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नव्य-न्याय_से_पकड़ें_डिजिटल_झूठ.m4a
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- 0:00–0:10मानलीजे, हम एक आँसा विट्यो दिकतें जिस में कोई बहुत बड़ान नेटा, मतलब किसी दुसरे देश पर सीदे युद्ध की गोशना कर रहा हो.
- 0:10–0:13औरे बाप रे अग़ निन्टिनेट पर तो तहल का ही मज्जगाएगा.
- 0:13–0:16दिलकुल, शेर बाजार द़ाडाम से गिर जाएंगे
- 0:16–0:19और फिर फिर थीक दो मिनेद बाथ पता चलता है
- 0:19–0:22कि वो विडियो पूरी तरह से कमपुटर दूरा बनाया गया
- 0:22–0:24एक एक दीप फेख ता
- 0:24–0:27उस नेता असल मैं से कुछ कहाए नी ता
- 0:27–0:29आज के दिज़र युग में यह भगत आम हो गया है
- 0:30–0:34हमारी आखें और कान मतलब लगातार हम से जुट बोल रहे है
- 0:34–0:34सही बात है
- 0:35–0:37दीप फेख और फेख नुस के ज़ूर में
- 0:38–0:41सच और भरम के भीच की रेखा इतनी धुन्डली हो चुकी है
- 0:41–0:45आप आप नी आप में बहुती क्रामति करी लकता है।
- 0:45–0:48जब हम अपने अपने अपने बहुती क्रामति करी लकता है।
- 0:48–0:51अग, तब आदवी सदी के महान दार्षनिक गंगेश उपादियाई दोरा रचित तत्वब चिन्तामनी नामग गरन्त
- 0:51–0:54अग, ये बहुती अचुक तूल किट प्रदान करता है
- 0:54–0:56तब अग, तब चिन्तामनी
- 0:56–1:00ये बचार अपनी आप में बहुती क्राम्ति करी लकता है.
- 1:00–1:03जब हम मदल अपने अपने अपने अपने अपने बहुती क्राम्ति करी लकता है.
- 1:03–1:05वर लोड और दिजिटल ब्रहम की बात करते है ना?
- 1:05–1:12तो चोदवी सदी के महां दार्षनिक गंगेश उपादियाई दूरा रचित तत्वब चिन्तामनी नामक ग्रन्त
- 1:12–1:15एक बहुती अचुक तूल किट प्रदान करता है.
- 1:15–1:17तत्वब चिन्तामनी.
- 1:17–1:20आप ये गरन्त नव्य नयाय दर्षन का आदार है
- 1:21–1:24और इसका पूरा धान्चा इसी एक सवाल पटिका है
- 1:24–1:27कि प्रमा, यहनी यतारत गयान और अप्रमा,
- 1:27–1:31यहनी ब्रहम इन दोनो के बीच फरक कैसे किया जाए?
- 1:31–1:34तीक है, आप ये ये ये गेराए से समझते हैं.
- 1:34–1:38योंकी ये जानना सच मे बहुत दिल्चास थे कि सद्यो पहले
- 1:38–1:41मड़ब जब कोई इंटनेएट या एए नहीं फाँ
- 1:41–1:45तब ये दाशनिक लोग सच्ट्य की प्रमानिकता को कैसे परकते थे
- 1:45–1:48तो अगर हम ज्यान प्राथ करने की बाद करें
- 1:48–2:18तो शुर्वात तो हमारी इंद्रीों से लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए
- 2:18–2:23विशेश रुब से उनका जो प्रभाखर स्कूल है, वो एक बहुती अनोखा तर्क प्रस्तूत करता है.
- 2:24–2:28उनका मानना ता की ज्यान हमेशा स्वतह प्रमानिक होता है.
- 2:29–2:31रूक, रूक, स्वतह प्रमानिक का यहा मतलव वा?
- 2:31–3:01स्वत्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
- 3:01–3:02अन्तर्नद समच्पाना है
- 3:03–3:05इसे वे अख्याती कहते है
- 3:05–3:06यानी नान आप्रिहेंशन
- 3:08–3:10मुझे लगता एसे तोडा और सपष्ट करने की जाडूरत है
- 3:10–3:11आज, जरूर
- 3:12–3:14मान लीजे कोई समुद्र किनारे तेहल रहा है
- 3:15–3:17और उसे जमीन पर एक चमकती हुई सीपी दिकती है
- 3:17–3:21और उसे देखकर मन में चान्दी की यादा जाती है
- 3:21–3:51वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 3:51–4:21ये तो बलकल किसी वाट्सेप प्ववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववव�
- 4:21–4:51अदर बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँ�
- 4:51–4:54वहाई एक वस्तूके गूनों को दूसरी वस्तूके खोप्र थोप्राहा है
- 4:55–4:58वह सीपी के उपर चांदी के गूनों का प्रक्षेपन कर रहा है
- 4:59–5:04नयाय एसे अन्निधा ख्याती यानी मिस अप्रिहेंचन कहता है
- 5:04–5:08रुके तो नयाय ये कह रहा है
- 5:08–5:13कि रस्सी को साब समजना केवल यादो का गाल मिल नहीं बलकी हमारा दिमाग
- 5:13–5:16उस अंदेरे में सच्मुच उस रस्सी पर साब की चवी को ठोप रहा है
- 5:16–5:22ये एक अक्तिव अरर है एक्डम सही तो फिर नववें नयाय के पास इसका समवावान क्या है
- 5:22–5:28अगर ख्यान को बहार से जानचना है, तो ये कैसे ताए होगा कि वो सामने पडी चीज रस्सी है आसाम?
- 5:28–5:35न्याए दर्षन इसका बहुती व्यवारेक समथान देता है, और वो है सफल व्यवावाहारेक गती विदी
- 5:35–5:37सफल व्यवाहारेक गती विदी?
- 5:37–6:07अगर पानी पीकर प्यास बूजग़े तो वो प्रत्यक्ष यान सत्यता लेकिना अगर प्रद्यक्ष गयान सत्यता लेकिना वागाँ तो वो बगाँ तो वो बगाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ
- 6:07–6:09अगर वहां पहुचकर सर्फ सुखी रेथ मिली
- 6:09–6:12तो वो ग्यान भ्रहम साभिट होगा. बिलकोल.
- 6:12–6:14यानी बिना किसी व्यावारेक पुष्टी के
- 6:14–6:17किसी फेक नुज या दीप फेक पर विष्वास कर लेना.
- 6:18–6:19अंदेरे में बिना तोर जलाए
- 6:19–6:22रसी को साप आमानकर बाग ख़े होने के समान है
- 6:22–6:24बहुत बड़या उदारन दी आपने
- 6:24–6:28ये सत्ट्य को परगने की सबसे मजबुत का सोट्टी है
- 6:28–6:34लेकिन समस्या ये है कि हम दुन्या की हर चीस को खुद अपनी आखो से नहीं देक सकते
- 6:34–6:37अग, उगर थीस का व्यावारेक परिक्षन करना तो मुमकिनी नहीं?
- 6:37–6:41यही बात है, और यही से गयान का दुस्रा सादन सामने आता है.
- 6:41–6:43अनुमान, यानी इन्फरेंस.
- 6:43–6:46मुझे लखता है के अनुमान के बिना तो अन्सान का काम चली नहीं सकता.
- 6:46–6:50मान लीजी आगर मुझे दूर पहाड़ पर दूमा दिख रहा है
- 6:50–6:54और मैं वहां जाग कर आग को व्यावारे क्रुब से चैक नहीं कर सकता
- 6:54–6:57तो मुझे दूए को देक्कर याग का अनुमान लगाना होगाना
- 6:57–7:00आप और ये अनुमान आईसे हवावा में नहीं लगाया जाता
- 7:00–7:05इसके ले नव्यन्याय में व्याप्ती का होना बहुत ज़ोरी माना गय है
- 7:05–7:07व्याप्ती? इसका क्या मतलब है?
- 7:07–7:11व्याप्ती वो अटूट और और सार्व भ्हूमिक नियम है
- 7:11–7:14जो दो चीसो को एक साथ जोडता है
- 7:14–7:19जेसे की ज़हां जहां दूवा है, वहां वहां आग है
- 7:19–7:21अच्छा कोज अई अप्ट की तरा
- 7:21–7:24रसोई गर इसका एक बहुती सकरात्मक उदारने
- 7:24–7:29जगां सद्यों से अजां आग और दूए को एक साथ देकता आगा है
- 7:29–7:35उसी व्याप्ति के आदार पर, हम पहाड के दूए को दिखकर आग का सतीक अनुमान लगाते हैं.
- 7:35–7:42लेके नगर हम चारवक दर्षन की बात करें, तो वे वेस पुरी प्रक्रिया को सिरे से खारिज कर देते हैं.
- 7:42–7:45रह, चारवक तो गोर बहुत इखादी थे.
- 7:45–7:47बिलकुल, उनका मानना दा की केवल प्रत्यक्ष,
- 7:47–7:51यहनी जो आखो से सीदा दिखे, वही एक मात्रसत्ते है.
- 7:51–7:56वे अनुमान को एक दोखा मानते दे, किकि विए दूर पहाड पर दिखने वाला दूवा,
- 7:56–7:59दरसल किसी दूल का उड़तावा गुबार भी तो हुसकता है.
- 7:59–8:02अदर हम इसे व्यापक संदर्ब में देखें,
- 8:02–8:05तो चार्वाक दरसल प्रब्लम अप प्ट्ट्चन की बाट कर रहे थे,
- 8:05–8:09जिसे बहुत बाद में पस्च्च्मी दाशनिक देविड विएम ने उठाया था.
- 8:09–8:10दिल्चासप है.
- 8:10–8:17चार्वाग का तरक ता कि भले ही हमने रसोई गर में सो बार आग और दूए को एक सा देखा हो,
- 8:17–8:21लेकिन ये कैसे साभित होता है कि 101 बार भी एस़ा होगा?
- 8:21–8:25इसलिए उनके हिसाब से अनुमान पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
- 8:25–8:55इमान्डारी से कहुँ तो मैं चार्वाग दर्षन का यहां कडा विरोथ करूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 8:55–8:57तो उसके प्रोसेसर और बेट्री के देटा को देखकर,
- 8:57–9:00ये अनुमान ही तो लगाते हैं कि फों बिना द्खे चलेगा.
- 9:00–9:04हर निरनें, जीवन का हर फैसला, अनुमान पर ही तो तिका है.
- 9:04–9:06अगर अँमान पुरी तरा गलत है
- 9:06–9:08तो आप आप अपनी ये बाट साभित कैसे कर रहे हैं
- 9:08–9:12चारवाख का ये सुचना कि उनका तर्ग दूस्रो को समझ आजाएगा
- 9:12–9:15ये खुद उनके दिमाख का एक अँमान ही तो है
- 9:15–9:17और वाए ये तो बहुती शांदार पलटवार है
- 9:17–9:19ये बाट साभित कैसे कर रहे हैं?
- 9:19–9:23चार्वाख का ये सुचना कि उनका तर्ग दूस्रों को समच आजाएगा
- 9:23–9:26ये खुड उनके दिमाख का एक अनुमान ही तो है
- 9:26–9:28औरे वाग ये तो बहुती शांदार पलटवार है
- 9:28–9:31है ना? इसली अनुमान को नकारा नहीं जासकता
- 9:31–9:36लेकिन लेकिन गंगेश ये बि मानतें कि अनुमान में गलतिया होती हैं
- 9:36–9:39पर वो खेतें कि गलतिया अनुमान की प्रक्रिया में नहीं
- 9:39–9:42बलकि हमारी समच की कमी के कारन होती हैं
- 9:42–9:44समच की कमी
- 9:44–9:46जिसे वे उपादी कहते हैं
- 9:46–9:48अख्ट्रेनिस कंडिशन
- 9:48–9:51ये उपादिवाला कुन्सेप थुड़ा जटिल लकता है
- 9:51–9:53क्या हम इसे तुड़ा और सरल कर सकते हैं
- 9:53–9:55ये उपादि आखिर है क्या
- 9:55–9:57जो हमारे अनुमान को गलत सावित कर देती है
- 9:57–9:59इसे ऐसे समचते हैं
- 9:59–10:01एक समान नियम है
- 10:01–10:03कि जहां आग है वहां दूवा ओगा
- 10:03–10:04है ना
- 10:04–10:05अब भी हम ने यही बात की
- 10:05–10:08लेकिन जरा एक लोहार की बद्टी के बारे में सोचीए
- 10:08–10:12वहां लाल रंका देखता हुआ लोहे का गोला रख है
- 10:12–10:14आग तो वहां बी पुरी तरा मोजुद है
- 10:14–10:17लेकिन, लेकिन क्या वाग दूवा है?
- 10:17–10:19आप बिलकुल नहीं
- 10:19–10:22देखते में लोई के गोले से दूँा नहीं प्रटा
- 10:22–10:25इसका मतलब है कि सर्फ आग का हूना
- 10:25–10:27दूई को पैडा करने के लें काफी नहीं है
- 10:27–10:30इसके पीचे ख्षुपीवी श्वर्थ है
- 10:30–10:31और वो श्वर्थ है
- 10:31–10:33लक्डी का गीला हूना
- 10:33–10:35जब आग का संपर्क
- 10:35–10:38तब भी दूवा निक गीली लक्डी से हुता है, तब भी दूवा निकलता है.
- 10:38–10:40ये गीली लक्डी ही उपादी है.
- 10:40–10:43जो व्यकती इस उपादी को पहचान लेता है,
- 10:43–10:45उसका अनुमान कभी गलत नी होता.
- 10:45–10:50तो बगर बवाग बाहरी गलतीगो को देखकर पूरे विग्यान कोई जूटा कैरे ते
- 10:50–10:54जबकी नव्यन नयाय कहता है की नियम सही है
- 10:54–10:59बस हमें उन छुपी हुई शर्थो यानी उपादि को पहचानने की द्रिष्टी रखनी चाही है
- 10:59–11:11ये बज़़ी शान्दार्स पष्टिकान है, मतलब अगर हमारा अनुमान फेल हो रा है, तो पूरे सिस्टम को दोज देने के बजाए, हमें एक होज ना चीए की, कि हम कुन सा महत्पोपून देटा या उपादी मिस कर रहे हैं.
- 11:11–11:12बिल्कुल.
- 11:12–11:14अब एक तीस्री स्तिती पर आते हैं
- 11:14–11:16मान लिजे आखो से कुछ नहीं दिक्रहा
- 11:16–11:18यानी प्रत्ट्उच नहीं है
- 11:18–11:21और और दूवा भी नहीं है जेसे आग का पता चले
- 11:21–11:23यानी अनुमान भी नहीं हैं
- 11:23–11:53अपने बज़ान बाद पर बज़ान बाद पर बज़ान बाद पर बज़ान बाद पर बज़ान बाद बाद पर बज़ान बाद बाद बज़ान बाद बाद बज़ान बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा
- 11:53–11:55आप्त, इसका क्या मतलब होता है?
- 11:55–11:56त्रुस्टवर्दी
- 11:56–11:57रहा बभरोसे मन्द
- 11:57–12:00और इक आप्त व्यक्ती होने के लिए तीन गुन आवश्षक है
- 12:00–12:03पहला, उसके पास विषय की विषे शक्गिता हो
- 12:03–12:05तुस्रा, वो सच्चा हो
- 12:05–12:12तु यह विशेशवगटा तो है, लेकिन लेकिन वो दोक्तर किसी क्यास फामा कमपनी से कमिशन लेकर सर्फ उसी कमपनी की महंगी दवायी लिकता है.
- 12:12–12:14रहु ये बहुत आम है.
- 12:14–12:18तु यह विशेशवगटा तो है, लेकिन निष्पकष्ता गायब होगी.
- 12:18–12:20जिसे मेटिकल सायंस की गेरी विषेशगगटा है
- 12:21–12:25लेकिन लेकिन वो दोक्तर किसी खास फामा कमपनी से कमिशन लेकर
- 12:25–12:27सर्फ उसी कमपनी की महंगी दवाया लिकता है
- 12:27–12:29वह ये बहुत आम है
- 12:29–12:31तो यहां विशेशग्यटा तो है
- 12:31–12:33लेकि निश्पक्ष्ता गायब हो गी
- 12:33–12:35निव बिने आये के मानकों के अनुसार
- 12:35–12:38उस दोक्तर का परचा शब्द प्रमाड नहीं माना जाएगा
- 12:38–12:41किंकि वो आप्ट की स्रेने से बहार हो गया
- 12:41–12:43इक्दम सही पक्रा आपने
- 12:43–12:46और बाद सर्फ वक्ता के आप्त होने पर खत्म नहीं होती
- 12:47–12:49जो वाग्य बुला जारा है
- 12:49–12:51उसका अर्ट समजने किलिए नवे नयाए
- 12:51–12:54चार्स्टंबों को अनिवारे मानता है
- 12:54–12:55चार्स्टंब? कों कों से?
- 12:56–12:56वे है
- 12:57–12:58आकांख्षा
- 12:58–12:59युगिता
- 13:11–13:13उसके बाद इगदं चुप होँजाए.
- 13:13–13:16तो मेरा दमाक तुरन पूषते है कि भाई क्या लाओ?
- 13:16–13:17यही अकांचा है.
- 13:17–13:18अख्ट्टन्सी.
- 13:18–13:20वाख्के के शब्डो में
- 13:20–13:23एक तुस्रे की अपेख्षा होनी चाए.
- 13:23–13:25मतलब एक शब सुनकर
- 13:25–13:29तुस्रे शब्त की मांग पेदा हूना ही व्याक्रन्का मुलनीम है
- 13:29–13:30तुछ आप तुस्रा?
- 13:30–13:32तुस्रा स्तम् है योग्गिता
- 13:32–13:34समान्तिक पिटनेस
- 13:34–13:37यानी बात में तारकिक संगती होनी चहीए
- 13:37–13:39ज़से अगर कोई कहे की
- 13:39–13:41वह आग से पवधुं को सीच रहा है
- 13:41–13:44अब व्याक्रन के हिसाब से तो वाके सही हैं,
- 13:44–13:48लेकिन लेकिन आग में सीचने की योग्यता ही नहीं है,
- 13:48–13:50इसले वाके का अर्थ ही नश्थ हो जाता है.
- 13:50–13:51बलकुल सही.
- 13:51–13:54तीस रहे आसथी, यानी प्रोक्समिती.
- 13:54–13:56अगर कोई व्यक्ती कहता है, गाए.
- 13:56–14:03अर फिर एक गड़़ बाद कहता है, गास अर फिर दो गड़़ बाद कहता है, खाती है.
- 14:03–14:05अह, तो सब बहुल जाएंगे कि बाद क्या होरी ती.
- 14:05–14:08अह, शब्द भी सही हैं और योगिता भी है,
- 14:08–14:13लेकिन समय का अंतराल इतना देक है कि वाके का अर्थी कष्ट मोचात है
- 14:13–14:16शब्दों को एक निरंतर प्रभामे हूना चाहीए
- 14:16–14:19और चोथास्तम्ब जो मुझे लकता है बहाशा के लिए सब से जादा जोरी है
- 14:19–14:21वहे तात्पर रे है
- 14:21–14:22यानी स्पीकर का अंटेंचन
- 14:22–14:28नव्या न्याय में इसके लिए संदव का एक बहुत लास्सिक उदारन दिया जाता है.
- 14:28–14:32आपको पता है संस्क्रित में संदव शब्द के दो अर्थ होते है.
- 14:32–14:33नमक और गोडा.
- 14:33–14:35नमक और गोडा.
- 14:35–14:37आब मान लिजे कोई वेक्ती भूजन कर रा है.
- 14:37–14:40और वो कैता है, सेंदवलाओ.
- 14:40–14:44तो यहां सुन्ने वाले को वक्ता का तात पर यह समजना होगा,
- 14:44–14:47की भोजन की समए नमक की माग हो रही है.
- 14:47–14:48गोडे की नहीं?
- 14:48–14:50भिलकुल. गोडा थाली में छोडी का एगा कोई.
- 14:50–14:52संदरप के बिना शबडो का कोई मोल नहीं है.
- 14:52–14:54यहां मुझे एक और मजदार बहेस यादारी है.
- 14:54–14:57वैशिषिक दरशन का मानना था,
- 14:57–15:00के शब्द अपने आपने कोई अलग प्रमान नहीं है.
- 15:00–15:02वे केते दे के जब हम किसी की बाथ सुनते है,
- 15:02–15:05तो हम भस ये अनुमान लगारे हुते हैं,
- 15:05–15:07कि उस व्यक्ती के दिमाग में क्या चल रहा है?
- 15:07–15:10आप, लिकि नववे न्याय ने यह तोगी खारइज कर दिया था.
- 15:10–15:12आप, अप उब ही एक तोटे के उदारन से,
- 15:12–15:15मडल वगर एक तोटा बिलकोल सब च्छारन के था है,
- 15:15–15:17दरवाजा बंद कर दो,
- 15:17–15:19तो भले ही तोते के अंदर कोई अरादा या चेतना नहो,
- 15:20–15:22फिर भी सुनने वला वकती उटकर दर्वाजा बन्द करी देता है.
- 15:23–15:23बिलकुल
- 15:23–15:26इस का मतलव है की शब्दों के अंदर
- 15:26–15:28अपना एक स्वतन्तर सामर्ठे होता है.
- 15:28–15:30जो जो अर्थ पैडा करता है.
- 15:30–15:37अगर अँ नहीं से आज की तकनीक से जोड़ें, तो आज के जेनरेटेव आए आए और चाटबोट से वे बलको लुँ स्थोटे की तरही हैं.
- 15:37–15:39आए ये बआत अच्चा पहण्ट है.
- 15:39–15:42सिलकर चिपस के अंदर कोई चेतना या अईन्सान जैसी समझ नहीं है,
- 15:42–15:48लेकिन वेजो वाग के गड़ते हैं उन्ने अकांचा, योग्यता और आसत्ती पुरी तर हमोजुद होती हैं.
- 15:48–15:53इसलि एए एक शब्द हमारे लिए एक स्वतन्त्र शब्द प्रमान बन जाते हैं.
- 15:53–15:55बले ही उनके पीछे कोई सुच्त्तावा अईन्सानी दमागना हूँ.
- 15:55–16:01निवव्य नियाय का ये विष्लेशन, मतलब भाशा विग्यान के स्थर्पे बहुत यी गहरा है,
- 16:01–16:05और शब्दो के साथ ही वो एक चोथे प्रमाण की बी बात करते हैं,
- 16:05–16:07जिसे उप्मान कहा जाताता.
- 16:07–16:12उप्मान, इसका मतलवे के अगर कोई किसी आजी चीस के बारे में बतारा है,
- 16:12–16:16जिसे हमने कभी देखा नहीं, तो वो एक उदारन या तुलना का इस्तमाल करता.
- 16:16–16:21आजेसे किसी ने बताया की गव्याय नाम का एक जंगली जानवर हुता है,
- 16:21–16:24जो बिल्ल्कुल गाए जासा दिकता है
- 16:24–16:25अप कोई व्यक्ती जंगल जाता है
- 16:25–16:27गाए जासा जान्वर दिकता है
- 16:27–16:29और समच जाता है कि यही गव्या है
- 16:29–16:31तो यह उप्मान्त से प्राथ ग्यानूवा
- 16:31–16:32बिल्कुल
- 16:32–16:35मिमान्त सा किसे एक रहे स्विमाई श्टेनी मानते थे
- 16:35–16:39लिकिन गंगेश उपाद्ध्याय इसे बहुत तारकिक रूप से समजाते है.
- 16:39–16:41वे कहते है कि समान्ता कोई जादूई चीस नहीं है.
- 16:41–16:45वल कि ये बस दो चीजों के बीच साजा गुनो,
- 16:45–16:47यानी शेड़ प्रोपतीज की प्यचान करना है.
- 16:47–16:49तो इस सब का असल मतलप क्या है.
- 16:49–16:53प्रत्यक्ष अनुमान, शब्द और उप्मान
- 16:54–16:56हमने ज्यान प्राप्त करने के सारे तरीके समज लिए
- 16:57–16:59सच्छ और ब्रहम को �alak karna bhi seek liya
- 16:59–17:02लेकिन चोदवी सदी के ये विद्वान
- 17:02–17:05इतनी जटल मान से कसरत आखर कर क्यो रहे थे
- 17:05–17:09या उनका उदेशे सर्फ शास्टरारत या या वादविवाज जीतना था?
- 17:09–17:12ये एक बहुती महत्वोपों सवाल कहडा करता है,
- 17:12–17:17कुकि बार्तिय दर्षन में ज्यान कभी भी सर्फ बोद्धिक मनुरंजन के लिए नहीं होता.
- 17:17–17:18तो फिर अंतिम लक्षे क्या था?
- 17:18–17:23नव्विन्याय की इस तूरी ग्यान मीमान्सा का अन्तिम लक्षे है अप्वर्ग
- 17:23–17:25यानी दुखों के चक्र से मुक्ती
- 17:25–17:28गंगेश्ये स्तापित करते है
- 17:28–17:31की हमारे जीवन की सभी दुखों की ज़ड में
- 17:31–17:35कोई ना कोई ब्रहम या आए यथारत ग्यान जरूर होता है
- 17:35–17:41लेगिन दूक्की जड क्या है, इस पर तो बवधधधशन का भी अपना एक बहुत मजब। नजरीय है ना?
- 17:41–17:45बवधधधशन क्या ता है कि अपना इनसान के हर दुक्का कारन त्रिष्ना है,
- 17:45–17:49अगर इच्छाँ को खतम कर दिया जाए तो दुख अपने आप समापत हो जाएगा.
- 17:50–17:52तो क्या न्याए दर्षन भी एसा ही मानता है?
- 17:53–17:55न्याए दर्षन इसे एक कडम और अगे लेजाता है.
- 17:56–17:59न्याय कहता है कि त्रिषना तो महेज एक लक्षर द है,
- 18:00–18:01एक सिम्टम है.
- 18:01–18:31अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्या
- 18:31–18:35तो उसे कुछ समे के लिए रहत ज़रूर मिल सकती है.
- 18:36–18:38लेकिन जब तक उस इच्छा की ज़ड,
- 18:38–18:42यानी अग्ज्यान को सथ यान की तल्वार से नहीं काटा जाएगा,
- 18:43–18:47तब तक पुरानी आदितें और दूक बार-बार लोटकर आते रहेंगे.
- 18:47–18:52ये मनो विग्यान की द्रिष्टी से बहुती सतीक विष्लेशन है
- 18:52–18:55इसे हम आजके जीवन से जोडग के देख सकते हैं
- 18:55–18:57मान लिजे किसी विक्ती को समाथवोन की बुरी लध है
- 18:57–19:01वो इस लट्से चुटकारा पाने किलिए अपने फोन में कोई आब बलोकर लगा देता है
- 19:01–19:04या या फोंको आलमारी में बंद कर दिता है?
- 19:04–19:05आा बवत लोग एसा करते है?
- 19:05–19:08ये बवडद दरशन के त्रिष्ना निंट्रन जैसा है.
- 19:08–19:11ये एक एमरजन्ची ब्रेख की तरे काम जरूर करता है.
- 19:11–19:15लेकिन लेकिन जब दक वो वेक्ती ये नहीं समदेगा कि वो बरबर फोंग प्यूं था है
- 19:15–19:20किया वो अंदर के किसी खाली पन, काम के तनाव, या गेरी बूरियत से बागनी की कोशिच कर रहा है?
- 19:20–19:21बिलकुल!
- 19:21–19:26उखाली पन ही अग्यान है, जब तक उस अग्यान को ग्यान से नहीं भ़ाजाएगा,
- 19:26–19:29तब तक आप ब्लोकर रड थे ही लद वापस लोट आएगी.
- 19:29–19:32नव्व्या न्याय हमें समस्स्या की सतथआए पर लडने के बजाए,
- 19:32–19:35सीथे उसकी जर तक पहुचना सिकھाता है.
- 19:35–19:41बहुत खुब कहा आपने. अनुशासन हमें तातकालिक सुरक्षा कवच देता है.
- 19:41–19:47लेकिन यतारत ज्यान, यानी अवेरनिस, हमें हमेशा के लिए आजाद कर देता है.
- 19:47–19:52तत्व चिंता मनी में ज्यान को परखने के जो भी तरीके बताए गये है,
- 19:52–19:58वे अन्तता मनुश्छ को अग्यान से निकाल कर मुक्ती की ओर लेजाने का ही एक तारकिक रोड मैप है.
- 19:58–20:07तो इस पूरे दीब डाईव में, हमने ये देखा की चोदवी सदी का नव्वे न्याएदर्षन रव्वे नाज के जीवन में भी कितनी गेराईई से लागो होता है.
- 20:22–20:25उसी भी जानकारी पर भरोसा करने से बहुटा का आप्त होना
- 20:25–20:29मतलब निशपक्ष और विषिषक्ग यह होना कितना ज़ूरी है
- 20:29–20:30बलकुल सही
- 20:30–20:35और सबसे बढ़ी बाध जीवन के दुखों और बूरी आदतों को सर्व दबाने के बजाए
- 20:35–20:38गयान के स्टर पर जाकर उने ज़र से खटम करने का महत्व समजा
- 20:39–20:41ये दरशन सपच्ट्रुब से सिकहाता है
- 20:41–20:43कि सुचनाँ के इस योग में
- 20:43–20:46हमें केवल एक निष्करिय उपभोगता बनकर नहीं रहना है
- 20:46–20:49बलकी हर जानकारी को तर्ख की कसोटी पर परचने वाला
- 20:49–20:51इक सक्रिया विष्लेशक बनना है
- 20:51–20:52इक दम सही निष्कर्शे
- 20:52–20:55लेकिन इस चर्चा को समाप करने से पहले
- 20:55–20:58नव्वे नियाये के व्यावहारिक सफलता वाले सिद्धान्त ने
- 20:58–21:01मिरे दिमाग में बहुती अजीब अद
- 21:01–21:03परिशान करने वाला विचार पैदा कर दिया है
- 21:03–21:04अच्या वो क्या?
- 21:04–21:09दिके, नवविन याय ख़ता है के दूर दिखने वाला पानी सच है यब रहम
- 21:09–21:13ये इस बाथ से तैहोगा के पानी पीने के बाथ प्यास भुजती है यह नहीं
- 21:13–21:16व्यावहारिक सबलता ही सद्टिका एक मात्र प्रमान है
- 21:16–21:18हा, हमने यही चर्चा की
- 21:18–21:22लेकिन आज हम जिस वर्च्ट्ट्र्यालिति और मेटवर्स की दुन्या कि और बड़रे हैं
- 21:22–21:24जर अज उसके बारे में विचार करें
- 21:24–21:25ये एक आजी दुन्या है
- 21:26–21:30जगा सब कुछ केवल पिक्सल, कोड और और कमपुटर सक्ट्रीन तक्सीमित है
- 21:30–22:00वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 22:00–22:03तब वड़िक रूब से जाचना पुरी तर ना मुमकिन होजाएगा
- 22:03–22:05ये सुचने वाली बात है
- 22:05–22:08क्या दिजितल दुन्या मानोजाती को हमेशा के लिएक
- 22:08–22:10आफ़े ब्रम की स्तिती में कैद कर सकती है
- 22:10–22:12जहां हमारी तोर्च की रोषनी भी
- 22:12–22:33उपने बज़नी भी सुब लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ ल�
Plain text
मानलीजे, हम एक आँसा विट्यो दिकतें जिस में कोई बहुत बड़ान नेटा, मतलब किसी दुसरे देश पर सीदे युद्ध की गोशना कर रहा हो. औरे बाप रे अग़ निन्टिनेट पर तो तहल का ही मज्जगाएगा. दिलकुल, शेर बाजार द़ाडाम से गिर जाएंगे और फिर फिर थीक दो मिनेद बाथ पता चलता है कि वो विडियो पूरी तरह से कमपुटर दूरा बनाया गया एक एक दीप फेख ता उस नेता असल मैं से कुछ कहाए नी ता आज के दिज़र युग में यह भगत आम हो गया है हमारी आखें और कान मतलब लगातार हम से जुट बोल रहे है सही बात है दीप फेख और फेख नुस के ज़ूर में सच और भरम के भीच की रेखा इतनी धुन्डली हो चुकी है आप आप नी आप में बहुती क्रामति करी लकता है। जब हम अपने अपने अपने बहुती क्रामति करी लकता है। अग, तब आदवी सदी के महान दार्षनिक गंगेश उपादियाई दोरा रचित तत्वब चिन्तामनी नामग गरन्त अग, ये बहुती अचुक तूल किट प्रदान करता है तब अग, तब चिन्तामनी ये बचार अपनी आप में बहुती क्राम्ति करी लकता है. जब हम मदल अपने अपने अपने अपने अपने बहुती क्राम्ति करी लकता है. वर लोड और दिजिटल ब्रहम की बात करते है ना? तो चोदवी सदी के महां दार्षनिक गंगेश उपादियाई दूरा रचित तत्वब चिन्तामनी नामक ग्रन्त एक बहुती अचुक तूल किट प्रदान करता है. तत्वब चिन्तामनी. आप ये गरन्त नव्य नयाय दर्षन का आदार है और इसका पूरा धान्चा इसी एक सवाल पटिका है कि प्रमा, यहनी यतारत गयान और अप्रमा, यहनी ब्रहम इन दोनो के बीच फरक कैसे किया जाए? तीक है, आप ये ये ये गेराए से समझते हैं. योंकी ये जानना सच मे बहुत दिल्चास थे कि सद्यो पहले मड़ब जब कोई इंटनेएट या एए नहीं फाँ तब ये दाशनिक लोग सच्ट्य की प्रमानिकता को कैसे परकते थे तो अगर हम ज्यान प्राथ करने की बाद करें तो शुर्वात तो हमारी इंद्रीों से लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए लिए विशेश रुब से उनका जो प्रभाखर स्कूल है, वो एक बहुती अनोखा तर्क प्रस्तूत करता है. उनका मानना ता की ज्यान हमेशा स्वतह प्रमानिक होता है. रूक, रूक, स्वतह प्रमानिक का यहा मतलव वा? स्वत्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� अन्तर्नद समच्पाना है इसे वे अख्याती कहते है यानी नान आप्रिहेंशन मुझे लगता एसे तोडा और सपष्ट करने की जाडूरत है आज, जरूर मान लीजे कोई समुद्र किनारे तेहल रहा है और उसे जमीन पर एक चमकती हुई सीपी दिकती है और उसे देखकर मन में चान्दी की यादा जाती है वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� ये तो बलकल किसी वाट्सेप प्ववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववववव� अदर बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँदा बवाँ� वहाई एक वस्तूके गूनों को दूसरी वस्तूके खोप्र थोप्राहा है वह सीपी के उपर चांदी के गूनों का प्रक्षेपन कर रहा है नयाय एसे अन्निधा ख्याती यानी मिस अप्रिहेंचन कहता है रुके तो नयाय ये कह रहा है कि रस्सी को साब समजना केवल यादो का गाल मिल नहीं बलकी हमारा दिमाग उस अंदेरे में सच्मुच उस रस्सी पर साब की चवी को ठोप रहा है ये एक अक्तिव अरर है एक्डम सही तो फिर नववें नयाय के पास इसका समवावान क्या है अगर ख्यान को बहार से जानचना है, तो ये कैसे ताए होगा कि वो सामने पडी चीज रस्सी है आसाम? न्याए दर्षन इसका बहुती व्यवारेक समथान देता है, और वो है सफल व्यवावाहारेक गती विदी सफल व्यवाहारेक गती विदी? अगर पानी पीकर प्यास बूजग़े तो वो प्रत्यक्ष यान सत्यता लेकिना अगर प्रद्यक्ष गयान सत्यता लेकिना वागाँ तो वो बगाँ तो वो बगाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ वागाँ अगर वहां पहुचकर सर्फ सुखी रेथ मिली तो वो ग्यान भ्रहम साभिट होगा. बिलकोल. यानी बिना किसी व्यावारेक पुष्टी के किसी फेक नुज या दीप फेक पर विष्वास कर लेना. अंदेरे में बिना तोर जलाए रसी को साप आमानकर बाग ख़े होने के समान है बहुत बड़या उदारन दी आपने ये सत्ट्य को परगने की सबसे मजबुत का सोट्टी है लेकिन समस्या ये है कि हम दुन्या की हर चीस को खुद अपनी आखो से नहीं देक सकते अग, उगर थीस का व्यावारेक परिक्षन करना तो मुमकिनी नहीं? यही बात है, और यही से गयान का दुस्रा सादन सामने आता है. अनुमान, यानी इन्फरेंस. मुझे लखता है के अनुमान के बिना तो अन्सान का काम चली नहीं सकता. मान लीजी आगर मुझे दूर पहाड़ पर दूमा दिख रहा है और मैं वहां जाग कर आग को व्यावारे क्रुब से चैक नहीं कर सकता तो मुझे दूए को देक्कर याग का अनुमान लगाना होगाना आप और ये अनुमान आईसे हवावा में नहीं लगाया जाता इसके ले नव्यन्याय में व्याप्ती का होना बहुत ज़ोरी माना गय है व्याप्ती? इसका क्या मतलब है? व्याप्ती वो अटूट और और सार्व भ्हूमिक नियम है जो दो चीसो को एक साथ जोडता है जेसे की ज़हां जहां दूवा है, वहां वहां आग है अच्छा कोज अई अप्ट की तरा रसोई गर इसका एक बहुती सकरात्मक उदारने जगां सद्यों से अजां आग और दूए को एक साथ देकता आगा है उसी व्याप्ति के आदार पर, हम पहाड के दूए को दिखकर आग का सतीक अनुमान लगाते हैं. लेके नगर हम चारवक दर्षन की बात करें, तो वे वेस पुरी प्रक्रिया को सिरे से खारिज कर देते हैं. रह, चारवक तो गोर बहुत इखादी थे. बिलकुल, उनका मानना दा की केवल प्रत्यक्ष, यहनी जो आखो से सीदा दिखे, वही एक मात्रसत्ते है. वे अनुमान को एक दोखा मानते दे, किकि विए दूर पहाड पर दिखने वाला दूवा, दरसल किसी दूल का उड़तावा गुबार भी तो हुसकता है. अदर हम इसे व्यापक संदर्ब में देखें, तो चार्वाक दरसल प्रब्लम अप प्ट्ट्चन की बाट कर रहे थे, जिसे बहुत बाद में पस्च्च्मी दाशनिक देविड विएम ने उठाया था. दिल्चासप है. चार्वाग का तरक ता कि भले ही हमने रसोई गर में सो बार आग और दूए को एक सा देखा हो, लेकिन ये कैसे साभित होता है कि 101 बार भी एस़ा होगा? इसलिए उनके हिसाब से अनुमान पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इमान्डारी से कहुँ तो मैं चार्वाग दर्षन का यहां कडा विरोथ करूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� तो उसके प्रोसेसर और बेट्री के देटा को देखकर, ये अनुमान ही तो लगाते हैं कि फों बिना द्खे चलेगा. हर निरनें, जीवन का हर फैसला, अनुमान पर ही तो तिका है. अगर अँमान पुरी तरा गलत है तो आप आप अपनी ये बाट साभित कैसे कर रहे हैं चारवाख का ये सुचना कि उनका तर्ग दूस्रो को समझ आजाएगा ये खुद उनके दिमाख का एक अँमान ही तो है और वाए ये तो बहुती शांदार पलटवार है ये बाट साभित कैसे कर रहे हैं? चार्वाख का ये सुचना कि उनका तर्ग दूस्रों को समच आजाएगा ये खुड उनके दिमाख का एक अनुमान ही तो है औरे वाग ये तो बहुती शांदार पलटवार है है ना? इसली अनुमान को नकारा नहीं जासकता लेकिन लेकिन गंगेश ये बि मानतें कि अनुमान में गलतिया होती हैं पर वो खेतें कि गलतिया अनुमान की प्रक्रिया में नहीं बलकि हमारी समच की कमी के कारन होती हैं समच की कमी जिसे वे उपादी कहते हैं अख्ट्रेनिस कंडिशन ये उपादिवाला कुन्सेप थुड़ा जटिल लकता है क्या हम इसे तुड़ा और सरल कर सकते हैं ये उपादि आखिर है क्या जो हमारे अनुमान को गलत सावित कर देती है इसे ऐसे समचते हैं एक समान नियम है कि जहां आग है वहां दूवा ओगा है ना अब भी हम ने यही बात की लेकिन जरा एक लोहार की बद्टी के बारे में सोचीए वहां लाल रंका देखता हुआ लोहे का गोला रख है आग तो वहां बी पुरी तरा मोजुद है लेकिन, लेकिन क्या वाग दूवा है? आप बिलकुल नहीं देखते में लोई के गोले से दूँा नहीं प्रटा इसका मतलब है कि सर्फ आग का हूना दूई को पैडा करने के लें काफी नहीं है इसके पीचे ख्षुपीवी श्वर्थ है और वो श्वर्थ है लक्डी का गीला हूना जब आग का संपर्क तब भी दूवा निक गीली लक्डी से हुता है, तब भी दूवा निकलता है. ये गीली लक्डी ही उपादी है. जो व्यकती इस उपादी को पहचान लेता है, उसका अनुमान कभी गलत नी होता. तो बगर बवाग बाहरी गलतीगो को देखकर पूरे विग्यान कोई जूटा कैरे ते जबकी नव्यन नयाय कहता है की नियम सही है बस हमें उन छुपी हुई शर्थो यानी उपादि को पहचानने की द्रिष्टी रखनी चाही है ये बज़़ी शान्दार्स पष्टिकान है, मतलब अगर हमारा अनुमान फेल हो रा है, तो पूरे सिस्टम को दोज देने के बजाए, हमें एक होज ना चीए की, कि हम कुन सा महत्पोपून देटा या उपादी मिस कर रहे हैं. बिल्कुल. अब एक तीस्री स्तिती पर आते हैं मान लिजे आखो से कुछ नहीं दिक्रहा यानी प्रत्ट्उच नहीं है और और दूवा भी नहीं है जेसे आग का पता चले यानी अनुमान भी नहीं हैं अपने बज़ान बाद पर बज़ान बाद पर बज़ान बाद पर बज़ान बाद पर बज़ान बाद बाद पर बज़ान बाद बाद बज़ान बाद बाद बज़ान बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा आप्त, इसका क्या मतलब होता है? त्रुस्टवर्दी रहा बभरोसे मन्द और इक आप्त व्यक्ती होने के लिए तीन गुन आवश्षक है पहला, उसके पास विषय की विषे शक्गिता हो तुस्रा, वो सच्चा हो तु यह विशेशवगटा तो है, लेकिन लेकिन वो दोक्तर किसी क्यास फामा कमपनी से कमिशन लेकर सर्फ उसी कमपनी की महंगी दवायी लिकता है. रहु ये बहुत आम है. तु यह विशेशवगटा तो है, लेकिन निष्पकष्ता गायब होगी. जिसे मेटिकल सायंस की गेरी विषेशगगटा है लेकिन लेकिन वो दोक्तर किसी खास फामा कमपनी से कमिशन लेकर सर्फ उसी कमपनी की महंगी दवाया लिकता है वह ये बहुत आम है तो यहां विशेशग्यटा तो है लेकि निश्पक्ष्ता गायब हो गी निव बिने आये के मानकों के अनुसार उस दोक्तर का परचा शब्द प्रमाड नहीं माना जाएगा किंकि वो आप्ट की स्रेने से बहार हो गया इक्दम सही पक्रा आपने और बाद सर्फ वक्ता के आप्त होने पर खत्म नहीं होती जो वाग्य बुला जारा है उसका अर्ट समजने किलिए नवे नयाए चार्स्टंबों को अनिवारे मानता है चार्स्टंब? कों कों से? वे है आकांख्षा युगिता उसके बाद इगदं चुप होँजाए. तो मेरा दमाक तुरन पूषते है कि भाई क्या लाओ? यही अकांचा है. अख्ट्टन्सी. वाख्के के शब्डो में एक तुस्रे की अपेख्षा होनी चाए. मतलब एक शब सुनकर तुस्रे शब्त की मांग पेदा हूना ही व्याक्रन्का मुलनीम है तुछ आप तुस्रा? तुस्रा स्तम् है योग्गिता समान्तिक पिटनेस यानी बात में तारकिक संगती होनी चहीए ज़से अगर कोई कहे की वह आग से पवधुं को सीच रहा है अब व्याक्रन के हिसाब से तो वाके सही हैं, लेकिन लेकिन आग में सीचने की योग्यता ही नहीं है, इसले वाके का अर्थ ही नश्थ हो जाता है. बलकुल सही. तीस रहे आसथी, यानी प्रोक्समिती. अगर कोई व्यक्ती कहता है, गाए. अर फिर एक गड़़ बाद कहता है, गास अर फिर दो गड़़ बाद कहता है, खाती है. अह, तो सब बहुल जाएंगे कि बाद क्या होरी ती. अह, शब्द भी सही हैं और योगिता भी है, लेकिन समय का अंतराल इतना देक है कि वाके का अर्थी कष्ट मोचात है शब्दों को एक निरंतर प्रभामे हूना चाहीए और चोथास्तम्ब जो मुझे लकता है बहाशा के लिए सब से जादा जोरी है वहे तात्पर रे है यानी स्पीकर का अंटेंचन नव्या न्याय में इसके लिए संदव का एक बहुत लास्सिक उदारन दिया जाता है. आपको पता है संस्क्रित में संदव शब्द के दो अर्थ होते है. नमक और गोडा. नमक और गोडा. आब मान लिजे कोई वेक्ती भूजन कर रा है. और वो कैता है, सेंदवलाओ. तो यहां सुन्ने वाले को वक्ता का तात पर यह समजना होगा, की भोजन की समए नमक की माग हो रही है. गोडे की नहीं? भिलकुल. गोडा थाली में छोडी का एगा कोई. संदरप के बिना शबडो का कोई मोल नहीं है. यहां मुझे एक और मजदार बहेस यादारी है. वैशिषिक दरशन का मानना था, के शब्द अपने आपने कोई अलग प्रमान नहीं है. वे केते दे के जब हम किसी की बाथ सुनते है, तो हम भस ये अनुमान लगारे हुते हैं, कि उस व्यक्ती के दिमाग में क्या चल रहा है? आप, लिकि नववे न्याय ने यह तोगी खारइज कर दिया था. आप, अप उब ही एक तोटे के उदारन से, मडल वगर एक तोटा बिलकोल सब च्छारन के था है, दरवाजा बंद कर दो, तो भले ही तोते के अंदर कोई अरादा या चेतना नहो, फिर भी सुनने वला वकती उटकर दर्वाजा बन्द करी देता है. बिलकुल इस का मतलव है की शब्दों के अंदर अपना एक स्वतन्तर सामर्ठे होता है. जो जो अर्थ पैडा करता है. अगर अँ नहीं से आज की तकनीक से जोड़ें, तो आज के जेनरेटेव आए आए और चाटबोट से वे बलको लुँ स्थोटे की तरही हैं. आए ये बआत अच्चा पहण्ट है. सिलकर चिपस के अंदर कोई चेतना या अईन्सान जैसी समझ नहीं है, लेकिन वेजो वाग के गड़ते हैं उन्ने अकांचा, योग्यता और आसत्ती पुरी तर हमोजुद होती हैं. इसलि एए एक शब्द हमारे लिए एक स्वतन्त्र शब्द प्रमान बन जाते हैं. बले ही उनके पीछे कोई सुच्त्तावा अईन्सानी दमागना हूँ. निवव्य नियाय का ये विष्लेशन, मतलब भाशा विग्यान के स्थर्पे बहुत यी गहरा है, और शब्दो के साथ ही वो एक चोथे प्रमाण की बी बात करते हैं, जिसे उप्मान कहा जाताता. उप्मान, इसका मतलवे के अगर कोई किसी आजी चीस के बारे में बतारा है, जिसे हमने कभी देखा नहीं, तो वो एक उदारन या तुलना का इस्तमाल करता. आजेसे किसी ने बताया की गव्याय नाम का एक जंगली जानवर हुता है, जो बिल्ल्कुल गाए जासा दिकता है अप कोई व्यक्ती जंगल जाता है गाए जासा जान्वर दिकता है और समच जाता है कि यही गव्या है तो यह उप्मान्त से प्राथ ग्यानूवा बिल्कुल मिमान्त सा किसे एक रहे स्विमाई श्टेनी मानते थे लिकिन गंगेश उपाद्ध्याय इसे बहुत तारकिक रूप से समजाते है. वे कहते है कि समान्ता कोई जादूई चीस नहीं है. वल कि ये बस दो चीजों के बीच साजा गुनो, यानी शेड़ प्रोपतीज की प्यचान करना है. तो इस सब का असल मतलप क्या है. प्रत्यक्ष अनुमान, शब्द और उप्मान हमने ज्यान प्राप्त करने के सारे तरीके समज लिए सच्छ और ब्रहम को �alak karna bhi seek liya लेकिन चोदवी सदी के ये विद्वान इतनी जटल मान से कसरत आखर कर क्यो रहे थे या उनका उदेशे सर्फ शास्टरारत या या वादविवाज जीतना था? ये एक बहुती महत्वोपों सवाल कहडा करता है, कुकि बार्तिय दर्षन में ज्यान कभी भी सर्फ बोद्धिक मनुरंजन के लिए नहीं होता. तो फिर अंतिम लक्षे क्या था? नव्विन्याय की इस तूरी ग्यान मीमान्सा का अन्तिम लक्षे है अप्वर्ग यानी दुखों के चक्र से मुक्ती गंगेश्ये स्तापित करते है की हमारे जीवन की सभी दुखों की ज़ड में कोई ना कोई ब्रहम या आए यथारत ग्यान जरूर होता है लेगिन दूक्की जड क्या है, इस पर तो बवधधधशन का भी अपना एक बहुत मजब। नजरीय है ना? बवधधधशन क्या ता है कि अपना इनसान के हर दुक्का कारन त्रिष्ना है, अगर इच्छाँ को खतम कर दिया जाए तो दुख अपने आप समापत हो जाएगा. तो क्या न्याए दर्षन भी एसा ही मानता है? न्याए दर्षन इसे एक कडम और अगे लेजाता है. न्याय कहता है कि त्रिषना तो महेज एक लक्षर द है, एक सिम्टम है. अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्यान अच्या तो उसे कुछ समे के लिए रहत ज़रूर मिल सकती है. लेकिन जब तक उस इच्छा की ज़ड, यानी अग्ज्यान को सथ यान की तल्वार से नहीं काटा जाएगा, तब तक पुरानी आदितें और दूक बार-बार लोटकर आते रहेंगे. ये मनो विग्यान की द्रिष्टी से बहुती सतीक विष्लेशन है इसे हम आजके जीवन से जोडग के देख सकते हैं मान लिजे किसी विक्ती को समाथवोन की बुरी लध है वो इस लट्से चुटकारा पाने किलिए अपने फोन में कोई आब बलोकर लगा देता है या या फोंको आलमारी में बंद कर दिता है? आा बवत लोग एसा करते है? ये बवडद दरशन के त्रिष्ना निंट्रन जैसा है. ये एक एमरजन्ची ब्रेख की तरे काम जरूर करता है. लेकिन लेकिन जब दक वो वेक्ती ये नहीं समदेगा कि वो बरबर फोंग प्यूं था है किया वो अंदर के किसी खाली पन, काम के तनाव, या गेरी बूरियत से बागनी की कोशिच कर रहा है? बिलकुल! उखाली पन ही अग्यान है, जब तक उस अग्यान को ग्यान से नहीं भ़ाजाएगा, तब तक आप ब्लोकर रड थे ही लद वापस लोट आएगी. नव्व्या न्याय हमें समस्स्या की सतथआए पर लडने के बजाए, सीथे उसकी जर तक पहुचना सिकھाता है. बहुत खुब कहा आपने. अनुशासन हमें तातकालिक सुरक्षा कवच देता है. लेकिन यतारत ज्यान, यानी अवेरनिस, हमें हमेशा के लिए आजाद कर देता है. तत्व चिंता मनी में ज्यान को परखने के जो भी तरीके बताए गये है, वे अन्तता मनुश्छ को अग्यान से निकाल कर मुक्ती की ओर लेजाने का ही एक तारकिक रोड मैप है. तो इस पूरे दीब डाईव में, हमने ये देखा की चोदवी सदी का नव्वे न्याएदर्षन रव्वे नाज के जीवन में भी कितनी गेराईई से लागो होता है. उसी भी जानकारी पर भरोसा करने से बहुटा का आप्त होना मतलब निशपक्ष और विषिषक्ग यह होना कितना ज़ूरी है बलकुल सही और सबसे बढ़ी बाध जीवन के दुखों और बूरी आदतों को सर्व दबाने के बजाए गयान के स्टर पर जाकर उने ज़र से खटम करने का महत्व समजा ये दरशन सपच्ट्रुब से सिकहाता है कि सुचनाँ के इस योग में हमें केवल एक निष्करिय उपभोगता बनकर नहीं रहना है बलकी हर जानकारी को तर्ख की कसोटी पर परचने वाला इक सक्रिया विष्लेशक बनना है इक दम सही निष्कर्शे लेकिन इस चर्चा को समाप करने से पहले नव्वे नियाये के व्यावहारिक सफलता वाले सिद्धान्त ने मिरे दिमाग में बहुती अजीब अद परिशान करने वाला विचार पैदा कर दिया है अच्या वो क्या? दिके, नवविन याय ख़ता है के दूर दिखने वाला पानी सच है यब रहम ये इस बाथ से तैहोगा के पानी पीने के बाथ प्यास भुजती है यह नहीं व्यावहारिक सबलता ही सद्टिका एक मात्र प्रमान है हा, हमने यही चर्चा की लेकिन आज हम जिस वर्च्ट्ट्र्यालिति और मेटवर्स की दुन्या कि और बड़रे हैं जर अज उसके बारे में विचार करें ये एक आजी दुन्या है जगा सब कुछ केवल पिक्सल, कोड और और कमपुटर सक्ट्रीन तक्सीमित है वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� तब वड़िक रूब से जाचना पुरी तर ना मुमकिन होजाएगा ये सुचने वाली बात है क्या दिजितल दुन्या मानोजाती को हमेशा के लिएक आफ़े ब्रम की स्तिती में कैद कर सकती है जहां हमारी तोर्च की रोषनी भी उपने बज़नी भी सुब लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ लग़ाप़ ल�