MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
नव्य-न्याय__सत्य_का_मैनुअल.mp4
Timestamped machine output
- 0:00–0:05अज्के इस देटा और इन्फुमेशन से भरे दोर मेंना, सच्चाई का पता लगाना सच्च में एक बहुत बडी चुनोती है.
- 0:05–0:08मतलप क्या सच्च है और क्या जुट ये समजी नहीं आता?
- 0:08–0:38लिकिन ज़र ज़े ज़े अगर सच्चाई को टेस्ट करने का एक अईईच्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
- 0:38–0:42यानी बार्ती यदर्शन की पूरी दिशा ही बडल्डी थी
- 0:42–0:45इसका नाम है तत्व चिन्तामनी
- 0:45–0:47गंगेशा अपाद्याय की लिखी इस किताब का मतलब है
- 0:47–0:51अपिस्टमोलगी में सच्चाईईपर विचार करने रत्न
- 0:51–0:54इसने ना सर्फ पुराने दंख से सुचने के तरीके कुचनोती दी,
- 0:54–0:57बलकी लोगिक को एक बलकुल नया रूप दे दिया.
- 0:57–0:59ये कोई आम टेक्स्ट नहीं है.
- 0:59–1:02ये विमन ठोट प्रोसिस को एक सहीं स्ट्रक्चर देने का
- 1:02–1:04बड़ाही कमाल का प्रयास था.
- 1:04–1:08तो इस पूरे विषलेशन को हम इं चार में हिस्सो में समजेंगे.
- 1:08–1:13पहला नहीं लोगिक का जनम, तुस्रा सच्चाई के चार स्थंब,
- 1:13–1:17तीस्रा सच्चाई को तेस्ट करने का अस्ली तरीका,
- 1:17–1:20और चोथा दुख के चकर को तोडना.
- 1:20–1:28जल्गी से आगे बड़ते हैं? सब से पहले आते हैं, हमारे पहले हिस्से पर, आखेर इस नहीं लोगिक कजन हुए कैसे?
- 1:28–1:34देखे, 2nd century BCE में सेज गोतमा ने एंषिंट लोगिक की नीव तो रक्दी थी.
- 1:34–2:04पर फिर क्या हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 2:04–2:09अब यहां सबसे बड़ा टरनिग पुएंट क्या था नव्या न्याईने
- 2:09–2:11फिलोस्टिफी को देखने का लेंस ही चेंज कर दिया.
- 2:11–2:15पूरानी विचार दारा बस इस पर अटकी ती कि दुन्या में क्या मोझुद है.
- 2:15–2:18बर नव्व्या न्याय ने एक नया सवाल उठाया,
- 2:18–2:22हम किस अबज्टिक्टिव मेठ़ट से ये जानते है कि वो चीज असल में मोईजुद है.
- 2:22–2:26मतलब, सिझफ ये कहना काफी नहीं कि कुछ इजिस्ट करता है,
- 2:26–2:30उस ग्यान को प्रमानेक तरीके से विरिफाई करना सबसे जरूरी बन गया.
- 2:31–2:35ये पूरा का पूरा फोकस, रियालेती से हटकर उस मेठहर्ट पर आगया,
- 2:35–2:37जो रियालेती को मस्भूटी से प्रूव करता है.
- 2:37–2:40चल ये अप चलते है अपनी दूस रेहेस से पर,
- 2:40–2:43अर समजते है, सती के चार स्थम्ब क्या है?
- 2:43–2:49तो नव्व्या न्याए कहता है, कि सही ज्यान प्राप्त करने कि स्रफ चार ही वालेड सोसेज हैं,
- 2:49–2:50जिने प्रम्मान कहते हैं.
- 2:50–2:54पहला है प्रत्यक्ष, यानी हमारे सेंसिस का दारेक अनुबव,
- 2:54–3:02जो हम देखते यह सुनते हैं, दूसरा अनुमान यानी लोगिकल डडक्षन जहा हम तरक लगाते हैं.
- 3:02–3:08तीसरा है उपमान जहा हम दो चीजों के बेच की समांता यह समिलारेटी देक कर नया गयान लेते हैं
- 3:08–3:13और चोथा है शब्द या वबल टेस्टमनी जो उन विष्वसनी एकसपर्ट्स की बाते है,
- 3:13–3:17जेने अपने सबजट की बिलकोल सच्ची और गेहरी समच होती है.
- 3:17–3:26अब यहां एक बहुत अईट्टिएं कमपारिजन देखिये, चार्वाका फिलोस्टी और न्याय फिलोस्टी के बीच्ट का अंतरना सच में बहुत गेरा है.
- 3:26–3:32चार्वाका विचार्दारा स्थ उसी को मानती ती जो बिलकुल आंको के सामने हो, यानी स्थ प्रत्यक्ष को.
- 3:32–3:36अदवाई असर करेगी या ट्रेन थेगजगा पहचेगी ये चीजे पुरी तरहा से अनुमान और उन अईकसपर्ट्स की टेस्टिमनी पर ही टिकी होती हैं.
- 3:36–3:40अदिजीने के लिए इंट चारोस तमबोका होना बहुत ही जरूरी है.
- 3:40–3:44खुदी सुचे अगर अगर अपनी आंको देखी पर भरोसा करे,
- 3:44–3:48तो बिमाल हुने पर दवाई कहना या किसी अनजान शहर के लिए ट्रेन पकडना,
- 3:48–3:50तो बिलकुल ना मुमकिन हो जाएगाना.
- 3:50–4:20दवाई असर करेगी या ट्रेन तेखजगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग
- 4:20–4:22जब तक थीक से इस्टाबलिष नहीं होताना,
- 4:22–4:24तब तक नया अनुमान लगाया एई नहीं जासकता.
- 4:24–4:26अगर आमे पक कब पता नहीं है,
- 4:26–4:29कि दूवा और आग, हमेशा साथ होते हैं,
- 4:29–4:32तो पहारद पर दूवां देक कर वहां आग होने का दावा
- 4:32–4:33हम कभी नहीं कर सकते.
- 4:33–4:39अब रोज मरा की जिन्दगी में ये उप्मान यानी कमपैरिзन कैसे काम करता है?
- 4:39–4:42इसे ये बिलकुल चोटे से एक से अज्ठ्टें से समझते हैं.
- 4:42–4:47मान लीजे किसी ने बताया के ब्रोकली एक हरी सबजी होती है,
- 4:47–4:50तो बिलकुल फूलगो भी जैसी दिकती है. तीके?
- 4:50–4:53तो दिमाग तुरन तुस पुरानी बाद को याद करता है
- 4:53–4:55और फाणल कन्कुछन क्या निकलता है?
- 4:55–4:58के हाँ, यही हरी सबजी ब्रोक्ली है
- 4:58–5:00बिना उस सबजी को पहले देखे
- 5:00–5:03सिझ शब शबडो और कमपरिजन के सहारे
- 5:03–5:06देखे, सिव शब्दो और कमपरेजन के सहारे
- 5:06–5:10एक बिलकल नया कुन्सेप दिमाग में पूरी तरव फिट होगया.
- 5:10–5:13तीक है, आब आते है तीस्ट्रे बहाग पर.
- 5:13–5:15सत्यकी जाज अकिर करे कैसे?
- 5:15–5:18अस्लियत और ब्रहम में फरक कैसे पहचाने?
- 5:18–5:48ये फिलोस्टिफी का एक बड़ा ही कलासिक पजल है, जर दियान से सूनेगा, मान लीजे एक अंदेरी सडग पर कुछ पडा है, जो भिलकल साप जैसा लग रहा है. अब सच क्या है? ये कैसे तै हो? अईनसान उस रस्सी को साप समच कर दर के बहाग सकता है, या फिर साप को र
- 5:48–5:52अगर उस चीस पर दूर से पथधध़ पेकने पर वो हिले या फुपकार मारे
- 5:52–5:54तो बहागलेने मही सबसे बडी समच्डारी है.
- 5:54–5:58पर अगर पास जाकर उस से किसी चीस को बाशने की कोशिष सबहल होग़ा है
- 5:58–6:01जो की रस्सी का असल काम है, तो वो पका रस्सी है.
- 6:01–6:05पर अगर पास जाकर उसे किसी चीस को बाणदने की कोशिष सबल होजाए,
- 6:05–6:08तो की रस्सी का असल काम है, तो वो पका रस्सी है.
- 6:08–6:11कहने का मतलब यह एक, सरफ देखना कापी नहीं है,
- 6:11–6:15किसी भी आक्षन का सबल यह अज सबल नतीजा ही,
- 6:15–6:17उस्छीस की सच्छी पहजान बताता है.
- 6:17–6:21इन सबही टेस्ट्स को एक बहुत ही मस्वुद आदार देने के लिए
- 6:21–6:26नव्यन्यायने एक बहुत रिगरस च्ट्प पाए च्ट्प फाइप आग्युमेंट बनाया है.
- 6:26–6:31इसुदारन को देखे, पहला स्टेप एक क्लेम हुता है, जैसे रामा भीमार है.
- 6:32–6:35तुस्रा उसका रीजन देना क्योंकी उसकी बोडी बहुत गरम है.
- 6:36–6:42तुस्रा एक विनिवर्सल रूल लगाना की जहाँँब ही अजी अजी अजी गर्मी हुती है, वहा बीमारी हुती है.
- 6:42–6:47अब खराब, लोगिक और जूट से बच्छने किलिए नियाय ने एक अर बहुत ही तग्डा टूल दिया है,
- 6:47–6:51अब उदाहरन के लिए आग से दूआ तब ही निकलता है,
- 6:51–6:58अब लख्डी गीली हो आप आप पाच्वा अख्डी कन्कलुजन की इसले रामा भीमार है.
- 6:58–7:03ये इतना सोलिट फ्रेमवक हैना किसी भी कन्फुजन की कोई गुईजनजी नहीं चोरता.
- 7:03–7:09अब आग बदा तूल दिया है अपादी यानी अख्च्ट्रेनियस कन्टिशन ये एक अच्ट्ट्टिः हुटी है
- 7:09–7:17जो दो चीजों के न आच्ट्रल रिलेशन को तोर देती है उदाहरन के लिए आग से दूँआ तभी निकलता है जब लक्डी गीली हो
- 7:17–7:23यहां गीली लक्डी एक छिपी हूँपादी है, क्यूँकी एक नोरमल गैस की आग में दूँा नहीं होता.
- 7:23–7:27आजके ताएम में इस उपादी को पकरना बलकल वैसा ही है,
- 7:27–7:31जैसे सोषल मेडिया पर वारल होने वाली फेख नुस के पीचे चुपे हुए
- 7:31–7:34अगिर न बायसेज या प्रोपगाँड़ा को पहचान ना
- 7:34–7:37शर्थ पकर ली तो जुथ अपने आप सामने आजाता है
- 7:37–7:40आखिर में चलते है चोथे बहाग पर
- 7:40–7:42दुक के चप्रो को तोडना
- 7:42–7:44और इस पूरी फोटींट सेंचूरी की लोजेक को
- 7:44–7:47अगर अज की साएकलोगी के साज जोडना.
- 7:47–7:50तो नियाया फिलोसटी में जो दुख का चकर है,
- 7:50–7:53वो एक बहुत ही स्पस्टिक सीकूँईन्स में चलता है.
- 7:53–7:55इसकी श्रूवात कहा से होती है?
- 7:55–7:57फाल्स कोगनिषन, यानी अग्यानता से,
- 7:57–8:01किसी आजी चीस को तीक मान लेना, जो असल में है ही नहीं.
- 8:01–8:05जब ये ब्रहम पैडा होता है, तब आते हैं, दीफेट्स,
- 8:05–8:08जैसे किसी गेर जरूरी चीस से गेहरा लगाव होना.
- 8:08–8:12फिर अजन उस ब्रहम को पाने के लिए, अक्ष्चन करता है.
- 8:12–8:16और इस पूरे गलत प्रोँसेस का जो आखरी नतीजा होता है, वो है दुक.
- 8:16–8:22देखे की कैसे बस एक चोती सी गलत फैमी दिमाग को एक गेरे दुक के गडड़े में दھकिल देती है.
- 8:22–8:24अब एक बहुत ज़रूरी अंपर देकते हैं.
- 8:24–8:30बोद्ध और न्याया फिलोस्टिप्य में इस दूख को दूर करने के तरीके को लेकर एक बड़ा फर्ख है.
- 8:30–8:36बोद्ध विचार दारा कहती है कि सब से पहले अपनी दिसायर या क्रेविंच पर लगाम लगानी चाहीए.
- 8:36–8:39लेकिन न्याया का तर्क थोडा � a lag hai.
- 8:39–8:46उनका मानना है के अगर रूट एकनूरेंस यानी उस ज़ड मे बसी अग्यानिता और ब्रहम को ही तीक कर लिया जाए,
- 8:46–8:50तो दिसायोज को दबाना यान उनसे लडना नहीं पडेगा.
- 8:50–8:56जैसे ही सही गयनाएगा वो इच्छा और वो दूख खुद बखुद गिर जाएगा बिना किसी मानसिक लडाई के
- 8:56–9:03और सची बात तो यह है कि ये प्राचीन सिथान्त हमारी आज की बुरी आदतोपर बिलकल परफेख बहता है
- 9:03–9:07ज़ेसे लगातार समाथफों स्क्रूल करने के आधद.
- 9:07–9:10जब ये आधद ठावी हो, तो तुरन्त फों चीन लेने,
- 9:10–9:14या जबर्दस्ती रोकने के बजाए, उसे बस अबजर्फ करना चाहिए.
- 9:14–9:17उस वक्त की मेंटल स्टेट को नोट कीजे.
- 9:17–9:21क्या दिमाक भोर होरा है, अकेला है, या स्ट्रेस में है?
- 9:21–9:24फिर इस ब्रहम को टीक से टेस्ट की जे,
- 9:24–9:29क्या सच में ये चमकती हुई स्क्रीन इस अकेलेपन को हमेशा के ले दूर कर रहे है?
- 9:29–9:33देखे बाहरी अनुशासन, यानी इकस्टरनल दिस्पलिन,
- 9:33–9:37अगर अग्यान्ता और ब्रम फीज़ सारे दुक्की अस्ली ज़ड़ है
- 9:37–9:39तो हमेशा के लिए काट सकती है
- 9:39–9:41दिस्पलिन से तो आदत बस दबेगी
- 9:41–9:44पर समच से वो पुरी तरा थीख होजाएगी
- 9:44–9:45कुकी जब तक ज़द जिन्दा है
- 9:45–9:48तो आगयान्ता और भ्रम फीज़ारे दुक की आस्ली ज़ड है
- 9:48–9:51तो हमरी रोज मर्रा की जिन्गी में आसी कुन्ची इच्छा है
- 9:51–9:54जो सच्छ में बस एक भ्रम से पएडा हो रही है
- 9:54–9:56जरा फूर्सत में सोचीएगा
- 9:56–9:58कि आसी कुन्सी रस्सी है
- 9:58–10:08अगर अग्यान्ता और भ्रम फीज़ा, फीज़ा दुक्की अस्ली जड़ है, तो हमरी रोज मर्रा की जिन्धिगी में अजी कुन्सी इच्छा है, जो सच्छ में बस एक भ्रम से पैडा हो रही है.
- 10:08–10:17ज़रा फुर्सत में सोचीगा क्यासी कुन सी पुरानी मानियताया और आदते है, जो दरसल रस्सी है, पर हमारी जिन्दगी में साप होने का नातक कर रही है.
Plain text
अज्के इस देटा और इन्फुमेशन से भरे दोर मेंना, सच्चाई का पता लगाना सच्च में एक बहुत बडी चुनोती है. मतलप क्या सच्च है और क्या जुट ये समजी नहीं आता? लिकिन ज़र ज़े ज़े अगर सच्चाई को टेस्ट करने का एक अईईच्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट यानी बार्ती यदर्शन की पूरी दिशा ही बडल्डी थी इसका नाम है तत्व चिन्तामनी गंगेशा अपाद्याय की लिखी इस किताब का मतलब है अपिस्टमोलगी में सच्चाईईपर विचार करने रत्न इसने ना सर्फ पुराने दंख से सुचने के तरीके कुचनोती दी, बलकी लोगिक को एक बलकुल नया रूप दे दिया. ये कोई आम टेक्स्ट नहीं है. ये विमन ठोट प्रोसिस को एक सहीं स्ट्रक्चर देने का बड़ाही कमाल का प्रयास था. तो इस पूरे विषलेशन को हम इं चार में हिस्सो में समजेंगे. पहला नहीं लोगिक का जनम, तुस्रा सच्चाई के चार स्थंब, तीस्रा सच्चाई को तेस्ट करने का अस्ली तरीका, और चोथा दुख के चकर को तोडना. जल्गी से आगे बड़ते हैं? सब से पहले आते हैं, हमारे पहले हिस्से पर, आखेर इस नहीं लोगिक कजन हुए कैसे? देखे, 2nd century BCE में सेज गोतमा ने एंषिंट लोगिक की नीव तो रक्दी थी. पर फिर क्या हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अब यहां सबसे बड़ा टरनिग पुएंट क्या था नव्या न्याईने फिलोस्टिफी को देखने का लेंस ही चेंज कर दिया. पूरानी विचार दारा बस इस पर अटकी ती कि दुन्या में क्या मोझुद है. बर नव्व्या न्याय ने एक नया सवाल उठाया, हम किस अबज्टिक्टिव मेठ़ट से ये जानते है कि वो चीज असल में मोईजुद है. मतलब, सिझफ ये कहना काफी नहीं कि कुछ इजिस्ट करता है, उस ग्यान को प्रमानेक तरीके से विरिफाई करना सबसे जरूरी बन गया. ये पूरा का पूरा फोकस, रियालेती से हटकर उस मेठहर्ट पर आगया, जो रियालेती को मस्भूटी से प्रूव करता है. चल ये अप चलते है अपनी दूस रेहेस से पर, अर समजते है, सती के चार स्थम्ब क्या है? तो नव्व्या न्याए कहता है, कि सही ज्यान प्राप्त करने कि स्रफ चार ही वालेड सोसेज हैं, जिने प्रम्मान कहते हैं. पहला है प्रत्यक्ष, यानी हमारे सेंसिस का दारेक अनुबव, जो हम देखते यह सुनते हैं, दूसरा अनुमान यानी लोगिकल डडक्षन जहा हम तरक लगाते हैं. तीसरा है उपमान जहा हम दो चीजों के बेच की समांता यह समिलारेटी देक कर नया गयान लेते हैं और चोथा है शब्द या वबल टेस्टमनी जो उन विष्वसनी एकसपर्ट्स की बाते है, जेने अपने सबजट की बिलकोल सच्ची और गेहरी समच होती है. अब यहां एक बहुत अईट्टिएं कमपारिजन देखिये, चार्वाका फिलोस्टी और न्याय फिलोस्टी के बीच्ट का अंतरना सच में बहुत गेरा है. चार्वाका विचार्दारा स्थ उसी को मानती ती जो बिलकुल आंको के सामने हो, यानी स्थ प्रत्यक्ष को. अदवाई असर करेगी या ट्रेन थेगजगा पहचेगी ये चीजे पुरी तरहा से अनुमान और उन अईकसपर्ट्स की टेस्टिमनी पर ही टिकी होती हैं. अदिजीने के लिए इंट चारोस तमबोका होना बहुत ही जरूरी है. खुदी सुचे अगर अगर अपनी आंको देखी पर भरोसा करे, तो बिमाल हुने पर दवाई कहना या किसी अनजान शहर के लिए ट्रेन पकडना, तो बिलकुल ना मुमकिन हो जाएगाना. दवाई असर करेगी या ट्रेन तेखजगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग जब तक थीक से इस्टाबलिष नहीं होताना, तब तक नया अनुमान लगाया एई नहीं जासकता. अगर आमे पक कब पता नहीं है, कि दूवा और आग, हमेशा साथ होते हैं, तो पहारद पर दूवां देक कर वहां आग होने का दावा हम कभी नहीं कर सकते. अब रोज मरा की जिन्दगी में ये उप्मान यानी कमपैरिзन कैसे काम करता है? इसे ये बिलकुल चोटे से एक से अज्ठ्टें से समझते हैं. मान लीजे किसी ने बताया के ब्रोकली एक हरी सबजी होती है, तो बिलकुल फूलगो भी जैसी दिकती है. तीके? तो दिमाग तुरन तुस पुरानी बाद को याद करता है और फाणल कन्कुछन क्या निकलता है? के हाँ, यही हरी सबजी ब्रोक्ली है बिना उस सबजी को पहले देखे सिझ शब शबडो और कमपरिजन के सहारे देखे, सिव शब्दो और कमपरेजन के सहारे एक बिलकल नया कुन्सेप दिमाग में पूरी तरव फिट होगया. तीक है, आब आते है तीस्ट्रे बहाग पर. सत्यकी जाज अकिर करे कैसे? अस्लियत और ब्रहम में फरक कैसे पहचाने? ये फिलोस्टिफी का एक बड़ा ही कलासिक पजल है, जर दियान से सूनेगा, मान लीजे एक अंदेरी सडग पर कुछ पडा है, जो भिलकल साप जैसा लग रहा है. अब सच क्या है? ये कैसे तै हो? अईनसान उस रस्सी को साप समच कर दर के बहाग सकता है, या फिर साप को र अगर उस चीस पर दूर से पथधध़ पेकने पर वो हिले या फुपकार मारे तो बहागलेने मही सबसे बडी समच्डारी है. पर अगर पास जाकर उस से किसी चीस को बाशने की कोशिष सबहल होग़ा है जो की रस्सी का असल काम है, तो वो पका रस्सी है. पर अगर पास जाकर उसे किसी चीस को बाणदने की कोशिष सबल होजाए, तो की रस्सी का असल काम है, तो वो पका रस्सी है. कहने का मतलब यह एक, सरफ देखना कापी नहीं है, किसी भी आक्षन का सबल यह अज सबल नतीजा ही, उस्छीस की सच्छी पहजान बताता है. इन सबही टेस्ट्स को एक बहुत ही मस्वुद आदार देने के लिए नव्यन्यायने एक बहुत रिगरस च्ट्प पाए च्ट्प फाइप आग्युमेंट बनाया है. इसुदारन को देखे, पहला स्टेप एक क्लेम हुता है, जैसे रामा भीमार है. तुस्रा उसका रीजन देना क्योंकी उसकी बोडी बहुत गरम है. तुस्रा एक विनिवर्सल रूल लगाना की जहाँँब ही अजी अजी अजी गर्मी हुती है, वहा बीमारी हुती है. अब खराब, लोगिक और जूट से बच्छने किलिए नियाय ने एक अर बहुत ही तग्डा टूल दिया है, अब उदाहरन के लिए आग से दूआ तब ही निकलता है, अब लख्डी गीली हो आप आप पाच्वा अख्डी कन्कलुजन की इसले रामा भीमार है. ये इतना सोलिट फ्रेमवक हैना किसी भी कन्फुजन की कोई गुईजनजी नहीं चोरता. अब आग बदा तूल दिया है अपादी यानी अख्च्ट्रेनियस कन्टिशन ये एक अच्ट्ट्टिः हुटी है जो दो चीजों के न आच्ट्रल रिलेशन को तोर देती है उदाहरन के लिए आग से दूँआ तभी निकलता है जब लक्डी गीली हो यहां गीली लक्डी एक छिपी हूँपादी है, क्यूँकी एक नोरमल गैस की आग में दूँा नहीं होता. आजके ताएम में इस उपादी को पकरना बलकल वैसा ही है, जैसे सोषल मेडिया पर वारल होने वाली फेख नुस के पीचे चुपे हुए अगिर न बायसेज या प्रोपगाँड़ा को पहचान ना शर्थ पकर ली तो जुथ अपने आप सामने आजाता है आखिर में चलते है चोथे बहाग पर दुक के चप्रो को तोडना और इस पूरी फोटींट सेंचूरी की लोजेक को अगर अज की साएकलोगी के साज जोडना. तो नियाया फिलोसटी में जो दुख का चकर है, वो एक बहुत ही स्पस्टिक सीकूँईन्स में चलता है. इसकी श्रूवात कहा से होती है? फाल्स कोगनिषन, यानी अग्यानता से, किसी आजी चीस को तीक मान लेना, जो असल में है ही नहीं. जब ये ब्रहम पैडा होता है, तब आते हैं, दीफेट्स, जैसे किसी गेर जरूरी चीस से गेहरा लगाव होना. फिर अजन उस ब्रहम को पाने के लिए, अक्ष्चन करता है. और इस पूरे गलत प्रोँसेस का जो आखरी नतीजा होता है, वो है दुक. देखे की कैसे बस एक चोती सी गलत फैमी दिमाग को एक गेरे दुक के गडड़े में दھकिल देती है. अब एक बहुत ज़रूरी अंपर देकते हैं. बोद्ध और न्याया फिलोस्टिप्य में इस दूख को दूर करने के तरीके को लेकर एक बड़ा फर्ख है. बोद्ध विचार दारा कहती है कि सब से पहले अपनी दिसायर या क्रेविंच पर लगाम लगानी चाहीए. लेकिन न्याया का तर्क थोडा � a lag hai. उनका मानना है के अगर रूट एकनूरेंस यानी उस ज़ड मे बसी अग्यानिता और ब्रहम को ही तीक कर लिया जाए, तो दिसायोज को दबाना यान उनसे लडना नहीं पडेगा. जैसे ही सही गयनाएगा वो इच्छा और वो दूख खुद बखुद गिर जाएगा बिना किसी मानसिक लडाई के और सची बात तो यह है कि ये प्राचीन सिथान्त हमारी आज की बुरी आदतोपर बिलकल परफेख बहता है ज़ेसे लगातार समाथफों स्क्रूल करने के आधद. जब ये आधद ठावी हो, तो तुरन्त फों चीन लेने, या जबर्दस्ती रोकने के बजाए, उसे बस अबजर्फ करना चाहिए. उस वक्त की मेंटल स्टेट को नोट कीजे. क्या दिमाक भोर होरा है, अकेला है, या स्ट्रेस में है? फिर इस ब्रहम को टीक से टेस्ट की जे, क्या सच में ये चमकती हुई स्क्रीन इस अकेलेपन को हमेशा के ले दूर कर रहे है? देखे बाहरी अनुशासन, यानी इकस्टरनल दिस्पलिन, अगर अग्यान्ता और ब्रम फीज़ सारे दुक्की अस्ली ज़ड़ है तो हमेशा के लिए काट सकती है दिस्पलिन से तो आदत बस दबेगी पर समच से वो पुरी तरा थीख होजाएगी कुकी जब तक ज़द जिन्दा है तो आगयान्ता और भ्रम फीज़ारे दुक की आस्ली ज़ड है तो हमरी रोज मर्रा की जिन्गी में आसी कुन्ची इच्छा है जो सच्छ में बस एक भ्रम से पएडा हो रही है जरा फूर्सत में सोचीएगा कि आसी कुन्सी रस्सी है अगर अग्यान्ता और भ्रम फीज़ा, फीज़ा दुक्की अस्ली जड़ है, तो हमरी रोज मर्रा की जिन्धिगी में अजी कुन्सी इच्छा है, जो सच्छ में बस एक भ्रम से पैडा हो रही है. ज़रा फुर्सत में सोचीगा क्यासी कुन सी पुरानी मानियताया और आदते है, जो दरसल रस्सी है, पर हमारी जिन्दगी में साप होने का नातक कर रही है.