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नव्य-न्याय_का_रहस्योद्घाटन.mp4

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:05तो चली ए भारत के बड़िक तिहास के एक बहुती शान्दार अद्धाय में सीथा गोता लगाते हैं.
  2. 0:05–0:08आजके स्विष्लेषन में हम बात करेंगे चोदवी सदी की.
  3. 0:08–0:14एक आसा समय जब भारतिय दरशन में एक बहुत बड़ा क्रीसिस या कहें संकत आगया था.
  4. 0:14–0:16और उसी संकत से तरक शास्त्र,
  5. 0:16–0:18यानी लोगिक की एक एसी क्रान्ती ने जनम लिया,
  6. 0:18–0:22जिस ने सोचने समजने का पूरा तरीका ही हमेशा के लिए बडल कर ड़ाग दिया.
  7. 0:22–0:25अब, शक्रीन पर जो नाम आब देख रहे है,
  8. 0:25–0:27ये कोई आम किताब नहीं है.
  9. 0:27–0:32ये है गंगेश उपाद्याय का लिखा हूँ तत्व चिन्तामनी
  10. 0:32–0:38आसल में यही वो मास्टर पीस है जसने पुरानी सभी फीट्वारीस को पलड़ दिया
  11. 0:38–0:45और अनालेतिकल खिंकें का जो पुरा संटर ता उसे सीथा मित्ला राज में लाकर स्तापित कर दिया
  12. 0:45–0:48पूरे थोडे से कोमप्लेक्स लगने विषेको
  13. 0:48–0:51हम पाज बहुत ही स्विल हिस्वो में बाद कर समजेंगे.
  14. 0:51–0:54शुवात करेंगे इसकी एतेहासिक प्रिष्ट भूमी से
  15. 0:54–0:56फिर गंगेश के लोजिक को समजेंगे
  16. 0:56–0:59और अन्त में जानेंगे कि कैसे इस ज्यान को
  17. 0:59–1:01द्रमाटिक तरीके से बंगाल लेजाय गया.
  18. 1:02–1:04तो आईए, सब से पहले अपने पहले कहन्द की तरव बड़ते है,
  19. 1:04–1:34और देखते हैं कि आखिर इस बवड़िक रान्ती का अदार कैसे तएयार हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  20. 1:34–1:41लोगिक के इस सकूल को बचाने किलिए, विचारको ने क्या किया कि पुरानी सोला पदार्तों वाली,
  21. 1:41–1:44बहुत ही चोडी प्रानाली को पुरी तर है चोडिया.
  22. 1:44–1:48और अपना पुरा फोकस सर्फ इस एक बात पर लगा दिया,
  23. 1:48–2:18अगर नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्
  24. 2:18–2:22अप च़िलियो उस दोर की सबसे बड़िए बध्धिग बहसु में से एक पर नज़ डालते हैं।
  25. 2:22–2:25हमें ये कैसे पता चलेगा कि जो हम जानते हैं।
  26. 2:25–2:28इसर्फ चार फूल प्रूप तरीकों के इर्द गिर्द बूना
  27. 2:28–2:33ये चार तरीके ते प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द
  28. 2:33–2:37बस इन चार पिलर्स के सहारे, उनहोंने दिबेट करने के
  29. 2:37–2:40पुरे स्ट्रक्चर को ही पुरी तरे से रीटटीपाईन कर दिया
  30. 2:40–2:46अप चलियो उस दोर की सब से बड़ी बवध्धिग बहसो में से एक पर नजर डालते हैं.
  31. 2:46–2:51हमें ये कैसे पता चलेगा की जो हम जानते है, वो सच्छ में सही है भी या नहीं?
  32. 2:51–2:55इस कोर दिबेट को थोड़ा नूटरल हो के समजना जरूरी है.
  33. 2:55–2:59एक तरफ मी मान सकते, जिनका मानना था, की ज्यान जैसे ही पैदा होता है,
  34. 2:59–3:01वो अपने आप मिस सत्तिव होता है.
  35. 3:01–3:05लेकिन गंगेश के न्याए दर्षन ने कहा, बिलकुल नहीं.
  36. 3:05–3:07सत्तिए की पुष्टी तो बाद में होती है,
  37. 3:07–3:11जब हम उस गयान का असल जिन्दगी में कोई सबहल प्रेयोग करते हैं
  38. 3:11–3:14मतलब जब तक प्रक्टिकल अप्लिकेशन सहीना हो
  39. 3:14–3:16गयान को सत्ते नहीं मान सकतें
  40. 3:16–3:18और यही बाद हमें भ्रम
  41. 3:18–3:21या कोगनेटिव अरर को समझने में मडद करती है
  42. 3:21–3:51इसे एक बहुत ही मशुर ठाट अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप �
  43. 3:51–3:53या कहें की प्रुज्ट कर देता है.
  44. 3:53–3:55कुन्सेप्स कैसे बनते हैं,
  45. 3:55–3:57इसे समजाने के लिए उनहोंने
  46. 3:57–3:59एक अर्ग कमाल का उदारन दिया.
  47. 3:59–4:01इमजन की जीए, एक बच्चा
  48. 4:01–4:03अपनी जिन्दिगी में पहली बार
  49. 4:03–4:05किसी गाय को देख रहा है.
  50. 4:05–4:07उस वक्त उसके दिमाग में
  51. 4:07–4:10ज़िए अपको लोगी बड़ते है और गंगेश के काम कि सब से शान्दार
  52. 4:10–4:14उस्वक्त उसके दिमाग में गाय होने का कोई कुन्सेप नहीं है.
  53. 4:14–4:44ये एक तरा का प्योर प्रषेप्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्
  54. 4:44–4:49जैसे की कोई पहार, दूस्रा, हे तू, यानी वो सबूथ जो आपको दिख्रा है.
  55. 4:49–4:53जैसे दूवा, और तीस्रा, साद्ध्य, यानी वो चपाहुवा सच,
  56. 4:53–4:57जेसे आप साभित करना चाते है, जैसे की आग.
  57. 4:57–5:02लिकिन ये पूरा का पूरा सिस्तम ताश के पत्तों की तरा देहे जाएगा,
  58. 5:02–5:04अगर इस में व्याप्ती ना हो.
  59. 5:04–5:05व्याप्ती क्या है?
  60. 5:05–5:08ये वो अटूट यूनिवर्सल रूल है,
  61. 5:08–5:11जो दूए और आग को आपस में जोड़ता है.
  62. 5:11–5:15मतलप, ज़हां दूँआ होगा, वहां आग का हुना ही पड़ेगा.
  63. 5:15–5:20आप को जानकर हैरानी होगी, कि गंगेश ने इस व्यापती को दिफाईन करने से पहले,
  64. 5:20–5:26पुराने विचारकों की चोबीस अलग गलक दिफिनेशन्स को लोगिकली रिजेट किया.
  65. 5:26–5:34अपर आपनी एक आज्सी सतिक बलकुल मेठमातिक्स जैसी परिबाशादी जिसने भविश्ष्वे किसी भी गल्ती की कोई गुईजाइची नहीं चोडी.
  66. 5:34–5:42परोगीए, इस में चोटा सा कैच भी है, क्या हो अगर वो लोगिकल रूल सिर्फ कुछ खास चिपी हुई शर्टों पर ही काम करता हो.
  67. 5:43–5:48इसी चिपी हुई शर्ट को उपादी का नाम दिया, जो किसी भी बने बनाए लोगिक को तोर सकती है.
  68. 5:48–5:51तो तोर सकती है. इसे एक उदारन से समषते हैं.
  69. 5:51–5:55एक रूल है कि जहां आग है वहां दूवा है.
  70. 5:55–5:58लेकिं ये लोगिक फ्लोड है गलात है.
  71. 5:58–6:00कुकि आख से दूवा तब ही निकलता है
  72. 6:00–6:04जब उस में लक्डी के गीले होने कि चिपी हूँई शर्थ मोईजुद हो.
  73. 6:04–6:07ग़ास तोव में आखतो होती है, पर दूवा नहीं होता है नहीं।
  74. 6:07–6:10तो ये दिखाता है कि कैसे एक छिपी हुपादी
  75. 6:10–6:13किसी बी अच्छे भले तरक को पुरी तरहा बरबात कर सकती हैं।
  76. 6:13–6:17तो अब सवाल ये उट्टा है के इतनी पावफुल नोलेज
  77. 6:17–6:21मित्ला राज के कडे पहरों के बीज से बहर कैसे निकली?
  78. 6:21–6:24दर सल मित्ला ने अपने इस बडद्धिक हजाने पर
  79. 6:24–6:26एक तरह की मूनापली बनाली फीज.
  80. 6:26–6:29उनहोंने एक बहुत ही कडा आम्बारगो लगा दिया था.
  81. 6:29–6:34किसी भी च्छात्रो को तत्व चिन्ता मनी की लिखित पान्दू लिपी
  82. 6:34–6:38यानी मैनिस्क्रिप्त के साथ उस इलाके से बहार जाने की भिल्ल भी जाजत नहीं फीग.
  83. 6:38–6:42लेकिन फिर कहानी में एक बहुत ही द्रमाटिक मोड आया
  84. 6:42–7:12बंगाल के एक बेहत शान्दार स्व्द्ड़्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
  85. 7:12–7:17याज गाल के नवधवीप तक पहुचा, और वहां दरशन शास्टर के एक बिलकुल नई युख की शुर्वात हूँई.
  86. 7:18–7:21तो जैसे-जैसे हम अपने सिख्ष्पलेनर के अंथ तक पहुचते है,
  87. 7:21–7:25ये पुरी कहानी हमारे सामने एक पहोती गेरा सवाल चोड जाती है.
  88. 7:25–7:30आजके इस दोर में चाहां हम दिजिटल मिसिनफोमेशन और फेख नुउसे गिरेवे है,
  89. 7:30–7:39वहां हम क्या सच है, और क्या जुट ये तैकरने के लिग गंगेश के उन चोदवी सदी वाले शब्द प्रमान के कठोर मानको का इस्तमाल कैसे कर सकते हैं.
  90. 7:39–7:41ये सुछने वाद है

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तो चली ए भारत के बड़िक तिहास के एक बहुती शान्दार अद्धाय में सीथा गोता लगाते हैं. आजके स्विष्लेषन में हम बात करेंगे चोदवी सदी की. एक आसा समय जब भारतिय दरशन में एक बहुत बड़ा क्रीसिस या कहें संकत आगया था. और उसी संकत से तरक शास्त्र, यानी लोगिक की एक एसी क्रान्ती ने जनम लिया, जिस ने सोचने समजने का पूरा तरीका ही हमेशा के लिए बडल कर ड़ाग दिया. अब, शक्रीन पर जो नाम आब देख रहे है, ये कोई आम किताब नहीं है. ये है गंगेश उपाद्याय का लिखा हूँ तत्व चिन्तामनी आसल में यही वो मास्टर पीस है जसने पुरानी सभी फीट्वारीस को पलड़ दिया और अनालेतिकल खिंकें का जो पुरा संटर ता उसे सीथा मित्ला राज में लाकर स्तापित कर दिया पूरे थोडे से कोमप्लेक्स लगने विषेको हम पाज बहुत ही स्विल हिस्वो में बाद कर समजेंगे. शुवात करेंगे इसकी एतेहासिक प्रिष्ट भूमी से फिर गंगेश के लोजिक को समजेंगे और अन्त में जानेंगे कि कैसे इस ज्यान को द्रमाटिक तरीके से बंगाल लेजाय गया. तो आईए, सब से पहले अपने पहले कहन्द की तरव बड़ते है, और देखते हैं कि आखिर इस बवड़िक रान्ती का अदार कैसे तएयार हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ लोगिक के इस सकूल को बचाने किलिए, विचारको ने क्या किया कि पुरानी सोला पदार्तों वाली, बहुत ही चोडी प्रानाली को पुरी तर है चोडिया. और अपना पुरा फोकस सर्फ इस एक बात पर लगा दिया, अगर नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज्बन नहीं तब बज् अप च़िलियो उस दोर की सबसे बड़िए बध्धिग बहसु में से एक पर नज़ डालते हैं। हमें ये कैसे पता चलेगा कि जो हम जानते हैं। इसर्फ चार फूल प्रूप तरीकों के इर्द गिर्द बूना ये चार तरीके ते प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द बस इन चार पिलर्स के सहारे, उनहोंने दिबेट करने के पुरे स्ट्रक्चर को ही पुरी तरे से रीटटीपाईन कर दिया अप चलियो उस दोर की सब से बड़ी बवध्धिग बहसो में से एक पर नजर डालते हैं. हमें ये कैसे पता चलेगा की जो हम जानते है, वो सच्छ में सही है भी या नहीं? इस कोर दिबेट को थोड़ा नूटरल हो के समजना जरूरी है. एक तरफ मी मान सकते, जिनका मानना था, की ज्यान जैसे ही पैदा होता है, वो अपने आप मिस सत्तिव होता है. लेकिन गंगेश के न्याए दर्षन ने कहा, बिलकुल नहीं. सत्तिए की पुष्टी तो बाद में होती है, जब हम उस गयान का असल जिन्दगी में कोई सबहल प्रेयोग करते हैं मतलब जब तक प्रक्टिकल अप्लिकेशन सहीना हो गयान को सत्ते नहीं मान सकतें और यही बाद हमें भ्रम या कोगनेटिव अरर को समझने में मडद करती है इसे एक बहुत ही मशुर ठाट अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप � या कहें की प्रुज्ट कर देता है. कुन्सेप्स कैसे बनते हैं, इसे समजाने के लिए उनहोंने एक अर्ग कमाल का उदारन दिया. इमजन की जीए, एक बच्चा अपनी जिन्दिगी में पहली बार किसी गाय को देख रहा है. उस वक्त उसके दिमाग में ज़िए अपको लोगी बड़ते है और गंगेश के काम कि सब से शान्दार उस्वक्त उसके दिमाग में गाय होने का कोई कुन्सेप नहीं है. ये एक तरा का प्योर प्रषेप्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष्ष् जैसे की कोई पहार, दूस्रा, हे तू, यानी वो सबूथ जो आपको दिख्रा है. जैसे दूवा, और तीस्रा, साद्ध्य, यानी वो चपाहुवा सच, जेसे आप साभित करना चाते है, जैसे की आग. लिकिन ये पूरा का पूरा सिस्तम ताश के पत्तों की तरा देहे जाएगा, अगर इस में व्याप्ती ना हो. व्याप्ती क्या है? ये वो अटूट यूनिवर्सल रूल है, जो दूए और आग को आपस में जोड़ता है. मतलप, ज़हां दूँआ होगा, वहां आग का हुना ही पड़ेगा. आप को जानकर हैरानी होगी, कि गंगेश ने इस व्यापती को दिफाईन करने से पहले, पुराने विचारकों की चोबीस अलग गलक दिफिनेशन्स को लोगिकली रिजेट किया. अपर आपनी एक आज्सी सतिक बलकुल मेठमातिक्स जैसी परिबाशादी जिसने भविश्ष्वे किसी भी गल्ती की कोई गुईजाइची नहीं चोडी. परोगीए, इस में चोटा सा कैच भी है, क्या हो अगर वो लोगिकल रूल सिर्फ कुछ खास चिपी हुई शर्टों पर ही काम करता हो. इसी चिपी हुई शर्ट को उपादी का नाम दिया, जो किसी भी बने बनाए लोगिक को तोर सकती है. तो तोर सकती है. इसे एक उदारन से समषते हैं. एक रूल है कि जहां आग है वहां दूवा है. लेकिं ये लोगिक फ्लोड है गलात है. कुकि आख से दूवा तब ही निकलता है जब उस में लक्डी के गीले होने कि चिपी हूँई शर्थ मोईजुद हो. ग़ास तोव में आखतो होती है, पर दूवा नहीं होता है नहीं। तो ये दिखाता है कि कैसे एक छिपी हुपादी किसी बी अच्छे भले तरक को पुरी तरहा बरबात कर सकती हैं। तो अब सवाल ये उट्टा है के इतनी पावफुल नोलेज मित्ला राज के कडे पहरों के बीज से बहर कैसे निकली? दर सल मित्ला ने अपने इस बडद्धिक हजाने पर एक तरह की मूनापली बनाली फीज. उनहोंने एक बहुत ही कडा आम्बारगो लगा दिया था. किसी भी च्छात्रो को तत्व चिन्ता मनी की लिखित पान्दू लिपी यानी मैनिस्क्रिप्त के साथ उस इलाके से बहार जाने की भिल्ल भी जाजत नहीं फीग. लेकिन फिर कहानी में एक बहुत ही द्रमाटिक मोड आया बंगाल के एक बेहत शान्दार स्व्द्ड़्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� याज गाल के नवधवीप तक पहुचा, और वहां दरशन शास्टर के एक बिलकुल नई युख की शुर्वात हूँई. तो जैसे-जैसे हम अपने सिख्ष्पलेनर के अंथ तक पहुचते है, ये पुरी कहानी हमारे सामने एक पहोती गेरा सवाल चोड जाती है. आजके इस दोर में चाहां हम दिजिटल मिसिनफोमेशन और फेख नुउसे गिरेवे है, वहां हम क्या सच है, और क्या जुट ये तैकरने के लिग गंगेश के उन चोदवी सदी वाले शब्द प्रमान के कठोर मानको का इस्तमाल कैसे कर सकते हैं. ये सुछने वाद है

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