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न्यायकुसुमांजलि__घर-वापसी.mp4
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- 0:00–0:03नमस्कार और स्वागत है इस खास विष्लेषन में
- 0:03–0:07आज हम गयारवी सदी के एसे गेहन गरन्थ की दुन्या में गोता लगाने वाले हैं
- 0:07–0:11जिसने भारती एदर्षन को एक बिल्कुल नहीं दिशा दी थी
- 0:11–0:17और सबसे कमाल की बात, सदियों बाद इस महान रच्ना को इक बार फिर से अपनी मुल आवाज मिल ग़े है.
- 0:17–0:24अप सवाल ये उट्ता है की एक हादार साल पुरानी कालजेई रच्ना अखिर कार अपने गर लोट्टी कैसे है.
- 0:24–0:29तो चल ये बड़देग गर वापसी की इस बेहत दिल्चछब कहानी को दिकोड करते हैं.
- 0:29–0:34ये कोई आम अनवाद नहीं है, हम एक बहितरीं संसक्रत गरन्त के अपनी जन्मबहुमी की बाशा,
- 0:34–0:37यहनी मेठली में लोटने की यात्रा को ट्रक कर रहे हैं.
- 0:37–0:40सद्यों की خमुषी के बाद, ग्यान वापस अपनी मिट्टी से जुड रहा है.
- 0:41–0:43और ये शान्दार वापसी समबह वुई है,
- 0:43–0:45गजेंद्र ताकृएके एहतिहासिक अनवाद से.
- 0:46–0:48विदेधवारा प्रकाषिद 2004 का मुल अनवाद
- 0:49–0:51और इसका 2026 का परीवरदित संसकरन,
- 0:51–1:21तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 1:21–1:23अदिनाचार्या खुद मित्ला की ही विबूती थे,
- 1:23–1:25लिकन उनकी महान रचना सदियों तक सुझ्व संट्सक्रित के
- 1:25–1:27अकाटमिक दायरो मेही सिमबत कर रहे गए ती.
- 1:27–1:30इस नहीं अनुवाद ने उस गयान को अजात कर दिया है.
- 1:30–1:34अदिनाचार्या खुद मित्ला की ही विबूती थे,
- 1:34–1:38लिकन उनकी महान रचना सदियों तक सच़्ित के
- 1:38–1:42अकाटमिक दाईरो मेही सिमथकर रहे गए ती.
- 1:42–1:45इस नय अनुवाद ने उस गयान को अजात कर दिया है.
- 1:45–1:48अपने अल्टिमेट तरको स्थापित करने कि लिए
- 1:48–1:52अदिनाचारेने अपने ग्रन्त को पाज विषिष्ट च्ताबूकों
- 1:52–1:54यहनी तरकों के गुच्छो मे बाटा है.
- 1:54–1:57यह बिल्कुल एक तारकिक सीटी की तरा काम करता है,
- 1:57–2:00जहां कारे कारन संबंत के बेसिक सिदान्तो से शुरूहो कर
- 2:00–2:05जियान की प्रमानिक्ता और फिर दिरे दिरे परम सत्तितक पहुचने का एक विवस्तित रास्ता तैए किया गया.
- 2:05–2:13अब आते है अगले हिस्से पर, बहुस्वर्वादी बहेस कै आवाजों और तरकों के भीच का बहेतरीं संटुलन.
- 2:13–2:19मूल स्ट्रूथ से एक बाज जो भिल्कुल साफ होती है वो ये कि ये कोई एक तर्फा उब्देश नहीं है.
- 2:19–2:25ये असल में मिक्हािल बाक्तिन की पूली फोनी या बहुस्वरता के विचार को परफिक तरीके से दिखाता है.
- 2:25–2:30उदेनाचारे क्या करते हैं? उचारवाग जेसे अपने विरोदियो के तरको को सीदे कहारिज नहीं करते है,
- 2:30–2:34बलकी पहले उने पूरी स्वतन्त्र मस्वुती देते हैं.
- 2:34–2:40उनके विचारों के उनके सबसे मस्वूत रूप में सामने रक्कर फिर उसे तारकिक रूप से ध्वस्त करना.
- 2:40–2:43प्राचीन भार्तिया बाद विवत परमप्रा की अस्ली खुबसुरति यही तो है?
- 2:43–2:49इसी कडी मे ये गरन्त अंतहीं संदेवाद को बड़ी ही चतुराई से बएसर करता है.
- 2:49–2:52ये सावित करता है कि कुछ संदे है आज़े होते है,
- 2:52–2:56जो हमारे रोज मरहा के व्यावारेग जीवन को ही नामुमकिन बना देते हैं.
- 2:56–3:00इस कन्सेप्त को आज हम प्राइग्मातेक सेल्फ्रीटेशन कहते हैं
- 3:00–3:03और सबसे अच्छी बात यहे है के अनुवादक ने
- 3:03–3:06बारी बहरकंशब्डावली के बना बड़ी ही सहज्टा से
- 3:06–3:09इस जटिल विचार को मेठली में प्रस्तुत कर दिया है
- 3:09–3:13जलिये अब इस गरन्त के सबसे एहम हिस्से की और चलते हैं.
- 3:13–3:18इश्वर ये सत्टा को सिथध करना, यानी तर्क रूपी फुलों का पाच्वा गुच्च्चा.
- 3:18–3:22ये पाच्वा अस्तबक पूरे गरन्त का क्लािमाएक्स है,
- 3:22–3:26ज़ाहा इश्वर के अस्तित्व का सबसे जबर्दस्त बचाँ किया गया है.
- 3:27–3:29पहले चार गुच्छोने जो जमीन तयार की ती,
- 3:30–3:34उस पर ये आप गेंप्रमान एक मस्बूद दाशनिक इमारत कष्टी करते हैं.
- 3:35–3:37ज़र शोच ये ये दाचा कितना सगन है.
- 3:37–3:43ब्रमान्ड्ये पैमाने और परमानों की गती से शुरूगो कर ये दिरे-दिरे भाशा की जटिल्ताओं
- 3:43–3:47और वाख्य रच्ना के नियमो तक बढ़ी गजब की लैई में आगे बड़ता है.
- 3:47–3:51इसे हम सच्छ में दर्षन शास्त्र का एक प्राश्तर खलास कै सकते हैं.
- 3:51–3:59हमारा अगला पडाव है, अनुवाद की गर वापसी, तकनीकी भाशा और सुलब्ता के भीच एक सेथू बनाना.
- 3:59–4:05जाहर है, इतनी बारी भरकम अतिहासेख समगरी का अनुवाद करना, बच्छो का खेल तो ता नही.
- 4:05–4:11लेकिन अनुवादक ने यहां एक बहुत्ती समाथ दूल लेर यहनी दोरेस तरकी रननीती अपनाई.
- 4:11–4:17उनोने मुख्य तरको के लिए व्याप्ती और समवाई जैसे सक्त संसक्रत शब्डो को तो बनाई रख्खा.
- 4:17–4:22उब आप उदारनों के लिए थेट्ट मेठिली मुहावरों का इस्तमाल किया
- 4:22–4:25जैसे की किसी असमबव चीज को समजाने के लिए
- 4:25–4:28करहाक सींग या करगोष का सींग कहना
- 4:28–4:32अकाद में गेहराई और आम भोलचाल का क्या गजब का ताल मेल है
- 4:32–5:02अब ख़ादाना बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा�
- 5:02–5:06अदियाना चार्या को एक तर्क वीर के रुप में दिखाया गया आगे,
- 5:06–5:09जो मानव पीडा के प्रतिग गेहरी करूना,
- 5:09–5:13यानी शान्त्रस से प्रेरिद होकर ये बहरी बध्धिक यूध लड़ रहा है,
- 5:13–5:16ये कोमबिनेशन बाकई दिल चूलेने वाला है.
- 5:16–5:19उदियाना चार्या को एक तर्क वीर के रुप में दिखाया गया है,
- 5:19–5:22जो मानव पीडा के प्रती गेहरी करूना,
- 5:22–5:26यानी शान्त्रस से प्रेरित होकर ये भभरी बडदिक युध लड़ा रहा है.
- 5:26–5:29ये कोमबिनेशन बाकई दिल चूलेने वाला है.
- 5:29–5:32अब बात करते हैं इसके दूर गामिय सरकी
- 5:32–5:37इक नया बाशा एक शितज मेठिली के दार्षनिक व्याक्रन का निरमान
- 5:37–5:42दिक्ये ये पूरी कभायत सर्फ एक पुरानी कहानी को नहीं बाशा में सुनाने बरकी नहीं है
- 5:42–5:46यदि तो क्योंकी जेसी जटिल संसक्रित सन्रच्नाओ को,
- 5:46–5:49मैठिली के सहज प्रवाः में दाला जाता है,
- 5:49–5:51तो असल में बाशा का विस्तार होता है.
- 5:51–5:54इस प्रोजेक्त ने दाशनिक गद्दे के लिए
- 5:54–5:57एक बिल्कुल नया और परिष्क्रित वियाक्रन तयार कर दिया है.
- 6:12–6:15ताज भी बद्दे क्यान गड़ाज बलक्ती है.
- 6:15–6:18ये सुचना सच्मुच रोंक्ते कड़े कर देता है,
- 6:18–6:20की तर्कों का ये प्राचीन गुल्दस्ता,
- 6:20–6:23पूरे एक हसाड़्ार साल बाद भी आज उतना ही ताजा,
- 6:23–6:25उप्रभ्ष्ट्टार है जितना वो अपने जन के वक ता
- 6:25–6:28सच कहा है अस्ली ग्यान कभी पुराना नहीं पड़ता
- 6:29–6:32तो स्रोथ समागरी के इस शान्दार विष्लेशन के अंप में
- 6:32–6:35ये हमें एक बहुत ही रोमान्चक सवाल के साथ चोड जाता है
- 6:35–6:41ना जाने कितनी ही और काल जैई क्रितिया आज भी खामुषी से अपनी मात्र भाशा में जागरत होने,
- 6:41–6:44अपनी संसक्रतिग गर वापसी का अंतिजार कर रही है.
- 6:44–6:46ज़ा ज़ा सुचीगा इस बारे में.
- 6:46–6:50भीद है इस बोद्धिक सफर में आपको कुछ नया और दिल्चस जानने को मिला होगा.
- 6:50–6:53हमारे साज ज़ुडने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.
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नमस्कार और स्वागत है इस खास विष्लेषन में आज हम गयारवी सदी के एसे गेहन गरन्थ की दुन्या में गोता लगाने वाले हैं जिसने भारती एदर्षन को एक बिल्कुल नहीं दिशा दी थी और सबसे कमाल की बात, सदियों बाद इस महान रच्ना को इक बार फिर से अपनी मुल आवाज मिल ग़े है. अप सवाल ये उट्ता है की एक हादार साल पुरानी कालजेई रच्ना अखिर कार अपने गर लोट्टी कैसे है. तो चल ये बड़देग गर वापसी की इस बेहत दिल्चछब कहानी को दिकोड करते हैं. ये कोई आम अनवाद नहीं है, हम एक बहितरीं संसक्रत गरन्त के अपनी जन्मबहुमी की बाशा, यहनी मेठली में लोटने की यात्रा को ट्रक कर रहे हैं. सद्यों की خमुषी के बाद, ग्यान वापस अपनी मिट्टी से जुड रहा है. और ये शान्दार वापसी समबह वुई है, गजेंद्र ताकृएके एहतिहासिक अनवाद से. विदेधवारा प्रकाषिद 2004 का मुल अनवाद और इसका 2026 का परीवरदित संसकरन, तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � अदिनाचार्या खुद मित्ला की ही विबूती थे, लिकन उनकी महान रचना सदियों तक सुझ्व संट्सक्रित के अकाटमिक दायरो मेही सिमबत कर रहे गए ती. इस नहीं अनुवाद ने उस गयान को अजात कर दिया है. अदिनाचार्या खुद मित्ला की ही विबूती थे, लिकन उनकी महान रचना सदियों तक सच़्ित के अकाटमिक दाईरो मेही सिमथकर रहे गए ती. इस नय अनुवाद ने उस गयान को अजात कर दिया है. अपने अल्टिमेट तरको स्थापित करने कि लिए अदिनाचारेने अपने ग्रन्त को पाज विषिष्ट च्ताबूकों यहनी तरकों के गुच्छो मे बाटा है. यह बिल्कुल एक तारकिक सीटी की तरा काम करता है, जहां कारे कारन संबंत के बेसिक सिदान्तो से शुरूहो कर जियान की प्रमानिक्ता और फिर दिरे दिरे परम सत्तितक पहुचने का एक विवस्तित रास्ता तैए किया गया. अब आते है अगले हिस्से पर, बहुस्वर्वादी बहेस कै आवाजों और तरकों के भीच का बहेतरीं संटुलन. मूल स्ट्रूथ से एक बाज जो भिल्कुल साफ होती है वो ये कि ये कोई एक तर्फा उब्देश नहीं है. ये असल में मिक्हािल बाक्तिन की पूली फोनी या बहुस्वरता के विचार को परफिक तरीके से दिखाता है. उदेनाचारे क्या करते हैं? उचारवाग जेसे अपने विरोदियो के तरको को सीदे कहारिज नहीं करते है, बलकी पहले उने पूरी स्वतन्त्र मस्वुती देते हैं. उनके विचारों के उनके सबसे मस्वूत रूप में सामने रक्कर फिर उसे तारकिक रूप से ध्वस्त करना. प्राचीन भार्तिया बाद विवत परमप्रा की अस्ली खुबसुरति यही तो है? इसी कडी मे ये गरन्त अंतहीं संदेवाद को बड़ी ही चतुराई से बएसर करता है. ये सावित करता है कि कुछ संदे है आज़े होते है, जो हमारे रोज मरहा के व्यावारेग जीवन को ही नामुमकिन बना देते हैं. इस कन्सेप्त को आज हम प्राइग्मातेक सेल्फ्रीटेशन कहते हैं और सबसे अच्छी बात यहे है के अनुवादक ने बारी बहरकंशब्डावली के बना बड़ी ही सहज्टा से इस जटिल विचार को मेठली में प्रस्तुत कर दिया है जलिये अब इस गरन्त के सबसे एहम हिस्से की और चलते हैं. इश्वर ये सत्टा को सिथध करना, यानी तर्क रूपी फुलों का पाच्वा गुच्च्चा. ये पाच्वा अस्तबक पूरे गरन्त का क्लािमाएक्स है, ज़ाहा इश्वर के अस्तित्व का सबसे जबर्दस्त बचाँ किया गया है. पहले चार गुच्छोने जो जमीन तयार की ती, उस पर ये आप गेंप्रमान एक मस्बूद दाशनिक इमारत कष्टी करते हैं. ज़र शोच ये ये दाचा कितना सगन है. ब्रमान्ड्ये पैमाने और परमानों की गती से शुरूगो कर ये दिरे-दिरे भाशा की जटिल्ताओं और वाख्य रच्ना के नियमो तक बढ़ी गजब की लैई में आगे बड़ता है. इसे हम सच्छ में दर्षन शास्त्र का एक प्राश्तर खलास कै सकते हैं. हमारा अगला पडाव है, अनुवाद की गर वापसी, तकनीकी भाशा और सुलब्ता के भीच एक सेथू बनाना. जाहर है, इतनी बारी भरकम अतिहासेख समगरी का अनुवाद करना, बच्छो का खेल तो ता नही. लेकिन अनुवादक ने यहां एक बहुत्ती समाथ दूल लेर यहनी दोरेस तरकी रननीती अपनाई. उनोने मुख्य तरको के लिए व्याप्ती और समवाई जैसे सक्त संसक्रत शब्डो को तो बनाई रख्खा. उब आप उदारनों के लिए थेट्ट मेठिली मुहावरों का इस्तमाल किया जैसे की किसी असमबव चीज को समजाने के लिए करहाक सींग या करगोष का सींग कहना अकाद में गेहराई और आम भोलचाल का क्या गजब का ताल मेल है अब ख़ादाना बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा� अदियाना चार्या को एक तर्क वीर के रुप में दिखाया गया आगे, जो मानव पीडा के प्रतिग गेहरी करूना, यानी शान्त्रस से प्रेरिद होकर ये बहरी बध्धिक यूध लड़ रहा है, ये कोमबिनेशन बाकई दिल चूलेने वाला है. उदियाना चार्या को एक तर्क वीर के रुप में दिखाया गया है, जो मानव पीडा के प्रती गेहरी करूना, यानी शान्त्रस से प्रेरित होकर ये भभरी बडदिक युध लड़ा रहा है. ये कोमबिनेशन बाकई दिल चूलेने वाला है. अब बात करते हैं इसके दूर गामिय सरकी इक नया बाशा एक शितज मेठिली के दार्षनिक व्याक्रन का निरमान दिक्ये ये पूरी कभायत सर्फ एक पुरानी कहानी को नहीं बाशा में सुनाने बरकी नहीं है यदि तो क्योंकी जेसी जटिल संसक्रित सन्रच्नाओ को, मैठिली के सहज प्रवाः में दाला जाता है, तो असल में बाशा का विस्तार होता है. इस प्रोजेक्त ने दाशनिक गद्दे के लिए एक बिल्कुल नया और परिष्क्रित वियाक्रन तयार कर दिया है. ताज भी बद्दे क्यान गड़ाज बलक्ती है. ये सुचना सच्मुच रोंक्ते कड़े कर देता है, की तर्कों का ये प्राचीन गुल्दस्ता, पूरे एक हसाड़्ार साल बाद भी आज उतना ही ताजा, उप्रभ्ष्ट्टार है जितना वो अपने जन के वक ता सच कहा है अस्ली ग्यान कभी पुराना नहीं पड़ता तो स्रोथ समागरी के इस शान्दार विष्लेशन के अंप में ये हमें एक बहुत ही रोमान्चक सवाल के साथ चोड जाता है ना जाने कितनी ही और काल जैई क्रितिया आज भी खामुषी से अपनी मात्र भाशा में जागरत होने, अपनी संसक्रतिग गर वापसी का अंतिजार कर रही है. ज़ा ज़ा सुचीगा इस बारे में. भीद है इस बोद्धिक सफर में आपको कुछ नया और दिल्चस जानने को मिला होगा. हमारे साज ज़ुडने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.