MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID

Nyayakusumanjali_Maithili_Animated.mp4

Not an editorially verified transcript. This text was generated automatically from the preserved recording and may contain recognition, language-detection, spelling, segmentation or name errors. Consult the source recording for authoritative content.
Collection
Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
Status
asr-draft
Human verified
No
Editorial review
not-reviewed
ASR model
small
Detected language
hi (0.442817)
Duration
1:36:17
Source
Open preserved recording

Timestamped machine output

  1. 0:00–0:04न्याय कु सुमाअजली तरकक पूष्पबूच, नाटकक पात्रे
  2. 0:04–0:14आई रातिक सबहा सुत्रदार, उद्यनाचार्य, आक्षेपक, पूर्वपकषी, सांख्या आचार्य, चार्वाक, भोध्द, परिषद
  3. 0:14–0:18अंक प्रत्हम, प्रत्हम पूष्पबूच
  4. 0:18–0:27संसारक कारन समबन्दी तरक, एही अंक्मे नवस्वर सम्मिलित नहीं होएत अची.
  5. 0:27–0:35द्रिश एक आवाहन, मंज दीपजरल सबहापर पर्दा उठैत अची.
  6. 0:35–0:46उद्यन्तार्च्छति एक्ता अद्रिष्प्रतिमा दिस हात्जोड़च्छति, आपहिने सबहाके नही अपितु एक्ता बहंट्रुक्मे बजच्छति.
  7. 0:46–0:50संकेत पड़ट्, तर कसंपहिने एक्ता बहंट्.
  8. 0:50–1:00एही शब्द के दूई अर्थ में एक ही संग भूजु जेना के यो फूलग कता कर अची आ, एक ही सांस में सिद्दान तक से हो.
  9. 1:00–1:30आवाहन रूक मे आदामन्त्रोच्चारन मे इपुष्पपगुच् सक्तितास बतोरल, ताजा राखल, हात कत्हुरतास दभेल हुतयो कहीो मुरुज्याल नही प्रभूक दूनु चरन मे राखल जाए, आहमर मन, उही बहंट मे एहन आनन्द जाने जकर पाचु कोनो शोक नही �
  10. 1:30–2:00ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  11. 2:00–2:06अपनिषवद क अनुयाई हूंका शुदज्द चैतने कहेट चत्फी
  12. 2:06–2:11कपिलक अनुयाई हूंका नित्य अचेतन कहेट चत्फी
  13. 2:11–2:15मुदा निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता
  14. 2:15–2:19निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता
  15. 2:19–2:24उपनिशद क अनुयाई हुनका शुद चटने कहेट चथी
  16. 2:24–2:31कपिलक अनुयाई हुनका नित्या आचेतन कहेट चथी मुदा निरमाता नहीं
  17. 2:31–2:36पतनजलिक योगी हुनका कलेश सन अस्प्रिष्त आत्मा कहेट चथी
  18. 2:36–2:40जे केवल शिक्षा दिबाक हे तु शरीर धारन कर अच्छति
  19. 2:41–2:45पाशुपत हुनका उही निमूस से हो मुक्त कहेट
  20. 2:45–2:48च्छति जे हम्रा सबके बान हैत अच्छि
  21. 2:48–2:54शैव हुनका शिव कहेट च्छति वैशनव, विषनु, पुरानकार, सबख पितामः
  22. 2:54–3:24ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  23. 3:24–3:28अग्ता शब्द से हो प्रमान खेक, मित्र,
  24. 3:28–3:34हमर भिन्दू खाड अची, एही सब हामे सब के पहिनही सब एह सहमती अची जे,
  25. 3:34–3:40इश्वर सकिचु अभिप्रेत अची, आप उनता अस्वमती अची जे की.
  26. 3:40–3:43इमानक आदार नहीं खेक,
  27. 3:43–3:45अदार नहीं थेख
  28. 3:45–3:50ये हो अदार थेख जे अनवेशन मांगैत अची
  29. 3:50–3:54हम शास्त्रस पर्यात सुनी चुकल ची
  30. 3:54–3:57अखन तरकक समय अची
  31. 3:57–4:02वेद स्वयं कहेत अची पहीने सुनु फेर मनन करू
  32. 4:02–4:13अव्रिद्दजन जोड़ाय्च्छति, श्रवन्स, तर्कसन, द्यानक्षान्त अभ्यास्सन, एक्ता अत्मा अंत्तह अपना के सत्यरूक में देख्भामे सक्षम होईत अची.
  33. 4:13–4:17तने मनन आरम्ध होईत अची.
  34. 4:17–4:21द्रिष्य तीन पाज्सन्शयक नाम करन.
  35. 4:21–4:30वम्रा प्रमानिक होईप चाही उही सबख विष्य मेजे हमर विरुद थार अची एक ता से हो प्रमान देबासं पहीने.
  36. 4:30–4:36पाच सन्चय आहम एही पुष्पबुच बहरी एक एक कवूथाएप.
  37. 4:36–4:44अंगुरी पर गनेथ एक अगिला जगत में हमर भाग्यत पाचु कोनो अगरिष्य, अलोकिख कारन अची ए नहीं.
  38. 4:44–4:52तुई एहन कारन भिनु से हो, केवल मानविय पुरुषार्त कर्मकान्द आ अकर फलके भुज्यबाक हे तु पर्याप्त अची.
  39. 4:52–4:573. सकारात्मक प्रमान अची जे इश्वर अस्तित्व में नहीं अची
  40. 4:57–5:034. भले इश्वरक कोनो प्रमान देल जाए, उप्रमाने अंता अमाने सिध होए
  41. 5:03–5:095. इश्वरक कोनो प्रमाने अची नहीं मानेवा अमाने
  42. 5:09–5:139. मीक स्पष्ट कहू यह उचित वाद थिख
  43. 5:13–5:16तं पहल के लिये
  44. 5:16–5:21द्रिश चार कोनो अद्रिष कारन नहीं कविरुद
  45. 5:21–5:27देखुक लोक कते क विन्न-विन्न धंगसा आच्ण करेत अची
  46. 5:27–5:36एक ही परिस्तिति में दू व्यक्ती विप्रीत मार्क चुनेत चति केो कर्मकान्दिस, केो भोग्दिस, केो त्याग्दिस
  47. 5:36–5:44उही प्रव्रित्तिक भेदक कारन अची, आव उही कारनक श्रिंखलाक कोनो प्रत्हम कडी नहीं देखा सकैट ची.
  48. 5:44–5:52आजे किचु मनुश्य बतोराथ अची, से अपने व्यक्ति में बतोराथ अची आन के अमे नहीं.
  49. 5:52–6:00तने किच्छु अद्रिष्य वस्तुके एही जीवनक कर्म के उहिसम परे प्राआप्त फल्सन जोर बाक चाही.
  50. 6:00–6:08इस अनसार, हर प्रकारक दूख्स भरल्जे अस्मान रूक्स बंतल अच्छी अकारन नहीं भह सकैत अच्छी.
  51. 6:08–6:19अखारन वस्तुयातन सदार हैत अची वाखहीो नही उनत कत्हु उपन्न होएत अची, नकत्हु समापत दिनु कोनो कार्यक्रमक.
  52. 6:19–6:49ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  53. 6:49–6:51सकी तात पर्यराख्यच्छी
  54. 6:51–6:56आहम आहाके देखा देप जेई चारी में सएक के दहीजाएत अची
  55. 6:56–7:00कोनो कारने नहीं स्वत्ध हुप्टी, शून्यसं उप्टी
  56. 7:00–7:05वा केवल वस्तुक अपन स्वभाव संबन्दी अच्ता तत्ये
  57. 7:05–7:09चारू में सके यो बाकी नहीं रहीत अची
  58. 7:09–7:25और खार्यजे बनेत अची यो कर एक तास पष्ट पहिलुक सीमा होएत अची उक्षन जक्रास पहिने नहीं चल आए एक तास पष्ट भादुक सीमा उक्षन जक्र भाद औची अची नहीं रहीत
  59. 7:25–7:35वो ही सीमा के वो ही कषन पर, किच्वो चहनित नहीं करायत अची, केवल वो ही समय क्रियाशी लेएक्ता कारनके चोडी.
  60. 7:35–7:51वूदा मानिलिया उक्षन स्वयं कोनो आर स्पष्टि करनक आवश्षकता नहीर अख्छी, एक्टा वस्तू में केवल इगुन अची जेो एही दिन अस्तिट्वमे आबई, आन दिन नही, खिक जेना अखाश में केवल इगुन अची जेो नित्याची.
  61. 7:51–7:59सबख्ख्द्वारा साजा एक्ता गुन किचुो नहीं भूज्भैत अचीजे की वस्थू एही दिन.
  62. 7:59–8:05जजगन कही यो अस्तित्वमे आभई केवल हर वस्तूक नगन स्वभाव होईत,
  63. 8:05–8:08कोनो कारन बिनो तकन एह प्रष्न तकने की एक,
  64. 8:08–8:15पहिने की एक नहीं फेर-फेर लोटत, अनन्ततह, कोनो उतर नहीं दै.
  65. 8:15–8:20नहीं उत्पती के एक ता उत्पाद कक आवश्षकता होईत अची.
  66. 8:20–8:26सन्यों कोनो उत्प्तर नहीं थेक, औवेश दहने प्रश्न मात्र थेक.
  67. 8:26–8:30द्रिष छेट सामान्य आविषेष कारन पर
  68. 8:30–8:43तक्हन बताओ एक ही प्रकारक कारन् जेना अगिन एक भिन नभिन सादन्सं की एक उपन होईत अछी सुकल दास दिसने काथ मतने लिनसद्वारा सूर्यक प्रकाष संग्रहित करने
  69. 8:43–8:51जखारन कार्यके कठोरतास निर्दारित करैत अची, तै एक्ता कार्यक तीन भिन नभिन उप्पक्तिस कोना अबैत अची.
  70. 8:51–9:02की एक्तं कारन शक्ती प्रत्यक भिन प्रसंग में देखाल गेल सहसं जानलजाएत अची, सब प्रसंग हे तु एक भेर भोषित नही.
  71. 9:02–9:13जिसनाय, मतनाय, केंद्रित करनाय, तीन भिन कारन स्मुज प्रत्तेक स्वतन्त्र रूप्स अपन्पन्शर्त में अगिन उपन्प्रण करे बला सत्यापित.
  72. 9:13–9:30उही विविद्ता में किछो निम के हानी नहीं पहुच भैत अची जे एक्ता कारिय के एक्ता पर्याप्त कारनक आवष्षक्ता होएत अची यी केवल देख्वैत अची जे पर्याप्त कारन, एक सब एसी दंगसं साकार भह सकात अची.
  73. 9:30–9:36निम बाकी रहेत अची, केवल आहाएक चित्र बहुत संकी रिष्छल.
  74. 9:36–9:39सैमतिक काना फूसी
  75. 9:39–9:45दिश्य सात, सन्सारक विविद्धाक कारन रुक में अद्रिष्ट
  76. 9:45–9:52इस सभ मानी लिय, की एक अद्रिष्य पून्या अपाप अद्रिष्ट ये रहाए कारन होईप चाही
  77. 9:52–10:02कि एक नसीदे कहल जाए, सामानिय, द्रिष सहायक कारन, एक दोस्रास जुडल, हम्रा सबख्डेकھल विविद्ताके स्पष्ट कदात अची?
  78. 10:02–10:19कि एक तन्ज केवल द्रिष्य कारनक शिंखला सब किचुस पष्ट कदैत, तकहन के यो भिनु प्रतिपलक एकु कर्मकान्द कर्बाक कष्ट नहीं उठाभैत तए यो लोक करैत अची, एताए किचु अ आशा नहीं रक्यत, केवल पर लोक में.
  79. 10:19–10:32पूचु कि ये को लोक आडल रहेत आची, सुखख हे तू नही अविश्वासी सुख अदेक प्रत्यक्षतासं कोजाइत आची आ कर्मकान्द चोडी दैत आची.
  80. 10:32–10:40केवल प्रतिष्थाख हे तु नही, ये हके वो नही देखाए बला निजी भक्ती सब पष्ट नही करए.
  81. 10:40–10:53एही हेतु नहीज व्रिद्दजन यूवाके ठھकलनी की एक तं व्रिद्दजन स्वयं वो आचन राख़ चत्छती, आ एक ता ठकनिहार सामानियता है पहीने अपनाके नहीं ठकगै.
  82. 10:53–10:58कोनो चत्टृर संस्तापक अपन लावख हेतु सभ्था गडने.
  83. 10:58–11:12तक्हन उ अकेल दनी आमुक्त भेल होद थी, किछो नही दैत तःयो पेटरन थीक विप्रीत दिशामे चलात अची सच्चा भक्तजन जे किछु राखआ च्छती, से दान कदैत च्छती.
  84. 11:12–11:19कोनो पूरन विवरन अद्रिष्ष्पल भिनो जाच्मे बची नही सकैत अची.
  85. 11:19–11:29किछो अद्रिष्ट, किछो अद्रिष्ट, के उही वास्तविक कारन्, रूप में स्विकार करभाके चाही जे एही कर्म के उही फल्सन् जोडअत अची.
  86. 11:30–11:36द्रिष्ट 8 स्वतन्त्र यतार्थ्ता रूप में सामर्त्या अबहावक कारे कारनत्म.
  87. 11:36–11:48सुत्रदार कھन्द्शीषक पड़द च्छति उद्यन आ अक्षेपक एक ता लंभा तकनी की अंश्पर काज करगट च्छति एताए वोकर मुल तत्वमे संख्षिप्त काएलगे
  88. 11:48–12:06तव्यो की इसामर्त्यर जकर आहा कता करेथ ची, कोनो अलक यतारत्ता हो एप चाही, उही द्रिष्द्रव्यसं अलक जे कार्ये करेथ अची, की केवल कोनो बादाख अबहाव कार्ये कार्यन काज नहीक सकेथ अची, आर किचो आवष्षकता बिनो.
  89. 12:06–12:15अबहाव कोनो बादा हता सकैत अची, उ अपन ही सकोनो सकारात्मक कार्य उत्पनन नहीक सकैत अची.
  90. 12:15–12:24इंतास गर बने बाख हे तु केवल राज्मिस्त्रीक आलस्यक अबहाव नही, अपितु राज्मिस्त्रीक हाथ से हो चाही.
  91. 12:24–12:37कर्मकान्द, तहीना, केवल मार्ग साफ नहीं करायत अची, उ किचु स्थापित करायत अची, करताक भीतर एक्ता अवशिष्ट सामर्ठ्य, जे बाद फल में पाकायत अची.
  92. 12:37–12:54उ अव्शिश सक्ठेक, यद्यपी अद्रिष्यक, वो कर सक्टा अनुमानित अची, थिक जेना हम दूवासध अगिनक अनुमान कर अची, वो कर एक्ता कारिक संग अवष्यक संबंद्ध्सन जकर आर कोनो पर्याप्त स्पष्टिकरन नही अची.
  93. 12:54–13:13अदिक तीवर्तासच ये उही तरकक शली ठिक जे, समएकर में हम्रा सब के पूरनत है इश्वर दहरी पहुचाओत कारिसच उही कारन दिस एक ता अनमान जक्रा कारिय आवश्षक बनबैत अची, कि चो रहे समय नही, केवल दावा काएल नही.
  94. 13:13–13:43ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  95. 13:43–13:47अदर्स्म् मुदाद्रिद्तास्व, एक्ता सुन्दर्विवस्त्धा,
  96. 13:47–13:51आचार्यव आहम एक्रा बहुत किच्छु मानिले,
  97. 13:51–13:56मुदा विचारू प्रक्रिति, जेना आहा वोकर वरनन करैत ची,
  98. 13:56–14:00पुरुषक मुक्ते के तू.
  99. 14:00–14:08अदर स्म्मुदाद्रिद्तास, अग्ता सुन्दर्विवस्ता, आचार्या आहम अग्रा बहुत किचु मानी ले.
  100. 14:08–14:19मुदा विचारू प्रक्रति, जेना आहा वरनन करेट ची, एक थिक, जर में अभेद, सदा एक ही सार्बुद स्वभाव सकाज करेद.
  101. 14:19–14:32एक ता एकल समान कारन, अपन ही चोडल, अपन ही सएकक बाद एक उत्पन होई वाला क्रम्स पष्ट नहीक सकैत अची प्रतेक अपन भारी क्प्रतिख्षामे.
  102. 14:32–14:47जव उ क्रमश्य उपन्कर आट चथी, तक्हन उही क्रमक्क्रम के किचु भुज्यबाक चाही, आउ किचु खीक उही प्रकारक अद्रिष्य, विषिष्टिकरन करे वाला कारन थेक जकर हम तर्ख करे है ल्ची.
  103. 14:47–15:17ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  104. 15:17–15:47ॐ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ
  105. 15:47–15:52अगा एक्रा अदत कहलहू
  106. 15:52–15:57मुदा अदत के से हो एक ता प्रत्हम कारनक आवर्षकता आची
  107. 15:57–16:03आजेजे भिवरन आधा देलू क सुख प्रत्हा, चल, संस्ताप कक चतुराई,
  108. 16:03–16:08सब दहीजाएत अची जकन ओकर परीच्षा होएत अची,
  109. 16:08–16:38अगिन दरी चलबा मे उप्यों करईट्छी यद्यपी आहा कहीो दूनु के सद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी य
  110. 16:38–17:03अद्यन आख पूरा तर को ही वस्सुपर तिकल अच्छन भंवादक सिद्धान्त बूद्द आगु अबैट च्छति
  111. 17:03–17:09उद्यन, आहां क्पूरा तरको ही वस्तूपर तिकल अची जे बनल रहेत अची,
  112. 17:09–17:14एक ता करता जे आए अनुष्ठान करेत अची आखाली पल पबैध अची,
  113. 17:14–17:18एक ता आत्मा जे पल प्राप्त करे रहेत। बनल रहेत अची.
  114. 17:18–17:21मुदा किछो बनल नहीं रहेत अची.
  115. 17:21–17:37अगी खषन में उपन आन नष्थ होएद अखी जाही में अप्रकत होएद अखी, जक्रा आहा एक ही व्यकती काल ही कहेद छी, से केवल अख्ता कारन श्रिंखला थेख. प्रतेख चन नव.
  116. 17:37–17:48तकन बताओ अपने सिद्धान्त पर के काटायत अची जे अग्ताख्षन दवारा भाँल गे चल जे कतबाक समय अस्तित्व में नहीं रहायत अची.
  117. 17:48–17:57जकि चो अपन उपतिस अ एक शन भेसी से हो नहीं तिकात अची तकन करमक करता अ फलक भोकता.
  118. 17:57–18:06अहाग आपन विवरने दूविन्न, असमबद्ख्षनिक सत्तातिक, आनेटिक उत्तर्दाएत्व स्वया विलीन भजाएत अची.
  119. 18:06–18:22इसे हो विचारुजे सामाने पहिचान कोना काज कर अची, हम आई एक ता ग्याल देखछची आ उक्रा एक ही ग्याल जानेट ची जक्रा हम काल ही देखने रही, प�रना के मिलेत एक ता नव ग्याल नहीं.
  120. 18:22–18:38जब पहिचानक इ अनुभूती सदाभ्रम होएत, तकन दूएक शनक भीच भेद कोनो अनुभूती से हो विश्वस्निय नहीं रही सकैत, कि एक तन दूनु समएक पार तुलना करे वाला एक हीक शमता पर तिकल अची.
  121. 18:38–19:08सातत्यके ज़िट्हनीस अस्विकार करू आहा औहा म्रा विरुद्द अखने उठाओल संचय पर से हो विश्वास नहीं कस अकैट्छी की एक तन संचय उठाभाए हे तु से हो जरूरी अच्छी जे एक शन पहिने संचय के लक आजे अखन बजैत अच्छी से एकी निरन्तर अ
  122. 19:08–19:12अद्दावलिस भेसी सार में नस्दिक भा सकैत ची
  123. 19:12–19:15मुदा किचु बनल रहेत अची
  124. 19:15–19:19यहिपर इपुष्पबुच्ष पीचु नहीं हद्टी सकैत अची
  125. 19:19–19:22द्रिष्च भाँप्च्टी बनल रहेत अची
  126. 19:22–19:25यहिप्ट्ट्बवच्टी बनल रहेत अची
  127. 19:25–19:32वड़िष बेसी सार में नस्दिख भज़ सकेट छी, मुदा किचु बनल रहेत अची,
  128. 19:32–19:38यहि पर यी पुष्पपगुछ पीचु नहीं हटी सकेट अची.
  129. 19:38–19:45द्रिष बारह सातत्या कार्य कार्य कारनत्वक सामन्जस्य, नित्या आत्मापर आपती
  130. 19:45–19:49फेर सव अखन अदेक साव्दान तखन सातत्य मानिले
  131. 19:50–19:54तव्योग जकोनो वस्तुक स्वयन स्वबहाव कारन होएव अची,
  132. 19:54–19:59तखन की उक्रा सदा सर्वत्र अस्तित्वक्षन में अपन कार्या नहीं करबाके चाही,
  133. 19:59–20:02थीक जेना नील सदा नील अची.
  134. 20:02–20:09तव्यो एक्ता नित्य, सर्व व्यापी आत्माके, रख्षन सुक आदुहक उत्पन् करेत नहीं देखल जाएत अची.
  135. 20:09–20:14तख्शन कार्ये कार्नत्वा नित्य आत्मा कोना सामन्जस्य में आभी सकेत अची.
  136. 20:14–20:24कि एक तं कार्यकारनत्व कोनो वस्तु स्वत्व आपन्क्शम्ता मेरे है, बलाहर कार्य सदा उपन्चर आच्छी नहीं थेक.
  137. 20:24–20:54इकारनक कार्यक सापेख्ष अबाद्ध पूर्ववर्तितातेक, ककन्हु सह्चार आभेद देखिक निष्चित काईईजाईत अच्छी, आजताई अस्फल होएट अच्छी, जेना कोनो निट्या सर्वत्र उपस्थित वस्टुक संद, जे कतू अनुपस्थित नहीभ रह्स �
  138. 20:54–21:07अपन उचित सहायक सर्टक संग उपन करेत अचिक मन शरीः, उही अद्रिश सामर्थ्यक पाकभ जकर कता हम पहिन ही केने चल हूँ.
  139. 21:07–21:13रह नील वस्तू से हो रह नील वस्तुग कार्य सदा उपन नहीं करेत अचिक,
  140. 21:13–21:19अपन विषिष्ट कार्ये उपन करायत अची
  141. 21:19–21:23यह थेक जे कार्ये कारनत्वक अर्थ्थेक,
  142. 21:23–21:26एक भेर साव्दानीस कहला पर,
  143. 21:26–21:30आसामान्य अनुबव एक्रा हर मोर पर पूष्ट करायत अची
  144. 21:30–21:33समापन प्रार्थना
  145. 21:33–21:38द्रिश्य तेरहा प्रत्हम पूष्पबुच्षक समापन प्रार्ठना
  146. 21:38–21:45उद्यन्पेर्स अद्रिश्य प्रतिमा दिस्मुरेद्च्छत्फी, सबहा शान्त भजाएत अची
  147. 21:45–21:53परम प्रभुको गुप्त्षक्तिजे हर आत्माके उकर भाग्द दैत अच्फि उक्रा माया कहूँ,
  148. 21:53–21:59कि एक तं मन उक्रा पूनता है नहीं पक्री सकैत अच्फि उक्रा प्रक्रति कहूँ,
  149. 21:59–22:29वो उग्रा अविद्या कहु, कि एक तं केवल जाने वोग्रा विलीन कराएत अचीगो प्रभू, एहि स्रिष्टिक समपून अव्यवस्तित मन्तन्सम परे ठाड, वोग्रा शानती में विश्रामरत, हमर हिद्यमे भकती जगाप थी, आसाखषी बनी ठाड रहती, प्रत्यक्�
  150. 22:29–22:32अंक द्वितिय द्वितिय पुष्पबुच्च्छ
  151. 22:33–22:35प्रमानक स्वभाव वेदक नित्यता
  152. 22:36–22:38आ आई नव्स्रिष्टिक संबावना संबन्दितर्च
  153. 22:40–22:42एही अंक में शामिल होई वाला नव्स्वर,
  154. 22:43–22:45मी मान्सक, एक्ता वेदिक कर्मकान्द विद्वान,
  155. 22:45–22:50अग्यान भाहरी सहायता बिनु अपन सत्यताक प्रमान दैत अची
  156. 22:50–22:56द्रिष एक सरवग्य सक्ताक आवश्षक्ता अख्फन हुख्ये
  157. 22:56–23:03पर्दा फेर उठ्यत अग्यान बाहरी सहायता भिनु अपन सत्यताक प्रमान दैत अची
  158. 23:03–23:08द्रिश्य एक सर्वग्य सक्ताक आवश्षक्ता अखन हुकिएक
  159. 23:08–23:13पर्दा फेर उठेत अची वादक पचाती क्रम में
  160. 23:13–23:17उद्यन अथी तार चती जतायो चोरने चला
  161. 23:17–23:23हम सब प्रत्हम पुष्पगुछ भरी इस �thepid केने चीजे
  162. 23:23–23:32वम सब प्रत्हम पुष्पबुच् भरी इस थापित केने चीजे एक ता अदरिश्य भागय रर कर्मक फलके शासित करैत अची.
  163. 23:32–23:42मुदा भागयक स्वयं कोनो कारन होईबाके चाही, आध हम्रा सब में सक्यो उही कारन के प्रत्यक्ष नहीं जानी सक्यत अची.
  164. 23:42–23:49क्यो उही दिस उद्देश पूर्वक काज नहीं कराएत अची जे पुरनता ज्यान संपरे अची?
  165. 23:49–23:55तने कोनो असादारन, सर्वक ज्सक्ताक अस्तित्व होईबाके चाही,
  166. 23:55–24:00जे हम्रा सब के उही गुप्त कारनिक संबंदक सच्चा ज्यान दस सक्ती,
  167. 24:00–24:04ताकि हम सब सही धंगसं काज कसरकी
  168. 24:04–24:10आगु आबेत दीरे दीरे उद्यन की एक सर्व शक्तिमान इश्वर दिस पहुची
  169. 24:10–24:18जक्हन वैदिक परमपराक अनादी अखन शिंखला पहिनही सवु ज्यान हम्रा सब तक पहुच बैत अच्छी
  170. 24:18–24:28वा ज़ा आखर्त्रिक वेद पर अविष्वास करैथ फी, तन्कपिल मुनि आदी योग आ अनुशासन द्वारा अके सरवग्यता प्राप्त्त केने चला.
  171. 24:28–24:33दूरुमे सकेो के आख इश्वरक आवष्षकता नहीं.
  172. 24:33–24:43कि एक्तं प्रमानक वेद्ता अपनासं भाहर कारन्पर निरभर करायत अची आसन्सार कोनो विवरने अखन्द नहीं थे,
  173. 24:43–24:48उ आवदेक रूपसक पूरनता विलीन होएत अची,
  174. 24:48–24:55जखन अविलीन होएत अची, वेदक अखन्प्रसारन अखरे सन्विलीन भजायत अची,
  175. 24:55–24:59तो उग़ा ख़ा पर पर पर आखे खचु नविक्रित कर बाखे चाही
  176. 24:59–25:03ये उ सुत्र थेख जक्रा हम अखन पकड़ चाहे थ छी
  177. 25:03–25:14तिका सकेच्छि जिनक गुप्त सक्य तक पहुच्छ्के हम एही पुष्पबुच्छक समाप्तिस पहिन ही प्रत्यक्ष्पर्ख्य भलाच्छि
  178. 25:14–25:20रर विल्यक बाद परमपराके किचु नविक्रित करभाके चाहि
  179. 25:20–25:24ये उ सुत्र थिक जक्रा हम अखन पकड़ चाहेत छी
  180. 25:25–25:30द्रिश दो वेद्ता भीतर से जानलजाएत अछी वा बाहर से
  181. 25:30–25:41इश्वर दिस पहुछ भास पहीने, एक ता छोट प्रष्न पहीने निप्तालियर, जक्रापर हमर आअआक समप्रदाय बहुत काल सविवाद केने अची.
  182. 25:41–25:50जक्ञन कोनो थ्यान उपन होगत अची, तनकी उकर सत्यता स्वत हच, उकर उपत्ती मात्र में जानलजाएत अची.
  183. 25:50–25:57वम कहेथ खीह, किचो के ज्यान रूप में जाननाई स्वया उक्रा सत्यमानब् ठेक.
  184. 25:57–26:04जे बाद मिठ्या सिथ होएत अची से जाज्छ में, कहीो सच्चे ज्याने नहीच हल.
  185. 26:04–26:08तकन संषे एक व्याख्या करू, मी मान सक.
  186. 26:08–26:26जववेद्ता कोनो थ्यानक उपन नहोई तेखशन स्वया गोषित भजाएत, तकन कोनो थ्यान पर कहीो संषे नहीं भहसकेत, तयो हम सब सतक संषे करईच्छी, जकन कोनो थ्यान पहिने सपृत आन ज्यान सन नहीं मिलात अची.
  187. 26:26–26:39वेद्ता वेद्ताजका जान हुबाक नगन तत्यसन भाहर किचुस जानल जाएत अची एक्ता अगुचिन, एक्ता अगु अनुमान सफल्क्रिया में एक्ता परीच्षा.
  188. 26:39–26:46मुदा अहाक बाहरी परीच्षा स्वया अपन अन्वस्तादोषके आमन्त्रित करेट अची.
  189. 26:46–26:56जब पहिल के प्रमानित करई हे तु दोसर ज्यानक आवश्षक्ता आची, तन दोसर के प्रमानित करई हे तु तेस्राक आईना अन्ततद है.
  190. 26:56–27:04एहन नही की एक तन अदिकाश समय, वैध्ता प्रमानित करव बilkul अनावश्षक आची.
  191. 27:04–27:17जते नषन्शे अची नषन्शे अखकारन, उते वस्तृपर विष्वास उपन्न होईत अची आहम भिनु कोनो अलक प्रमानी करन करमक उही पर काज करएद ची.
  192. 27:17–27:36केवल जत्यटे संशे वास्तव में उपन होईत अची, उते आगु अनुमान अबैत अची, अव उते औरुकी जाइत अची, की एक तनजे अन्वस्ता अहाके देराबैत अची, से अहाक स्वत्यप्रामान्य सिद्धानत के उप्वे द्हम्काबैत अची जते कहम्रा.
  193. 27:36–27:48आँु के इमान्बाके चाही जे ज्यानक जानल जाएब, स्वया वेद्धा पूर्वक अनुमानित अची एक्रा सिद्ग करु आधा फेर सवनुमान करे है लची.
  194. 27:48–27:52रलकी मुस्कान एक्ता उचित प्रहार
  195. 27:52–27:58उही प्यासल मनुश्ष्य के विचारूजे पानी देखिते पीभी लैत अची.
  196. 27:58–28:04आखे है जे अ पानिक प्यास भुजे बाक शक्तिके प्रक्तिप्षत है जानैत अची,
  197. 28:04–28:08की एक ता ओब पिनु हिचकी चाहतक काज करै अची.
  198. 28:08–28:11उनही जानैत अची.
  199. 28:11–28:24उ शक्ति अनुमानत अची तुर्वंत आ अचे तन रूप सबीतल अनुभवस थीक जेना इच्छा स्वया एक तीवर मान अनुमानस जन्म लैत अची जे कोनो कार्य कोनो परिनाम दैत अची.
  200. 28:25–28:27तीवरता समानता नहीं थिक.
  201. 28:27–28:33जल्दि लेल जेल एक्ता बाहे परीच्षा तैयो बाहे रहेत अची
  202. 28:33–28:38द्रिष् 3 स्वपन जाग्रती आमुरक दूई हाथ
  203. 28:38–28:45फेर मंच्पर, तकन बताओ हम्रा सब में सकेो जाग्रती के स्वपन स्कोना अलक बैत अची
  204. 28:45–28:52अजगन आहा जागेछ छी, दूनू अवस्तातीछन, निर्विवाद विरोद में ठाड होएत अची,
  205. 28:52–28:58स्वपनक दून्धली स्म्रिती जाग्रतिक जीवन्त तद्कालतास विप्रीत.
  206. 28:58–29:04अविरोद अवास्तातीछन, निर्विवाद विरोद में ठाड होएत अची,
  207. 29:04–29:29अविरोदा भास स्वया माप्दन्तेक, वोक्रा कत्हु आर सा आयातित करबाक आवष्ख्ता नही, कि एक तन जागरित अनुभज़, अपन माप्दन्त स्वया दैत अछी, जक्रा विरोद्द्द स्वपन् मापल आन्यून पाओल जाएत अछी.
  208. 29:29–29:34पश्छिम्य तार्किक एक्ता तिछन संषे उठबैट चति
  209. 29:34–30:04अभी चलित अजन्चै करती, अग्ता नगन तारकिक समभावनाजे कहीो कोनो तत्यक विरुद प्रमान मिली सकैत अची, से अग्ता दार्षनिक मुर्ख फुनका कहेल जाएत अची, सबहाक सुजह अपन दूनुहात उठाक कहलनी यह अच्ता अच्त, यह दो सर्च तने बाहे �
  210. 30:04–30:11अही संश्यवाद के ओखर ज़दिद हरी दھकेलू आहा अविरोदनीम पर पहुची जाएभ,
  211. 30:11–30:17चाहुतं एक्रा तत्वहीं पून्रुक्ती कहू, मुदा संश्यवादी के से हो किच्वो के है हे तु
  212. 30:17–30:22अपन संश्यष समेद, एही पर ठाड हो एबाके चाही.
  213. 30:22–30:25अपन संशे समेट एही पर ठाड होई बाके चाही
  214. 30:27–30:32हम्रा हर समभावित भविश्यक विरुद अभेद्यनिष्चित्ता नहीं
  215. 30:33–30:37हम्रा ओदबे चाही जब एक ओनो युप्तिएक्ट अनवेशन के चाही
  216. 30:37–30:40प्रमानक संतुलन सत्यतास तोलल
  217. 30:40–30:51आव उजि सन्तुलन पर न्यायक वेध्ता संबंदी विवरन भाहे चहनस जानल सफलक रियास अन्तपुष्त अदिक भार राख़ेद अछी.
  218. 30:51–30:55ग्रम आप्रूटी अनुब्वक निर्विवाद तत्यत्तेग
  219. 30:55–31:08जजेना आहा मी मान्सक कहेछ छी, एर ज्यान औहिसच सत्यहोएत अची तक्हन द्रम आत्रूती की छे, आहाख हे तु कोनो उत्तर नही अची.
  220. 31:08–31:18द्रिशचार प्रमान जे द्वनी नित्या नही छे, एट्बे मानिलिय तक्हन आहाम्रा भूमी बडले दिया.
  221. 31:18–31:33आाक इश्वर भिनू से हो वेद के रच्टाक आवष्षक्ता नहीं वेद आजक्रास अद्वनी बनल अच्छी से केवल निट्यभ्वा सकैत अच्छी कोनो निर्दोश वक्तावा उद्तर्दाय रच्टाक आवष्ष्षक्ता भिनू.
  222. 31:33–31:41तक्हन इसे हो हम्रा अहास लेबाके चाही, मित्र, आहम एक्रा सामाने श्रवन्स करव.
  223. 31:41–31:49हम सब प्रतिदिन कहेट ची, ओद्वने रुकी गेल, द्होल पीटल गेल चल, आह अखन उशान्त अची.
  224. 31:49–31:54यह द्वनेक नाशक प्रत्यक्ष अनुबुती थिक.
  225. 31:54–32:24द्वनी केवल कत्फु आर नहीं जासकैत आची, आखार रहित होई बाक कारने, उद्धाकल नहीं जासकैत आची, की एक तन द्धाकब आखार युक्त वस्तुक द्र्म आची, उकेवल हम्रा हे तु अदिक शीन नहीं भेल आची, की एक तन ये बहानाई से हो सिद्ध कदेत, �
  226. 32:24–32:46अदरिश्यकन कन के अदरिश्यकन के अनुबष्यकन का एने जे ओकर अदार होगत.
  227. 32:46–32:59आस्वया द्वनिके सुनु स्वर उठयत अची गिरः अची, तेज होईत अची, म्रिदू होईत अची, एक ही नित्के वस्तु एक ही च्चन विरोदी गुन नहीं दारन कषकैत अची.
  228. 32:59–33:13जख्रा आगा एक ही शब्द फेर पहज्चानल कहे थ्छी से एक ता शिक्ठ पुना पहज्चानल फिक नव ओव ओव ओव जोती प्रतेखषन आदत्वष एक नामस बजाओल गे.
  229. 33:13–33:24उत्पत्ति आनाश नित्यतानही ये उत्फिक जे आहाक अपनकान आहाके बतभैत अची जँ आहा उही पर विष्वास करू.
  230. 33:24–33:31शान्त तासप परमपराके एहे पर विस्तार सक कत हुार आहाके उत्टर दिवाके चाही.
  231. 33:31–33:45देत अखन हे तु एद्भे पर्याथ अची जे द्वनी आव उक्रे संग, उच्चारित वेद उपन्न होएद अची आजे उपन्न होएद अची से खोईजा सकैत अची.
  232. 33:45–33:56विल्यक समय आख अपन विवरने किचो नहीं हिलः, किचो काज नहीं करः, अखाश स्वयंशुन्य आस्थिर ताद रहें अची.
  233. 33:56–34:14तक विल्यक समय आख अपन विवरने किचो नहीं हिलः, किचो काज नहीं करः, अखाश स्वयंशुन्य आस्थिर ताद रहें अची.
  234. 34:14–34:19तखन पूर्न स्थिर्तास नव्स्रिष्टी की आरंभ्ख कषकत अची?
  235. 34:19–34:25पहिने कहीर निद्रा के विचारू एक ही पहलीक चोट्रूक में
  236. 34:25–34:33स्वपनरहित निद्रा में आत्माग ज्यान, इच्छा, सुख, आदूवक सभ एक संव शांत भजाएत अची,
  237. 34:33–34:41तविज़ियो शरीरक साँस चलात रहेत रहेत आची, शीन, आ आत्मा फेर सवक्षक जागेत आची.
  238. 34:41–34:48तहीना स्रिष्टिक विल्यमे, चारी तत्वक कन मे एक ता अत्यंत सुख्शम गती बनड रहेत आची,
  239. 34:48–34:59एक सुख्श्म्जे सन्सार प्रुक्मे दर्स नहीं होएत आची, जाभे उकर अंतिम चरन उहीक शनके चहनित कराएत आची, आई नव्स्रिष्टिक भीज बनी जाएत आची.
  240. 34:59–35:12ये आवश्षक नहीं जे कोनो दिनक पहिने सदा एक ता और एहन दिन होई, वर्शारतुक पहिल्दिनक पहिने गरिष्मक अंतिन दिन होई आची, कोनो और वर्शाक दिन नहीं.
  241. 35:12–35:20तहीना नव स्रिष्टिक पहल दिनक पहीने विलै होएत अची, कोनो पुरान संसारक आर दिन नहीं.
  242. 35:20–35:25अप्रत्ठम मनुश्यः प्रत्ठम ब्राहमन, कोनो भाशाथ प्रत्ठम वकता.
  243. 35:25–35:27वगता
  244. 35:27–35:33के उ माता पिता हुनका भाजव नहीं सिखाओल, की एक तन सिखाभई बलाके उ अखन हुन नहीं चल
  245. 35:33–35:43तीक जेना प्रध्षु स़ल गो बरस उपन होएत अची, कोनो भिच्षु माता पितास नहीं आकेवल बादु पीदी सही प्रजन करैत अची,
  246. 35:43–35:45अवि इशारा मे शब्दा अरतक प्रत्हम प्रत्हा सिख बैत चति
  247. 35:45–35:47अवि प्रत्हम शिक्षास पूरन शिंखला
  248. 35:47–35:49कुमहार्स कुमहार् जुलाहास जुलाहा
  249. 35:49–35:51शिक्षकस शिष्य अखंड चलत अची
  250. 35:51–35:53जाभे अगिला वागिला
  251. 35:53–35:55वागिला वागिला
  252. 35:55–35:57वागिला वागिला
  253. 36:13–36:15अगरा फेर तोड़त अची
  254. 36:15–36:23द्रिष छेट दीर गरास, आशास्त्र की एक पुन्हस्तापंक आवश्षक्ता राखईद अची
  255. 36:23–36:33सबहा दिस मुरएत अदेक गमभीर आई मत सोचुजे शिंखला आई उत्वे मस्वुती सपकडल अची जते कही उचल
  256. 36:33–36:39इमान्दारिस देखु जे पहिनही सकी जरजर भा गेल अची
  257. 36:39–36:51जे अनुष्ठान कहीो हजारो वैदिक शाक्ठ, पूरन स्म्रितिस का एजाएच्छल से अखन, जब चल अची तं केवल एक ता शाक्ठस, अपूरन रुप मे राख्छल
  258. 36:51–36:57दर्म कहीो चारी पैर पर ठार चल तप ज्यान यग्यर दान.
  259. 36:57–37:01तप खसी गेल गुई पैर बाकी रहले.
  260. 37:01–37:09ज्यान खसी गेल एक पैर दान अखन पूरा भार दोएत अची आओजो पैर खायल अची.
  261. 37:09–37:14तखन सपष्ट कहो अहा की बनाभाई जा रहे लची.
  262. 37:14–37:18इजे शास्त्रस्वयन्सिद्ध नहीं थिक
  263. 37:18–37:48अकर अदिकार वेद पर निरभर अची, सद्गुनी लोकक सामान्य आचन पर नहीजे एक दोस्राके अनुसरन कर अची की एक तन्ज सद्गुनी आचन अके खोनो कर्म के अनिवार्य बने बाक हे तु पर्याप्त होएत, तंखोनो शास्त्रिय अदेशक आवष्षक्ता नही हो
  264. 37:48–37:54खब उख्रा उपन्न नहीं कषकेत अख्छी एक भेर मुइ कारन चली गेलापः.
  265. 37:54–38:01द्रिश सात कपिल पर्खल जाएत खथी आ अपर्यात पाओल जाएत खथी.
  266. 38:01–38:12तखन कपिल के ओग्याता होग़े दिव, प्रत्यक्ष अनुभवक रिषी, योगसन्शुध, दूहकी प्रानिक, हे तु करुनास्प्रेरित, शास्तरक, जे किचु हरायल अची उक्रा पुनर्जीविद करभामे सक्षम.
  267. 38:12–38:26तक्हन कपिल के उ ज्याता हो भै दिएक प्रत्यक्ष अनुभ्वक रशी योग संशुद्द, दूहकी प्रानिक हे तु करुना स्प्रेरित, शास्त्रक जे किचु हरायल अची उक्रा पुनर जीवित करभामे सक्षम.
  268. 38:26–38:35ौमल्तास मुदा बिनुजुकने, उदावा के उप्वे साव्दानीस पर्खुजतेक आहा रमर के पर्खल हू मित्र.
  269. 38:35–38:45द्यान वस्तृता उही कि चुके जान्बाक साद्धन भह सकैत अची जे अन्यतागुक्त अची, हम एक्रा पूनता अस्विकार नहीं करैच्छी,
  270. 38:45–38:51अगा द्यान उहिक्षन यान स्वत्ध नही दैत अची जक्ठन उ अभ्यास कय जाएत अची,
  271. 38:51–38:58ओख्रा जे भेटल अची, ओख्रा प्रमानत करे हे तु कोनो आर साद्धन क आवश्षकता अची.
  272. 38:58–39:03कपिलक करूना अहिन सापर द्यानके की प्रमानत करे अची,
  273. 39:03–39:33अज्ग़ प्रत्यक्षत है, एही जीवन मे वादुई जीवनक भीच मे नहीं भेट्लक अच्छी की एक तनजे शरीर एही जन्म मे काज कर अच्छी आजे शरीर अगिला जन्म मे फल्भ होगैट अच्छी से एक ही शरीर से हो नहीं खेक आदूनु कि अच्छी की अच्छी अ�
  274. 39:33–40:03अग्टा शिक्षक्जे त्योहारक राती सुती जाएद चाछी आभोर में काल हिक पात फेर सशूरू कराएद चाछी से केवल इसिद कराएद चाछी जे सम्रती एक जीवनक देवन कराएद चाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जा
  275. 40:03–40:09भीटर बाकी रहात अची दूई जीवनक भीचक खाई पार नहीं.
  276. 40:09–40:16अप्रत्फम ब्रहमन के विचारू, स्रिष्टिक भोर में कोंस मिरतिसचो अपन वन्शावली जानी सकैट चला,
  277. 40:16–40:21जक्यो अखन्हु समरन कर आय रहे तु जनमल नहीं चल.
  278. 40:21–40:31लोकक भीच यात्राक कोनो शक्ती से हो सिद्ध नहीं भेल अचीजे तयार जातिवेवस्ता भहन्क बसनिहार के आनी सकैत होग.
  279. 40:31–41:01अंतह, एक सर्वग्य, सर्वषक्तिमान सत्ताके स्विकार करव, जक्रा कोनो सरीज नहीं चाही, कोनो अप्रीच्षित स्म्रतीं नहीं, कोनो अप्रमानित यात्रा नहीं असिध्ध, आदा सर्वग्य रिषिक संख्या बड़ाक यह काज भेकार धंगसं करेभास अदिक सरल आय
  280. 41:01–41:08एक्रे दोसर चरनक अंत्मेवाद के एही दंगे ताड होईबाके चाही.
  281. 41:08–41:13द्रिश आत्ग्ध्वित्ये पुष्पबुच्षक समापन प्रार्ठना
  282. 41:13–41:18उद्यन्केर सवद्रिष्प्रतिमा दिस मुरएच्छत्फी
  283. 41:18–41:23वमर रिदाय शिव में जीवनक अंतिमखषन दھरी द्रेद रहें जे,
  284. 41:23–41:29रहर प्रानिक भागय संसाहाइता प्राथका की अद्बुत संसार भेर-भेर बन बैध छत्थी आँ,
  285. 41:29–41:33येक्ता जादूगर जकाजे अपन प्रिक स्वयम मेंगबैच्छत्छी,
  286. 41:33–41:37अगी प्रभुपर अकेल हमर भक्ती अटल रहें
  287. 41:37–41:41पर्दा दिरे-दिरे-खसेत अची
  288. 41:41–41:45मी मान्सक छिंतन में बैसल रही जाएत
  289. 41:45–41:48चती जखन दिप मन्ध होएत अची
  290. 41:48–41:51परिषत काना फुसी कर अची भूमी हिली गेल अची
  291. 41:51–42:21आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
  292. 42:21–42:51ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  293. 42:51–42:57दिए उज्कयल जाएत अची इपुष्पबुच्ष सबहास सर्वादिक विवादित थिक
  294. 42:58–43:05उद्यन्स पहिने आगु बडध, आहा दुई पुष्पबुच्ष सन्सारक निर्माता दिस बन बैक भिताओल उद्यन.
  295. 43:06–43:08हम इएक में नीम उखाडब.
  296. 43:08–43:19जए इश्वर अस्तित्वमे हुएत तन उ गे हुए बाके चाही, थीक जेना गायक सिंके उकर आकार आरंगसन जानल जाएत अची.
  297. 43:19–43:21उग्यात नहीं च्हती.
  298. 43:21–43:35तने उ नही च्छति, थिक जेना क्हर्हाक्सिं नही अच्छि, तिक एही लेल जे, यद्यपी वोकर अकार जे होए जब वो रही ते, तवियो के वो अग्ता नही देख्लक अच्छि.
  299. 43:35–43:41अच्छत्र्क आआ आपन पहिल पयर मिस वच्छता सबहुल.
  300. 43:41–43:57आख अनुमान के वल उतै काजकर आप अचीजत्य वस्तूके पहिनही सब प्रक्तिक्षक अचर मानल गेल चल, क्रहाक सिंग औही प्रक्तिक्षक परिक्षामे अस्फल होएत अचीजक्रा उक्रा सदाभैस भाक योगि मानल गेल चल.
  301. 43:57–44:06इश्वर के एही सबहा में कोनो आस्टिक दवारा कहीो सामाने प्रक्तिक्षक वस्तू दावा नहीं कहीलगे.
  302. 44:06–44:17आहा एक ता अदरिष्य वस्तू के उही परीच्षामे अस्फल होईबाक दोश नहीं दस खैच्ची जक्रामेो कहीो प्रविष्त नहीं भेल.
  303. 44:17–44:25तक्हनो कोना जानल जाएत च्छती, जा उही एक ही विधिसन नहीं जक्रास आहा अक्हन हुंका मुक्त करे है थी.
  304. 44:25–44:40अपन सब्स्मस्वुथ आपती पाच्मक लेगु जखन अनुमान स्वया आख सोजा थाड होए.
  305. 44:40–44:53अखन हे तु हम के वल भूमि साव करेट ची जे वस्तू कहीो अनुवूत होई बाक दावा नहीं का इल्गेल वोकर अनुवूती किच्वो सिद्ध नहीं करेट अची.
  306. 44:53–45:00द्रिष्ष दोप निद्रा अत्मा आजक्रा अनुवूती सपर्ष नहीं कषकेत अची.
  307. 45:00–45:06तक्हन आपन स्वयंक आत्माके एक्ता परीच्षा प्रक्रन रूप में बिचारू,
  308. 45:06–45:19स्वपनरहित निद्रामे आहा आपन आत्माके अनुबhut नहीं कराथ ची, तयो आहा जागित इनिषकर्ष नहीं निकालाथ ची, जे आहा अस्तिप्व में रहेप बंद कदेने रही.
  309. 45:19–45:27तक्हन येमान इश्वर पर लागुवेने उनक अनुपस्त्तिके समान रुखस की एक सिद्ध नहीं कराथ अची.
  310. 45:27–45:35की एक तन निद्रामे उकारन जे आत्म ज्यान उत्पन करिताई से एकत्रित नहीं होईत अची,
  311. 45:35–45:46अपितु एहि लेल्जे वूक्रा ध्यान देवाय बला उपकरन शान्त भगेल अची.
  312. 45:46–45:55जक्रापर आहा निरभर ची, जे के अ स्वपनर हित रातिक पार अपन निरन्तर अस्तिट्वपर संषै नहीं कराइत अची,
  313. 45:55–46:01अजी ये स्वयं प्रमान थेख जे अनुभूती अनस्तित्व नही भुज्बैत अची
  314. 46:01–46:07आहा अपने उदाहरन्स अपने पद्धती के खंदित कदेल हू
  315. 46:07–46:13संभलैत तकन इपर्खू एक ता चेतन सक्ता के शारिरिक क्रिया देखा बाके चाही
  316. 46:13–46:43अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना �
  317. 46:43–46:57अख्श्थिर्ता में बिनु कोनो शारिरिक च्यनक अचल बनल रहेत अची भिन्कार्य भिन्प्रकारक कारन्स आबैत अची आख्चोनो निम हर निर्माता की एक ता द्रिष्या राथ स्भानहल नहीं राख्यत अची
  318. 46:57–47:03द्रिश तीं चार्वाकक शर्थ आउ की एक भुनाओल नहीजा सकैत अची
  319. 47:03–47:09चार्वाक आगु बडध च्फी पहिने सा अदिक देज
  320. 47:09–47:13एक्रा नास्टिक्स बेसी संकुछत करे दिया
  321. 47:13–47:43ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  322. 47:43–47:47अगा अख अखि उनकास हदथ अची
  323. 47:47–47:51कि अगा एहिपर विष्वास करईच्छी
  324. 47:51–47:55चिडचिडाएत सम्रती हमरा आश्वस्त करईच्छे यो बाकी चति
  325. 47:55–47:59सम्रती अगा के बहुतो नश्त भेल वस्तुख से हो आश्वासन दैद अची
  326. 47:59–48:02की आहा एही पर विष्वास करईट ची?
  327. 48:02–48:07चिडच़ाएत स्म्रती हमरा आश्वस्ट करईट अची जे यो बाखी चती.
  328. 48:07–48:13स्म्रती आहा के बहुतो नश्त भेल वस्तुख से हो आश्वासन दैद अची,
  329. 48:13–48:16एक ता बच्पनक गर जे कहीो सद ही गेल अची,
  330. 48:16–48:22अगे स्म्रिति वर्त्मान अस्तित्वके प्रमानित नहीं कष अकैत अची
  331. 48:22–48:27जेख्षन अहा स्म्रिति पर जुकैत ची अपन परिवार के अपने निम्स बचाभाई हे तु
  332. 48:27–48:32आजा स्म्दिपर जुकेट्छी आपन परिवार के अपने निम्स बचाभई हे तु,
  333. 48:32–48:40आँँ थिक उत्वे मानी लेनेची जब आम्राचाही अनुभूती अनस्तित्व सिद्ध नहीं करेट अछी.
  334. 48:40–48:45आआखिके स्वयं विचारूब जकर देखभ आहा निरभर करईच्छी,
  335. 48:45–48:49उ आम्स्वयं कही उ देखल नहीं जाएत अची,
  336. 48:49–48:54तई उ आहा उकर अस्तित्वपर संषे नहीं करईच्छी.
  337. 48:54–48:57आख नियम इमान्दारीस अनुसरन का इलापर,
  338. 48:57–49:01अहाख अपन संशे उख़न के नष्ट कदैत अची
  339. 49:02–49:05समवान्य आचरन के निष्ट ताक अवष्षकता नहीं
  340. 49:06–49:10उस समवावना पर चलैत अची समवान्य सहमती उप्योक्सं परकल
  341. 49:11–49:15तकन समवावना कते रहेत अची अहाख विवरन में
  342. 49:15–49:45ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  343. 49:45–49:49अनुमान के किषु भूमि दिय, तक्षन, ज़ आहा आग्रै कर अची.
  344. 49:49–49:53मुदा उहीपर संचय कोना अंता हतैत अची.
  345. 49:53–49:56हर देखल पैटरन काल ही तुटी सकैत अची,
  346. 49:56–50:00वा एक मील दूर, वा एहन शर्त में जक्रा हम सब जाचै नहीं सोचल हूँ.
  347. 50:00–50:05वा एक मील दूर, वा एहन शर्ट में जक्रा हम सब जाच़े नहीं सोचल हु.
  348. 50:05–50:08इदम की कही यो बन्द नहीं होएत अची.
  349. 50:08–50:15इो ही खषन बन्द भजाएत अची जक्शन आहार इदेखआत ची जे आहा पहिनही समानी चुकल ची,
  350. 50:15–50:25अग अग शम्ता थेख जे वर्त्मान समयस गन्ता दिन आरितु तक विस्तारित अनुमान थेग.
  351. 50:25–50:41अग अनुमान पर अक्रमन कर अग तु अनुमान के उप्योग नहीं कषकेट्छी बिनु उप्करन के उदार लेने जक्रा अहा अएोगे थ हरेबाक प्रयास कर अहल ची.
  352. 50:41–51:01अव्यावारिक रूप्स, संशे उते समाप्त होएत अचीजते अग्ता प्रतितत्य संशे करता के अपन ही विरोदा भास में फसादेत, कारन अकार्यक विष्वस्निय संबंद के अस्विकार करू, अशंशे करबाक क्रिया स्वया,
  353. 51:01–51:07जे स्वयान एक्ता कारियत्ख आहामे कहीो उपन्ने नहीभ रह सकैच्छल.
  354. 51:08–51:13एक्ता युक्तियुक्त मन हर कल्पनिय अप्वाद के अन्तताह नहीं कोजैत अची,
  355. 51:13–51:21उ एक्ता एहन हे तुक अनुसरन करईत अची जकर भ्याप्ती परकल गेल अची अटिकल अची अखाज करईत अची
  356. 51:21–51:26पीछो हताएत अनिष्चत मुदा भूमिस भाहर तकन अगु बड़ा
  357. 51:26–51:28हम बाकी के सुनब
  358. 51:28–51:35द्रिश पाज उप्मान, आ पाज्चम पुष्पगुछ्षक आगामी परीच्षा, स्तगित.
  359. 51:35–51:43एक्ता सुख्श्म वर्गी करन प्रियस्वर, एक्ता आर मार्ग, उद्यन, आगु बद्भास पहीने.
  360. 51:43–51:53किछु मानेद छतीजे उप्मान देखल समान तासग्यान अपन स्वतन्त्र प्रमान्सादन थेक, प्रक्तिक्ष आ अनुमान सभिन्न.
  361. 51:53–52:03जएहन होगी तक्चन आहाथ हे तु एक ता कतिनाई आबैत अपी, हर ज्यात वस्तु कोनो आर पहिनेग्यात वस्तु सम्मिलैत अछी,
  362. 52:13–52:15अपस्तिति सिद्खषकट अची
  363. 52:15–52:25केवल ज़ समान्ता कोनो तेसर प्रकारक सथ्ता होएत, नस्सत नवसत आएहन कोनो तेसर प्रकार अस्तित्वमे नहीं अची
  364. 52:25–52:36सत आअ असत सम्पून क्षेत्र के समाप कदैत अची, एक के अस्विकार करू, आऔहिसन दोस्रा के स्विकार कलेने ची.
  365. 52:36–52:42समान्ता केवल उही वस्तुक एक ता गुन्त्ठिक जे पहिनही सवची,
  366. 52:42–52:48उही दूई श्रेनी में सर एक में वर्गी क्रत ओक्रा कोनो स्वतन्त्र स्थेक आवश्षक्ता नही,
  367. 52:48–52:58आतने हो एक ता एहन सताक विरुद्ध कोनो स्वतन्त्र हत्यार नही दैत अची जे अपन स्वभावस अद्वितिया हो थी.
  368. 52:58–53:10अद्वितियता कोनो दोष नहीं थिक जक्रा तर्ख हत्यार बना सरकैत अची इ केवल एकता तत्ध्ध्धिक जे किचु विश्य राखआत च्धिया किचु नहीं.
  369. 53:10–53:16द्रिष छे शाब्द प्रमान आसर्वग्य रच्टाक विवाद
  370. 53:16–53:21वेर मच्पर तक्हन हम्रा अहाके शाब्द प्रमान पर दबाब देभई दिय,
  371. 53:21–53:30कि एक तैई समपुन पुष्पगुच अंतै एही प्रशन्पर लोटआत अचीजे वेद के कोनो रच्छिताक आवष्षकता अची की नही.
  372. 53:30–53:41वैशेशिक एक्ता सामानिय वाक्यक अर्थके वक्ताक अभी प्राएस अनुमानत किचु मानात अची, शाब्द प्रमान के एक्ता प्रकारक अनुमान में गटा देल्गे.
  373. 53:41–54:11अम्रे अपन सम्प्रदायक प्रभाखर शाखा आर आगुजाईत अची केवल वेद अकर्त्रिक होईबाक कारने स्वतन्त्र अदिकार राखआट अची एक ता सामान्यमान भीवाक केवल तकने विष्वस्नी अची जखन अनुमान वक्ताके विष्वस्नी प्रमानत कचुकल �
  374. 54:11–54:26वक्ताक विष्वस्नियताक कोनो पूर्व प्रमानिकरन नहीं गुज्बाक हे तु आवश्षक अची
  375. 54:26–54:33अग्ता बच्चाजे अख्शन हूनही जनैत अख्शिजे वेदक कोनो अख्चिता अख्शिकी नहीं,
  376. 54:33–54:45उहो एक्ता वैदिक वाख्यके पूरनता भूजी लैत अची सुन्तही एक भे देखभैत अची जे भूज़प पहिने रचितवक निनयक प्रतिख्षा नहीं कराइत अची.
  377. 54:45–54:55शाब्द प्रमान अपने आपने एक्ता ज्यान सादन्तेक, प्रत्यक्ष आ अनुमानक बगल में ताड, वेश्द्धयने अनुमान नहीं.
  378. 54:55–55:01तक्शन औ अदेक तिछन अपती के विचारुजे किचु लोग सीदे अहाक विरुद उत्बैट चति,
  379. 55:01–55:31जेना हम आहाके द्वितिय पूष्पगुछ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ
  380. 55:31–55:42वदोरी कद्पूत्लिक हातके एक्ता दूरक वस्तुदिस इशारा करभैत अची, आदेक हैत बच्चा शब्द बस्भास पहिनी इशारास अर्थ अनुमानित करैत अची.
  381. 55:42–55:53शिक्षा के बाशा पूरन होई बाक पूर्वकल पना नहीं कर बाके चाही, उबाशा के आरंभ कषकैत अची पहिने इशारा फेर शबद.
  382. 55:53–55:58हम अहा के आई एक रास विकार करे नहीं कहेट ची.
  383. 55:58–56:08वम केवल इकहे ची जे आपती, कते क टिख्षन सूनाइ दिय, पहिन ही सबहेंट कयल जाचुकल अची.
  384. 56:08–56:15द्रिश सात अर्था पती आ अनुपलप्दी, संख्षेप में तालल आ अपर्याप्पाव्र.
  385. 56:15–56:29सुत्रदार बाकिखन्द्शिर्षक एक ही संग, तीवरतास पड़ध चचत्ही, जखन उद्यन प्रतेक उत्र बारी-बारी दैच्चत्ही गती एताय तेस होएत अची, ध्वन्दवस भेसी चोग.
  386. 56:29–56:34आर्था पत्तिख स्वत्ट्र प्रमान सादन रुक में परीच्षा.
  387. 56:34–56:40अनुप्लब्दिक स्वतन्त्र प्रमान सादन रूप में परीच्षा आ एकर आर परीच्षा
  388. 56:40–56:47एक फेर दो सर, उद्यन, की एक ता आहा उप्मान आ शाभद के उदर दचुकल ची
  389. 56:47–56:57पहिने अर्थापत्ती उ अनुमान जे हम्रापर भाद्ध्यहोएत अची जकन एक ता ग्यात तत्यणन्यता कोनो अर्थ नहीं रक्ध अची.
  390. 56:57–57:27अपना उतत्या देखाउजे केवल निरमाता बिनु अर्थ रक्ठ अच्छी आहम उक्रा सीदे उट्तर देप मुदा एही सबहामे के अ अख्ण दھरी एक हु प्रस्तृत नहीं के लक अच्छवरक विरुद अर्थापती कहर दावाक्रित मामला जाच्मे अपना उपना उपन
  391. 57:27–57:38अर्थापतिक नाम दहेने एकता सामाने अनुमान सिथ होएत अची, असामाने अनुमान के हम पहिन ही सविस्तार सवुत्तर दचुकल ची.
  392. 57:38–57:45तकन अनुप्लप्दी फेर सव, अपन पूरन रूक में केवल, हम हुनका नही देक्खल हूँ नही,
  393. 57:45–58:00अपितु उ गहीर मीमान्सा दावाजे अनुपलब्धि स्वयाई अंद्रेजने ज्यानक अग्ता भिन्न सादन थेक, अअ इश्वरक समबन्ध में ओकर मान के सकार आत्मक प्रमान मानल जाएप चाही.
  394. 58:00–58:30देर्यवान मुदा एक्ता लंबा दिनक्तरकक अंतलग, साब्दानी सो करपत अनुसरन करू, आअ अंत्ता प्रत्यक्ष्मे धही जाएत अची, एक्ता सामान्य, अख्षत अंद्रिये इहा कोनो ग्यल नही इनिश्छत ज्यान अहिस तान के अनुबहव का उपन्न करआत अची �
  395. 58:30–58:46प्रत्यक्शे दोसर वेश्मे ठेक, औटीक औशीमा उतर आदिकार में पबैत अचीजे प्रक्यक्ष्के पहिनही सच्छल, औगेवल उही वस्तुक अबहावक रिपोट कषकैत अचीजक्रा उ शुरूएसं पकड़ योगेच्छल.
  396. 58:46–58:51इश्वर कहीो उही योग्यताक भीतर नहीं चला.
  397. 58:51–58:54मून किचो नव सिद्ध नहीं करःत अची केवल,
  398. 58:54–58:57एही पुष्पगुच्छ मे तेसरी भेर,
  399. 58:57–59:03उही प्रथम उत्तर के पूनह कहेद अची जे हम अहाके देने रही.
  400. 59:03–59:06एक्ता लंबात हैराव, फेर एक्ता चोट,
  401. 59:06–59:20इमान्दार मुरी हिलाब, तक्हन हम प्रत्यक्ष अनुप्लब्दिस अनुमान, उप्मान, शाभ्दः आ अर्ठापतिके समाप्त कचुकल ची, आ अहिमेस एक हो हम्रा आहाक अनुपस्तिती नही दैत अची.
  402. 59:20–59:26समाप्त नही प्र्वक पर्खल, न्याय पूर्वक एक एक कखा.
  403. 59:26–59:32एक बे हम एही पूरा पूष्पबुच्ष भरी के क्रो समांगल अची.
  404. 59:32–59:37द्रिश आत, ख्रीतिय पूष्पबुच्च्चक समापन प्रार्थना.
  405. 59:37–59:42उद्यन एही अंक में अंतिन भेर अदरिष्प्रतिमा दिस मुरएद्छत्छति
  406. 59:42–59:48पूर्न भक्तिसं हम उही देव्ताक देव्ताके प्रनाम कर अच्छि
  407. 59:48–59:52एही सबहाक हर परमपरामे सैक्रो नाम्स पूजित
  408. 59:52–59:57जिनक शान्त आनन्दक उद्सव्सं कोनो प्रतिद्वन्द्वी सुख्ध नहीं मिलात अची,
  409. 59:57–1:00:02जिनक यतार्त्ताके कोनो प्रत्यक्ष पक्री फेकी नहीं सकैत अची,
  410. 1:00:02–1:00:05कोनो अनुमान उल्ती नहीं सकैत अची,
  411. 1:00:05–1:00:08कोनो आर प्रमान्सादन रदा नहीं सकैत अची,
  412. 1:00:08–1:00:16आजिन पर अंत्तध औहर प्रमान सादन स्वयन निरभर अची विष्वस्नी होभै हे तु.
  413. 1:00:16–1:00:18पर्दाख असेत अची
  414. 1:00:18–1:00:26नास्तिक बाखी परिषत्स की चौकाल अदिक थाड रही जाएच्छत्छती फेर अहो भैसेत च्छत्छती
  415. 1:00:26–1:00:56अंक चतुर्त, चतुर्त पूष्पगुच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्
  416. 1:00:56–1:01:00उद्यन निक दंगसं ठाकल भुजाएद छत्फी,
  417. 1:01:00–1:01:04एक्ता भादीजे अपन मामला मे गहीर दंसल अची,
  418. 1:01:04–1:01:06उहिसन जरजर नहीं.
  419. 1:01:06–1:01:09एक्ता अर कतिनाई, उद्यन आई आहाजे किचु बनोनेची,
  420. 1:01:09–1:01:11उकर जडिके चोट कर अची.
  421. 1:01:11–1:01:17अपन वाम्लामे गहीर दन्सल अची उहिसन जरजर नहीं.
  422. 1:01:17–1:01:24अच्ता आर कठिनाई उद्यन आई आई आजे किचु बनोने ची उकर जडिके चोट कर अची.
  423. 1:01:24–1:01:29आई इश्वर के सरवगे कहेच छी.
  424. 1:01:29–1:01:59ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  425. 1:01:59–1:02:12अज़वूनक ज्यान वैद नही अच्छी तनो केक्रो से हो विश्वस्निय रच्छिता नही चति वेद सहित जकर रक्षा आहा तीन पुष्पबुच बहरी केनिची
  426. 1:02:12–1:02:17तकन दोश अही परिभाशा मे अच्छी इश्वर मे नही
  427. 1:02:17–1:02:28जे पहिने ग्यात नही च्हल से जानब कोनो ग्यान के सत्या नहीं बना सकैत अच्छी अतिसंखुचत से हो थिक आ अतिविस्त्रत से हो.
  428. 1:02:28–1:02:38अतिसंकुच्छत एक ही ग्यल के दूभेर देखू, तो सर देखफ पहिल्जक्बे सत्य अच्छी, यद्यपी उही में किचु उनव नही अच्छी.
  429. 1:02:38–1:02:47अदिविस्त्रत एक्ता भ्रम कहीो नहीं देखल गेल की चुप्रस्तुत का सक्वत अच्छि आत्यो मिठ्या रही सक्वत अच्छि.
  430. 1:02:47–1:02:52नवींता नस सक्वताके नमिठ्यत्वके ट्रैक करैत अच्छि.
  431. 1:02:52–1:03:02जे कोनो ज्यान के सक्तिबन बैत अच्छी से एद भे ठेक जे उ वस्तु वास्तव में जेहन अच्छी उक्रासम मेल खायत अच्छी.
  432. 1:03:02–1:03:09उही माप दन्दस, इश्वरक ज्यान पूर्न अख्यो प्रूतिपूर्न नही होई बाक कारने,
  433. 1:03:09–1:03:16अपन विश्वस्तू उदार लिभाय लिभाय तू उशुन्यसादन अग्वान
  434. 1:03:16–1:03:22अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान
  435. 1:03:22–1:03:27अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान
  436. 1:03:27–1:03:32अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान
  437. 1:03:32–1:03:42अगी पूरनत है एकता पूर्व ज्यान पर निरभर करः अची अपन विश्वस्तू उदार लिभाय है तु उशून्यसन उपन्न नही भह सकत अची.
  438. 1:03:42–1:03:55एक ही ग्यलत एक ताजा दर्षन उही पर निरभर करैत अची जे ग्यल अखन उपस्थित अची अपन कारन स्फेर देक्षल गेल भंदार्सं स्मरन नहीं कएल गे.
  439. 1:03:55–1:04:12आइश्वरक मामला दूनुस अदेक सरल अची सम्पून ब्रह्मान्दक हुनक जान एकता एकल स्वयन्स्मान क्रिया थेक, उक्रासंपहिनेक कोनो आर जान पर निरभर नही, किच्वो के तो सर भेर देखबाक आवश्ष्ख्ता नही.
  440. 1:04:12–1:04:18एक्रा ननव कहुन पुरान इकेवल ठिक समपुन एक ही संग.
  441. 1:04:18–1:04:24द्रिश दो ज्यातत्व कदावा तीन प्रयास तीन असपलता
  442. 1:04:24–1:04:28एक्ता भिन्न ध्वार्सम प्रयास करी तक्हन
  443. 1:04:28–1:04:34ज्यान निष्चे अपन विष्षे पर किचु करएत अची किचु चिना चोडअची
  444. 1:04:34–1:04:45अम एही च्हनके ज्यात्व कहे थ्छी, उगुन जे एक्ता वस्तुप, केवल ज्यात होई भासक, प्राथ करेत अची, जे उग्यात भेल अची.
  445. 1:04:45–1:05:15एही बिनु आहाक अपन अनमान में उत्पन होएभ जे एक्ता देवी निरमाताक हे तु अच्छी, अविष्वस्निय भजाएत अच्छी, की एक तन जे करताजे किच्वोस परषकर अच्छी, उही पर कोनो चिनह नहीं चोडआच्छी, उनका अपन सामगरी जनायत कहे पकतिन
  446. 1:05:15–1:05:25अगान एक्ता क्रिया होई बाक कारने, कोनो कारियक फल देबाके चाही जेना कोनो क्रिया फल दैत अची, आवो फल ज्यातत वत्थेग.
  447. 1:05:25–1:05:39मुदा खाली आखाश मे चोडल एक ता तीर आखाश मे कोनो फल उपन न नहीं करेत आची, ज्यान वोही तीर जकाब हसकेत आची, वास्तविक गती, कोनो चिनः पाषू नहीं चोडल.
  448. 1:05:39–1:05:492. जे हम कहेट ची द्हल ज्यात अची आई वाक्याश स्वयन सिद्ध करेट अची जे किछु नव्गुन ग्हल पर बैसल अची.
  449. 1:05:49–1:06:19वूदा हम समान रूखस ग्यल नष्ट भगेल कहे ची उही ग्यलक हे तुजे अखन कोनो गुन प्राथ करे हे तु अस्तित्वमे नही अच्छी, एक ताक्रियास संबंद वरनन करे वाला भाशा, अपने आप मे, वस्तू मे कोनो वास्तविक अवषेश सिद्ध नही करे अची.
  450. 1:06:19–1:06:34वूदाजे कारन हम्राग्यानक विष्वे बजबई दैध अची, से थीक उही कारन थेख जे पहिने ज्यानके उपन्न के लक बाच्चीट स्पष्ट करै है तु आर किच्वो मानबाक आवश्षकता नहीए.
  451. 1:06:34–1:06:44तक्हन ज्यात्त्व किच्वो स्पष्ट नहीं करायत अच्छी जक्राग्यानक अपन स्वबहाज पहिनहीस स्वयन स्पष्ट नहीं करायत होई.
  452. 1:06:44–1:06:46तीक यहे!
  453. 1:06:46–1:07:04अग्ता ग्यलत ज्यान अपन स्वबाज् स्ग्यलत ज्यान फिक, तिक जेना अग्ता पातर उठयबाग प्रयास अपन स्वबाज्स उही पातर समबन्दी प्रयास फिक, कोनो एको के जे उस पर्ष करैत अची उही में तेसर वस्तू जमा कैने बिनु.
  454. 1:07:04–1:07:09द्रिश्तीन की ज्यान स्वयंकी चुत्धेख जक्राहम अनुबुत करैच्ची
  455. 1:07:09–1:07:15वस्तुके किनार राखु तक्हन आप रष्न के ज्यान पर गूमा
  456. 1:07:15–1:07:19आहा कुना जानैच्ची जे कुनो ज्यान भेल आची
  457. 1:07:19–1:07:26जखनो आर ज्यान दवारा वोक्रा अनुबुत नहीं कयल गेल अनन्तता है, एक अक बाद एक.
  458. 1:07:26–1:07:30अनन्तता नहीं प्रत्यक्षता है.
  459. 1:07:30–1:07:36उही ख्षन जखन कोनो भाहे वस्तुक अनिष्चित अव भोद उत्पन होएत अची,
  460. 1:07:36–1:07:43अही ज्यान होई भाक तत्या स्वया मनक्सं, रलकासं, पहिन ही सवृपस्तित अची अगिलाक्षन में,
  461. 1:07:43–1:07:48जक्धन अही एक ही वस्तुक एक ता आर ज्यान उत्पन अहोईत अची,
  462. 1:07:48–1:07:53मन मुरत अची आपुर्व ज्यान के निष्चत रूप सजानी लैद अची,
  463. 1:07:53–1:08:04खिक जेना अपन रसोईगर में पहीचानल गेल पहिल अगिन उही एक ही चहनस भाद दूरक पहाडपर दूवासन दोसर अगिन पहीचाने दैत अची.
  464. 1:08:04–1:08:16ज्यान स्वया कोनो दोसर, उहिसा अलग धार ज्यान सा अनुबhoot नहीं होईत अच्छि, मनक आत्मासन सीधा संबंद, जक्रामे ज्यान नहित अच्छि, पर्याप्त अच्छि.
  465. 1:08:16–1:08:20तक्हन प्रष्नक कत्हन रुब के उत्तर दिया.
  466. 1:08:20–1:08:29आख आपन समप्रदायक अनुसार, एक ता ज्यान मुष्किलेस दूई वा तींख्षन तिकेत अची नष्थ होई बास पहीने.
  467. 1:08:29–1:08:41जव उ एतेक खषनक अची तव उ एतेक काल कोना टिकात अची जे उ अपन वस्तुके प्रकत से हो करया मनक पाषु मुडिक देख भास स्वयं पकडल से हो जाए.
  468. 1:08:41–1:08:54अकि उक्षन भंगुर यान अपन दोसर कषन में थीक उही वस्तुके पक्रत अची जे उ पहिल कषन में पकरने चल वा वस्तु उही कषन में पहिन ही सब भदली गेल अची
  469. 1:08:54–1:09:24एक ही वस्तु दूनूक शनक पार बनग रहेत, एह सव अजन्भी कि चो आवशक नहीं अची, केवल इमानी लेबजे कोनो ज्यान एक भेर उपन भेने, भिनू विरोदा भासक तुनूक आज करे हे तु पर्याप्त काल टिकेत अची अपन वस्तुके प्रकत करव, आफेर, मनक
  470. 1:09:24–1:09:54अवालाक शन के अपन लुप्त होईवालाक जातत्व चाही उक्रा प्रमानित करे है तु, आवो ही जातत्व के अपन आर जातत्व उक्रा प्रमानित करे है तु, आवा के वल, एक स्तर उपर, यह अनंत अन्वस्ता फेर उपन कदेने ची जक्रास आवाप जातत्व के बचाव
  471. 1:09:54–1:10:24इच्वर आहाक विवर ने एही मेसं कि चुव नहीं अच्वर अच्वर अच्वर ने इही मेसं कि चुव नहीं अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच
  472. 1:10:24–1:10:30अगर वास्तविक उप्योगक सम्पूनता नहीं
  473. 1:10:30–1:10:34अगर वास्तविक उप्योगक सम्पूनता नहीं
  474. 1:10:34–1:10:40वहा उनका ग्यात कहेट्छी, एक्ता एहन शब्दक उप्योग सजे पुरनता है करत्रत्वसं बनल अच्छी?
  475. 1:10:41–1:10:50कि एक्ता शमान्यव्युपत्ती एक्ता शब्दक अर्ठक केवल समान्यमुल दैत अच्छी, वोकर वास्तविक उप्योगक सम्पुरनता नही.
  476. 1:10:50–1:11:00अम अग्ता इंद्री शक्ति के जान सादन, कहेट ची की अग्तान, उग्यान उपन करभामे कारनिक रूट सनलगन अची.
  477. 1:11:00–1:11:10अम अच्वर के अग्ता भिन्न, समान रूट सवैध कारन सक्यात खहेट ची, जान के वल हुंकामे निवास करएट अची,
  478. 1:11:10–1:11:17जे उ छठि उकर एक ता स्थाई विषेष्ता रूप में कोनो वस्तु दवारा उपन भेने बिनु
  479. 1:11:18–1:11:28एक ता व्यक्ति जाता भह सकैत अची बिनु एहीक शन् कोनो वस्तुप करता वेने जानब करभाक आवश्वकता नही राख्यत अची
  480. 1:11:28–1:11:39नहम्रा इदावा कर्बाके चाहीजे हुनक जान प्रत्यक्ष, अनुमान, शाभ्द, अ बाकिक बगल में किचु पाचम, अनाविष्क्रत जान साद्धन थेड.
  481. 1:11:39–1:12:09प्रक्तिक्ष्के व्यापक करू के वल एक्ता वस्तुक सीधा, अबादित जाग्रुक्ता भुज़्ावःे हे तुग विषेश रूप्स आंद्रे समपर कद्वारा प्रक्तिक्ष्च नही आ इश्वरक जानप स्वाभाविक रूप्स औही व्यापक अर्ठक अंतर्गत आभ
  482. 1:12:09–1:12:12विर हम एही पुष्पबुछ्छ्खे चोडी देब.
  483. 1:12:12–1:12:17जए इश्वर सरवग्य चत्फी, उनका हर मिथ्या विष्वास जयात अची,
  484. 1:12:17–1:12:20जे कोनो प्रानी कही औराखने अची, फर भ्हम,
  485. 1:12:20–1:12:24रर गलत अनुमान, रर स्वपनर.
  486. 1:12:24–1:12:31मुदा तक्हन हम्रा सबख् त्रूतिक विषेवस्तृ से हो, कि चू अर्थ में, उनक अपन जान में उपस्थित अची.
  487. 1:12:31–1:12:37कि हूनक जान के सवयन् त्रूतिस भरल नहीं बन बैत अची?
  488. 1:12:37–1:12:46आजज़नक ज्यान पहिन ही सा हमरा सबवोल राखने अची, तन हमरा सबवोल मेटेबा में हुनक शिक्षाक की उप्योग.
  489. 1:12:46–1:13:01एही सम्पून अंक्मे पहल्मुस्कानक संकेत, आहा प्रूतिके प्रूतिक ज्यान संब्रमत कदेलूप मित्र आए ब्रम थीक उ प्रकारक गल्ती फिक जे इश्वरक ज्यान, हमर सबखक विप्रीत कहीो नहीं कराइत अची.
  490. 1:13:01–1:13:05एक्ता ब्रम मिथ्या फिक
  491. 1:13:05–1:13:21मुदा एक्ता सच्चा ज्यान जे एक्ता भ्रम के भ्रम रूप में पहचानेद अच्छी एह एक्ता मिठ्या ज्यान थिक सि स्वयम मिठ्या नही थिक यी छीक विप्री थिक मिठ्यत्वक विष्ष्मे स्पष्ट्ता, उही में सहभागिता नही.
  492. 1:13:21–1:13:51इश्वर हर प्रूतिके त्हीक, वो हन जानैत, चत्ही जेहन, वो वास्तव में अची, प्रूती रुक में आएक ता ज्यान जे प्रूतिके प्रूती रुक में सही देखहत अची से, ये पूष्पबूगुच्षक आरंभ में हम सभ जे परिभाशा तै केने रही, औहिसन सक्त
  493. 1:13:51–1:14:05अगन सत्यताक बगल में नहीं राख़, चदी उ हुँँका सब के भूल रूप में देखआट, चदी जे तीक उठिक जे हम सब अखन हुँ ही में फनसल, अपने हे तु अखन दھरी नहीं कषकैच्ची.
  494. 1:14:05–1:14:18एक्ता लंबा सास, फिर एक्ता छोट सिरन्मन, हम एही सबहामे चारी पूषपबुच् संशेयक भहन का अनल अची, उद्यन, आधा प्रतेक के भिनु अपन स्वर उठेने भेटल हु.
  495. 1:14:18–1:14:23हम अखन हो अपना के पूलन रूकस उतरित नहीं कहेट ची.
  496. 1:14:23–1:14:53अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अ�
  497. 1:14:53–1:15:04वो नो समापन प्रार्ठना मुल पाठ मे नहीं देल गेल अची बचल पन्ना सीदे इश्वरक त्रुटिज्यानक चर्चासं महान सकारात्मक प्रमान मे बड़ाट अची.
  498. 1:15:04–1:15:09सुत्रदार एकर बदला मोड चहनित कर अची.
  499. 1:15:09–1:15:16एही सबहाक पाचु अक्हन तीन पुष्पबुष्वष बजाव भेल इसंशेजे कोनो अदरिष कारन नही अची,
  500. 1:15:16–1:15:24इसंशेजे करमकान्द के इश्वरक आवश्षक्ता नही, इदावाजे इश्वर पुरनता खंदित भशकेट छत्फी आ,
  501. 1:15:24–1:15:33एही चतुर्त आँ सब सब छोट पूष्पगुछ में इप्रषनजे एतेक अचल सक्ता के जाता कहवाक अर्द की थेग.
  502. 1:15:33–1:15:38उनक विरुद उठाओल हर संचय के बहन्तल आम वोडल गेल अची.
  503. 1:15:38–1:15:51एक्ता काज बाकी अची, बाकी सबसम महान, केवल कि लाक रक्षा नही, अपितू उक्रा बनेब, आप प्रमान, अपन पयर पर ठाड, कोनो विरोदिक पहिजालक आववष्षकता बिनु.
  504. 1:15:51–1:15:57एह पाचम पुष्पगुछ थेख, आए ही समझ्पून उद्यानक शिक्धर.
  505. 1:15:57–1:16:08पर्दा दिरे संख अष्यत अची कोनो समापन संगीत नही, केवल एक ता ठहराव आगु आभई बलाग हे तुदीप अदेक उजज्वल कयल गे.
  506. 1:16:08–1:16:12अंक पन्चम पन्चम पुष्पगुछ्च्च्च्.
  507. 1:16:12–1:16:17इश्वरक अस्तित्वस �thepid करेवाला आत प्रमान.
  508. 1:16:17–1:16:19वादक शिक्धर
  509. 1:16:19–1:16:28उद्यन अखन के वल उतर नही दैत चत्छी, उब नबैट चत्छी, प्रमान प्रमान, प्रतेक अपन पईर पर ठार.
  510. 1:16:28–1:16:46नास्तिक, चार्वाक, मीमान्सक, सांक्या आचार्य, बोद्ध, आवएशेषिक सब-सबहा में उपस्तित चति, अब बारी-भारी विरोध नहीं करैत, अपितु एक्ता सबहा रूप में सूनैत चति, एक्ता मामला के जे अंते पूरन रूप्स बनल जारेहे लचि.
  511. 1:16:46–1:16:49द्रिश एक आतके रूप्रेका देप
  512. 1:16:50–1:16:53अन्तिम भेर पर्दा उठैत अची
  513. 1:16:54–1:16:56दीप स्थिर जरैत अची
  514. 1:16:56–1:16:59उद्यन सबहाक मद्यमे तार चती
  515. 1:16:59–1:17:04आए ही भेर आरमभेमे के उ हुनका भीच में नहीं तोकेट चती
  516. 1:17:04–1:17:18चारी पुष्पपगुच्, आहम अखन दहरी किचो नहीं केनेची सिवाई भूमी साव करबाक, संशयक उतर देद, आक्रमनक खन्दन करभ, एक्ता निरमाताक समभाबनाक रक्षा करभ.
  517. 1:17:18–1:17:22आईरा की हम रक्षा करभ बन्ग करएच्छी.
  518. 1:17:22–1:17:35आप्रमान आहाक सुजा ताध चति, प्रत्येग आपने आपने पर्याप्, कोनो विरोदिक पहिल्चालक आवश्व्ता बिनु अस्तिप्व में, जे सन्सार एक्ता कार्यतेक,
  519. 1:17:35–1:17:43जे परमानु मे प्रत्हम गती के एक्ता प्रेरक्के आवश्षक्ता अची, जे सन्सार धारित अची, जे उनस्त होएत अची,
  520. 1:17:43–1:17:49जे शब्दा शिल्पक स्वयं प्रत्हा के एक्ता प्रत्हम शिक्षकक आवश्ष्षक्ता च्ल,
  521. 1:17:49–1:17:54जे शास्त्रिय परम्पराक वेद्ता एक्ता विष्वस्निय स्रोथ मांगएत अच्छी,
  522. 1:17:54–1:17:58जे शास्त्र स्वया अपन रच्छताक साएक्षे दैत अच्छी,
  523. 1:17:58–1:18:01जे भिनु संख्या से हो, द्वित्वुख् त्रिथ्व,
  524. 1:18:01–1:18:07अहन वस्तुमेजे हम्रा सब मेशंके अगनी नहीं सकैत अची एकता.
  525. 1:18:07–1:18:12गन्निहार मनक छिनह बहन करैत अची.
  526. 1:18:12–1:18:19प्रतेख के उद्बे कध्हुर तास पर्खु, जद्बे आहा आई राती हमर बाकी हर बात के परखने ची.
  527. 1:18:19–1:18:25अम केवल इमांगे चीजे अहां हुनका एक एक क, अपनपन भूमिपर पर्खू.
  528. 1:18:27–1:18:28आरंभ करू तक्हन
  529. 1:18:29–1:18:34अम आई राती सहजतास्म नहीं मानलू आ अक्हन से हो शुरू नहीं करब.
  530. 1:18:36–1:18:36नीक
  531. 1:18:37–1:18:41यह थीक दंख थिक जक्रामे एकर अंथ होईबाके चाही
  532. 1:18:41–1:18:47द्रिश़ तो प्रत्हम प्रमान सन्सार एक्ता कारियत्ध
  533. 1:18:47–1:18:57प्रित्वी पर्वत जक्रामे हम सब भैसल्ची वो शरीर सबता उत्पन भेल अची थिक जेना एक्ता गेल उत्पन होएत अची
  534. 1:18:57–1:19:03अकोनो उत्पन वस्तू में उत्पाद कक कमी नहीं होएत अची
  535. 1:19:03–1:19:07तने सन्सारक एक्ता निर्माता अची
  536. 1:19:07–1:19:12तक्हन उ निर्माता के एक्ता शरीर होएबाके चाही
  537. 1:19:12–1:19:15जेना हर कुमार के होएद अची
  538. 1:19:15–1:19:17आजहुन का शरीर अची
  539. 1:19:17–1:19:20तंखो उ अश्रीरी इश्वर नहीं च्ध्रा
  540. 1:19:20–1:19:23आहाचारी पुष्पगुछ भरी बन बैत रहल हो
  541. 1:19:23–1:19:31उही आपत्तिके दबाव आ देखू ओ आहाक अपन हाथ सकोना फिसल जाएत अची.
  542. 1:19:31–1:19:36याता आहा दावा करएद चीजे इश्वर के शरीर अची,
  543. 1:19:36–1:19:41जक्रा मे आहा पहिन ही समानी चुकल चीजे ओ अस्तिप्वमे च्थी,
  544. 1:19:41–1:20:11अगर उनक आखार पर तीका तिप पनी करेथ ची, वा अहा दावा करेथ चीजे सनसार एकता शरीव दारी सक्ता दवारा नहीं बनल चल आवो हिसं अकेल निशकर्ष निकालेथ चीजे उ जिलकुले नहीं बनल चल, जे उही अनुमानक स्वयं विरोदा भास करेथ अची जकर अ
  545. 1:20:11–1:20:27अगिन दूआसा अनुमानित होईत अची चाहे कोन ईंधन जरल होएक, एक ता निर्माता एक ता बनल संसार सा अनुमानित होएत अची, चाहे उनिर्माता शरीर दारन करै थ हो थी वान ही.
  546. 1:20:27–1:20:39शरीर दारी कहीो हमर प्रमानक भार्वाहक भाग नहीं चल, आहा एक ता एहन शब्दक विरुद्द्दद, केलूजकर हमरा आवष्षकता नहीं चल.
  547. 1:20:39–1:20:44द्रिश तीं द्वितिय प्रमान परमानू मेगती
  548. 1:20:44–1:20:51पर्मानु के स्वयम विचारू तक्हन, वो कहीो सन्सार बन्नास पहिने
  549. 1:20:51–1:20:56स्रिष्तिक प्रध्हम क्षन में, वो पर्मानु जे कहीो पहिने नहीं हिलल चल,
  550. 1:20:56–1:20:58फिलै लागल, आजुडै लागल
  551. 1:20:58–1:21:05ज़्वस्तु स्वया नहीं हिली सकैत अची, कुदार स्वया माटी में नहीं जूलात अची.
  552. 1:21:05–1:21:09चेतन किचु वोक्रा प्रेरित करभाके चाही.
  553. 1:21:09–1:21:15शान्ततासव अकेल भाग्या उही प्रध्धम्गती के स्पष्ट के सकैत अची,
  554. 1:21:15–1:21:22अच्टन्ताक अदार अवष्ख अच्टिए उक्रा हिले बाक हे तु थिक जेना कुदार के अच्टा हाथ चाही
  555. 1:21:22–1:21:29अचार्यक खुनो एहन कारन नहीजे बाकी सबके भीर्संग बाहर कदैत अची
  556. 1:21:29–1:21:43एक्ता जर वस्तुके, थीक एही लेल ये उजर छेक, चेतंताक एक्ता अदार अवश्यक अची उक्रा हिले बाक हे तु, थीक जेना कुदार के एक्ता हाथ चाही
  557. 1:21:43–1:22:13आचाहुतन जीवित शरीरक विषिष्ट गतिके परमानुख प्रथम गति संग भिन्प्रकार कही सकैट ची, मुदा शारिरिग गति कोनो दंगसं परिभाशित करू, आहा पाएप जे उ परिभाशा पहिनही सत्फीख वो मानी लैत अची जकर हम तर्क करे है लची, एक ता चे
  558. 1:22:13–1:22:43तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ �
  559. 1:22:43–1:23:03अजकन एह सन्सार बाद में नष्त होगत अची सबस छोट अविभाज पर मानुविभ्मद्हरी नष्से हो एक ता करताक आवस्षकता राखआत अची जे उक्रा सक्षम होई, खिक जेना कप्रा केवल फारनिहार हाच्स नष्त होगत अची, शून्यसन नही.
  560. 1:23:03–1:23:10भागे फेर सदुनुके स्पष्ट कषकैत अची भिनु दारकक स्थिरता भिनु नाशकक विलैं
  561. 1:23:10–1:23:21भागे स्थ अची आहम एक रा कहीो अस्विकार नहीं केलूए, मुदा एक ता स्विक्रित कारन रर कारन के बाहर नहीं कदैत अची
  562. 1:23:21–1:23:40जए अके बाग्ये शरीरक दारन के सपष्ट करितै, तम प्रयास स्वयान एक ता जीवित प्रानी के ताध राख्भामे कोनो काज नहीं बचाइत जे सपष्टता मित्या अची, जे हन एही सभामे ताध हम्रा सभ्मेसं के अजम्रा बता सकैत अची.
  563. 1:23:40–1:23:58दारन आनाश प्रक्तेक, कार्य थेक, कार्य के कर्ताक आवश्षक्ता होएत अची, सन्सारक विशालता, उही निमस कोनो चुत नही थेक, जे हर चोट वस्तुके शासित करएत अची जक्रा हम सब कहीो उठैत आखशाथ देखने ची.
  564. 1:23:58–1:24:03द्रिश्पाज पाचम प्रमान प्रथम शब्द केक्रा सिक्हालनी
  565. 1:24:03–1:24:12पर मानुस अदिक निक्तक किचु विचारू उ स्वयं प्रत्हा जक्रास हम्रामिस्केो एक दोस्राके भुजहत अची
  566. 1:24:12–1:24:17एक्ता कुम्हारक शिल्प आन कुम्हारस सिक्हल जाएत अची,
  567. 1:24:17–1:24:46अवाई अग्टा प्रत्टम कडी पहुचव अग्टा प्रत्टम कुमार जकर सिखभाख हे तु कुनो कुमार नहीं चल, अग्टा प्रत्टम वकता जकर सिखभाख हे तु कुनो भाशा अखन हो नहीं भाजल गे चल.
  568. 1:24:46–1:24:54शायज श्रिंखला कोनो प्रत्ध्वादि अच्छिये नही, अनादि, थीक जेना पुनर जन्मक चक्र स्वया.
  569. 1:24:54–1:25:01स्रिष्तिया विल्यक चक्र अनादि अच्छि, भिख्षुक हम एक्रा विवाद नहीं करेच्छी.
  570. 1:25:01–1:25:12मुदा कोनो एक चक्रक भीतर, आपन नव भोर मे, कोनो पतित्वा सामानिय मनुष्य अखनो उपलड्द नहीं चत्थी, जे किचु शूरू कषक्ति.
  571. 1:25:12–1:25:16किचुो के प्रत्हम प्रत्हा गति में राखभा के चाही,
  572. 1:25:16–1:25:22अही प्रत्हम शिक्षक के स्थाई रूप स्वीर राखबाक आववष्ष्धा नहीं,
  573. 1:25:22–1:25:29शास्त्र स्वयं अग्ता एहन सत्ता के दर्स करईत अछीजे बेर्भे रूप दारन करईत च्वाएद वोगाईग.
  574. 1:25:29–1:25:35उहिसंपहिन ही जे दूनुप भीछ कोनो शब्द भाजल केल होए.
  575. 1:25:35–1:25:40उही प्रत्हम शिक्षक के स्ताए रूप स्चरी राखबाक आववष्खता नही,
  576. 1:25:40–1:25:47शास्त्र स्वयं एकता एहन सत्ताके दर्स करैत अची जे बेरभे रूप धारन करैत चत्फी,
  577. 1:25:47–1:25:53त्विख उही हे तु जे अन्यता हराएल होएत उक्रा पुनर जीवित करे हे तु
  578. 1:25:53–1:26:01द्रिष छे चधम आस आतम प्रमान एक ता विष्वस्निय परमपरा आशास्त्रक अपन वचन
  579. 1:26:01–1:26:07तकन हम्रा अपन भूमिपर अन्तिम भेर आहास भेद् करे दिय
  580. 1:26:07–1:26:15आख है त्छी वेदिक परमपराक वेद्ता स्वयाओकर पाषुक एक्ता स्रोट सिद्खरेत अची.
  581. 1:26:15–1:26:28मुदा वेद्ता, हमर सम्प्रदायक शिक्षानुसार, कोनो बाहे गारन्तीक आवश्षक्ता नहीराख्यत अची केवल एध्छिक जे एक्ता उचित रुपस उपनन जान पहिनहीस अची.
  582. 1:26:28–1:26:58आजज़ार ज्यानक वेध्धा के एक्टा आर ज्यान प्रमानित कर एह तु चाही, तन हम सब उही अन्वस्ताक सामना कर अब जेद वितिय पुष्पगुच्षसा हम्रा सबख पाचु लागल अच्छी, एक्टा अन्वस्ता जक्रा हम उते उत्तर देल हू आ अक्चन हू फेर
  583. 1:26:58–1:27:10उक्रा अपन्ज़ी मे एक्ता एहन सद्टाक आवष्ष्टा अची जे उक्रा सद्ट्यता पूर्वक उपन्च करे हे तु आवष्षक उपक्रिष्ट्ता राख है
  584. 1:27:10–1:27:17अशास्त्र के वल एहन स्रोद के संकेट नहीं करे है अची को उक्रा आन्दाईद अची
  585. 1:27:17–1:27:23पन्नादर पन्ना बिनु प्रशन्साग कोनो आवष्षक्ताग प्रेरित भेने,
  586. 1:27:23–1:27:28वेद स्वयन के एक्ता जाननिहार मुहस्निक्लात बत्बैत अची,
  587. 1:27:28–1:27:34ये वेद हम्रास्निक्लात अची, प्रत्टेक चकर में नव वाख्यक एहन् संग्रैजक्रा,
  588. 1:27:34–1:27:49अगर ग्यानी व्यक्ती स्विकार केने अची जेो कर अद्यान के लक, अपन अदिकार पर, आन किचो अपर तिकल नहीं कि उही सामाने मानवी रचनास भिन वस्तुत्थेख जकर रच्चिता केवल अनामित रही जाएट अची.
  589. 1:27:49–1:27:56एक्ता लंबा थदेराव आहा उस्सुत्र चारी पूष्पबुच भरी यहा द्हरी आनी पहुचोल हूँ.
  590. 1:27:56–1:28:03हम तरकक अक्रती पहचाने थ्छी, यद्यपी हम अखन हो अपन निशकर्ष नहीं रखने छी.
  591. 1:28:03–1:28:09इमान्दार अच्छी आई रातिक हे तु पर्याप्त अच्छी
  592. 1:28:09–1:28:16द्रिश सात एक्ता अंतराल, जखन शास्त्र आग्या दैत अच्छी, तंके आग्या दैत अच्छी
  593. 1:28:16–1:28:21एक्ता सुत्र आँख्छन हू नहीं किछने ची, उद्यन
  594. 1:28:21–1:28:25अद्मा जानल जाएप चाही एक्ता अग्या की खेख,
  595. 1:28:25–1:28:28जो केवल एक्ता क्रिया नहीं, वा एक्ता इच्छा,
  596. 1:28:28–1:28:34जे श्रोता में बिनु कोनो वक्ताक आवश्षक्ताक पहिन ही सवुपस्तित अच्छी?
  597. 1:28:34–1:28:37नहीं को काज करत.
  598. 1:28:37–1:28:40क्रिया नहीं की एक तन अद्मा के जानु,
  599. 1:28:40–1:29:01ख्या नहीं की एक तन आत्मा के जानू, कोनो एहन काजक आग्या नहीं दैत अछी जे अंतरिक्ष मेहिलैत अछी, आख्यों आग्या जे केवल ख्या में गथा देल जाए, से भाजार में चलैत विक्तिक वरनन करे वाला, हर सामाने वाख्यमे दही जाएत अछी.
  600. 1:29:01–1:29:17च्छा से हो नही कि एक तन काज कर बाक इच्चा स्वया उही आग्याक अर्ठके जान्नासः उपन होईत आच्छी आग्याक अर्ठके इच्छा बनाउ आए इच्चा स्वयान कारन अकार ये दुनु भजाएत आच्छी व्रित्ताकार आखाली.
  601. 1:29:17–1:29:32अग्ता आग्या वास्तव में जे भुज्भैत अची से अग्ता वक्ताक अविप्राय थिक जे श्रोता काज कराय आग्ता अविप्राय के अपन व्याकरन सर अविप्राय करताक आवस्षकता होईत अची.
  602. 1:29:32–1:29:41आा के इकर्भाके चाही अर्ठहीं थिक भिनु के उक जिनक इच्छा अहाक समबन्द में इव्यक्त करैत अची.
  603. 1:29:41–1:29:52शास्त्रक हर अदेश, इमान्दारी सोकर व्यकरन दھरी जान्चल, क्रियाप्दक पाछुट्फाड एक्ता वक्ता दिस इशारा करैत अची.
  604. 1:29:52–1:29:57द्रिश आत आतम प्रमान्ः परमानुके के गनेत अची
  605. 1:29:58–1:30:04आ अंतिम आत्मेसन सब्स विच्ट्र आ, हमर विचारें सब्स सुख्ष्म.
  606. 1:30:05–1:30:09अगता परमानु उल्ग्मक अगता निष्च्ट परमान होगत अची,
  607. 1:30:09–1:30:17एक तात्रय उहिसंग भहुत बेसी परिमान एतेख बेसीजे अकेल परमानुवा कार्स श्पष्ट नहीं होएत अची,
  608. 1:30:17–1:30:21की एक तनजकेवल परमानुख गुनन अक्रा स्पष्ट करिताय,
  609. 1:30:21–1:30:30तन्दुई पर मानु एक संपहिन ही सवेह मोड आकार देखभैत आ उस पष्तते नही देखभैत अची.
  610. 1:30:30–1:30:37खाली संच्यन समपरे किचु, एक ता गन्ना, एक ता गनब इहो एताए काज करएत होएप चाही,
  611. 1:30:37–1:30:45एहन्स्तर्पर्जक्रा एही सबहा में कोनो आखी कही अ सीदे अनुभव नहीं कषकत अची.
  612. 1:30:45–1:30:49दूप्वित्वु कोनो निष्क्रे गुन नहीं थेक जे युगम में पडल अची,
  613. 1:30:49–1:30:53उगन्नाक एक ताक रियास उपन अपन अपन अची.
  614. 1:30:53–1:31:00अपर्मानु अपन स्वभावेसध, हम्रामेस प्रतेख के अद्रिष्छत्ही.
  615. 1:31:00–1:31:11तक्हन के कर गन्ना, युगम के अकर द्विद्व्दैत अची, जकुनो सीमित प्रानी अपन जीवन में एक हु पर्मानु कही अ नहीं गन्ने अची.
  616. 1:31:11–1:31:20शान्त्ता सक् एक्ता लंभा मूनक्बाद, केवल एक्ता सर्वग्य गन्निहार
  617. 1:31:21–1:31:32आप्प्रमान्क मित्र कार्यरुक्मे सन्सार, पर मानुक प्रत्हम्गती, वोकर धारन, वोकर नाश, हम्रा सब जेजे शब्द बजैच्ची वोकर प्रत्हम्षिक्षा,
  618. 1:31:32–1:31:46एक्ता प्राछीन विश्वासक वैद्ता, शास्त्रक स्वयंक साख्ष्य अपन्स्रोतक, आअ अखन संक्या स्वयं, उही में उपस्तित जक्रा हम्रा में स्केो अकेल कही उगनी नहीं सकत.
  619. 1:31:46–1:32:04वम दावा नहीं करेट चीजे एहमेसं एकू, अके थाड, एक्ता द्यर्यवान विरोदी द्वारा, एक्ता आर पुरा साथ भरी खोत्राल नहीं जासकेत अची, अहा एक आईराती छीक देखा देलूजे, इसबहा कते एक द्यर्यवान भच्सकेत अची.
  620. 1:32:04–1:32:19अम केवल एह दावा कर आची जे आट स्वतन्त्र रेखा, एक ही निषकर्ष पर आट विन्न दिशास मिलआत, जक्रामिस एको के दूस्रासं उदार नही लेल गेल से आट सन्योग नही थिक.
  621. 1:32:19–1:32:37अंता एह थेक जे एक्ता पुष्पबुच्छ होईत अची, एक्ता अटूट फुल नही, अपितु बहुतो एक संब भतोरल तेज एक्ता पंखुरी से हो कुछल जाए, तईो पुष्पबुच्छ स्वया आहाक हाच में पूरन थाड रहे त अची.
  622. 1:32:37–1:32:41द्रिश्य नाँ प्रत्यक्ष जानब तर कसमपरे
  623. 1:32:41–1:32:55अकी सच्मुच रुणका जानबाक कोनो आर मार्ग नहीं अछ्छितर कष्रिंक्लास भाहर, उद्यन्द आप्प्रमान प्रत्यक्के एहन अछ्टा सबहा, एहन अछ्टा साथ चाही उक्रापार करे हे तु.
  624. 1:32:55–1:33:02अब अदिक कोमल वाद प्रत्यक्षत्य समाप्त होएत, तर्क अकेल द्वार नहीतेक.
  625. 1:33:02–1:33:32योगी हुनक प्रक्तिक्ष आन्तरे ज्यानक रिपोर्ट करेट चति, त्यिक जेना ककन हु एक ता स्वपन मनके एहन वस्तू देख बैत अची जक्रा कोनो भाहे अंद्रिय नही आपुर्ति के ने चल, हर स्वपन के वल स्म्रितिक पुन्राव्रित्ती नही थेक, किचु सच्�
  626. 1:33:32–1:34:02वो आप वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो
  627. 1:34:02–1:34:10उद्यन एही नातक में अन्तिन भेर, सबहाक शीर्षप्रक अद्रिष्प्रतिमा दिस मुराएक्षत्थी.
  628. 1:34:10–1:34:20सम्पूल्न परिषद, आक्षेपक, मीमान्सक, चार्वाक, सांख्य, बोध्ध, वैशेषिट, नास्तेक, वूनका चारुकात, शांथ भजायत अची.
  629. 1:34:20–1:34:34जे हो आत प्रमान, इमान्दारिस अर्पित, इमान्दारिस पर्कल, कोनो मन्के नहीं हिलासकः ता उमन पातर्थिक, आतर्कक, कोनो पुष्पगुछ पातर्के नहीं नर्मासकत.
  630. 1:34:34–1:34:39तै हम एते विजक हेतु प्रार्ठना नहीं करैट्खी
  631. 1:34:39–1:34:59वम बरु प्रार्ठना करएच्छी, इटरकक पूशपबुच् दूनो नाखस समान रुपस सुगन्दित होई इवोही आस्तिक के संथुष्ट करएजे पहिनही सविष्वास का आयल चल, आ, अपन समय में, उही आस्तिक तक से हो पहुचट इजे एक्रा तोडई आयल चल.
  632. 1:34:59–1:35:29आजजे ये एक बो नहीं कषकः, तः ये वल एक ता वेंत रूप मे बाकी रे है, सक्तितास बतोरल, ताजा राख्ध, बिनू कोनो अपेख्षाक शिक्षक सबख्प्रबूक चरन मे राख्ध, जे अकेल जनैत, चति जे अई राती एक्रा सुने वाला मन अपन गर जल्दि प
  633. 1:35:29–1:35:32अद्बडिक परिषद उठ़द अची
  634. 1:35:32–1:35:36नास्तिक सबसा अंत में ताड हो इद्छत्छी
  635. 1:35:36–1:35:39रंगमन्चक परदा क्रिषनरक्त आसुनहर
  636. 1:35:39–1:35:42ये परदाजे प्रत्ठम पुष्पगुच्छ पर उठल चल
  637. 1:35:42–1:35:48अपन अंतिम दीरे अवतरन दीप जरल सबापर आरंभ कर अची
  638. 1:35:48–1:35:57शान्त्तासत जखन पर्दाख हसैत अची, पाज पुष्पपगुच, आज प्रमान आ एक ता दीप जे समपून साच नहीं जाए.
  639. 1:35:57–1:36:01वाद एतर समाप्त होगत अची
  640. 1:36:01–1:36:12की इनिप्तल समात होईत अची से, जेना एही सबहामे सदा होईत अची, उही विक्तिपर चोडल जाएत अची, जे एक रादवार सं बाहर लाजाएत अची.
  641. 1:36:12–1:36:16अंक पन्चम समात, नाटक समात

Plain text

न्याय कु सुमाअजली तरकक पूष्पबूच, नाटकक पात्रे आई रातिक सबहा सुत्रदार, उद्यनाचार्य, आक्षेपक, पूर्वपकषी, सांख्या आचार्य, चार्वाक, भोध्द, परिषद अंक प्रत्हम, प्रत्हम पूष्पबूच संसारक कारन समबन्दी तरक, एही अंक्मे नवस्वर सम्मिलित नहीं होएत अची. द्रिश एक आवाहन, मंज दीपजरल सबहापर पर्दा उठैत अची. उद्यन्तार्च्छति एक्ता अद्रिष्प्रतिमा दिस हात्जोड़च्छति, आपहिने सबहाके नही अपितु एक्ता बहंट्रुक्मे बजच्छति. संकेत पड़ट्, तर कसंपहिने एक्ता बहंट्. एही शब्द के दूई अर्थ में एक ही संग भूजु जेना के यो फूलग कता कर अची आ, एक ही सांस में सिद्दान तक से हो. आवाहन रूक मे आदामन्त्रोच्चारन मे इपुष्पपगुच् सक्तितास बतोरल, ताजा राखल, हात कत्हुरतास दभेल हुतयो कहीो मुरुज्याल नही प्रभूक दूनु चरन मे राखल जाए, आहमर मन, उही बहंट मे एहन आनन्द जाने जकर पाचु कोनो शोक नही � ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अपनिषवद क अनुयाई हूंका शुदज्द चैतने कहेट चत्फी कपिलक अनुयाई हूंका नित्य अचेतन कहेट चत्फी मुदा निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता निर्माता उपनिशद क अनुयाई हुनका शुद चटने कहेट चथी कपिलक अनुयाई हुनका नित्या आचेतन कहेट चथी मुदा निरमाता नहीं पतनजलिक योगी हुनका कलेश सन अस्प्रिष्त आत्मा कहेट चथी जे केवल शिक्षा दिबाक हे तु शरीर धारन कर अच्छति पाशुपत हुनका उही निमूस से हो मुक्त कहेट च्छति जे हम्रा सबके बान हैत अच्छि शैव हुनका शिव कहेट च्छति वैशनव, विषनु, पुरानकार, सबख पितामः ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अग्ता शब्द से हो प्रमान खेक, मित्र, हमर भिन्दू खाड अची, एही सब हामे सब के पहिनही सब एह सहमती अची जे, इश्वर सकिचु अभिप्रेत अची, आप उनता अस्वमती अची जे की. इमानक आदार नहीं खेक, अदार नहीं थेख ये हो अदार थेख जे अनवेशन मांगैत अची हम शास्त्रस पर्यात सुनी चुकल ची अखन तरकक समय अची वेद स्वयं कहेत अची पहीने सुनु फेर मनन करू अव्रिद्दजन जोड़ाय्च्छति, श्रवन्स, तर्कसन, द्यानक्षान्त अभ्यास्सन, एक्ता अत्मा अंत्तह अपना के सत्यरूक में देख्भामे सक्षम होईत अची. तने मनन आरम्ध होईत अची. द्रिष्य तीन पाज्सन्शयक नाम करन. वम्रा प्रमानिक होईप चाही उही सबख विष्य मेजे हमर विरुद थार अची एक ता से हो प्रमान देबासं पहीने. पाच सन्चय आहम एही पुष्पबुच बहरी एक एक कवूथाएप. अंगुरी पर गनेथ एक अगिला जगत में हमर भाग्यत पाचु कोनो अगरिष्य, अलोकिख कारन अची ए नहीं. तुई एहन कारन भिनु से हो, केवल मानविय पुरुषार्त कर्मकान्द आ अकर फलके भुज्यबाक हे तु पर्याप्त अची. 3. सकारात्मक प्रमान अची जे इश्वर अस्तित्व में नहीं अची 4. भले इश्वरक कोनो प्रमान देल जाए, उप्रमाने अंता अमाने सिध होए 5. इश्वरक कोनो प्रमाने अची नहीं मानेवा अमाने 9. मीक स्पष्ट कहू यह उचित वाद थिख तं पहल के लिये द्रिश चार कोनो अद्रिष कारन नहीं कविरुद देखुक लोक कते क विन्न-विन्न धंगसा आच्ण करेत अची एक ही परिस्तिति में दू व्यक्ती विप्रीत मार्क चुनेत चति केो कर्मकान्दिस, केो भोग्दिस, केो त्याग्दिस उही प्रव्रित्तिक भेदक कारन अची, आव उही कारनक श्रिंखलाक कोनो प्रत्हम कडी नहीं देखा सकैट ची. आजे किचु मनुश्य बतोराथ अची, से अपने व्यक्ति में बतोराथ अची आन के अमे नहीं. तने किच्छु अद्रिष्य वस्तुके एही जीवनक कर्म के उहिसम परे प्राआप्त फल्सन जोर बाक चाही. इस अनसार, हर प्रकारक दूख्स भरल्जे अस्मान रूक्स बंतल अच्छी अकारन नहीं भह सकैत अच्छी. अखारन वस्तुयातन सदार हैत अची वाखहीो नही उनत कत्हु उपन्न होएत अची, नकत्हु समापत दिनु कोनो कार्यक्रमक. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ सकी तात पर्यराख्यच्छी आहम आहाके देखा देप जेई चारी में सएक के दहीजाएत अची कोनो कारने नहीं स्वत्ध हुप्टी, शून्यसं उप्टी वा केवल वस्तुक अपन स्वभाव संबन्दी अच्ता तत्ये चारू में सके यो बाकी नहीं रहीत अची और खार्यजे बनेत अची यो कर एक तास पष्ट पहिलुक सीमा होएत अची उक्षन जक्रास पहिने नहीं चल आए एक तास पष्ट भादुक सीमा उक्षन जक्र भाद औची अची नहीं रहीत वो ही सीमा के वो ही कषन पर, किच्वो चहनित नहीं करायत अची, केवल वो ही समय क्रियाशी लेएक्ता कारनके चोडी. वूदा मानिलिया उक्षन स्वयं कोनो आर स्पष्टि करनक आवश्षकता नहीर अख्छी, एक्टा वस्तू में केवल इगुन अची जेो एही दिन अस्तिट्वमे आबई, आन दिन नही, खिक जेना अखाश में केवल इगुन अची जेो नित्याची. सबख्ख्द्वारा साजा एक्ता गुन किचुो नहीं भूज्भैत अचीजे की वस्थू एही दिन. जजगन कही यो अस्तित्वमे आभई केवल हर वस्तूक नगन स्वभाव होईत, कोनो कारन बिनो तकन एह प्रष्न तकने की एक, पहिने की एक नहीं फेर-फेर लोटत, अनन्ततह, कोनो उतर नहीं दै. नहीं उत्पती के एक ता उत्पाद कक आवश्षकता होईत अची. सन्यों कोनो उत्प्तर नहीं थेक, औवेश दहने प्रश्न मात्र थेक. द्रिष छेट सामान्य आविषेष कारन पर तक्हन बताओ एक ही प्रकारक कारन् जेना अगिन एक भिन नभिन सादन्सं की एक उपन होईत अछी सुकल दास दिसने काथ मतने लिनसद्वारा सूर्यक प्रकाष संग्रहित करने जखारन कार्यके कठोरतास निर्दारित करैत अची, तै एक्ता कार्यक तीन भिन नभिन उप्पक्तिस कोना अबैत अची. की एक्तं कारन शक्ती प्रत्यक भिन प्रसंग में देखाल गेल सहसं जानलजाएत अची, सब प्रसंग हे तु एक भेर भोषित नही. जिसनाय, मतनाय, केंद्रित करनाय, तीन भिन कारन स्मुज प्रत्तेक स्वतन्त्र रूप्स अपन्पन्शर्त में अगिन उपन्प्रण करे बला सत्यापित. उही विविद्ता में किछो निम के हानी नहीं पहुच भैत अची जे एक्ता कारिय के एक्ता पर्याप्त कारनक आवष्षक्ता होएत अची यी केवल देख्वैत अची जे पर्याप्त कारन, एक सब एसी दंगसं साकार भह सकात अची. निम बाकी रहेत अची, केवल आहाएक चित्र बहुत संकी रिष्छल. सैमतिक काना फूसी दिश्य सात, सन्सारक विविद्धाक कारन रुक में अद्रिष्ट इस सभ मानी लिय, की एक अद्रिष्य पून्या अपाप अद्रिष्ट ये रहाए कारन होईप चाही कि एक नसीदे कहल जाए, सामानिय, द्रिष सहायक कारन, एक दोस्रास जुडल, हम्रा सबख्डेकھल विविद्ताके स्पष्ट कदात अची? कि एक तन्ज केवल द्रिष्य कारनक शिंखला सब किचुस पष्ट कदैत, तकहन के यो भिनु प्रतिपलक एकु कर्मकान्द कर्बाक कष्ट नहीं उठाभैत तए यो लोक करैत अची, एताए किचु अ आशा नहीं रक्यत, केवल पर लोक में. पूचु कि ये को लोक आडल रहेत आची, सुखख हे तू नही अविश्वासी सुख अदेक प्रत्यक्षतासं कोजाइत आची आ कर्मकान्द चोडी दैत आची. केवल प्रतिष्थाख हे तु नही, ये हके वो नही देखाए बला निजी भक्ती सब पष्ट नही करए. एही हेतु नहीज व्रिद्दजन यूवाके ठھकलनी की एक तं व्रिद्दजन स्वयं वो आचन राख़ चत्छती, आ एक ता ठकनिहार सामानियता है पहीने अपनाके नहीं ठकगै. कोनो चत्टृर संस्तापक अपन लावख हेतु सभ्था गडने. तक्हन उ अकेल दनी आमुक्त भेल होद थी, किछो नही दैत तःयो पेटरन थीक विप्रीत दिशामे चलात अची सच्चा भक्तजन जे किछु राखआ च्छती, से दान कदैत च्छती. कोनो पूरन विवरन अद्रिष्ष्पल भिनो जाच्मे बची नही सकैत अची. किछो अद्रिष्ट, किछो अद्रिष्ट, के उही वास्तविक कारन्, रूप में स्विकार करभाके चाही जे एही कर्म के उही फल्सन् जोडअत अची. द्रिष्ट 8 स्वतन्त्र यतार्थ्ता रूप में सामर्त्या अबहावक कारे कारनत्म. सुत्रदार कھन्द्शीषक पड़द च्छति उद्यन आ अक्षेपक एक ता लंभा तकनी की अंश्पर काज करगट च्छति एताए वोकर मुल तत्वमे संख्षिप्त काएलगे तव्यो की इसामर्त्यर जकर आहा कता करेथ ची, कोनो अलक यतारत्ता हो एप चाही, उही द्रिष्द्रव्यसं अलक जे कार्ये करेथ अची, की केवल कोनो बादाख अबहाव कार्ये कार्यन काज नहीक सकेथ अची, आर किचो आवष्षकता बिनो. अबहाव कोनो बादा हता सकैत अची, उ अपन ही सकोनो सकारात्मक कार्य उत्पनन नहीक सकैत अची. इंतास गर बने बाख हे तु केवल राज्मिस्त्रीक आलस्यक अबहाव नही, अपितु राज्मिस्त्रीक हाथ से हो चाही. कर्मकान्द, तहीना, केवल मार्ग साफ नहीं करायत अची, उ किचु स्थापित करायत अची, करताक भीतर एक्ता अवशिष्ट सामर्ठ्य, जे बाद फल में पाकायत अची. उ अव्शिश सक्ठेक, यद्यपी अद्रिष्यक, वो कर सक्टा अनुमानित अची, थिक जेना हम दूवासध अगिनक अनुमान कर अची, वो कर एक्ता कारिक संग अवष्यक संबंद्ध्सन जकर आर कोनो पर्याप्त स्पष्टिकरन नही अची. अदिक तीवर्तासच ये उही तरकक शली ठिक जे, समएकर में हम्रा सब के पूरनत है इश्वर दहरी पहुचाओत कारिसच उही कारन दिस एक ता अनमान जक्रा कारिय आवश्षक बनबैत अची, कि चो रहे समय नही, केवल दावा काएल नही. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अदर्स्म् मुदाद्रिद्तास्व, एक्ता सुन्दर्विवस्त्धा, आचार्यव आहम एक्रा बहुत किच्छु मानिले, मुदा विचारू प्रक्रिति, जेना आहा वोकर वरनन करैत ची, पुरुषक मुक्ते के तू. अदर स्म्मुदाद्रिद्तास, अग्ता सुन्दर्विवस्ता, आचार्या आहम अग्रा बहुत किचु मानी ले. मुदा विचारू प्रक्रति, जेना आहा वरनन करेट ची, एक थिक, जर में अभेद, सदा एक ही सार्बुद स्वभाव सकाज करेद. एक ता एकल समान कारन, अपन ही चोडल, अपन ही सएकक बाद एक उत्पन होई वाला क्रम्स पष्ट नहीक सकैत अची प्रतेक अपन भारी क्प्रतिख्षामे. जव उ क्रमश्य उपन्कर आट चथी, तक्हन उही क्रमक्क्रम के किचु भुज्यबाक चाही, आउ किचु खीक उही प्रकारक अद्रिष्य, विषिष्टिकरन करे वाला कारन थेक जकर हम तर्ख करे है ल्ची. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ ौ अगा एक्रा अदत कहलहू मुदा अदत के से हो एक ता प्रत्हम कारनक आवर्षकता आची आजेजे भिवरन आधा देलू क सुख प्रत्हा, चल, संस्ताप कक चतुराई, सब दहीजाएत अची जकन ओकर परीच्षा होएत अची, अगिन दरी चलबा मे उप्यों करईट्छी यद्यपी आहा कहीो दूनु के सद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी यद्वाँच्छी य अद्यन आख पूरा तर को ही वस्सुपर तिकल अच्छन भंवादक सिद्धान्त बूद्द आगु अबैट च्छति उद्यन, आहां क्पूरा तरको ही वस्तूपर तिकल अची जे बनल रहेत अची, एक ता करता जे आए अनुष्ठान करेत अची आखाली पल पबैध अची, एक ता आत्मा जे पल प्राप्त करे रहेत। बनल रहेत अची. मुदा किछो बनल नहीं रहेत अची. अगी खषन में उपन आन नष्थ होएद अखी जाही में अप्रकत होएद अखी, जक्रा आहा एक ही व्यकती काल ही कहेद छी, से केवल अख्ता कारन श्रिंखला थेख. प्रतेख चन नव. तकन बताओ अपने सिद्धान्त पर के काटायत अची जे अग्ताख्षन दवारा भाँल गे चल जे कतबाक समय अस्तित्व में नहीं रहायत अची. जकि चो अपन उपतिस अ एक शन भेसी से हो नहीं तिकात अची तकन करमक करता अ फलक भोकता. अहाग आपन विवरने दूविन्न, असमबद्ख्षनिक सत्तातिक, आनेटिक उत्तर्दाएत्व स्वया विलीन भजाएत अची. इसे हो विचारुजे सामाने पहिचान कोना काज कर अची, हम आई एक ता ग्याल देखछची आ उक्रा एक ही ग्याल जानेट ची जक्रा हम काल ही देखने रही, प�रना के मिलेत एक ता नव ग्याल नहीं. जब पहिचानक इ अनुभूती सदाभ्रम होएत, तकन दूएक शनक भीच भेद कोनो अनुभूती से हो विश्वस्निय नहीं रही सकैत, कि एक तन दूनु समएक पार तुलना करे वाला एक हीक शमता पर तिकल अची. सातत्यके ज़िट्हनीस अस्विकार करू आहा औहा म्रा विरुद्द अखने उठाओल संचय पर से हो विश्वास नहीं कस अकैट्छी की एक तन संचय उठाभाए हे तु से हो जरूरी अच्छी जे एक शन पहिने संचय के लक आजे अखन बजैत अच्छी से एकी निरन्तर अ अद्दावलिस भेसी सार में नस्दिक भा सकैत ची मुदा किचु बनल रहेत अची यहिपर इपुष्पबुच्ष पीचु नहीं हद्टी सकैत अची द्रिष्च भाँप्च्टी बनल रहेत अची यहिप्ट्ट्बवच्टी बनल रहेत अची वड़िष बेसी सार में नस्दिख भज़ सकेट छी, मुदा किचु बनल रहेत अची, यहि पर यी पुष्पपगुछ पीचु नहीं हटी सकेट अची. द्रिष बारह सातत्या कार्य कार्य कारनत्वक सामन्जस्य, नित्या आत्मापर आपती फेर सव अखन अदेक साव्दान तखन सातत्य मानिले तव्योग जकोनो वस्तुक स्वयन स्वबहाव कारन होएव अची, तखन की उक्रा सदा सर्वत्र अस्तित्वक्षन में अपन कार्या नहीं करबाके चाही, थीक जेना नील सदा नील अची. तव्यो एक्ता नित्य, सर्व व्यापी आत्माके, रख्षन सुक आदुहक उत्पन् करेत नहीं देखल जाएत अची. तख्शन कार्ये कार्नत्वा नित्य आत्मा कोना सामन्जस्य में आभी सकेत अची. कि एक तं कार्यकारनत्व कोनो वस्तु स्वत्व आपन्क्शम्ता मेरे है, बलाहर कार्य सदा उपन्चर आच्छी नहीं थेक. इकारनक कार्यक सापेख्ष अबाद्ध पूर्ववर्तितातेक, ककन्हु सह्चार आभेद देखिक निष्चित काईईजाईत अच्छी, आजताई अस्फल होएट अच्छी, जेना कोनो निट्या सर्वत्र उपस्थित वस्टुक संद, जे कतू अनुपस्थित नहीभ रह्स � अपन उचित सहायक सर्टक संग उपन करेत अचिक मन शरीः, उही अद्रिश सामर्थ्यक पाकभ जकर कता हम पहिन ही केने चल हूँ. रह नील वस्तू से हो रह नील वस्तुग कार्य सदा उपन नहीं करेत अचिक, अपन विषिष्ट कार्ये उपन करायत अची यह थेक जे कार्ये कारनत्वक अर्थ्थेक, एक भेर साव्दानीस कहला पर, आसामान्य अनुबव एक्रा हर मोर पर पूष्ट करायत अची समापन प्रार्थना द्रिश्य तेरहा प्रत्हम पूष्पबुच्षक समापन प्रार्ठना उद्यन्पेर्स अद्रिश्य प्रतिमा दिस्मुरेद्च्छत्फी, सबहा शान्त भजाएत अची परम प्रभुको गुप्त्षक्तिजे हर आत्माके उकर भाग्द दैत अच्फि उक्रा माया कहूँ, कि एक तं मन उक्रा पूनता है नहीं पक्री सकैत अच्फि उक्रा प्रक्रति कहूँ, वो उग्रा अविद्या कहु, कि एक तं केवल जाने वोग्रा विलीन कराएत अचीगो प्रभू, एहि स्रिष्टिक समपून अव्यवस्तित मन्तन्सम परे ठाड, वोग्रा शानती में विश्रामरत, हमर हिद्यमे भकती जगाप थी, आसाखषी बनी ठाड रहती, प्रत्यक्� अंक द्वितिय द्वितिय पुष्पबुच्च्छ प्रमानक स्वभाव वेदक नित्यता आ आई नव्स्रिष्टिक संबावना संबन्दितर्च एही अंक में शामिल होई वाला नव्स्वर, मी मान्सक, एक्ता वेदिक कर्मकान्द विद्वान, अग्यान भाहरी सहायता बिनु अपन सत्यताक प्रमान दैत अची द्रिष एक सरवग्य सक्ताक आवश्षक्ता अख्फन हुख्ये पर्दा फेर उठ्यत अग्यान बाहरी सहायता भिनु अपन सत्यताक प्रमान दैत अची द्रिश्य एक सर्वग्य सक्ताक आवश्षक्ता अखन हुकिएक पर्दा फेर उठेत अची वादक पचाती क्रम में उद्यन अथी तार चती जतायो चोरने चला हम सब प्रत्हम पुष्पगुछ भरी इस �thepid केने चीजे वम सब प्रत्हम पुष्पबुच् भरी इस थापित केने चीजे एक ता अदरिश्य भागय रर कर्मक फलके शासित करैत अची. मुदा भागयक स्वयं कोनो कारन होईबाके चाही, आध हम्रा सब में सक्यो उही कारन के प्रत्यक्ष नहीं जानी सक्यत अची. क्यो उही दिस उद्देश पूर्वक काज नहीं कराएत अची जे पुरनता ज्यान संपरे अची? तने कोनो असादारन, सर्वक ज्सक्ताक अस्तित्व होईबाके चाही, जे हम्रा सब के उही गुप्त कारनिक संबंदक सच्चा ज्यान दस सक्ती, ताकि हम सब सही धंगसं काज कसरकी आगु आबेत दीरे दीरे उद्यन की एक सर्व शक्तिमान इश्वर दिस पहुची जक्हन वैदिक परमपराक अनादी अखन शिंखला पहिनही सवु ज्यान हम्रा सब तक पहुच बैत अच्छी वा ज़ा आखर्त्रिक वेद पर अविष्वास करैथ फी, तन्कपिल मुनि आदी योग आ अनुशासन द्वारा अके सरवग्यता प्राप्त्त केने चला. दूरुमे सकेो के आख इश्वरक आवष्षकता नहीं. कि एक्तं प्रमानक वेद्ता अपनासं भाहर कारन्पर निरभर करायत अची आसन्सार कोनो विवरने अखन्द नहीं थे, उ आवदेक रूपसक पूरनता विलीन होएत अची, जखन अविलीन होएत अची, वेदक अखन्प्रसारन अखरे सन्विलीन भजायत अची, तो उग़ा ख़ा पर पर पर आखे खचु नविक्रित कर बाखे चाही ये उ सुत्र थेख जक्रा हम अखन पकड़ चाहे थ छी तिका सकेच्छि जिनक गुप्त सक्य तक पहुच्छ्के हम एही पुष्पबुच्छक समाप्तिस पहिन ही प्रत्यक्ष्पर्ख्य भलाच्छि रर विल्यक बाद परमपराके किचु नविक्रित करभाके चाहि ये उ सुत्र थिक जक्रा हम अखन पकड़ चाहेत छी द्रिश दो वेद्ता भीतर से जानलजाएत अछी वा बाहर से इश्वर दिस पहुछ भास पहीने, एक ता छोट प्रष्न पहीने निप्तालियर, जक्रापर हमर आअआक समप्रदाय बहुत काल सविवाद केने अची. जक्ञन कोनो थ्यान उपन होगत अची, तनकी उकर सत्यता स्वत हच, उकर उपत्ती मात्र में जानलजाएत अची. वम कहेथ खीह, किचो के ज्यान रूप में जाननाई स्वया उक्रा सत्यमानब् ठेक. जे बाद मिठ्या सिथ होएत अची से जाज्छ में, कहीो सच्चे ज्याने नहीच हल. तकन संषे एक व्याख्या करू, मी मान सक. जववेद्ता कोनो थ्यानक उपन नहोई तेखशन स्वया गोषित भजाएत, तकन कोनो थ्यान पर कहीो संषे नहीं भहसकेत, तयो हम सब सतक संषे करईच्छी, जकन कोनो थ्यान पहिने सपृत आन ज्यान सन नहीं मिलात अची. वेद्ता वेद्ताजका जान हुबाक नगन तत्यसन भाहर किचुस जानल जाएत अची एक्ता अगुचिन, एक्ता अगु अनुमान सफल्क्रिया में एक्ता परीच्षा. मुदा अहाक बाहरी परीच्षा स्वया अपन अन्वस्तादोषके आमन्त्रित करेट अची. जब पहिल के प्रमानित करई हे तु दोसर ज्यानक आवश्षक्ता आची, तन दोसर के प्रमानित करई हे तु तेस्राक आईना अन्ततद है. एहन नही की एक तन अदिकाश समय, वैध्ता प्रमानित करव बilkul अनावश्षक आची. जते नषन्शे अची नषन्शे अखकारन, उते वस्तृपर विष्वास उपन्न होईत अची आहम भिनु कोनो अलक प्रमानी करन करमक उही पर काज करएद ची. केवल जत्यटे संशे वास्तव में उपन होईत अची, उते आगु अनुमान अबैत अची, अव उते औरुकी जाइत अची, की एक तनजे अन्वस्ता अहाके देराबैत अची, से अहाक स्वत्यप्रामान्य सिद्धानत के उप्वे द्हम्काबैत अची जते कहम्रा. आँु के इमान्बाके चाही जे ज्यानक जानल जाएब, स्वया वेद्धा पूर्वक अनुमानित अची एक्रा सिद्ग करु आधा फेर सवनुमान करे है लची. रलकी मुस्कान एक्ता उचित प्रहार उही प्यासल मनुश्ष्य के विचारूजे पानी देखिते पीभी लैत अची. आखे है जे अ पानिक प्यास भुजे बाक शक्तिके प्रक्तिप्षत है जानैत अची, की एक ता ओब पिनु हिचकी चाहतक काज करै अची. उनही जानैत अची. उ शक्ति अनुमानत अची तुर्वंत आ अचे तन रूप सबीतल अनुभवस थीक जेना इच्छा स्वया एक तीवर मान अनुमानस जन्म लैत अची जे कोनो कार्य कोनो परिनाम दैत अची. तीवरता समानता नहीं थिक. जल्दि लेल जेल एक्ता बाहे परीच्षा तैयो बाहे रहेत अची द्रिष् 3 स्वपन जाग्रती आमुरक दूई हाथ फेर मंच्पर, तकन बताओ हम्रा सब में सकेो जाग्रती के स्वपन स्कोना अलक बैत अची अजगन आहा जागेछ छी, दूनू अवस्तातीछन, निर्विवाद विरोद में ठाड होएत अची, स्वपनक दून्धली स्म्रिती जाग्रतिक जीवन्त तद्कालतास विप्रीत. अविरोद अवास्तातीछन, निर्विवाद विरोद में ठाड होएत अची, अविरोदा भास स्वया माप्दन्तेक, वोक्रा कत्हु आर सा आयातित करबाक आवष्ख्ता नही, कि एक तन जागरित अनुभज़, अपन माप्दन्त स्वया दैत अछी, जक्रा विरोद्द्द स्वपन् मापल आन्यून पाओल जाएत अछी. पश्छिम्य तार्किक एक्ता तिछन संषे उठबैट चति अभी चलित अजन्चै करती, अग्ता नगन तारकिक समभावनाजे कहीो कोनो तत्यक विरुद प्रमान मिली सकैत अची, से अग्ता दार्षनिक मुर्ख फुनका कहेल जाएत अची, सबहाक सुजह अपन दूनुहात उठाक कहलनी यह अच्ता अच्त, यह दो सर्च तने बाहे � अही संश्यवाद के ओखर ज़दिद हरी दھकेलू आहा अविरोदनीम पर पहुची जाएभ, चाहुतं एक्रा तत्वहीं पून्रुक्ती कहू, मुदा संश्यवादी के से हो किच्वो के है हे तु अपन संश्यष समेद, एही पर ठाड हो एबाके चाही. अपन संशे समेट एही पर ठाड होई बाके चाही हम्रा हर समभावित भविश्यक विरुद अभेद्यनिष्चित्ता नहीं हम्रा ओदबे चाही जब एक ओनो युप्तिएक्ट अनवेशन के चाही प्रमानक संतुलन सत्यतास तोलल आव उजि सन्तुलन पर न्यायक वेध्ता संबंदी विवरन भाहे चहनस जानल सफलक रियास अन्तपुष्त अदिक भार राख़ेद अछी. ग्रम आप्रूटी अनुब्वक निर्विवाद तत्यत्तेग जजेना आहा मी मान्सक कहेछ छी, एर ज्यान औहिसच सत्यहोएत अची तक्हन द्रम आत्रूती की छे, आहाख हे तु कोनो उत्तर नही अची. द्रिशचार प्रमान जे द्वनी नित्या नही छे, एट्बे मानिलिय तक्हन आहाम्रा भूमी बडले दिया. आाक इश्वर भिनू से हो वेद के रच्टाक आवष्षक्ता नहीं वेद आजक्रास अद्वनी बनल अच्छी से केवल निट्यभ्वा सकैत अच्छी कोनो निर्दोश वक्तावा उद्तर्दाय रच्टाक आवष्ष्षक्ता भिनू. तक्हन इसे हो हम्रा अहास लेबाके चाही, मित्र, आहम एक्रा सामाने श्रवन्स करव. हम सब प्रतिदिन कहेट ची, ओद्वने रुकी गेल, द्होल पीटल गेल चल, आह अखन उशान्त अची. यह द्वनेक नाशक प्रत्यक्ष अनुबुती थिक. द्वनी केवल कत्फु आर नहीं जासकैत आची, आखार रहित होई बाक कारने, उद्धाकल नहीं जासकैत आची, की एक तन द्धाकब आखार युक्त वस्तुक द्र्म आची, उकेवल हम्रा हे तु अदिक शीन नहीं भेल आची, की एक तन ये बहानाई से हो सिद्ध कदेत, � अदरिश्यकन कन के अदरिश्यकन के अनुबष्यकन का एने जे ओकर अदार होगत. आस्वया द्वनिके सुनु स्वर उठयत अची गिरः अची, तेज होईत अची, म्रिदू होईत अची, एक ही नित्के वस्तु एक ही च्चन विरोदी गुन नहीं दारन कषकैत अची. जख्रा आगा एक ही शब्द फेर पहज्चानल कहे थ्छी से एक ता शिक्ठ पुना पहज्चानल फिक नव ओव ओव ओव जोती प्रतेखषन आदत्वष एक नामस बजाओल गे. उत्पत्ति आनाश नित्यतानही ये उत्फिक जे आहाक अपनकान आहाके बतभैत अची जँ आहा उही पर विष्वास करू. शान्त तासप परमपराके एहे पर विस्तार सक कत हुार आहाके उत्टर दिवाके चाही. देत अखन हे तु एद्भे पर्याथ अची जे द्वनी आव उक्रे संग, उच्चारित वेद उपन्न होएद अची आजे उपन्न होएद अची से खोईजा सकैत अची. विल्यक समय आख अपन विवरने किचो नहीं हिलः, किचो काज नहीं करः, अखाश स्वयंशुन्य आस्थिर ताद रहें अची. तक विल्यक समय आख अपन विवरने किचो नहीं हिलः, किचो काज नहीं करः, अखाश स्वयंशुन्य आस्थिर ताद रहें अची. तखन पूर्न स्थिर्तास नव्स्रिष्टी की आरंभ्ख कषकत अची? पहिने कहीर निद्रा के विचारू एक ही पहलीक चोट्रूक में स्वपनरहित निद्रा में आत्माग ज्यान, इच्छा, सुख, आदूवक सभ एक संव शांत भजाएत अची, तविज़ियो शरीरक साँस चलात रहेत रहेत आची, शीन, आ आत्मा फेर सवक्षक जागेत आची. तहीना स्रिष्टिक विल्यमे, चारी तत्वक कन मे एक ता अत्यंत सुख्शम गती बनड रहेत आची, एक सुख्श्म्जे सन्सार प्रुक्मे दर्स नहीं होएत आची, जाभे उकर अंतिम चरन उहीक शनके चहनित कराएत आची, आई नव्स्रिष्टिक भीज बनी जाएत आची. ये आवश्षक नहीं जे कोनो दिनक पहिने सदा एक ता और एहन दिन होई, वर्शारतुक पहिल्दिनक पहिने गरिष्मक अंतिन दिन होई आची, कोनो और वर्शाक दिन नहीं. तहीना नव स्रिष्टिक पहल दिनक पहीने विलै होएत अची, कोनो पुरान संसारक आर दिन नहीं. अप्रत्ठम मनुश्यः प्रत्ठम ब्राहमन, कोनो भाशाथ प्रत्ठम वकता. वगता के उ माता पिता हुनका भाजव नहीं सिखाओल, की एक तन सिखाभई बलाके उ अखन हुन नहीं चल तीक जेना प्रध्षु स़ल गो बरस उपन होएत अची, कोनो भिच्षु माता पितास नहीं आकेवल बादु पीदी सही प्रजन करैत अची, अवि इशारा मे शब्दा अरतक प्रत्हम प्रत्हा सिख बैत चति अवि प्रत्हम शिक्षास पूरन शिंखला कुमहार्स कुमहार् जुलाहास जुलाहा शिक्षकस शिष्य अखंड चलत अची जाभे अगिला वागिला वागिला वागिला वागिला वागिला अगरा फेर तोड़त अची द्रिष छेट दीर गरास, आशास्त्र की एक पुन्हस्तापंक आवश्षक्ता राखईद अची सबहा दिस मुरएत अदेक गमभीर आई मत सोचुजे शिंखला आई उत्वे मस्वुती सपकडल अची जते कही उचल इमान्दारिस देखु जे पहिनही सकी जरजर भा गेल अची जे अनुष्ठान कहीो हजारो वैदिक शाक्ठ, पूरन स्म्रितिस का एजाएच्छल से अखन, जब चल अची तं केवल एक ता शाक्ठस, अपूरन रुप मे राख्छल दर्म कहीो चारी पैर पर ठार चल तप ज्यान यग्यर दान. तप खसी गेल गुई पैर बाकी रहले. ज्यान खसी गेल एक पैर दान अखन पूरा भार दोएत अची आओजो पैर खायल अची. तखन सपष्ट कहो अहा की बनाभाई जा रहे लची. इजे शास्त्रस्वयन्सिद्ध नहीं थिक अकर अदिकार वेद पर निरभर अची, सद्गुनी लोकक सामान्य आचन पर नहीजे एक दोस्राके अनुसरन कर अची की एक तन्ज सद्गुनी आचन अके खोनो कर्म के अनिवार्य बने बाक हे तु पर्याप्त होएत, तंखोनो शास्त्रिय अदेशक आवष्षक्ता नही हो खब उख्रा उपन्न नहीं कषकेत अख्छी एक भेर मुइ कारन चली गेलापः. द्रिश सात कपिल पर्खल जाएत खथी आ अपर्यात पाओल जाएत खथी. तखन कपिल के ओग्याता होग़े दिव, प्रत्यक्ष अनुभवक रिषी, योगसन्शुध, दूहकी प्रानिक, हे तु करुनास्प्रेरित, शास्तरक, जे किचु हरायल अची उक्रा पुनर्जीविद करभामे सक्षम. तक्हन कपिल के उ ज्याता हो भै दिएक प्रत्यक्ष अनुभ्वक रशी योग संशुद्द, दूहकी प्रानिक हे तु करुना स्प्रेरित, शास्त्रक जे किचु हरायल अची उक्रा पुनर जीवित करभामे सक्षम. ौमल्तास मुदा बिनुजुकने, उदावा के उप्वे साव्दानीस पर्खुजतेक आहा रमर के पर्खल हू मित्र. द्यान वस्तृता उही कि चुके जान्बाक साद्धन भह सकैत अची जे अन्यतागुक्त अची, हम एक्रा पूनता अस्विकार नहीं करैच्छी, अगा द्यान उहिक्षन यान स्वत्ध नही दैत अची जक्ठन उ अभ्यास कय जाएत अची, ओख्रा जे भेटल अची, ओख्रा प्रमानत करे हे तु कोनो आर साद्धन क आवश्षकता अची. कपिलक करूना अहिन सापर द्यानके की प्रमानत करे अची, अज्ग़ प्रत्यक्षत है, एही जीवन मे वादुई जीवनक भीच मे नहीं भेट्लक अच्छी की एक तनजे शरीर एही जन्म मे काज कर अच्छी आजे शरीर अगिला जन्म मे फल्भ होगैट अच्छी से एक ही शरीर से हो नहीं खेक आदूनु कि अच्छी की अच्छी अ� अग्टा शिक्षक्जे त्योहारक राती सुती जाएद चाछी आभोर में काल हिक पात फेर सशूरू कराएद चाछी से केवल इसिद कराएद चाछी जे सम्रती एक जीवनक देवन कराएद चाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जाछी जा भीटर बाकी रहात अची दूई जीवनक भीचक खाई पार नहीं. अप्रत्फम ब्रहमन के विचारू, स्रिष्टिक भोर में कोंस मिरतिसचो अपन वन्शावली जानी सकैट चला, जक्यो अखन्हु समरन कर आय रहे तु जनमल नहीं चल. लोकक भीच यात्राक कोनो शक्ती से हो सिद्ध नहीं भेल अचीजे तयार जातिवेवस्ता भहन्क बसनिहार के आनी सकैत होग. अंतह, एक सर्वग्य, सर्वषक्तिमान सत्ताके स्विकार करव, जक्रा कोनो सरीज नहीं चाही, कोनो अप्रीच्षित स्म्रतीं नहीं, कोनो अप्रमानित यात्रा नहीं असिध्ध, आदा सर्वग्य रिषिक संख्या बड़ाक यह काज भेकार धंगसं करेभास अदिक सरल आय एक्रे दोसर चरनक अंत्मेवाद के एही दंगे ताड होईबाके चाही. द्रिश आत्ग्ध्वित्ये पुष्पबुच्षक समापन प्रार्ठना उद्यन्केर सवद्रिष्प्रतिमा दिस मुरएच्छत्फी वमर रिदाय शिव में जीवनक अंतिमखषन दھरी द्रेद रहें जे, रहर प्रानिक भागय संसाहाइता प्राथका की अद्बुत संसार भेर-भेर बन बैध छत्थी आँ, येक्ता जादूगर जकाजे अपन प्रिक स्वयम मेंगबैच्छत्छी, अगी प्रभुपर अकेल हमर भक्ती अटल रहें पर्दा दिरे-दिरे-खसेत अची मी मान्सक छिंतन में बैसल रही जाएत चती जखन दिप मन्ध होएत अची परिषत काना फुसी कर अची भूमी हिली गेल अची आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ दिए उज्कयल जाएत अची इपुष्पबुच्ष सबहास सर्वादिक विवादित थिक उद्यन्स पहिने आगु बडध, आहा दुई पुष्पबुच्ष सन्सारक निर्माता दिस बन बैक भिताओल उद्यन. हम इएक में नीम उखाडब. जए इश्वर अस्तित्वमे हुएत तन उ गे हुए बाके चाही, थीक जेना गायक सिंके उकर आकार आरंगसन जानल जाएत अची. उग्यात नहीं च्हती. तने उ नही च्छति, थिक जेना क्हर्हाक्सिं नही अच्छि, तिक एही लेल जे, यद्यपी वोकर अकार जे होए जब वो रही ते, तवियो के वो अग्ता नही देख्लक अच्छि. अच्छत्र्क आआ आपन पहिल पयर मिस वच्छता सबहुल. आख अनुमान के वल उतै काजकर आप अचीजत्य वस्तूके पहिनही सब प्रक्तिक्षक अचर मानल गेल चल, क्रहाक सिंग औही प्रक्तिक्षक परिक्षामे अस्फल होएत अचीजक्रा उक्रा सदाभैस भाक योगि मानल गेल चल. इश्वर के एही सबहा में कोनो आस्टिक दवारा कहीो सामाने प्रक्तिक्षक वस्तू दावा नहीं कहीलगे. आहा एक ता अदरिष्य वस्तू के उही परीच्षामे अस्फल होईबाक दोश नहीं दस खैच्ची जक्रामेो कहीो प्रविष्त नहीं भेल. तक्हनो कोना जानल जाएत च्छती, जा उही एक ही विधिसन नहीं जक्रास आहा अक्हन हुंका मुक्त करे है थी. अपन सब्स्मस्वुथ आपती पाच्मक लेगु जखन अनुमान स्वया आख सोजा थाड होए. अखन हे तु हम के वल भूमि साव करेट ची जे वस्तू कहीो अनुवूत होई बाक दावा नहीं का इल्गेल वोकर अनुवूती किच्वो सिद्ध नहीं करेट अची. द्रिष्ष दोप निद्रा अत्मा आजक्रा अनुवूती सपर्ष नहीं कषकेत अची. तक्हन आपन स्वयंक आत्माके एक्ता परीच्षा प्रक्रन रूप में बिचारू, स्वपनरहित निद्रामे आहा आपन आत्माके अनुबhut नहीं कराथ ची, तयो आहा जागित इनिषकर्ष नहीं निकालाथ ची, जे आहा अस्तिप्व में रहेप बंद कदेने रही. तक्हन येमान इश्वर पर लागुवेने उनक अनुपस्त्तिके समान रुखस की एक सिद्ध नहीं कराथ अची. की एक तन निद्रामे उकारन जे आत्म ज्यान उत्पन करिताई से एकत्रित नहीं होईत अची, अपितु एहि लेल्जे वूक्रा ध्यान देवाय बला उपकरन शान्त भगेल अची. जक्रापर आहा निरभर ची, जे के अ स्वपनर हित रातिक पार अपन निरन्तर अस्तिट्वपर संषै नहीं कराइत अची, अजी ये स्वयं प्रमान थेख जे अनुभूती अनस्तित्व नही भुज्बैत अची आहा अपने उदाहरन्स अपने पद्धती के खंदित कदेल हू संभलैत तकन इपर्खू एक ता चेतन सक्ता के शारिरिक क्रिया देखा बाके चाही अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना अपना � अख्श्थिर्ता में बिनु कोनो शारिरिक च्यनक अचल बनल रहेत अची भिन्कार्य भिन्प्रकारक कारन्स आबैत अची आख्चोनो निम हर निर्माता की एक ता द्रिष्या राथ स्भानहल नहीं राख्यत अची द्रिश तीं चार्वाकक शर्थ आउ की एक भुनाओल नहीजा सकैत अची चार्वाक आगु बडध च्फी पहिने सा अदिक देज एक्रा नास्टिक्स बेसी संकुछत करे दिया ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अगा अख अखि उनकास हदथ अची कि अगा एहिपर विष्वास करईच्छी चिडचिडाएत सम्रती हमरा आश्वस्त करईच्छे यो बाकी चति सम्रती अगा के बहुतो नश्त भेल वस्तुख से हो आश्वासन दैद अची की आहा एही पर विष्वास करईट ची? चिडच़ाएत स्म्रती हमरा आश्वस्ट करईट अची जे यो बाखी चती. स्म्रती आहा के बहुतो नश्त भेल वस्तुख से हो आश्वासन दैद अची, एक ता बच्पनक गर जे कहीो सद ही गेल अची, अगे स्म्रिति वर्त्मान अस्तित्वके प्रमानित नहीं कष अकैत अची जेख्षन अहा स्म्रिति पर जुकैत ची अपन परिवार के अपने निम्स बचाभाई हे तु आजा स्म्दिपर जुकेट्छी आपन परिवार के अपने निम्स बचाभई हे तु, आँँ थिक उत्वे मानी लेनेची जब आम्राचाही अनुभूती अनस्तित्व सिद्ध नहीं करेट अछी. आआखिके स्वयं विचारूब जकर देखभ आहा निरभर करईच्छी, उ आम्स्वयं कही उ देखल नहीं जाएत अची, तई उ आहा उकर अस्तित्वपर संषे नहीं करईच्छी. आख नियम इमान्दारीस अनुसरन का इलापर, अहाख अपन संशे उख़न के नष्ट कदैत अची समवान्य आचरन के निष्ट ताक अवष्षकता नहीं उस समवावना पर चलैत अची समवान्य सहमती उप्योक्सं परकल तकन समवावना कते रहेत अची अहाख विवरन में ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अनुमान के किषु भूमि दिय, तक्षन, ज़ आहा आग्रै कर अची. मुदा उहीपर संचय कोना अंता हतैत अची. हर देखल पैटरन काल ही तुटी सकैत अची, वा एक मील दूर, वा एहन शर्त में जक्रा हम सब जाचै नहीं सोचल हूँ. वा एक मील दूर, वा एहन शर्ट में जक्रा हम सब जाच़े नहीं सोचल हु. इदम की कही यो बन्द नहीं होएत अची. इो ही खषन बन्द भजाएत अची जक्शन आहार इदेखआत ची जे आहा पहिनही समानी चुकल ची, अग अग शम्ता थेख जे वर्त्मान समयस गन्ता दिन आरितु तक विस्तारित अनुमान थेग. अग अनुमान पर अक्रमन कर अग तु अनुमान के उप्योग नहीं कषकेट्छी बिनु उप्करन के उदार लेने जक्रा अहा अएोगे थ हरेबाक प्रयास कर अहल ची. अव्यावारिक रूप्स, संशे उते समाप्त होएत अचीजते अग्ता प्रतितत्य संशे करता के अपन ही विरोदा भास में फसादेत, कारन अकार्यक विष्वस्निय संबंद के अस्विकार करू, अशंशे करबाक क्रिया स्वया, जे स्वयान एक्ता कारियत्ख आहामे कहीो उपन्ने नहीभ रह सकैच्छल. एक्ता युक्तियुक्त मन हर कल्पनिय अप्वाद के अन्तताह नहीं कोजैत अची, उ एक्ता एहन हे तुक अनुसरन करईत अची जकर भ्याप्ती परकल गेल अची अटिकल अची अखाज करईत अची पीछो हताएत अनिष्चत मुदा भूमिस भाहर तकन अगु बड़ा हम बाकी के सुनब द्रिश पाज उप्मान, आ पाज्चम पुष्पगुछ्षक आगामी परीच्षा, स्तगित. एक्ता सुख्श्म वर्गी करन प्रियस्वर, एक्ता आर मार्ग, उद्यन, आगु बद्भास पहीने. किछु मानेद छतीजे उप्मान देखल समान तासग्यान अपन स्वतन्त्र प्रमान्सादन थेक, प्रक्तिक्ष आ अनुमान सभिन्न. जएहन होगी तक्चन आहाथ हे तु एक ता कतिनाई आबैत अपी, हर ज्यात वस्तु कोनो आर पहिनेग्यात वस्तु सम्मिलैत अछी, अपस्तिति सिद्खषकट अची केवल ज़ समान्ता कोनो तेसर प्रकारक सथ्ता होएत, नस्सत नवसत आएहन कोनो तेसर प्रकार अस्तित्वमे नहीं अची सत आअ असत सम्पून क्षेत्र के समाप कदैत अची, एक के अस्विकार करू, आऔहिसन दोस्रा के स्विकार कलेने ची. समान्ता केवल उही वस्तुक एक ता गुन्त्ठिक जे पहिनही सवची, उही दूई श्रेनी में सर एक में वर्गी क्रत ओक्रा कोनो स्वतन्त्र स्थेक आवश्षक्ता नही, आतने हो एक ता एहन सताक विरुद्ध कोनो स्वतन्त्र हत्यार नही दैत अची जे अपन स्वभावस अद्वितिया हो थी. अद्वितियता कोनो दोष नहीं थिक जक्रा तर्ख हत्यार बना सरकैत अची इ केवल एकता तत्ध्ध्धिक जे किचु विश्य राखआत च्धिया किचु नहीं. द्रिष छे शाब्द प्रमान आसर्वग्य रच्टाक विवाद वेर मच्पर तक्हन हम्रा अहाके शाब्द प्रमान पर दबाब देभई दिय, कि एक तैई समपुन पुष्पगुच अंतै एही प्रशन्पर लोटआत अचीजे वेद के कोनो रच्छिताक आवष्षकता अची की नही. वैशेशिक एक्ता सामानिय वाक्यक अर्थके वक्ताक अभी प्राएस अनुमानत किचु मानात अची, शाब्द प्रमान के एक्ता प्रकारक अनुमान में गटा देल्गे. अम्रे अपन सम्प्रदायक प्रभाखर शाखा आर आगुजाईत अची केवल वेद अकर्त्रिक होईबाक कारने स्वतन्त्र अदिकार राखआट अची एक ता सामान्यमान भीवाक केवल तकने विष्वस्नी अची जखन अनुमान वक्ताके विष्वस्नी प्रमानत कचुकल � वक्ताक विष्वस्नियताक कोनो पूर्व प्रमानिकरन नहीं गुज्बाक हे तु आवश्षक अची अग्ता बच्चाजे अख्शन हूनही जनैत अख्शिजे वेदक कोनो अख्चिता अख्शिकी नहीं, उहो एक्ता वैदिक वाख्यके पूरनता भूजी लैत अची सुन्तही एक भे देखभैत अची जे भूज़प पहिने रचितवक निनयक प्रतिख्षा नहीं कराइत अची. शाब्द प्रमान अपने आपने एक्ता ज्यान सादन्तेक, प्रत्यक्ष आ अनुमानक बगल में ताड, वेश्द्धयने अनुमान नहीं. तक्शन औ अदेक तिछन अपती के विचारुजे किचु लोग सीदे अहाक विरुद उत्बैट चति, जेना हम आहाके द्वितिय पूष्पगुछ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ वदोरी कद्पूत्लिक हातके एक्ता दूरक वस्तुदिस इशारा करभैत अची, आदेक हैत बच्चा शब्द बस्भास पहिनी इशारास अर्थ अनुमानित करैत अची. शिक्षा के बाशा पूरन होई बाक पूर्वकल पना नहीं कर बाके चाही, उबाशा के आरंभ कषकैत अची पहिने इशारा फेर शबद. हम अहा के आई एक रास विकार करे नहीं कहेट ची. वम केवल इकहे ची जे आपती, कते क टिख्षन सूनाइ दिय, पहिन ही सबहेंट कयल जाचुकल अची. द्रिश सात अर्था पती आ अनुपलप्दी, संख्षेप में तालल आ अपर्याप्पाव्र. सुत्रदार बाकिखन्द्शिर्षक एक ही संग, तीवरतास पड़ध चचत्ही, जखन उद्यन प्रतेक उत्र बारी-बारी दैच्चत्ही गती एताय तेस होएत अची, ध्वन्दवस भेसी चोग. आर्था पत्तिख स्वत्ट्र प्रमान सादन रुक में परीच्षा. अनुप्लब्दिक स्वतन्त्र प्रमान सादन रूप में परीच्षा आ एकर आर परीच्षा एक फेर दो सर, उद्यन, की एक ता आहा उप्मान आ शाभद के उदर दचुकल ची पहिने अर्थापत्ती उ अनुमान जे हम्रापर भाद्ध्यहोएत अची जकन एक ता ग्यात तत्यणन्यता कोनो अर्थ नहीं रक्ध अची. अपना उतत्या देखाउजे केवल निरमाता बिनु अर्थ रक्ठ अच्छी आहम उक्रा सीदे उट्तर देप मुदा एही सबहामे के अ अख्ण दھरी एक हु प्रस्तृत नहीं के लक अच्छवरक विरुद अर्थापती कहर दावाक्रित मामला जाच्मे अपना उपना उपन अर्थापतिक नाम दहेने एकता सामाने अनुमान सिथ होएत अची, असामाने अनुमान के हम पहिन ही सविस्तार सवुत्तर दचुकल ची. तकन अनुप्लप्दी फेर सव, अपन पूरन रूक में केवल, हम हुनका नही देक्खल हूँ नही, अपितु उ गहीर मीमान्सा दावाजे अनुपलब्धि स्वयाई अंद्रेजने ज्यानक अग्ता भिन्न सादन थेक, अअ इश्वरक समबन्ध में ओकर मान के सकार आत्मक प्रमान मानल जाएप चाही. देर्यवान मुदा एक्ता लंबा दिनक्तरकक अंतलग, साब्दानी सो करपत अनुसरन करू, आअ अंत्ता प्रत्यक्ष्मे धही जाएत अची, एक्ता सामान्य, अख्षत अंद्रिये इहा कोनो ग्यल नही इनिश्छत ज्यान अहिस तान के अनुबहव का उपन्न करआत अची � प्रत्यक्शे दोसर वेश्मे ठेक, औटीक औशीमा उतर आदिकार में पबैत अचीजे प्रक्यक्ष्के पहिनही सच्छल, औगेवल उही वस्तुक अबहावक रिपोट कषकैत अचीजक्रा उ शुरूएसं पकड़ योगेच्छल. इश्वर कहीो उही योग्यताक भीतर नहीं चला. मून किचो नव सिद्ध नहीं करःत अची केवल, एही पुष्पगुच्छ मे तेसरी भेर, उही प्रथम उत्तर के पूनह कहेद अची जे हम अहाके देने रही. एक्ता लंबात हैराव, फेर एक्ता चोट, इमान्दार मुरी हिलाब, तक्हन हम प्रत्यक्ष अनुप्लब्दिस अनुमान, उप्मान, शाभ्दः आ अर्ठापतिके समाप्त कचुकल ची, आ अहिमेस एक हो हम्रा आहाक अनुपस्तिती नही दैत अची. समाप्त नही प्र्वक पर्खल, न्याय पूर्वक एक एक कखा. एक बे हम एही पूरा पूष्पबुच्ष भरी के क्रो समांगल अची. द्रिश आत, ख्रीतिय पूष्पबुच्च्चक समापन प्रार्थना. उद्यन एही अंक में अंतिन भेर अदरिष्प्रतिमा दिस मुरएद्छत्छति पूर्न भक्तिसं हम उही देव्ताक देव्ताके प्रनाम कर अच्छि एही सबहाक हर परमपरामे सैक्रो नाम्स पूजित जिनक शान्त आनन्दक उद्सव्सं कोनो प्रतिद्वन्द्वी सुख्ध नहीं मिलात अची, जिनक यतार्त्ताके कोनो प्रत्यक्ष पक्री फेकी नहीं सकैत अची, कोनो अनुमान उल्ती नहीं सकैत अची, कोनो आर प्रमान्सादन रदा नहीं सकैत अची, आजिन पर अंत्तध औहर प्रमान सादन स्वयन निरभर अची विष्वस्नी होभै हे तु. पर्दाख असेत अची नास्तिक बाखी परिषत्स की चौकाल अदिक थाड रही जाएच्छत्छती फेर अहो भैसेत च्छत्छती अंक चतुर्त, चतुर्त पूष्पगुच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च् उद्यन निक दंगसं ठाकल भुजाएद छत्फी, एक्ता भादीजे अपन मामला मे गहीर दंसल अची, उहिसन जरजर नहीं. एक्ता अर कतिनाई, उद्यन आई आहाजे किचु बनोनेची, उकर जडिके चोट कर अची. अपन वाम्लामे गहीर दन्सल अची उहिसन जरजर नहीं. अच्ता आर कठिनाई उद्यन आई आई आजे किचु बनोने ची उकर जडिके चोट कर अची. आई इश्वर के सरवगे कहेच छी. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अज़वूनक ज्यान वैद नही अच्छी तनो केक्रो से हो विश्वस्निय रच्छिता नही चति वेद सहित जकर रक्षा आहा तीन पुष्पबुच बहरी केनिची तकन दोश अही परिभाशा मे अच्छी इश्वर मे नही जे पहिने ग्यात नही च्हल से जानब कोनो ग्यान के सत्या नहीं बना सकैत अच्छी अतिसंखुचत से हो थिक आ अतिविस्त्रत से हो. अतिसंकुच्छत एक ही ग्यल के दूभेर देखू, तो सर देखफ पहिल्जक्बे सत्य अच्छी, यद्यपी उही में किचु उनव नही अच्छी. अदिविस्त्रत एक्ता भ्रम कहीो नहीं देखल गेल की चुप्रस्तुत का सक्वत अच्छि आत्यो मिठ्या रही सक्वत अच्छि. नवींता नस सक्वताके नमिठ्यत्वके ट्रैक करैत अच्छि. जे कोनो ज्यान के सक्तिबन बैत अच्छी से एद भे ठेक जे उ वस्तु वास्तव में जेहन अच्छी उक्रासम मेल खायत अच्छी. उही माप दन्दस, इश्वरक ज्यान पूर्न अख्यो प्रूतिपूर्न नही होई बाक कारने, अपन विश्वस्तू उदार लिभाय लिभाय तू उशुन्यसादन अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अग्वान अगी पूरनत है एकता पूर्व ज्यान पर निरभर करः अची अपन विश्वस्तू उदार लिभाय है तु उशून्यसन उपन्न नही भह सकत अची. एक ही ग्यलत एक ताजा दर्षन उही पर निरभर करैत अची जे ग्यल अखन उपस्थित अची अपन कारन स्फेर देक्षल गेल भंदार्सं स्मरन नहीं कएल गे. आइश्वरक मामला दूनुस अदेक सरल अची सम्पून ब्रह्मान्दक हुनक जान एकता एकल स्वयन्स्मान क्रिया थेक, उक्रासंपहिनेक कोनो आर जान पर निरभर नही, किच्वो के तो सर भेर देखबाक आवश्ष्ख्ता नही. एक्रा ननव कहुन पुरान इकेवल ठिक समपुन एक ही संग. द्रिश दो ज्यातत्व कदावा तीन प्रयास तीन असपलता एक्ता भिन्न ध्वार्सम प्रयास करी तक्हन ज्यान निष्चे अपन विष्षे पर किचु करएत अची किचु चिना चोडअची अम एही च्हनके ज्यात्व कहे थ्छी, उगुन जे एक्ता वस्तुप, केवल ज्यात होई भासक, प्राथ करेत अची, जे उग्यात भेल अची. एही बिनु आहाक अपन अनमान में उत्पन होएभ जे एक्ता देवी निरमाताक हे तु अच्छी, अविष्वस्निय भजाएत अच्छी, की एक तन जे करताजे किच्वोस परषकर अच्छी, उही पर कोनो चिनह नहीं चोडआच्छी, उनका अपन सामगरी जनायत कहे पकतिन अगान एक्ता क्रिया होई बाक कारने, कोनो कारियक फल देबाके चाही जेना कोनो क्रिया फल दैत अची, आवो फल ज्यातत वत्थेग. मुदा खाली आखाश मे चोडल एक ता तीर आखाश मे कोनो फल उपन न नहीं करेत आची, ज्यान वोही तीर जकाब हसकेत आची, वास्तविक गती, कोनो चिनः पाषू नहीं चोडल. 2. जे हम कहेट ची द्हल ज्यात अची आई वाक्याश स्वयन सिद्ध करेट अची जे किछु नव्गुन ग्हल पर बैसल अची. वूदा हम समान रूखस ग्यल नष्ट भगेल कहे ची उही ग्यलक हे तुजे अखन कोनो गुन प्राथ करे हे तु अस्तित्वमे नही अच्छी, एक ताक्रियास संबंद वरनन करे वाला भाशा, अपने आप मे, वस्तू मे कोनो वास्तविक अवषेश सिद्ध नही करे अची. वूदाजे कारन हम्राग्यानक विष्वे बजबई दैध अची, से थीक उही कारन थेख जे पहिने ज्यानके उपन्न के लक बाच्चीट स्पष्ट करै है तु आर किच्वो मानबाक आवश्षकता नहीए. तक्हन ज्यात्त्व किच्वो स्पष्ट नहीं करायत अच्छी जक्राग्यानक अपन स्वबहाज पहिनहीस स्वयन स्पष्ट नहीं करायत होई. तीक यहे! अग्ता ग्यलत ज्यान अपन स्वबाज् स्ग्यलत ज्यान फिक, तिक जेना अग्ता पातर उठयबाग प्रयास अपन स्वबाज्स उही पातर समबन्दी प्रयास फिक, कोनो एको के जे उस पर्ष करैत अची उही में तेसर वस्तू जमा कैने बिनु. द्रिश्तीन की ज्यान स्वयंकी चुत्धेख जक्राहम अनुबुत करैच्ची वस्तुके किनार राखु तक्हन आप रष्न के ज्यान पर गूमा आहा कुना जानैच्ची जे कुनो ज्यान भेल आची जखनो आर ज्यान दवारा वोक्रा अनुबुत नहीं कयल गेल अनन्तता है, एक अक बाद एक. अनन्तता नहीं प्रत्यक्षता है. उही ख्षन जखन कोनो भाहे वस्तुक अनिष्चित अव भोद उत्पन होएत अची, अही ज्यान होई भाक तत्या स्वया मनक्सं, रलकासं, पहिन ही सवृपस्तित अची अगिलाक्षन में, जक्धन अही एक ही वस्तुक एक ता आर ज्यान उत्पन अहोईत अची, मन मुरत अची आपुर्व ज्यान के निष्चत रूप सजानी लैद अची, खिक जेना अपन रसोईगर में पहीचानल गेल पहिल अगिन उही एक ही चहनस भाद दूरक पहाडपर दूवासन दोसर अगिन पहीचाने दैत अची. ज्यान स्वया कोनो दोसर, उहिसा अलग धार ज्यान सा अनुबhoot नहीं होईत अच्छि, मनक आत्मासन सीधा संबंद, जक्रामे ज्यान नहित अच्छि, पर्याप्त अच्छि. तक्हन प्रष्नक कत्हन रुब के उत्तर दिया. आख आपन समप्रदायक अनुसार, एक ता ज्यान मुष्किलेस दूई वा तींख्षन तिकेत अची नष्थ होई बास पहीने. जव उ एतेक खषनक अची तव उ एतेक काल कोना टिकात अची जे उ अपन वस्तुके प्रकत से हो करया मनक पाषु मुडिक देख भास स्वयं पकडल से हो जाए. अकि उक्षन भंगुर यान अपन दोसर कषन में थीक उही वस्तुके पक्रत अची जे उ पहिल कषन में पकरने चल वा वस्तु उही कषन में पहिन ही सब भदली गेल अची एक ही वस्तु दूनूक शनक पार बनग रहेत, एह सव अजन्भी कि चो आवशक नहीं अची, केवल इमानी लेबजे कोनो ज्यान एक भेर उपन भेने, भिनू विरोदा भासक तुनूक आज करे हे तु पर्याप्त काल टिकेत अची अपन वस्तुके प्रकत करव, आफेर, मनक अवालाक शन के अपन लुप्त होईवालाक जातत्व चाही उक्रा प्रमानित करे है तु, आवो ही जातत्व के अपन आर जातत्व उक्रा प्रमानित करे है तु, आवा के वल, एक स्तर उपर, यह अनंत अन्वस्ता फेर उपन कदेने ची जक्रास आवाप जातत्व के बचाव इच्वर आहाक विवर ने एही मेसं कि चुव नहीं अच्वर अच्वर अच्वर ने इही मेसं कि चुव नहीं अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच्वर अच अगर वास्तविक उप्योगक सम्पूनता नहीं अगर वास्तविक उप्योगक सम्पूनता नहीं वहा उनका ग्यात कहेट्छी, एक्ता एहन शब्दक उप्योग सजे पुरनता है करत्रत्वसं बनल अच्छी? कि एक्ता शमान्यव्युपत्ती एक्ता शब्दक अर्ठक केवल समान्यमुल दैत अच्छी, वोकर वास्तविक उप्योगक सम्पुरनता नही. अम अग्ता इंद्री शक्ति के जान सादन, कहेट ची की अग्तान, उग्यान उपन करभामे कारनिक रूट सनलगन अची. अम अच्वर के अग्ता भिन्न, समान रूट सवैध कारन सक्यात खहेट ची, जान के वल हुंकामे निवास करएट अची, जे उ छठि उकर एक ता स्थाई विषेष्ता रूप में कोनो वस्तु दवारा उपन भेने बिनु एक ता व्यक्ति जाता भह सकैत अची बिनु एहीक शन् कोनो वस्तुप करता वेने जानब करभाक आवश्वकता नही राख्यत अची नहम्रा इदावा कर्बाके चाहीजे हुनक जान प्रत्यक्ष, अनुमान, शाभ्द, अ बाकिक बगल में किचु पाचम, अनाविष्क्रत जान साद्धन थेड. प्रक्तिक्ष्के व्यापक करू के वल एक्ता वस्तुक सीधा, अबादित जाग्रुक्ता भुज़्ावःे हे तुग विषेश रूप्स आंद्रे समपर कद्वारा प्रक्तिक्ष्च नही आ इश्वरक जानप स्वाभाविक रूप्स औही व्यापक अर्ठक अंतर्गत आभ विर हम एही पुष्पबुछ्छ्खे चोडी देब. जए इश्वर सरवग्य चत्फी, उनका हर मिथ्या विष्वास जयात अची, जे कोनो प्रानी कही औराखने अची, फर भ्हम, रर गलत अनुमान, रर स्वपनर. मुदा तक्हन हम्रा सबख् त्रूतिक विषेवस्तृ से हो, कि चू अर्थ में, उनक अपन जान में उपस्थित अची. कि हूनक जान के सवयन् त्रूतिस भरल नहीं बन बैत अची? आजज़नक ज्यान पहिन ही सा हमरा सबवोल राखने अची, तन हमरा सबवोल मेटेबा में हुनक शिक्षाक की उप्योग. एही सम्पून अंक्मे पहल्मुस्कानक संकेत, आहा प्रूतिके प्रूतिक ज्यान संब्रमत कदेलूप मित्र आए ब्रम थीक उ प्रकारक गल्ती फिक जे इश्वरक ज्यान, हमर सबखक विप्रीत कहीो नहीं कराइत अची. एक्ता ब्रम मिथ्या फिक मुदा एक्ता सच्चा ज्यान जे एक्ता भ्रम के भ्रम रूप में पहचानेद अच्छी एह एक्ता मिठ्या ज्यान थिक सि स्वयम मिठ्या नही थिक यी छीक विप्री थिक मिठ्यत्वक विष्ष्मे स्पष्ट्ता, उही में सहभागिता नही. इश्वर हर प्रूतिके त्हीक, वो हन जानैत, चत्ही जेहन, वो वास्तव में अची, प्रूती रुक में आएक ता ज्यान जे प्रूतिके प्रूती रुक में सही देखहत अची से, ये पूष्पबूगुच्षक आरंभ में हम सभ जे परिभाशा तै केने रही, औहिसन सक्त अगन सत्यताक बगल में नहीं राख़, चदी उ हुँँका सब के भूल रूप में देखआट, चदी जे तीक उठिक जे हम सब अखन हुँ ही में फनसल, अपने हे तु अखन दھरी नहीं कषकैच्ची. एक्ता लंबा सास, फिर एक्ता छोट सिरन्मन, हम एही सबहामे चारी पूषपबुच् संशेयक भहन का अनल अची, उद्यन, आधा प्रतेक के भिनु अपन स्वर उठेने भेटल हु. हम अखन हो अपना के पूलन रूकस उतरित नहीं कहेट ची. अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अखन अ� वो नो समापन प्रार्ठना मुल पाठ मे नहीं देल गेल अची बचल पन्ना सीदे इश्वरक त्रुटिज्यानक चर्चासं महान सकारात्मक प्रमान मे बड़ाट अची. सुत्रदार एकर बदला मोड चहनित कर अची. एही सबहाक पाचु अक्हन तीन पुष्पबुष्वष बजाव भेल इसंशेजे कोनो अदरिष कारन नही अची, इसंशेजे करमकान्द के इश्वरक आवश्षक्ता नही, इदावाजे इश्वर पुरनता खंदित भशकेट छत्फी आ, एही चतुर्त आँ सब सब छोट पूष्पगुछ में इप्रषनजे एतेक अचल सक्ता के जाता कहवाक अर्द की थेग. उनक विरुद उठाओल हर संचय के बहन्तल आम वोडल गेल अची. एक्ता काज बाकी अची, बाकी सबसम महान, केवल कि लाक रक्षा नही, अपितू उक्रा बनेब, आप प्रमान, अपन पयर पर ठाड, कोनो विरोदिक पहिजालक आववष्षकता बिनु. एह पाचम पुष्पगुछ थेख, आए ही समझ्पून उद्यानक शिक्धर. पर्दा दिरे संख अष्यत अची कोनो समापन संगीत नही, केवल एक ता ठहराव आगु आभई बलाग हे तुदीप अदेक उजज्वल कयल गे. अंक पन्चम पन्चम पुष्पगुछ्च्च्च्. इश्वरक अस्तित्वस �thepid करेवाला आत प्रमान. वादक शिक्धर उद्यन अखन के वल उतर नही दैत चत्छी, उब नबैट चत्छी, प्रमान प्रमान, प्रतेक अपन पईर पर ठार. नास्तिक, चार्वाक, मीमान्सक, सांक्या आचार्य, बोद्ध, आवएशेषिक सब-सबहा में उपस्तित चति, अब बारी-भारी विरोध नहीं करैत, अपितु एक्ता सबहा रूप में सूनैत चति, एक्ता मामला के जे अंते पूरन रूप्स बनल जारेहे लचि. द्रिश एक आतके रूप्रेका देप अन्तिम भेर पर्दा उठैत अची दीप स्थिर जरैत अची उद्यन सबहाक मद्यमे तार चती आए ही भेर आरमभेमे के उ हुनका भीच में नहीं तोकेट चती चारी पुष्पपगुच्, आहम अखन दहरी किचो नहीं केनेची सिवाई भूमी साव करबाक, संशयक उतर देद, आक्रमनक खन्दन करभ, एक्ता निरमाताक समभाबनाक रक्षा करभ. आईरा की हम रक्षा करभ बन्ग करएच्छी. आप्रमान आहाक सुजा ताध चति, प्रत्येग आपने आपने पर्याप्, कोनो विरोदिक पहिल्चालक आवश्व्ता बिनु अस्तिप्व में, जे सन्सार एक्ता कार्यतेक, जे परमानु मे प्रत्हम गती के एक्ता प्रेरक्के आवश्षक्ता अची, जे सन्सार धारित अची, जे उनस्त होएत अची, जे शब्दा शिल्पक स्वयं प्रत्हा के एक्ता प्रत्हम शिक्षकक आवश्ष्षक्ता च्ल, जे शास्त्रिय परम्पराक वेद्ता एक्ता विष्वस्निय स्रोथ मांगएत अच्छी, जे शास्त्र स्वया अपन रच्छताक साएक्षे दैत अच्छी, जे भिनु संख्या से हो, द्वित्वुख् त्रिथ्व, अहन वस्तुमेजे हम्रा सब मेशंके अगनी नहीं सकैत अची एकता. गन्निहार मनक छिनह बहन करैत अची. प्रतेख के उद्बे कध्हुर तास पर्खु, जद्बे आहा आई राती हमर बाकी हर बात के परखने ची. अम केवल इमांगे चीजे अहां हुनका एक एक क, अपनपन भूमिपर पर्खू. आरंभ करू तक्हन अम आई राती सहजतास्म नहीं मानलू आ अक्हन से हो शुरू नहीं करब. नीक यह थीक दंख थिक जक्रामे एकर अंथ होईबाके चाही द्रिश़ तो प्रत्हम प्रमान सन्सार एक्ता कारियत्ध प्रित्वी पर्वत जक्रामे हम सब भैसल्ची वो शरीर सबता उत्पन भेल अची थिक जेना एक्ता गेल उत्पन होएत अची अकोनो उत्पन वस्तू में उत्पाद कक कमी नहीं होएत अची तने सन्सारक एक्ता निर्माता अची तक्हन उ निर्माता के एक्ता शरीर होएबाके चाही जेना हर कुमार के होएद अची आजहुन का शरीर अची तंखो उ अश्रीरी इश्वर नहीं च्ध्रा आहाचारी पुष्पगुछ भरी बन बैत रहल हो उही आपत्तिके दबाव आ देखू ओ आहाक अपन हाथ सकोना फिसल जाएत अची. याता आहा दावा करएद चीजे इश्वर के शरीर अची, जक्रा मे आहा पहिन ही समानी चुकल चीजे ओ अस्तिप्वमे च्थी, अगर उनक आखार पर तीका तिप पनी करेथ ची, वा अहा दावा करेथ चीजे सनसार एकता शरीव दारी सक्ता दवारा नहीं बनल चल आवो हिसं अकेल निशकर्ष निकालेथ चीजे उ जिलकुले नहीं बनल चल, जे उही अनुमानक स्वयं विरोदा भास करेथ अची जकर अ अगिन दूआसा अनुमानित होईत अची चाहे कोन ईंधन जरल होएक, एक ता निर्माता एक ता बनल संसार सा अनुमानित होएत अची, चाहे उनिर्माता शरीर दारन करै थ हो थी वान ही. शरीर दारी कहीो हमर प्रमानक भार्वाहक भाग नहीं चल, आहा एक ता एहन शब्दक विरुद्द्दद, केलूजकर हमरा आवष्षकता नहीं चल. द्रिश तीं द्वितिय प्रमान परमानू मेगती पर्मानु के स्वयम विचारू तक्हन, वो कहीो सन्सार बन्नास पहिने स्रिष्तिक प्रध्हम क्षन में, वो पर्मानु जे कहीो पहिने नहीं हिलल चल, फिलै लागल, आजुडै लागल ज़्वस्तु स्वया नहीं हिली सकैत अची, कुदार स्वया माटी में नहीं जूलात अची. चेतन किचु वोक्रा प्रेरित करभाके चाही. शान्ततासव अकेल भाग्या उही प्रध्धम्गती के स्पष्ट के सकैत अची, अच्टन्ताक अदार अवष्ख अच्टिए उक्रा हिले बाक हे तु थिक जेना कुदार के अच्टा हाथ चाही अचार्यक खुनो एहन कारन नहीजे बाकी सबके भीर्संग बाहर कदैत अची एक्ता जर वस्तुके, थीक एही लेल ये उजर छेक, चेतंताक एक्ता अदार अवश्यक अची उक्रा हिले बाक हे तु, थीक जेना कुदार के एक्ता हाथ चाही आचाहुतन जीवित शरीरक विषिष्ट गतिके परमानुख प्रथम गति संग भिन्प्रकार कही सकैट ची, मुदा शारिरिग गति कोनो दंगसं परिभाशित करू, आहा पाएप जे उ परिभाशा पहिनही सत्फीख वो मानी लैत अची जकर हम तर्क करे है लची, एक ता चे तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ तुछ � अजकन एह सन्सार बाद में नष्त होगत अची सबस छोट अविभाज पर मानुविभ्मद्हरी नष्से हो एक ता करताक आवस्षकता राखआत अची जे उक्रा सक्षम होई, खिक जेना कप्रा केवल फारनिहार हाच्स नष्त होगत अची, शून्यसन नही. भागे फेर सदुनुके स्पष्ट कषकैत अची भिनु दारकक स्थिरता भिनु नाशकक विलैं भागे स्थ अची आहम एक रा कहीो अस्विकार नहीं केलूए, मुदा एक ता स्विक्रित कारन रर कारन के बाहर नहीं कदैत अची जए अके बाग्ये शरीरक दारन के सपष्ट करितै, तम प्रयास स्वयान एक ता जीवित प्रानी के ताध राख्भामे कोनो काज नहीं बचाइत जे सपष्टता मित्या अची, जे हन एही सभामे ताध हम्रा सभ्मेसं के अजम्रा बता सकैत अची. दारन आनाश प्रक्तेक, कार्य थेक, कार्य के कर्ताक आवश्षक्ता होएत अची, सन्सारक विशालता, उही निमस कोनो चुत नही थेक, जे हर चोट वस्तुके शासित करएत अची जक्रा हम सब कहीो उठैत आखशाथ देखने ची. द्रिश्पाज पाचम प्रमान प्रथम शब्द केक्रा सिक्हालनी पर मानुस अदिक निक्तक किचु विचारू उ स्वयं प्रत्हा जक्रास हम्रामिस्केो एक दोस्राके भुजहत अची एक्ता कुम्हारक शिल्प आन कुम्हारस सिक्हल जाएत अची, अवाई अग्टा प्रत्टम कडी पहुचव अग्टा प्रत्टम कुमार जकर सिखभाख हे तु कुनो कुमार नहीं चल, अग्टा प्रत्टम वकता जकर सिखभाख हे तु कुनो भाशा अखन हो नहीं भाजल गे चल. शायज श्रिंखला कोनो प्रत्ध्वादि अच्छिये नही, अनादि, थीक जेना पुनर जन्मक चक्र स्वया. स्रिष्तिया विल्यक चक्र अनादि अच्छि, भिख्षुक हम एक्रा विवाद नहीं करेच्छी. मुदा कोनो एक चक्रक भीतर, आपन नव भोर मे, कोनो पतित्वा सामानिय मनुष्य अखनो उपलड्द नहीं चत्थी, जे किचु शूरू कषक्ति. किचुो के प्रत्हम प्रत्हा गति में राखभा के चाही, अही प्रत्हम शिक्षक के स्थाई रूप स्वीर राखबाक आववष्ष्धा नहीं, शास्त्र स्वयं अग्ता एहन सत्ता के दर्स करईत अछीजे बेर्भे रूप दारन करईत च्वाएद वोगाईग. उहिसंपहिन ही जे दूनुप भीछ कोनो शब्द भाजल केल होए. उही प्रत्हम शिक्षक के स्ताए रूप स्चरी राखबाक आववष्खता नही, शास्त्र स्वयं एकता एहन सत्ताके दर्स करैत अची जे बेरभे रूप धारन करैत चत्फी, त्विख उही हे तु जे अन्यता हराएल होएत उक्रा पुनर जीवित करे हे तु द्रिष छे चधम आस आतम प्रमान एक ता विष्वस्निय परमपरा आशास्त्रक अपन वचन तकन हम्रा अपन भूमिपर अन्तिम भेर आहास भेद् करे दिय आख है त्छी वेदिक परमपराक वेद्ता स्वयाओकर पाषुक एक्ता स्रोट सिद्खरेत अची. मुदा वेद्ता, हमर सम्प्रदायक शिक्षानुसार, कोनो बाहे गारन्तीक आवश्षक्ता नहीराख्यत अची केवल एध्छिक जे एक्ता उचित रुपस उपनन जान पहिनहीस अची. आजज़ार ज्यानक वेध्धा के एक्टा आर ज्यान प्रमानित कर एह तु चाही, तन हम सब उही अन्वस्ताक सामना कर अब जेद वितिय पुष्पगुच्षसा हम्रा सबख पाचु लागल अच्छी, एक्टा अन्वस्ता जक्रा हम उते उत्तर देल हू आ अक्चन हू फेर उक्रा अपन्ज़ी मे एक्ता एहन सद्टाक आवष्ष्टा अची जे उक्रा सद्ट्यता पूर्वक उपन्च करे हे तु आवष्षक उपक्रिष्ट्ता राख है अशास्त्र के वल एहन स्रोद के संकेट नहीं करे है अची को उक्रा आन्दाईद अची पन्नादर पन्ना बिनु प्रशन्साग कोनो आवष्षक्ताग प्रेरित भेने, वेद स्वयन के एक्ता जाननिहार मुहस्निक्लात बत्बैत अची, ये वेद हम्रास्निक्लात अची, प्रत्टेक चकर में नव वाख्यक एहन् संग्रैजक्रा, अगर ग्यानी व्यक्ती स्विकार केने अची जेो कर अद्यान के लक, अपन अदिकार पर, आन किचो अपर तिकल नहीं कि उही सामाने मानवी रचनास भिन वस्तुत्थेख जकर रच्चिता केवल अनामित रही जाएट अची. एक्ता लंबा थदेराव आहा उस्सुत्र चारी पूष्पबुच भरी यहा द्हरी आनी पहुचोल हूँ. हम तरकक अक्रती पहचाने थ्छी, यद्यपी हम अखन हो अपन निशकर्ष नहीं रखने छी. इमान्दार अच्छी आई रातिक हे तु पर्याप्त अच्छी द्रिश सात एक्ता अंतराल, जखन शास्त्र आग्या दैत अच्छी, तंके आग्या दैत अच्छी एक्ता सुत्र आँख्छन हू नहीं किछने ची, उद्यन अद्मा जानल जाएप चाही एक्ता अग्या की खेख, जो केवल एक्ता क्रिया नहीं, वा एक्ता इच्छा, जे श्रोता में बिनु कोनो वक्ताक आवश्षक्ताक पहिन ही सवुपस्तित अच्छी? नहीं को काज करत. क्रिया नहीं की एक तन अद्मा के जानु, ख्या नहीं की एक तन आत्मा के जानू, कोनो एहन काजक आग्या नहीं दैत अछी जे अंतरिक्ष मेहिलैत अछी, आख्यों आग्या जे केवल ख्या में गथा देल जाए, से भाजार में चलैत विक्तिक वरनन करे वाला, हर सामाने वाख्यमे दही जाएत अछी. च्छा से हो नही कि एक तन काज कर बाक इच्चा स्वया उही आग्याक अर्ठके जान्नासः उपन होईत आच्छी आग्याक अर्ठके इच्छा बनाउ आए इच्चा स्वयान कारन अकार ये दुनु भजाएत आच्छी व्रित्ताकार आखाली. अग्ता आग्या वास्तव में जे भुज्भैत अची से अग्ता वक्ताक अविप्राय थिक जे श्रोता काज कराय आग्ता अविप्राय के अपन व्याकरन सर अविप्राय करताक आवस्षकता होईत अची. आा के इकर्भाके चाही अर्ठहीं थिक भिनु के उक जिनक इच्छा अहाक समबन्द में इव्यक्त करैत अची. शास्त्रक हर अदेश, इमान्दारी सोकर व्यकरन दھरी जान्चल, क्रियाप्दक पाछुट्फाड एक्ता वक्ता दिस इशारा करैत अची. द्रिश आत आतम प्रमान्ः परमानुके के गनेत अची आ अंतिम आत्मेसन सब्स विच्ट्र आ, हमर विचारें सब्स सुख्ष्म. अगता परमानु उल्ग्मक अगता निष्च्ट परमान होगत अची, एक तात्रय उहिसंग भहुत बेसी परिमान एतेख बेसीजे अकेल परमानुवा कार्स श्पष्ट नहीं होएत अची, की एक तनजकेवल परमानुख गुनन अक्रा स्पष्ट करिताय, तन्दुई पर मानु एक संपहिन ही सवेह मोड आकार देखभैत आ उस पष्तते नही देखभैत अची. खाली संच्यन समपरे किचु, एक ता गन्ना, एक ता गनब इहो एताए काज करएत होएप चाही, एहन्स्तर्पर्जक्रा एही सबहा में कोनो आखी कही अ सीदे अनुभव नहीं कषकत अची. दूप्वित्वु कोनो निष्क्रे गुन नहीं थेक जे युगम में पडल अची, उगन्नाक एक ताक रियास उपन अपन अपन अची. अपर्मानु अपन स्वभावेसध, हम्रामेस प्रतेख के अद्रिष्छत्ही. तक्हन के कर गन्ना, युगम के अकर द्विद्व्दैत अची, जकुनो सीमित प्रानी अपन जीवन में एक हु पर्मानु कही अ नहीं गन्ने अची. शान्त्ता सक् एक्ता लंभा मूनक्बाद, केवल एक्ता सर्वग्य गन्निहार आप्प्रमान्क मित्र कार्यरुक्मे सन्सार, पर मानुक प्रत्हम्गती, वोकर धारन, वोकर नाश, हम्रा सब जेजे शब्द बजैच्ची वोकर प्रत्हम्षिक्षा, एक्ता प्राछीन विश्वासक वैद्ता, शास्त्रक स्वयंक साख्ष्य अपन्स्रोतक, आअ अखन संक्या स्वयं, उही में उपस्तित जक्रा हम्रा में स्केो अकेल कही उगनी नहीं सकत. वम दावा नहीं करेट चीजे एहमेसं एकू, अके थाड, एक्ता द्यर्यवान विरोदी द्वारा, एक्ता आर पुरा साथ भरी खोत्राल नहीं जासकेत अची, अहा एक आईराती छीक देखा देलूजे, इसबहा कते एक द्यर्यवान भच्सकेत अची. अम केवल एह दावा कर आची जे आट स्वतन्त्र रेखा, एक ही निषकर्ष पर आट विन्न दिशास मिलआत, जक्रामिस एको के दूस्रासं उदार नही लेल गेल से आट सन्योग नही थिक. अंता एह थेक जे एक्ता पुष्पबुच्छ होईत अची, एक्ता अटूट फुल नही, अपितु बहुतो एक संब भतोरल तेज एक्ता पंखुरी से हो कुछल जाए, तईो पुष्पबुच्छ स्वया आहाक हाच में पूरन थाड रहे त अची. द्रिश्य नाँ प्रत्यक्ष जानब तर कसमपरे अकी सच्मुच रुणका जानबाक कोनो आर मार्ग नहीं अछ्छितर कष्रिंक्लास भाहर, उद्यन्द आप्प्रमान प्रत्यक्के एहन अछ्टा सबहा, एहन अछ्टा साथ चाही उक्रापार करे हे तु. अब अदिक कोमल वाद प्रत्यक्षत्य समाप्त होएत, तर्क अकेल द्वार नहीतेक. योगी हुनक प्रक्तिक्ष आन्तरे ज्यानक रिपोर्ट करेट चति, त्यिक जेना ककन हु एक ता स्वपन मनके एहन वस्तू देख बैत अची जक्रा कोनो भाहे अंद्रिय नही आपुर्ति के ने चल, हर स्वपन के वल स्म्रितिक पुन्राव्रित्ती नही थेक, किचु सच्� वो आप वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो उद्यन एही नातक में अन्तिन भेर, सबहाक शीर्षप्रक अद्रिष्प्रतिमा दिस मुराएक्षत्थी. सम्पूल्न परिषद, आक्षेपक, मीमान्सक, चार्वाक, सांख्य, बोध्ध, वैशेषिट, नास्तेक, वूनका चारुकात, शांथ भजायत अची. जे हो आत प्रमान, इमान्दारिस अर्पित, इमान्दारिस पर्कल, कोनो मन्के नहीं हिलासकः ता उमन पातर्थिक, आतर्कक, कोनो पुष्पगुछ पातर्के नहीं नर्मासकत. तै हम एते विजक हेतु प्रार्ठना नहीं करैट्खी वम बरु प्रार्ठना करएच्छी, इटरकक पूशपबुच् दूनो नाखस समान रुपस सुगन्दित होई इवोही आस्तिक के संथुष्ट करएजे पहिनही सविष्वास का आयल चल, आ, अपन समय में, उही आस्तिक तक से हो पहुचट इजे एक्रा तोडई आयल चल. आजजे ये एक बो नहीं कषकः, तः ये वल एक ता वेंत रूप मे बाकी रे है, सक्तितास बतोरल, ताजा राख्ध, बिनू कोनो अपेख्षाक शिक्षक सबख्प्रबूक चरन मे राख्ध, जे अकेल जनैत, चति जे अई राती एक्रा सुने वाला मन अपन गर जल्दि प अद्बडिक परिषद उठ़द अची नास्तिक सबसा अंत में ताड हो इद्छत्छी रंगमन्चक परदा क्रिषनरक्त आसुनहर ये परदाजे प्रत्ठम पुष्पगुच्छ पर उठल चल अपन अंतिम दीरे अवतरन दीप जरल सबापर आरंभ कर अची शान्त्तासत जखन पर्दाख हसैत अची, पाज पुष्पपगुच, आज प्रमान आ एक ता दीप जे समपून साच नहीं जाए. वाद एतर समाप्त होगत अची की इनिप्तल समात होईत अची से, जेना एही सबहामे सदा होईत अची, उही विक्तिपर चोडल जाएत अची, जे एक रादवार सं बाहर लाजाएत अची. अंक पन्चम समात, नाटक समात

← Transcript index