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भामती_आ_वास्तविकता.mp4

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:30बेस आव आई एक तक गजब के विषेए पर गब करी, नवम शताबदिक अद्वेट विदान्त दर्षन को उगेराई, अवकर एक ता एतिहास इक आदूनिक मेठली अनुवाद, इकोनो सादारन बातनी चे. आज हम सब वास्ट्विक्ता के एक दम्मूल दहरी जबाग प्रय
  2. 0:30–0:34अद्वाइतक महान वास्तुकार अटियासिक संदर्व
  3. 0:34–0:38अगर बाद दूईता प्रमुक विचार दारा कक्तुल्ना
  4. 0:38–0:42फेर हम सब भ्रहम कवास्त्विक्ता जिक्रा इल्यूजन कही च्ये
  5. 0:42–0:45अख्रा भुज्यव अप्रत्ध्हम चारी सुत्र कब विष्लेशन करव
  6. 0:45–0:50अदूनिक मेठ्छली में कते खुद्र तरीका सा उतार लगेल चे तच्छलूँ पहिल कन सा शुर्बात करेज्ची अदवाएदिक वस्तुकार
  7. 0:50–0:55अवदारना सब के आदूनिक मेठली में कते क सुन्दर तरीका सा उतार लगेल चे.
  8. 0:55–0:59तच्छलूँ, पहिल कहन सा शुरबात करेजची अदवाएदिक प्वास्तुकार.
  9. 1:00–1:02एही समपून गंभीर तीका कपाजा,
  10. 1:02–1:04जे मुख्य सूत्रदार चलया,
  11. 1:04–1:08उचला नवम शताब्दिक महान दार्षनी कवाचस पती मिष्र.
  12. 1:08–1:11उनका विषे में जे बात सबसे भेशी हेरान करेत चै,
  13. 1:11–1:15उचै उनकर रचना सबखक कविषाल श्रिंगला.
  14. 1:15–1:17सोचु चोरासी इस्वी दहरी,
  15. 1:17–1:19उनकर न्याय रचना,
  16. 1:19–1:23उनकर एतिहासिक उपस्तिति के मजबूती सद्ठापित कदेत चै.
  17. 1:23–1:25बामती लिख्वा से पहले दहरी,
  18. 1:25–1:27उप्राया सब आस्तिक दर्षन,
  19. 1:27–1:29जैना, सांख्य, योग,
  20. 1:29–1:30अपुर्व मीमान्सा,
  21. 1:30–1:33सब पर प्रामानिक टीका सब लिक चुकल जला,
  22. 1:33–1:37मुदा हुनकर आस्ली मास्तर पीस, हुनकर सर्वूत क्रिष्ट उपलब्दि आएल,
  23. 1:37–1:40नवम शताभ्दी कच्चरम पर भामती.
  24. 1:40–1:42इएतिक प्रभ्हाव कारी चल,
  25. 1:42–1:48जे एक्रासा अदवेत विदान तक एक्ता पूनतया स्वतन्त्र संप्रदायक स्थापना भगेल.
  26. 1:48–1:52आई एही ताम, हम सब एक ता बोछ विलक्ष्छन उपादिक बात करब,
  27. 1:52–1:55सर्वत्र स्वतन्त्र, सून्ने में किते बारी लगे चेना,
  28. 1:55–1:59एकर सीथा अर्थ चे सब तन्त्र वादर्षन कग्याता.
  29. 1:59–2:04बिविन्न्त दार्ष्निक परम्परा सब में हुंकर एहन अध्वित्य विषेश्व्ग्यता चल,
  30. 2:04–2:07जे लोग हुंका एहन उपादी ससम्मानित के लक,
  31. 2:07–2:09अइकोन चोट बात नहीं चे,
  32. 2:09–2:11एह विस्त्रत ज्यान कक खारने,
  33. 2:11–2:15उ एक परिपक्व रूप सा भामतिक रच्ना कर्भा में सक्षम बहसक्ला.
  34. 2:16–2:18आब दोसर कहन्दिस भहेत ची,
  35. 2:18–2:21जते हम सब दूईता प्रमुक विचार दारक चर्चा कर्ब.
  36. 2:22–2:26अद्वायत वेदान्तिक अंतर्गत शंकरा भाश्ष्षक व्याख्या के लक्क,
  37. 2:26–2:56जे एक ता गेहिर दार्षनिक बहेज भेल उब भद्रोचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचच�
  38. 2:56–3:03आब तेसर कहन्द में हम सव ब्रमक प्रक्रिती यानी जे Illusion चे उक्रा खोल के देखव.
  39. 3:03–3:09दैइनिक जीवन में ब्रम आत्रुते कजे अनबवव हम सब करे ची उवास्तव में कोना होए चे
  40. 3:09–3:13एले ल्ट सब सब शब फिले अद्ध्यास के बुज़व आवष्ष्षक चे.
  41. 3:13–3:18आसान शब्द में कही, ता इई एक वस्तुक दोसर वस्तूपर मित्या आरोपन चे,
  42. 3:18–3:22मतलव एक ता वास्ट्विक्ता के दोसर वास्ट्विक्ता मानी लेनाई,
  43. 3:22–3:25जिना शरीर वमन्जेका जि अनात्मक गुन्चे
  44. 3:25–3:28उक्रा शुद अविश्य आत्मापर आरोपित कदेनाई.
  45. 3:28–3:31इबात सुन्ना में तनिक आमुर्त लागी रहे तै.
  46. 3:31–3:36मुदा ग्रन्त में एकर एक ता बड्ड नीक आव्यवाहारे ध्विश्तान्त देल गिल चे.
  47. 3:36–3:44पशु कुदारन खल्पना करु जे कोनो पशु तार थेना लेल, कोनो मनुश्षे के देखाएचे, तो उदरे बाग जाएचे.
  48. 3:44–3:48मुदाजकन उधर यर गास देखाएचे, तो उख्रालग आभी जाएचे.
  49. 3:48–4:00इक देखाराल जे? इदेखावेचे जे एई आरोपन या अद्ध्यास चचे जे पूर्व संचार पर आदारित एक तवरित प्रतीक्रिया चे उसम्पुन जीवदारी में किते गह्राई दरी बैसल चे.
  50. 4:00–4:09आई पर वाच्छस्पती मिष्ष्विपक्षी न्याए दर्षनक सिद्धान्त पर एक्टा बड्ड्ड्व्यंज्यात्मक मुदा अद्भुट प्रहार करे च्छती.
  51. 4:09–4:15अग कहेट च्छती आहो बिचारी प्रतीती के कते एक विलक्षन सबभाग्या प्राप्त च्छै,
  52. 4:15–4:45जे उ मित्थ्यात्वक माद्ध्यम्स सहो निष्च्च्य प्राप्त कष्च्य कि तच्छी इग कोतेशन अपने आप में बहुत किच्चू कहेच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च
  53. 4:45–4:46अन्ना ही दूनु चे.
  54. 4:47–4:50अब मन में प्रष्ने उठेए जे एहन कोना बहसके चे.
  55. 4:50–4:51करन इचे,
  56. 4:51–4:54जे कोनो मात्र प्रतीत होमे वाला वस्तूके,
  57. 4:54–4:57हम सब कडाईसा अस्तित्वो वा अनस्तित्वो में बातने सके चे.
  58. 4:58–4:59उबस अनिरवचनी अचे.
  59. 4:59–5:01उक्रा श्वद में नहीं बानधल जासके चे.
  60. 5:01–5:05मरु मरी चिका या जिक्रा हम सब मरिग मरी चिका कहे चिये
  61. 5:05–5:11उक्र द्रिष्टानत एही अनिरवचनीय सिद्धानत के एक दम नीक जका सपष्ट कदिच चे.
  62. 5:11–5:15मनो जे म्रग मरी च्कामे आरोपित पानी पुनते आँ सत्यो होएत,
  63. 5:15–5:19तो एक तप्यासा लोग आराम से औही मन्दाकिनी नदिक ब्रम लगे,
  64. 5:19–5:22जाके उकर तरंग से पानी पी भी सके चल.
  65. 5:22–5:25मुदा उपानी पी नहीं सके चै, माने उसत्या नहीं चै.
  66. 5:25–5:38मुदा, 2-3 उक्रा उपनी दिखाईत रहले चै, तो उपनत्या असत्या से हो नहीं भल, चैन गजजब का लोजिक, आब एक ता आन गमभीर द्रिष्टान्त पर विचार करे च्छे, नील्मडि कतोरा.
  67. 5:38–5:43जना अवेवेखी बच्छा सब विशाल अनिराकार अखाश के देख कर,
  68. 5:43–5:48उक्रा नील्मडी से बनल एक्ता पेग, उल्टल कतोरा का अखार मानी लेच्छें.
  69. 5:48–5:54तीक अहिना जीव हुबागजे सीमा सब चै, उक्रा अविशै आत्मापर आरोपित कर देईच्छे.
  70. 5:54–5:59अपन अग्यान के कारने निराकार के एक्ता सीमा दादैईच्ये.
  71. 5:59–6:04चलू आब हम सब चारिम कहन्द में प्रत्हम चारी सुत्र दिस बड़ाईच्छी,
  72. 6:04–6:07जक्रा चतू सुत्री कहल जाएच्छे.
  73. 6:07–6:12इजे चारी सुत्र कक्रम चे उआही दार्षनिक शास्त्रार्थ लेल
  74. 6:12–6:14अचारें तत्तु समन्वयात
  75. 6:14–6:18अचारें समपून श्रूति वाख्यक समन्वयात्मक तात्पर्या
  76. 6:18–6:24आउ दिखेच्ये जे वाच्स्पति मिष्ष्य अही व्याख्या सब में कतिक सम्रिद्ध्ध्द्रुश्टान तक उप्योख के ने चतिटी
  77. 6:24–6:30तेसर शास्त्र यो नित्वात, जि शास्त्र के ज्यानक स्रुथ सिद्ध करे चे,
  78. 6:30–6:36अचारिम तत्तु समन्वयात, अथा त्सम्पुन स्रूति वाख्यक समन्वयात्मक तात्पर्यः.
  79. 6:36–6:38आउ दिक्ही ची जि वाचस्पती मिष्ष्व,
  80. 6:38–7:08आईही व्याख्या सब में कतिक सम्रिद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्
  81. 7:08–7:12वक्ला के गर्बदान के लेल वर्शा रितु इसब देखाओ गेल चे
  82. 7:12–7:14और व्यक्त ग्यानक जे सीमा चे
  83. 7:14–7:16अकर तुलना, दूद, उखारीक रस
  84. 7:16–7:19और गुड धध्राएक मिठास के भीचके ओई अंपर सकेल गेल चे
  85. 7:19–7:22जक्रा मूँ सभाजी के नहीं भुजाल जासके चे
  86. 7:22–7:27चारीम सुत्र में मोक्ष्कलिल एक ता बड्षक्तिष्याली द्रिष्टान्त बहते चे,
  87. 7:27–7:31परिवर्तन्शिल किनारा, फेईन आतरंके पाचा चोडका,
  88. 7:31–7:34मलाह नदिक शान्त मधिबाग में पहुच जाए चे.
  89. 7:34–7:37इस सुन्दर द्रिष्ष्छ इसिद करे चे,
  90. 7:37–7:40जे मोखश कोनो एहन वस्तून नहीं जगरा कोनो करम सा,
  91. 7:40–7:43नवका तरीका सा उत्पन काईल जा सकेच्छे.
  92. 7:43–7:46इतो एक ता नित्ये प्राप्त शान्त अवस्ताचे,
  93. 7:46–7:50जगरा लोक के वल दून्या कोलाहल के पाचा चोडका अनबूत कषकेच्छे.
  94. 7:50–7:57आब पाजपम कहन्दिज बड़े ची जते की इदेखव जे एहि सब आमुर्थ बातक अनवाद कोना बेल चे.
  95. 7:58–8:03इस समपोरन दर्षन एक टा एतिहासिक उपलडदिक रूप में सोजे हम्रा लोकनिदरी पूँची रहल जे.
  96. 8:03–8:07बामतिक शुद्ध मेठली में कैल्गेल अनुवाद
  97. 8:07–8:11प्रारंब में 2004 में प्रकाशित आफिर 2026 में परीवर्दित
  98. 8:11–8:16इकाज अट्यन्त जटिल्दर्षन के मेठली भूलीक एक दम स्वभाविक
  99. 8:16–8:19अल्यात्मक सहच तक संक प्रस्तुत करे चे
  100. 8:19–8:24अद्याई वेद हुंकर सास्तिखी पन्च्महाबूद हुंकर द्रिष्टी इच्चराचर जगत हुंकर मुस्की थिकनी
  101. 8:24–8:27अथे मुस्की जखाए तेट मैठिली शब्दक उप्योग भेल चे
  102. 8:27–8:31वेद हुंकर सास्तिखी, पन्च महाभूद हुंकर द्रिष्टी,
  103. 8:31–8:34इच्डराचर जगत हुंकर मुस्की ठिकनी.
  104. 8:34–8:38अथे, मुस्की जगका जे तेट मैठिली शब्दक उप्योग भेल चे,
  105. 8:38–8:41ओ एही विराद ब्रमान्दी लिला के,
  106. 8:41–8:47उ एही विरात ब्रमान्दी लिला के एक्ता एत्तेक आत्मिया अग्रेलु स्वरुप ददेचे,
  107. 8:47–8:50जे ईबात सोजे रिदेदरी उत्री जाएचे.
  108. 8:50–8:57आईपंटी तीका कारक कषास्त्रिया मर्यादा अविनम्रता के बहुत नीजका देखावेचे.
  109. 8:57–9:02जना राज पतक जल गंगाक दार में ख़्सलापर पवित्र भेजाइच्छे,
  110. 9:02–9:09तिक उहें आ, हमरा सन लोकक ख्षुद्र शब्द सो आचार्यक रचनाक संग जुडका पवित्र भेजाइच्छे.
  111. 9:09–9:14इं मुल ग्रन्त आचार्यक प्रती गेर सम्मानक एक ता बड्नीक प्रमान्चे.
  112. 9:15–9:20तव एही विष्लेशन के समःत एहित एक ता बात पर विचार कर बड जरूरी चे.
  113. 9:21–9:24की हम सब जे देनिक वास्ट्विक्ता का अनबभव करेच छे,
  114. 9:24–9:29अ नील्मनिक कतोरा कब भीतर स्थित अकाश जैका सीमित आन निरपेक चे,
  115. 9:29–9:31वाई मात्र एक दाद्यास चे,
  116. 9:31–9:34जक्र अ भुजल जानाई अखनो बाकी चे.
  117. 9:34–9:36इए एक दा एहन प्रष्न चे,
  118. 9:36–9:40जे हमरा सब के अपन अनबूती को वास्थविक स्वरूप पर विचार करवाले चोड जाएचे.
  119. 9:40–9:45बहामतीक के एई अधबूत अनवेशन में जुडबाग लेल बहुत-बहुत द्श्झेवाद.

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बेस आव आई एक तक गजब के विषेए पर गब करी, नवम शताबदिक अद्वेट विदान्त दर्षन को उगेराई, अवकर एक ता एतिहास इक आदूनिक मेठली अनुवाद, इकोनो सादारन बातनी चे. आज हम सब वास्ट्विक्ता के एक दम्मूल दहरी जबाग प्रय अद्वाइतक महान वास्तुकार अटियासिक संदर्व अगर बाद दूईता प्रमुक विचार दारा कक्तुल्ना फेर हम सब भ्रहम कवास्त्विक्ता जिक्रा इल्यूजन कही च्ये अख्रा भुज्यव अप्रत्ध्हम चारी सुत्र कब विष्लेशन करव अदूनिक मेठ्छली में कते खुद्र तरीका सा उतार लगेल चे तच्छलूँ पहिल कन सा शुर्बात करेज्ची अदवाएदिक वस्तुकार अवदारना सब के आदूनिक मेठली में कते क सुन्दर तरीका सा उतार लगेल चे. तच्छलूँ, पहिल कहन सा शुरबात करेजची अदवाएदिक प्वास्तुकार. एही समपून गंभीर तीका कपाजा, जे मुख्य सूत्रदार चलया, उचला नवम शताब्दिक महान दार्षनी कवाचस पती मिष्र. उनका विषे में जे बात सबसे भेशी हेरान करेत चै, उचै उनकर रचना सबखक कविषाल श्रिंगला. सोचु चोरासी इस्वी दहरी, उनकर न्याय रचना, उनकर एतिहासिक उपस्तिति के मजबूती सद्ठापित कदेत चै. बामती लिख्वा से पहले दहरी, उप्राया सब आस्तिक दर्षन, जैना, सांख्य, योग, अपुर्व मीमान्सा, सब पर प्रामानिक टीका सब लिक चुकल जला, मुदा हुनकर आस्ली मास्तर पीस, हुनकर सर्वूत क्रिष्ट उपलब्दि आएल, नवम शताभ्दी कच्चरम पर भामती. इएतिक प्रभ्हाव कारी चल, जे एक्रासा अदवेत विदान तक एक्ता पूनतया स्वतन्त्र संप्रदायक स्थापना भगेल. आई एही ताम, हम सब एक ता बोछ विलक्ष्छन उपादिक बात करब, सर्वत्र स्वतन्त्र, सून्ने में किते बारी लगे चेना, एकर सीथा अर्थ चे सब तन्त्र वादर्षन कग्याता. बिविन्न्त दार्ष्निक परम्परा सब में हुंकर एहन अध्वित्य विषेश्व्ग्यता चल, जे लोग हुंका एहन उपादी ससम्मानित के लक, अइकोन चोट बात नहीं चे, एह विस्त्रत ज्यान कक खारने, उ एक परिपक्व रूप सा भामतिक रच्ना कर्भा में सक्षम बहसक्ला. आब दोसर कहन्दिस भहेत ची, जते हम सब दूईता प्रमुक विचार दारक चर्चा कर्ब. अद्वायत वेदान्तिक अंतर्गत शंकरा भाश्ष्षक व्याख्या के लक्क, जे एक ता गेहिर दार्षनिक बहेज भेल उब भद्रोचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचचच� आब तेसर कहन्द में हम सव ब्रमक प्रक्रिती यानी जे Illusion चे उक्रा खोल के देखव. दैइनिक जीवन में ब्रम आत्रुते कजे अनबवव हम सब करे ची उवास्तव में कोना होए चे एले ल्ट सब सब शब फिले अद्ध्यास के बुज़व आवष्ष्षक चे. आसान शब्द में कही, ता इई एक वस्तुक दोसर वस्तूपर मित्या आरोपन चे, मतलव एक ता वास्ट्विक्ता के दोसर वास्ट्विक्ता मानी लेनाई, जिना शरीर वमन्जेका जि अनात्मक गुन्चे उक्रा शुद अविश्य आत्मापर आरोपित कदेनाई. इबात सुन्ना में तनिक आमुर्त लागी रहे तै. मुदा ग्रन्त में एकर एक ता बड्ड नीक आव्यवाहारे ध्विश्तान्त देल गिल चे. पशु कुदारन खल्पना करु जे कोनो पशु तार थेना लेल, कोनो मनुश्षे के देखाएचे, तो उदरे बाग जाएचे. मुदाजकन उधर यर गास देखाएचे, तो उख्रालग आभी जाएचे. इक देखाराल जे? इदेखावेचे जे एई आरोपन या अद्ध्यास चचे जे पूर्व संचार पर आदारित एक तवरित प्रतीक्रिया चे उसम्पुन जीवदारी में किते गह्राई दरी बैसल चे. आई पर वाच्छस्पती मिष्ष्विपक्षी न्याए दर्षनक सिद्धान्त पर एक्टा बड्ड्ड्व्यंज्यात्मक मुदा अद्भुट प्रहार करे च्छती. अग कहेट च्छती आहो बिचारी प्रतीती के कते एक विलक्षन सबभाग्या प्राप्त च्छै, जे उ मित्थ्यात्वक माद्ध्यम्स सहो निष्च्च्य प्राप्त कष्च्य कि तच्छी इग कोतेशन अपने आप में बहुत किच्चू कहेच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च अन्ना ही दूनु चे. अब मन में प्रष्ने उठेए जे एहन कोना बहसके चे. करन इचे, जे कोनो मात्र प्रतीत होमे वाला वस्तूके, हम सब कडाईसा अस्तित्वो वा अनस्तित्वो में बातने सके चे. उबस अनिरवचनी अचे. उक्रा श्वद में नहीं बानधल जासके चे. मरु मरी चिका या जिक्रा हम सब मरिग मरी चिका कहे चिये उक्र द्रिष्टानत एही अनिरवचनीय सिद्धानत के एक दम नीक जका सपष्ट कदिच चे. मनो जे म्रग मरी च्कामे आरोपित पानी पुनते आँ सत्यो होएत, तो एक तप्यासा लोग आराम से औही मन्दाकिनी नदिक ब्रम लगे, जाके उकर तरंग से पानी पी भी सके चल. मुदा उपानी पी नहीं सके चै, माने उसत्या नहीं चै. मुदा, 2-3 उक्रा उपनी दिखाईत रहले चै, तो उपनत्या असत्या से हो नहीं भल, चैन गजजब का लोजिक, आब एक ता आन गमभीर द्रिष्टान्त पर विचार करे च्छे, नील्मडि कतोरा. जना अवेवेखी बच्छा सब विशाल अनिराकार अखाश के देख कर, उक्रा नील्मडी से बनल एक्ता पेग, उल्टल कतोरा का अखार मानी लेच्छें. तीक अहिना जीव हुबागजे सीमा सब चै, उक्रा अविशै आत्मापर आरोपित कर देईच्छे. अपन अग्यान के कारने निराकार के एक्ता सीमा दादैईच्ये. चलू आब हम सब चारिम कहन्द में प्रत्हम चारी सुत्र दिस बड़ाईच्छी, जक्रा चतू सुत्री कहल जाएच्छे. इजे चारी सुत्र कक्रम चे उआही दार्षनिक शास्त्रार्थ लेल अचारें तत्तु समन्वयात अचारें समपून श्रूति वाख्यक समन्वयात्मक तात्पर्या आउ दिखेच्ये जे वाच्स्पति मिष्ष्य अही व्याख्या सब में कतिक सम्रिद्ध्ध्द्रुश्टान तक उप्योख के ने चतिटी तेसर शास्त्र यो नित्वात, जि शास्त्र के ज्यानक स्रुथ सिद्ध करे चे, अचारिम तत्तु समन्वयात, अथा त्सम्पुन स्रूति वाख्यक समन्वयात्मक तात्पर्यः. आउ दिक्ही ची जि वाचस्पती मिष्ष्व, आईही व्याख्या सब में कतिक सम्रिद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द् वक्ला के गर्बदान के लेल वर्शा रितु इसब देखाओ गेल चे और व्यक्त ग्यानक जे सीमा चे अकर तुलना, दूद, उखारीक रस और गुड धध्राएक मिठास के भीचके ओई अंपर सकेल गेल चे जक्रा मूँ सभाजी के नहीं भुजाल जासके चे चारीम सुत्र में मोक्ष्कलिल एक ता बड्षक्तिष्याली द्रिष्टान्त बहते चे, परिवर्तन्शिल किनारा, फेईन आतरंके पाचा चोडका, मलाह नदिक शान्त मधिबाग में पहुच जाए चे. इस सुन्दर द्रिष्ष्छ इसिद करे चे, जे मोखश कोनो एहन वस्तून नहीं जगरा कोनो करम सा, नवका तरीका सा उत्पन काईल जा सकेच्छे. इतो एक ता नित्ये प्राप्त शान्त अवस्ताचे, जगरा लोक के वल दून्या कोलाहल के पाचा चोडका अनबूत कषकेच्छे. आब पाजपम कहन्दिज बड़े ची जते की इदेखव जे एहि सब आमुर्थ बातक अनवाद कोना बेल चे. इस समपोरन दर्षन एक टा एतिहासिक उपलडदिक रूप में सोजे हम्रा लोकनिदरी पूँची रहल जे. बामतिक शुद्ध मेठली में कैल्गेल अनुवाद प्रारंब में 2004 में प्रकाशित आफिर 2026 में परीवर्दित इकाज अट्यन्त जटिल्दर्षन के मेठली भूलीक एक दम स्वभाविक अल्यात्मक सहच तक संक प्रस्तुत करे चे अद्याई वेद हुंकर सास्तिखी पन्च्महाबूद हुंकर द्रिष्टी इच्चराचर जगत हुंकर मुस्की थिकनी अथे मुस्की जखाए तेट मैठिली शब्दक उप्योग भेल चे वेद हुंकर सास्तिखी, पन्च महाभूद हुंकर द्रिष्टी, इच्डराचर जगत हुंकर मुस्की ठिकनी. अथे, मुस्की जगका जे तेट मैठिली शब्दक उप्योग भेल चे, ओ एही विराद ब्रमान्दी लिला के, उ एही विरात ब्रमान्दी लिला के एक्ता एत्तेक आत्मिया अग्रेलु स्वरुप ददेचे, जे ईबात सोजे रिदेदरी उत्री जाएचे. आईपंटी तीका कारक कषास्त्रिया मर्यादा अविनम्रता के बहुत नीजका देखावेचे. जना राज पतक जल गंगाक दार में ख़्सलापर पवित्र भेजाइच्छे, तिक उहें आ, हमरा सन लोकक ख्षुद्र शब्द सो आचार्यक रचनाक संग जुडका पवित्र भेजाइच्छे. इं मुल ग्रन्त आचार्यक प्रती गेर सम्मानक एक ता बड्नीक प्रमान्चे. तव एही विष्लेशन के समःत एहित एक ता बात पर विचार कर बड जरूरी चे. की हम सब जे देनिक वास्ट्विक्ता का अनबभव करेच छे, अ नील्मनिक कतोरा कब भीतर स्थित अकाश जैका सीमित आन निरपेक चे, वाई मात्र एक दाद्यास चे, जक्र अ भुजल जानाई अखनो बाकी चे. इए एक दा एहन प्रष्न चे, जे हमरा सब के अपन अनबूती को वास्थविक स्वरूप पर विचार करवाले चोड जाएचे. बहामतीक के एई अधबूत अनवेशन में जुडबाग लेल बहुत-बहुत द्श्झेवाद.

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