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क्या_हमारा_अस्तित्व_क्षणिक_है_या_स्थायी.m4a

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:05मानलीजे आब जिस कुर्सी पर आभी बेटी है या बेटी है,
  2. 0:05–0:10वो एक सेकंट से दुस्रे सेकंट तक वास्टव में अस्तित्व मेही नहों.
  3. 0:10–0:13मतलब वो रपल पुरी तरा से नष्ट हो रही हो?
  4. 0:13–0:14बिल्कुल!
  5. 0:14–0:18या हो अगर ये विचार ही एक-एक ब्रहम हो,
  6. 0:18–0:21कि जो व्यक्ती इस वाक्के को सुन्ना शूँड़ा रहा था
  7. 0:21–0:24वही व्यक्ती इस वाक्के के खत्म होने पर भी मुझुद है
  8. 0:25–0:29हम जब भी अपने आस्पास की दॉन्या को देखते हैं तो हमें बहुती
  9. 0:30–0:33गेरी आश्वस्ट करने वाली स्तिरता दिखाई देती है
  10. 0:33–0:37आँ, जेसे हम किसी मेज को चुते है, तो एक दम ठोस लकती है.
  11. 0:37–0:41सही कहा, बहुत दिकी और हमारा रोस मर्रा का अनुबव,
  12. 0:41–0:46हमें यही बताता है, कि चीजें जैसी है, वैसी ही बनी रहती है.
  13. 0:46–0:52लेकिन क्या हो अगर वो मेज वो व्यक्ती और यहां तक की आप स्वायम भी
  14. 0:52–0:58हर एक पल में नश्थ हो रहे हों और एक बिल्कुल नहें रूप में जन में जन में ले रहे हों
  15. 0:58–1:03विमर्ष और �alagalag द्रिष्टी कोनो के इस बोध दिख मंच देबेट में आपका स्वागत है
  16. 1:03–1:06बवहाती गेरा विशे है आजका.
  17. 1:06–1:09हम अपनी पूरी जिन्दगी ये मानकर जीते है,
  18. 1:09–1:12कि दूनिया में एक तहराव है.
  19. 1:12–1:16लेकिन जब हम चीजों को उनके सबसे सुख्श्मस्तर पर देकते है,
  20. 1:16–1:19तो क्या वाखाई को यस थिरता है?
  21. 1:19–1:22अर इसी बूनियादी सवाल पर आज हम चर्चा कर रहे हैं
  22. 1:22–1:25क्या ये ब्रम्मान्द और हमारा यतार्त
  23. 1:25–1:29एक इक स्थाई निरंतर सत्टापर्टिका है
  24. 1:29–1:31या फिर ये मूलत है ख्षनिक है
  25. 1:31–1:36आज की चर्चा का आदार कोई सामान्ने सामगरी नहीं है
  26. 1:36–1:42अम गयरमी शताबदी के एक बहद कालजाई गरन्त आत्मतत्व विवेक पर बात कर रहे हैं।
  27. 1:42–1:45जो की महां दार्षनिक उदना चारे दूरा लिखा गया आता.
  28. 1:45–1:46रहां!
  29. 1:46–1:52बिलकु, या गरन्त मुख्हे रूप से नयाय, वैशेषिक और बोध ददर्षन के भीच हुए
  30. 1:52–1:58सहस्राब्दी व्यापी शास्त्रार्त का एक बहुत्छी शान्दार दस्तावेज है
  31. 1:58–2:00और सब से अच्छी बाद ये है के हाली में
  32. 2:00–2:04गजेंद्र ताकुर ने इस अट्टिंत जटिल गरन्त का
  33. 2:04–2:10में अद्टिली में इक इक बहुत उत्क्रिष्ट अकाद्दमिक अनुवाद की आए और सचका हूँ
  34. 2:10–2:18तो इस अनुवाद ने इस प्राछीन बहेस को आजके आदमिक बोद्टिक विमर्ष के लिए फिर से खोल दिया है एक दम सही
  35. 2:18–2:25तो आजकी इस चर्चा में न्याये वे शेशेक और उदेनाचारे के द्रिष्टिकोंका प्रतिनेदिदव कर रही हूं.
  36. 2:25–2:34मेरा ये द्रड मानना है की यतार्त स्थाई है, बाहरी जगत सत्तिय है और एक निरन्तर आत्मा का अस्तित्व अकात्य है.
  37. 2:34–2:38और मैं, मैं बोद्ददर्षन के परप्रेखष्य को सामने रखूगगा.
  38. 2:38–2:41मैं इस द्रिष्टिकोन का प्रतिनदित्व करता हूँ,
  39. 2:41–2:46किक्षनिक्वाद, यानी ये सिद्धान्त की सब कुछ केवल एक शन के लिये है,
  40. 2:46–2:50अर नेरात में अवाद, यानी कोई स्थाई आत्मा नहीं है,
  41. 2:50–2:53यही दूनिया को समजने का सब से तारकिक तरीका है.
  42. 2:53–2:58तो चलिये, हम दोनो पहले अपने-अपने बुन्यादी द्रिष्टिकोन को सपष्ट कर देते हैं.
  43. 2:58–3:02देखे, मैं ये सपष्ट करन चाती हूँ,
  44. 3:02–3:05कि वास्तविक्ता को समजने के लिये ना स्थाईत्वा
  45. 3:05–3:07या जिसे आम परमनिन्स कहते हैं
  46. 3:07–3:08वो नितानत आवश्षक है
  47. 3:08–3:12ज़र सुचिए यदि हर वस्तूक शनिक है
  48. 3:12–3:15अगर हर चीज रर पल नष्थ हो रही है
  49. 3:15–3:17तो कारन और प्रभाव का यानी
  50. 3:17–3:19कोज इन अप्टक्का कोई अर्थी नहीं रहे जाता?
  51. 3:19–3:23लिकिन हम कारन और प्रभाव को अलक तरीके से परिभाशित करते हैं
  52. 3:23–3:26एक मिनेद, मुझे अपनी बाद पूरी करने दीजे
  53. 3:27–3:29विग्यान और हमारा व्यवावाहारेग जीवन
  54. 3:29–3:34इसी पर्टिका है, कि अगर मैं आज खुछ करूंगी, तो कल उसका परडाम मिलेगा.
  55. 3:34–3:38और मनोविग्यान में जिसे हम प्रत्यबिग्या कहते है,
  56. 3:38–3:43यान इस म्रिती और पहचान, वो सबसे बड़ा सबुध है.
  57. 3:43–3:47हम कहते है, कल जिस वेक्ती ने जबात कानुबहव किया ता,
  58. 3:47–3:49आज वही वेक्ती उसे याद कर रहा है.
  59. 3:49–3:51आप वर वे ब्रहम भी तो हुऽ सकता है ना?
  60. 3:51–3:52कैसे?
  61. 3:52–3:55ये जो एक तव या अड़ेंटिती कानुबहव है
  62. 3:55–3:58ये एक स्थाई आत्मा के बिना बिलकुल असंबभ है.
  63. 3:58–4:02इसे हम, बीज और अंकुर के दिश्टान से समथ सकते है.
  64. 4:02–4:14अगर उब बीज किसी भंडार गर मे रख्खा है, तो उब तुरन्त इसले नहीं पनवता, क्युकि उसे पानी, मिट्टी जैसे सहकारी कारनो की आवशक्ता होती है.
  65. 4:14–4:23इसका अर्थ ये बिल्खुल नहीं है, कि वो बीज क्षनिक है, या उसकी मूल छम्ता बडल गगी है.
  66. 4:23–4:26अब मैं इसे एक बिल्कुल अलग नजर्ये से देखते हूँ।
  67. 4:26–4:31शनिक वाद कोई खोरी बोद्धिक कल्पना नहीं है।
  68. 4:31–4:34यह यतार्त का सबसे सुक्ष्म विष्लेशन है।
  69. 4:34–5:04बध्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द
  70. 5:04–5:07तुब से मुजुद है, तुटूए तुरन्त अंकुरित होना चाएए,
  71. 5:07–5:09उसे इंटिजार क्यो करना चाएए?
  72. 5:09–5:11क्यो कि उसे पानी और मिटी चाएए.
  73. 5:11–5:15लेकिन तर्क का एक बहुत फीब बुनियादी नियम है.
  74. 5:15–5:18यदि वहे बीज भंडार मे रखा है,
  75. 5:18–5:20महीनो तक अंकुरित नहीं हो रहा है,
  76. 5:21–5:22तो इसका सीथा सा अर्थ है,
  77. 5:22–5:24कि वहें उस विष्च्ट शन में,
  78. 5:24–5:26अंकुर पैदा करने में असमर्त है.
  79. 5:27–5:28एक ही वस्तु,
  80. 5:28–5:29एक ही समय में,
  81. 5:29–5:30समर्त,
  82. 5:30–5:31और असमर्त,
  83. 5:31–5:34आऽसे दो परस पर विरोदी गुनो वाली नहीं हो सकती.
  84. 5:34–5:37इसलिये जो भीज बंदार मे रखा है
  85. 5:37–5:40और जो भीज खेट मे पानी मिलने पर अंकुरित हो रहा है
  86. 5:40–5:42वे एक नहीं है
  87. 5:42–5:44और ये तो बे दो गल अग शनिक सत्ताए हैं
  88. 5:44–5:47और इसी लोगिक को अगर हम चेतना पर लागु करें
  89. 5:47–5:50तो नेरात्मवाद सिथ होता है
  90. 5:50–5:55जिसे आप आत्मा कहती है, वे वास्तो में चेतना का एक शनिक प्रवाज मातर है.
  91. 5:55–5:58इसे हम विग्यान सन्तान कहते है.
  92. 5:58–6:02एक शन उबरता है, तुसरे को जन्म देता है और नश्थ होँजाता है.
  93. 6:02–6:05कोई नित्त मैं पीचे बैटकर देख नहीं रहा है.
  94. 6:05–6:13अपकी बातों से ये बात बलकुल साफ अबर कर आ़गी है, कि खषनिक वाद विनाश को चीजों का मुल सवभाव मानता है.
  95. 6:13–6:19और यही से हमारी चर्चा के एक बहुत लिए गेरे वैचारी क मतभेद की शुर्वात होती है.
  96. 6:19–6:22आप ये कह रहे हैं कि चीजें बिना किसी बहरी कारनके
  97. 6:22–6:24बस अपने आप नश्थ हो जाती हैं
  98. 6:24–6:25जी भिल्कुल
  99. 6:25–6:27हम इसे आहेतुक विनाश कहते हैं
  100. 6:27–6:28आहेतुक मतलब
  101. 6:28–6:30जिसका कोई हेतू या कारन नहों
  102. 6:30–6:33ये तो तरक से बहागने वाद हुई ना
  103. 6:33–6:35बिना कारन के विनाश कैसे हो सकता है?
  104. 6:35–6:37नहीं, ये बागना नहीं है,
  105. 6:37–6:39बवध तर की ये है,
  106. 6:39–6:41कि विनाश किसी वस्तु का सबहाव है.
  107. 6:41–6:45वस्तुए बिना किसी बाहरी कारन के सुतही नष्त हो जाती हैं.
  108. 6:45–6:48क्योंकी उनका अस्तित फीए एक शन का है?
  109. 6:48–6:52अगर किसी वस्तुके विनाश के लिए, किसी बाहरी कारन की ज़र्वत होती,
  110. 6:52–6:57तो इसका मतलब यह उता, कि वो वस्तु तब तक स्थाई रहती,
  111. 6:57–6:59जब तक वो कारन ना जाए.
  112. 6:59–7:02दिखे, मैं समच्ती हूं के आप आप यह साथ क्यों सुचते हैं,
  113. 7:02–7:06अगर आम मान ले के विनाश आहेतुक है, मतलब अपने आप होता है,
  114. 7:06–7:09तो इसके केवल दो ही लोगिल परनाम हो सकते है.
  115. 7:09–7:11आच्छ? कोंषे दो परनाम?
  116. 7:11–7:13या तो विनाश कभी होगा ही नहीं,
  117. 7:13–7:17क्योंकि उसे त्रिगर करने वाला कोई कारन ही मोईजुद नहीं है.
  118. 7:17–7:19या तो वो विनाश कभी होगा ही नहीं
  119. 7:19–7:19विनाश कभी होगा ही नहीं
  120. 7:19–7:19विनाश कभी होगा ही नहीं
  121. 7:19–7:19विनाश कभी होगा ही नहीं
  122. 7:19–7:19विनाश कभी होगा ही नहीं
  123. 7:19–7:19विनाश कभी होगा ही नहीं
  124. 7:19–7:19या विनाश कभी होगा ही नहीं
  125. 7:19–7:19या विनाश कभी होगा ही नहीं
  126. 7:19–7:22वूँविनाश हमेशा होता रहेगा जिस्से किसी वस्तुका कभी जन्म ही नहीं होपाएगा?
  127. 7:23–7:25चली यह से बहुत व्यावहारे कुदारन्चे समचते है,
  128. 7:26–7:28दन्दे के प्रहार से गड़े का तुटना.
  129. 7:29–7:31अआ, गड़े का उदारन्चे दरशन में बहुत आम है.
  130. 7:31–7:34दन्दे के प्रहार से गड़े का तुटना
  131. 7:34–7:37अआ, गड़े का उदारन दर्षन में बहुत आम है
  132. 7:37–7:40मान लिजे एक कुमार का गड़ा रखचा है
  133. 7:40–7:43और कोई उस पर जोर से दन्दा मारता है
  134. 7:43–7:45जिस से गड़ा तुट जाता है
  135. 7:45–7:47भी बद़न्ड़ की बादी ज़़ुरती किव पडी
  136. 7:47–7:49मुझे खेद है, लेकिन मैं इस बाद को बिलकुल नहीं पादी
  137. 7:49–7:51क्यो? यह तो सीथा सा तरक है
  138. 7:51–7:53मैं बताता हूँ क्यो
  139. 7:53–7:55जब आप दन्ड़ और गड़े की बाद करती है
  140. 7:55–7:57तो आप वास्तविक्ता को
  141. 7:57–8:02तो गड़े को बिना दन्दे के ही बनते ही तूर जाना जाना जाना जाने ता
  142. 8:02–8:04दन्दे की जरूरत ही क्यो पडी?
  143. 8:04–8:08मुझे खेद है, लेकिन मैं इस बात को भिलकुल नहीं मानता.
  144. 8:08–8:10क्यो? ये तो सीथा सा तरक है?
  145. 8:10–8:11मैं बताता हो क्यो.
  146. 8:11–8:14जब आप दन्दे और गड़े की बात करती है,
  147. 8:14–8:16तो आप वास्टविक्ता को बहुत्टी,
  148. 8:17–8:19बहुत्टी मोटे तोर पर देख रही है.
  149. 8:19–8:22आप शूच रही है कि दन्दे ले उस गड़े को नश्ट कर दिया.
  150. 8:23–8:25लेकिन बोद दर्षन की अनुसार,
  151. 8:25–8:28दन्दे ने उस गडे का विनाश नहीं किया है
  152. 8:28–8:33दन्दे के प्रहार ने एक नईशनिक श्रिंख्डा को जन्मदिया है
  153. 8:33–8:36जिसे आप कपाल या गड़े के तुक्डे कहती है
  154. 8:36–8:39ये तो सर्फ शब्दों का खेल लग रहा है
  155. 8:39–8:42नहीं इसे आप फिल्म की एक रील कितरा समजी एं
  156. 8:42–8:45वो ग़ा तो वैसे भी हर पल बडल रहा था
  157. 8:45–8:48ग़ा चन एक ग़ा चन दो
  158. 8:48–8:50दन्दे के समपरक में आने से बसितना हुए
  159. 8:50–8:52की गड़े वाली रील रूग गी
  160. 8:52–8:55और तुक्डो वाली एक नहीं रील शूरू होगगगग
  161. 8:55–8:57दन्दा नहीं शिंखला का का खारन है
  162. 8:57–8:59पूरानी श्रिंक्ला के विनाश का नहीं
  163. 8:59–9:01विनाश तो हरपल हो ही रहा था
  164. 9:01–9:03लेकिन आँ...
  165. 9:03–9:07आप खुदी केरे हैं कि दंदे के समपरक में आने से
  166. 9:07–9:10गड़े वाली रील रुग ग़ाए और तुक्षुण वाली रील शुरू होगग़ाए
  167. 9:10–9:16यदि आप ये स्विकार करते है कि दन्दे ने उस प्रवाह की दिशा बदल दी, तो आप मान रहे है,
  168. 9:16–9:20कि उस बदलाव के लिए एक बाहरी कारन ने रस्तक्षेप की आगे.
  169. 9:20–9:25न दिशा बदलना और विनाश करना अलग �alak cheezhe hai.
  170. 9:25–9:28बिना दन्दे के वो गड़े वाली रील चलती रहती ना?
  171. 9:28–9:31और यह दी बाहरी कारन का रस्तक्षेप आवश्शक है,
  172. 9:31–9:34तो आपका एहे तुक विनाशका सिद्दान्त वही गर जाता है?
  173. 9:34–9:39तीक है, लेकिन जरा रूकिये, अगर आप खहती है कि वस्तुए स्ताई है,
  174. 9:39–9:45तो फिर हम भाशा और याथार्त के एक बड़े विरोदाबास में पहस जाते हैं.
  175. 9:45–9:51और यही से हम अपोवाद या थेरी अप एकस्क्लुजन की दून्या में प्रवेश करते हैं.
  176. 9:51–9:57ये अपोवाद क्या है? और यक शनिक बनाम स्थाए बहेश से कैसे जुडता है?
  177. 9:57–10:01देखेए आप मानती हैं कि दुन्या में चीजें स्ताई हैं
  178. 10:01–10:04और जब हम किसी चीजेंस का नाम लेते हैं
  179. 10:04–10:07तो वो शब्द किसी स्ताई यदार्थ को दर्षाता है
  180. 10:07–10:10लेकिन हम कैते हैं कि शब्द किसी सकरात्मक
  181. 10:10–10:13स्ताई यदार्थ को नहीं दर्षाते
  182. 10:13–10:18वे केवल अन्नेके बहिषकार, यानी अईक्स्कलुजन को दर्षाते हैं.
  183. 10:18–10:19अन्नेका बहिषकार?
  184. 10:19–10:20मतलप!
  185. 10:20–10:23जैसे जब हम गाई शब्द कहते हैं,
  186. 10:23–10:25तो न्याई वैशेशिक वाले मानते हैं,
  187. 10:25–10:28कि दूनिया में गोत्व नाम की कोई स्थाए जाती है.
  188. 10:28–10:33लेकिन वास्त्विक्ता मे केवल विषिष्ट्ख शनिक परमानू है
  189. 10:33–10:38गाय शब्द केवल एक ही आगी आगाय का बहिष्कार
  190. 10:38–10:43यानि जो गाय नहीं है जैसे कुट्ता या पत्धर उसका निषेद
  191. 10:43–10:47शब्द केवल हमारे दिमाक दवारा बनाई गय सीमाव को परिबाशित करते हैं.
  192. 10:48–10:50औरे, ये है इक दिलचस्ट पोझट है.
  193. 10:51–10:56लेकिन उदायनाचार्यने इस में एक बहुत फीश्ट परस्पराश्ष्रै दोश,
  194. 10:56–10:59यानी स्विल्ग रीजनिंग पक्डी है.
  195. 10:59–11:04ज़रा त्धदे दिमाक से सुच्छिए, यदि हम ये जानते ही नहीं,
  196. 11:04–11:08की एक सकारात्मक गाय क्या है, तो हम आग गाय,
  197. 11:08–11:11यानी जो गाय नहीं है, उसको कैसे पच्चानेंगे?
  198. 11:11–11:16वं आप निशे उसके लक्षनो के निशेद से पच्चानते है,
  199. 11:16–11:18अपको आग का निशेद करने के लिए पहले आगान होना चाही ना?
  200. 11:18–11:22ये तो वही बात होगे, कि मैं आप से पूछु, कि प्रकाष क्या है?
  201. 11:22–11:26और आप कहें, जो अंदकार नहीं है, वो प्रकाष है.
  202. 11:26–11:28ये तो गोल-गोल गूमने बात होगे.
  203. 11:28–11:30यह बवाशा की सीमा है
  204. 11:30–11:32नहीं, इनसान का विवाहारेक मनोविग्यान
  205. 11:32–11:34इस तरे काम नहीं करता
  206. 11:34–11:36जब एक विक्ती को प्यास लकती है
  207. 11:36–11:38तो वो ये सुचकर पानी लेने नहीं जाता
  208. 11:38–11:40की मुझे आफी चीस चाहिजे
  209. 11:40–11:42बाशा बाहरी यदारत को सकरात्मक रूप से इंगित करती है
  210. 11:42–11:44लेकिन जब आप खुमने बाश हो ग़ी
  211. 11:44–11:46ये गोल-गोल गूमना नहीं है
  212. 11:46–11:48ये बाशा की सीमा है
  213. 11:48–11:50नहीं अजन का विवाहारेक मनोविग्यान इस तरे काम नहीं करता
  214. 11:50–11:52जब एक व्यकती को प्यास लकती है
  215. 11:52–11:55तो वो ये सुचकर पानी लेने नहीं जाता,
  216. 11:55–11:58कि मुझे आजी चीस चाहिये जो आप पानी नहो,
  217. 11:58–12:01वो बहुती सकरात्मक रूप से सुचता है,
  218. 12:01–12:04ये पानी है और मुझे आपनी प्यास भुजानी है,
  219. 12:04–12:08भाशा बाहरी यतार्त को सकरात्मक रूप से इंगित करती है.
  220. 12:08–12:09इंगित करती है.
  221. 12:09–12:12लेकिं जब आप ख़ती हैं कि ये पानी है,
  222. 12:12–12:14तो आप अपने दिमाग में येख सारुब हो में
  223. 12:14–12:16पानी पन की कलपना कर रही हैं,
  224. 12:16–12:18जो वास्तविक्ता में है ही नहीं.
  225. 12:18–12:20वास्तविक्ता में केवल विषिष्ट
  226. 12:20–12:22क्षनिक परमानों का एक जुन्द है.
  227. 12:22–12:27और इसी बाथ से हम विग्यानवाद या सबज्टिव अईडिलिटम पर पहुटते हैं
  228. 12:27–12:30क्या आपने सहे उपलब नीम के बारे में सुचचा है?
  229. 12:30–12:33ये नीम किस टन्ट्र पर काम करता है?
  230. 12:33–12:38सह उपलब का मतलब है कि तो चीजों का हमेशा एक सात अनुबभ होना
  231. 12:38–12:47ये नियम केता है कि गयान यानी जानने की क्रिया और गेय जो विशे जाना जारा है वे दोनो अबहिन आप एक ही है
  232. 12:47–12:49एक ही है? ये कैसे संबव है?
  233. 12:49–12:52किंकि जब भी आप किसी निले रंको देकती है
  234. 12:52–12:57तो निले रंक का होना और आपके भीतर निले रंक के गयान का पैडा होना
  235. 13:08–13:10वो का कोई सुत्टर अस्तित्व है ही नहीं?
  236. 13:10–13:12मैं इस तरक से भिलकोल आश्वस्त नहीं हूं
  237. 13:12–13:16कियोंकि या अनुबहव के बुन्यादी सुरूप कोई नकार रहा है
  238. 13:16–13:19ग्यान और गेय कभी एक नहीं हो सकते
  239. 13:19–13:22देखे ग्यान प्रकाषक है जो दिखाता है
  240. 13:22–13:25अर बाहरी वस्तु प्रकाश्श्य अगे जो दिखाई जाती है
  241. 13:25–13:30क्या एक दीपक और वो कम्रा जिसे दीपक रोशन कर रहा है
  242. 13:30–13:31वे दोनो एक ही चीज हैं
  243. 13:31–13:35वा एक बहुते क उदारन हैं चेतना अलक तरसे काम करती हैं
  244. 13:35–13:41राज महल के पाटक पर खडे हाती का, बहुत इशान्दार और वियंग्यात्मक द्रश्णान्त दिया है.
  245. 13:41–13:42अच्छ?
  246. 13:42–13:45राज महल के पाटक पर हाती? ये कैसे काम करता है?
  247. 13:45–13:48मान लिजे राद का बहुत गेरा अंदेरा है.
  248. 13:48–13:52राज महल के पाटक पर एक असली विशाल काई हाती बन्दा हूँ अख्राँ है
  249. 13:53–13:57तबही वहां एक एक असा वेकती आता है, जो बहुत बुद्दिमान नहीं है
  250. 13:57–14:00वो अंदेरे में हाती की दुंदली सी अक्रती देखता है
  251. 14:00–14:02वो सुचता है, शायद ये बादल है
  252. 14:02–14:05फिर सुचता है शायत कोई बडी परचाई है
  253. 14:05–14:07उं। तीक है
  254. 14:07–14:10जब वो किसी निशकरष पर नहीं पूच पाता
  255. 14:10–14:11तो वो जुंजला कर कहता है
  256. 14:11–14:14औरे चोडो यहां कुजबी नहीं यह सब ग्रम है
  257. 14:14–14:15उदेना चर यह कहते है
  258. 14:15–14:18कि टीक इसी तरा बोध दुदार्षनिक
  259. 14:18–14:23जब इस जटेल यतार्त को अपने सीमित तर्कों से समझ नहीं पाते,
  260. 14:23–14:25तो वे अपनी बध्धिक विपल्ता को चिपाने के लिए,
  261. 14:25–14:28संसार को ही शुन्या गोषित कर देते हैं.
  262. 14:28–14:30वे हाती को पचानने के बजाए,
  263. 14:30–14:33उसके अस्तित हो को ही नकार देते हैं.
  264. 14:33–14:37ये एक बहुत्टी चतृर साहित्तिग रंग है, इस में कोई शक नहीं.
  265. 14:37–14:41लेकिन दाशनिक रूप से ये हमारे तर्क को खारिज नहीं करता.
  266. 14:41–14:45उस हाती को ब्रहम कहने वाला वकती मुर्क हो सकता है,
  267. 14:45–14:48लेकिन अगर हम सुक्ष्मता से ये सिथ द कर दें,
  268. 14:48–14:54कि जिसे आप हाती कहरे हैं, वो महेंस परमानुवो के एक शनिक समूह के �alawa kuch nahi hai,
  269. 14:54–14:58तो शून्यवाद मुरक्ता नहीं रहे जाती. हम उस हाती को विखधन्टित कर रहे हैं.
  270. 14:58–15:01लेकिन अगर हम सब कुछ विखधन्टित कर दे,
  271. 15:01–15:03तो हम एक आजे खटरे की तरव बड़ते हैं,
  272. 15:03–15:06जो हमारे पूरे समाज और मनो विग्यान को ही डहा देगा.
  273. 15:06–15:10नैति कुट्टर दाइत्व, यानी मोरल रिस्पौँआट्बिलिती का क्या होगा?
  274. 15:10–15:13अगर मैं हर पल बडल रही हूँ,
  275. 15:13–15:15रब पल मरकर एक नहीं वक्ती बन रही हूं
  276. 15:15–15:18तो जो मैंने कल अप्राद की आथा
  277. 15:18–15:20उसकी सजा आज मुजे कैसे मिलेगी?
  278. 15:20–15:24मैं समज रहा हूं की आप इसे एक समस्स्या के रुप में क्यों देख रही हैं
  279. 15:24–15:26लेकिन इसका उत्तर है आले विग्यान
  280. 15:26–15:56या वो ब़वाज खाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाई
  281. 15:56–15:59लेकिन फिर भी हम उसे गंगा ही केरते हैं
  282. 15:59–16:03इसके लिए किसी स्थिर आत्मा की आवश्वक्ता बिलकुल नहीं है
  283. 16:03–16:06रिले रेस का उदारन्द सुन्ने में बहुत अच्छा है
  284. 16:06–16:14लेकिन रिले रेस में बैटन पकरने किलिए दावकों का होना जरूरी है
  285. 16:14–16:19यदि कर्म करनेवाला और पल भोगनेवाला दो गलग गलक शनिक सत्ताः हैं,
  286. 16:19–16:22तो न्याय का पुरा दाचा ही चर्मरा जाएगा.
  287. 16:22–16:27इसे भार्तिय दर्षन में क्रित्प्रनाश और अक्रता भ्यागम का दोश कहा जाता है.
  288. 16:27–16:32अगर मैंने चोरी की, तो खषनिक वाद के अनुसार, अगले ही पल मैं नहीं सत्ता बन गय.
  289. 16:32–16:36जिस मुजने चोरी की थी, वो तो उसी खषन नश्थ होग़ए.
  290. 16:36–16:38तो आदालगत सचा किसे देगी?
  291. 16:38–16:41ये तो अग्रता भ्यागम हूँना?
  292. 16:41–16:46बवाद बवाद विज्यानिक स्थर पर एक नवजाज शिषु को देखिए,
  293. 16:46–16:51जन्म लेते ही बिना सिखाई वो स्टन्पान के लिए प्रैयास करने लकता है.
  294. 16:51–16:53ये कहा से आया?
  295. 16:53–17:23उज़न्म लेते ही बिना सिखाई वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो
  296. 17:23–17:26तिकने के लिए एक स्थाई आश़्े चाहिये
  297. 17:26–17:29और वही नित्ते आत्मा है
  298. 17:29–17:31जिसे आप नित्ते आत्मा कहरें है
  299. 17:31–17:34नवजात शिषु की वो प्रव्रत्ती भी
  300. 17:34–17:36उसी जेविक प्रवाहा का हिस्था है
  301. 17:36–17:38जिसे हम आले विग्यान कहते हैं
  302. 17:38–17:44आप मानती है कि मोतियों को पिरोनेवाला दागा नहीं होगा तो मोति बिखर जाएंगे.
  303. 17:44–17:49लिकिन हम केते है कि केवल मोतियों का एक अबाद प्रवाह है.
  304. 17:49–17:51दागा कभी थाई ही नहीं.
  305. 17:51–17:56आत्मा वास्तव में हमारे आहिंकार और लगाव का ही तुस्रा नाम है.
  306. 17:56–18:00अनुबवव के लिए एक अनुबव करता का हुना आवश्षक है,
  307. 18:00–18:03जो न सभी पलों को एक सुत्र में बान सके.
  308. 18:03–18:10ख़र मुझे लखता है कि या एक आईसा बिन्दू है जहां हमारे द्रुष्टिकोर श्पप्ष्ट रूप से एक दूस्रे को चुनाउती देते रहेंगे.
  309. 18:10–18:15तो चलिये इस भेहत गेहरी चर्चा को समेटने का प्रैआस करते हैं
  310. 18:15–18:16आप बिलकुल
  311. 18:16–18:21उदेनाचारे के तरकों और गजेंद्र ताकृर के शांदार अनुवाद के माद्धियम से
  312. 18:21–18:27अज मेरी समज यही कहती है कि इस ब्रमान को समजने के लिए एक स्थाए यदार्त की आवश्च्टा है.
  313. 18:27–18:31कारन्ड और कारे कि स्थिर्ता, हमारी यादों कि प्रामानिक्ता,
  314. 18:31–18:34यस दिक निरन्तर आत्मा की बिना टिकी नहीं सकता.
  315. 18:34–19:04तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ �
  316. 19:04–19:07अद्रायी से निखारा है, और हम दोनो इस बाथ से सहमत हैं,
  317. 19:07–19:10कि गजेंद्र ताकुर के उत्करिष्ट अनुवादने
  318. 19:10–19:13इस विमर्ष्ख को फिर से हमारे सामने लाके
  319. 19:13–19:15एक बहुत बडा अकाटमिक योग्डान दिया है.
  320. 19:15–19:20बिल्कुल इन तर्कोंने सच मे हमे ये सोचने पर मजबोर कर दिया है,
  321. 19:20–19:24के वास्तविक्ता के पीचे का तन्त्र कैसे काम करता है?
  322. 19:24–19:26तो आब ये हम अपने श्रोटामों पर चोडते हैं.
  323. 19:26–19:30जब आप अब अब अगली बार किसी बहेती हूँँँँ नदी को देखें,
  324. 19:30–19:34तो खुट से ये सवाल ज़ोर पूछें, क्या आप उस पानी की तरा है,
  325. 19:34–19:36जो हर पल बदल रहा है?
  326. 19:36–19:40या फिर आप उस नदी के तल में मुझुद वो स्थाई चटान है,
  327. 19:40–19:44जो उस बदलते प्रवा को शानती से महसुस कर रही है.
  328. 19:44–19:46सोचने किले बहुत कुछ है.
  329. 19:46–19:49तब दिबेट में हमारे सा जुनने के लिग द्धानिवाद

Plain text

मानलीजे आब जिस कुर्सी पर आभी बेटी है या बेटी है, वो एक सेकंट से दुस्रे सेकंट तक वास्टव में अस्तित्व मेही नहों. मतलब वो रपल पुरी तरा से नष्ट हो रही हो? बिल्कुल! या हो अगर ये विचार ही एक-एक ब्रहम हो, कि जो व्यक्ती इस वाक्के को सुन्ना शूँड़ा रहा था वही व्यक्ती इस वाक्के के खत्म होने पर भी मुझुद है हम जब भी अपने आस्पास की दॉन्या को देखते हैं तो हमें बहुती गेरी आश्वस्ट करने वाली स्तिरता दिखाई देती है आँ, जेसे हम किसी मेज को चुते है, तो एक दम ठोस लकती है. सही कहा, बहुत दिकी और हमारा रोस मर्रा का अनुबव, हमें यही बताता है, कि चीजें जैसी है, वैसी ही बनी रहती है. लेकिन क्या हो अगर वो मेज वो व्यक्ती और यहां तक की आप स्वायम भी हर एक पल में नश्थ हो रहे हों और एक बिल्कुल नहें रूप में जन में जन में ले रहे हों विमर्ष और �alagalag द्रिष्टी कोनो के इस बोध दिख मंच देबेट में आपका स्वागत है बवहाती गेरा विशे है आजका. हम अपनी पूरी जिन्दगी ये मानकर जीते है, कि दूनिया में एक तहराव है. लेकिन जब हम चीजों को उनके सबसे सुख्श्मस्तर पर देकते है, तो क्या वाखाई को यस थिरता है? अर इसी बूनियादी सवाल पर आज हम चर्चा कर रहे हैं क्या ये ब्रम्मान्द और हमारा यतार्त एक इक स्थाई निरंतर सत्टापर्टिका है या फिर ये मूलत है ख्षनिक है आज की चर्चा का आदार कोई सामान्ने सामगरी नहीं है अम गयरमी शताबदी के एक बहद कालजाई गरन्त आत्मतत्व विवेक पर बात कर रहे हैं। जो की महां दार्षनिक उदना चारे दूरा लिखा गया आता. रहां! बिलकु, या गरन्त मुख्हे रूप से नयाय, वैशेषिक और बोध ददर्षन के भीच हुए सहस्राब्दी व्यापी शास्त्रार्त का एक बहुत्छी शान्दार दस्तावेज है और सब से अच्छी बाद ये है के हाली में गजेंद्र ताकुर ने इस अट्टिंत जटिल गरन्त का में अद्टिली में इक इक बहुत उत्क्रिष्ट अकाद्दमिक अनुवाद की आए और सचका हूँ तो इस अनुवाद ने इस प्राछीन बहेस को आजके आदमिक बोद्टिक विमर्ष के लिए फिर से खोल दिया है एक दम सही तो आजकी इस चर्चा में न्याये वे शेशेक और उदेनाचारे के द्रिष्टिकोंका प्रतिनेदिदव कर रही हूं. मेरा ये द्रड मानना है की यतार्त स्थाई है, बाहरी जगत सत्तिय है और एक निरन्तर आत्मा का अस्तित्व अकात्य है. और मैं, मैं बोद्ददर्षन के परप्रेखष्य को सामने रखूगगा. मैं इस द्रिष्टिकोन का प्रतिनदित्व करता हूँ, किक्षनिक्वाद, यानी ये सिद्धान्त की सब कुछ केवल एक शन के लिये है, अर नेरात में अवाद, यानी कोई स्थाई आत्मा नहीं है, यही दूनिया को समजने का सब से तारकिक तरीका है. तो चलिये, हम दोनो पहले अपने-अपने बुन्यादी द्रिष्टिकोन को सपष्ट कर देते हैं. देखे, मैं ये सपष्ट करन चाती हूँ, कि वास्तविक्ता को समजने के लिये ना स्थाईत्वा या जिसे आम परमनिन्स कहते हैं वो नितानत आवश्षक है ज़र सुचिए यदि हर वस्तूक शनिक है अगर हर चीज रर पल नष्थ हो रही है तो कारन और प्रभाव का यानी कोज इन अप्टक्का कोई अर्थी नहीं रहे जाता? लिकिन हम कारन और प्रभाव को अलक तरीके से परिभाशित करते हैं एक मिनेद, मुझे अपनी बाद पूरी करने दीजे विग्यान और हमारा व्यवावाहारेग जीवन इसी पर्टिका है, कि अगर मैं आज खुछ करूंगी, तो कल उसका परडाम मिलेगा. और मनोविग्यान में जिसे हम प्रत्यबिग्या कहते है, यान इस म्रिती और पहचान, वो सबसे बड़ा सबुध है. हम कहते है, कल जिस वेक्ती ने जबात कानुबहव किया ता, आज वही वेक्ती उसे याद कर रहा है. आप वर वे ब्रहम भी तो हुऽ सकता है ना? कैसे? ये जो एक तव या अड़ेंटिती कानुबहव है ये एक स्थाई आत्मा के बिना बिलकुल असंबभ है. इसे हम, बीज और अंकुर के दिश्टान से समथ सकते है. अगर उब बीज किसी भंडार गर मे रख्खा है, तो उब तुरन्त इसले नहीं पनवता, क्युकि उसे पानी, मिट्टी जैसे सहकारी कारनो की आवशक्ता होती है. इसका अर्थ ये बिल्खुल नहीं है, कि वो बीज क्षनिक है, या उसकी मूल छम्ता बडल गगी है. अब मैं इसे एक बिल्कुल अलग नजर्ये से देखते हूँ। शनिक वाद कोई खोरी बोद्धिक कल्पना नहीं है। यह यतार्त का सबसे सुक्ष्म विष्लेशन है। बध्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द तुब से मुजुद है, तुटूए तुरन्त अंकुरित होना चाएए, उसे इंटिजार क्यो करना चाएए? क्यो कि उसे पानी और मिटी चाएए. लेकिन तर्क का एक बहुत फीब बुनियादी नियम है. यदि वहे बीज भंडार मे रखा है, महीनो तक अंकुरित नहीं हो रहा है, तो इसका सीथा सा अर्थ है, कि वहें उस विष्च्ट शन में, अंकुर पैदा करने में असमर्त है. एक ही वस्तु, एक ही समय में, समर्त, और असमर्त, आऽसे दो परस पर विरोदी गुनो वाली नहीं हो सकती. इसलिये जो भीज बंदार मे रखा है और जो भीज खेट मे पानी मिलने पर अंकुरित हो रहा है वे एक नहीं है और ये तो बे दो गल अग शनिक सत्ताए हैं और इसी लोगिक को अगर हम चेतना पर लागु करें तो नेरात्मवाद सिथ होता है जिसे आप आत्मा कहती है, वे वास्तो में चेतना का एक शनिक प्रवाज मातर है. इसे हम विग्यान सन्तान कहते है. एक शन उबरता है, तुसरे को जन्म देता है और नश्थ होँजाता है. कोई नित्त मैं पीचे बैटकर देख नहीं रहा है. अपकी बातों से ये बात बलकुल साफ अबर कर आ़गी है, कि खषनिक वाद विनाश को चीजों का मुल सवभाव मानता है. और यही से हमारी चर्चा के एक बहुत लिए गेरे वैचारी क मतभेद की शुर्वात होती है. आप ये कह रहे हैं कि चीजें बिना किसी बहरी कारनके बस अपने आप नश्थ हो जाती हैं जी भिल्कुल हम इसे आहेतुक विनाश कहते हैं आहेतुक मतलब जिसका कोई हेतू या कारन नहों ये तो तरक से बहागने वाद हुई ना बिना कारन के विनाश कैसे हो सकता है? नहीं, ये बागना नहीं है, बवध तर की ये है, कि विनाश किसी वस्तु का सबहाव है. वस्तुए बिना किसी बाहरी कारन के सुतही नष्त हो जाती हैं. क्योंकी उनका अस्तित फीए एक शन का है? अगर किसी वस्तुके विनाश के लिए, किसी बाहरी कारन की ज़र्वत होती, तो इसका मतलब यह उता, कि वो वस्तु तब तक स्थाई रहती, जब तक वो कारन ना जाए. दिखे, मैं समच्ती हूं के आप आप यह साथ क्यों सुचते हैं, अगर आम मान ले के विनाश आहेतुक है, मतलब अपने आप होता है, तो इसके केवल दो ही लोगिल परनाम हो सकते है. आच्छ? कोंषे दो परनाम? या तो विनाश कभी होगा ही नहीं, क्योंकि उसे त्रिगर करने वाला कोई कारन ही मोईजुद नहीं है. या तो वो विनाश कभी होगा ही नहीं विनाश कभी होगा ही नहीं विनाश कभी होगा ही नहीं विनाश कभी होगा ही नहीं विनाश कभी होगा ही नहीं विनाश कभी होगा ही नहीं या विनाश कभी होगा ही नहीं या विनाश कभी होगा ही नहीं वूँविनाश हमेशा होता रहेगा जिस्से किसी वस्तुका कभी जन्म ही नहीं होपाएगा? चली यह से बहुत व्यावहारे कुदारन्चे समचते है, दन्दे के प्रहार से गड़े का तुटना. अआ, गड़े का उदारन्चे दरशन में बहुत आम है. दन्दे के प्रहार से गड़े का तुटना अआ, गड़े का उदारन दर्षन में बहुत आम है मान लिजे एक कुमार का गड़ा रखचा है और कोई उस पर जोर से दन्दा मारता है जिस से गड़ा तुट जाता है भी बद़न्ड़ की बादी ज़़ुरती किव पडी मुझे खेद है, लेकिन मैं इस बाद को बिलकुल नहीं पादी क्यो? यह तो सीथा सा तरक है मैं बताता हूँ क्यो जब आप दन्ड़ और गड़े की बाद करती है तो आप वास्तविक्ता को तो गड़े को बिना दन्दे के ही बनते ही तूर जाना जाना जाना जाने ता दन्दे की जरूरत ही क्यो पडी? मुझे खेद है, लेकिन मैं इस बात को भिलकुल नहीं मानता. क्यो? ये तो सीथा सा तरक है? मैं बताता हो क्यो. जब आप दन्दे और गड़े की बात करती है, तो आप वास्टविक्ता को बहुत्टी, बहुत्टी मोटे तोर पर देख रही है. आप शूच रही है कि दन्दे ले उस गड़े को नश्ट कर दिया. लेकिन बोद दर्षन की अनुसार, दन्दे ने उस गडे का विनाश नहीं किया है दन्दे के प्रहार ने एक नईशनिक श्रिंख्डा को जन्मदिया है जिसे आप कपाल या गड़े के तुक्डे कहती है ये तो सर्फ शब्दों का खेल लग रहा है नहीं इसे आप फिल्म की एक रील कितरा समजी एं वो ग़ा तो वैसे भी हर पल बडल रहा था ग़ा चन एक ग़ा चन दो दन्दे के समपरक में आने से बसितना हुए की गड़े वाली रील रूग गी और तुक्डो वाली एक नहीं रील शूरू होगगगग दन्दा नहीं शिंखला का का खारन है पूरानी श्रिंक्ला के विनाश का नहीं विनाश तो हरपल हो ही रहा था लेकिन आँ... आप खुदी केरे हैं कि दंदे के समपरक में आने से गड़े वाली रील रुग ग़ाए और तुक्षुण वाली रील शुरू होगग़ाए यदि आप ये स्विकार करते है कि दन्दे ने उस प्रवाह की दिशा बदल दी, तो आप मान रहे है, कि उस बदलाव के लिए एक बाहरी कारन ने रस्तक्षेप की आगे. न दिशा बदलना और विनाश करना अलग �alak cheezhe hai. बिना दन्दे के वो गड़े वाली रील चलती रहती ना? और यह दी बाहरी कारन का रस्तक्षेप आवश्शक है, तो आपका एहे तुक विनाशका सिद्दान्त वही गर जाता है? तीक है, लेकिन जरा रूकिये, अगर आप खहती है कि वस्तुए स्ताई है, तो फिर हम भाशा और याथार्त के एक बड़े विरोदाबास में पहस जाते हैं. और यही से हम अपोवाद या थेरी अप एकस्क्लुजन की दून्या में प्रवेश करते हैं. ये अपोवाद क्या है? और यक शनिक बनाम स्थाए बहेश से कैसे जुडता है? देखेए आप मानती हैं कि दुन्या में चीजें स्ताई हैं और जब हम किसी चीजेंस का नाम लेते हैं तो वो शब्द किसी स्ताई यदार्थ को दर्षाता है लेकिन हम कैते हैं कि शब्द किसी सकरात्मक स्ताई यदार्थ को नहीं दर्षाते वे केवल अन्नेके बहिषकार, यानी अईक्स्कलुजन को दर्षाते हैं. अन्नेका बहिषकार? मतलप! जैसे जब हम गाई शब्द कहते हैं, तो न्याई वैशेशिक वाले मानते हैं, कि दूनिया में गोत्व नाम की कोई स्थाए जाती है. लेकिन वास्त्विक्ता मे केवल विषिष्ट्ख शनिक परमानू है गाय शब्द केवल एक ही आगी आगाय का बहिष्कार यानि जो गाय नहीं है जैसे कुट्ता या पत्धर उसका निषेद शब्द केवल हमारे दिमाक दवारा बनाई गय सीमाव को परिबाशित करते हैं. औरे, ये है इक दिलचस्ट पोझट है. लेकिन उदायनाचार्यने इस में एक बहुत फीश्ट परस्पराश्ष्रै दोश, यानी स्विल्ग रीजनिंग पक्डी है. ज़रा त्धदे दिमाक से सुच्छिए, यदि हम ये जानते ही नहीं, की एक सकारात्मक गाय क्या है, तो हम आग गाय, यानी जो गाय नहीं है, उसको कैसे पच्चानेंगे? वं आप निशे उसके लक्षनो के निशेद से पच्चानते है, अपको आग का निशेद करने के लिए पहले आगान होना चाही ना? ये तो वही बात होगे, कि मैं आप से पूछु, कि प्रकाष क्या है? और आप कहें, जो अंदकार नहीं है, वो प्रकाष है. ये तो गोल-गोल गूमने बात होगे. यह बवाशा की सीमा है नहीं, इनसान का विवाहारेक मनोविग्यान इस तरे काम नहीं करता जब एक विक्ती को प्यास लकती है तो वो ये सुचकर पानी लेने नहीं जाता की मुझे आफी चीस चाहिजे बाशा बाहरी यदारत को सकरात्मक रूप से इंगित करती है लेकिन जब आप खुमने बाश हो ग़ी ये गोल-गोल गूमना नहीं है ये बाशा की सीमा है नहीं अजन का विवाहारेक मनोविग्यान इस तरे काम नहीं करता जब एक व्यकती को प्यास लकती है तो वो ये सुचकर पानी लेने नहीं जाता, कि मुझे आजी चीस चाहिये जो आप पानी नहो, वो बहुती सकरात्मक रूप से सुचता है, ये पानी है और मुझे आपनी प्यास भुजानी है, भाशा बाहरी यतार्त को सकरात्मक रूप से इंगित करती है. इंगित करती है. लेकिं जब आप ख़ती हैं कि ये पानी है, तो आप अपने दिमाग में येख सारुब हो में पानी पन की कलपना कर रही हैं, जो वास्तविक्ता में है ही नहीं. वास्तविक्ता में केवल विषिष्ट क्षनिक परमानों का एक जुन्द है. और इसी बाथ से हम विग्यानवाद या सबज्टिव अईडिलिटम पर पहुटते हैं क्या आपने सहे उपलब नीम के बारे में सुचचा है? ये नीम किस टन्ट्र पर काम करता है? सह उपलब का मतलब है कि तो चीजों का हमेशा एक सात अनुबभ होना ये नियम केता है कि गयान यानी जानने की क्रिया और गेय जो विशे जाना जारा है वे दोनो अबहिन आप एक ही है एक ही है? ये कैसे संबव है? किंकि जब भी आप किसी निले रंको देकती है तो निले रंक का होना और आपके भीतर निले रंक के गयान का पैडा होना वो का कोई सुत्टर अस्तित्व है ही नहीं? मैं इस तरक से भिलकोल आश्वस्त नहीं हूं कियोंकि या अनुबहव के बुन्यादी सुरूप कोई नकार रहा है ग्यान और गेय कभी एक नहीं हो सकते देखे ग्यान प्रकाषक है जो दिखाता है अर बाहरी वस्तु प्रकाश्श्य अगे जो दिखाई जाती है क्या एक दीपक और वो कम्रा जिसे दीपक रोशन कर रहा है वे दोनो एक ही चीज हैं वा एक बहुते क उदारन हैं चेतना अलक तरसे काम करती हैं राज महल के पाटक पर खडे हाती का, बहुत इशान्दार और वियंग्यात्मक द्रश्णान्त दिया है. अच्छ? राज महल के पाटक पर हाती? ये कैसे काम करता है? मान लिजे राद का बहुत गेरा अंदेरा है. राज महल के पाटक पर एक असली विशाल काई हाती बन्दा हूँ अख्राँ है तबही वहां एक एक असा वेकती आता है, जो बहुत बुद्दिमान नहीं है वो अंदेरे में हाती की दुंदली सी अक्रती देखता है वो सुचता है, शायद ये बादल है फिर सुचता है शायत कोई बडी परचाई है उं। तीक है जब वो किसी निशकरष पर नहीं पूच पाता तो वो जुंजला कर कहता है औरे चोडो यहां कुजबी नहीं यह सब ग्रम है उदेना चर यह कहते है कि टीक इसी तरा बोध दुदार्षनिक जब इस जटेल यतार्त को अपने सीमित तर्कों से समझ नहीं पाते, तो वे अपनी बध्धिक विपल्ता को चिपाने के लिए, संसार को ही शुन्या गोषित कर देते हैं. वे हाती को पचानने के बजाए, उसके अस्तित हो को ही नकार देते हैं. ये एक बहुत्टी चतृर साहित्तिग रंग है, इस में कोई शक नहीं. लेकिन दाशनिक रूप से ये हमारे तर्क को खारिज नहीं करता. उस हाती को ब्रहम कहने वाला वकती मुर्क हो सकता है, लेकिन अगर हम सुक्ष्मता से ये सिथ द कर दें, कि जिसे आप हाती कहरे हैं, वो महेंस परमानुवो के एक शनिक समूह के �alawa kuch nahi hai, तो शून्यवाद मुरक्ता नहीं रहे जाती. हम उस हाती को विखधन्टित कर रहे हैं. लेकिन अगर हम सब कुछ विखधन्टित कर दे, तो हम एक आजे खटरे की तरव बड़ते हैं, जो हमारे पूरे समाज और मनो विग्यान को ही डहा देगा. नैति कुट्टर दाइत्व, यानी मोरल रिस्पौँआट्बिलिती का क्या होगा? अगर मैं हर पल बडल रही हूँ, रब पल मरकर एक नहीं वक्ती बन रही हूं तो जो मैंने कल अप्राद की आथा उसकी सजा आज मुजे कैसे मिलेगी? मैं समज रहा हूं की आप इसे एक समस्स्या के रुप में क्यों देख रही हैं लेकिन इसका उत्तर है आले विग्यान या वो ब़वाज खाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाईज़ाई लेकिन फिर भी हम उसे गंगा ही केरते हैं इसके लिए किसी स्थिर आत्मा की आवश्वक्ता बिलकुल नहीं है रिले रेस का उदारन्द सुन्ने में बहुत अच्छा है लेकिन रिले रेस में बैटन पकरने किलिए दावकों का होना जरूरी है यदि कर्म करनेवाला और पल भोगनेवाला दो गलग गलक शनिक सत्ताः हैं, तो न्याय का पुरा दाचा ही चर्मरा जाएगा. इसे भार्तिय दर्षन में क्रित्प्रनाश और अक्रता भ्यागम का दोश कहा जाता है. अगर मैंने चोरी की, तो खषनिक वाद के अनुसार, अगले ही पल मैं नहीं सत्ता बन गय. जिस मुजने चोरी की थी, वो तो उसी खषन नश्थ होग़ए. तो आदालगत सचा किसे देगी? ये तो अग्रता भ्यागम हूँना? बवाद बवाद विज्यानिक स्थर पर एक नवजाज शिषु को देखिए, जन्म लेते ही बिना सिखाई वो स्टन्पान के लिए प्रैयास करने लकता है. ये कहा से आया? उज़न्म लेते ही बिना सिखाई वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो तिकने के लिए एक स्थाई आश़्े चाहिये और वही नित्ते आत्मा है जिसे आप नित्ते आत्मा कहरें है नवजात शिषु की वो प्रव्रत्ती भी उसी जेविक प्रवाहा का हिस्था है जिसे हम आले विग्यान कहते हैं आप मानती है कि मोतियों को पिरोनेवाला दागा नहीं होगा तो मोति बिखर जाएंगे. लिकिन हम केते है कि केवल मोतियों का एक अबाद प्रवाह है. दागा कभी थाई ही नहीं. आत्मा वास्तव में हमारे आहिंकार और लगाव का ही तुस्रा नाम है. अनुबवव के लिए एक अनुबव करता का हुना आवश्षक है, जो न सभी पलों को एक सुत्र में बान सके. ख़र मुझे लखता है कि या एक आईसा बिन्दू है जहां हमारे द्रुष्टिकोर श्पप्ष्ट रूप से एक दूस्रे को चुनाउती देते रहेंगे. तो चलिये इस भेहत गेहरी चर्चा को समेटने का प्रैआस करते हैं आप बिलकुल उदेनाचारे के तरकों और गजेंद्र ताकृर के शांदार अनुवाद के माद्धियम से अज मेरी समज यही कहती है कि इस ब्रमान को समजने के लिए एक स्थाए यदार्त की आवश्च्टा है. कारन्ड और कारे कि स्थिर्ता, हमारी यादों कि प्रामानिक्ता, यस दिक निरन्तर आत्मा की बिना टिकी नहीं सकता. तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ � अद्रायी से निखारा है, और हम दोनो इस बाथ से सहमत हैं, कि गजेंद्र ताकुर के उत्करिष्ट अनुवादने इस विमर्ष्ख को फिर से हमारे सामने लाके एक बहुत बडा अकाटमिक योग्डान दिया है. बिल्कुल इन तर्कोंने सच मे हमे ये सोचने पर मजबोर कर दिया है, के वास्तविक्ता के पीचे का तन्त्र कैसे काम करता है? तो आब ये हम अपने श्रोटामों पर चोडते हैं. जब आप अब अब अगली बार किसी बहेती हूँँँँ नदी को देखें, तो खुट से ये सवाल ज़ोर पूछें, क्या आप उस पानी की तरा है, जो हर पल बदल रहा है? या फिर आप उस नदी के तल में मुझुद वो स्थाई चटान है, जो उस बदलते प्रवा को शानती से महसुस कर रही है. सोचने किले बहुत कुछ है. तब दिबेट में हमारे सा जुनने के लिग द्धानिवाद

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