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भामती__संस्कृतसँ_मैथिली_धरि.mp4
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- 0:00–0:06नमसकार, आजुक एही विषेश प्रस्तृती में, हम सब एक ता बहुत अटिहासेक अग गमभीर विषेए पर चर्चा करब.
- 0:06–0:13इचर्चा छे गजिंद्र ताकुर द्रा केल्गेल, नोमन सताभ्दिक महान संस्क्रित दाश्निक ग्रन्त,
- 0:13–0:16वाचस्पती मिश्रक भामती कमेतिली अनुवाद पर
- 0:16–0:18इक उनो सादारन अनुवाद नहीं चै,
- 0:18–0:21बूजुजे ये एक ता एहन विशाल पूल चे,
- 0:21–0:24जे हाजार वर्ष्षे बेशी पूरान प्राचीन इआन के,
- 0:24–0:28अम्रा लोक्निक अपन भोल्चाल का बाशा में लोग कै बेट्चै.
- 0:28–0:31इजे पारमपर एक आवरन चित्राची, उख्रा देखू.
- 0:32–0:35पहल नज्री में इग्रन्त का सान्सक्रितिक
- 0:35–0:39और साहित्तिक महत्वके बहुत सुन्दर दंग से स्तापित कदैत ची.
- 0:39–0:42विदेह एपत्रिका दवारा प्रकाषिती काज,
- 0:42–0:45केवल एक तक किताब कप्रकाषन मात्र नहीं,
- 0:45–0:48बलकी मित्हलाक सम्रिध बोद्धिक परमपराग,
- 0:48–0:50एक तबहव्य उच्सव थेक.
- 0:50–0:52ता, आगु बद़ावास पहीने,
- 0:52–0:55अम सब एजेंदा पर एक ता सर सरी नज्री दादी,
- 0:55–0:58पहिल भामती आ वाचस पती मिष्र,
- 0:58–1:01दो सर अदवेइत वेदान तक प्रस्थान,
- 1:01–1:04तेसर अद्धास आ ख्याती वाद,
- 1:04–1:08चोथिम चतू सुत्रिक दाशनिक गामभीर्य,
- 1:08–1:11अर अन्तिम अनुवादक भाशिक सुन्दर्य,
- 1:11–1:15इएजेंदा हम्रा लोक्निके कथोर संस्त्रत तरक सला क
- 1:15–1:18आदनिक मैठिलिक आत्मी अबाशादरी लजाईत.
- 1:19–1:22तच्छलू, बिना विलंब केने पहिल्खंदसा आरंब करेच्छी
- 1:22–1:25भामती आ वाच्छस्पती मिष्र.
- 1:25–1:29इए तिहासिक यात्रा नोमम सताब्दिक मित्ला से शुरू हो इच्छे,
- 1:29–1:37जदे महान दाशनिक वाचस्पती मिष्र लग्बभग अद्ठाशू एक तालीस इस्वी में भामती तीकाक रचना केलनी.
- 1:37–1:43एते सब से द्यानकर्ष्वात इच जे वाचस्पती मिष्र के सर्वतन्त्र स्वतन्त्र उपादी प्राप्तिचल,
- 1:43–1:47मने ओ भर्तिये दर्षनक लगभग सब आस्तिक प्रस्थान,
- 1:47–1:52जनन न्याय, सांख्य अयोग, पर अदिकार पुर्न तीका सब लिखने चला,
- 1:52–1:59अब अवे ची दोसर कहन्द पर अदवैट वेदान तक प्रस्थान
- 1:59–2:07इते ही देखवर बहुत दिल्चवक छे ये टी का कोना अदवैट वेदान तक एक ता नव ग्यानी मिमान सक शाक्ध निरमान करे चे
- 2:07–2:10जक्रा बाद में भामती प्रस्थान कहल गेल
- 2:10–2:16यह ताम भामती आविव्रन्प्रस्थानक बीचक कडगर अंतर सपष्ट बहराल चे.
- 2:16–2:22निश्पक्ष रूप से दिखठल जाए, तब भामती प्रस्थान व्यक्तिग जीव के अविद्या काश्वे मानेच्छे,
- 2:22–2:52जखन की विव्रन प्रस्थानक समपून केंद्र ब्रम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म
- 2:52–3:00अद्र अद्परम्परा इसब अनलोगी सगन विचार सबखगे बहुत सबष्ट कोडेई चे
- 3:00–3:03इते न्याई दर्षने केक्त बहुत प्रक्यात खंडन देखू
- 3:03–3:07हजार शास्त्रे मिलियो गड्के पत नहीं बना सकते चे
- 3:07–3:13एकर सोज़ अर थी चे, जे केवल सद्दहनते कषास्त्र कोनो प्रत्यक्ष व्यवावर्ग अनुबहो के बदली नहीं सकत्चे.
- 3:13–3:16माने गाईला कैईो कब्डा नहीं बहाँ सकत्चे.
- 3:16–3:18गजब के तरक चे नहीं.
- 3:18–3:23मुदा एकर विरुद वाचस्पती मिश्रुक्तर्क आर हु भेसी तार्किक चे.
- 3:23–3:28उ कहे चतिन जे जगन सत्ते ज्यान से परम ब्रहमक नाश होई चे,
- 3:28–3:33तकनो रोस मर्राग व्यवावाश्तविक्ता के मेट बेत नहीं चे.
- 3:33–3:36माने, दाशनिक रूप से इस जन्सार चाहे जे हो,
- 3:36–3:40हम्रा लोकनिक देनिक जीवन के वेवावारेक दुन्या उईना चलत रहेत चै.
- 3:40–3:46आप पंचेत ची चारिम खंद पर, चतू सुत्रिक दाशनिक गामभीर्य.
- 3:46–3:53इविश्लेशन हम्रा लोकिनके आब्रम्म्सुत्रक पहिल चार आदार्बूत्सुत्र, अथात चतू सुत्री दरी लजाईत चाईत चाईत.
- 3:53–3:59ब्रम्म्मजिग्यासा सन्लग, जगतक जन्म, शास्त्रक स्रोथ, अशास्त्रक समन्वेद्धारी.
- 3:59–4:04इच्छारु क्रमिक्चरन अद्वेद वेदान्त ग्यान मिमान्सा किग्टम आदार शिला चै.
- 4:04–4:08इवास्तविक्ताक अद्वेद स्वरूपके बहुत कडाई सरक्षित करेच चै.
- 4:08–4:11एते एक ता बहुत क्रान्तिकारी बात कहल गेल चै.
- 4:11–4:15अब अन्तिम अप पाचम्क्हन्द अनुवादक बहाशिक सुन्देर्यग
- 4:15–4:18उत्पाद्या माने आता का गोला जगा बनायल,
- 4:18–4:22विकार्या माने दूट से दही जगा बडल लेल,
- 4:22–4:24नहीं एक रा एना जगा चमकायल,
- 4:24–4:27वा कोनो गन्तव्य जगा प्राप्त कयल जासकाई तची.
- 4:27–4:31आर्थ ई, जे मोक्ष पहिलें से विद्यमान चै,
- 4:31–4:35ये कोनो नववस्तू नहीं चें, जक्रा हम सब कोनो काथ से प्राब्त करो.
- 4:35–4:40आब अन्तिम अप पाचम्क्हन्द, अनुवादक बाशिक सुन्देर्य.
- 4:40–4:44गजेंद्र ताकुरा की आदूनिक अतिहासिक काज वास्तव में प्रशन्सनी आच्छे.
- 4:44–4:49अपारिभाशिक शब्द सबग तक्नीकी शुद्द्था के तो उहिना सुरक्षित्रा क्लनी,
- 4:49–4:55मुदा शास्तरिय संस्क्रित कक जटिल दाश्निक समाज सबग के मैठ्लीक सहच भोल्चालक बाशा में बडल्दलनी.
- 4:55–4:59इकोनो चोट मुट काज नहीं चल इे एक ता बहुत पैग अपलप्दी चै.
- 4:59–5:02यानोवाद उच्छ ब्रम्मान्डय सिद्धान्त सबके,
- 5:02–5:05गाम गरक माटिक सुगंद से जोडी दिच्छै.
- 5:05–5:08उदारन लेल, ब्रम्हान्डय लीला लेल मुस्की.
- 5:08–5:12मूल प्रव्रुत्ती के दिखाई बलेल, हर्यर गास देक लगजाईप,
- 5:12–5:18अदेहे संबन्द लेल, अंद्राक श्रिंक्ला मानी, अंद परमपरा, संट हेट प्रयोग कलोगेल चे.
- 5:18–5:21इदर्षन के सीथा लोक संस्क्रती से जोड़े चे.
- 5:21–5:31विदेह यी जरनल दवारा प्रकाशित यी विषिष्ट संसकरन आदूनिक मेत्ली में दाशनिक गद्ध्ध्ध्ध लिखबाग एक ता एक दम नव मानक ताए करेजचे.
- 5:31–5:35यस पश्ट्रूब से देखावेद चे जे हम्रा लोकनिक मैठली भाशा
- 5:35–5:39कोनो भी गमभीर दर्षनिक विमर्ष के उठाभे में पोडदा सक्षम अची.
- 5:39–5:45अन्त में यी विष्लेशन हम्रा सब के एकता बहुत महत्वपुन विचार पर चोरी रहल चे
- 5:45–5:48के प्राचीन बध्धिक दरोहर के बच्टैबाक लेल
- 5:48–5:51उक्रा हम्रा लोकनिक रोज मर्रा का बाशाका गर्माहत मैं
- 5:51–5:54पुनर जनम लेवा आवश्षक चे.
- 5:54–5:57सोचु प्राचीन बध्धिक परमप्रा के जीवन्त रक्वाक
- 5:57–6:03इप्रयास निष्चित रूप से भ्हामती अनुवादक के आहु भेसी गराई से पड़िबाक लेल प्रेरिद करे चे.
- 6:03–6:06हम्रा लोकनीश जुरबाक लेल बहुत-भहुत द्ध्निवाद.
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नमसकार, आजुक एही विषेश प्रस्तृती में, हम सब एक ता बहुत अटिहासेक अग गमभीर विषेए पर चर्चा करब. इचर्चा छे गजिंद्र ताकुर द्रा केल्गेल, नोमन सताभ्दिक महान संस्क्रित दाश्निक ग्रन्त, वाचस्पती मिश्रक भामती कमेतिली अनुवाद पर इक उनो सादारन अनुवाद नहीं चै, बूजुजे ये एक ता एहन विशाल पूल चे, जे हाजार वर्ष्षे बेशी पूरान प्राचीन इआन के, अम्रा लोक्निक अपन भोल्चाल का बाशा में लोग कै बेट्चै. इजे पारमपर एक आवरन चित्राची, उख्रा देखू. पहल नज्री में इग्रन्त का सान्सक्रितिक और साहित्तिक महत्वके बहुत सुन्दर दंग से स्तापित कदैत ची. विदेह एपत्रिका दवारा प्रकाषिती काज, केवल एक तक किताब कप्रकाषन मात्र नहीं, बलकी मित्हलाक सम्रिध बोद्धिक परमपराग, एक तबहव्य उच्सव थेक. ता, आगु बद़ावास पहीने, अम सब एजेंदा पर एक ता सर सरी नज्री दादी, पहिल भामती आ वाचस पती मिष्र, दो सर अदवेइत वेदान तक प्रस्थान, तेसर अद्धास आ ख्याती वाद, चोथिम चतू सुत्रिक दाशनिक गामभीर्य, अर अन्तिम अनुवादक भाशिक सुन्दर्य, इएजेंदा हम्रा लोक्निके कथोर संस्त्रत तरक सला क आदनिक मैठिलिक आत्मी अबाशादरी लजाईत. तच्छलू, बिना विलंब केने पहिल्खंदसा आरंब करेच्छी भामती आ वाच्छस्पती मिष्र. इए तिहासिक यात्रा नोमम सताब्दिक मित्ला से शुरू हो इच्छे, जदे महान दाशनिक वाचस्पती मिष्र लग्बभग अद्ठाशू एक तालीस इस्वी में भामती तीकाक रचना केलनी. एते सब से द्यानकर्ष्वात इच जे वाचस्पती मिष्र के सर्वतन्त्र स्वतन्त्र उपादी प्राप्तिचल, मने ओ भर्तिये दर्षनक लगभग सब आस्तिक प्रस्थान, जनन न्याय, सांख्य अयोग, पर अदिकार पुर्न तीका सब लिखने चला, अब अवे ची दोसर कहन्द पर अदवैट वेदान तक प्रस्थान इते ही देखवर बहुत दिल्चवक छे ये टी का कोना अदवैट वेदान तक एक ता नव ग्यानी मिमान सक शाक्ध निरमान करे चे जक्रा बाद में भामती प्रस्थान कहल गेल यह ताम भामती आविव्रन्प्रस्थानक बीचक कडगर अंतर सपष्ट बहराल चे. निश्पक्ष रूप से दिखठल जाए, तब भामती प्रस्थान व्यक्तिग जीव के अविद्या काश्वे मानेच्छे, जखन की विव्रन प्रस्थानक समपून केंद्र ब्रम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म अद्र अद्परम्परा इसब अनलोगी सगन विचार सबखगे बहुत सबष्ट कोडेई चे इते न्याई दर्षने केक्त बहुत प्रक्यात खंडन देखू हजार शास्त्रे मिलियो गड्के पत नहीं बना सकते चे एकर सोज़ अर थी चे, जे केवल सद्दहनते कषास्त्र कोनो प्रत्यक्ष व्यवावर्ग अनुबहो के बदली नहीं सकत्चे. माने गाईला कैईो कब्डा नहीं बहाँ सकत्चे. गजब के तरक चे नहीं. मुदा एकर विरुद वाचस्पती मिश्रुक्तर्क आर हु भेसी तार्किक चे. उ कहे चतिन जे जगन सत्ते ज्यान से परम ब्रहमक नाश होई चे, तकनो रोस मर्राग व्यवावाश्तविक्ता के मेट बेत नहीं चे. माने, दाशनिक रूप से इस जन्सार चाहे जे हो, हम्रा लोकनिक देनिक जीवन के वेवावारेक दुन्या उईना चलत रहेत चै. आप पंचेत ची चारिम खंद पर, चतू सुत्रिक दाशनिक गामभीर्य. इविश्लेशन हम्रा लोकिनके आब्रम्म्सुत्रक पहिल चार आदार्बूत्सुत्र, अथात चतू सुत्री दरी लजाईत चाईत चाईत. ब्रम्म्मजिग्यासा सन्लग, जगतक जन्म, शास्त्रक स्रोथ, अशास्त्रक समन्वेद्धारी. इच्छारु क्रमिक्चरन अद्वेद वेदान्त ग्यान मिमान्सा किग्टम आदार शिला चै. इवास्तविक्ताक अद्वेद स्वरूपके बहुत कडाई सरक्षित करेच चै. एते एक ता बहुत क्रान्तिकारी बात कहल गेल चै. अब अन्तिम अप पाचम्क्हन्द अनुवादक बहाशिक सुन्देर्यग उत्पाद्या माने आता का गोला जगा बनायल, विकार्या माने दूट से दही जगा बडल लेल, नहीं एक रा एना जगा चमकायल, वा कोनो गन्तव्य जगा प्राप्त कयल जासकाई तची. आर्थ ई, जे मोक्ष पहिलें से विद्यमान चै, ये कोनो नववस्तू नहीं चें, जक्रा हम सब कोनो काथ से प्राब्त करो. आब अन्तिम अप पाचम्क्हन्द, अनुवादक बाशिक सुन्देर्य. गजेंद्र ताकुरा की आदूनिक अतिहासिक काज वास्तव में प्रशन्सनी आच्छे. अपारिभाशिक शब्द सबग तक्नीकी शुद्द्था के तो उहिना सुरक्षित्रा क्लनी, मुदा शास्तरिय संस्क्रित कक जटिल दाश्निक समाज सबग के मैठ्लीक सहच भोल्चालक बाशा में बडल्दलनी. इकोनो चोट मुट काज नहीं चल इे एक ता बहुत पैग अपलप्दी चै. यानोवाद उच्छ ब्रम्मान्डय सिद्धान्त सबके, गाम गरक माटिक सुगंद से जोडी दिच्छै. उदारन लेल, ब्रम्हान्डय लीला लेल मुस्की. मूल प्रव्रुत्ती के दिखाई बलेल, हर्यर गास देक लगजाईप, अदेहे संबन्द लेल, अंद्राक श्रिंक्ला मानी, अंद परमपरा, संट हेट प्रयोग कलोगेल चे. इदर्षन के सीथा लोक संस्क्रती से जोड़े चे. विदेह यी जरनल दवारा प्रकाशित यी विषिष्ट संसकरन आदूनिक मेत्ली में दाशनिक गद्ध्ध्ध्ध लिखबाग एक ता एक दम नव मानक ताए करेजचे. यस पश्ट्रूब से देखावेद चे जे हम्रा लोकनिक मैठली भाशा कोनो भी गमभीर दर्षनिक विमर्ष के उठाभे में पोडदा सक्षम अची. अन्त में यी विष्लेशन हम्रा सब के एकता बहुत महत्वपुन विचार पर चोरी रहल चे के प्राचीन बध्धिक दरोहर के बच्टैबाक लेल उक्रा हम्रा लोकनिक रोज मर्रा का बाशाका गर्माहत मैं पुनर जनम लेवा आवश्षक चे. सोचु प्राचीन बध्धिक परमप्रा के जीवन्त रक्वाक इप्रयास निष्चित रूप से भ्हामती अनुवादक के आहु भेसी गराई से पड़िबाक लेल प्रेरिद करे चे. हम्रा लोकनीश जुरबाक लेल बहुत-भहुत द्ध्निवाद.