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Bhamati_Chatuhsutri_Maithili_Animated.mp4

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Part 11 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 11
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  1. 0:00–0:04शंक्खा रजत उत्तरार्द, चारी सुत्रध
  2. 0:04–0:15आई रातिक सबहा, सुत्रदार, वाचस्पती मिष्र, मी मान्सक, कर्मकान्टी, आक्षेपक, शंकी, एक्ता युवा सन्यासी, शिष्ष्ट, परिषद
  3. 0:15–0:24भामतिक तर्क पर आदारित इमूल ग्रन्त्ख अनुवाद नहीं अची, अपितु एक ता स्वतन्त्र स्रिजनात्मक ग्रिति ख्यक.
  4. 0:24–0:27प्रस्तावना
  5. 0:27–0:33सुत्रदार प्रवेश कर अची, अची दिस इशारा कर अची.
  6. 0:33–0:42खाल ही राती एही सबामे शंक आचानिक कता भेल द्रम की खेल, आव उकर उतर सन्सारक विष्मे की कहत अची.
  7. 0:42–0:45बचल केवल एक्ता द्वार, शब्द वेद
  8. 0:45–0:50आखिक वोही द्वार पर आई रातिक विरोदी थाडचत्छति
  9. 0:50–0:55अग्दा वाद एक्ता वचन पर समाप्त भेल चल जे अख्चन द्हरी निभाँल नही गेल
  10. 0:55–1:03अखि उक्रा नहीं देख हैत अच्छि अनुमान अच्रा नहीं आपाइत अच्छि
  11. 1:03–1:07बचल केवल एक ता द्वार शब्द वेद
  12. 1:07–1:12अख्छिक अही द्वार पर आई रातिक विरोदि थाड चति
  13. 1:12–1:29जमनिक शिष्ष, जे कहता, वेद हमर अची, आवेदक एक मात्र काज कर्मक आग्या देप्ठेक यग्य करु, होम करु, आजे वाख्य कुनो कर्मक आग्या नहीं दैत अची, से यातम विर्त अची, या कुनो आग्याक सेवक.
  14. 1:29–1:32तत्वम्सी तो वेह छे एहि में कोन आग्या?
  15. 1:32–1:39तने को कहता, वेदान्त या तम्मान रहाई, या कर्म्कान्डक डासी बने.
  16. 1:39–1:51मेज पर राखल उपोत्फी में बाद्राईनक चारी सुत्र लिखल अची, चारी चोट वाख्य, जक्रापर वाचस्पती मिष्र अपन भामतिक सब्स पैग भाग रचलनी.
  17. 1:51–2:03आई राति उ चारु सुत्र चारी सीधि बनत आज सबस उपर का सीधि पर उवाद होएत जक्राशास्त्र समन्वै कहेत अच्छी वेदक प्रयोजन कर्म थेक वाग्यान.
  18. 2:03–2:05प्रस्थान
  19. 2:05–2:08अंक प्रत्हम
  20. 2:08–2:11गरद्निक हाए
  21. 2:11–2:16प्रथम सुत्रग अथातो ब्रह्मजिग्यासा, तक्हन ते ब्रह्मग्जिग्यासा
  22. 2:18–2:20वाचस्पती आसीन छत्ही
  23. 2:21–2:25एक्ता यूवा सन्यासी प्रवेश करेद अची प्रनाम करेग
  24. 2:25–2:32आचार्य, हम अक्ता प्रश्नलाका आयल चीजे हमर गुर्कुल मे आगी जका पस्रल अची.
  25. 2:32–2:39सुत्रक पहल्षब, अत्त, ठिक, तक्शन, हमर कर्मकान्दी सहपाती कहेत चत्छी,
  26. 2:39–2:44तक्शन, माने, दर्मज यासाक बाद, पहिने पूरा मीमान्सा पडू,
  27. 2:44–2:48ब्रावाँ जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्दक पह्रा आची
  28. 2:48–2:50ब्रावाँ आची
  29. 2:50–2:53ब्राँँ जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्दक पह्रा आची
  30. 2:53–2:56ब्राँँ जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्दक पह्रा आची
  31. 2:56–3:26वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  32. 3:26–3:56अद्या पी उवे आपी तु आनल नहीगे अद्या पी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आ�
  33. 3:56–3:58ख़ेत अच्छि आख्बाके चाही
  34. 3:58–4:04वेदद्जयन समात कैने विद्यार फीक सोजा दुई मार्ग, दर्म विचार आब्रहम विचार
  35. 4:04–4:10वेदजयन समाप्त कैने विद्यार थीक सोजा दुई मार्ग, दर्म विह्चार आब्रहम विचार
  36. 4:10–4:17दर्म विचार पहिने, की एक तंकर्म फल्डदध अछी, स्वर्ग, संतती, सम्रद्दि, आप फलक, हे तुप्रव्रित्ती स्वाभिट
  37. 4:17–4:22अब्रहम ग्यान से हो, जब प्हेत, तंकर्मक, शुद्द्दिसर, चित, निर्मलभेने
  38. 4:22–4:29तने क्रम बान्हल अची पहिने कर्म, तक्हन ग्यान, जेना पहिने केट, जोतलजाइत अची तक्हन भीज
  39. 4:29–4:35तनेक्रम भानहल अची पहिने कर्म, तक्हन ज्यान जेना पहिने केट जोतल जाएत अची तक्हन भीज
  40. 4:36–4:45खेटक उप्मा हम्राप्रिय अची ते उक्रे सवुत्तर देप मुदा पहिने अच्ताभेद जक्रापर इस समपून अंक्तिकत
  41. 4:46–4:48दर्म अब्रहम्मे की अंतर
  42. 4:48–5:05द्र्म साद्यत्त, कयल्जाय्वाला, भविष्यक् वस्तु, यग्याई, स्वर्क्कालि, ब्रह्मा सिध्ध्ध, पहिन्हिस्च, सदासर, प्राप्त, आईईभेद सम्पूल्न, क्रम्वाद्के काटी दैत अची.
  43. 5:05–5:20जे वस्तु कयल जाएत अछी, वो कर चारी गती, उत्पती, जेना अतासं, रोती, विकार, जेना दहन्सं, चार, संसकार, जेना वोक्रिपर, जल छिडकभ, प्रापती, जेना गाए, दूभ,
  44. 5:20–5:50ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  45. 5:50–5:54तक्हन कर्मक कोनो स्थाने नहीं हमर समपुन शास्त्रव्यर्त
  46. 5:54–5:59थीक विप्रीत स्थान अची मुदा सिनहासन नहीं सीदी
  47. 5:59–6:03सूनु क्रम नित्यकर्मस पापकषे पापकषेस चित्तषुद्दी
  48. 6:03–6:08चित्षुद्दिसं वेरागय वेरागय से जिग्यासा
  49. 6:08–6:15वर्दा अटेने हार नाच नहीं करेत अची, मुदा नाच अख्रे बिनू नहीं देखाएत अची.
  50. 6:15–6:45अजज़ के उ कहे जे क्रम अनिवार्य अच्छी जे सन्यास के वल्ग रहस्तक बाद तनजाबालश्वृती ताड अच्छी यदरे विर्जे तदरेव प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्र
  51. 6:45–6:50जाही दिन वेरागे उपजगे, उही दिन निकलीजा.
  52. 6:50–6:56ब्रहम्चर्येसं सुजे सन्यास, श्रूती स्वया द्वार खोलने अची.
  53. 6:56–7:01यूवा सन्यासी दिस, अहाक सहबाठी के कहबनी द्वार पर पहरा नही अची,
  54. 7:01–7:07केवल एक्ता दहलीज अखी आवकर नाम अखी आथ हद्धे.
  55. 7:07–7:10अता सुत्रक दो सर शवत.
  56. 7:10–7:12अखर आदित.
  57. 7:12–7:17चारी सादन जे बिनु जिग्यासा जिग्यासे नही नित्यानित्यक विवेक,
  58. 7:17–7:24हिलोक पर लोकक भोगसं विराद शम्द्मादी सम्पती आम उमुख्षा.
  59. 7:24–7:32आए ते पूर्वपक्ष एक्ता रस्गर आपती अनैत अची, जे हम पूरा स्वाथसं सूनाएप वेरागे किए.
  60. 7:32–7:37माच में कांत अची तनकी लोक माच छोडी दैध अची?
  61. 7:37–7:41कांत भीछिक मासु खायत अची.
  62. 7:41–7:46दान में भूसी अची, किसान दान नहीं फेकःत अची.
  63. 7:46–7:50विखारिक दरे के अ भानस बन नहीं कर अची
  64. 7:50–7:56तहिना सन्सार में दूवक मिलल अची तंकी, दूवक शोडु, सुख्ख भोगु
  65. 7:57–7:59रसेथ, आईकर उत्तर
  66. 8:00–8:06उत्तर एक ही वाख्यमे, माचक कांत अलग अची, ते भीछल जाएद अची
  67. 8:06–8:17मुदा जाही भोजन में विष मदूमे गोरिक मिला उल्गेल हो, औही में सचन्सारक सबस निपुन रसोयो के वल मदूं नहीं का सकैत अची.
  68. 8:17–8:23सन्सारक सुख होने खेक, दूवक होही में गोरल अची, भीचल नहीं जाएत.
  69. 8:23–8:27आज सोम पील हो आमर भेल हो जकाश्रूती.
  70. 8:27–8:37पुरान स्वयं ताला को लैत अची आप्रलिस ठाएत्व के नमरता के है जाएत अची गोन अमरता प्रलैद हरेक सच्चा नहीं.
  71. 8:37–8:40शम्दमक फल्ट
  72. 8:40–8:49जेना शान्त आस दहाल बाचा हर में जोते जोग होएत अची चंचल मन कोनो जूा नहीं उठा सकैत अची
  73. 8:49–8:54एक ता अंतिन गिरह, वाचस्पती आई शब्दक गिरह थिक
  74. 8:54–8:58ब्रह्मजिग्यासा एही समास में ब्रह्मना कोन विबखती
  75. 8:58–9:10किचु प्राछीन व्याख्याकार कहत, चत्छतुर्ति, ब्रहमक, हेतु जिग्यासा, तक्हन ब्रहमाजिग्यासाक विषै नही, प्रयोजन भेल, आअ आअक समपूनक विषारक विषै ब्रहमा थिक य भवन खसी पडत.
  76. 9:10–9:22आई एह उस्तान थिक जतै हम अपनासं पहिलुक तीका कार स्कूलिक असहमत्ख्षी शास्त्र में इमान्दारी एही में थिक जे मत्भेद नुकाल नहीं जाए.
  77. 9:22–9:30समास शष्ती तत पूरुष्तिक ब्रहमक जिग्यासा कर्मनी शष्ती ब्रहमा विश्याय.
  78. 9:30–9:36कि एक तन जिग्यासा एक ता सकर्मक बूक थेख.
  79. 9:36–9:41सूर्यवा चन्द्र देखिक के औनही पुछ़ेत अच्फी इखेकर,
  80. 9:41–9:47मुदा ज्यान शब्द सुनेते प्रषन अपने उठैत अच्फी खेकर ज्यान,
  81. 9:47–9:52कत्फीख ज्यान बिनु विष्यक अदूरा वाखे खेख.
  82. 9:52–10:08आशेश जे किछु ब्रहमस जुडल, सादन, फल, प्रकार से अपने गिचा का आभीजाइत अच्छी, जेना राजाजाइत छती, सुनिते परिकर सेट राजाएत बुजाइत अच्छी, मंत्री, छत्र, सेना के उ आलगसन नहीं कहेट अच्छी.
  83. 10:08–10:17प्रणाम करेद, हम आपन गुरुकुल जाक कहबनी द्वार खुजल अची आचाभीक नाम वेरागयतेक, वेतन नहीं.
  84. 10:18–10:22अंक दुटिय, माला आदागा
  85. 10:23–10:28दुटिय सुत्रक जन्माद यस्ये यत ہے जक्रास एही जगत कजन्मादी
  86. 10:28–10:32निक आचार्यक जिग्यासाक अदिकार सिद्ध
  87. 10:32–10:34मुदा जिग्यासाके कर
  88. 10:34–10:36ब्रहमक
  89. 10:36–10:38अब्रहमाकी
  90. 10:38–10:41एता आवाके कालहिक उही शंक्पर वापस गीचब
  91. 10:41–10:47जते एक वस्तु हम जनेप छी, गेल, गाछ, दे, सब सीमित, जर्द नष्वर
  92. 10:47–11:17ब्र्हम के आहा एही सबख्विप्रीद कहेच्छी अन्थ्चेतन नित्यः, तक्हन उकर लक्षन की देब, उकर अपन कोनो गुन हम्रा परिच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्
  93. 11:17–11:22जेना सुर्यक गती सोजे नहीं देखायत अची,
  94. 11:22–11:27मुदा भोर मे पूभ आशाज मे पच्छम, ठाम ठाम वोकर पहुच़,
  95. 11:27–11:31वोकर गतेख छिनह बनी जायत अची.
  96. 11:31–11:35तहिना जगत जे ब्रहमस उप्जल, ब्रहमक छिनह थेख,
  97. 11:35–11:39यद्यपी ब्रहमा सवया अखिसन उचल.
  98. 11:39–11:43ब्रह्मक छिनहतेग, यद्यपी ब्रह्मा स्वया आखिसन उचल
  99. 11:45–11:46जन्मादी जन्म आदी
  100. 11:47–11:49की की गनब एही आदी में
  101. 11:50–11:56यासकक निरुक्त चैविकार गन्बैत अची जन्म, अस्तित्व व्रिद्ध्धी परिनाम अपक्षैट नाश्
  102. 11:57–11:59सुत्रकार तीनेटा की एक लिलनी
  103. 11:59–12:29ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  104. 12:29–12:40वाणी लेल हु लक्षन, मुदा आब अस्ली प्रष्ने इसुत्र की थिक, की इक ता अनुमान छिक जगक करता अची कार्या होई बाक कारने ध्यल जका.
  105. 12:40–12:51जहाँ तनकाल हुका बोध फेर बजाँ, उ एही अनुमान्स लडि लेता, आहाख ब्रहमातर कक तराजुपर लटकल रहेत, जताय उद्यन अगंगेषक इश्वर लटकल अची.
  106. 12:51–12:58पोति उथबआत, शनहसं, आहे है एही अंकक रड़े थेक, ते दिरेसं सूनु.
  107. 12:58–13:03नहीं की सुत्र स्वत्ट्ट्र अनुमान नहीं थेख
  108. 13:03–13:33जगत कर अचना देखिक, नाम रूक्स भाईतल, अंगिनत करता बूक तास भरल, देश कालनिमित्तसा एहन सदलजे मन्स कलपनो कत्हिन, कारी हरिन केवल कोनो-कोनो देश में, कोलक्को केवल कोनो-कोनो रितु में, बगुलीक गर्व वर्षाक, पहिलगर जन्सम की सभ देखिक
  109. 13:33–13:46सुत्रक आस्लिकाज दोसर अची, सुत्रक प्रयोजन थिक वेदान्त वाख्यस्भ के मालाजका दागामे गुतभ, फूल्ष्रूतिक थिक, यतोवा इमानी भुतानी जायंते.
  110. 13:46–13:51तद ब्रहमा भ्रिगुवरून समवाद, तट्तीरी.
  111. 13:51–13:54सुत्र केवल दागा थिक.
  112. 13:54–14:00ब्रह्मा शब्द्ग्गम अद्ख, तर्कक तराजुपर उ कहीो चदभे नहीं कहे
  113. 14:01–14:04तक्ठन्तर्क कोनो स्थाने नहीं आहाक गर में
  114. 14:05–14:09स्थान अची श्रुतिक अनुगामी तर्कक, स्वतन्त्रक नहीं
  115. 14:09–14:21श्रूति स्वयंकहेत अच्छिक पन्दित बुद्धिमान पुरुश गान्दार देश पहुचेत अच्छिक मुदातकने, जगन पहिने के उक्रा रस्ता कही दैट चैए.
  116. 14:21–14:25कहनिहार श्रूति चलनिहार तर्क
  117. 14:25–14:38आईते अक्त भेद राक्छिलिय, जक्रापर चारिम अंकक समपून युध्ध लडल जाएत, दर्मजग्यासा आब रह्मजग्यासात प्रमान में अक्ता जडिक अंतर अची.
  118. 14:38–15:08ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  119. 15:08–15:12अब्रहमद्यान वस्तुग्यान थेक विदिनही
  120. 15:12–15:17यी वाक्यमोन राखू चारिम अंक में तर्वारी बनत
  121. 15:17–15:20अंक त्रीतिये
  122. 15:20–15:23नर्टकक दे है
  123. 15:23–15:29त्रीतिया सुत्र, शास्त्रयो नित्वात, शास्त्रक योनी होई बाक कारने
  124. 15:29–15:34तेसर सुत्र चोत अची आचार्य, मुदा दुमहा भुजाएत अची
  125. 15:34–15:39शास्त्रयोनित्वात, के अ पड़़ अची ब्रहमा शास्त्रक योनी ठिक,
  126. 15:39–15:42वेदक कारन, के अ पड़़ अची शास्त्र ब्रहमक योनी छिक,
  127. 15:42–15:44ब्रहमक प्रमार. कुन छीक?
  128. 15:44–15:54तुनु आदुनु के क्रम्सं सुनु कि एक तन तुनु मिलिक एक दूस्रा के दारन कर आची जेना महराबक दूई पातर.
  129. 15:54–16:09पहल आर्त्रिग्वेदादी विशाल शास्त्र राशिक अंगिनत विद्याक शाखासव, भरल दीप जका सभ वस्तुप प्रकाषक एकर स्रोट ब्रहमात्धिक, आस्रोट होईबाक कारने ब्रहमक सरवगता सिध.
  130. 16:09–16:15निम सोज अची ग्रन्त्कारत ज्यान ग्रन्त्स पैग होईत अची
  131. 16:15–16:21पानेनी व्याकरन रचलनी की पानेनिक ज्यान अच्ताद्याई में अटागेल
  132. 16:21–16:27नहीं कुशिलक रस् दूद आगुडक मिठासक भेद जी जनैत अची
  133. 16:27–16:32वानी नहीं कही पबैत अची वक्ताक ज्यान सदा वचन सागु
  134. 16:32–16:40तन्जकर वचन वेद थिक, एही महान सत्ताक नहिज्वास जका ओकर ज्यानक सीमा के बान हद
  135. 16:40–16:47उठैत आप गंवीर आई थी, वाचस पती, हमर गरक सबस पुरान दिवाल ताड अची,
  136. 16:47–16:51ताड अची आहम देख़ई चाहब आहा एक्रा कोना गिराभी
  137. 16:51–16:53वेद करता
  138. 16:53–16:55वेद अपारुषे थिक
  139. 16:55–17:01अनादी पात परमपरा, गुरुस शिष्ष्ः, शिष्ष्ष्ष्ष्ष्ः कोनो पहल रच्चिता बिनू
  140. 17:01–17:07जमनिक सम्पुन गर्षन एही पर थाड अची जकर मोनही, तकर दोष नहीं.
  141. 17:07–17:16दीवाल गिराएब नहीं, मित्र एक हम उक्रा सरकाएब, आहा देखफ जे सरकलाएक बादो उटाड रहेथ.
  142. 17:16–17:25पहिने एक ता बात जे आहुक माने पडद, आहा वरन के निट्यक है ची गग ध्वनी सदा एक मानी ले.
  143. 17:25–17:35मुदा वाक्यः पदको विषेश क्रम को अनुपूर वी, क्रमतं उच्चारन में बनैत अच्छ आ उच्चारन अनिट्य.
  144. 17:35–17:40तने वेद्वाक्यक अभिव्यक्ती हर भेदनव
  145. 17:40–17:55आब सुनु हमर प्रिय उप्मा नाज सिखनिहार शिष्यगुरुक देहक गती देखयत अच्विया अपन देहमे उही क्रमक अनुकरन करईत अच्वियुक अगती स्वयन शिष्यक देहमे नही चली अबआत अच्विय.
  146. 17:55–18:01तहिना वेद पात, हर पीदी नव उचारन, पुरान क्रमक अनुकरन में
  147. 18:01–18:10तक्हन प्रष्न प्रल्यक बाद, जक्हन सब कंठ माँन, सब स्म्रिति लुप्त, नव स्रिष्टि में उक्रम के देखाओत.
  148. 18:10–18:23जेमनी कहाइत चति स्रिष्टिप रलः हो इते नही अची, व्यासक अनुयाई कहाइत चति सर्ववध्य परमात्मा, रस्रिष्टि में भेटके पूर्वस्रिष्टिक उही क्रम में फे रचाइत चति.
  149. 18:23–18:33अदूनु मे मेल एताय अची अपारुशेएक कवर्त तूनु पक्ष्के स्विकारियरुक मे एत्भे थेक रच्चिताख पूर्न स्वतन्त्रताख अबहा.
  150. 18:33–18:42इश्वरोस वछ्छन्द नही रच्यत छत्छी, उ पूर्वक्रमक अनुगामी छत्छी, जेना आहाक पात परमपरा.
  151. 18:42–18:55अन्यम अतल रहेत अची, कोनो स्रिष्ट में ब्रह्महत्तिया पुन्य नहीं होएत, ना अश्वमेद पाप जेना अगिन कहीो नहीं भिज्बैत अची, जल कहीो नहीं जर बैत अची.
  152. 18:55–19:00अदोसर अर्थ, शास्त्र ब्रह्मक योनी प्रमान अर्थ
  153. 19:00–19:042. सर आर्थ पहिलुक द्हाल थेख
  154. 19:04–19:18जके अ भुजने हो जे जन्मादी सुत्र अनुमान चल तैं इ सुत्र ओकर भ्रम कातैत अचिए ब्रह्मक असाद्धारन स्वरुपक ज्यान के वल शास्त्रसच ना आख्फिसं नतरकसं
  155. 19:18–19:24शास्त्र ब्रह्मक योनी ठेक ओखर एक मात्र प्रमान दवार
  156. 19:24–19:31आथिक एताएत मित्र लोकनी इसाज अपन अस्ली रन्भूमी पर पहुछल
  157. 19:31–19:39कि एक तन जब ब्रह्मक एक मात्र प्रमान वेद ठेक, ता आब वेदक प्रयोजन पर निरने होएद अनिवार्या
  158. 19:39–19:48आओी प्रशन पर हमर सोजा भैसल जैमनिक इशिष्य अपन समप्रदायक समपुन सेनाला का थाडचती.
  159. 19:48–19:52मी मान सक दिस्खुमैत आहाक भारी मित्र.
  160. 19:52–20:02पूरा भल्स आउ काल ही हम नयाएक के कहने रहीनी जे दूर्गक केंद्र चोडनिहार के बाहरी दिवाल समर्पित करबाक आवश्षकता नहीं.
  161. 20:03–20:07आई हम अपन दूर्गक पातक अपने खोली रहे लची.
  162. 20:07–20:19अंक चतूर्त् समन्वय चतूर्त् सुत्रक तत्तू समन्वयात् मुदाउ समन्वयक्कारने
  163. 20:19–20:24मी मान्सक कर्म कान्दी सबहाक मद्यमे आबैट्छती
  164. 20:24–20:29दीप उच्कायल जाएत अची इसाजक सबस्पैक वाध थेग
  165. 20:29–20:34तक्हन सुनु जमनेक सम्पून पक्ष्ट बिनु कातल चान्तल
  166. 20:34–20:38वेदक प्रयोजन एक कर्म में प्रव्रित्ती कराईप
  167. 20:38–20:42आमनायसे क्रियार्थत्वात वेदक्रियार्थ ख्धिक
  168. 20:42–20:49वाखिय खक्रा की देलक, ज़ सुन्निहार फल आने नहीं जाए, तं वाखिय हवामे बिलागेल.
  169. 20:49–20:57सिथ वस्तुख कतन यातं विर्ठ, या आन प्रमानक जुट, जे आखि देखि सकेत अखिय खक्रा वेद की एक कहत.
  170. 20:57–21:06सिद्वस्तुक्त्ठन्यातं यार्थ्या आन्प्रमानक्जूथ जे आखि देखि सक्यत अचि तक्रा वेद कि एक के हैत.
  171. 21:06–21:36तने वेदान्त वाख्यत तीने तागती याता उ कोनो विदिख शेष्थिक करतावा देव्ताक स्वरुब बत्बैत जेना वायुर वैख्षे पिष्ठा देव्ता यग्यक अंग या उस्वया उपास्ना विदिख आत्माद्रष्थ्विया माने आत्माक ध्यान करू प्रतिप
  172. 21:36–21:47तव उवाक्य सिद्द ब्रहम भाव देद, तन सुनिते मुक्ती मुदा सुन्निहार साज्ज्मे फेर तमसाइत अच्छी, फेर देराइत अच्छी.
  173. 21:47–21:59तने मानु सिद्धक कतन निष्फल, वेदान्त विदेक सेवक, आवाक आत्मा युप आवावने जका, कर्म कान्धक एक्ता अंग जकर ज्यान यग्यक हे तु चाही, मुख्षक हे तु नही.
  174. 21:59–22:04गहिंग काना फूसी, पक्ष पूरा बल स्थाद भेल अची.
  175. 22:04–22:17उठैत आचार्या सन्सन नीचा आबैत, काल हीजका, एक्ता दूर्ग, इमान्दारीस बनाओल आहम एक्रा उत्भे इमान्दारीस़, पातर पातर उतारभ.
  176. 22:17–22:29पहल पातर सिद्धक कतन निष्फल सूत्रक उत्तर एक ही शब्द में अची समन्वयात की एक तन सब्धावे दान्त वाख्या एक ही तात पर्यमे मिलात अची.
  177. 22:29–22:59सदेर सोमेद मगर आसीत है सोमै, आरमभमे सक मात्रच्छल, एक मेवाद्वितिम, एक अद्वितिय, आत्मावा इद्मेक एवागर आसीत, आरमभमे आत्मे मात्रच्छल, उपक्रम्स, उक्सनार गरी एक ही सुर, आत आत पर्यनिरनयक निम्तिक, जे कहल गेल अचि तक्रा चो�
  178. 22:59–23:05उद्दानिश्पल ताक उत्द कताए, कतन रहाई ब्रहमक फलकी
  179. 23:05–23:10आए ताई प्मित्र आख अपन कसाउती आख विरुद गुमत
  180. 23:10–23:13सिद्दख कतनिश्पल अच्फा
  181. 23:13–23:19एक ता कता सुनु जे हमर भामतीक सबस प्रियपन्ना थिक
  182. 23:19–23:21भामतिक सबस प्रियपन्नातिक
  183. 23:21–23:29एक्ता ध्रविध, जे आर्यभाशा एक हु आखर नहीं जनैत अच्छी, सब हामे बैसल अच्छी
  184. 23:29–23:42दूत आबिक देव्दत्तस कहेत अची देव्दत्त आहाक कल्यान हो आहाके पुत्रभेल अची देव्दत्तक दे पुल्कित आखियामो फुलल कमल जका खिलल.
  185. 23:42–23:45द्रविड की देख्लक
  186. 23:45–23:51कोनु क्रिया नहीं देव्दत उठिक कतू नहीं गेल, किछु नहीं काएलक.
  187. 23:51–23:56केवल एक्ता सिध समाचार, पुत्र भेल आ आनन्दक जवार.
  188. 23:56–24:02औही पुलक्स ध्रविड भूजी गेल, एही वाक्य में कोनो प्री आर्थ चल.
  189. 24:02–24:06तंकहू सिध्धक कतन निष्फल.
  190. 24:06–24:12एक्ता वाक्य, बिनु कोनो आग्याक, मनुष्यक रोया ताड का देलक.
  191. 24:12–24:26आज्या पुत्र भेल इछ़ोट सिद्दि एतेक फल दैत अछी, तन्तों स्वयावो अबहे, अजर, आम्रित ब्रहमाचे इज्दि सुनीजकर अविद्याक गिरहे कटैट शैक, अकर फल की कम.
  192. 24:26–24:32पहल्बेर एक देक पाषु तक्हन आत्माद्रष्ट्व्या जका विदेरुप वाख्यक की करब.
  193. 24:32–24:35देक बाक चाही इता आगे ठिक
  194. 24:35–24:44आग्याक तुब छिक, आग्याक बल नही, जेना पातर पर चलाओल चूरी, आकार चूरीक, दार भोत.
  195. 24:44–24:56इवाके कोनो नव करतविय नहीं लाड़ अची, इखेवल बाहर मूलोक के, जे स्वबहाव वष्विषय दिस भहेत अची, गूमाक भीतर दिस भहभेत अची.
  196. 24:56–25:02नदीक दार के बान हमोड़़ अची, नव जल नहीं उपच भै.
  197. 25:02–25:20अस्लिकाज उही वाक्यक थेक जे मोडलाक बात भेटात अची, तत्वम्सी आ उ वाक्यविधि थेक की सिद्भोदख, एकर निने आहाक अपन उही भेट्सा होएत जे हम तो सर अंक मे राखने रही, आ आब उ तर्वारी म्यान्सा निक्लत.
  198. 25:20–25:50ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  199. 25:50–25:54वम नहीं भूजि सकब लाग चाहीो का
  200. 25:54–25:58जान वस्तुक अदहीन करताक नहीं
  201. 25:58–26:03तने ब्रह्मा जानु कहीो विधिक विषे भहीं नहीं सकैत अची
  202. 26:03–26:07जानब आग्यासन नहीं प्रमान सहोएत अची
  203. 26:07–26:11अप्रमान उपनी शद्वाक्यर सोजा तार अची
  204. 26:11–26:15वज्वाँ पत्ती अखन हु जीवेत अची
  205. 26:15–26:21तत्वम्सी सुन्लाक बादो भाइशोग जहनाक तहनाक तो ग्यान भेल्कत है
  206. 26:21–26:27की एक तन सुनब अजानब मे उत्वे दूरी अची जत्वे भीज आगाच मे
  207. 26:27–26:31अप्दूरी अची जग्भे भीज आगाच मे
  208. 26:31–26:40श्रवन पहिल देग, तकर भाद मनन तर कस अर्खध द्रिधि करन तकर भाद निदिद्यासन धारावाहिक भावना
  209. 26:40–26:52साजक जुर्जूरी में तूथ आकी मनुशे य संशे जाभे गुर्या रहल अची, ताभे निष्चे नही आशनशे सहित सूनल वाखे ज्यान नही ज्यानक आरम्ब थिग.
  210. 26:52–27:05जेना संगीतक विद्यारती पहिल दिंच ज्रिश्ग सुनेत अची, वर्षक अभ्यासक बाद चिनहेत अची कानवे, स्वरवे, मुदा साख्षाख्षाख्चार अभ्यास्सं.
  211. 27:05–27:15अजखन साख्शाखार होएत अछी, तखन की होएत अछी से चारी नकार सचुनु की एक तं एह एह अद्द्यायक शिक्र थिग.
  212. 27:15–27:22मोख्ष उपन्वस्तु नहीं जे उपजैत अछी से नश्ष्त होएत अछी द्यालजका.
  213. 27:22–27:28विकार नहीक दूद संद ही भेल वस्तु नित्य नहीं रहें
  214. 27:28–27:39संसकार नहीं संसकार दूई रंगक गुन जोडब, जेना अद्हुलर्स स्फतेक रंगब दोश हताएप, जेना इंताक चुनस दर्पन मानजब
  215. 27:39–27:49ब्रहम्मे नकिचु जोडल जासकैत अची, नहो ही में किचु हते बाजोग अची, दरपन माजने मनी नहीं चमकैत अची,
  216. 27:49–27:57सनानो पन्यनक शुद्धी जीवक अपादेक शुद्धी ठेक, जेना नाएकाक सुगन्द होकर सक्षीः पर चदल भुजाएत अची,
  217. 27:57–28:03आप राप्ती से हो नही आईते हमर सबस प्री उप्मा नाहक यातरी
  218. 28:03–28:16नाह भीच दार दिस बड़ेत अची किनारा, फेन लहरी सब पाषु चुतेत जाएत अची आईयातरी पहुचेत अची औही निस्तरंग, शान्त, स्वच्ष, स्तिर मद्यमे
  219. 28:16–28:19कि उ मद्यनव भेतल
  220. 28:19–28:31नही जल्तन सबतरी चल, उ केवल लहरिस धल, ब्रहमा सरवगत्त्तिक, नित्यप्राःत, प्राःतिक भ्रम केवल लहरिक चल,
  221. 28:31–28:43चारु गती बन्नेग एही चारिक अत्रिक्त पाच्चं कोनो भाट नहीं जाहिसं कर्म मुक्ष्मे पैसशे, तने ग्यान के चोडी कर्मक चाहो मुक्ष्मे नहीं पैसशेत अची.
  222. 28:43–28:45बहुत काल मून
  223. 28:45–28:50फेर दिरे संग लगबबग अपनहीस अजे जीवध जागेत इजानी गेल
  224. 28:50–28:54शरीर तर रहभे करतेंख बूख लगबे करतेंग
  225. 28:54–29:24ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  226. 29:24–29:54आ उही दिन, मित्र, एक ता आश्चर यहोएत अची जक्रा हम एही साजक अन्तिन वाख्य बनाएप आजब रहमास्मी एही ज्यान में सब विदिया सब प्रमान समाप भाजाएत अची प्रमान प्रमाता सापेच्ष, जते प्रमाता भाव गलल, उते प्रमान से हो विष्रान्
  227. 29:54–30:01अपन आसन्सन उटेक, हात जोडी पराज मे नही, उही आदर मे जे काल ही नयाएक देखाने चला.
  228. 30:01–30:07अपन आसन्सन उटेक, हात जोडी पराज मे नही, उही आदर मे जे काल ही नयाएक देखाने चला.
  229. 30:07–30:37ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
  230. 30:37–30:44आईईशन सुन्नर वाके पर कोनो समन्वाई वात कहीो समाबत नहीं भेल आची
  231. 30:44–30:46उपसंहार
  232. 30:46–30:50सुत्रदार वापस आबैत आपछी
  233. 30:50–30:57उमेज परक पोठी उट्बैत आची आद्वार लगक शंक्खक बगल में राखी दैत आची
  234. 30:57–31:03खाल ही यी शंक हम्रा सब के सिखाँने चल जे व्रम की ठेक.
  235. 31:03–31:12आए यी पोती सिखालक जे व्रमसन निकल बाक रस्ता कते लिखल अची आ औरस्ता आग्या नही ठेक, समाचार ठेक.
  236. 31:12–31:21आाके पुत्र भेल एप बे सुनिक देवदद्ध्तदे पूलकित भागेल च्ल, दूत कोनो काज करे नहीं कहने च्ल.
  237. 31:21–31:32उपनिषद उहने दूत ख्छ, आा उकर समाचार एहिसं पैग, जक्रा आा जनम भरी ताकेत रहल हूँ से आाक अपन गरदने मे पडल रहार ख्छिए.
  238. 31:32–31:49चारी सुत्र चारी देग चल, जिग्या साक अदिकार, ग्रहमक लक्षन, शास्त्रक प्रामानिय, आतात पर्यक समनवय, आचारू देग एक ही देहली इस दिस, जते सुन्निहार भूजीजाएत अची जे दूत जकर चर्चाका रहेल चल से आन के हो नही.
  239. 31:49–32:00ज़ाहा आई राती पोठी आपन मोन में लाका जा रहे जी, तं ओख्रा माला जका राखभ, पूइश्रू तिक खेक, दागा सुत्रकारक आगुतभ.
  240. 32:00–32:04गुतभ रहेक पडनिहार के अपने पड़च्छै
  241. 32:04–32:08सब पात्र प्रस्थान कर अच्छ थी
  242. 32:08–32:13दीप सबसा अंप में बाहर जाएत अच्छ आपो थी
  243. 32:13–32:16संगे संग द्वार लक चुटर रही जाएत अच्छी

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शंक्खा रजत उत्तरार्द, चारी सुत्रध आई रातिक सबहा, सुत्रदार, वाचस्पती मिष्र, मी मान्सक, कर्मकान्टी, आक्षेपक, शंकी, एक्ता युवा सन्यासी, शिष्ष्ट, परिषद भामतिक तर्क पर आदारित इमूल ग्रन्त्ख अनुवाद नहीं अची, अपितु एक ता स्वतन्त्र स्रिजनात्मक ग्रिति ख्यक. प्रस्तावना सुत्रदार प्रवेश कर अची, अची दिस इशारा कर अची. खाल ही राती एही सबामे शंक आचानिक कता भेल द्रम की खेल, आव उकर उतर सन्सारक विष्मे की कहत अची. बचल केवल एक्ता द्वार, शब्द वेद आखिक वोही द्वार पर आई रातिक विरोदी थाडचत्छति अग्दा वाद एक्ता वचन पर समाप्त भेल चल जे अख्चन द्हरी निभाँल नही गेल अखि उक्रा नहीं देख हैत अच्छि अनुमान अच्रा नहीं आपाइत अच्छि बचल केवल एक ता द्वार शब्द वेद अख्छिक अही द्वार पर आई रातिक विरोदि थाड चति जमनिक शिष्ष, जे कहता, वेद हमर अची, आवेदक एक मात्र काज कर्मक आग्या देप्ठेक यग्य करु, होम करु, आजे वाख्य कुनो कर्मक आग्या नहीं दैत अची, से यातम विर्त अची, या कुनो आग्याक सेवक. तत्वम्सी तो वेह छे एहि में कोन आग्या? तने को कहता, वेदान्त या तम्मान रहाई, या कर्म्कान्डक डासी बने. मेज पर राखल उपोत्फी में बाद्राईनक चारी सुत्र लिखल अची, चारी चोट वाख्य, जक्रापर वाचस्पती मिष्र अपन भामतिक सब्स पैग भाग रचलनी. आई राति उ चारु सुत्र चारी सीधि बनत आज सबस उपर का सीधि पर उवाद होएत जक्राशास्त्र समन्वै कहेत अच्छी वेदक प्रयोजन कर्म थेक वाग्यान. प्रस्थान अंक प्रत्हम गरद्निक हाए प्रथम सुत्रग अथातो ब्रह्मजिग्यासा, तक्हन ते ब्रह्मग्जिग्यासा वाचस्पती आसीन छत्ही एक्ता यूवा सन्यासी प्रवेश करेद अची प्रनाम करेग आचार्य, हम अक्ता प्रश्नलाका आयल चीजे हमर गुर्कुल मे आगी जका पस्रल अची. सुत्रक पहल्षब, अत्त, ठिक, तक्शन, हमर कर्मकान्दी सहपाती कहेत चत्छी, तक्शन, माने, दर्मज यासाक बाद, पहिने पूरा मीमान्सा पडू, ब्रावाँ जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्दक पह्रा आची ब्रावाँ आची ब्राँँ जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्दक पह्रा आची ब्राँँ जिग्या साग द्वार पर कर्म्कान्दक पह्रा आची वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अद्या पी उवे आपी तु आनल नहीगे अद्या पी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आपी अवे आ� ख़ेत अच्छि आख्बाके चाही वेदद्जयन समात कैने विद्यार फीक सोजा दुई मार्ग, दर्म विचार आब्रहम विचार वेदजयन समाप्त कैने विद्यार थीक सोजा दुई मार्ग, दर्म विह्चार आब्रहम विचार दर्म विचार पहिने, की एक तंकर्म फल्डदध अछी, स्वर्ग, संतती, सम्रद्दि, आप फलक, हे तुप्रव्रित्ती स्वाभिट अब्रहम ग्यान से हो, जब प्हेत, तंकर्मक, शुद्द्दिसर, चित, निर्मलभेने तने क्रम बान्हल अची पहिने कर्म, तक्हन ग्यान, जेना पहिने केट, जोतलजाइत अची तक्हन भीज तनेक्रम भानहल अची पहिने कर्म, तक्हन ज्यान जेना पहिने केट जोतल जाएत अची तक्हन भीज खेटक उप्मा हम्राप्रिय अची ते उक्रे सवुत्तर देप मुदा पहिने अच्ताभेद जक्रापर इस समपून अंक्तिकत दर्म अब्रहम्मे की अंतर द्र्म साद्यत्त, कयल्जाय्वाला, भविष्यक् वस्तु, यग्याई, स्वर्क्कालि, ब्रह्मा सिध्ध्ध, पहिन्हिस्च, सदासर, प्राप्त, आईईभेद सम्पूल्न, क्रम्वाद्के काटी दैत अची. जे वस्तु कयल जाएत अछी, वो कर चारी गती, उत्पती, जेना अतासं, रोती, विकार, जेना दहन्सं, चार, संसकार, जेना वोक्रिपर, जल छिडकभ, प्रापती, जेना गाए, दूभ, ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ तक्हन कर्मक कोनो स्थाने नहीं हमर समपुन शास्त्रव्यर्त थीक विप्रीत स्थान अची मुदा सिनहासन नहीं सीदी सूनु क्रम नित्यकर्मस पापकषे पापकषेस चित्तषुद्दी चित्षुद्दिसं वेरागय वेरागय से जिग्यासा वर्दा अटेने हार नाच नहीं करेत अची, मुदा नाच अख्रे बिनू नहीं देखाएत अची. अजज़ के उ कहे जे क्रम अनिवार्य अच्छी जे सन्यास के वल्ग रहस्तक बाद तनजाबालश्वृती ताड अच्छी यदरे विर्जे तदरेव प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्रवरजेद प्र जाही दिन वेरागे उपजगे, उही दिन निकलीजा. ब्रहम्चर्येसं सुजे सन्यास, श्रूती स्वया द्वार खोलने अची. यूवा सन्यासी दिस, अहाक सहबाठी के कहबनी द्वार पर पहरा नही अची, केवल एक्ता दहलीज अखी आवकर नाम अखी आथ हद्धे. अता सुत्रक दो सर शवत. अखर आदित. चारी सादन जे बिनु जिग्यासा जिग्यासे नही नित्यानित्यक विवेक, हिलोक पर लोकक भोगसं विराद शम्द्मादी सम्पती आम उमुख्षा. आए ते पूर्वपक्ष एक्ता रस्गर आपती अनैत अची, जे हम पूरा स्वाथसं सूनाएप वेरागे किए. माच में कांत अची तनकी लोक माच छोडी दैध अची? कांत भीछिक मासु खायत अची. दान में भूसी अची, किसान दान नहीं फेकःत अची. विखारिक दरे के अ भानस बन नहीं कर अची तहिना सन्सार में दूवक मिलल अची तंकी, दूवक शोडु, सुख्ख भोगु रसेथ, आईकर उत्तर उत्तर एक ही वाख्यमे, माचक कांत अलग अची, ते भीछल जाएद अची मुदा जाही भोजन में विष मदूमे गोरिक मिला उल्गेल हो, औही में सचन्सारक सबस निपुन रसोयो के वल मदूं नहीं का सकैत अची. सन्सारक सुख होने खेक, दूवक होही में गोरल अची, भीचल नहीं जाएत. आज सोम पील हो आमर भेल हो जकाश्रूती. पुरान स्वयं ताला को लैत अची आप्रलिस ठाएत्व के नमरता के है जाएत अची गोन अमरता प्रलैद हरेक सच्चा नहीं. शम्दमक फल्ट जेना शान्त आस दहाल बाचा हर में जोते जोग होएत अची चंचल मन कोनो जूा नहीं उठा सकैत अची एक ता अंतिन गिरह, वाचस्पती आई शब्दक गिरह थिक ब्रह्मजिग्यासा एही समास में ब्रह्मना कोन विबखती किचु प्राछीन व्याख्याकार कहत, चत्छतुर्ति, ब्रहमक, हेतु जिग्यासा, तक्हन ब्रहमाजिग्यासाक विषै नही, प्रयोजन भेल, आअ आअक समपूनक विषारक विषै ब्रहमा थिक य भवन खसी पडत. आई एह उस्तान थिक जतै हम अपनासं पहिलुक तीका कार स्कूलिक असहमत्ख्षी शास्त्र में इमान्दारी एही में थिक जे मत्भेद नुकाल नहीं जाए. समास शष्ती तत पूरुष्तिक ब्रहमक जिग्यासा कर्मनी शष्ती ब्रहमा विश्याय. कि एक तन जिग्यासा एक ता सकर्मक बूक थेख. सूर्यवा चन्द्र देखिक के औनही पुछ़ेत अच्फी इखेकर, मुदा ज्यान शब्द सुनेते प्रषन अपने उठैत अच्फी खेकर ज्यान, कत्फीख ज्यान बिनु विष्यक अदूरा वाखे खेख. आशेश जे किछु ब्रहमस जुडल, सादन, फल, प्रकार से अपने गिचा का आभीजाइत अच्छी, जेना राजाजाइत छती, सुनिते परिकर सेट राजाएत बुजाइत अच्छी, मंत्री, छत्र, सेना के उ आलगसन नहीं कहेट अच्छी. प्रणाम करेद, हम आपन गुरुकुल जाक कहबनी द्वार खुजल अची आचाभीक नाम वेरागयतेक, वेतन नहीं. अंक दुटिय, माला आदागा दुटिय सुत्रक जन्माद यस्ये यत ہے जक्रास एही जगत कजन्मादी निक आचार्यक जिग्यासाक अदिकार सिद्ध मुदा जिग्यासाके कर ब्रहमक अब्रहमाकी एता आवाके कालहिक उही शंक्पर वापस गीचब जते एक वस्तु हम जनेप छी, गेल, गाछ, दे, सब सीमित, जर्द नष्वर ब्र्हम के आहा एही सबख्विप्रीद कहेच्छी अन्थ्चेतन नित्यः, तक्हन उकर लक्षन की देब, उकर अपन कोनो गुन हम्रा परिच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च् जेना सुर्यक गती सोजे नहीं देखायत अची, मुदा भोर मे पूभ आशाज मे पच्छम, ठाम ठाम वोकर पहुच़, वोकर गतेख छिनह बनी जायत अची. तहिना जगत जे ब्रहमस उप्जल, ब्रहमक छिनह थेख, यद्यपी ब्रहमा सवया अखिसन उचल. ब्रह्मक छिनहतेग, यद्यपी ब्रह्मा स्वया आखिसन उचल जन्मादी जन्म आदी की की गनब एही आदी में यासकक निरुक्त चैविकार गन्बैत अची जन्म, अस्तित्व व्रिद्ध्धी परिनाम अपक्षैट नाश् सुत्रकार तीनेटा की एक लिलनी ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ वाणी लेल हु लक्षन, मुदा आब अस्ली प्रष्ने इसुत्र की थिक, की इक ता अनुमान छिक जगक करता अची कार्या होई बाक कारने ध्यल जका. जहाँ तनकाल हुका बोध फेर बजाँ, उ एही अनुमान्स लडि लेता, आहाख ब्रहमातर कक तराजुपर लटकल रहेत, जताय उद्यन अगंगेषक इश्वर लटकल अची. पोति उथबआत, शनहसं, आहे है एही अंकक रड़े थेक, ते दिरेसं सूनु. नहीं की सुत्र स्वत्ट्ट्र अनुमान नहीं थेख जगत कर अचना देखिक, नाम रूक्स भाईतल, अंगिनत करता बूक तास भरल, देश कालनिमित्तसा एहन सदलजे मन्स कलपनो कत्हिन, कारी हरिन केवल कोनो-कोनो देश में, कोलक्को केवल कोनो-कोनो रितु में, बगुलीक गर्व वर्षाक, पहिलगर जन्सम की सभ देखिक सुत्रक आस्लिकाज दोसर अची, सुत्रक प्रयोजन थिक वेदान्त वाख्यस्भ के मालाजका दागामे गुतभ, फूल्ष्रूतिक थिक, यतोवा इमानी भुतानी जायंते. तद ब्रहमा भ्रिगुवरून समवाद, तट्तीरी. सुत्र केवल दागा थिक. ब्रह्मा शब्द्ग्गम अद्ख, तर्कक तराजुपर उ कहीो चदभे नहीं कहे तक्ठन्तर्क कोनो स्थाने नहीं आहाक गर में स्थान अची श्रुतिक अनुगामी तर्कक, स्वतन्त्रक नहीं श्रूति स्वयंकहेत अच्छिक पन्दित बुद्धिमान पुरुश गान्दार देश पहुचेत अच्छिक मुदातकने, जगन पहिने के उक्रा रस्ता कही दैट चैए. कहनिहार श्रूति चलनिहार तर्क आईते अक्त भेद राक्छिलिय, जक्रापर चारिम अंकक समपून युध्ध लडल जाएत, दर्मजग्यासा आब रह्मजग्यासात प्रमान में अक्ता जडिक अंतर अची. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अब्रहमद्यान वस्तुग्यान थेक विदिनही यी वाक्यमोन राखू चारिम अंक में तर्वारी बनत अंक त्रीतिये नर्टकक दे है त्रीतिया सुत्र, शास्त्रयो नित्वात, शास्त्रक योनी होई बाक कारने तेसर सुत्र चोत अची आचार्य, मुदा दुमहा भुजाएत अची शास्त्रयोनित्वात, के अ पड़़ अची ब्रहमा शास्त्रक योनी ठिक, वेदक कारन, के अ पड़़ अची शास्त्र ब्रहमक योनी छिक, ब्रहमक प्रमार. कुन छीक? तुनु आदुनु के क्रम्सं सुनु कि एक तन तुनु मिलिक एक दूस्रा के दारन कर आची जेना महराबक दूई पातर. पहल आर्त्रिग्वेदादी विशाल शास्त्र राशिक अंगिनत विद्याक शाखासव, भरल दीप जका सभ वस्तुप प्रकाषक एकर स्रोट ब्रहमात्धिक, आस्रोट होईबाक कारने ब्रहमक सरवगता सिध. निम सोज अची ग्रन्त्कारत ज्यान ग्रन्त्स पैग होईत अची पानेनी व्याकरन रचलनी की पानेनिक ज्यान अच्ताद्याई में अटागेल नहीं कुशिलक रस् दूद आगुडक मिठासक भेद जी जनैत अची वानी नहीं कही पबैत अची वक्ताक ज्यान सदा वचन सागु तन्जकर वचन वेद थिक, एही महान सत्ताक नहिज्वास जका ओकर ज्यानक सीमा के बान हद उठैत आप गंवीर आई थी, वाचस पती, हमर गरक सबस पुरान दिवाल ताड अची, ताड अची आहम देख़ई चाहब आहा एक्रा कोना गिराभी वेद करता वेद अपारुषे थिक अनादी पात परमपरा, गुरुस शिष्ष्ः, शिष्ष्ष्ष्ष्ष्ः कोनो पहल रच्चिता बिनू जमनिक सम्पुन गर्षन एही पर थाड अची जकर मोनही, तकर दोष नहीं. दीवाल गिराएब नहीं, मित्र एक हम उक्रा सरकाएब, आहा देखफ जे सरकलाएक बादो उटाड रहेथ. पहिने एक ता बात जे आहुक माने पडद, आहा वरन के निट्यक है ची गग ध्वनी सदा एक मानी ले. मुदा वाक्यः पदको विषेश क्रम को अनुपूर वी, क्रमतं उच्चारन में बनैत अच्छ आ उच्चारन अनिट्य. तने वेद्वाक्यक अभिव्यक्ती हर भेदनव आब सुनु हमर प्रिय उप्मा नाज सिखनिहार शिष्यगुरुक देहक गती देखयत अच्विया अपन देहमे उही क्रमक अनुकरन करईत अच्वियुक अगती स्वयन शिष्यक देहमे नही चली अबआत अच्विय. तहिना वेद पात, हर पीदी नव उचारन, पुरान क्रमक अनुकरन में तक्हन प्रष्न प्रल्यक बाद, जक्हन सब कंठ माँन, सब स्म्रिति लुप्त, नव स्रिष्टि में उक्रम के देखाओत. जेमनी कहाइत चति स्रिष्टिप रलः हो इते नही अची, व्यासक अनुयाई कहाइत चति सर्ववध्य परमात्मा, रस्रिष्टि में भेटके पूर्वस्रिष्टिक उही क्रम में फे रचाइत चति. अदूनु मे मेल एताय अची अपारुशेएक कवर्त तूनु पक्ष्के स्विकारियरुक मे एत्भे थेक रच्चिताख पूर्न स्वतन्त्रताख अबहा. इश्वरोस वछ्छन्द नही रच्यत छत्छी, उ पूर्वक्रमक अनुगामी छत्छी, जेना आहाक पात परमपरा. अन्यम अतल रहेत अची, कोनो स्रिष्ट में ब्रह्महत्तिया पुन्य नहीं होएत, ना अश्वमेद पाप जेना अगिन कहीो नहीं भिज्बैत अची, जल कहीो नहीं जर बैत अची. अदोसर अर्थ, शास्त्र ब्रह्मक योनी प्रमान अर्थ 2. सर आर्थ पहिलुक द्हाल थेख जके अ भुजने हो जे जन्मादी सुत्र अनुमान चल तैं इ सुत्र ओकर भ्रम कातैत अचिए ब्रह्मक असाद्धारन स्वरुपक ज्यान के वल शास्त्रसच ना आख्फिसं नतरकसं शास्त्र ब्रह्मक योनी ठेक ओखर एक मात्र प्रमान दवार आथिक एताएत मित्र लोकनी इसाज अपन अस्ली रन्भूमी पर पहुछल कि एक तन जब ब्रह्मक एक मात्र प्रमान वेद ठेक, ता आब वेदक प्रयोजन पर निरने होएद अनिवार्या आओी प्रशन पर हमर सोजा भैसल जैमनिक इशिष्य अपन समप्रदायक समपुन सेनाला का थाडचती. मी मान सक दिस्खुमैत आहाक भारी मित्र. पूरा भल्स आउ काल ही हम नयाएक के कहने रहीनी जे दूर्गक केंद्र चोडनिहार के बाहरी दिवाल समर्पित करबाक आवश्षकता नहीं. आई हम अपन दूर्गक पातक अपने खोली रहे लची. अंक चतूर्त् समन्वय चतूर्त् सुत्रक तत्तू समन्वयात् मुदाउ समन्वयक्कारने मी मान्सक कर्म कान्दी सबहाक मद्यमे आबैट्छती दीप उच्कायल जाएत अची इसाजक सबस्पैक वाध थेग तक्हन सुनु जमनेक सम्पून पक्ष्ट बिनु कातल चान्तल वेदक प्रयोजन एक कर्म में प्रव्रित्ती कराईप आमनायसे क्रियार्थत्वात वेदक्रियार्थ ख्धिक वाखिय खक्रा की देलक, ज़ सुन्निहार फल आने नहीं जाए, तं वाखिय हवामे बिलागेल. सिथ वस्तुख कतन यातं विर्ठ, या आन प्रमानक जुट, जे आखि देखि सकेत अखिय खक्रा वेद की एक कहत. सिद्वस्तुक्त्ठन्यातं यार्थ्या आन्प्रमानक्जूथ जे आखि देखि सक्यत अचि तक्रा वेद कि एक के हैत. तने वेदान्त वाख्यत तीने तागती याता उ कोनो विदिख शेष्थिक करतावा देव्ताक स्वरुब बत्बैत जेना वायुर वैख्षे पिष्ठा देव्ता यग्यक अंग या उस्वया उपास्ना विदिख आत्माद्रष्थ्विया माने आत्माक ध्यान करू प्रतिप तव उवाक्य सिद्द ब्रहम भाव देद, तन सुनिते मुक्ती मुदा सुन्निहार साज्ज्मे फेर तमसाइत अच्छी, फेर देराइत अच्छी. तने मानु सिद्धक कतन निष्फल, वेदान्त विदेक सेवक, आवाक आत्मा युप आवावने जका, कर्म कान्धक एक्ता अंग जकर ज्यान यग्यक हे तु चाही, मुख्षक हे तु नही. गहिंग काना फूसी, पक्ष पूरा बल स्थाद भेल अची. उठैत आचार्या सन्सन नीचा आबैत, काल हीजका, एक्ता दूर्ग, इमान्दारीस बनाओल आहम एक्रा उत्भे इमान्दारीस़, पातर पातर उतारभ. पहल पातर सिद्धक कतन निष्फल सूत्रक उत्तर एक ही शब्द में अची समन्वयात की एक तन सब्धावे दान्त वाख्या एक ही तात पर्यमे मिलात अची. सदेर सोमेद मगर आसीत है सोमै, आरमभमे सक मात्रच्छल, एक मेवाद्वितिम, एक अद्वितिय, आत्मावा इद्मेक एवागर आसीत, आरमभमे आत्मे मात्रच्छल, उपक्रम्स, उक्सनार गरी एक ही सुर, आत आत पर्यनिरनयक निम्तिक, जे कहल गेल अचि तक्रा चो� उद्दानिश्पल ताक उत्द कताए, कतन रहाई ब्रहमक फलकी आए ताई प्मित्र आख अपन कसाउती आख विरुद गुमत सिद्दख कतनिश्पल अच्फा एक ता कता सुनु जे हमर भामतीक सबस प्रियपन्ना थिक भामतिक सबस प्रियपन्नातिक एक्ता ध्रविध, जे आर्यभाशा एक हु आखर नहीं जनैत अच्छी, सब हामे बैसल अच्छी दूत आबिक देव्दत्तस कहेत अची देव्दत्त आहाक कल्यान हो आहाके पुत्रभेल अची देव्दत्तक दे पुल्कित आखियामो फुलल कमल जका खिलल. द्रविड की देख्लक कोनु क्रिया नहीं देव्दत उठिक कतू नहीं गेल, किछु नहीं काएलक. केवल एक्ता सिध समाचार, पुत्र भेल आ आनन्दक जवार. औही पुलक्स ध्रविड भूजी गेल, एही वाक्य में कोनो प्री आर्थ चल. तंकहू सिध्धक कतन निष्फल. एक्ता वाक्य, बिनु कोनो आग्याक, मनुष्यक रोया ताड का देलक. आज्या पुत्र भेल इछ़ोट सिद्दि एतेक फल दैत अछी, तन्तों स्वयावो अबहे, अजर, आम्रित ब्रहमाचे इज्दि सुनीजकर अविद्याक गिरहे कटैट शैक, अकर फल की कम. पहल्बेर एक देक पाषु तक्हन आत्माद्रष्ट्व्या जका विदेरुप वाख्यक की करब. देक बाक चाही इता आगे ठिक आग्याक तुब छिक, आग्याक बल नही, जेना पातर पर चलाओल चूरी, आकार चूरीक, दार भोत. इवाके कोनो नव करतविय नहीं लाड़ अची, इखेवल बाहर मूलोक के, जे स्वबहाव वष्विषय दिस भहेत अची, गूमाक भीतर दिस भहभेत अची. नदीक दार के बान हमोड़़ अची, नव जल नहीं उपच भै. अस्लिकाज उही वाक्यक थेक जे मोडलाक बात भेटात अची, तत्वम्सी आ उ वाक्यविधि थेक की सिद्भोदख, एकर निने आहाक अपन उही भेट्सा होएत जे हम तो सर अंक मे राखने रही, आ आब उ तर्वारी म्यान्सा निक्लत. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ वम नहीं भूजि सकब लाग चाहीो का जान वस्तुक अदहीन करताक नहीं तने ब्रह्मा जानु कहीो विधिक विषे भहीं नहीं सकैत अची जानब आग्यासन नहीं प्रमान सहोएत अची अप्रमान उपनी शद्वाक्यर सोजा तार अची वज्वाँ पत्ती अखन हु जीवेत अची तत्वम्सी सुन्लाक बादो भाइशोग जहनाक तहनाक तो ग्यान भेल्कत है की एक तन सुनब अजानब मे उत्वे दूरी अची जत्वे भीज आगाच मे अप्दूरी अची जग्भे भीज आगाच मे श्रवन पहिल देग, तकर भाद मनन तर कस अर्खध द्रिधि करन तकर भाद निदिद्यासन धारावाहिक भावना साजक जुर्जूरी में तूथ आकी मनुशे य संशे जाभे गुर्या रहल अची, ताभे निष्चे नही आशनशे सहित सूनल वाखे ज्यान नही ज्यानक आरम्ब थिग. जेना संगीतक विद्यारती पहिल दिंच ज्रिश्ग सुनेत अची, वर्षक अभ्यासक बाद चिनहेत अची कानवे, स्वरवे, मुदा साख्षाख्षाख्चार अभ्यास्सं. अजखन साख्शाखार होएत अछी, तखन की होएत अछी से चारी नकार सचुनु की एक तं एह एह अद्द्यायक शिक्र थिग. मोख्ष उपन्वस्तु नहीं जे उपजैत अछी से नश्ष्त होएत अछी द्यालजका. विकार नहीक दूद संद ही भेल वस्तु नित्य नहीं रहें संसकार नहीं संसकार दूई रंगक गुन जोडब, जेना अद्हुलर्स स्फतेक रंगब दोश हताएप, जेना इंताक चुनस दर्पन मानजब ब्रहम्मे नकिचु जोडल जासकैत अची, नहो ही में किचु हते बाजोग अची, दरपन माजने मनी नहीं चमकैत अची, सनानो पन्यनक शुद्धी जीवक अपादेक शुद्धी ठेक, जेना नाएकाक सुगन्द होकर सक्षीः पर चदल भुजाएत अची, आप राप्ती से हो नही आईते हमर सबस प्री उप्मा नाहक यातरी नाह भीच दार दिस बड़ेत अची किनारा, फेन लहरी सब पाषु चुतेत जाएत अची आईयातरी पहुचेत अची औही निस्तरंग, शान्त, स्वच्ष, स्तिर मद्यमे कि उ मद्यनव भेतल नही जल्तन सबतरी चल, उ केवल लहरिस धल, ब्रहमा सरवगत्त्तिक, नित्यप्राःत, प्राःतिक भ्रम केवल लहरिक चल, चारु गती बन्नेग एही चारिक अत्रिक्त पाच्चं कोनो भाट नहीं जाहिसं कर्म मुक्ष्मे पैसशे, तने ग्यान के चोडी कर्मक चाहो मुक्ष्मे नहीं पैसशेत अची. बहुत काल मून फेर दिरे संग लगबबग अपनहीस अजे जीवध जागेत इजानी गेल शरीर तर रहभे करतेंख बूख लगबे करतेंग ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आ उही दिन, मित्र, एक ता आश्चर यहोएत अची जक्रा हम एही साजक अन्तिन वाख्य बनाएप आजब रहमास्मी एही ज्यान में सब विदिया सब प्रमान समाप भाजाएत अची प्रमान प्रमाता सापेच्ष, जते प्रमाता भाव गलल, उते प्रमान से हो विष्रान् अपन आसन्सन उटेक, हात जोडी पराज मे नही, उही आदर मे जे काल ही नयाएक देखाने चला. अपन आसन्सन उटेक, हात जोडी पराज मे नही, उही आदर मे जे काल ही नयाएक देखाने चला. ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ आईईशन सुन्नर वाके पर कोनो समन्वाई वात कहीो समाबत नहीं भेल आची उपसंहार सुत्रदार वापस आबैत आपछी उमेज परक पोठी उट्बैत आची आद्वार लगक शंक्खक बगल में राखी दैत आची खाल ही यी शंक हम्रा सब के सिखाँने चल जे व्रम की ठेक. आए यी पोती सिखालक जे व्रमसन निकल बाक रस्ता कते लिखल अची आ औरस्ता आग्या नही ठेक, समाचार ठेक. आाके पुत्र भेल एप बे सुनिक देवदद्ध्तदे पूलकित भागेल च्ल, दूत कोनो काज करे नहीं कहने च्ल. उपनिषद उहने दूत ख्छ, आा उकर समाचार एहिसं पैग, जक्रा आा जनम भरी ताकेत रहल हूँ से आाक अपन गरदने मे पडल रहार ख्छिए. चारी सुत्र चारी देग चल, जिग्या साक अदिकार, ग्रहमक लक्षन, शास्त्रक प्रामानिय, आतात पर्यक समनवय, आचारू देग एक ही देहली इस दिस, जते सुन्निहार भूजीजाएत अची जे दूत जकर चर्चाका रहेल चल से आन के हो नही. ज़ाहा आई राती पोठी आपन मोन में लाका जा रहे जी, तं ओख्रा माला जका राखभ, पूइश्रू तिक खेक, दागा सुत्रकारक आगुतभ. गुतभ रहेक पडनिहार के अपने पड़च्छै सब पात्र प्रस्थान कर अच्छ थी दीप सबसा अंप में बाहर जाएत अच्छ आपो थी संगे संग द्वार लक चुटर रही जाएत अच्छी

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