MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
उदयनाचार्य_और_बौद्ध_दर्शन_का_तार्किक_महासंग्राम.m4a
Timestamped machine output
- 0:00–0:08तो इतिहास को दिखने का एक नजर्या ये भी हो सकता है, के सबसे बड़े युध, हत्यारों से नहीं, बलकी विचारों से लडे गये हैं.
- 0:08–0:10बलकुल सई बाते है.
- 0:10–0:14मतलब, तलवारों और तोपों से लडे युध तो सुफ दुन्यां के नक्षे बड़लते हैं,
- 0:14–0:17लिकिन तर्कों और्चन के यूध होते हैं
- 0:17–0:19वो हमारी पूरी सोच बडल देते हैं
- 0:19–0:20एक दम सही
- 0:20–0:21वो ये तैक रहे हैं
- 0:21–0:23के हम उस नक्षे को
- 0:23–0:24उस दून्या को
- 0:24–0:27और खुद अपने अस्तित्बो को कैसे समचते हैं
- 0:27–0:29और आजके हमारी एक गेरी चर्चा
- 0:29–0:59उआप आद बाद गर बाद बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बा�
- 0:59–1:04इसके मत्ली अनुवाद के ज़र यह जिसे गजदर ताकृर ने अनुधित किया है.
- 1:04–1:07यह गरन्त अपने आप में एक ताईमशीन है.
- 1:07–1:10और हमारी इस चर्चा का जो मिशन है,
- 1:10–1:13यह नहीं है कि बस इक पुरानी किताप का सरावष दे दिया जाए.
- 1:13–1:15तो फिर आसल उदेश गया है?
- 1:15–1:19हमारा उदेश येश्छ न्याय वैशिषिक दर्षन और बोद दर्षन के भीचुए
- 1:19–1:21उस महा संग्राम को समजना है
- 1:21–1:25मतलब ये कोई आसी बहेस नहीं ती जो बस कुछ विद्वान ताईमपास के लिक रहे थे
- 1:25–1:55यह बवाँद बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा ब�
- 1:55–1:57तो कुछ भी दावा कर देतें.
- 1:57–2:00तो ये समझना बहुत जरूडिये कि किसी भी विचार या सत्ते को
- 2:00–2:03तारकिख कसोटी पर कैसे जाचा जाता है.
- 2:03–2:06उदेना चारे का जो सोचने का तरीका है, वो हमें यही सिकहाता है.
- 2:06–2:09तु चल्लिएस महासंग्राम के पहले मुर्चे से शुर्वात करते हैं
- 2:09–2:12उं। सब से बून्यादी सवाल से
- 2:12–2:12जी
- 2:12–2:16क्या इस भूथक दून्या में चीजे टिकती हैं या सब कुछ शनिक हैं
- 2:16–2:18मतलब क्या कुछ स्ताए है भी
- 2:18–2:23ये दर्षन शास्त्र का बहुत ही गेरा और खादा है?
- 2:23–2:26दिमाग चक्रा देने वाल है.
- 2:26–2:27तोड़ा खोल कर देकते हैं से.
- 2:27–2:30बुडद दर्षन का एक विचार है.
- 2:30–2:30खषनिक वाद.
- 2:30–2:33जिसके आनूसार हर चीस के लग शन किलिए है.
- 2:33–2:34हाँ.
- 2:34–2:37बवददर्ष्निक बहुती मजबूती से यह मानते है,
- 2:37–2:42कि जो चीज इस पल है, वो आगले पल नश्थ होटी है.
- 2:42–2:46और उसकी जगा बिलकुल वैसी ही दिखने वाली एक नईई चीज जन लेती है.
- 2:46–2:49मतलब सब कोछे एक बहती हूँई नदी गी तर है.
- 2:49–2:50बिलकुल.
- 2:50–2:53जो दूर से देखने पर एक जैसी लकती है.
- 2:53–2:55लेके उसका पानी हर पल नया है.
- 2:55–2:56औरे बाप्रे.
- 2:56–3:00पहली बार सूनने में तो ये विचार थोडा अजीब लगता है.
- 3:00–3:04मतल, मैं सुच राता के अगर मैं खुर्सी पर बटा हूँ,
- 3:04–3:07तो वो खुर्सी कल भी वही ती और आज भी वही है,
- 3:07–3:09वो हर पल नहीं कैसे हो सकती है.
- 3:09–3:12यही तो बडद तरकों की ताकत है,
- 3:12–3:15जो हमारी आम समच को चुनोती देती है.
- 3:15–3:17उगर बीज नगी बोरी में बोया है
- 3:17–3:47बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज ब�
- 3:47–3:49तो वो बोरी में बेटके अंट़ार क्यों कर रहा है?
- 3:49–3:52एक दम सही पक्डे आप, बोध्दों का तरक है,
- 3:52–3:55कि कोई भी एक वस्तु, एक ही समैमे समर्त,
- 3:55–4:00यानी सक्षम और असमर्त, यानी अक्षम नहीं हो सकती.
- 4:00–4:04एक ही समामे दोनो चीजे कैसे हो सकती है?
- 4:04–4:09आ, तो अगर गुदाम का भीज असमरत है, और केट का भीज समरत है,
- 4:09–4:12तो इसका सीथा सा अरत है कि वि दोनो अलगलग है.
- 4:12–4:16जैसे ही भीज मिटी में जाता है, पुराना भीज नष्ट हो जाता है,
- 4:16–4:19और एक नया समरत भीज जन में लेता है.
- 4:19–4:20अहो!
- 4:20–4:23तच्व में, ये तरक तो बहुती टोस लगरा है.
- 4:23–4:27जब वो ये समर्थ और असमर्थ के तराजू पर तोलते हैं,
- 4:27–4:30तो शनिक वाद बलकुल तारकिक लगने लगने लकता है.
- 4:30–4:30है न?
- 4:30–4:32लेकिन एक मिनेद,
- 4:33–4:35अगर हम थोडा रुककर सोचें,
- 4:35–4:38तो क्या हम इसे आजकी उस पूटेंचल अनरजी की तरा नहीं देख सकते हैं
- 4:38–4:39मतल?
- 4:39–4:40आपके स्थान से जोड रहे हैं से
- 4:40–4:43जैसे मान लीजे मेरे हाप में जो समाथफों है
- 4:43–4:46उसकी बेट़्री पूरी सोप्रतिषट चाज है
- 4:46–4:46तीक है
- 4:46–4:50फोन में काम करने का और सक्रीन अंकरने का पूरा समर्थ मोजुद है
- 4:50–4:53लेकिन जब तक में पावावाबटन नहीं दबाता
- 4:53–4:55तब तक स्क्रीन अई अण नहीं होती
- 4:55–4:58तो क्या मैं ये कहुँँँँँ के कल जो फोन बन ता
- 4:58–5:00वो पुरी तरा अख्षम ता
- 5:00–5:04और आज जो फों चालू है, वो कोई नया फों है,
- 5:04–5:08फों तो वैई है ना, बस उसे त्रिगर करने वाला वो पावर बटन गाएप ठा.
- 5:08–5:12औरे वाए, ये बहुती सतीक आदूनिक तुलना है,
- 5:12–5:14और आपको शाए द यकीन नहो,
- 5:14–5:18लेकिन गयारवी सदी में उदैन अचारे ने बिलकुल यही बात कही ती
- 5:18–5:19सच में
- 5:19–5:20बिलकुल
- 5:20–5:22उनो ने समाथवों का उदारन तो नी दिया होगा
- 5:22–5:23नहीं उनो ने समाथवों नहीं कहा
- 5:23–5:26लेकिन उनक तरक बिलकुल यही ता
- 5:26–5:29उन्हो ने एक शनिक्वाद के अस्टर्क कुदवस्त करतेवे का,
- 5:29–5:33कि बीज में अंकुर पेडा करने का एक स्थाई सामर्ते हमेशा हुता है.
- 5:33–5:36मतलब गुदाम के बीज में भी वो सामर्ते है.
- 5:36–5:37बिलकुल.
- 5:37–5:40लेकिन स्थाईव सामर्त्योना काफी नहीं है.
- 5:40–5:44उसे हकीकत में बड़लने किले कुछ बाहरी कारनो के आविषकता होती है.
- 5:44–5:48जैसे मिटी, पानी, हवा, और सही तापमान?
- 5:48–5:53आजीने उदैना चारे सहकारी कारन या सहायक कारन कैते है.
- 5:53–5:57वो कैते है कि जब गुदाम में रखा बीज अंकुरत नहीं हो रहा,
- 5:57–5:59यह तो मतलब यह नहीं है कि वो भीजी कुछ रहा है
- 5:59–6:02बस उसे ट्रिगर करने ले कारन नी मिलें
- 6:02–6:03एक दम सही
- 6:03–6:06जैसे ही वो मिट्टी वो पानी मिलते है
- 6:06–6:09वही पुराना स्थाई भीज अपना काम कर देता है
- 6:09–6:12इसे ये सिथ दोता है कि वस्तूं खषनिक नहीं
- 6:12–6:14बल की स्थाए होती है
- 6:14–6:15बहत हुब
- 6:15–6:17ये तो एक बहत बडी वैचारिग जीथ होगग
- 6:17–6:18लेकिन
- 6:18–6:22जलिये अब समय के साथ वस्तुम के तिकने से थोडा अगे बडदते हैं
- 6:22–6:23एक और बड़ वड़ सवाल है
- 6:23–6:24कुन से सवाल
- 6:24–6:28ये कि क्या ये बाहरी दून्या वास्तव में है भी?
- 6:28–6:30ये ये सब सर्फ हमारे दिमाख का कोई ब्रम है?
- 6:30–6:34आज आप विग्यान्वाद और शून्यवाद की तरव जारे हैं.
- 6:34–6:39आज बवद्द्दर्म की कुछ शाक्ठा आएं याई तु मानती हैं कि केवल चेतना सत्ते हैं
- 6:39–6:41और ये बहारी दुनिया पूरी तना अवास तविक है
- 6:41–6:44ये विचार किसी साँईन्स फिक्ष्छन फिल्म जैसा लकता है
- 6:44–6:46जास या सब कुछ इक सिमूलेशन हो
- 6:46–6:47विग्यान वादी कैते है
- 6:47–6:50की जैसे हम सपने में चीजें देखते है
- 6:50–6:52और वो अस्ली लकते है
- 6:52–6:56वैसे ही ये जागती हुई दून्या भी दिमाग का एक प्रजेक्ष्छन है
- 6:56–6:58और शुन्यवाद तो इस से भी आगे जागता है
- 6:58–7:01की बाहरी दून्या भी लही है और चेतना भी नहीं है
- 7:01–7:02राँ, सब कुछ शुन्ने है
- 7:02–7:05तो उदैना चार ये इस बात का सामना कैसे करते हैं?
- 7:05–7:08गजेंद्र ताकृर के मेठली अनुवाद में
- 7:08–7:11एक बहुतिशान्दार और व्यंग्यात्मा कुदारन आना अच्टारन आच्टारन
- 7:11–7:15अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन
- 7:15–7:17अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन
- 7:17–7:24अदेना चारे कहते हैं कि कलपना की जीए राज महल के दर्वाजे पर एक विशाल अस्ली हाती कड़ा है, रात का अंदेरा है, और वहाँ से एक मुरक व्यक्ती गुजरता है.
- 7:24–7:27और उसे अंदेरे में हाती साभ दिखाए नी देता.
- 7:27–7:31राज महल के दर्वाजे पर एक विशाल अस्ली हाती कड़ा है
- 7:31–7:32राथ का अंदेरा है
- 7:32–7:35और वहां से एक मुरक व्यकती गुजरता है
- 7:35–7:37और उसे अंदेरे में हाती साव दिखाए नी देता
- 7:38–7:38बलकल
- 7:38–7:42उदेना चार्या बहुती तीके वियंगय के सात कहते है,
- 7:42–7:46कि शुन्ने वादियों का हाल भी इसी मुर्क व्यक्ती जैसा है.
- 7:46–7:50मतलव उनहे वास्टविक्ता समजनी आरी तो उगे देते है, कि दून्या ही नहीं है.
- 7:50–7:51एक दम सही.
- 7:51–7:54तो वो वास्ट्विक्ता समज नहीं तो अग्यान्ता चुपाने के लिए शून्ने की गूश्ना कर देते हैं।
- 7:54–7:56ये तो सच में बहुती दिल्चस्प हैं।
- 7:56–7:59इतने जटिल दर्षन को उनो ने एक द्रिष्ष्य और हास्ट्विक्ता तो आप ज़ुपाने नहीं।
- 7:59–8:03वाज्ट्विक्ता समजनी आरी तो वो कह देते हैं कि दुन्या ही नहीं है।
- 8:03–8:04एक दम सही
- 8:04–8:07जब वाज्ट्विक्ता कि जटिल्ता नहीं समच बाते
- 8:07–8:12तो अग्यान्ता चुपाने के लिए शुन्ने कि गूशना कर देते है
- 8:12–8:14ये तो सच में बहुती दिल्चस्प है
- 8:14–8:16यह तो सच में बहुती दिल्चस्प है
- 8:16–8:20इतने जटिल दर्षन को उनो लें एक द्रिष्चे और हास्इके माद्दम से कैसे तोर दिया
- 8:21–8:23आप एक न वो सर्फ मजाक तक नहीं रुके
- 8:23–8:26उनो लें विग्यान वादियों के एक बहुत्ही गेरा नियम
- 8:26–8:32विज्यान वादियों के एक बहुत गेरा नियम, सह उपलंब नियम का भी तारके क्चन्दन किया.
- 8:33–8:37ये सह उपलंब नियम क्या है? तोड़ा सरल बाशा में समजगेंगी.
- 8:38–8:44इस का मतलव है कि जब हम किसी चीस को दिखते है, मान लीजी एक निला ग़ा है.
- 8:44–8:50तो हमे उस नीले गडे का ज्यान और वो गड़ा दोनो एक साथ मिलते है.
- 8:50–8:53ग्यान और वस्तू एक साथ?
- 8:53–8:59आँ तो विग्यान वादी कहते है कि चुकी तोनो हमेशा एक साथ अनुबहव होते है,
- 8:59–9:04इसका मतलब बहारी वस्टू का ज्यान से अलग कोई अस्तित्वव है ही नहीं
- 9:04–9:07ज्यान ही कुटको गड़े के रूप में दिखारा है
- 9:07–9:11अच्छा, लिकिन अगर मैं ज्यान को एक तोर्ज की रोष्नी की तरा मांगल।
- 9:11–9:13उंआप ख्याप यान चारे?
- 9:13–9:18मिरा मतलब है के जियान एक टर्च है, जो अंदेरे में रक्छीजों को दिखाता है.
- 9:18–9:24जब में रोशनी नीले गड़े पर डालता हूं, तो रोशनी और ग़ा, मुझे एक साती दिकते हैं.
- 9:24–9:25बिलक्कल.
- 9:25–9:27अग, बद्यानाचारे का तरक कुछ अज़ाए है?
- 9:27–9:31और वाज, आप दो बिल्कुल उनके तरक के दिल तक पहुज गय.
- 9:31–9:35उद्यानाचारे ने यही कहा कि ज्यान प्रकाषक है,
- 9:35–9:39यहनी इल्युमिनेटा वो बहारी सत्ति को प्रकाषित करता है,
- 9:39–9:41उसे बनाता नहीं है.
- 9:41–9:46प्रकाशक है, यानी इल्युमिनेटा वो बहारी सत्तिको प्रकाशित करता है,
- 9:46–9:48उसे बनाता नहीं है.
- 9:48–9:50वुझ, मतलब रोशनी डालने वाला?
- 9:50–9:54आप, जब हम किसी नीली चीस को देकते है,
- 9:54–9:56तो हम कहते है, यह नीला है.
- 9:56–9:58हम ये कभी नहीं कहते है कि मैं नीला हू.
- 9:58–10:03बलकुल सही बात है, ग्यान और ग्याता खुद को हमेशा वस्तू से अलग मानते हैं
- 10:03–10:06और अगर ये दुन्या सर्फ मेरे दिमाग का ब्रहम होती,
- 10:06–10:09तो हम सब एक ही दुन्या पर सेमत कैसे होते?
- 10:10–10:13बाहरी सत्यका अपना एक स्वतन्त्र वजूद है.
- 10:13–10:13तीक है.
- 10:13–10:17तो हमने ये मान लिया के दुन्या स्थाई है और वास्तविक है
- 10:17–10:20लेकिन इस सब के भीचे एक और बहुत एहम सवाल क्डा है
- 10:20–10:24वो अवलोकन करता यानी अबजरववाला सवाल
- 10:24–10:28आगर बहरी दुन्या वास्तविक है तो हमारे भीतर बेटे हूस मैं का क्या
- 10:28–10:30वो अवलोकन करता कोन है?
- 10:30–10:33यही पर बवद्धों का नेरात्मेवाद सामने आता है.
- 10:33–10:36जो केता है कि आत्मा जैसी कोई चीज है ही नहीं.
- 10:36–10:38तो फिर उनके हिसाब से हमारे अंदर क्या है?
- 10:38–10:41उनके अनुसार जिसे हम आत्मा कैते है,
- 10:41–10:44उसर्व चेत्ना की एक बहती हूए दारा है
- 10:44–10:46एक पल की चेत्ना पैदा होती है,
- 10:46–10:48तुस्रे को जन देती है,
- 10:48–10:50और कुद नश्थ होटी है
- 10:50–10:52कोई स्थाई मैं नहीं है
- 10:52–10:56लेकिन तु इस सब का असल मतलप क्या है
- 10:56–10:58अगर आत्मा है ही नहीं
- 10:58–10:59मैं सरफे कषनिक चीतना हूं
- 11:00–11:02तो कल मैंने जो अनबोफ की आउसे आज याज याज कुन रख रहा है?
- 11:03–11:05ये एक बहुत ही जायस सवाल है.
- 11:05–11:08मतलब अगर कोई स्थाए मैं है ही नहीं
- 11:09–11:11तो मान लिजे मैंने कल किसी से करज लिया
- 11:11–11:14तो आज उसे चुकाने की जिम्मेडारी मिरी कैसे हुई?
- 11:14–11:16कल का मैं तो मरचुका है?
- 11:16–11:20या कल के किसी बूरे कर्म की सजाम उजे आज क्यो मिलनी चाही है?
- 11:20–11:21विलकुल!
- 11:21–11:25ये तो समाज की पूरी नेटिक्ता और नयाई विवस्ता को ही क्योई क्योई क्योई कर देगा.
- 11:25–11:29उदेना चार्या ने इसी विवारेक सत्ते को अपना हत्यार बनाया
- 11:29–11:31उनहोंने कैसे कहन्दन की आजका?
- 11:31–11:38उनहोंने स्म्रती, यानी याद्दाश्ट, और प्रत्ट्य भिग्या, यानी रेकिगनिष्न, का उप्योग कर के एक स्थाई आत्मा को सिद्ध्धिया
- 11:38–11:40उगर चेतना हर पल नश्थ हो रहे है,
- 11:40–11:44तो नश्थ होगी चीस किसी नहीं चीस को अपनी यादे कैसे दे सकती है,
- 11:44–11:48इन सब अनबवो को पिरोने किलिए एक स्थाई दागा चाहीए,
- 11:48–11:50और वही दागा आत्मा है.
- 11:50–11:51बहुती तारकिक बात है,
- 11:51–11:56तो मैंसुस निक रहागता अगर चेतना हर पल नष्ट हो रही है,
- 11:56–12:00तो नष्ट होचो की चीस किसी नहीं चीस को अपनी यादे कैसे दे सकती है.
- 12:00–12:04इन सब अनबहवो को पिरोने किलिए एक स्थाई दागा चाहीए,
- 12:04–12:06और वही दागा आत्मा है.
- 12:06–12:11तरकिक बात है, लेकिन अगर आत्मा स्थाएई है, तो मोक्ष का वास्थवे करत क्या है?
- 12:12–12:14क्या मोक्ष का मतलब हमेशा रहने वाली खुषी है?
- 12:15–12:19आँ, नियाई दर्षन में मोक्ष को लेकर बहुत ही अनुथा विचार है.
- 12:19–12:21इसे वो अपवर्ग कहते है.
- 12:21–12:26उदैना चारे समजाते हैं के मोखष कोई हमेशा रहने वाली खूशी नहीं है.
- 12:26–12:30आऽ सा क्यो? सब लोग तो यही मानते न के मोखष मतलप परमानन्त?
- 12:30–12:36क्योंके खूशी महसुस करने के लिए आपके पाज शरीर, मन, और प्यद्वाग निजा हूनी चाही एं.
- 12:36–12:41और मोखश का तु मतलब है, जन्मा मरन के चक्रसे और इस शरीर से मुखती
- 12:41–12:43आप, शरीर तो नहीं रहेगा
- 12:43–12:46तु जब शरीर ही नहीं है, तु सुख्ख का अनबभव कैसे होगा
- 12:46–12:51इसले मोखश कोई खृषी नहीं, बलकी दुख की आत्यंतिक निव्रुत्ती है
- 12:51–12:55अट्यान्तिक निव्रुत्ती, मतलब दुखुका पूरी तरह से क्हतम हो जाना.
- 12:55–12:58बिल्कुल, अपसलुट् सेसेश्याशन अप्सट्ट्रिंग.
- 12:58–13:00वहां कोई लोकिक सुक्या दर्द नहीं होता.
- 13:00–13:05बस आत्मा अपने मुल निर्गुन रूप में परम्शान्ती में रहती है.
- 13:21–13:51बज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़�
- 13:51–13:55अगर आम इसे व्यापक संदरब से जोडग़ देखें,
- 13:55–13:57तो विदेशी करन का मतलब है,
- 13:57–13:59मुल बहाशा के कथण शब्डों को
- 13:59–14:01ज्यों का त्यों रखना,
- 14:01–14:03ताकि उनका दार्षनिक वजन कम ना हो.
- 14:03–14:05ज़से इस किताब में ने
- 14:05–14:07अपोहुवाद या अविनाबहाव ज़से
- 14:21–14:24मतलब उने विस्टानी रूपको में डाल दिया.
- 14:24–14:25बिलकुल.
- 14:25–14:29जैसे सत्ट्यो और ब्रम को रवक करने की प्रक्रिया को समजाने कि लिये
- 14:29–14:32उनो ने क्हरीहान का बहुत सुन्दर उप्योग किया है.
- 14:32–14:33क्हरीहान.
- 14:33–14:36मतलब जहाँ फसल से बूसी रवक की जाती है.
- 14:36–14:37एक्दम सही.
- 14:37–14:39जैसे किसान कहरीहान में
- 14:39–14:41दान से भूसी अलक करता है,
- 14:41–14:44वैसी ही दार्षनिक अपने तरको से
- 14:44–14:46सत्टिको ब्रम से अलक करता है.
- 14:46–14:47औरे वाज.
- 14:47–14:49ये तो थेट जमीनी उदारन है.
- 14:49–14:51इसे ये भी साभित होता है,
- 14:51–14:54कि मैतली या हमारी कोई भी शेत्रि भाशा
- 14:54–14:56केवल लोग गीतों तक सीमित नहीं है.
- 14:56–14:57बिलकुल.
- 14:57–14:59अगर अनुवादक सक्षम हो,
- 14:59–15:03तो ये बहाशाए गंभीर दाशनिक चिंतन की पुरी क्षमता रकती है.
- 15:03–15:08तो इस पुरी चर्चा को समझते हुए मैं यही कहोंगा,
- 15:08–15:10के आत्मतत्वे विवेग का ये विष्लेषन
- 15:10–15:13ना केवल प्राचीन भार्तिदर्षन की तारकिग गेराई को दिखाता है?
- 15:13–15:20बल की ये बी बताता है कि ज्यान को स्तानिया बाशाव में सुरक्षिद रक्छना कितना अवष्षेक है.
- 15:20–15:21मिलकल.
- 15:21–15:25उदेश़्ी बाज जो सीकने वाली है वो हे बोद्धिक इमान बारी
- 15:25–15:32आदेना चारी ने पहले अपने विरोदियों के तरको को निशपक्ष्ता से प्रस्थ॥ किया जिसे पूर्वबपक्ष कैते हैं
- 15:32–15:36अप फिर उनका खंडन किया यही आस्ली आलोचना अत्मक छिन्टन है
- 15:36–15:37सही कहा
- 15:37–15:41अप श्रोटाँ को सोचने के लिएक आखली विचार के साथ हम विदालेंगे
- 15:41–15:47उदैनाचारे ने सिद्ध किया ता की हमारी स्म्रती या मेमरी
- 15:47–15:50ही हमारी स्थाए आत्मा का सबसे बड़ा प्रमान है
- 15:51–15:53हम अपने कल को आज से जोड बाते हैं
- 15:53–15:55इसलिया हमारा अस्तितव है
- 15:55–15:57ये तो हम आभी चर्चा की
- 15:57–15:59लेकिन आजके इस दिज़िल योग में जर ज़ा सुचीए
- 15:59–16:01अईन्सान अपनी यादों
- 16:01–16:03तस्वीरो और जानकारियों को
- 16:03–16:05समाथफोन और कलाउट श्वोरज में अप्सोट्स कर रहा है
- 16:05–16:09तु सब आल ये है कि जब हमने अपनी यादें मशीनो को देदी हैं,
- 16:09–16:14तु क्या मान्विय आत्मा या उसका स्वव भी विखन्डद फोड़ा है.
- 16:14–16:18जब हमारी यादें मशीनो के पास है, तु हम वास्तम में कुन है.
- 16:18–16:20बहुती गेरा सवाल है.
- 16:20–16:22तो हम वास्तम में कुन है?
- 16:22–16:23बहुति गेरा सवाल है
- 16:23–16:25इसी विचारो तेजक प्रष्न के साथ
- 16:25–16:28इस गेहन चर्चा का समापन करते हैं
- 16:28–16:31तर्कों की कसोटी पर सत्तिको कसते रहीे
Plain text
तो इतिहास को दिखने का एक नजर्या ये भी हो सकता है, के सबसे बड़े युध, हत्यारों से नहीं, बलकी विचारों से लडे गये हैं. बलकुल सई बाते है. मतलब, तलवारों और तोपों से लडे युध तो सुफ दुन्यां के नक्षे बड़लते हैं, लिकिन तर्कों और्चन के यूध होते हैं वो हमारी पूरी सोच बडल देते हैं एक दम सही वो ये तैक रहे हैं के हम उस नक्षे को उस दून्या को और खुद अपने अस्तित्बो को कैसे समचते हैं और आजके हमारी एक गेरी चर्चा उआप आद बाद गर बाद बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बादग बा� इसके मत्ली अनुवाद के ज़र यह जिसे गजदर ताकृर ने अनुधित किया है. यह गरन्त अपने आप में एक ताईमशीन है. और हमारी इस चर्चा का जो मिशन है, यह नहीं है कि बस इक पुरानी किताप का सरावष दे दिया जाए. तो फिर आसल उदेश गया है? हमारा उदेश येश्छ न्याय वैशिषिक दर्षन और बोद दर्षन के भीचुए उस महा संग्राम को समजना है मतलब ये कोई आसी बहेस नहीं ती जो बस कुछ विद्वान ताईमपास के लिक रहे थे यह बवाँद बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा बवाशा ब� तो कुछ भी दावा कर देतें. तो ये समझना बहुत जरूडिये कि किसी भी विचार या सत्ते को तारकिख कसोटी पर कैसे जाचा जाता है. उदेना चारे का जो सोचने का तरीका है, वो हमें यही सिकहाता है. तु चल्लिएस महासंग्राम के पहले मुर्चे से शुर्वात करते हैं उं। सब से बून्यादी सवाल से जी क्या इस भूथक दून्या में चीजे टिकती हैं या सब कुछ शनिक हैं मतलब क्या कुछ स्ताए है भी ये दर्षन शास्त्र का बहुत ही गेरा और खादा है? दिमाग चक्रा देने वाल है. तोड़ा खोल कर देकते हैं से. बुडद दर्षन का एक विचार है. खषनिक वाद. जिसके आनूसार हर चीस के लग शन किलिए है. हाँ. बवददर्ष्निक बहुती मजबूती से यह मानते है, कि जो चीज इस पल है, वो आगले पल नश्थ होटी है. और उसकी जगा बिलकुल वैसी ही दिखने वाली एक नईई चीज जन लेती है. मतलब सब कोछे एक बहती हूँई नदी गी तर है. बिलकुल. जो दूर से देखने पर एक जैसी लकती है. लेके उसका पानी हर पल नया है. औरे बाप्रे. पहली बार सूनने में तो ये विचार थोडा अजीब लगता है. मतल, मैं सुच राता के अगर मैं खुर्सी पर बटा हूँ, तो वो खुर्सी कल भी वही ती और आज भी वही है, वो हर पल नहीं कैसे हो सकती है. यही तो बडद तरकों की ताकत है, जो हमारी आम समच को चुनोती देती है. उगर बीज नगी बोरी में बोया है बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज बज ब� तो वो बोरी में बेटके अंट़ार क्यों कर रहा है? एक दम सही पक्डे आप, बोध्दों का तरक है, कि कोई भी एक वस्तु, एक ही समैमे समर्त, यानी सक्षम और असमर्त, यानी अक्षम नहीं हो सकती. एक ही समामे दोनो चीजे कैसे हो सकती है? आ, तो अगर गुदाम का भीज असमरत है, और केट का भीज समरत है, तो इसका सीथा सा अरत है कि वि दोनो अलगलग है. जैसे ही भीज मिटी में जाता है, पुराना भीज नष्ट हो जाता है, और एक नया समरत भीज जन में लेता है. अहो! तच्व में, ये तरक तो बहुती टोस लगरा है. जब वो ये समर्थ और असमर्थ के तराजू पर तोलते हैं, तो शनिक वाद बलकुल तारकिक लगने लगने लकता है. है न? लेकिन एक मिनेद, अगर हम थोडा रुककर सोचें, तो क्या हम इसे आजकी उस पूटेंचल अनरजी की तरा नहीं देख सकते हैं मतल? आपके स्थान से जोड रहे हैं से जैसे मान लीजे मेरे हाप में जो समाथफों है उसकी बेट़्री पूरी सोप्रतिषट चाज है तीक है फोन में काम करने का और सक्रीन अंकरने का पूरा समर्थ मोजुद है लेकिन जब तक में पावावाबटन नहीं दबाता तब तक स्क्रीन अई अण नहीं होती तो क्या मैं ये कहुँँँँँ के कल जो फोन बन ता वो पुरी तरा अख्षम ता और आज जो फों चालू है, वो कोई नया फों है, फों तो वैई है ना, बस उसे त्रिगर करने वाला वो पावर बटन गाएप ठा. औरे वाए, ये बहुती सतीक आदूनिक तुलना है, और आपको शाए द यकीन नहो, लेकिन गयारवी सदी में उदैन अचारे ने बिलकुल यही बात कही ती सच में बिलकुल उनो ने समाथवों का उदारन तो नी दिया होगा नहीं उनो ने समाथवों नहीं कहा लेकिन उनक तरक बिलकुल यही ता उन्हो ने एक शनिक्वाद के अस्टर्क कुदवस्त करतेवे का, कि बीज में अंकुर पेडा करने का एक स्थाई सामर्ते हमेशा हुता है. मतलब गुदाम के बीज में भी वो सामर्ते है. बिलकुल. लेकिन स्थाईव सामर्त्योना काफी नहीं है. उसे हकीकत में बड़लने किले कुछ बाहरी कारनो के आविषकता होती है. जैसे मिटी, पानी, हवा, और सही तापमान? आजीने उदैना चारे सहकारी कारन या सहायक कारन कैते है. वो कैते है कि जब गुदाम में रखा बीज अंकुरत नहीं हो रहा, यह तो मतलब यह नहीं है कि वो भीजी कुछ रहा है बस उसे ट्रिगर करने ले कारन नी मिलें एक दम सही जैसे ही वो मिट्टी वो पानी मिलते है वही पुराना स्थाई भीज अपना काम कर देता है इसे ये सिथ दोता है कि वस्तूं खषनिक नहीं बल की स्थाए होती है बहत हुब ये तो एक बहत बडी वैचारिग जीथ होगग लेकिन जलिये अब समय के साथ वस्तुम के तिकने से थोडा अगे बडदते हैं एक और बड़ वड़ सवाल है कुन से सवाल ये कि क्या ये बाहरी दून्या वास्तव में है भी? ये ये सब सर्फ हमारे दिमाख का कोई ब्रम है? आज आप विग्यान्वाद और शून्यवाद की तरव जारे हैं. आज बवद्द्दर्म की कुछ शाक्ठा आएं याई तु मानती हैं कि केवल चेतना सत्ते हैं और ये बहारी दुनिया पूरी तना अवास तविक है ये विचार किसी साँईन्स फिक्ष्छन फिल्म जैसा लकता है जास या सब कुछ इक सिमूलेशन हो विग्यान वादी कैते है की जैसे हम सपने में चीजें देखते है और वो अस्ली लकते है वैसे ही ये जागती हुई दून्या भी दिमाग का एक प्रजेक्ष्छन है और शुन्यवाद तो इस से भी आगे जागता है की बाहरी दून्या भी लही है और चेतना भी नहीं है राँ, सब कुछ शुन्ने है तो उदैना चार ये इस बात का सामना कैसे करते हैं? गजेंद्र ताकृर के मेठली अनुवाद में एक बहुतिशान्दार और व्यंग्यात्मा कुदारन आना अच्टारन आच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अच्टारन अदेना चारे कहते हैं कि कलपना की जीए राज महल के दर्वाजे पर एक विशाल अस्ली हाती कड़ा है, रात का अंदेरा है, और वहाँ से एक मुरक व्यक्ती गुजरता है. और उसे अंदेरे में हाती साभ दिखाए नी देता. राज महल के दर्वाजे पर एक विशाल अस्ली हाती कड़ा है राथ का अंदेरा है और वहां से एक मुरक व्यकती गुजरता है और उसे अंदेरे में हाती साव दिखाए नी देता बलकल उदेना चार्या बहुती तीके वियंगय के सात कहते है, कि शुन्ने वादियों का हाल भी इसी मुर्क व्यक्ती जैसा है. मतलव उनहे वास्टविक्ता समजनी आरी तो उगे देते है, कि दून्या ही नहीं है. एक दम सही. तो वो वास्ट्विक्ता समज नहीं तो अग्यान्ता चुपाने के लिए शून्ने की गूश्ना कर देते हैं। ये तो सच में बहुती दिल्चस्प हैं। इतने जटिल दर्षन को उनो ने एक द्रिष्ष्य और हास्ट्विक्ता तो आप ज़ुपाने नहीं। वाज्ट्विक्ता समजनी आरी तो वो कह देते हैं कि दुन्या ही नहीं है। एक दम सही जब वाज्ट्विक्ता कि जटिल्ता नहीं समच बाते तो अग्यान्ता चुपाने के लिए शुन्ने कि गूशना कर देते है ये तो सच में बहुती दिल्चस्प है यह तो सच में बहुती दिल्चस्प है इतने जटिल दर्षन को उनो लें एक द्रिष्चे और हास्इके माद्दम से कैसे तोर दिया आप एक न वो सर्फ मजाक तक नहीं रुके उनो लें विग्यान वादियों के एक बहुत्ही गेरा नियम विज्यान वादियों के एक बहुत गेरा नियम, सह उपलंब नियम का भी तारके क्चन्दन किया. ये सह उपलंब नियम क्या है? तोड़ा सरल बाशा में समजगेंगी. इस का मतलव है कि जब हम किसी चीस को दिखते है, मान लीजी एक निला ग़ा है. तो हमे उस नीले गडे का ज्यान और वो गड़ा दोनो एक साथ मिलते है. ग्यान और वस्तू एक साथ? आँ तो विग्यान वादी कहते है कि चुकी तोनो हमेशा एक साथ अनुबहव होते है, इसका मतलब बहारी वस्टू का ज्यान से अलग कोई अस्तित्वव है ही नहीं ज्यान ही कुटको गड़े के रूप में दिखारा है अच्छा, लिकिन अगर मैं ज्यान को एक तोर्ज की रोष्नी की तरा मांगल। उंआप ख्याप यान चारे? मिरा मतलब है के जियान एक टर्च है, जो अंदेरे में रक्छीजों को दिखाता है. जब में रोशनी नीले गड़े पर डालता हूं, तो रोशनी और ग़ा, मुझे एक साती दिकते हैं. बिलक्कल. अग, बद्यानाचारे का तरक कुछ अज़ाए है? और वाज, आप दो बिल्कुल उनके तरक के दिल तक पहुज गय. उद्यानाचारे ने यही कहा कि ज्यान प्रकाषक है, यहनी इल्युमिनेटा वो बहारी सत्ति को प्रकाषित करता है, उसे बनाता नहीं है. प्रकाशक है, यानी इल्युमिनेटा वो बहारी सत्तिको प्रकाशित करता है, उसे बनाता नहीं है. वुझ, मतलब रोशनी डालने वाला? आप, जब हम किसी नीली चीस को देकते है, तो हम कहते है, यह नीला है. हम ये कभी नहीं कहते है कि मैं नीला हू. बलकुल सही बात है, ग्यान और ग्याता खुद को हमेशा वस्तू से अलग मानते हैं और अगर ये दुन्या सर्फ मेरे दिमाग का ब्रहम होती, तो हम सब एक ही दुन्या पर सेमत कैसे होते? बाहरी सत्यका अपना एक स्वतन्त्र वजूद है. तीक है. तो हमने ये मान लिया के दुन्या स्थाई है और वास्तविक है लेकिन इस सब के भीचे एक और बहुत एहम सवाल क्डा है वो अवलोकन करता यानी अबजरववाला सवाल आगर बहरी दुन्या वास्तविक है तो हमारे भीतर बेटे हूस मैं का क्या वो अवलोकन करता कोन है? यही पर बवद्धों का नेरात्मेवाद सामने आता है. जो केता है कि आत्मा जैसी कोई चीज है ही नहीं. तो फिर उनके हिसाब से हमारे अंदर क्या है? उनके अनुसार जिसे हम आत्मा कैते है, उसर्व चेत्ना की एक बहती हूए दारा है एक पल की चेत्ना पैदा होती है, तुस्रे को जन देती है, और कुद नश्थ होटी है कोई स्थाई मैं नहीं है लेकिन तु इस सब का असल मतलप क्या है अगर आत्मा है ही नहीं मैं सरफे कषनिक चीतना हूं तो कल मैंने जो अनबोफ की आउसे आज याज याज कुन रख रहा है? ये एक बहुत ही जायस सवाल है. मतलब अगर कोई स्थाए मैं है ही नहीं तो मान लिजे मैंने कल किसी से करज लिया तो आज उसे चुकाने की जिम्मेडारी मिरी कैसे हुई? कल का मैं तो मरचुका है? या कल के किसी बूरे कर्म की सजाम उजे आज क्यो मिलनी चाही है? विलकुल! ये तो समाज की पूरी नेटिक्ता और नयाई विवस्ता को ही क्योई क्योई क्योई कर देगा. उदेना चार्या ने इसी विवारेक सत्ते को अपना हत्यार बनाया उनहोंने कैसे कहन्दन की आजका? उनहोंने स्म्रती, यानी याद्दाश्ट, और प्रत्ट्य भिग्या, यानी रेकिगनिष्न, का उप्योग कर के एक स्थाई आत्मा को सिद्ध्धिया उगर चेतना हर पल नश्थ हो रहे है, तो नश्थ होगी चीस किसी नहीं चीस को अपनी यादे कैसे दे सकती है, इन सब अनबवो को पिरोने किलिए एक स्थाई दागा चाहीए, और वही दागा आत्मा है. बहुती तारकिक बात है, तो मैंसुस निक रहागता अगर चेतना हर पल नष्ट हो रही है, तो नष्ट होचो की चीस किसी नहीं चीस को अपनी यादे कैसे दे सकती है. इन सब अनबहवो को पिरोने किलिए एक स्थाई दागा चाहीए, और वही दागा आत्मा है. तरकिक बात है, लेकिन अगर आत्मा स्थाएई है, तो मोक्ष का वास्थवे करत क्या है? क्या मोक्ष का मतलब हमेशा रहने वाली खुषी है? आँ, नियाई दर्षन में मोक्ष को लेकर बहुत ही अनुथा विचार है. इसे वो अपवर्ग कहते है. उदैना चारे समजाते हैं के मोखष कोई हमेशा रहने वाली खूशी नहीं है. आऽ सा क्यो? सब लोग तो यही मानते न के मोखष मतलप परमानन्त? क्योंके खूशी महसुस करने के लिए आपके पाज शरीर, मन, और प्यद्वाग निजा हूनी चाही एं. और मोखश का तु मतलब है, जन्मा मरन के चक्रसे और इस शरीर से मुखती आप, शरीर तो नहीं रहेगा तु जब शरीर ही नहीं है, तु सुख्ख का अनबभव कैसे होगा इसले मोखश कोई खृषी नहीं, बलकी दुख की आत्यंतिक निव्रुत्ती है अट्यान्तिक निव्रुत्ती, मतलब दुखुका पूरी तरह से क्हतम हो जाना. बिल्कुल, अपसलुट् सेसेश्याशन अप्सट्ट्रिंग. वहां कोई लोकिक सुक्या दर्द नहीं होता. बस आत्मा अपने मुल निर्गुन रूप में परम्शान्ती में रहती है. बज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़� अगर आम इसे व्यापक संदरब से जोडग़ देखें, तो विदेशी करन का मतलब है, मुल बहाशा के कथण शब्डों को ज्यों का त्यों रखना, ताकि उनका दार्षनिक वजन कम ना हो. ज़से इस किताब में ने अपोहुवाद या अविनाबहाव ज़से मतलब उने विस्टानी रूपको में डाल दिया. बिलकुल. जैसे सत्ट्यो और ब्रम को रवक करने की प्रक्रिया को समजाने कि लिये उनो ने क्हरीहान का बहुत सुन्दर उप्योग किया है. क्हरीहान. मतलब जहाँ फसल से बूसी रवक की जाती है. एक्दम सही. जैसे किसान कहरीहान में दान से भूसी अलक करता है, वैसी ही दार्षनिक अपने तरको से सत्टिको ब्रम से अलक करता है. औरे वाज. ये तो थेट जमीनी उदारन है. इसे ये भी साभित होता है, कि मैतली या हमारी कोई भी शेत्रि भाशा केवल लोग गीतों तक सीमित नहीं है. बिलकुल. अगर अनुवादक सक्षम हो, तो ये बहाशाए गंभीर दाशनिक चिंतन की पुरी क्षमता रकती है. तो इस पुरी चर्चा को समझते हुए मैं यही कहोंगा, के आत्मतत्वे विवेग का ये विष्लेषन ना केवल प्राचीन भार्तिदर्षन की तारकिग गेराई को दिखाता है? बल की ये बी बताता है कि ज्यान को स्तानिया बाशाव में सुरक्षिद रक्छना कितना अवष्षेक है. मिलकल. उदेश़्ी बाज जो सीकने वाली है वो हे बोद्धिक इमान बारी आदेना चारी ने पहले अपने विरोदियों के तरको को निशपक्ष्ता से प्रस्थ॥ किया जिसे पूर्वबपक्ष कैते हैं अप फिर उनका खंडन किया यही आस्ली आलोचना अत्मक छिन्टन है सही कहा अप श्रोटाँ को सोचने के लिएक आखली विचार के साथ हम विदालेंगे उदैनाचारे ने सिद्ध किया ता की हमारी स्म्रती या मेमरी ही हमारी स्थाए आत्मा का सबसे बड़ा प्रमान है हम अपने कल को आज से जोड बाते हैं इसलिया हमारा अस्तितव है ये तो हम आभी चर्चा की लेकिन आजके इस दिज़िल योग में जर ज़ा सुचीए अईन्सान अपनी यादों तस्वीरो और जानकारियों को समाथफोन और कलाउट श्वोरज में अप्सोट्स कर रहा है तु सब आल ये है कि जब हमने अपनी यादें मशीनो को देदी हैं, तु क्या मान्विय आत्मा या उसका स्वव भी विखन्डद फोड़ा है. जब हमारी यादें मशीनो के पास है, तु हम वास्तम में कुन है. बहुती गेरा सवाल है. तो हम वास्तम में कुन है? बहुति गेरा सवाल है इसी विचारो तेजक प्रष्न के साथ इस गेहन चर्चा का समापन करते हैं तर्कों की कसोटी पर सत्तिको कसते रहीे