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ठेठ_मैथिलीमे_वाचस्पति_मिश्रक_भामती.m4a
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- 0:00–0:11इवाहिस्पती मिश्वक, हजार साल पुरान, दार्षनिक ग्रन्त, भामती का गजें़्र ताकृर द्वारा केल-गेल, मैठली अनुवादक, एक्ता त्वरित साहित्षी.
- 0:11–0:23नवम शताब्दी के जटिल अदवेदान्त दर्षन, जे आब दहरे मात्र संस्क्रिप पन्दित लोकनिक लेल सीमिट्चल से पहिल भेर थेट मैठली में प्रस्तूद भेल अची,
- 0:23–0:29जे हम्रा सबक लेल आपनी माट्टिक दार्षनिक खजाना के बुजबक अदबूत अज़ अची.
- 0:29–0:34पहले ही कोनो सादारन पोती नहीं, बलकी एक ता एतिहासे कुपलप दी आची.
- 0:34–0:39सोचुज कोनो आमुले खजाना अपनी आंगन में हजार साल सब बंदच्छल,
- 0:39–0:45वूदा आप गजें़र ताकृर एक्रा मेठलिक चाभीसा रवाद सबकलेल अंतता खूली देलनी आची.
- 0:46–0:49तो सर एकर दार्षनिग गेराई बड रोचा कची.
- 0:50–0:53इए अनुवाद जटिल दर्षन के सपष्ट करएत ची,
- 0:53–1:01जकर मुख्य सिद्धान्त आची जे अग्यानक कारन जीव अर्ठात हम आ आँजी, ब्रम्मवा मुल सत्ति बलकुल नहीं.
- 1:01–1:07एक रा एहिना बुजु जी जो हम रंगीन चष्मा पहिर ली, तदून्या रंगीन लागे तची.
- 1:07–1:10मुदा की ताही ससुरच का अपन अस्ली रंग बदली जाई तची.
- 1:10–1:12बिल्ल्कुल नहीं.
- 1:12–1:15आई अनुवाद एही ब्रम के बड असानी सब भुजवेई तचे.
- 1:15–1:20अन्त में, एकर भाशाई सुन्दर ये अ मुहावरक प्रयोग अकल्पनी आचे.
- 1:20–1:27आहा सुचे थेब जे बहारी भरकम दरषन पवग कतेक नीर सहेथ मुदेई बिलकुल गामक चोपालक बाशा में आची,
- 1:27–1:32जते जतिल बात के समजावक लेल अंदर अंदरक हात पक्री खसाइत अचे,
- 1:32–1:37अज्जोक खिर नोनगर नहीं संटेट मुहावरा कसुंदर प्रयोग वेला ची.
- 1:37–1:47संखशेप में इई अध्बुत अनुवाद मित्लाक महान दार्षनिक दरोहर के आम लोकक सहज भाशा में सुलब करा का सदिकन लेल जीवन्त का देलक अची.
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इवाहिस्पती मिश्वक, हजार साल पुरान, दार्षनिक ग्रन्त, भामती का गजें़्र ताकृर द्वारा केल-गेल, मैठली अनुवादक, एक्ता त्वरित साहित्षी. नवम शताब्दी के जटिल अदवेदान्त दर्षन, जे आब दहरे मात्र संस्क्रिप पन्दित लोकनिक लेल सीमिट्चल से पहिल भेर थेट मैठली में प्रस्तूद भेल अची, जे हम्रा सबक लेल आपनी माट्टिक दार्षनिक खजाना के बुजबक अदबूत अज़ अची. पहले ही कोनो सादारन पोती नहीं, बलकी एक ता एतिहासे कुपलप दी आची. सोचुज कोनो आमुले खजाना अपनी आंगन में हजार साल सब बंदच्छल, वूदा आप गजें़र ताकृर एक्रा मेठलिक चाभीसा रवाद सबकलेल अंतता खूली देलनी आची. तो सर एकर दार्षनिग गेराई बड रोचा कची. इए अनुवाद जटिल दर्षन के सपष्ट करएत ची, जकर मुख्य सिद्धान्त आची जे अग्यानक कारन जीव अर्ठात हम आ आँजी, ब्रम्मवा मुल सत्ति बलकुल नहीं. एक रा एहिना बुजु जी जो हम रंगीन चष्मा पहिर ली, तदून्या रंगीन लागे तची. मुदा की ताही ससुरच का अपन अस्ली रंग बदली जाई तची. बिल्ल्कुल नहीं. आई अनुवाद एही ब्रम के बड असानी सब भुजवेई तचे. अन्त में, एकर भाशाई सुन्दर ये अ मुहावरक प्रयोग अकल्पनी आचे. आहा सुचे थेब जे बहारी भरकम दरषन पवग कतेक नीर सहेथ मुदेई बिलकुल गामक चोपालक बाशा में आची, जते जतिल बात के समजावक लेल अंदर अंदरक हात पक्री खसाइत अचे, अज्जोक खिर नोनगर नहीं संटेट मुहावरा कसुंदर प्रयोग वेला ची. संखशेप में इई अध्बुत अनुवाद मित्लाक महान दार्षनिक दरोहर के आम लोकक सहज भाशा में सुलब करा का सदिकन लेल जीवन्त का देलक अची.