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न्यायकुसुमांजलि_की_मैथिली_में_बौद्धिक_घर_वापसी.m4a
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- 0:00–0:12ज़रा कलपना कीजे के किसी को, रहाजारो साल पुरानी गनित की अईसी किताप मिलती है, जिसके पन्ने पलप्ने पर उस में भीज गनित या रेक्ह गनित नहीं.
- 0:12–0:17रहाजा बनकी बहुत ही रूखे और तोस तरकों के फामिले लिख्वे मिलते है.
- 0:17–0:22बलकोड. और वो भी किस लिये? इश्वर के अस्तित्वो को साभट करने किलिये?
- 0:22–0:26मतलप, ये कुच आसा है ज़े से कोई विग्याने कपनी लबरेट्री में बैट्गर
- 0:26–0:30किसी मातमेतिकल एकवेश्टिन से इश्वर को सिद्द कर राउ.
- 0:30–0:36वही तो, आम तोर पर हम लोग यही सुचते हैं तार्क और विग्यान एक दिशा मे जाते हैं
- 0:36–0:40और जो श्रद्धाया बखती है, वो बलकल अलक दिशा मे जाते हैं
- 0:40–0:42आप, एक दम उल्ते रास्ते
- 0:42–0:45यही का, तार्क को हमेशा से दिमाक कविषे माना गया है
- 0:45–0:48अद्रादाना दाब पूरी तरा तूर्ट जाती है,
- 0:48–0:51जब हम भारत की प्राचीन गयान परमप्रा में उतरते हैं
- 0:51–0:54आप बलकी वो परम सत्य तक पहुट्टिए की अग्सीडी है
- 0:54–0:56और आज की इस गेहन चर्चा में,
- 0:56–0:59जब हम भारत की प्राचीन गयान प्रमप्रा में उतरते हैं
- 0:59–1:02आप बलकी वो परम सत्य तक पहुचने की एक सीटी है
- 1:02–1:07और आज की इस गेहन चर्चा में हम भिल्कुल आजी ही एक सीटी के बारे में बात करने वाले हैं
- 1:07–1:12इक आसे कलजाई गरन्त के रहस्से को सलजाने वाले हैं, जिसका नाम है नयाय कुसमाअजली.
- 1:12–1:18जो की गयारेमी सदी के महां दाशनिक उद्द्याना चार्या जीने संसक्रित मेरचा था.
- 1:18–1:19बिल्कुल!
- 1:19–1:22और इसके सात ही, हम बात करेंगे साल दोहाँजार चब्वीस में
- 1:22–1:25गजेंद्र ताकुर दवारा की एगे, इसके बिल्कुल नहीं
- 1:25–1:27मैठिली आनुवाद की.
- 1:27–1:29ये चर्चा दरसल विदेहा एप पत्रिका दवारा
- 1:29–1:33अद्रादवारा प्रकाशित यह बहुती विस्त्रित अर दिल्च्छः समिक्षापर आदारित है
- 1:33–1:38और हमारा मक्सध यहां सर्फ एक पुरानी किताप के पन्ने पलडटन नहीं है
- 1:38–1:39नहीं बलकुल नहीं
- 1:39–1:47हमें ये समजना है कि सद्यो पहले इश्वर को इन कडे तरकों की कसोटी पर कैसे परका गया था
- 1:47–1:53और सात ही इस भेहत जटल संसक्रित गरन्त का एक शित्रिये भाशा में
- 1:53–1:57यानी मेठिली में अनुवाद होना यान चर्फ एक भाशा इबडलाव क्यो नहीं है
- 1:57–2:03अज़े तरको रूपी फुलो की आंजली ये नव्यमाई दरशन का एक बहत्ट्वोपून गरन्त है जो की पाच स्टंबहों में बता हूँँः.
- 2:03–2:06वूर्वात ग्रन्त के नामसे करतें नियाय को समाश्टिली
- 2:07–2:09मदलप नाम सुन्ती कैसा लकता है
- 2:09–2:13जैसे किसी प्राचीन मंदिर में ज्यान के फुल च़़ाय जारहे हूं
- 2:13–2:16वही तो, और इसका शाभ्टिक अर्द भी एह येए
- 2:16–2:18तरको रुपी फुलो की आंजिली
- 2:18–2:25ये नव्यमाई दरशन का एक बहुत फिल्ट्वापून गरन्त है, जो की पाज च्तम्पको में बतावा है.
- 2:25–2:29च्तम्पक, यानी पूलो के गुछे, या आसान भाशा में कहें तो अद्ध्या है.
- 2:29–2:31आ, बद्या है.
- 2:32–2:35तो उदयाना चारिया मित्ला की दर्ती से दे,
- 2:35–2:40लेकिन उनका ये जियान ताना उसदियों तक स्व्संट्क्रिद जानने वाले
- 2:40–2:43उच्छ विद्वानो के भीची सिमट्ट कर रहे गया ता.
- 2:43–2:45वही सबसे बडी समस्या थी उसवक्त के.
- 2:45–2:48तो अप जो गजंद्र ताकूर नी ये मेठली अनुवात कीया है,
- 2:48–2:52उसे बोद्दिग गर वापसी कहागया है.
- 2:52–2:56अब अगर मैं इसको अपने नजरये से देखूँ,
- 2:56–2:57तो यह भिलकुल अच्ता है.
- 2:57–3:00जैसे किसी की कोई पुरानी चीज मिल गयो.
- 3:00–3:01आँआ.
- 3:01–3:04जैसे किसी महान वैग्याने की कोई पुरानी डायरी थी,
- 3:04–3:34तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 3:34–4:04अज तो थी अज तो थी बज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो �
- 4:04–4:08तो ये अनुवाद दर असल इन दोनों कषितिजों को मिला रहा है.
- 4:08–4:11और यानी एक हजार साल पुराना शास्त्राथ,
- 4:11–4:14सीदे आज के आदूनिक पाटक से बात कर रहा है?
- 4:14–4:18आप और वो भी उसी के आम भोल चाल की बाशा मे.
- 4:18–4:20ये सरफ शब्डो का अनुवाद नहीं है.
- 4:20–4:29यह समज का अटिहासेख संगम है, जहां गयान पेडा हूँआ, उसी मित्ला की दरती पर, उसी भाशा मे वो आम लोगो तक पहुच रा है.
- 4:29–4:33वाज़, यह तो सच में एक समारान्तर साइते आंदोलन जैसा लकता है,
- 4:33–4:38जो इन अकटमिक दीवारों को गिराकर, दर्षन को आमजन जीवन का हिस्सा बनारा है.
- 4:38–4:43बलकुल, और आपको पते उद्याना चारे का जो दर्षन समजाने का तरीका है ना,
- 4:43–5:13अब आप दिए बादा था नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो दछागा नहीं तो दछागा नहीं तो दछागा �
- 5:13–5:21एकतम सही, और समीक्शा में चार्वाका दर्शन के खन्दन का एक बहुत लगास्या स्पक और सतीक उदारन दिया गया है.
- 5:21–5:27औह, हाँ चार्वाका दर्शन. इनका तो मुल सिद्दानती यही है एना कि जो आखो से दिकता है,
- 5:27–5:33यानी जो प्रत्यक्ष है, बस वही सच है, बाखी अनुमान या लोगिक को तो वो मानते हैं।
- 5:33–5:38बिल्कुल, तो अब उदैना चार्या इस पर कैसे प्रहार करते है, ये जरा सुनी है।
- 5:38–5:44अगर चार्वा का दर्शन को माननेवाला कोई आद्मी अपने गर से बहार जाता है
- 5:44–5:48तो क्या उसके परिवार को ये मान लेना चाहीए क्योसका अस्तित्वी खतम हो गया
- 5:48–5:52वही तो क्योकि अई आद्मी अप उनकी आखों के सामने नहीं प्रत्यक्ष नहीं
- 5:52–6:22अग तो बज़ा था था था तो बज़ा था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था �
- 6:22–6:27इसे दर्षन की बाशा मे वियवहारिक आत्मविरोद कहते हैं.
- 6:27–6:30अद्द्याना चारिक आत्मविरोद कहते हैं
- 6:30–7:00अब प्रक्तिकल स्व्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 7:00–7:06उद्याना चार्या यहां किसी को च्डाने किले बहस नहीं कर रहे हैं
- 7:06–7:09उनका अंतिम लक्ष्य कुछ औरी है
- 7:09–7:14और इसी से उस बात का जवाब भी मिलता है, जो अपके दिमाग में चल रही होगी
- 7:14–7:16और आपने मेरे मन की बाट चीन लिए
- 7:16–7:21मेरे मन में यही सवाल आरा था की एक तरफ तो आप यतने तीखे और रुखे तरग दे रहें
- 7:21–7:27और दूस्री तरव कहा जाता है की इस गरन्त का अंतिम लक्ष, शान्त्रस या भकती की प्राप्ती है
- 7:27–7:30तो आप दोनो बाते विरोदा भासी लकती है नहीं
- 7:30–7:32वही तो यह दो बलकल उल्ती बाते हो ग़ा हो ग़ा हो ग़ा है?
- 7:32–7:36मलग़ युध्ध के मेडान में भला किसी को शानती कैसे मिल सकती है?
- 7:36–7:39इसका उतर एक और बहुत बडे विचारक
- 7:40–7:45मिक्हाल बक्तिन के बहुस्वरता यानी पौलिफिनी के सिदान्त में चिपा है
- 7:45–7:50इसे आप एक संगीट समूहा या एक कोयर की तरह समच्च्चीए
- 7:50–7:53आच्छा जाँ अलग अलग आवाजे एक साथ आती है
- 7:53–8:00आप एक महान ग्रन्त वो होता है जाँ अलग अलग आवाजे एक साथ गुईचती है
- 8:00–8:05उदयान चार्या यहां अपने विरोदियों की आवाज को दबाते नहीं है
- 8:05–8:10बलकी वो रर विरोदिय स्वर को पूरी शकती से गूँजने देते हैं
- 8:10–8:13बढ़लब उने पूरा मोका देते है है अपनी बात रक्नेगा
- 8:13–8:14बिल्कुल
- 8:14–8:17और जब मन में उपने अपने हर सन्दे
- 8:17–8:20अगर विरोदी तरक को सुन लिया जाता है
- 8:20–8:24अफिर लोगिक से उसका समथान कर दिया जाता है, तब क्या हुता है?
- 8:24–8:25तब दिमाग में कोई शोर नी बष्टा?
- 8:25–8:26वगी.
- 8:26–8:29और जब सारे सवालों के जवाब मिल जाते हैं,
- 8:29–8:32तो जो एक शून्यता और सबष्टता आती है,
- 8:32–8:33वही शानती है.
- 8:33–8:33वाए.
- 8:34–8:36इनी सबही शंकाओं के मिट जाने पर
- 8:36–8:38जो बादिक शानती मिलती है
- 8:38–8:40वही इस गरन्त का अस्ली शानत्रस है.
- 8:40–8:41हा.
- 8:41–8:43तर्क यहां कोई मन्जिल नहीं है.
- 8:43–8:45तर्क बस वो जाडू है
- 8:45–8:48जो दिमाक के जालों को साफ करता है.
- 8:48–8:49आप यह वाग,
- 8:49–8:50क्या बाद कही आपने अग?
- 8:50–8:54और उस सफाई के बाज जो निर्मल मन बच्छता है नहीं से आगे चल कर भक्ती का जन मोथा है.
- 8:54–8:58ये सच में एक बहुत इग फुप सुरत विचार है.
- 8:58–8:59लेकिन...
- 8:59–9:00लेकिन क्या?
- 9:00–9:30अग, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आ, आँ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ,
- 9:30–9:33ताजी और लोकल अस्तमाल करनी है ताकी आजके लोग उसे आसानी से पचाँ सकें?
- 9:33–9:37उंआपकी ये शेझट्फाली बात कापी हद तक ठीक हैं.
- 9:37–9:41लेकिन अनुवाद की दुन्या मैंना एक बहुत बडी चुनाती होती है.
- 9:41–9:46अगर आप ज़रूरत से जाडा ताजी और लोकल सबज्या अस्तमाल कर लेंगे,
- 9:46–9:49तो वो पक्वान अपने आपिहासेक आत्माही कोडेगा.
- 9:49–9:52अच्छ? मतलव उएक दमी नहीं नहीं और मोडन बन जागा?
- 9:52–9:57अप्षी करन और देशी करन यानी फोरिनाइशेशन और दोमेस्टिकेशन
- 9:57–10:01तो गजेंद्र ताकूर जी ने इस मेठिली अनुवाद में कैसा बलंस बनाया है?
- 10:01–10:05यहां वो दूरलब मसाले कोंसे हैं जिने उनहुने नहीं बढ़ला?
- 10:05–10:09वो दूर्लप मसाले है न्याए दर्षन के बारी तकनी की शब्द
- 10:09–10:13जैसे व्याप्ती समवःए और उपादेई
- 10:13–10:17गजेंदरजी ने इन संसक्रिच शब्दों को मेठिली में भिल्कुल वैसा ही रख्खा है
- 10:17–10:19इसी को विदेशी करन कहते हैं
- 10:19–10:49ताकी पशनेवाले को यह अजास होता रहे कि वो गरीमा माए और प्राचीन शास्ट्र पद रहा है आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ
- 10:49–11:19तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 11:19–11:20अग, उपादी.
- 11:20–11:21अग, उपादी.
- 11:21–11:25ये दरसल वो चिपी हूए शर्थ या कारन है,
- 11:25–11:28जो किसी गटना के लिए जिम्मेडार तो होती है,
- 11:28–11:30पर सामने से दिकती नहीं है.
- 11:30–11:33तोड़ा उलज गया मैं, फोड़ा और आसान करेंगी असको.
- 11:33–11:34जरुर.
- 11:34–11:39दूवा तब निकलता है, जब आग किसी गीली लक्डी में लगी हो.
- 11:39–11:45तो यहाप पर वो गीली लक्डी एक उपादी है, अनुवादक नी इन मूल शब्डो को तो बचाकर रखा.
- 11:45–11:52तो यहां पर वो गीली लक्डी एक उपादी है, अनुवादक नी इन मूल शब्डो को तो बचाकर रखा.
- 11:52–11:57लेकिं जब इने समजाने की बारी आई आई, तो नों बिलकल थेट देसाए शब्डो का इस्तमाल किया.
- 11:57–12:00यहनी मेरी वाली वो ताजी लोकल सबज्या.
- 12:00–12:01राग.
- 12:01–12:04समिक्षा में इसके कापी मजदार उदारन भी थे
- 12:04–12:07जैसे किसी असमबज़्व चीस को समजाने के लिए
- 12:07–12:11करहा किसिंग, यहनी खरगोष किसिंग का मुहावरा
- 12:11–12:14आँ और किसी भेटु की बात को दिखाने के लिए
- 12:14–12:18गगगा में गोत, यानी गगगा नदी में गोवर के उपले तेरने की बात कहना.
- 12:18–12:20ये होती है असली देशी करन की कला.
- 12:20–12:21बलकल.
- 12:21–12:23पाटक तुरन तिस मुद्दे से जुड जाता है.
- 12:23–12:24बलकल.
- 12:24–12:27पर देखे अनुवाद चाए कितना भी बहतरीन क्यों नहो,
- 12:27–12:32जब किसी गंबीर किताप की समिक्षा हुती है, तो कुछ कमया भी निकल कर आती है।
- 12:32–12:40आह, समिक्षा में बहुती त्रोस आलोषन दी, वर्तमान अदुवाद से, मूल संसक्रिद श्लोको का गया बोना, जिने एक कारे क्या है कहा जाता है।
- 12:40–12:42अगर मूल श्लोक ही नहीं हूंगे
- 12:42–12:44तो कोई रीशाच़र या विद्वान
- 12:44–12:46ये कैसे च्छ करेगा के कहाँ आर्ठ बडला गया और कहाँ नहीं
- 12:46–12:48एक दम सही सवाल
- 12:48–12:50आम पाटक के लिए तो ये अनुवाद बडलिया है
- 12:50–12:52कि उसे तरक समज आरहे है
- 12:52–12:56यह के अद्वान यह के से च्वट करेगा के कहाँ आप बडला गया और कहानी
- 12:56–12:57एक दम सही सवाल
- 12:58–13:02आम पाटख के लिए तो यह अनुवाद बड़ीया है क्यों कि उसे तर्ख समजा रहे है
- 13:02–13:05लिकिन अकडेमिक वालेडिटी के लिए तो मूल श्लोक बहुत जरूरी है ना
- 13:05–13:06वही तो.
- 13:06–13:09इसी वज्यासे सम्मिक्षक ने एक बहुती प्रक्तिकल सुजाव दिया है.
- 13:09–13:15उन्होंने कहा है कि बहुविष्छे में इसका एक आलुच नात्मक संसकरन,
- 13:15–13:17यानी क्रितिकल इडिशन आना चाहीए.
- 13:17–13:18जिसके चार्स्तर हो.
- 13:18–13:19चार्स्तर?
- 13:19–13:24अग, पहला मुल संट्स्क्रित श्लोक, दुस्रा उनका शाभ्दिक अनुवाद,
- 13:24–13:28तीस्रा विस्त्रित व्याख्या, और चोथा संपाद किये टिप्पनी.
- 13:28–13:32इस दो बहुती बडिया सुजाव है, इस से हर तरांके पाटख का असान जाएगा.
- 13:32–13:37तो चली अब उस हिसे के तरव चलते हैं, जिसके लिए उद्याना चारिया सब से जाने जाते हैं.
- 13:37–13:39यानी ग्रन्त का पाच्वा स्तमबक.
- 13:39–13:40भिल्कुल.
- 13:40–13:44जहां इश्वर के अस्तितव के आथ अकात्ते प्रमान दिये गये हैं.
- 13:44–13:48मैं चाता हूं के हम इन में से कुछ खास तरकों को तुरा और गेराइ से समजें.
- 13:48–13:52समिक्षा में जो सब से पहला तरक ता बो है कारिएत.
- 13:52–13:55इसका सीथा सा आर्थ लकता है कि कुछी ये ब्रमान्डे कारे है,
- 13:55–14:25यह आप यह अप अज़ाना चारे है, यह अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप �
- 14:25–14:27अगर बाद की जबाब में उद्यानाचारे कहते हैं,
- 14:27–14:31कि ब्रमाड़ की हर चीज चाई वो बड़ब़े पहाड हों,
- 14:31–14:34गरहे हों, या खुद हमारा शरीर हों,
- 14:34–14:36ये सब साव्यव है,
- 14:36–14:39यानी ये चोटे-चोटे हिस्सों से मिलकर बने है.
- 14:39–14:40अप रव बाद बाद बने है.
- 14:40–14:46बिल्कोल और उनका लोजिक यह गे जिस भी चीज में एक स्पैसटिक अरेंजमिंट होता है,
- 14:46–14:50एक विषिष्ट सन्रच्ना होती है, वो अपने आप नहीं जोर सकती.
- 14:50–14:57एक आंदा या अर्चेतन पदार्त कुद को एक इतने जतिल और निंआमबद ब्रम्मान्ड में
- 14:57–14:59विववस्तित नहीं कर सकता
- 14:59–15:01इसके लिए किसी ना किसी
- 15:01–15:03सचेतन, ग्यानवान, रचीता की
- 15:03–15:05जरुरत तो पडेगी ही
- 15:05–15:09अगर ब्रम्मान्द पर्मानूं से यानी आटम से बना है
- 15:09–15:13तो व्ड़ पर्मानूं होड अपस में जुडकर चीजे ने बना सकते
- 15:13–15:15शाएद यही पर उनका दुस्रतर काता है
- 15:15–15:16आयोजन
- 15:16–15:20आयोजन यानी पर्मानूं का प्रारमबिख सैएजन
- 15:20–15:27इसे एक चोटे से उदारन से समचते है, मान लीजे आप के पास एक दिबभे में लेगो के चोटे-चोटे तुक्डे हैं.
- 15:27–15:28तीक है.
- 15:28–15:31आप मान लीजे कि ये तुक्डे परमानू हैं.
- 15:31–15:33अगर आप उस दिबभे को बस एसे हिलाते रहें,
- 15:33–15:37तो थो तुक्डे आप जुडकर एक शान्दार महल बनाल लेंगे?
- 15:37–15:38आप बलकल नहीं
- 15:38–15:40वो तो बस आपस में तक्रा कर अवास करेंगे
- 15:40–15:42उने महल का अकार देने के लिए
- 15:42–15:45किसी अन्सान के हात हों और उसके दिमाक की जरत होगी है?
- 15:45–16:15अगर देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना द
- 16:15–16:17अगर नहीं ताई नहीं कर सकता.
- 16:17–16:19वाए ये सच्छ में दिमाक को लिए लोगेक है.
- 16:19–16:24लिक ने कोर तरक तरक ताई जिस ने मुझे सबसे जाडा सोचने पर मुझवूर किया.
- 16:24–16:29वो ता पदात यानी बाशा और शब्दों क्यो तरक.
- 16:29–16:34आप ये उनके सबसे औरजनल और सबसे गेरे तरको में से एक है.
- 16:34–16:37जर ज़ा सोचिए है, हम भाशा कैसे सीकते है.
- 16:37–16:41एक चोटा बच्च्चा किसी शब्ट का मतलप कैसे जानता है.
- 16:41–16:42जाहिर सी बात है.
- 16:42–16:45उसके माता पिता है, या कोई बड़ा सदस से उसे सीकता है,
- 16:45–16:47कि बिटा ये सेब है, ये पानी है?
- 16:47–16:50वैं ना, बच्चा अपने बड़ो से सीकता है,
- 16:50–16:52बड़े अपने बड़ो से सीकते है.
- 16:52–16:58लेकिन अगर हम इस चेन में, इस श्रिंखला में पीचे जाते जाए जाते जाए,
- 16:58–17:01तो मानव सब़ियता की श्रूवात में,
- 17:01–17:06उपहला इन्सान कों ता? उने उन शब्डो का अर्थ किसने सिखाया?
- 17:06–17:13किसी दूनी और किसी वस्तू के बीच का संबबन्त, सबसे पहले किसने स्तापित किया?
- 17:13–17:18अगर बाशा एक समाजिक समजोता है, एक कनवेंचन है,
- 17:18–17:22तो उस कनवेंशन को शुरू करनेवाला, स्थाट करनेवाला कोई ना कोई तो हुना चीए?
- 17:22–17:25यही उदेयाना चार्या का पदार्थ का तर्क है.
- 17:25–17:30बाशा के उस पहले शिक्षक को, जिसने शब्दो में अर्ठ डाला और पहला गयान दिया,
- 17:30–17:33उसे ही उद्याना चार्यने इश्वर कहा है
- 17:33–17:35बहुती जबर्दस्त
- 17:35–17:37इसके लावा एक और बहुत मस्बुत तर्क है
- 17:37–17:38द्रित्यादे
- 17:38–17:41यानी ब्रम्मांट के दारन और पोषन का तर्क
- 17:41–17:44अब ब्रम्मांट के वल बना के चोडनी दिया गया है
- 17:44–17:46मतलव उसे चलाना भी पड़ता है.
- 17:46–17:47भिलकुल.
- 17:47–17:50जैसे हवामे लटके हुए किसी बहारी पट्धर को
- 17:50–17:53गुरुत्वा कर्षन के खिलाफ
- 17:53–17:54तामे रकने के लिए
- 17:54–17:56किसी शकती की जरूरत होती है ना
- 17:56–17:59वैसे ही इस विशाल ब्रम्मान्द को
- 17:59–18:00नश्थोने से बचाने
- 18:00–18:04अर तामे रक्ने के लिए एक दारक की आविशकता है
- 18:04–18:07जब मैं तरकों को सुन्ता हूँन तो मुझे पश्च्च्मी दर्षन के
- 18:07–18:09बड़बड़े विचारकों की आदाती है
- 18:09–18:12जैसे तोमस एक विनस या विल्यम पेली
- 18:12–18:14उनो ने भी तो करीब-करी भी यही लोगिक दिए थे
- 18:14–18:19अपकी ये तुलना बिलकुल सही है, अख्वीनस का जो कोसमोलोगिकल आर्ग्युमेंट था,
- 18:19–18:22कि हर चीस का एक प्रथम कारन हो ना चाही है,
- 18:22–18:27वो उदायाना चारे के कारयात और आयोजना तरक से बहुत मिलता जलता है.
- 18:27–18:31अर विल्यम पेली का वो मशहुर वाच्मेकर अनालेजी
- 18:31–18:34आपको अपको सड़क पर एग गड़ी पडी मिले,
- 18:34–18:38तो आप मान लिंगे कि इसे किसी गड़ी साज नहीं बनाया होगा.
- 18:38–18:42वो भी उदयाना चारे के सन्रचना वाले तरकों जैसा ही है.
- 18:42–18:46लेकिन, यहां सब से हिरान करने वाली बात क्या है पता है?
- 18:46–18:49इंका तामलाई न, यह खल पहले तो अथारोई सदी में हुए,
- 18:49–18:51और अख्वाईनस तेरोई सदी में.
- 18:51–18:55जबकी, उद्याना चार्या ग्यारोई सदी में ही,
- 18:55–18:56मितला की दरती पर बैटकर,
- 18:56–18:57इनहीं सवालों के,
- 18:57–19:01कही अदिक परश्क्रित और तरकीक जवाब दे चुके ते
- 19:01–19:03ये को चुटी मुटी बात नहीं?
- 19:03–19:06आप, ये हमारी विचारिक परमपरा की ताकत है
- 19:06–19:10लेकिन मेरे मन में एक वेवाहारिक सवाल अभी भी गूम रहा है
- 19:10–19:11पुच्छे
- 19:11–19:13आजके यस आदूनिक युग में
- 19:13–19:16ज़हां विग्यान ने इतनी तरकी कर लिए हम ने A.I बना लिया है,
- 19:17–19:22तो किसी आम अँँन्सान को एक हाँजार साल पुराने यं कडे तरकों को समझने की क्या जुर्वात है?
- 19:23–19:25इस से हमारी आजकी जिन्दगी भी क्या फरक पडने वाला है?
- 19:25–19:28देखे इसका हमारी रोज मरहा की जिन्धगी
- 19:28–19:31और हमारी सोचने की प्रक्रिया
- 19:31–19:34उस प्रोसेस से पहुट गहरा कनेक्षिन है
- 19:34–19:38इस गरन्त और इसके अनुवाद को पडने से
- 19:38–19:41हमें बहुट जरूरी स्किल सीकते हैं
- 19:41–19:42न्द, कुन्सी स्किल?
- 19:42–20:12विप्रीत विचारों का तारकिक परीक्ष्यन यानी काूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 20:12–20:15अद्यानाचारिया हमे थीक यही देर्या सिक हाते है,
- 20:15–20:21वो बताते है किसी भी विषेय या किसी भी माननिता को गेराई से समजने किलिए,
- 20:21–20:25अपने विरोदियों के विचारों को पूरी तरा सुन्ना परता है.
- 20:25–20:27और फिर लोगिकल तरीके से अने परक्ना भी जरूगी है.
- 20:27–20:57अगर अज भी बग़ाई की ज़़चा का सार निकालें, तो एक बात तो भी शिषे की तो देखाएं ज़ाई तो बग़ाई नाई बागा नाई प्रट़्ाई तो बग़ाई प्रट़्ाई प्रट़्ाई तो बग़ाई प्रट़्ाई प्रट़्ाई प्रट़्ाई प्रट़्ा
- 20:57–21:01यह ग़े तरे साफ जातीए के गेरा दरशन यह कथिन तरक और शास्ट्रार्थ
- 21:01–21:04यह सब केवल संसक्रित के अकटमिक कमरों
- 21:04–21:07यह कुछ मुट्टिबर विद्वानो की जागीर नहीं
- 21:07–21:10बिलकल नहीं, जब यस तरा के गुड यान को
- 21:10–21:13जियान को आम भोल्चाल की छेट्री अबहाशाशा में उतारा जाता है,
- 21:13–21:16जैसे यहा मेठिली में उतारा गया है,
- 21:16–21:20तो यह जियान का सच्चा लोक तन्त्री करन बन जाता है.
- 21:20–21:22दमक्रताइशेशन हो जाता है.
- 21:22–21:24गजेंद्र ताकृर जी का यह जो अनुवाद है,
- 21:24–21:27यह साभद करता है के अगर भारी दरशन को थीग भाशा
- 21:27–21:30और स्थानिये मुहावरों के साथ पेश की आजाईना
- 21:30–21:33तो वो किसी भी आम पाटक की सोच को दिशा दे सकता है
- 21:33–21:38और यह यह जबात का भी प्रमान है कि हमारी खषेट्री अ भाशाँमे
- 21:38–21:40कितनी गेराई और कितना समरत है,
- 21:40–21:44वो इतने कडे लोगिक कबार उठा सकती है,
- 21:44–21:47और वो भी अपनी मिठास और दे सचपन खोई बिना,
- 21:47–21:49जैसे समएखषक नी शुरू में कहाता,
- 21:49–21:51ये बोद्धिक गर वापसी के लगे किताब की नहीं है.
- 21:51–21:52तो फिर किस की है?
- 21:52–21:58ये उस पूरी महान परमपरा की वापसी है जो विचार विमः और तर्क परादारी थी
- 21:58–22:02और जो कभी हमारे समाज का एक बहुत एहम हिस्सा हूँए करती ती
- 22:02–22:06बहुत खुब और इस विशे की इतनी गेराए में उतरने के बाद
- 22:06–22:09मैं सबी विचारों को यही समेटते वे
- 22:09–22:11बस एक उकसानेवाला विचार चोडकर जाना चाता हूं
- 22:11–22:12जरुर
- 22:12–22:17हमने शुवात में सुचा ताना की तरके क्रूकी मशीन जिसका बहावनाउसे कोई लेना देना नहीं
- 22:17–22:20लेकन उदे आना चारे ने उसी तरके के विचार के जर्ये
- 22:36–22:42बुरानी लिपियों और उन्ताड पत्रों में आभी आईसे और कितने अनुधित गरन्त दूल फाख रहुंगे.
- 22:42–22:47आईसे खजाने जो शाएद दुन्या के सुचने का नजर्या ही पूरी तरा बडल दे.
- 22:47–22:48वही तो?
- 22:48–22:49बस सवाल यह एक के
- 22:49–22:51क्या हम और हमारा समाज
- 22:51–22:52उस खजाने को खोजने
- 22:52–22:54और समजने के लिए वाखी तेयार है?
Plain text
ज़रा कलपना कीजे के किसी को, रहाजारो साल पुरानी गनित की अईसी किताप मिलती है, जिसके पन्ने पलप्ने पर उस में भीज गनित या रेक्ह गनित नहीं. रहाजा बनकी बहुत ही रूखे और तोस तरकों के फामिले लिख्वे मिलते है. बलकोड. और वो भी किस लिये? इश्वर के अस्तित्वो को साभट करने किलिये? मतलप, ये कुच आसा है ज़े से कोई विग्याने कपनी लबरेट्री में बैट्गर किसी मातमेतिकल एकवेश्टिन से इश्वर को सिद्द कर राउ. वही तो, आम तोर पर हम लोग यही सुचते हैं तार्क और विग्यान एक दिशा मे जाते हैं और जो श्रद्धाया बखती है, वो बलकल अलक दिशा मे जाते हैं आप, एक दम उल्ते रास्ते यही का, तार्क को हमेशा से दिमाक कविषे माना गया है अद्रादाना दाब पूरी तरा तूर्ट जाती है, जब हम भारत की प्राचीन गयान परमप्रा में उतरते हैं आप बलकी वो परम सत्य तक पहुट्टिए की अग्सीडी है और आज की इस गेहन चर्चा में, जब हम भारत की प्राचीन गयान प्रमप्रा में उतरते हैं आप बलकी वो परम सत्य तक पहुचने की एक सीटी है और आज की इस गेहन चर्चा में हम भिल्कुल आजी ही एक सीटी के बारे में बात करने वाले हैं इक आसे कलजाई गरन्त के रहस्से को सलजाने वाले हैं, जिसका नाम है नयाय कुसमाअजली. जो की गयारेमी सदी के महां दाशनिक उद्द्याना चार्या जीने संसक्रित मेरचा था. बिल्कुल! और इसके सात ही, हम बात करेंगे साल दोहाँजार चब्वीस में गजेंद्र ताकुर दवारा की एगे, इसके बिल्कुल नहीं मैठिली आनुवाद की. ये चर्चा दरसल विदेहा एप पत्रिका दवारा अद्रादवारा प्रकाशित यह बहुती विस्त्रित अर दिल्च्छः समिक्षापर आदारित है और हमारा मक्सध यहां सर्फ एक पुरानी किताप के पन्ने पलडटन नहीं है नहीं बलकुल नहीं हमें ये समजना है कि सद्यो पहले इश्वर को इन कडे तरकों की कसोटी पर कैसे परका गया था और सात ही इस भेहत जटल संसक्रित गरन्त का एक शित्रिये भाशा में यानी मेठिली में अनुवाद होना यान चर्फ एक भाशा इबडलाव क्यो नहीं है अज़े तरको रूपी फुलो की आंजली ये नव्यमाई दरशन का एक बहत्ट्वोपून गरन्त है जो की पाच स्टंबहों में बता हूँँः. वूर्वात ग्रन्त के नामसे करतें नियाय को समाश्टिली मदलप नाम सुन्ती कैसा लकता है जैसे किसी प्राचीन मंदिर में ज्यान के फुल च़़ाय जारहे हूं वही तो, और इसका शाभ्टिक अर्द भी एह येए तरको रुपी फुलो की आंजिली ये नव्यमाई दरशन का एक बहुत फिल्ट्वापून गरन्त है, जो की पाज च्तम्पको में बतावा है. च्तम्पक, यानी पूलो के गुछे, या आसान भाशा में कहें तो अद्ध्या है. आ, बद्या है. तो उदयाना चारिया मित्ला की दर्ती से दे, लेकिन उनका ये जियान ताना उसदियों तक स्व्संट्क्रिद जानने वाले उच्छ विद्वानो के भीची सिमट्ट कर रहे गया ता. वही सबसे बडी समस्या थी उसवक्त के. तो अप जो गजंद्र ताकूर नी ये मेठली अनुवात कीया है, उसे बोद्दिग गर वापसी कहागया है. अब अगर मैं इसको अपने नजरये से देखूँ, तो यह भिलकुल अच्ता है. जैसे किसी की कोई पुरानी चीज मिल गयो. आँआ. जैसे किसी महान वैग्याने की कोई पुरानी डायरी थी, तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � अज तो थी अज तो थी बज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो � तो ये अनुवाद दर असल इन दोनों कषितिजों को मिला रहा है. और यानी एक हजार साल पुराना शास्त्राथ, सीदे आज के आदूनिक पाटक से बात कर रहा है? आप और वो भी उसी के आम भोल चाल की बाशा मे. ये सरफ शब्डो का अनुवाद नहीं है. यह समज का अटिहासेख संगम है, जहां गयान पेडा हूँआ, उसी मित्ला की दरती पर, उसी भाशा मे वो आम लोगो तक पहुच रा है. वाज़, यह तो सच में एक समारान्तर साइते आंदोलन जैसा लकता है, जो इन अकटमिक दीवारों को गिराकर, दर्षन को आमजन जीवन का हिस्सा बनारा है. बलकुल, और आपको पते उद्याना चारे का जो दर्षन समजाने का तरीका है ना, अब आप दिए बादा था नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो बद्छागा नहीं तो दछागा नहीं तो दछागा नहीं तो दछागा � एकतम सही, और समीक्शा में चार्वाका दर्शन के खन्दन का एक बहुत लगास्या स्पक और सतीक उदारन दिया गया है. औह, हाँ चार्वाका दर्शन. इनका तो मुल सिद्दानती यही है एना कि जो आखो से दिकता है, यानी जो प्रत्यक्ष है, बस वही सच है, बाखी अनुमान या लोगिक को तो वो मानते हैं। बिल्कुल, तो अब उदैना चार्या इस पर कैसे प्रहार करते है, ये जरा सुनी है। अगर चार्वा का दर्शन को माननेवाला कोई आद्मी अपने गर से बहार जाता है तो क्या उसके परिवार को ये मान लेना चाहीए क्योसका अस्तित्वी खतम हो गया वही तो क्योकि अई आद्मी अप उनकी आखों के सामने नहीं प्रत्यक्ष नहीं अग तो बज़ा था था था तो बज़ा था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था � इसे दर्षन की बाशा मे वियवहारिक आत्मविरोद कहते हैं. अद्द्याना चारिक आत्मविरोद कहते हैं अब प्रक्तिकल स्व्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् उद्याना चार्या यहां किसी को च्डाने किले बहस नहीं कर रहे हैं उनका अंतिम लक्ष्य कुछ औरी है और इसी से उस बात का जवाब भी मिलता है, जो अपके दिमाग में चल रही होगी और आपने मेरे मन की बाट चीन लिए मेरे मन में यही सवाल आरा था की एक तरफ तो आप यतने तीखे और रुखे तरग दे रहें और दूस्री तरव कहा जाता है की इस गरन्त का अंतिम लक्ष, शान्त्रस या भकती की प्राप्ती है तो आप दोनो बाते विरोदा भासी लकती है नहीं वही तो यह दो बलकल उल्ती बाते हो ग़ा हो ग़ा हो ग़ा है? मलग़ युध्ध के मेडान में भला किसी को शानती कैसे मिल सकती है? इसका उतर एक और बहुत बडे विचारक मिक्हाल बक्तिन के बहुस्वरता यानी पौलिफिनी के सिदान्त में चिपा है इसे आप एक संगीट समूहा या एक कोयर की तरह समच्च्चीए आच्छा जाँ अलग अलग आवाजे एक साथ आती है आप एक महान ग्रन्त वो होता है जाँ अलग अलग आवाजे एक साथ गुईचती है उदयान चार्या यहां अपने विरोदियों की आवाज को दबाते नहीं है बलकी वो रर विरोदिय स्वर को पूरी शकती से गूँजने देते हैं बढ़लब उने पूरा मोका देते है है अपनी बात रक्नेगा बिल्कुल और जब मन में उपने अपने हर सन्दे अगर विरोदी तरक को सुन लिया जाता है अफिर लोगिक से उसका समथान कर दिया जाता है, तब क्या हुता है? तब दिमाग में कोई शोर नी बष्टा? वगी. और जब सारे सवालों के जवाब मिल जाते हैं, तो जो एक शून्यता और सबष्टता आती है, वही शानती है. वाए. इनी सबही शंकाओं के मिट जाने पर जो बादिक शानती मिलती है वही इस गरन्त का अस्ली शानत्रस है. हा. तर्क यहां कोई मन्जिल नहीं है. तर्क बस वो जाडू है जो दिमाक के जालों को साफ करता है. आप यह वाग, क्या बाद कही आपने अग? और उस सफाई के बाज जो निर्मल मन बच्छता है नहीं से आगे चल कर भक्ती का जन मोथा है. ये सच में एक बहुत इग फुप सुरत विचार है. लेकिन... लेकिन क्या? अग, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आँ, आ, आँ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, आ, ताजी और लोकल अस्तमाल करनी है ताकी आजके लोग उसे आसानी से पचाँ सकें? उंआपकी ये शेझट्फाली बात कापी हद तक ठीक हैं. लेकिन अनुवाद की दुन्या मैंना एक बहुत बडी चुनाती होती है. अगर आप ज़रूरत से जाडा ताजी और लोकल सबज्या अस्तमाल कर लेंगे, तो वो पक्वान अपने आपिहासेक आत्माही कोडेगा. अच्छ? मतलव उएक दमी नहीं नहीं और मोडन बन जागा? अप्षी करन और देशी करन यानी फोरिनाइशेशन और दोमेस्टिकेशन तो गजेंद्र ताकूर जी ने इस मेठिली अनुवाद में कैसा बलंस बनाया है? यहां वो दूरलब मसाले कोंसे हैं जिने उनहुने नहीं बढ़ला? वो दूर्लप मसाले है न्याए दर्षन के बारी तकनी की शब्द जैसे व्याप्ती समवःए और उपादेई गजेंदरजी ने इन संसक्रिच शब्दों को मेठिली में भिल्कुल वैसा ही रख्खा है इसी को विदेशी करन कहते हैं ताकी पशनेवाले को यह अजास होता रहे कि वो गरीमा माए और प्राचीन शास्ट्र पद रहा है आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � अग, उपादी. अग, उपादी. ये दरसल वो चिपी हूए शर्थ या कारन है, जो किसी गटना के लिए जिम्मेडार तो होती है, पर सामने से दिकती नहीं है. तोड़ा उलज गया मैं, फोड़ा और आसान करेंगी असको. जरुर. दूवा तब निकलता है, जब आग किसी गीली लक्डी में लगी हो. तो यहाप पर वो गीली लक्डी एक उपादी है, अनुवादक नी इन मूल शब्डो को तो बचाकर रखा. तो यहां पर वो गीली लक्डी एक उपादी है, अनुवादक नी इन मूल शब्डो को तो बचाकर रखा. लेकिं जब इने समजाने की बारी आई आई, तो नों बिलकल थेट देसाए शब्डो का इस्तमाल किया. यहनी मेरी वाली वो ताजी लोकल सबज्या. राग. समिक्षा में इसके कापी मजदार उदारन भी थे जैसे किसी असमबज़्व चीस को समजाने के लिए करहा किसिंग, यहनी खरगोष किसिंग का मुहावरा आँ और किसी भेटु की बात को दिखाने के लिए गगगा में गोत, यानी गगगा नदी में गोवर के उपले तेरने की बात कहना. ये होती है असली देशी करन की कला. बलकल. पाटक तुरन तिस मुद्दे से जुड जाता है. बलकल. पर देखे अनुवाद चाए कितना भी बहतरीन क्यों नहो, जब किसी गंबीर किताप की समिक्षा हुती है, तो कुछ कमया भी निकल कर आती है। आह, समिक्षा में बहुती त्रोस आलोषन दी, वर्तमान अदुवाद से, मूल संसक्रिद श्लोको का गया बोना, जिने एक कारे क्या है कहा जाता है। अगर मूल श्लोक ही नहीं हूंगे तो कोई रीशाच़र या विद्वान ये कैसे च्छ करेगा के कहाँ आर्ठ बडला गया और कहाँ नहीं एक दम सही सवाल आम पाटक के लिए तो ये अनुवाद बडलिया है कि उसे तरक समज आरहे है यह के अद्वान यह के से च्वट करेगा के कहाँ आप बडला गया और कहानी एक दम सही सवाल आम पाटख के लिए तो यह अनुवाद बड़ीया है क्यों कि उसे तर्ख समजा रहे है लिकिन अकडेमिक वालेडिटी के लिए तो मूल श्लोक बहुत जरूरी है ना वही तो. इसी वज्यासे सम्मिक्षक ने एक बहुती प्रक्तिकल सुजाव दिया है. उन्होंने कहा है कि बहुविष्छे में इसका एक आलुच नात्मक संसकरन, यानी क्रितिकल इडिशन आना चाहीए. जिसके चार्स्तर हो. चार्स्तर? अग, पहला मुल संट्स्क्रित श्लोक, दुस्रा उनका शाभ्दिक अनुवाद, तीस्रा विस्त्रित व्याख्या, और चोथा संपाद किये टिप्पनी. इस दो बहुती बडिया सुजाव है, इस से हर तरांके पाटख का असान जाएगा. तो चली अब उस हिसे के तरव चलते हैं, जिसके लिए उद्याना चारिया सब से जाने जाते हैं. यानी ग्रन्त का पाच्वा स्तमबक. भिल्कुल. जहां इश्वर के अस्तितव के आथ अकात्ते प्रमान दिये गये हैं. मैं चाता हूं के हम इन में से कुछ खास तरकों को तुरा और गेराइ से समजें. समिक्षा में जो सब से पहला तरक ता बो है कारिएत. इसका सीथा सा आर्थ लकता है कि कुछी ये ब्रमान्डे कारे है, यह आप यह अप अज़ाना चारे है, यह अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप � अगर बाद की जबाब में उद्यानाचारे कहते हैं, कि ब्रमाड़ की हर चीज चाई वो बड़ब़े पहाड हों, गरहे हों, या खुद हमारा शरीर हों, ये सब साव्यव है, यानी ये चोटे-चोटे हिस्सों से मिलकर बने है. अप रव बाद बाद बने है. बिल्कोल और उनका लोजिक यह गे जिस भी चीज में एक स्पैसटिक अरेंजमिंट होता है, एक विषिष्ट सन्रच्ना होती है, वो अपने आप नहीं जोर सकती. एक आंदा या अर्चेतन पदार्त कुद को एक इतने जतिल और निंआमबद ब्रम्मान्ड में विववस्तित नहीं कर सकता इसके लिए किसी ना किसी सचेतन, ग्यानवान, रचीता की जरुरत तो पडेगी ही अगर ब्रम्मान्द पर्मानूं से यानी आटम से बना है तो व्ड़ पर्मानूं होड अपस में जुडकर चीजे ने बना सकते शाएद यही पर उनका दुस्रतर काता है आयोजन आयोजन यानी पर्मानूं का प्रारमबिख सैएजन इसे एक चोटे से उदारन से समचते है, मान लीजे आप के पास एक दिबभे में लेगो के चोटे-चोटे तुक्डे हैं. तीक है. आप मान लीजे कि ये तुक्डे परमानू हैं. अगर आप उस दिबभे को बस एसे हिलाते रहें, तो थो तुक्डे आप जुडकर एक शान्दार महल बनाल लेंगे? आप बलकल नहीं वो तो बस आपस में तक्रा कर अवास करेंगे उने महल का अकार देने के लिए किसी अन्सान के हात हों और उसके दिमाक की जरत होगी है? अगर देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना देखाना द अगर नहीं ताई नहीं कर सकता. वाए ये सच्छ में दिमाक को लिए लोगेक है. लिक ने कोर तरक तरक ताई जिस ने मुझे सबसे जाडा सोचने पर मुझवूर किया. वो ता पदात यानी बाशा और शब्दों क्यो तरक. आप ये उनके सबसे औरजनल और सबसे गेरे तरको में से एक है. जर ज़ा सोचिए है, हम भाशा कैसे सीकते है. एक चोटा बच्च्चा किसी शब्ट का मतलप कैसे जानता है. जाहिर सी बात है. उसके माता पिता है, या कोई बड़ा सदस से उसे सीकता है, कि बिटा ये सेब है, ये पानी है? वैं ना, बच्चा अपने बड़ो से सीकता है, बड़े अपने बड़ो से सीकते है. लेकिन अगर हम इस चेन में, इस श्रिंखला में पीचे जाते जाए जाते जाए, तो मानव सब़ियता की श्रूवात में, उपहला इन्सान कों ता? उने उन शब्डो का अर्थ किसने सिखाया? किसी दूनी और किसी वस्तू के बीच का संबबन्त, सबसे पहले किसने स्तापित किया? अगर बाशा एक समाजिक समजोता है, एक कनवेंचन है, तो उस कनवेंशन को शुरू करनेवाला, स्थाट करनेवाला कोई ना कोई तो हुना चीए? यही उदेयाना चार्या का पदार्थ का तर्क है. बाशा के उस पहले शिक्षक को, जिसने शब्दो में अर्ठ डाला और पहला गयान दिया, उसे ही उद्याना चार्यने इश्वर कहा है बहुती जबर्दस्त इसके लावा एक और बहुत मस्बुत तर्क है द्रित्यादे यानी ब्रम्मांट के दारन और पोषन का तर्क अब ब्रम्मांट के वल बना के चोडनी दिया गया है मतलव उसे चलाना भी पड़ता है. भिलकुल. जैसे हवामे लटके हुए किसी बहारी पट्धर को गुरुत्वा कर्षन के खिलाफ तामे रकने के लिए किसी शकती की जरूरत होती है ना वैसे ही इस विशाल ब्रम्मान्द को नश्थोने से बचाने अर तामे रक्ने के लिए एक दारक की आविशकता है जब मैं तरकों को सुन्ता हूँन तो मुझे पश्च्च्मी दर्षन के बड़बड़े विचारकों की आदाती है जैसे तोमस एक विनस या विल्यम पेली उनो ने भी तो करीब-करी भी यही लोगिक दिए थे अपकी ये तुलना बिलकुल सही है, अख्वीनस का जो कोसमोलोगिकल आर्ग्युमेंट था, कि हर चीस का एक प्रथम कारन हो ना चाही है, वो उदायाना चारे के कारयात और आयोजना तरक से बहुत मिलता जलता है. अर विल्यम पेली का वो मशहुर वाच्मेकर अनालेजी आपको अपको सड़क पर एग गड़ी पडी मिले, तो आप मान लिंगे कि इसे किसी गड़ी साज नहीं बनाया होगा. वो भी उदयाना चारे के सन्रचना वाले तरकों जैसा ही है. लेकिन, यहां सब से हिरान करने वाली बात क्या है पता है? इंका तामलाई न, यह खल पहले तो अथारोई सदी में हुए, और अख्वाईनस तेरोई सदी में. जबकी, उद्याना चार्या ग्यारोई सदी में ही, मितला की दरती पर बैटकर, इनहीं सवालों के, कही अदिक परश्क्रित और तरकीक जवाब दे चुके ते ये को चुटी मुटी बात नहीं? आप, ये हमारी विचारिक परमपरा की ताकत है लेकिन मेरे मन में एक वेवाहारिक सवाल अभी भी गूम रहा है पुच्छे आजके यस आदूनिक युग में ज़हां विग्यान ने इतनी तरकी कर लिए हम ने A.I बना लिया है, तो किसी आम अँँन्सान को एक हाँजार साल पुराने यं कडे तरकों को समझने की क्या जुर्वात है? इस से हमारी आजकी जिन्दगी भी क्या फरक पडने वाला है? देखे इसका हमारी रोज मरहा की जिन्धगी और हमारी सोचने की प्रक्रिया उस प्रोसेस से पहुट गहरा कनेक्षिन है इस गरन्त और इसके अनुवाद को पडने से हमें बहुट जरूरी स्किल सीकते हैं न्द, कुन्सी स्किल? विप्रीत विचारों का तारकिक परीक्ष्यन यानी काूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अद्यानाचारिया हमे थीक यही देर्या सिक हाते है, वो बताते है किसी भी विषेय या किसी भी माननिता को गेराई से समजने किलिए, अपने विरोदियों के विचारों को पूरी तरा सुन्ना परता है. और फिर लोगिकल तरीके से अने परक्ना भी जरूगी है. अगर अज भी बग़ाई की ज़़चा का सार निकालें, तो एक बात तो भी शिषे की तो देखाएं ज़ाई तो बग़ाई नाई बागा नाई प्रट़्ाई तो बग़ाई प्रट़्ाई प्रट़्ाई तो बग़ाई प्रट़्ाई प्रट़्ाई प्रट़्ाई प्रट़्ा यह ग़े तरे साफ जातीए के गेरा दरशन यह कथिन तरक और शास्ट्रार्थ यह सब केवल संसक्रित के अकटमिक कमरों यह कुछ मुट्टिबर विद्वानो की जागीर नहीं बिलकल नहीं, जब यस तरा के गुड यान को जियान को आम भोल्चाल की छेट्री अबहाशाशा में उतारा जाता है, जैसे यहा मेठिली में उतारा गया है, तो यह जियान का सच्चा लोक तन्त्री करन बन जाता है. दमक्रताइशेशन हो जाता है. गजेंद्र ताकृर जी का यह जो अनुवाद है, यह साभद करता है के अगर भारी दरशन को थीग भाशा और स्थानिये मुहावरों के साथ पेश की आजाईना तो वो किसी भी आम पाटक की सोच को दिशा दे सकता है और यह यह जबात का भी प्रमान है कि हमारी खषेट्री अ भाशाँमे कितनी गेराई और कितना समरत है, वो इतने कडे लोगिक कबार उठा सकती है, और वो भी अपनी मिठास और दे सचपन खोई बिना, जैसे समएखषक नी शुरू में कहाता, ये बोद्धिक गर वापसी के लगे किताब की नहीं है. तो फिर किस की है? ये उस पूरी महान परमपरा की वापसी है जो विचार विमः और तर्क परादारी थी और जो कभी हमारे समाज का एक बहुत एहम हिस्सा हूँए करती ती बहुत खुब और इस विशे की इतनी गेराए में उतरने के बाद मैं सबी विचारों को यही समेटते वे बस एक उकसानेवाला विचार चोडकर जाना चाता हूं जरुर हमने शुवात में सुचा ताना की तरके क्रूकी मशीन जिसका बहावनाउसे कोई लेना देना नहीं लेकन उदे आना चारे ने उसी तरके के विचार के जर्ये बुरानी लिपियों और उन्ताड पत्रों में आभी आईसे और कितने अनुधित गरन्त दूल फाख रहुंगे. आईसे खजाने जो शाएद दुन्या के सुचने का नजर्या ही पूरी तरा बडल दे. वही तो? बस सवाल यह एक के क्या हम और हमारा समाज उस खजाने को खोजने और समजने के लिए वाखी तेयार है?