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वाचस्पति_मिश्र_की_भामती.mp4
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- 0:00–0:09नमस्कार आज्की इस चर्चा में हम बात करने वाले है, नोवी शताबदी के एक बहतिरीं प्राषीं संसक्रित दार्ष्ने ग्रन्त की, जिसका नाम है ब्रमाती.
- 0:09–0:14सात ही हम देखेंगे इसके उस अतिहासक आदूनिक मैठली अनुवाद को,
- 0:14–0:16जिसने इसके रहेस्सियो से परदा उतारा है.
- 0:16–0:18तो जलिये बिना देरी कि ये शुरू करते हैं.
- 0:18–0:22आज हम इस सफर में किन पहलोवों पर नजर डालेंगे?
- 0:22–0:25पहला भामाती की अदबुत क्रिती,
- 0:39–1:09आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
- 1:09–1:13तो वाचस्पति मिश्टाजी कोई सादारन व्यक्ती तो थे नहीं
- 1:13–1:16उने सर्व तन्त्रा स्वतन्त्र की उपादी मिली थी
- 1:16–1:20इसका सीदा समत्लभ है, लगबक सभी दार्ष्निक प्रनालियों के स्वतन्त्र मास्टर
- 1:20–1:23ग्यान और विनम्रता सच्छ में एक सिक्के के दो पहलू थे.
- 1:23–1:27केर, वाचस्पती मिष्टा जी कोई सादारन वक्ती तो थे नहीं.
- 1:27–1:30उने सर्व तन्त्रा स्वतन्त्र की उपादी मिली थी.
- 1:30–1:34इसका सीदा समतलब है, लगबक सभी दार्षनिक प्रनालियों के स्वतन्त्र मास्टर.
- 1:34–1:36वैशेशिका को अगर चोर दिया जाए,
- 1:36–1:39तो भार्तिय दर्षन के लगबक सभी आस्टिक सम्प्रदायों,
- 1:39–1:42जैसे न्याय, संक्या, योगा और पूर्वम्मान्शा,
- 1:42–1:47इन सप्पर उनकी प्रमानिक टीकाए, यहनी कोमेंट्रीस आज भी मोजुद है.
- 1:47–1:50उनका गयान किसी एक विचार्दारा तक बंदहवा नहीं ता,
- 1:50–1:53और उनका जो यह सबसे परीपक्वा काम है, भहमाती,
- 1:53–1:55वो उनके इसी व्यापक द्रिष्टीकों का नतीजा है.
- 1:55–2:01अब आगे बड़ते हैं और अद्वैत वेदान्त की उन दो प्रमुक दाराँ को समचते हैं,
- 2:01–2:05जिनों आगे चलकर एक बड़ा वेदान्तिक विभाजन क्डाए किया.
- 2:05–2:10आचारे शंकरा के बाद उनके ब्रम्म्सुत्र भाश्ष्य को समजने के लिए,
- 2:10–2:12तो में सम्प्रदाय उबर कराए.
- 2:12–2:15एक तरव था वाचस्पती मिष्र का भामाती सकूल
- 2:15–2:18और दूसरी तरव पद्मपाना का विवारना.
- 2:18–2:21इनके बीच का जो मूल भूत अंतर हैना
- 2:21–2:22वो बड़ा दिल्चस्प है.
- 2:22–2:24बामाती कहता है कि अविध्या
- 2:24–2:27या आग्यान का केंद्र जीवा है,
- 2:27–2:31लेकिन विवरना मानता है कि आग्यान सीदे ब्रम्मण में स्थित है.
- 2:31–2:34जीवा की नेचर को लेकर भी दोनो अलक सुचते है,
- 2:34–2:37बामाती अवछेदा वादा को मानता है,
- 2:37–2:41वाँदिया मतलब है कि जीवा अविद्या दूरा सीमित ब्रम्मन है.
- 2:41–2:44तीक वैसे ही जैसे गड़े के अंदर का अकाश.
- 2:44–2:46वही विवरना प्रतिविम्ब वादा को मानता है.
- 2:46–2:51यहनी जीवा अविद्या में ब्रम्मन का सरफ प्रतिविम्ब या रिफलेक्षन है.
- 2:51–2:53अगर जीवा की अपनी अलग अविद्या हुत्ती है,
- 2:53–2:55इसलिये अविद्या अनेक है,
- 2:55–2:58पर विवरना केवल एक ही मुला अविद्या को मानता है.
- 2:58–3:00इन सिदान्तो को समजे बिना,
- 3:00–3:03इनके दर्षन की गेराइ तक पहुचना थोडा मुष्किल है.
- 3:03–3:06इंके दर्शन की गेराई तक पहुचना थोडा मुष्किल है।
- 3:06–3:10तो चली, इस दीईप फिलाज़फी से थोडा अगे बडदते हैं
- 3:10–3:13और बात करते हैं ब्रम की प्रक्रिती के बारे में
- 3:13–3:16आखिर अद्ध्यासा या एरर कर रहिस से क्या है।
- 3:16–3:19अब देखे ब्रम्या प्रूटी युक्त ज्यान आखिर होता कैसे है
- 3:19–3:22संसक्रत में इसे अद्यासा कहा गया है
- 3:22–3:24न्याय दर्षन का इस पर अपना एक सिद्धानत है
- 3:24–3:26जिसे अन्ने ताक ख्याती कहते हैं
- 3:26–3:29उनका सीदा सामानना है कि ब्रम् तब होता है
- 3:29–3:33जब हम एक मोजुद वस्तू को किसी दुस्री वस्तू के रूप में देख लेते हैं
- 3:33–3:37जैसे किसी सीप्या शल को देखा और लगा की चान्दी है
- 3:37–3:41लेकिन अदवाइत वेदान्त जिसे भहमाती भी सपोट करता है
- 3:41–3:43उनका अंगल बिलकोल रग है
- 3:43–3:46उनका सिद्दान्त है अनिर्वाचनीया ख्याती
- 3:46–3:49इसका अर्थ यह है कि जो दिख रहा है
- 3:49–3:52वो ना तो पुरी तरह सच है और नहीं पुरी तरह जुड
- 3:52–3:54ये बस अनिर्वाचनीये है
- 3:54–3:56जैसे मिरिग त्रिष्ना
- 3:56–3:59यानी मिराज में चमकती दूप पर पानी का अबहासोना
- 3:59–4:06ये द्रिश्टान्त बहुत ब्युतिफुली अल्ट्ट्ट्टा है कि जो सर्फ दिख रहा है, जरूरी नहीं कि वो हकीकत हो.
- 4:06–4:10और इसी बाट पर अपने विरोदी सिद्धान्तो की आलोचना करते हुए,
- 4:10–4:15वाचचः पती मिश्वाजीने एक बड़ाही तीखा और शान्दार व्यंगे किया है.
- 4:15–4:17उ कहते हैं, आज!
- 4:17–4:21क्या आसादारन सबहागय है इस बिचारे ज्यान का,
- 4:21–4:24कि ये जुट के माद्यम से भी निष्चे प्राट कर लिता है.
- 4:24–4:25है ना कमाल कि लाईं?
- 4:25–4:29ये दिखाता है कि प्राछीन दोर के वो दाशनिक शास्टरार्त,
- 4:29–4:32कितने शार्प, लाइव्ली और तारकिक होते थे,
- 4:32–4:35वहां आर्गिमेंच में एक �alag hi urja hoti thi.
- 4:35–4:39अद्दियास के स्पूरी चर्चा से एक बड़ाही ट्रिक्की सवाल निकल कर आता है,
- 4:39–4:43अद्मा किसी अज़्ीस का आरोप लगाया जासकता है जो अद्मा है ही नहीं?
- 4:44–4:48अगर हम अद्मा को ज़, यानी भिल्कुल इन्ध मान लें, तो एक बडी समस्या कडी हो जाएगी.
- 4:49–4:52इसे अन्दो की अनन्त शिंक्ला वाले उदारन्चे समझीए.
- 4:52–4:58कल्पूना की जीए, एक अंदा अद्मी दूस्रे अंदे का हाद पक्डे हुए चल रहा है, और हर कदम पर दोनो गिर रहे है.
- 4:58–5:02अगर आत्मा खुद एनर्थ है, तो एक यान को प्रमानित करने के लिए,
- 5:02–5:07तुज़्े ग्यान की ज़़ूरत पड़ेगी, फिर तीस्रे की जिस्फे अईन्फिनाइट रीग्रेस होगाएगा.
- 5:07–5:09ये कडी कमी कथम ही अगी.
- 5:09–5:12इसिल्ए, भामाती ये पुरी तरा सपष्ट करता है,
- 5:12–5:15कि आत्मा किसी तुज़्े ग्यान पर निरभर नहीं करती,
- 5:15–5:18वो स्वेंप्रकाशित यानी सेल्फ्लुमिनस है
- 5:18–5:21अब हम इस गरन्त के सबसे कोर हिस्से में अंटर कर रहे हैं
- 5:22–5:23चार सुत्रों का रहेस से
- 5:24–5:26जिसे चतुस सुत्री भी कहा जाता है
- 5:27–5:29ब्रम्मसुत्र के सुर्वाती चार सुत्र समज लीजिये
- 5:29–5:32पूरे वेदान्त का केंदरी सार प्रस्तुत करते है.
- 5:32–5:36इनका क्रम एक्दम लोगिकल स्तेब बाई स्तेप यात्रा कितरा है.
- 5:36–5:39पहला सुत्र है अठातो ब्रमजिग्यासा.
- 5:39–5:42मतलब ब्रमवन को जानने की इच्छा.
- 5:42–5:44ये एक खोज को स्तापित करता है.
- 5:44–5:50तुस्रा है जन्माद्यश्से यताः, जिस से इस्ठ्रिष्टी का जन्म, विकास, और विनाश होता है,
- 5:50–5:53यानी ब्रह्म्मन ही सब का मुल कारन है.
- 5:53–5:56तीस्रा सुत्र है शास्त्र योनित्वत,
- 5:56–6:01जो इस बात की वोर इशारा करता है, की ज्यान के लिए शास्तरों को ही प्रमान मना जाए.
- 6:01–6:03और चोथा है, तत्व समन्वयात.
- 6:03–6:08इस का मतलब है, की इन सभी शास्तरों का अल्टिमिट तागित और समान्वय,
- 6:08–6:10स्वर्फ अर्स्व ब्रम्म्मन को स्तापित करना ही है.
- 6:10–6:15इस चोथे सुत्रमे मुक्ती या मोख्ष को लेकर बहुत दीटेल में चर्चा की गए है.
- 6:15–6:23एक भाज जो भमाती ने क्लिर्एए समजगाई है, वो ये की मुक्ती पाने में किसी आक्ष्चन या क्रिया का प्रत्यक्ष योग्दान नहीं होता.
- 6:23–6:26दियान देनेवाली बात यह एक प्रविखती क्या नहीं है?
- 6:27–6:29प्रविखती कोई अई अईसी नहीं वस्तू नहीं है,
- 6:29–6:30जिसे बनाया जा सके,
- 6:30–6:31जैसे दूथ से दही बनाना,
- 6:31–6:33या मिट्टी से गडा,
- 6:33–6:34ये कोई अईसी चीस भी नहीं है,
- 6:34–6:36जिसे कुछ करके,
- 6:36–6:41तो तो प्रदे प्रदे बामाती लिए बहामाती लिए बहाती बहाती बहाती रूपक यहनी आनलोगी दीगाई.
- 6:41–6:43तु है जिसे रग़ रग़ कर साफ करना हो,
- 6:43–6:46जैसे एट के पाअडर से किसी गंदे शीषे को चमकाना.
- 6:47–6:48इस सब का तातपरया क्या है?
- 6:48–6:52यही कि मुक्ती एक शाषवत पूर्विस थिट्स थिटि है,
- 6:52–6:53जो बस वहां है.
- 6:53–6:58और इस शाश्वत मुक्ती को समजाने कि लिए भामाती में एक बहुती बहतरीन रूपक,
- 6:58–6:59यानी आनलोगी दीगाई है.
- 6:59–7:01तब बोट मैन आनलोगी.
- 7:01–7:05एक नाविक की कलपना की जीए, जो बदलते किनारो, पानी के जाग,
- 7:05–7:07और लेहरो के शोर शराभे से दूर निकल कर,
- 7:07–7:10नदी के भिलकुल शान्त मद्धिबहाग में पहुझज जाता है,
- 7:10–7:12उस भीच्वाले हिस से में कोई शोल नहीं है.
- 7:12–7:14सर्फ स्तिरता है,
- 7:14–7:17ये शान्त मद्धिबहाग ही दर असल ब्रम्मन की स्थिती है,
- 7:17–7:19शान्ती तो वहां हमेशा सिती,
- 7:19–7:21बस लेहरो के कुलाहल को चोड़कर वहां तक पहुचना था.
- 7:21–7:26ये उदारन इतने अमुर्ट विचारो को सच्व में कितना सहज और यतारत बना दिता है.
- 7:26–7:31तो चलिये अब इस प्राचीन यान की यात्रा को तोडा आदूनिक समय से जोडते हैं
- 7:31–7:35अर बाद करते है इसके मेठिली अनुवाद के महत्वकी
- 7:35–7:40वाचछपती मिश्राजी के इसकत्हन संसक्रित टेक्स्ट का शुध्द मेठिली में अनुवाद करना
- 7:41–7:42सच में एक महान कारे है
- 7:43–7:45गजेंदर ताकृर दूरा किया यह एक अनुवाद
- 7:45–7:48वाखई एक अटिहासिक उपलब दिहें.
- 7:48–7:52विदेहा दूरा प्रकाशित ये दो हाँजार शब्भीस का परवर्दित संसकरन,
- 7:52–7:57एक जीता जागता उदाहरन है, कि कैसे प्राषीन ज्यान को आदूनिक भाशा
- 7:57–7:59और सहित्यका मानेक बनाया जासकता है.
- 7:59–8:05इसे हम केवल एक आनुवाद नहीं कैसकते, ये दर्षन और भाशा का एक हुपसुरत उट्सव है.
- 8:05–8:09अप सवाल उट्ता है कि ये आनुवाद इतना जीवन्त कैसे बन पडा?
- 8:09–8:14दर असल आनुवादक ने इन मुष्किल और प्राचीन कोन्सेप्स को जमीन से जोडने किलिए
- 8:14–8:19तेट, ग्रामीन और सीदे सादे मुहावरों का कमाल का इस्तमाल की आप जैसे,
- 8:19–8:22जाए जाए बहुत कम प्रयाज दिखाना हो, तो नोने लिखा,
- 8:22–8:24जों का हल्वा नमकीन नहीं होता.
- 8:24–8:27या बरम को समजाने किलिए एक पशू का उदारन देक्खे,
- 8:27–8:57दन्डा उठाय आदमी को देक्कर भागना, या फिर दिफक्टिव कोजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजजगजगजगजगजगजगजगजगजजगजजगजजजजजजजजजजजजजजजजजजजजजज
- 8:57–9:02ये बाशा भी अपने आप में एक और फुबसुरत भ्रहम एक द्यासा है
- 9:02–9:04बाशा हमेशा इस वोर इशारा करता है
- 9:04–9:09कि सत्तिक अनुबहव बाशा की सीमावो से कही आगे की चीज है
- 9:09–9:14ये एक आँसा विचार है जो किसी को भी और गेराए से सोचने पर मजबोर कर देगा
- 9:14–9:18इस ग्यानवर्दख चर्चा में हमारे साथ बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत द्श्निवाद
- 9:18–9:22उमीद है ये अनुबहव आप सभी के लिए अट्यन्त रोचक रहा होगा
Plain text
नमस्कार आज्की इस चर्चा में हम बात करने वाले है, नोवी शताबदी के एक बहतिरीं प्राषीं संसक्रित दार्ष्ने ग्रन्त की, जिसका नाम है ब्रमाती. सात ही हम देखेंगे इसके उस अतिहासक आदूनिक मैठली अनुवाद को, जिसने इसके रहेस्सियो से परदा उतारा है. तो जलिये बिना देरी कि ये शुरू करते हैं. आज हम इस सफर में किन पहलोवों पर नजर डालेंगे? पहला भामाती की अदबुत क्रिती, आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ तो वाचस्पति मिश्टाजी कोई सादारन व्यक्ती तो थे नहीं उने सर्व तन्त्रा स्वतन्त्र की उपादी मिली थी इसका सीदा समत्लभ है, लगबक सभी दार्ष्निक प्रनालियों के स्वतन्त्र मास्टर ग्यान और विनम्रता सच्छ में एक सिक्के के दो पहलू थे. केर, वाचस्पती मिष्टा जी कोई सादारन वक्ती तो थे नहीं. उने सर्व तन्त्रा स्वतन्त्र की उपादी मिली थी. इसका सीदा समतलब है, लगबक सभी दार्षनिक प्रनालियों के स्वतन्त्र मास्टर. वैशेशिका को अगर चोर दिया जाए, तो भार्तिय दर्षन के लगबक सभी आस्टिक सम्प्रदायों, जैसे न्याय, संक्या, योगा और पूर्वम्मान्शा, इन सप्पर उनकी प्रमानिक टीकाए, यहनी कोमेंट्रीस आज भी मोजुद है. उनका गयान किसी एक विचार्दारा तक बंदहवा नहीं ता, और उनका जो यह सबसे परीपक्वा काम है, भहमाती, वो उनके इसी व्यापक द्रिष्टीकों का नतीजा है. अब आगे बड़ते हैं और अद्वैत वेदान्त की उन दो प्रमुक दाराँ को समचते हैं, जिनों आगे चलकर एक बड़ा वेदान्तिक विभाजन क्डाए किया. आचारे शंकरा के बाद उनके ब्रम्म्सुत्र भाश्ष्य को समजने के लिए, तो में सम्प्रदाय उबर कराए. एक तरव था वाचस्पती मिष्र का भामाती सकूल और दूसरी तरव पद्मपाना का विवारना. इनके बीच का जो मूल भूत अंतर हैना वो बड़ा दिल्चस्प है. बामाती कहता है कि अविध्या या आग्यान का केंद्र जीवा है, लेकिन विवरना मानता है कि आग्यान सीदे ब्रम्मण में स्थित है. जीवा की नेचर को लेकर भी दोनो अलक सुचते है, बामाती अवछेदा वादा को मानता है, वाँदिया मतलब है कि जीवा अविद्या दूरा सीमित ब्रम्मन है. तीक वैसे ही जैसे गड़े के अंदर का अकाश. वही विवरना प्रतिविम्ब वादा को मानता है. यहनी जीवा अविद्या में ब्रम्मन का सरफ प्रतिविम्ब या रिफलेक्षन है. अगर जीवा की अपनी अलग अविद्या हुत्ती है, इसलिये अविद्या अनेक है, पर विवरना केवल एक ही मुला अविद्या को मानता है. इन सिदान्तो को समजे बिना, इनके दर्षन की गेराइ तक पहुचना थोडा मुष्किल है. इंके दर्शन की गेराई तक पहुचना थोडा मुष्किल है। तो चली, इस दीईप फिलाज़फी से थोडा अगे बडदते हैं और बात करते हैं ब्रम की प्रक्रिती के बारे में आखिर अद्ध्यासा या एरर कर रहिस से क्या है। अब देखे ब्रम्या प्रूटी युक्त ज्यान आखिर होता कैसे है संसक्रत में इसे अद्यासा कहा गया है न्याय दर्षन का इस पर अपना एक सिद्धानत है जिसे अन्ने ताक ख्याती कहते हैं उनका सीदा सामानना है कि ब्रम् तब होता है जब हम एक मोजुद वस्तू को किसी दुस्री वस्तू के रूप में देख लेते हैं जैसे किसी सीप्या शल को देखा और लगा की चान्दी है लेकिन अदवाइत वेदान्त जिसे भहमाती भी सपोट करता है उनका अंगल बिलकोल रग है उनका सिद्दान्त है अनिर्वाचनीया ख्याती इसका अर्थ यह है कि जो दिख रहा है वो ना तो पुरी तरह सच है और नहीं पुरी तरह जुड ये बस अनिर्वाचनीये है जैसे मिरिग त्रिष्ना यानी मिराज में चमकती दूप पर पानी का अबहासोना ये द्रिश्टान्त बहुत ब्युतिफुली अल्ट्ट्ट्टा है कि जो सर्फ दिख रहा है, जरूरी नहीं कि वो हकीकत हो. और इसी बाट पर अपने विरोदी सिद्धान्तो की आलोचना करते हुए, वाचचः पती मिश्वाजीने एक बड़ाही तीखा और शान्दार व्यंगे किया है. उ कहते हैं, आज! क्या आसादारन सबहागय है इस बिचारे ज्यान का, कि ये जुट के माद्यम से भी निष्चे प्राट कर लिता है. है ना कमाल कि लाईं? ये दिखाता है कि प्राछीन दोर के वो दाशनिक शास्टरार्त, कितने शार्प, लाइव्ली और तारकिक होते थे, वहां आर्गिमेंच में एक �alag hi urja hoti thi. अद्दियास के स्पूरी चर्चा से एक बड़ाही ट्रिक्की सवाल निकल कर आता है, अद्मा किसी अज़्ीस का आरोप लगाया जासकता है जो अद्मा है ही नहीं? अगर हम अद्मा को ज़, यानी भिल्कुल इन्ध मान लें, तो एक बडी समस्या कडी हो जाएगी. इसे अन्दो की अनन्त शिंक्ला वाले उदारन्चे समझीए. कल्पूना की जीए, एक अंदा अद्मी दूस्रे अंदे का हाद पक्डे हुए चल रहा है, और हर कदम पर दोनो गिर रहे है. अगर आत्मा खुद एनर्थ है, तो एक यान को प्रमानित करने के लिए, तुज़्े ग्यान की ज़़ूरत पड़ेगी, फिर तीस्रे की जिस्फे अईन्फिनाइट रीग्रेस होगाएगा. ये कडी कमी कथम ही अगी. इसिल्ए, भामाती ये पुरी तरा सपष्ट करता है, कि आत्मा किसी तुज़्े ग्यान पर निरभर नहीं करती, वो स्वेंप्रकाशित यानी सेल्फ्लुमिनस है अब हम इस गरन्त के सबसे कोर हिस्से में अंटर कर रहे हैं चार सुत्रों का रहेस से जिसे चतुस सुत्री भी कहा जाता है ब्रम्मसुत्र के सुर्वाती चार सुत्र समज लीजिये पूरे वेदान्त का केंदरी सार प्रस्तुत करते है. इनका क्रम एक्दम लोगिकल स्तेब बाई स्तेप यात्रा कितरा है. पहला सुत्र है अठातो ब्रमजिग्यासा. मतलब ब्रमवन को जानने की इच्छा. ये एक खोज को स्तापित करता है. तुस्रा है जन्माद्यश्से यताः, जिस से इस्ठ्रिष्टी का जन्म, विकास, और विनाश होता है, यानी ब्रह्म्मन ही सब का मुल कारन है. तीस्रा सुत्र है शास्त्र योनित्वत, जो इस बात की वोर इशारा करता है, की ज्यान के लिए शास्तरों को ही प्रमान मना जाए. और चोथा है, तत्व समन्वयात. इस का मतलब है, की इन सभी शास्तरों का अल्टिमिट तागित और समान्वय, स्वर्फ अर्स्व ब्रम्म्मन को स्तापित करना ही है. इस चोथे सुत्रमे मुक्ती या मोख्ष को लेकर बहुत दीटेल में चर्चा की गए है. एक भाज जो भमाती ने क्लिर्एए समजगाई है, वो ये की मुक्ती पाने में किसी आक्ष्चन या क्रिया का प्रत्यक्ष योग्दान नहीं होता. दियान देनेवाली बात यह एक प्रविखती क्या नहीं है? प्रविखती कोई अई अईसी नहीं वस्तू नहीं है, जिसे बनाया जा सके, जैसे दूथ से दही बनाना, या मिट्टी से गडा, ये कोई अईसी चीस भी नहीं है, जिसे कुछ करके, तो तो प्रदे प्रदे बामाती लिए बहामाती लिए बहाती बहाती बहाती रूपक यहनी आनलोगी दीगाई. तु है जिसे रग़ रग़ कर साफ करना हो, जैसे एट के पाअडर से किसी गंदे शीषे को चमकाना. इस सब का तातपरया क्या है? यही कि मुक्ती एक शाषवत पूर्विस थिट्स थिटि है, जो बस वहां है. और इस शाश्वत मुक्ती को समजाने कि लिए भामाती में एक बहुती बहतरीन रूपक, यानी आनलोगी दीगाई है. तब बोट मैन आनलोगी. एक नाविक की कलपना की जीए, जो बदलते किनारो, पानी के जाग, और लेहरो के शोर शराभे से दूर निकल कर, नदी के भिलकुल शान्त मद्धिबहाग में पहुझज जाता है, उस भीच्वाले हिस से में कोई शोल नहीं है. सर्फ स्तिरता है, ये शान्त मद्धिबहाग ही दर असल ब्रम्मन की स्थिती है, शान्ती तो वहां हमेशा सिती, बस लेहरो के कुलाहल को चोड़कर वहां तक पहुचना था. ये उदारन इतने अमुर्ट विचारो को सच्व में कितना सहज और यतारत बना दिता है. तो चलिये अब इस प्राचीन यान की यात्रा को तोडा आदूनिक समय से जोडते हैं अर बाद करते है इसके मेठिली अनुवाद के महत्वकी वाचछपती मिश्राजी के इसकत्हन संसक्रित टेक्स्ट का शुध्द मेठिली में अनुवाद करना सच में एक महान कारे है गजेंदर ताकृर दूरा किया यह एक अनुवाद वाखई एक अटिहासिक उपलब दिहें. विदेहा दूरा प्रकाशित ये दो हाँजार शब्भीस का परवर्दित संसकरन, एक जीता जागता उदाहरन है, कि कैसे प्राषीन ज्यान को आदूनिक भाशा और सहित्यका मानेक बनाया जासकता है. इसे हम केवल एक आनुवाद नहीं कैसकते, ये दर्षन और भाशा का एक हुपसुरत उट्सव है. अप सवाल उट्ता है कि ये आनुवाद इतना जीवन्त कैसे बन पडा? दर असल आनुवादक ने इन मुष्किल और प्राचीन कोन्सेप्स को जमीन से जोडने किलिए तेट, ग्रामीन और सीदे सादे मुहावरों का कमाल का इस्तमाल की आप जैसे, जाए जाए बहुत कम प्रयाज दिखाना हो, तो नोने लिखा, जों का हल्वा नमकीन नहीं होता. या बरम को समजाने किलिए एक पशू का उदारन देक्खे, दन्डा उठाय आदमी को देक्कर भागना, या फिर दिफक्टिव कोजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजगजजगजगजगजगजगजगजगजगजजगजजगजजजजजजजजजजजजजजजजजजजजजज ये बाशा भी अपने आप में एक और फुबसुरत भ्रहम एक द्यासा है बाशा हमेशा इस वोर इशारा करता है कि सत्तिक अनुबहव बाशा की सीमावो से कही आगे की चीज है ये एक आँसा विचार है जो किसी को भी और गेराए से सोचने पर मजबोर कर देगा इस ग्यानवर्दख चर्चा में हमारे साथ बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत द्श्निवाद उमीद है ये अनुबहव आप सभी के लिए अट्यन्त रोचक रहा होगा