:51–8:55जैसे एक बेहत गरेलो और आत्मी एश्वद का उप्योक करना
  146. 8:55–8:58एक बहुत बड़ा और सहसिक बाशाई निरने है।
  147. 8:58–8:59बहुत हुब!
  148. 8:59–9:29अद्यादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादिया�
  149. 9:29–9:32अद्यास के उस लिज़े का उदारन लिज़े,
  150. 9:32–9:36जगा मनुश्शे और पशो के विवार में समानता के बात की गगे है.
  151. 9:36–9:41अद्वेत विदान्त में अद्यास एक बहुत ही आमुर्त और जटिल अवदारना है.
  152. 9:41–9:43आप, काफी कोम्पलेक्स है.
  153. 9:43–9:46तो जब समीक्षक उस दाशनिक तरक को समजा रहा हो,
  154. 9:46–9:49उसी पारग्राफ में उसे ये भी सपष्ट करना चाहीए,
  155. 9:49–9:52कि कैसे लाठी उठोने,
  156. 9:52–9:54मनुश्षे देकी भागब़,
  157. 9:54–9:56जैसी टेट ग्राम्यबाशा,
  158. 9:56–10:00उस जटल दरषन को बिल्कुल जमीनी हकीकत से जोडती है.
  159. 10:00–10:06बिल्कुल या स्पष्ट क्या जाना चाहीए कि अनुवादक ने जान बुचकर इन ग्रामीन भिम्बो का उप्योग क्या है
  160. 10:06–10:12ताकि मैत्हली पाटक को ये महसुस हो कि अग्यान या अद्यास कोई अईसी चीज नहीं है,
  161. 10:12–10:15यो केवल संस्क्रित के पुराने गरन्तों में पाईजाती है
  162. 10:15–10:18आप बलकी या हमारी रोस मरा की जिंदिगी का हिस्सा है
  163. 10:18–10:22इस तरा से पूरी समिखष्या की संद्रच्ना स्वाभेक रूप से
  164. 10:22–10:25दार्षनिक प्रगती और भाशाई रन्नीती
  165. 10:25–10:27अगदम सही कहा आपने
  166. 10:27–10:31अब आब हम अपने तीस्रे और अन्तिम फीट्बाक की अर बडटे हैं
  167. 10:31–10:35जो की तोन और अडियंस अलाइन्मेंट से जोडा है
  168. 10:35–10:37आप ये बहुत महत्वपून है
  169. 10:37–10:40बवविश्छे के संसक्रनो के लिए दिये गय संपाद की एं सुजाओ
  170. 10:40–10:46बविश्छे के संट्क्रनों के लिए देए गय संपाद की एशुजाव बहुत पैने और सतीक हैं
  171. 10:46–10:49परवे निशकरष्ष्छ से तीक पहले एक सुची
  172. 10:49–10:52मतलब बूलेट पूएंट्ट्ब्रूप में प्रस्थूत हुने के कारन
  173. 10:52–10:55विमर्ष्छ के प्रवाज और गंभीर्ता को अचानक बादित कर देते हैं
  174. 10:55–10:59आप मतलब जब हम सन्रचना में बडलाव की बात करते हैं
  175. 11:00–11:04तो उसका सीथा असर पाट के तोन यानी उसके लहजे पर पडता है
  176. 11:04–11:09अर ये इस समगरी की एक बड़ी समस्या की योर हमारा दियान कीचता है.
  177. 11:09–11:10बलकल.
  178. 11:10–11:15उंग या पूरी समिक्षा एक बहुत ही उच्छ दाशनिक स्टर पह पहुछती है.
  179. 11:15–11:19जैसे हम जीवन मुक्ती के सिद्दानत, सिद्द वस्तवाख्क्यः
  180. 11:19–11:24अर अदवाइत वेदान्त के अंतिम निषकर्षों पर अत्यंत गंभीर चर्चा कर रहे हूते हैं
  181. 11:24–11:28पाथक एक प्रकार के दाशनिक शिक्र पर बैथा होता है
  182. 11:28–11:31आप और फिर थीक निषकर्स से पहले क्या होता है
  183. 11:31–11:34अचानक एक बूलेटिट सुची आ जाती है
  184. 11:34–11:39वही तो इस सुची में अप्रोती बनाम अपरोक्ष की ताइपिंच्रूती
  185. 11:39–11:43या प्रीकी ताकर की वरतनी जैसी चोटी चोटी गलतीों का जिक्र है.
  186. 11:43–11:46ये वैचारिक ताल मेल को बूरी तरा तोड देता है.
  187. 11:46–11:54बलकुल, ये अचानक से पाटख के अनुववव को एक दार्षनिक शिकर से गिराकर एक सादारन प्रूप रीडिंक के स्थर पर लेयाता है.
  188. 11:54–11:56रहा, एक दम जद के से?
  189. 11:56–12:02मतलब एक शन पहले पाटख ये सुच रहा होता है, की आत्मा और ब्रहम का मिलन कै से होता है.
  190. 12:02–12:07अगले इश्वन उसे बताया जारा है, की पेज नमबर भ्यालीस पर एक मात्रा गलड शपी है.
  191. 12:07–12:09ये सच में बहुती अजी बनुभाव है?
  192. 12:09–12:13है ना, यह पूरी समिक्षा के उस भववे प्रभाव को कमजोर कर दिता है,
  193. 12:13–12:15जो लेकहक ने इतनी महनत से बनाया था.
  194. 12:15–12:19तो मेरी समच कन उसार इन नोट्ट से जो मुख्धगे बाद निकल कर आगी है,
  195. 12:19–12:25वो यह है कि इसे सुदारने के लिए हमें इन बारीक समपाद की तिपपन्यों को,
  196. 12:25–12:28एक सुची कितरा प्रस्टूत करने से बचना चाही है.
  197. 12:28–12:29तो फिर न भी आप या क्या कर सकते है?
  198. 12:29–12:30या कर सकते है?
  199. 12:30–12:36इसके बजाए उने मैठली बाशा के मानकी करन की एक व्यापक अकाद्द्मिक चर्चा के भीटर गूथ देना चाहीए.
  200. 12:36–12:40औ, यह है बहुत ही शान्दार विचार है.
  201. 12:40–12:44इन त्रूटियों को केभल गलतियों की पेष करने के बजाए,
  202. 12:44–12:50अनुवाद की कत्होर अदिट प्रक्रिया की सब्ठलता के प्रमान के रुब प्रस्टूत की आजा सकता है
  203. 12:50–12:51बिल्कुल
  204. 12:51–12:54और यह केवल अशुद्दियो को सुदारने की बात नहीं है
  205. 12:54–12:59बलकी मेठली वांगमाई के एक दार्षनिक भाशा की रूप में परपक्पो होने का जचन है?
  206. 12:59–13:03आँ, इसे एक बहुत शक्तिषाली तर्क में बडला जा सकता है.
  207. 13:03–13:04बलकु!
  208. 13:04–13:07समिक्षक इस बात पर एक पुरा पारग्राफ लिक सकता है.
  209. 13:07–13:13कि कैसे चाल सो एक्यानवे प्रिष्थों के इस विश्षाल और अत्यंत जतिल गरन्त में.
  210. 13:13–13:18त्रूटियों की यह आलपता अपने आप में एक बहुत बडी उपलबदी है.
  211. 13:18–13:19सही बाथ है.
  212. 13:19–13:24उदारन के लिए पूरे गरन्त में केवल साज जग़ अप्रोती चपना कोई कमी नहीं है.
  213. 13:24–13:29बलकी यह उस एक अगरता और भाशाई अनुशासन का प्रमाण है,
  214. 13:29–13:31जिसे अनुवादक ने बनाई रखा है
  215. 13:31–13:32बलकुल
  216. 13:32–13:35इसे एक मानक स्तापित करने वाली उपलप्डी के रूप में
  217. 13:35–13:37फ्रेम किया जाना जाहीए
  218. 13:37–13:41और जब हम लिंग वचन संगती की बात करते है
  219. 13:41–13:45जैसे अची और चती का अनुशासित प्रयोग
  220. 13:45–13:48या नुक्ता के सतिक उप्योग की चर्चा करते हैं,
  221. 13:48–13:50तो इसे इस तरा पेश किया जाना जाहाहीए,
  222. 13:50–13:54कि गजेंदर ठाकूर केवल एक पुस्तक का समपादन नहीं कर रहे हैं.
  223. 13:54–13:55तो वो क्या कर रहे हैं?
  224. 13:55–14:01वे वास्तम में मैठिली को विष्वविद्यालेस तर के दर्षन शास्तर का माद्यम बनाने की दिशा में
  225. 14:01–14:03एक अटिहासे कदम उटार रहे हैं.
  226. 14:03–14:07बिल्कुल. ये बाशा के मानकी करन का एक मोडल है.
  227. 14:07–14:10और जब समिक्षक इस तरा पेश करेगा.
  228. 14:10–14:17तो वे च्टी चोटी समपाद की अटिपन्या भी उस भववे दाशनिक लहजे के साथ पूरी तरहा माच करेंगी
  229. 14:17–14:21जो पूरी समिक्षा में शुर्वाथ से लेकर अंटक बनाई रखा गया है
  230. 14:21–14:22एक दम सही
  231. 14:22–14:24तो चली अब इस पूरी चर्चा को समेट लेते हैं
  232. 14:24–14:25आब यह बलकोल.
  233. 14:25–14:29इस शान्दर समिक्षा को और भी प्रभाव्शाली बनाने के लिए,
  234. 14:29–14:31तीन मुखे कदम उठाये जासकते हैं.
  235. 14:31–14:34पहला, दर्षन शास्टर की गेरी व्याख्यागो,
  236. 14:34–14:36हमेशा अनुवाद की कला,
  237. 14:36–14:39और अनुवादक के निरनेों से जोड कर रखना.
  238. 14:39–14:43ताकी दार्शनिक सिद्धान्त अकेले हवामे नतेरे
  239. 14:43–14:44सही कहा
  240. 14:44–14:48तुस्रा, देशज मुहावरों और भाशाई रननीतियों को
  241. 14:48–14:51अलक खलक एक परशिष्ट में रखने के बजाए
  242. 14:51–14:54मुक्के पाथ में प्रासंगिक स्थानों पर गुदना
  243. 14:54–14:55बलकल
  244. 14:55–14:59ताकी पाटक उसी समय उस भाशाई जादों को महसुश कर सके.
  245. 14:59–15:05और तीस्रा, चोटी समपाद की ये त्रूटीों की सुची को एक प्रूफ रीटर की रिपोट की तरह न नच्छोड कर,
  246. 15:05–15:09उसे मैठली भाशा के व्यापक मानकि करन की अकादमिक चर्चा में बडलना.
  247. 15:09–15:14अग, जो की इस पूरे काम को एक बहुत बड़ा और अटिहासिक परपेखषे देता है.
  248. 15:14–15:19बलकुल, तो हम श्रोता को यन छो सुजावो पर काम करने के प्रुद सहीत करते है,
  249. 15:19–15:22आपके पास यक बहुत फीं मस्बुत नीव है,
  250. 15:22–15:27और इन बदलाओ के साथ आपकी ये समिक्षा आपने आपने एक मानक बन सकती है.
  251. 15:27–15:28बलकोल.
  252. 15:28–15:33और हम चाहेंगे अप अपने सन्शोदिद दस्तवेस को फिरसे चर्चा मच पर भीजे
  253. 15:33–15:37ताकि हम देख सके कि आपने इन सुजावो को कैसे लागू किया है.
  254. 15:37–15:38एक दम.
  255. 15:38–15:40अज के लिए बस इतना ही फिर मिलेंगे

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आज्छ की चर्चा में हम वाचस्पती मिश्र की जतिल दार्षनिक रचना भामती, के गजेंद्र ताकुर दूरा किये गय उतक्रिष्ट मैठिली अनुवाद के एक अत्यंत गहन विष्लेशन पर बाथ कर रहे हैं. बलकुल, और ये स्रोट समगरी सच्छ में बहुत दीप और विद्वतापोन है. तो चलिये सीदा अपने पहले फीट्बाक पर आते हैं. प्रस्तुट समगरी में मूल अद्वेद्वेदान्त की दार्षनेग जटिल्ताओं का अद्बुत और विस्त्रत वरनन है. किन்तु कभी कभी यह अनुवाद की कला की समिक्षा होने के बजाए सीदे तोर पर दर्षन शास्तर का मुल पाट लगने लकता है आप मतलब यह एक आँसा जाल है जिस में कोई भी गंभीर समिक्षक बहुत आसानी से पहस्सकता है जब आब भामती ज़ेसे किसी अट्यन्त गूड संस्क्रित क्रन्त के अनुवाद का विष्लेशन कर रहे होतेना, तो उसकी दार्ष्निग गेराई इतनी समोहक होती है, कि उसे दीकोड करना ही अपने अपने कुपलब्दि लगने लकता है. बिल्को लिग्दम सही कहा आपने. दिके, इस सामगरी को परते समें, ये एक दम सपष्ट होता है, कि लेक्हक ने अदवेट वेदान्त की ज्यान मेंमान्सा, उनक अद्ध्यास यानी ब्रहम की स्तिती, और ख्यातिवाज जटल सिद्दान्तो पर बहुत गेरी पकड बनाली है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जो मूल उदेश्ठ है, यहनी एक अनुवाद की समिक्षा करना, वो कही न कही पीछे चूट जाता है. वही तो. तो इसका परनाम यह ता है कि पाटख मुल संस्क्रित दरशन के सद्दान्तो में इतना दुब जाता है कि गजेंदर ताकर के विषिष्ट योग्दान और उनकी मेठिली भाशा के प्रियोग की चर्चा पूरी तरा से प्रिष्टबूमी में चले जाती है. भिलकुल आँप्ताने जैसे अनुवादक गायब हो गया हो आँ, मतलब हम ये बूलने लकते हैं, कि हम सीदे वाचसपती मिश्र को नहीं पड़रे हैं बलकी हम ताकृर जी की दिष्टी से चन कर आए वाचसपती मिश्र को पड़रे हैं ये कुछ वैसा ही है जैसे हम किसी सिमफनी औरकेस्ट्रा की समिक्षा कर रहे हों लेकन हमारा पुरा ध्यान केवल संगीत कार के लिखे नोट्स पर हो. और आई हम भड़या उदारन है ये. और मतलब हम ये बताना ही बहुल जाएं कि वादकोंने उसे अपने वाद्यन्तरों पर कैसा बजाया? एक दम सतिक बात कही आपने. उस सिमफनी वाले उदारन को अगर हम थोडा और आगे बड़ाये. तो हम कै सकते है, कि यहां समीखषक हमे ये तो बतारा है, कि संगीट कि दून कितनी जटिल है, लेकिन ये नहीं बतारा के जव वही दून मैठली भाशा के वादी अंट्र पर बच्टी है, तो उसकी अनुगुच कैसी होती है. सही बाद है, तो इसका सुजाओ क्या हो सकता है? इसका सीथा सा समथान यह है के दार्षनिक सिद्धान्तो की अगर एक गेरी व्यक्या को तोरन्त मैठली अनुवाद के किसी विषिछ्ट निरनें या शब्द चयन किसाद जोडना होगा. मतलब दर्षन केवल उस कैन्वास के रूप में इसतमाल किया जाना जाहिए जिस पर अनुवादक की सपल्ता को उकेरा जासके. बिल्कुल और इसे जमीन पर उतारने किलिए, हम स्रोथ सामगरी के उस हिससे को देक सकते हैं, जहां नियाएक मत यान्नेता ख्याती के कचन्डन की चर्चा की गगे है. आवो हिससा कापी दिल्चस्प है. अबि जिस रूप में से लिखा गया है, वह अन्निता ख्याती का एक बहुत ही शान्दार और अकाद में दाशनिक साराव्च है, लिकिन अगर हम केवल दाशनिक तरक को समजाने तक सीमित न रहें, तो हम पातक को वह आहा मोमन्त दे सकते हैं जो केवल एक सफल अनुवाद ही दे सकता हैं और यही पर गजेंदर ताकृर की आस्ली कला उबरकर सामने आती है जब हम अन्निता ख्याती का कंडन पडते हैं तो समीख्षक को सीदे तोर पर थाकुरजी के उस मैठली वाख्के को सामने लाना जाहीए. जहाँ वो लिकते है आहा बिचारा ग्यानेक इखेहन महान सबहाग अची जे असत्यक तवारा से हो निष्षितता प्राथकर लेत अची. या बात है, बहुत थीखख कटाक्ष है है ना, अब यहां दियान देने बात ये है कि यह एक शब्दे कनुवाद नहीं है यह संसक्रित के एक बोद्धिक प्रहार का एक एक गेरे संसक्रित टिग वियंगे में रुपान्तरन है बिल्कुल ये वास्तमे एक बहुत फीज़ सती कवलोकन है संस्क्रत कमुल कताएक्ष बहुत फीज़क और अकादमिक हो सकता है लेकिन मेठली में आफ़े कहने से इस में एक थेट लोक समवाद का पोता जाता है आआ, एक दम लोकल फलेवर आजाता है आँद बाद को समगरी में सपष्ट रुप से रेख हंकित किया जाना जाएगे. बिल्कुल पाटख को ये बताया जाना जाना जाएगे, कैसे ये आनुवाद उस दरशन को आम आदमी की पहुच में ले आता है. पात्ख को ये बताया जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना जाना भिल्कुल, एक आंदा दुस्रे आंदे का हात पकड़कर हर कदम पर गिर रहा है. हा, ये चित्र इतना सजीव और दिश्टी गोचर है, कि ये तुरन्त आंद परमपरा के पुरे दार्ष्निक कुन्सेप्त को पाटग के दिमाग में उकेर देता है. सही कहा. तो बेसेक्ली इन बाशाई और सान्स्क्रितिक उदारनों को दार्षनेक व्याख्या के बिल्कुल समनान्तर रखना हुगा नाकी कि खिसी अलग द्ध्ध्याय में और इसी से हम अपने दूस्रे फीट्बैक पर आते हैं जो की स्ट्रक्चर के बारे में हैं हैं आ? जी. अनुवाद की देशज मुहावरा और तीन स्टरो वाली बाशाई रननीती का विष्लेशन अथ्यनत उतक्रिष्ट है. लेकिन इसे ग्रन्त के अन्त में इक �alagakhand के रूप में रक्ने से इसका समग्र प्रभाव कमजोर होजाता है अग, मैं इस भाथ से पूरी तरा सैमथ हूँ अगर दर्षन और अनुवाद के उदारन साथ साथ चलेंगे तो इसका सीथा आसर इस बात पर पडेगा की पूरी समिक्षा को कैसे स्ट्रक्षर की आगया है बिलकुल वर्तमान में अनुवाद सिद्धान्त, बाशा रन्निती, अदेशज मुहावरा, नामक एक पूरा का पूरा क्हन्द, समिक्ष्या के बिल्कुल अंतिम हिस्से में एक अपिंटेक्स या परिषिष्ट की तरा रख्खा गया है. अर सच कहुं तो ये पाटकों के अनुबहव के लिए एक बहुत बडी संज्यानात्मक बादा मदला बे कोगनेटिप ब्लोक क्ड़ा कर देता है वो के से? आप खुद कलपना की जिए की एक पाटक लगभक चारसो पन्नो तक अट्तिंत सगन दार्षनिक अद्यायों से गुजरता है, जब विल्कुल अन्त में पूछता है, तब उसे मुसकी, यानी मुसकान, इजोथ, यानी प्रकाश, दूंदल का, या चुट्याला, जैसे तेट और खुबसुरत मैठली शब्डों की रननीती के बारे में बताया जाता है आप, तब तक तो वो सब बूल चुका होगा वही तो, तब तक वो पाथक उन मूल दार्षनिक अद्यायों को बहुत पीछे चोर चुका होता है यह ज़ाह इन शब्डों का वास्तम में उप्योग हूँ आता उसे आब यादी नहीं कि मुस्की शब्द किस विष्च्ट श्लोग या प्रसंग में आया आता तो पाटख को बार बार पीचे मुडकर देखने क्यों बाज्बूर हूँना परता है जो पडने के फ्लो को पुरी तरह तोर देता है एक दम सही तो इसका एक बहतर तरीका यह जो सकता है कि इस भाशाई रनीती को जिस में पारिभाशिक, शुद्द्रता, वाख के संदचना का सर्ली करन और देशज महावरो का प्रुक्षामिल है उसे एक �alag khana mein kayaat karne ke bhajai, पूरे पाथ में कालानुक्रमें गुब से, यहनी क्रनोलोगिकली प्रवाइत क्या जाए. आ, बलकुल. मतलब इन सिद्दान्तो को वही स्पष्ट किया जाना जाए, जहावे किताब में पहली बार प्रकत होते हैं. लिकिन एक मिनेट यहा मेरे मन में एक सवाल उत्रा है आब दाई एक मैं यहा ये सोच रहा हूं की यह यह दी हम भाशाई समिक्षा को दार्षनिक साराज के सात पूरी तरा मिला देंगे तो क्या ये खत्रानी है कि पाथख गजंदर ताकृ की उस व्यापक और सून्योजित कारे प्रनाली को देखने से चूक जाए, जो उनोने अनूवाद किले बनाई है? उंज, ये एक अच्छा point है. मतलब क्या वे तीनोस्तर पारिभाशिक, शुद्द्दथा, वाख के सन्रच्ना और मूहावरे दार्षनिक चर्चा के उसे उस भारी शोर में कही दब नहीं जाएंगे? देखे ये एक बहुत ही वाजब चिनता है. कि सन रच्ना को तोडने से कही मुल दाचा ही न बेखर जाएं. लेके अगर अगर अज़े एक तूल किट की तरा देखें, तो ये समस्याल हो सकती है. मैंगा बाशाई रननीतियो को एक पर शुरूात में संखषेत में बता सकते हैं और फिर उने पूरी समीख्षा में दर्षन के हर एक पडाव पर एक तूल की तराँग काम करते होई प्रदर्षित कर सकते हैं औ, अच्छा? आ, ये तरीका जाडा कारगर होगा इसे अनुवादक की रननीती केवल एक थ्योरी बनकर नहींगाएगी बलकी वो हर पनने पर अपना प्रभाव सावित करेगी. दिलकल उदाहरन के लिए, जब समीखषक दूस्रे मंगलाचरन श्लोक की चर्चा कर रहा हो, तो उसे उसीक शण मुस्की शब्द के प्रयोग का विष्लेशन करना चाहीए. क्योंकी देखे, मंगला चरन में ब्रम्हांड्ये, लीला, महाप्रलै और स्रिष्टी के निर्मान जैसे अथ्यंत गंभीर और भारी विष्षों की बात होती है. आज़े में अनुवादक दवारा मुसकी, यहनी एक हलकी सी मुसकान जैसे एक बेहत गरेलो और आत्मी एश्वद का उप्योक करना एक बहुत बड़ा और सहसिक बाशाई निरने है। बहुत हुब! अद्यादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादिया� अद्यास के उस लिज़े का उदारन लिज़े, जगा मनुश्शे और पशो के विवार में समानता के बात की गगे है. अद्वेत विदान्त में अद्यास एक बहुत ही आमुर्त और जटिल अवदारना है. आप, काफी कोम्पलेक्स है. तो जब समीक्षक उस दाशनिक तरक को समजा रहा हो, उसी पारग्राफ में उसे ये भी सपष्ट करना चाहीए, कि कैसे लाठी उठोने, मनुश्षे देकी भागब़, जैसी टेट ग्राम्यबाशा, उस जटल दरषन को बिल्कुल जमीनी हकीकत से जोडती है. बिल्कुल या स्पष्ट क्या जाना चाहीए कि अनुवादक ने जान बुचकर इन ग्रामीन भिम्बो का उप्योग क्या है ताकि मैत्हली पाटक को ये महसुस हो कि अग्यान या अद्यास कोई अईसी चीज नहीं है, यो केवल संस्क्रित के पुराने गरन्तों में पाईजाती है आप बलकी या हमारी रोस मरा की जिंदिगी का हिस्सा है इस तरा से पूरी समिखष्या की संद्रच्ना स्वाभेक रूप से दार्षनिक प्रगती और भाशाई रन्नीती अगदम सही कहा आपने अब आब हम अपने तीस्रे और अन्तिम फीट्बाक की अर बडटे हैं जो की तोन और अडियंस अलाइन्मेंट से जोडा है आप ये बहुत महत्वपून है बवविश्छे के संसक्रनो के लिए दिये गय संपाद की एं सुजाओ बविश्छे के संट्क्रनों के लिए देए गय संपाद की एशुजाव बहुत पैने और सतीक हैं परवे निशकरष्ष्छ से तीक पहले एक सुची मतलब बूलेट पूएंट्ट्ब्रूप में प्रस्थूत हुने के कारन विमर्ष्छ के प्रवाज और गंभीर्ता को अचानक बादित कर देते हैं आप मतलब जब हम सन्रचना में बडलाव की बात करते हैं तो उसका सीथा असर पाट के तोन यानी उसके लहजे पर पडता है अर ये इस समगरी की एक बड़ी समस्या की योर हमारा दियान कीचता है. बलकल. उंग या पूरी समिक्षा एक बहुत ही उच्छ दाशनिक स्टर पह पहुछती है. जैसे हम जीवन मुक्ती के सिद्दानत, सिद्द वस्तवाख्क्यः अर अदवाइत वेदान्त के अंतिम निषकर्षों पर अत्यंत गंभीर चर्चा कर रहे हूते हैं पाथक एक प्रकार के दाशनिक शिक्र पर बैथा होता है आप और फिर थीक निषकर्स से पहले क्या होता है अचानक एक बूलेटिट सुची आ जाती है वही तो इस सुची में अप्रोती बनाम अपरोक्ष की ताइपिंच्रूती या प्रीकी ताकर की वरतनी जैसी चोटी चोटी गलतीों का जिक्र है. ये वैचारिक ताल मेल को बूरी तरा तोड देता है. बलकुल, ये अचानक से पाटख के अनुववव को एक दार्षनिक शिकर से गिराकर एक सादारन प्रूप रीडिंक के स्थर पर लेयाता है. रहा, एक दम जद के से? मतलब एक शन पहले पाटख ये सुच रहा होता है, की आत्मा और ब्रहम का मिलन कै से होता है. अगले इश्वन उसे बताया जारा है, की पेज नमबर भ्यालीस पर एक मात्रा गलड शपी है. ये सच में बहुती अजी बनुभाव है? है ना, यह पूरी समिक्षा के उस भववे प्रभाव को कमजोर कर दिता है, जो लेकहक ने इतनी महनत से बनाया था. तो मेरी समच कन उसार इन नोट्ट से जो मुख्धगे बाद निकल कर आगी है, वो यह है कि इसे सुदारने के लिए हमें इन बारीक समपाद की तिपपन्यों को, एक सुची कितरा प्रस्टूत करने से बचना चाही है. तो फिर न भी आप या क्या कर सकते है? या कर सकते है? इसके बजाए उने मैठली बाशा के मानकी करन की एक व्यापक अकाद्द्मिक चर्चा के भीटर गूथ देना चाहीए. औ, यह है बहुत ही शान्दार विचार है. इन त्रूटियों को केभल गलतियों की पेष करने के बजाए, अनुवाद की कत्होर अदिट प्रक्रिया की सब्ठलता के प्रमान के रुब प्रस्टूत की आजा सकता है बिल्कुल और यह केवल अशुद्दियो को सुदारने की बात नहीं है बलकी मेठली वांगमाई के एक दार्षनिक भाशा की रूप में परपक्पो होने का जचन है? आँ, इसे एक बहुत शक्तिषाली तर्क में बडला जा सकता है. बलकु! समिक्षक इस बात पर एक पुरा पारग्राफ लिक सकता है. कि कैसे चाल सो एक्यानवे प्रिष्थों के इस विश्षाल और अत्यंत जतिल गरन्त में. त्रूटियों की यह आलपता अपने आप में एक बहुत बडी उपलबदी है. सही बाथ है. उदारन के लिए पूरे गरन्त में केवल साज जग़ अप्रोती चपना कोई कमी नहीं है. बलकी यह उस एक अगरता और भाशाई अनुशासन का प्रमाण है, जिसे अनुवादक ने बनाई रखा है बलकुल इसे एक मानक स्तापित करने वाली उपलप्डी के रूप में फ्रेम किया जाना जाहीए और जब हम लिंग वचन संगती की बात करते है जैसे अची और चती का अनुशासित प्रयोग या नुक्ता के सतिक उप्योग की चर्चा करते हैं, तो इसे इस तरा पेश किया जाना जाहाहीए, कि गजेंदर ठाकूर केवल एक पुस्तक का समपादन नहीं कर रहे हैं. तो वो क्या कर रहे हैं? वे वास्तम में मैठिली को विष्वविद्यालेस तर के दर्षन शास्तर का माद्यम बनाने की दिशा में एक अटिहासे कदम उटार रहे हैं. बिल्कुल. ये बाशा के मानकी करन का एक मोडल है. और जब समिक्षक इस तरा पेश करेगा. तो वे च्टी चोटी समपाद की अटिपन्या भी उस भववे दाशनिक लहजे के साथ पूरी तरहा माच करेंगी जो पूरी समिक्षा में शुर्वाथ से लेकर अंटक बनाई रखा गया है एक दम सही तो चली अब इस पूरी चर्चा को समेट लेते हैं आब यह बलकोल. इस शान्दर समिक्षा को और भी प्रभाव्शाली बनाने के लिए, तीन मुखे कदम उठाये जासकते हैं. पहला, दर्षन शास्टर की गेरी व्याख्यागो, हमेशा अनुवाद की कला, और अनुवादक के निरनेों से जोड कर रखना. ताकी दार्शनिक सिद्धान्त अकेले हवामे नतेरे सही कहा तुस्रा, देशज मुहावरों और भाशाई रननीतियों को अलक खलक एक परशिष्ट में रखने के बजाए मुक्के पाथ में प्रासंगिक स्थानों पर गुदना बलकल ताकी पाटक उसी समय उस भाशाई जादों को महसुश कर सके. और तीस्रा, चोटी समपाद की ये त्रूटीों की सुची को एक प्रूफ रीटर की रिपोट की तरह न नच्छोड कर, उसे मैठली भाशा के व्यापक मानकि करन की अकादमिक चर्चा में बडलना. अग, जो की इस पूरे काम को एक बहुत बड़ा और अटिहासिक परपेखषे देता है. बलकुल, तो हम श्रोता को यन छो सुजावो पर काम करने के प्रुद सहीत करते है, आपके पास यक बहुत फीं मस्बुत नीव है, और इन बदलाओ के साथ आपकी ये समिक्षा आपने आपने एक मानक बन सकती है. बलकोल. और हम चाहेंगे अप अपने सन्शोदिद दस्तवेस को फिरसे चर्चा मच पर भीजे ताकि हम देख सके कि आपने इन सुजावो को कैसे लागू किया है. एक दम. अज के लिए बस इतना ही फिर मिलेंगे

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