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न्यायकुसुमाञ्जलि_के_मैथिली_अनुवाद_पर_तार्किक_बहस.m4a
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- 0:00–0:29तो आज रहाज अब आपका समवात का केंद्र एक आँजा एतिहासिक गरन्त जिसने बारतीए दर्षन की पुरी दिशा ही तैकर दी, महान दाशनिक उद्यान आचार्ये की कालजेई रच्ना न्याय कुसुमान जली।
- 0:29–0:59अगर बाद्ये दर्शन लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बा
- 0:59–1:01तर्कों को अदिक प्रभाव्शाली बनाता है?
- 1:01–1:03जिसे हम अनुवाद विग्यान में
- 1:03–1:05दिनामिक एक्विवेलेंस
- 1:05–1:07या देशी करन कहते है
- 1:07–1:09बिल्कु या फिर तुस्री तरव
- 1:09–1:11क्या इस पूरी प्रक्रिया में
- 1:11–1:13गरन्त की जो सक्त तारकिक सन्रच्ना है
- 1:13–1:20तकनी की शब्दावली और बहुस्तर ये दार्षनिक सटिकता है, वो कमजोर पडजाती है।
- 1:20–1:23और यही आज की बहस का मूल बिन्दू है।
- 1:23–1:29तो मैं सपषकर दू, मेरा मानना है की गजेंद्र ताकृ के इस अनुवाद ने सहित्तिक सुन्दर्या
- 1:29–1:35और स्तानी या बाशा के प्रेोग से दर्षन की जटल क्रिती को सबपल्ता पुर्वक पुनर जीवित किया है
- 1:35–1:44और मैं अपना अनुवाद के सान्सक्रितिक महत्व को पुरी तरा स्विकार करते हुए भी इसके सन्रचनात्मक अर तकनी की पहलों को लेकर काफी चिनतित हूँ
- 1:59–2:05अगर देशी करन के देशी करन के सिद्डान्तो का बहुती शान्दार उप्योग किया है
- 2:05–2:10अच्छा आप देशी करन के उस प्रेोग की बात कर रहे है
- 2:10–2:13जाए शब्दू कुस्मानजली मात्र एक शूश्क क खनीतिये तार के गरन्त गरन्त नहीं है
- 2:13–2:23यहां अनुवादक ने युजी नाइडा के गत्यात्मक तुल्लेता और लोरेंस वेनुती के देशी करन के सिद्दान्तो का बहुती शान्दार उप्योग किया है
- 2:23–2:28अप देशी करन के उस प्रेजोग की बात कर रहे हैं
- 2:28–2:30जाए शब्दो को स्थानिया रहां दिया गया है
- 2:30–2:32आप बलकुल उदारन के लिए
- 2:32–2:36जब वे संसक्रित के गूष को मेठिली के गोट्फ में बडलते है
- 2:36–2:41या शश्रुंग यानी कहर गोष के सींग को
- 2:41–2:45खरहा कसीन कहते हैं, तो ये कोई सादारन बाशाई बडलाओ नहीं है।
- 2:45–2:47तो आपके ही साब से ये क्या है।
- 2:47–2:51ये इस महान गरन्त को उसके मुल जन्मिस्ठान,
- 2:51–2:55यानी मित्हला की मिट्टी, और उसकी बोद्दिक विरासत से वापेज जोडता है।
- 2:55–3:05तारकिक बहेस के भीच शान्तरस और भक्ती का ये जो सम्मिष्रन आना वो उस अथ्तिंत जटिल प्रमाण मिमान्सा को आजके पाटको के लिए सुगम और जीवन्त बनाता है.
- 3:05–3:10विशेशकर पाच्वे स्तवक में इश्वर सिद्दी के जो आत प्रमान दिये गे है,
- 3:10–3:13उने अनुवाद इक नई पाटक के लिए भी पुरी तरा सुलप कर देता है.
- 3:13–3:21दिक्हे, इस में तो कुई संदे हैं कि ये अनुवाद मित्ला के लिए एक बोद्धिक गर वाप्सी है.
- 3:35–3:38दिहासिक कद तो बहुत विशाल है, मैं सिंकार नहीं कर रा.
- 3:38–3:43बलकुल ये नव्यन न्याए दर्षन का वो प्रस्थान बिन्दू है,
- 3:43–3:48जहां से आगे चलकर गंगेश उपाद्ध्याय की तत्व चिंतामनी का मारक प्रष्ष्स्त होता है.
- 3:48–3:51आजे गरन्तो में तक्नीकी सतीकता,
- 3:51–3:54यानी जिसे हम फोमल एक्वेलेंज कहते है,
- 3:54–3:55वो सर्वो परी होनी चाहीे.
- 3:55–3:59लेकिन अगर फोमल एक्वेलेंज पात को उबाव बना दे तो?
- 3:59–4:01उबावोना एक �alagbaad है.
- 4:01–4:04लेकिन मूल सन्रचना को नष्ट करना �alag hai.
- 4:04–4:08मूल गरन्त की एक बहुत इस पष्ट दूईस तर्यसन्रच्ना है
- 4:08–4:13पहले कारिका, यानी पद्ध, या शलोग, और फिर उसका गद्ध्यविव्रन
- 4:13–4:16इस अनुवाद में मेरी सबसे बड़ी समस्या ये है
- 4:16–4:20कारिकाओ को गद्ध्य में पुरी तरहा विलीन कर दिया गया है
- 4:20–4:21अच्छा
- 4:21–4:23और सिर्फ इतना ही नहीं
- 4:23–4:24जो तीकस्तर है
- 4:24–4:26जो व्याख्या है
- 4:26–4:29उसे भी उसी प्रवाहमे जोड दिया गया है
- 4:29–4:30नतीजा ये हूए
- 4:30–4:33कि मूल लेक्ख उदेनाचारे की आवाज
- 4:33–4:35भाश्वेकार की आवाज
- 4:35–4:37और आदूनिक अनुवादक की आवाज
- 4:37–4:40आपस में पूरी तरह गूल मिल गई हैं.
- 4:40–4:44पर मेरा सवाल यह कि ख्या ये गूलना मिलना वास्तप में कोई नुक्सान है?
- 4:44–4:47एक गंवेर अकाद में ग्रन्त के लिए है, बिल्कुल है.
- 4:47–4:51दिखे, जो श्रोता नव्व न्याय की बारी कियों से वाखिफ नहीं है,
- 4:51–4:55उनके लिए मैं बतादूं कि यह दर्षन अपने आप में इतना जटिल है,
- 4:55–4:58कि अगर इसे एकदम रुके तरीके से प्रस्थ॥ किया जाए,
- 4:58–5:01तो आम पाथक पहले पनने पही हार मान लेगा.
- 5:01–5:03मैं इस बात पर जोर देना चाूंगा,
- 5:03–5:06कि तर्क्शास्त्र में साहित्तिक सुंदरे कुई बादा नहीं है?
- 5:06–5:09बादा नहीं है, लिकिन वो मुख्खे उदेश्छे भी तो नहीं है ना?
- 5:09–5:10नहीं!
- 5:10–5:13वो पाट को समजने में व्रिद्धिए करता है.
- 5:13–5:16अनूवाद में मंगला चरन के सलेष को ही देक लिजिये.
- 5:16–5:22दूई आर्थी शब्दों का प्रेज़, अनुवादक ने इसे ब्दो अलग अलग अनुच्छेदो में बाद कर स्पष्ट किया है,
- 5:22–5:27एक हिस्ट्सा फुल के अर्थ में, और दुस्रा न्याई सिद्दान के अर्थ में,
- 5:27–5:30यह वक्रोक्ती और दूनी को सुरक्षित रकता है.
- 5:46–5:49वक्रुक्ति अज़न्दरे अपनी जगा बहुत महत्तोपून है,
- 5:49–5:52लेगिन दर्शन की एक विद्धे आर्थि के रूप मुझे
- 5:52–5:53इस पद्दती से बारी आपती है,
- 5:53–5:57आपने शलेष को दो बहगो में बाटनेगा जो उदारन दिया ना,
- 5:57–6:02जब इस पदती से बारी आपती है, आपने शलेश को दो बागो में बाटनेगा जो उदारन दिया ना,
- 6:02–6:06वो दर असल दूवनी की हत्या कर उसे वाच बना देना है.
- 6:06–6:09रद्या? ये तो बहत कडाशव दिस्तेमाल कर रही है आप.
- 6:09–6:21अप ख़ा है, कुई प्रभाव भी वैसा ही है, बारतिय काविशास्त्र में द्वनी का अर्थी है कि अर्थ चिपा हूँ और पाटक उसे अपनी बुद्दी से उदगार्टित करे,
- 6:21–6:27यह किसी कविता के चिपे हुए अर्थ को गन्द के फोमले की तरा ब्लाकबोड़ पर लिख देने जैसा है.
- 6:27–6:31जब आप उसे दो गलग अनुच्छेडो में खोल कर रख देते है,
- 6:31–6:33तो वो पकी पकाए सामगरी बन जाती है.
- 6:33–6:38इसे रहेस्या और पाटक की अपनी भोदिक खोज का अनन्द चिन जाता है.
- 6:38–6:44तो क्या आप ये कह रही है, कि अनवादक को जान भूज कर अर्थ को अस्पष्ट चोर देना चाही था,
- 6:44–6:46ताकी पाटक संगर्ष करता रहे?
- 6:46–6:48अपकी मुल सन्रच्ना के प्रती इमान्दार
- 6:48–6:50मैंआपको एक अड़ारन से समजाती हूँ।
- 6:50–6:52जब हम पाच्वेस तबक में
- 6:52–6:54कार्यात्वात हेतू की बात करते है।
- 6:54–6:56यानी वो कोसमोलोगिकल तरक
- 6:56–6:58जो कहता है
- 6:58–7:00की एब्रहमान्द एक कारे है
- 7:00–7:04जो कहता है, कि ये ब्रहमान्द एक कारे है, और हर कारे का एक करता होता है.
- 7:04–7:06इसलिये इश्वर का अस्तित्वा है.
- 7:06–7:10आज, जो न्याय दर्षन का एक बहुत ही महतुपून तर्क है.
- 7:10–7:10बलकुल!
- 7:10–7:13और इस तरक की स्थापना न्याए दर्षन के
- 7:13–7:15जिस व्याप्ती सिद्दान्पट्टिकी है
- 7:15–7:17वो एक गड़ितिय सम्ही करन की तर है सतीक है.
- 7:18–7:20जहां दूवा है, वहां आग है.
- 7:20–7:22यह एक सार्व भहुमिक नियम है.
- 7:23–7:23उद्यान आचारे,
- 7:23–7:26जब इस तारकिक सन्रच्ना का निरमान कर रहे हैं
- 7:26–7:29तो वहा अवे कावियात्मक सपष्टी करन की नहीं
- 7:29–7:32बलकी उसी तारकिक कठोरता की आवश्शकता होती है
- 7:32–7:34मैं आप की बाद समज रहा हूं
- 7:34–7:37लेकिन बास एक सेकिन जब आप आमुर्थ तरको के भीज
- 7:37–7:40अद्तिदिक काव्यात्मक द्रिष्टान्तो को भारते है,
- 7:40–7:43तो पाथक का द्यान मोल तारकिक सिलोजिसम से बखतकर,
- 7:43–7:45साहितिक सुन्दरे की और सला जाता है.
- 7:45–7:48क्या ये स्पष्टी करन नयाय कि कथोर प्रमानो से
- 7:48–7:50पाथक का द्यान बखतकाता नहीं है?
- 7:50–7:53दर्शन में सुन्दरे एक बाई प्रड़क्त हो सकता है,
- 7:53–7:55लेकिन वह मुख्य लक्ष्य कभी नहीं हो सकता.
- 7:55–7:59मैं समज रहूँ, कि आप सथिक्ता को लेकर चिन्तित है,
- 7:59–8:02लेकिन जो बात आप को तर्ख से द्यान बखतकाने लग्रे है,
- 8:02–8:07वो वास्तव में अनुवाद को एक जीवन्त रूप देने का तरीका है.
- 8:07–8:11अगर हम मिक्हािल बाक्तिन की बहुस्वरता के सिद्धान्त को यहां लागू करें,
- 8:11–8:13तो चीजिये बहुत सपष्ट हो जाती है.
- 8:13–8:15बहुस्वरता किस संदर्प में?
- 8:15–8:20इस संदरभ में की न्याए कुसुमाअजली कोई एक तरफा एकालाप नहीं
- 8:20–8:24इस में चारवाग बोल रहा है, बोद्धों का अक्षनिक वाद बोल रहा है
- 8:24–8:30और मीमान्सकों का अन्विता भिदान वाद भी अपनी पूरी तारकिक शकती के सात मोईजुद है
- 8:30–8:37अनुवादक ने जब पूरोप अख्शों को प्रस्थूट किया है, तो नहों ने मैठली वाके विन्न्यास का बहुट चतुराई से प्रेुख किया है.
- 8:37–8:40अच्छ ज़े से वो स्थानिया व्याकरन का इस्तमाल?
- 8:40–8:46अच्छ जे से जजद, तं, मतलब यदी, तो, कप्रेुग.
- 9:00–9:09आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदी के उदेनाचारे का खष्टिज एक आदहनेक मेठल पाटक के खष्टिज से एक दम सहजता से मिल रहा है.
- 9:09–9:18देखे आपकी ये बाद सम्मोहक है के अनुवाद में बूद्धे कि मानदारी के तहत सम्वाद की शेली को जीवन्त रखा गया है.
- 9:18–9:25बाख्तन की भूस्वर्ता का यो प्योख सरानिया है की चार्वाग और बूद्धों के तरकों को कमजोर कर के नहीं,
- 9:25–9:55अरे लेकिन आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 9:55–10:25अदूनेक शब्डों का बहारी हैं यह ज़ादिए था अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अ�
- 10:25–10:55गयरवी सदी के उदयना चार्यए काून्तर पक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 10:55–10:57कुई कि जब आप मूल्ष लोकों को गायब कर देते हैं,
- 10:58–11:01तो आप दर असल पाटक से वब पैमाना चीन लेते हैं,
- 11:01–11:04जिस से वब अनुवाद की सत्तिनिष्था को माप सके.
- 11:04–11:06यही पर हमें ये तैकरना हुगा,
- 11:06–11:36कि किसी भी अनुवाद का अंतिम उद्टिष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष
- 11:36–11:37अर कलाबी
- 11:38–11:41उदेना चार्रे की प्रमान मीमान्सा इतनी सगन है
- 11:41–11:44कि बिना किसी सहारे के आम पाथक उस में कोजाएगा
- 11:45–11:46तो क्या आम पाथक के लिए
- 11:46–11:49विषे को सरल बनाने के आम पर
- 11:49–11:52हम ग्रन्त की धाचागत अख्डन्दता समजोता कर लें?
- 11:52–11:54मैं इसे समजोता नहीं
- 11:54–11:56बल की एक ज़ोरी पुल बनाना कहुंगा.
- 11:56–12:01चल ये, मैं उदेना चार्य की प्रमान मीमान्सा का ही एक विषिछ्ट उदारन लेता हूं.
- 12:02–12:07प्रभाकर मीमान्सक, अर्ठापती और अनुप लबदी को स्वतन्त्र प्रमान मान्ते है.
- 12:07–12:09आप प्रभाकर मत का ये मुख्धिबिन्दू है
- 12:09–12:10बलकुल
- 12:10–12:12अब उदेना चार्ये
- 12:12–12:15एक बहुत्ही लंदी और जटिल तारकिक प्रक्रिया कि तहत
- 12:15–12:17इन दोनो का क्हन्दन करते हैं
- 12:17–12:21और इने केवल अनुमान या प्रत्त्ख्ष में समाहित कर देते हैं
- 12:21–12:27मूल संसक्रित पाट में या पूरी भहस एक अंतहीन भूल भूलईया जैसी लकती है,
- 12:27–12:31जाहा ये समजना मुषकिल हो जाता है कुन सा पक्ष तरक दे रहा है?
- 12:31–12:34पाट जतिल तो है
- 12:34–12:39अप इसे आपिसे समजें, जैसे किसी गनी भूलबूलया में जगे-जगे मील के पत्धर लगा दिये गयों?
- 12:39–12:40अच्छा
- 12:40–12:49इन मील के पत्टरों से नया पाटख भी चारवाग के अग्रहन, सिद्धान्त या मीमान्सकों के ग्यातागों के खंडन को बिना बधके समथ सकता है.
- 12:49–12:54क्या दर्षन को इस तरह से लोक तान्तरिक बनाना अनवादक की सबसे बढ़ी सपल्सा नहीं है?
- 12:54–12:59देखे ब्ल बुलगया में मील के पत्टर लगाना निष्चित रूप से अच्छा है
- 12:59–13:01पाथख कुराह दिखाना जरूरी है
- 13:01–13:04और उप्शीशकों का मैं भी समर्ठन करती हूं
- 13:04–13:09लेकिन मेरी आपती, तेक्स्ट्ट्रान्स्पेरेंसी के उलंगन को लेकर है
- 13:09–13:14तेक्ष्छौल त्रान्स्परेर्श्टी, मत्लब आप फिर से उसी कथोर दाची की बात कर रही है?
- 13:14–13:15क्योंकि वा आवश्षक है?
- 13:15–13:20बार्तिय बाश्ष परमपरा की अपनी एक अप यह तिहासिक मर्यादा रही है,
- 13:20–13:24हमारे यहां गयान का विकास एक रेखिय क्रम में हुए है.
- 13:24–13:27सब से पहले सुत्र या कारिका,
- 13:27–13:29उसके बाद उस पर लिखागया बाश्च्छ
- 13:29–13:32और अंत में उस भाश्च्छ पर लिखिगगय तीका.
- 13:32–13:34ये तीनो अलग �alak स्तर हैं,
- 13:34–13:37जो सद्यों के बड़्दिक विकास को दर्षाते हैं
- 13:37–13:41जब आप इन सभी स्भी स्दरों को एक ही फांट में
- 13:41–13:44एक ही निरबाद गद्द प्रवाह में मिला देते हैं
- 13:44–13:48तो वो पाट इतिहास विheen हो जाता है
- 13:48–13:51लेकिन आम पातख को इस अटिहासिक स्तरी करन्सि क्या लेना देना है?
- 13:51–13:54उसे तो मुख्ध्य विचार अद तर्क से मतलब है ना?
- 13:54–13:58लेना देना है, क्योंकि दर्षन में ये बहुत माइने रकता है,
- 13:58–14:02के कुन्सी बात किस काल खंड में और किस संदरव में कही गई?
- 14:02–14:07एक गंभीर दार्ष्नि कनूवाद कम से कम चार स्पष्ट स्थरो में होना चाहीए.
- 14:08–14:10पहला मूल संसक्रित कारे का.
- 14:11–14:13तुस्रा उसका एक दम शाभ्दि कनूवाद.
- 14:14–14:17तुस्रा अनूवादक की अपनी विस्त्रत व्याख्या
- 14:18–14:20और चोथा संपादकी ए तिक्निया
- 14:20–14:23अदूनिक शब्दों का अच्टित्य बताया गया हो.
- 14:23–14:25ये तो पुरी एक फीसिस बन जाएगी?
- 14:25–14:26जो की ये है.
- 14:26–14:29जब आप इन रेखाँ को पुरी तरा मिता देते हैं,
- 14:29–14:32तो ये महां गरन्त एक विषुद शोद संदरप के बजाए,
- 14:32–14:36स्रफ एक परी चयात्मक पाट्खे पुस्तक बनके रहे जाता है
- 14:36–14:38आपने अन्विता भिदान्वाद का जिक्रि किया
- 14:39–14:42अब इस विषेः पर उदायना चारे के शब्द काहा खत्म होते हैं
- 14:42–14:45और अनुवादक की अपनी समझ कहा से शुरू होती है
- 14:45–14:50ये सपष्ट हुना ही चाहीए, दर्षन शास्टर में भाल की खाल निकाली जाती है,
- 14:50–14:53वहां लगभग या करीप-करीप से काम नहीं चलता.
- 14:53–14:57दिखे, जब हम अनुवाद में, टेक्स्छुल ट्रन्स्परन्सी
- 14:57–14:59या मूल पाट की कठोरता बनाई रकने की,
- 14:59–15:04बवाड़ा बवाड़ करते हैं तो जाने अन जाने हम उस पाट को इतना भोजिल बना देते हैं
- 15:04–15:06कि कोई उसे परता ही नहीं?
- 15:06–15:08अकादमिक शुद्धा की ये जिद
- 15:08–15:12अकसर महान गरन्तो को पुस्तकाले की आलमारियो में दूल फाकने गे ले चोर जेती हैं
- 15:12–15:15तो क्या लोग प्रियता के लिए प्रामानिक्ता की बली देदी जाए?
- 15:15–15:16बली नहीं!
- 15:16–15:18गजेंद्र ताकृर का ये अनुवाद,
- 15:18–15:20इस बात का जीता जाक्ता प्रमान है,
- 15:20–15:24कि यदि आप फोरमल एक्विवेलन्स को थोडा शितल करते है,
- 15:24–15:29तो आप न्याई दर्षन जैसी अछ्ट्यंत जटूल वस्तू को भी आदूनिक समाज में जीवंद कर सकते हैं.
- 15:29–15:31पर किस कीमद पर?
- 15:31–15:35उस कीमद पर जो समवाद स्तापित करने के लिए चुकानी परती है.
- 15:35–15:38जब पाच्मे स्तबक में आयोजनात का तर काता है.
- 15:38–15:47यानी की ब्रमान्द के जो निषक्रिय परमाडू है, वे अपने आप सयोजित नहीं हो सकते, उने एक दिशा देने वाले चेतन करता की आवश्षकता होती है.
- 15:47–15:51तो इस तर्क को अनुवादक ने जिस प्रवाहमाई मैठली में प्रस्त॥ किया है,
- 15:51–15:56वा पाथक को तरक की सीटियों पर बिना किसी मानसिक जटके के उपर लेजाता है.
- 15:56–15:59ये अनुवाद अप सर्फे कनुवाद नहीं रहे गया है.
- 15:59–16:03ये अपने आप में एक रचनात्मक साहित्ते बन गया है.
- 16:03–16:09अद थीक इसी रचनात्मक साहित्ते वाले हिस्से से ही मैं सब से अदिक आशंकित हूँ.
- 16:09–16:15न्याय कुसुमानजली कोई उपन्यास या महाकावे नहीं है, ये एक कतोर प्रमान शास्त्र है.
- 16:15–16:45बद्दियानादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा�
- 16:45–16:47वो बाँबाशिक शब्डो को बरकरार रखा है.
- 16:47–16:48आप, वो तो है.
- 16:48–16:52लेकिन कारिकाओ को पूरी तरा रदा देना एक बहुत बडी कीमत है.
- 16:52–16:56सुची ए, अगर मुझे कल को ये शोद करना हो,
- 16:56–16:59की उदैना चार्या ने शबद और आर्द की समबंद पर
- 16:59–17:02तीक किन संस्क्रिट शब्डों का प्रुवक या था,
- 17:02–17:06तो मैं इस मैठली अनुवाद पर पुरी तरा ब्रोसा नहीं कर सकती.
- 17:06–17:09मुझे वापस मुल संस्क्रिट गरन्द की तरफी बागना पड़ेगा.
- 17:09–17:13कुकि मुझे नहीं पता कि अनुवाद की प्रवाहा मैंई भाशा के पीछे
- 17:13–17:16मूल कारिका का सतीक सवरूप क्या था?
- 17:16–17:19आपकी बाद का एक अकादमिक वजन है.
- 17:19–17:21मैं से भिलकुल नकार नहीं रहा हूँ.
- 17:21–17:24लिकि मुझे लखता है कि इस पूरी बहेस का केंद्र ये है
- 17:24–17:28कि ये अनवाद किस पाटक्वरग को लक्षिट कर रहा है?
- 17:28–17:35अन्ततह इस अनवाद का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपून सार यहे है,
- 17:35–17:42कि यहे मित्ला की महान दार्षनिक विरासत की एक अथ्तिंत सबھल भोद्दिक गर वापसी है.
- 17:42–17:45तक्नीकी शब्डों का सन्रक्षन करते हुए
- 17:45–17:49संस्क्रितिक और स्थानिया भाशा के मुहावरों का प्रयोग
- 17:49–17:53यह सिद करता है कि उच्टमस्तर का दार्षनिक विमर्ष
- 17:53–17:55केवल शास्त्रिये संस्क्रितिया आजके
- 17:55–17:59अग्रेजी अकाद्मिक दाईरों तक सीमित रहने के लिए अबिशव्प्त नहीं है
- 17:59–18:01ये बात तो सच है
- 18:01–18:06इसे हमारी आदूनिक शेत्रीया भाशाँ मे भी उतनी ही गेराए
- 18:06–18:10सुन्दर्या और प्रभाव के सात समप्रेषित किया जासकता है
- 18:10–18:17यह है अन्वाद अन्वाद सिद्धानत में देशी करन की सकती का एक अतिहासिक प्रमान है
- 18:17–18:21मैं आपके इस संसक्रितिक निष्कर्स से पुरी तरह सेमत हूँ
- 18:21–18:26अपनी मात्र भाशा में अजे गुड यान का आना हमेशा स्वागत योगे है
- 18:26–18:31अर यह एक शेत्री ये बाशाँ के बड़िक विकास के लिए बहुत आवश्वेग भी है.
- 18:31–18:32जी.
- 18:32–18:36फिर भी एक शुद्र दाशनिक और अकादमिक द्र्ष्टिकों से
- 18:36–18:38मेरे विचारों का साराव्च यही है,
- 18:38–18:42की सन्रच्नात्मक पार्दर्षिता संज़ोता नहीं किया जासकता.
- 18:42–18:47न्याय जेसे विशुद्द तरक शास्त्र के लिए, मूल पाट की सीमा,
- 18:47–18:52श्लोकों की उपस्तिती, और आदूनिक सम्पादकी यव्याख्यां के भीज,
- 18:52–18:55एक स्पष्ट और अभेद दिरेखा होनी ही चाहीए.
- 18:55–18:59अनुवादक का काम पाट को सुन्दर बनाना हो सकता है,
- 18:59–19:04लेकिन उसका पहला दरम मूल लेखख के प्रती जवाब दे है.
- 19:04–19:07तो आप केरियें कि अनुवादख को अद्रिश्छे हूना चाहीए.
- 19:07–19:09हाँ, काफी हत्तक.
- 19:09–19:12अनुवादख को एक पार दर्षी काच की तरा हूना चाहीए,
- 19:12–19:16जिसके आर्पार मूल लेखष्पष्ट दिखाई दे,
- 19:16–19:18ना की एक रंगीन शीषे की तरा,
- 19:18–19:20जो प्रकाश को सुन्दर तो बनाता है,
- 19:20–19:23लेकिन मूल वस्तू का आस्ली रंगी बडल देता है.
- 19:23–19:26यदिवर एक्धा स्पष्ट नहीं है,
- 19:26–19:29तो पाट चाहे कितना भी सुंदर क्यो नहो,
- 19:29–19:31वह एक गंभीर शोदारती के लिए
- 19:31–19:33अपनी प्रामानिक्ता को देता है.
- 19:33–19:35पर शाइद यही वो गेरा तनाव है,
- 19:35–19:38जो यस मेठली अनुवाद को यतना चर्चा की योग्य बनाता है.
- 19:38–19:40यह हमें सूचने पर मजबोर करता है,
- 19:40–19:42कि अनवाद का अंतिम दर्म क्या है?
- 19:42–19:44क्या वो किसी प्राषीन मंदर के मुल
- 19:44–19:46कुर्दरे पट्फरों को जसका
- 19:46–19:48तस सहेज कर रखने में है
- 19:48–19:50ताकि इतिहास कार उसकी प्राषीन्ता का दिशन कर सकें
- 19:50–19:52जैसा कि आप
- 19:52–19:54फोर्मालिक्विवलिन्स में चाती है
- 19:54–19:55बलकोल
- 19:55–20:01या फिर उस मन्दिर को रंग रोगन करके उसे आजके लोगों के लिए तना जीवन्त बनाने में है
- 20:01–20:05कि बि वहां आखर जुड सकें, जैसा की डानमेक इक्विवलिंस करता है
- 20:05–20:10न्याय कुस्मानजली तरक और दर्षन का एक अझसा सगन उप्वन है
- 20:10–20:13जिस में गेराई से उतरने पर हर बार नई अर्थ खुलते हैं
- 20:13–20:14सही कहा
- 20:14–20:17और इसकी व्याख्या के भी कई तरीके हो सकते हैं
- 20:17–20:18एक दम सही
- 20:18–20:21ये पुरी तरा से हमारे श्रोताउंपर निरभर करता है
- 20:21–20:25कि वो इस अनुवाद में सुगमता, साहितिक, सुंदर्य
- 20:25–20:28अर उस जीवन्त बहुश्वर्ता को प्रात्मिक्ता देते हैं
- 20:28–20:30जो उने दर्शन के करीब लाती है
- 20:30–20:32या फिर उसकी मुल सन्रचनात्मक
- 20:32–20:35तारकी कत्होरता और पाट्धगत पार्दर्षिता को
- 20:35–20:38जो अकाद्मिक सतिनिष्ठा किली जरूरी है
- 20:38–20:43इस कालजेई दाशनिक सामगरी में आभी और भी बहुत कुछ है जिसे खोजा जाना बाखी है.
- 20:43–20:49आजकी हमारी चर्चा से ये सपष्ट है कि अनुवाद कभी एक यान्तरिक प्रक्रिया नहीं होती,
- 20:49–20:58बलकी यह दो युगो, दो भाशाँ और दो गल गल बध्धिक शितियो के बीच का एक भेहद, समवेदनशील और जटिल समबाद है. विचार करते रहीए.
Plain text
तो आज रहाज अब आपका समवात का केंद्र एक आँजा एतिहासिक गरन्त जिसने बारतीए दर्षन की पुरी दिशा ही तैकर दी, महान दाशनिक उद्यान आचार्ये की कालजेई रच्ना न्याय कुसुमान जली। अगर बाद्ये दर्शन लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बाद्ये लिए बा तर्कों को अदिक प्रभाव्शाली बनाता है? जिसे हम अनुवाद विग्यान में दिनामिक एक्विवेलेंस या देशी करन कहते है बिल्कु या फिर तुस्री तरव क्या इस पूरी प्रक्रिया में गरन्त की जो सक्त तारकिक सन्रच्ना है तकनी की शब्दावली और बहुस्तर ये दार्षनिक सटिकता है, वो कमजोर पडजाती है। और यही आज की बहस का मूल बिन्दू है। तो मैं सपषकर दू, मेरा मानना है की गजेंद्र ताकृ के इस अनुवाद ने सहित्तिक सुन्दर्या और स्तानी या बाशा के प्रेोग से दर्षन की जटल क्रिती को सबपल्ता पुर्वक पुनर जीवित किया है और मैं अपना अनुवाद के सान्सक्रितिक महत्व को पुरी तरा स्विकार करते हुए भी इसके सन्रचनात्मक अर तकनी की पहलों को लेकर काफी चिनतित हूँ अगर देशी करन के देशी करन के सिद्डान्तो का बहुती शान्दार उप्योग किया है अच्छा आप देशी करन के उस प्रेोग की बात कर रहे है जाए शब्दू कुस्मानजली मात्र एक शूश्क क खनीतिये तार के गरन्त गरन्त नहीं है यहां अनुवादक ने युजी नाइडा के गत्यात्मक तुल्लेता और लोरेंस वेनुती के देशी करन के सिद्दान्तो का बहुती शान्दार उप्योग किया है अप देशी करन के उस प्रेजोग की बात कर रहे हैं जाए शब्दो को स्थानिया रहां दिया गया है आप बलकुल उदारन के लिए जब वे संसक्रित के गूष को मेठिली के गोट्फ में बडलते है या शश्रुंग यानी कहर गोष के सींग को खरहा कसीन कहते हैं, तो ये कोई सादारन बाशाई बडलाओ नहीं है। तो आपके ही साब से ये क्या है। ये इस महान गरन्त को उसके मुल जन्मिस्ठान, यानी मित्हला की मिट्टी, और उसकी बोद्दिक विरासत से वापेज जोडता है। तारकिक बहेस के भीच शान्तरस और भक्ती का ये जो सम्मिष्रन आना वो उस अथ्तिंत जटिल प्रमाण मिमान्सा को आजके पाटको के लिए सुगम और जीवन्त बनाता है. विशेशकर पाच्वे स्तवक में इश्वर सिद्दी के जो आत प्रमान दिये गे है, उने अनुवाद इक नई पाटक के लिए भी पुरी तरा सुलप कर देता है. दिक्हे, इस में तो कुई संदे हैं कि ये अनुवाद मित्ला के लिए एक बोद्धिक गर वाप्सी है. दिहासिक कद तो बहुत विशाल है, मैं सिंकार नहीं कर रा. बलकुल ये नव्यन न्याए दर्षन का वो प्रस्थान बिन्दू है, जहां से आगे चलकर गंगेश उपाद्ध्याय की तत्व चिंतामनी का मारक प्रष्ष्स्त होता है. आजे गरन्तो में तक्नीकी सतीकता, यानी जिसे हम फोमल एक्वेलेंज कहते है, वो सर्वो परी होनी चाहीे. लेकिन अगर फोमल एक्वेलेंज पात को उबाव बना दे तो? उबावोना एक �alagbaad है. लेकिन मूल सन्रचना को नष्ट करना �alag hai. मूल गरन्त की एक बहुत इस पष्ट दूईस तर्यसन्रच्ना है पहले कारिका, यानी पद्ध, या शलोग, और फिर उसका गद्ध्यविव्रन इस अनुवाद में मेरी सबसे बड़ी समस्या ये है कारिकाओ को गद्ध्य में पुरी तरहा विलीन कर दिया गया है अच्छा और सिर्फ इतना ही नहीं जो तीकस्तर है जो व्याख्या है उसे भी उसी प्रवाहमे जोड दिया गया है नतीजा ये हूए कि मूल लेक्ख उदेनाचारे की आवाज भाश्वेकार की आवाज और आदूनिक अनुवादक की आवाज आपस में पूरी तरह गूल मिल गई हैं. पर मेरा सवाल यह कि ख्या ये गूलना मिलना वास्तप में कोई नुक्सान है? एक गंवेर अकाद में ग्रन्त के लिए है, बिल्कुल है. दिखे, जो श्रोता नव्व न्याय की बारी कियों से वाखिफ नहीं है, उनके लिए मैं बतादूं कि यह दर्षन अपने आप में इतना जटिल है, कि अगर इसे एकदम रुके तरीके से प्रस्थ॥ किया जाए, तो आम पाथक पहले पनने पही हार मान लेगा. मैं इस बात पर जोर देना चाूंगा, कि तर्क्शास्त्र में साहित्तिक सुंदरे कुई बादा नहीं है? बादा नहीं है, लिकिन वो मुख्खे उदेश्छे भी तो नहीं है ना? नहीं! वो पाट को समजने में व्रिद्धिए करता है. अनूवाद में मंगला चरन के सलेष को ही देक लिजिये. दूई आर्थी शब्दों का प्रेज़, अनुवादक ने इसे ब्दो अलग अलग अनुच्छेदो में बाद कर स्पष्ट किया है, एक हिस्ट्सा फुल के अर्थ में, और दुस्रा न्याई सिद्दान के अर्थ में, यह वक्रोक्ती और दूनी को सुरक्षित रकता है. वक्रुक्ति अज़न्दरे अपनी जगा बहुत महत्तोपून है, लेगिन दर्शन की एक विद्धे आर्थि के रूप मुझे इस पद्दती से बारी आपती है, आपने शलेष को दो बहगो में बाटनेगा जो उदारन दिया ना, जब इस पदती से बारी आपती है, आपने शलेश को दो बागो में बाटनेगा जो उदारन दिया ना, वो दर असल दूवनी की हत्या कर उसे वाच बना देना है. रद्या? ये तो बहत कडाशव दिस्तेमाल कर रही है आप. अप ख़ा है, कुई प्रभाव भी वैसा ही है, बारतिय काविशास्त्र में द्वनी का अर्थी है कि अर्थ चिपा हूँ और पाटक उसे अपनी बुद्दी से उदगार्टित करे, यह किसी कविता के चिपे हुए अर्थ को गन्द के फोमले की तरा ब्लाकबोड़ पर लिख देने जैसा है. जब आप उसे दो गलग अनुच्छेडो में खोल कर रख देते है, तो वो पकी पकाए सामगरी बन जाती है. इसे रहेस्या और पाटक की अपनी भोदिक खोज का अनन्द चिन जाता है. तो क्या आप ये कह रही है, कि अनवादक को जान भूज कर अर्थ को अस्पष्ट चोर देना चाही था, ताकी पाटक संगर्ष करता रहे? अपकी मुल सन्रच्ना के प्रती इमान्दार मैंआपको एक अड़ारन से समजाती हूँ। जब हम पाच्वेस तबक में कार्यात्वात हेतू की बात करते है। यानी वो कोसमोलोगिकल तरक जो कहता है की एब्रहमान्द एक कारे है जो कहता है, कि ये ब्रहमान्द एक कारे है, और हर कारे का एक करता होता है. इसलिये इश्वर का अस्तित्वा है. आज, जो न्याय दर्षन का एक बहुत ही महतुपून तर्क है. बलकुल! और इस तरक की स्थापना न्याए दर्षन के जिस व्याप्ती सिद्दान्पट्टिकी है वो एक गड़ितिय सम्ही करन की तर है सतीक है. जहां दूवा है, वहां आग है. यह एक सार्व भहुमिक नियम है. उद्यान आचारे, जब इस तारकिक सन्रच्ना का निरमान कर रहे हैं तो वहा अवे कावियात्मक सपष्टी करन की नहीं बलकी उसी तारकिक कठोरता की आवश्शकता होती है मैं आप की बाद समज रहा हूं लेकिन बास एक सेकिन जब आप आमुर्थ तरको के भीज अद्तिदिक काव्यात्मक द्रिष्टान्तो को भारते है, तो पाथक का द्यान मोल तारकिक सिलोजिसम से बखतकर, साहितिक सुन्दरे की और सला जाता है. क्या ये स्पष्टी करन नयाय कि कथोर प्रमानो से पाथक का द्यान बखतकाता नहीं है? दर्शन में सुन्दरे एक बाई प्रड़क्त हो सकता है, लेकिन वह मुख्य लक्ष्य कभी नहीं हो सकता. मैं समज रहूँ, कि आप सथिक्ता को लेकर चिन्तित है, लेकिन जो बात आप को तर्ख से द्यान बखतकाने लग्रे है, वो वास्तव में अनुवाद को एक जीवन्त रूप देने का तरीका है. अगर हम मिक्हािल बाक्तिन की बहुस्वरता के सिद्धान्त को यहां लागू करें, तो चीजिये बहुत सपष्ट हो जाती है. बहुस्वरता किस संदर्प में? इस संदरभ में की न्याए कुसुमाअजली कोई एक तरफा एकालाप नहीं इस में चारवाग बोल रहा है, बोद्धों का अक्षनिक वाद बोल रहा है और मीमान्सकों का अन्विता भिदान वाद भी अपनी पूरी तारकिक शकती के सात मोईजुद है अनुवादक ने जब पूरोप अख्शों को प्रस्थूट किया है, तो नहों ने मैठली वाके विन्न्यास का बहुट चतुराई से प्रेुख किया है. अच्छ ज़े से वो स्थानिया व्याकरन का इस्तमाल? अच्छ जे से जजद, तं, मतलब यदी, तो, कप्रेुग. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदारन है. आदर सुदी के उदेनाचारे का खष्टिज एक आदहनेक मेठल पाटक के खष्टिज से एक दम सहजता से मिल रहा है. देखे आपकी ये बाद सम्मोहक है के अनुवाद में बूद्धे कि मानदारी के तहत सम्वाद की शेली को जीवन्त रखा गया है. बाख्तन की भूस्वर्ता का यो प्योख सरानिया है की चार्वाग और बूद्धों के तरकों को कमजोर कर के नहीं, अरे लेकिन आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � अदूनेक शब्डों का बहारी हैं यह ज़ादिए था अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अदूनेक शब्डों के लिए अ� गयरवी सदी के उदयना चार्यए काून्तर पक्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् कुई कि जब आप मूल्ष लोकों को गायब कर देते हैं, तो आप दर असल पाटक से वब पैमाना चीन लेते हैं, जिस से वब अनुवाद की सत्तिनिष्था को माप सके. यही पर हमें ये तैकरना हुगा, कि किसी भी अनुवाद का अंतिम उद्टिष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष अर कलाबी उदेना चार्रे की प्रमान मीमान्सा इतनी सगन है कि बिना किसी सहारे के आम पाथक उस में कोजाएगा तो क्या आम पाथक के लिए विषे को सरल बनाने के आम पर हम ग्रन्त की धाचागत अख्डन्दता समजोता कर लें? मैं इसे समजोता नहीं बल की एक ज़ोरी पुल बनाना कहुंगा. चल ये, मैं उदेना चार्य की प्रमान मीमान्सा का ही एक विषिछ्ट उदारन लेता हूं. प्रभाकर मीमान्सक, अर्ठापती और अनुप लबदी को स्वतन्त्र प्रमान मान्ते है. आप प्रभाकर मत का ये मुख्धिबिन्दू है बलकुल अब उदेना चार्ये एक बहुत्ही लंदी और जटिल तारकिक प्रक्रिया कि तहत इन दोनो का क्हन्दन करते हैं और इने केवल अनुमान या प्रत्त्ख्ष में समाहित कर देते हैं मूल संसक्रित पाट में या पूरी भहस एक अंतहीन भूल भूलईया जैसी लकती है, जाहा ये समजना मुषकिल हो जाता है कुन सा पक्ष तरक दे रहा है? पाट जतिल तो है अप इसे आपिसे समजें, जैसे किसी गनी भूलबूलया में जगे-जगे मील के पत्धर लगा दिये गयों? अच्छा इन मील के पत्टरों से नया पाटख भी चारवाग के अग्रहन, सिद्धान्त या मीमान्सकों के ग्यातागों के खंडन को बिना बधके समथ सकता है. क्या दर्षन को इस तरह से लोक तान्तरिक बनाना अनवादक की सबसे बढ़ी सपल्सा नहीं है? देखे ब्ल बुलगया में मील के पत्टर लगाना निष्चित रूप से अच्छा है पाथख कुराह दिखाना जरूरी है और उप्शीशकों का मैं भी समर्ठन करती हूं लेकिन मेरी आपती, तेक्स्ट्ट्रान्स्पेरेंसी के उलंगन को लेकर है तेक्ष्छौल त्रान्स्परेर्श्टी, मत्लब आप फिर से उसी कथोर दाची की बात कर रही है? क्योंकि वा आवश्षक है? बार्तिय बाश्ष परमपरा की अपनी एक अप यह तिहासिक मर्यादा रही है, हमारे यहां गयान का विकास एक रेखिय क्रम में हुए है. सब से पहले सुत्र या कारिका, उसके बाद उस पर लिखागया बाश्च्छ और अंत में उस भाश्च्छ पर लिखिगगय तीका. ये तीनो अलग �alak स्तर हैं, जो सद्यों के बड़्दिक विकास को दर्षाते हैं जब आप इन सभी स्भी स्दरों को एक ही फांट में एक ही निरबाद गद्द प्रवाह में मिला देते हैं तो वो पाट इतिहास विheen हो जाता है लेकिन आम पातख को इस अटिहासिक स्तरी करन्सि क्या लेना देना है? उसे तो मुख्ध्य विचार अद तर्क से मतलब है ना? लेना देना है, क्योंकि दर्षन में ये बहुत माइने रकता है, के कुन्सी बात किस काल खंड में और किस संदरव में कही गई? एक गंभीर दार्ष्नि कनूवाद कम से कम चार स्पष्ट स्थरो में होना चाहीए. पहला मूल संसक्रित कारे का. तुस्रा उसका एक दम शाभ्दि कनूवाद. तुस्रा अनूवादक की अपनी विस्त्रत व्याख्या और चोथा संपादकी ए तिक्निया अदूनिक शब्दों का अच्टित्य बताया गया हो. ये तो पुरी एक फीसिस बन जाएगी? जो की ये है. जब आप इन रेखाँ को पुरी तरा मिता देते हैं, तो ये महां गरन्त एक विषुद शोद संदरप के बजाए, स्रफ एक परी चयात्मक पाट्खे पुस्तक बनके रहे जाता है आपने अन्विता भिदान्वाद का जिक्रि किया अब इस विषेः पर उदायना चारे के शब्द काहा खत्म होते हैं और अनुवादक की अपनी समझ कहा से शुरू होती है ये सपष्ट हुना ही चाहीए, दर्षन शास्टर में भाल की खाल निकाली जाती है, वहां लगभग या करीप-करीप से काम नहीं चलता. दिखे, जब हम अनुवाद में, टेक्स्छुल ट्रन्स्परन्सी या मूल पाट की कठोरता बनाई रकने की, बवाड़ा बवाड़ करते हैं तो जाने अन जाने हम उस पाट को इतना भोजिल बना देते हैं कि कोई उसे परता ही नहीं? अकादमिक शुद्धा की ये जिद अकसर महान गरन्तो को पुस्तकाले की आलमारियो में दूल फाकने गे ले चोर जेती हैं तो क्या लोग प्रियता के लिए प्रामानिक्ता की बली देदी जाए? बली नहीं! गजेंद्र ताकृर का ये अनुवाद, इस बात का जीता जाक्ता प्रमान है, कि यदि आप फोरमल एक्विवेलन्स को थोडा शितल करते है, तो आप न्याई दर्षन जैसी अछ्ट्यंत जटूल वस्तू को भी आदूनिक समाज में जीवंद कर सकते हैं. पर किस कीमद पर? उस कीमद पर जो समवाद स्तापित करने के लिए चुकानी परती है. जब पाच्मे स्तबक में आयोजनात का तर काता है. यानी की ब्रमान्द के जो निषक्रिय परमाडू है, वे अपने आप सयोजित नहीं हो सकते, उने एक दिशा देने वाले चेतन करता की आवश्षकता होती है. तो इस तर्क को अनुवादक ने जिस प्रवाहमाई मैठली में प्रस्त॥ किया है, वा पाथक को तरक की सीटियों पर बिना किसी मानसिक जटके के उपर लेजाता है. ये अनुवाद अप सर्फे कनुवाद नहीं रहे गया है. ये अपने आप में एक रचनात्मक साहित्ते बन गया है. अद थीक इसी रचनात्मक साहित्ते वाले हिस्से से ही मैं सब से अदिक आशंकित हूँ. न्याय कुसुमानजली कोई उपन्यास या महाकावे नहीं है, ये एक कतोर प्रमान शास्त्र है. बद्दियानादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा� वो बाँबाशिक शब्डो को बरकरार रखा है. आप, वो तो है. लेकिन कारिकाओ को पूरी तरा रदा देना एक बहुत बडी कीमत है. सुची ए, अगर मुझे कल को ये शोद करना हो, की उदैना चार्या ने शबद और आर्द की समबंद पर तीक किन संस्क्रिट शब्डों का प्रुवक या था, तो मैं इस मैठली अनुवाद पर पुरी तरा ब्रोसा नहीं कर सकती. मुझे वापस मुल संस्क्रिट गरन्द की तरफी बागना पड़ेगा. कुकि मुझे नहीं पता कि अनुवाद की प्रवाहा मैंई भाशा के पीछे मूल कारिका का सतीक सवरूप क्या था? आपकी बाद का एक अकादमिक वजन है. मैं से भिलकुल नकार नहीं रहा हूँ. लिकि मुझे लखता है कि इस पूरी बहेस का केंद्र ये है कि ये अनवाद किस पाटक्वरग को लक्षिट कर रहा है? अन्ततह इस अनवाद का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपून सार यहे है, कि यहे मित्ला की महान दार्षनिक विरासत की एक अथ्तिंत सबھल भोद्दिक गर वापसी है. तक्नीकी शब्डों का सन्रक्षन करते हुए संस्क्रितिक और स्थानिया भाशा के मुहावरों का प्रयोग यह सिद करता है कि उच्टमस्तर का दार्षनिक विमर्ष केवल शास्त्रिये संस्क्रितिया आजके अग्रेजी अकाद्मिक दाईरों तक सीमित रहने के लिए अबिशव्प्त नहीं है ये बात तो सच है इसे हमारी आदूनिक शेत्रीया भाशाँ मे भी उतनी ही गेराए सुन्दर्या और प्रभाव के सात समप्रेषित किया जासकता है यह है अन्वाद अन्वाद सिद्धानत में देशी करन की सकती का एक अतिहासिक प्रमान है मैं आपके इस संसक्रितिक निष्कर्स से पुरी तरह सेमत हूँ अपनी मात्र भाशा में अजे गुड यान का आना हमेशा स्वागत योगे है अर यह एक शेत्री ये बाशाँ के बड़िक विकास के लिए बहुत आवश्वेग भी है. जी. फिर भी एक शुद्र दाशनिक और अकादमिक द्र्ष्टिकों से मेरे विचारों का साराव्च यही है, की सन्रच्नात्मक पार्दर्षिता संज़ोता नहीं किया जासकता. न्याय जेसे विशुद्द तरक शास्त्र के लिए, मूल पाट की सीमा, श्लोकों की उपस्तिती, और आदूनिक सम्पादकी यव्याख्यां के भीज, एक स्पष्ट और अभेद दिरेखा होनी ही चाहीए. अनुवादक का काम पाट को सुन्दर बनाना हो सकता है, लेकिन उसका पहला दरम मूल लेखख के प्रती जवाब दे है. तो आप केरियें कि अनुवादख को अद्रिश्छे हूना चाहीए. हाँ, काफी हत्तक. अनुवादख को एक पार दर्षी काच की तरा हूना चाहीए, जिसके आर्पार मूल लेखष्पष्ट दिखाई दे, ना की एक रंगीन शीषे की तरा, जो प्रकाश को सुन्दर तो बनाता है, लेकिन मूल वस्तू का आस्ली रंगी बडल देता है. यदिवर एक्धा स्पष्ट नहीं है, तो पाट चाहे कितना भी सुंदर क्यो नहो, वह एक गंभीर शोदारती के लिए अपनी प्रामानिक्ता को देता है. पर शाइद यही वो गेरा तनाव है, जो यस मेठली अनुवाद को यतना चर्चा की योग्य बनाता है. यह हमें सूचने पर मजबोर करता है, कि अनवाद का अंतिम दर्म क्या है? क्या वो किसी प्राषीन मंदर के मुल कुर्दरे पट्फरों को जसका तस सहेज कर रखने में है ताकि इतिहास कार उसकी प्राषीन्ता का दिशन कर सकें जैसा कि आप फोर्मालिक्विवलिन्स में चाती है बलकोल या फिर उस मन्दिर को रंग रोगन करके उसे आजके लोगों के लिए तना जीवन्त बनाने में है कि बि वहां आखर जुड सकें, जैसा की डानमेक इक्विवलिंस करता है न्याय कुस्मानजली तरक और दर्षन का एक अझसा सगन उप्वन है जिस में गेराई से उतरने पर हर बार नई अर्थ खुलते हैं सही कहा और इसकी व्याख्या के भी कई तरीके हो सकते हैं एक दम सही ये पुरी तरा से हमारे श्रोताउंपर निरभर करता है कि वो इस अनुवाद में सुगमता, साहितिक, सुंदर्य अर उस जीवन्त बहुश्वर्ता को प्रात्मिक्ता देते हैं जो उने दर्शन के करीब लाती है या फिर उसकी मुल सन्रचनात्मक तारकी कत्होरता और पाट्धगत पार्दर्षिता को जो अकाद्मिक सतिनिष्ठा किली जरूरी है इस कालजेई दाशनिक सामगरी में आभी और भी बहुत कुछ है जिसे खोजा जाना बाखी है. आजकी हमारी चर्चा से ये सपष्ट है कि अनुवाद कभी एक यान्तरिक प्रक्रिया नहीं होती, बलकी यह दो युगो, दो भाशाँ और दो गल गल बध्धिक शितियो के बीच का एक भेहद, समवेदनशील और जटिल समबाद है. विचार करते रहीए.