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ठेठ_मैथिलीमे_वाचस्पति_मिश्रक_भामतीक_इजोत.m4a
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- 0:00–0:06यह मरुवुमी मेट रहा बनके जब पानी देखार लाची तिमने जब पानी लागे ते चीजे,
- 0:06–0:08उ लगे लापर बालु कोना बैंजाईते चीजे.
- 0:08–0:12आप यह बद रास लोका के अचम्हा लागे चीजे.
- 0:12–0:16वा बीचार करु जे अंदेरा गरम में बूईया पर खसलक्त रस्सी
- 0:16–0:19उ आचानक साप कोना बन जाईता चे
- 0:19–0:22बापरे चाही से दधकन यक दम तेज भाजाईती चे
- 0:22–0:26वा जना कोनो पिता के जकन इस समाचार भेटेटी चे
- 0:26–0:29जे देवदत पुत्र जन मल आची
- 0:29–0:34तो उकर चेरा भीना कोनो भोटिक लाब कोनेक्ता कमल जका के लूटेटेचे
- 0:34–0:35बलकल
- 0:35–0:40इसब अनुबहू, किवल मने किवल द्रस्टी दोष्वा मनो वैग्ण्यानिक प्रतिक्रिया मात्र न नहीं अची
- 0:40–0:41बुजलो
- 0:41–0:42तो इस की अची
- 0:42–0:51इसम्पुड ब्रम्मान्द के ब्रमबाँग, वास्तविक्ता के बुज्बाँग, आश्वद के शक्ती के छिन्नवाँग कुन्जी अची.
- 0:51–0:57इस उस्वीमारेखा ज़ाई हमर भाँतिक सन्सार अच्छेतना को भेद समाप्त बहुजाई तची.
- 0:57–1:03मैंजे हम्रा लोकनी देखाई च्ये आजे वास्तव में आच्ये तकर भीच का इजे खाई आच्ये
- 1:03–1:08उक्रा भुजनाई तम माने विदियास कर सब सब पैग डच्निक चुनाती रहा लग च्ये
- 1:08–1:10एक दम सत्त कहलिए
- 1:10–1:12इब्रम कुना उत्पन रहे तची
- 1:12–1:16अग्यान कुना अख्रा काटेत अची, इकुन अ सादारन गप नहीं है।
- 1:17–1:24आजी जटिला के सुलजे बाक लेल, हम्रा लोकनी आई इ विषेश गज़न अद्यशार रहा रहा लगजी
- 1:24–1:26हम्रा लोक्निक लग जि स्रोथ अचे
- 1:26–1:29उ नवम शताब्दिक महान दाशनिक
- 1:29–1:30वाचस पती मिष्ष्खा
- 1:30–1:32अध्वेट वेदान्त ग्रन्त अची
- 1:32–1:33बहामती
- 1:33–1:35माने चतृर्सूट्री
- 1:35–1:38अदि शंक्रा चारिक ब्रहम्सूट्र भाश्ष्पर
- 1:38–1:41इक ता युगान्त कारी तीका जे.
- 1:41–1:44मुदा एते जे सबहसा आकर्षक बात आच्छी,
- 1:44–1:47औई जे हम्रा लोकनी एकर कोनो संस्क्रित
- 1:47–1:50वा अन्ने बाशा क्रूप नहीं देख्र रहल ची.
- 1:50–1:52हम्रा लोकनी विमर्ष कररहल ची,
- 1:52–1:54गजेंद्र ताकुर दूरा केलगेल एकर
- 1:54–1:57नव शुद अट्टेट मेट्ली अनुवादक
- 1:57–1:59इब भध महत तो पुरन काज भेल अचे
- 1:59–2:03बूजुजे कोना हजार वर्ष पुरान दार्षनिक सिद्धान्त
- 2:03–2:05अग्यानस अन्देरास
- 2:05–2:06यानक प्रकाष दरी
- 2:06–2:09हमर गाँं गरग भाशा में जीवन्त भावो टा लचे
- 2:09–2:14आँई आँ, प्राचीन दर्षन जखन्दरी आम जन मानसकक बाशा मे नहीं आई तची,
- 2:14–2:19तखन्दरी उ मात्रक गिछ विद्वान लोकनिक पुस्तिकाल्यमे बंद रहे तची.
- 2:19–2:24बिल्कु, कुनो महान ग्रन्त का वास्तविक जीवन तखन आरमब है तची,
- 2:24–2:28जखन उकर सिद्धान्त लोकक आपन माटिक भाशा में सपरष करे तची
- 2:28–2:32इई अनुवाद उई बन्दर्वाजा के खुलबाख काजके लगा ची
- 2:32–2:37ता सबहासा पहिले वाच्पती मिष्विक्टित्वो पर विचार कर अब आवश्ष्षक चे
- 2:37–2:40नोम शताब्दिक मित्छला के एं महान व्यक्तित्वा
- 2:40–2:44श्रूत में हुनका सर्वतंत्र स्वतंत्र कहल गेल आज
- 2:44–2:48आई इव आदी सुन्वा में बद गंभीर लगाई तची ने
- 2:48–2:53एक दम लगत आज ही, मुदायकर वास्तविक दाशनिक तात्पर या की आज
- 2:53–3:06देखो, इकोन सादारन सम्मान नहीं एजी, सर्वतंत्र स्वतंत्र का अर्थ है उ ब्यक्ती जे दर्षन का प्राया सब शाखा, माने सवतंत्र पर समान आस्वतंत्र अदिकार रख़े थो.
- 3:06–3:08अच्छा, माने केवल वेदान्त नहीं?
- 3:08–3:12नहीं नहीं, वाच्छस्पती मिष्र केवल अद्वाइत वेदान्त पर नहीं लिखलने,
- 3:12–3:19उ नियाय, सांख्य, योग, मिमान्सा, सब आस्तिक प्रस्थान पर अदिकार पूर्न तीका लिखलने.
- 3:19–3:25आँनाक इग्रन्त, भामती, उनका जीवन का सरवष्रेष्ट और अंतिम क्रती मानल जायतचे.
- 3:25–3:34माने जोगन के ओ समपुरन दाशनिक परिद्रिष्खाँ देख चुकल होई तची, तकन उकर जे अंतिम निशकर स होई तची उबामती आज.
- 3:34–3:36एक दम सही पकल लिया.
- 3:36–3:44आई लग बग एक सहस्राब्दी दभी, इं महान ग्रन्त मात्र संसक्रत जान्निहार पन्ट्ट लोकनिक किलिल्सी मिट्चल,
- 3:45–3:53मुदा आब विदे इ पत्रिका के माद्दिम सग, गजेंद्र ताकर एक राम मेठली में अनवादित केलने आची.
- 3:53–3:59अग, 2004 को प्रथम संसकरन और आप 2016 का परीववर्दित संसकरन
- 3:59–4:04तए एजे अनुवादक रननीती आचे, इघम रालेल बद रोचक आचे.
- 4:04–4:12मैं इगोनो जटिल वेग्यानिक शोद पत्रके एक ता सुन्दर प्रवाह मैं लोक कताक रुप में
- 4:12–4:17कहबाक प्रयास जका आया ज़े, जदे वोकर आत्मा क्शन्दित नहीं होई तची.
- 4:17–4:21एते इ अनुवादक के द्रिष्टी बडड इस्पष्ट छे.
- 4:21–4:24मुजे लो, श्रोथ में इब दताल गे लगे लची,
- 4:24–4:28जे उ च्चन्द सुवक्षाक बदला अर्थ सुवक्षापर भीशी द्यान देलनी.
- 4:28–4:33आच्चा, मैंने च्चन्द बनेवाग चकर में मुल अर्थ नहीं बद्ट की जाए.
- 4:33–4:36आप प्रायव अर्थ विक्रित भोजाए तची.
- 4:36–4:39मुदद जे चीस सब से भीशी द्याना कर्षन करेता ची
- 4:39–4:41औव आची हुनक शब्द चैन
- 4:41–4:42जैना की
- 4:42–4:45उ पारी भाशिक शब्दावली के तो बचेलनी जैना
- 4:45–4:47अद्द्यास अतात्विक
- 4:47–4:51मुदद संगे संग ब्रम्मान्दिये लीलाक वर्डन करवालेल
- 4:51–4:55मुस्की, इजोत, भूसी सन, गरेलु शब्द्ख प्रयोक लेएग.
- 4:55–4:56वाज.
- 4:56–4:59विचार करूँ, एक ता श्लोकक अनवाद में,
- 4:59–5:03उही कहत शती, जे वेद हुनक श्वास छती,
- 5:03–5:06अच्छल अच्छल जगत हुनक मुस्की आची.
- 5:06–5:10मुस्कान, वस्मित, कलेल, मुस्की.
- 5:10–5:15इसुनिता ही लागत असी जना इश्वर कोनो दूरक आमुर्त सत्ता नहीं
- 5:15–5:17बलकी हमर बड आत्मी अच्छती.
- 5:17–5:22बलकु अब ब्रमान्द कनिर्मान केवल एक ता मुस्की से बहुर रहल चे
- 5:22–5:25इच्ट्रन दर्षनक के कते ख्सुप आच्च बना दे तचे
- 5:25–5:32आईकर संगे संगे लोकोक्तिक जे प्रयोग आचे जेना जोक, खीर, नोंगर नहीं आची.
- 5:32–5:40मुदा इज शब्दक सरलता आचे उवास्तमे दर्षनक सब से जटिल गुथ्ती के सुल्जेबा में मददती करे तची.
- 5:40–5:41एक दम.
- 5:41–5:45उमुल समस्या जगरा इग्रन्त सुल्जावा चाहेत अची
- 5:45–5:48जगरा वेदान्त में अद्द्यास कहल गेल अची
- 5:48–5:51ता इए अद्द्यास वास्तमे की अची
- 5:51–5:54दिखो अद्द्यास अच सेद्दान्ते करत ची
- 5:54–5:57जे वस्तुजे नहीं अची ताही में उकर बुद्दी के नहीं
- 6:11–6:17यी चेतनाक ब्रम आची, वेदान्त में एक राख राद क्याती वाद कनत्रगत वीचारल जाए तची,
- 6:17–6:23जे यी अनवेशन करत जी, जे मानव मस्तिषक वास्तविक्ता के कुना गड़़़ची.
- 6:23–6:28इत उईना भेल जेना राती में सुतलाक बाद अचानक आखुज़य
- 6:28–6:34आप अन्देहार में खुटी पर तंगल कप्रा किन देख क्छोरक ब्रम बजाय
- 6:34–6:37वोनो व्यक्तिक पसीना चुडजय दधकन तेज बजाय
- 6:37–7:07मुदा तकन बत्ती जराएत थाची अदेखाए एद जे उतमात्र कप्राच्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
- 7:07–7:11या ता खुटी पर चोर आची या नहीं आची
- 7:11–7:14तुनु के बीच में कोना की चुब आचाखे ता ची
- 7:14–7:18ये एक ता सुख्श्म भेद आची जक्रा भूज़ाब आवश्यक आची
- 7:18–7:22जे म्रिएग त्रिषनाक पानी पूरनता हा सत्ती होईत
- 7:22–7:23आपी चुब हा सके तची?
- 7:23–7:26इते एक ता सुख्श्म भेद आची
- 7:26–7:28जक्रा भुज़व आवश्यक अचे
- 7:28–7:31जे म्रिएग त्रिष्नाक पानी पुर्नता हसते होईत
- 7:32–7:35तब अकर पानी पीब कब प्यास भूजी जाएत
- 7:35–7:35जी
- 7:35–7:37मुदा प्यास नहीं भुज़ाएत ची
- 7:37–7:38तो उसत्ते नहीं भेला
- 7:38–7:40आचा, ही तो तर्क संगत अची
- 7:40–7:44आद्दुसर दिस, जो उ पूर्न ता असत्ते होगत,
- 7:44–7:47जिन अकाशक फूल वा बंद्याक पुत्र,
- 7:47–7:49जकर कुनो अस्तित वे नहीं आची,
- 7:49–7:51तो उ देखाई है नहीं दित,
- 7:51–7:56मुदा म्रिएद्रिष्नाक पानी देखा रहा लाची, खुडि परक चोर दरा रहा लाची,
- 7:56–7:59अकर शारीरीक आमानसिक प्रभाव बहर रहा लाची.
- 7:59–8:03बिल्कोल. ताहिले लिए पूरन आसत्ते से हो नहीं आची,
- 8:03–8:06इस सत्त्या आआऊऊषत्ते सबहिन आची,
- 8:06–8:11इई आनिर्वाचनीय अची जक्रा शब्दमे बान्हल्वा परिबाशित नहीं कहिल जासा कै तचे
- 8:11–8:17बाप्रे, इस सत्या आ असत्यक भीच्क जे अनिर्वाचनीय इस थी अचे
- 8:17–8:20इता कप्डाक, चोर, वा भालुक, पानिदरी सिम्थ नहीं अचे
- 8:20–8:26बामती एक रा जीवनक मुल सत्यस जोडी रहाल जे नहीं आत्मापर अद्ध्यास.
- 8:26–8:33हम्रा लोकनी कोना देः अद्ध्या के आत्मा मानी लेद ची एक कोना गती थोई तची.
- 8:33–8:37वाचस्पती मिष्र एकर बद्द सुन्दर विष्लेषन करे चती.
- 8:37–8:46उ बुज्यावेत छती जे जेना अ प्रत्ष्ष्व आकाशपर अग्यानी लोग नील्क कतोरा वा मलिन्ता का अरोप करे तची,
- 8:46–8:49जखन की आकाशप कोनो रंग नहीं होई तची.
- 8:49–8:52आखाश तनिराका रचे.
- 8:52–8:56अद्मा जे नित्य शुद्ध आमुक्त जे उईपर आजम भाव भावी भोजाई दची
- 8:56–8:58मनुश्षे कहे तची हम गुंग ची हम अनरची वहमर देह में कष्ट ची
- 8:58–9:00अच्छा मने अनहर वा गुंग हिनाई अद्ग्विएच अद्माक नहीं
- 9:00–9:03अविपर आँम भाव भाविबोजाई तची
- 9:03–9:09मनुश्षे कहे तची, हम गुंग ची, हम अनहर ची, वहमर देहमे कष्ट तची
- 9:09–9:15अच्छा, मने अनहर वा गुंग हैनाई अद्रियक दर्म अच आतमाक नही
- 9:15–9:21बिल्कल, मुदा देहेक दर्म केन आत्माक दर्म मानी लेबे ता अग्जियानिक मुल अच्छे.
- 9:21–9:27और एक रा वाचस्पती मिष्ष्ड एक ता बद्म मार्मेक लोकोक्ती सा समवोदित करे चती.
- 9:27–9:34अन्हर-अन्हर के हात पकडी प्रत्तिक देग पर ख़्सेत जग्डा अंद परमपरा दोष कहल गेल आचे.
- 9:34–9:40अई जखन समपुन न मानव जाती एहे देहकेन आत्मा मानी केन जीवी रहल आची
- 9:40–9:43तई अन्हर केन अन्हर दोरा बात देखेबा जखबेल.
- 9:43–9:50जखन एक ता ब्रमित वक्ती, तो सर भ्रमित वक्तिक सत्यक मार्क देखे बाक प्रयास करे तची,
- 9:50–9:53तची तुन्नो गोते गडहा में खसाइत चत्थी.
- 9:53–9:57इए अग्यानक श्रिंखला अनन्त काल सचली आभे रहो लग.
- 9:57–9:58सत्यक ब.
- 9:58–10:01तचचन इबुज मे आभी जाए तची,
- 10:13–10:19अद्या इते सा लग ब्रम्म्सुत्र, प्रथम्सुत्र क्यात्रा आरम्भ होईता ची.
- 10:19–10:21अच्छा किया ची उसुत्र?
- 10:21–10:27प्रथम्सुत्र आईच अठा तो ब्रम्म्जिग्यासा अठा आब ब्रम्म्म के जान्बाक इच्छा.
- 10:27–10:31इते जे अथ शब्द थी एकर की महत्वाची
- 10:31–10:36देखू मी मान्सक लोकनी एक राश्श्वादन जका कोनो मंगल दोनी मानिच्छला
- 10:36–10:39जेना कोनो शुब काजक आरंभ भारो हो
- 10:39–10:42मुथा वाचस्पती मिश्र इस पस्ट करे चती
- 10:42–11:12अगर बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्
- 11:12–11:16दान, दर्म, किलासे मोक्ष्वा परम जान बेटी जाईताच,
- 11:16–11:20मिमान्सक दर्षनक सो हो ईमान अप्चल जे कर्म से मोक्ष बेटत,
- 11:20–11:23रहा, इबहुत पएग ब्रहम अची.
- 11:23–11:28तक वी केवल नीक कर्म सा इग्यान वा अद्यास की एक ने कर्टी सकेत अची,
- 11:28–11:31यान किले लेते क अनिवार्याता की अखछी?
- 11:31–11:34इदर्षनक सब सक्रानतिकारी विचार अखछी भूजलो.
- 11:34–11:39कर्म आए अग्यानक भीच कजी समबन्द अखछी उखछब अवष्षक अखछी.
- 11:39–11:43विचार करो जो अनिजार में रस्सी के साभ मान के,
- 11:43–11:47वो ब्रम ब्रम के सबते मानी के कयाल जायतची
- 11:47–11:51वो ब्रम के जानब पुष्ट करे तची एक दम
- 11:51–11:55केवल इजोथ, केवल प्रकाष वा जान है
- 11:55–11:59वो ब्रम के वो ब्रम के वागान वागान वागान वागान
- 11:59–12:03वागान वागान वागान वागान वागान वागान वागान
- 12:03–12:08अहो! माने लाथी मार्वा का कर्म ब्रम के जानब पूष्ट करे तच्छी,
- 12:08–12:13एक्दम! केवल इजोथ, केवल प्रकाष, वा ग्यान है,
- 12:13–12:16उई ब्रम के काटी सके तच्छी.
- 12:16–12:18वाचस्पती मिस्र, बुज़ावैच्ठतिन,
- 12:18–12:21जे मोख्ष कोनो उठ्पात देवस्त। नहीं आची
- 12:21–12:23जे दूथ से दही बने बाजा का
- 12:23–12:24कर्म से उपन होईत.
- 12:24–12:27इ़ रसी अ लाथी के द्रिश्टान्त से
- 12:27–12:29इए एक दम सपष्ट बहजात आची
- 12:29–12:33जे कर्म कोना अग्यानक के पोषित कर सके तची
- 12:33–12:37कर्म केवल हमर अंत्ह करन के शुद करे तची
- 12:37–12:39मुदा अग्यानक के अंदारा के
- 12:39–12:42केवल यानक प्रकास काटी सके तची
- 12:42–12:42हाँ
- 12:43–12:44आब हामती में
- 12:44–12:47एक रेक्ता बद्द सुंदर द्रिश्टान्त दिल गे लगाजी
- 12:47–12:49मदू में विश्मिलल भोजन से
- 12:49–12:54श्रिष्ट्त्म पाक्कुशलो विश अलग कब, केवल मदू नहीं कहासके दची.
- 12:54–12:55बाप्रे!
- 12:55–12:57मैंने उद्रिश्टान्त इबुजावेइ तची,
- 12:57–13:00जे अग्यानी विक्तिक नीक से नीक तर्म,
- 13:00–13:03से हो उई विश्मिलल मदू के समान अची.
- 13:03–13:04बिल्ल्कुल!
- 13:04–13:09जावद्द्द्री अग्यान रूपी विष अची कर्मक्मदू मोख्ष नहीं दो सके तची.
- 13:09–13:15ताही लिल ब्रम्मजिग्यासा माने सत्ते के जान्बा की इच्छा अनिवार रे आची.
- 13:15–13:20तच्छ यान के आविष्खता अची, तो उग्यान कक्रा दिस लगाई तची.
- 13:20–13:22दोसर सुत्र की कहेत जी?
- 13:22–13:25दोसर सुत्र जी जन्माद्यज से यता
- 13:25–13:30अथात जाहे से एह जगत के जन्म स्तिती अलै होई तचे
- 13:30–13:35मने इप ब्रमहन्ड कर जचना कार दिस इशारा के रहे जी?
- 13:35–13:38आप इस सुत्र उस पष्ट करे जी
- 13:38–13:43जे इस सम्पुल्न ब्रम्हांद कोनो अंद प्रक्रियावा ज़द प्रक्रिति के परिनाम नही आची.
- 13:43–13:48एक रा संचालित करे वाला एक ता सरवग्य अ सरव शक्तिमान कारन आची.
- 13:49–13:50ब्रम्व औहो.
- 13:50–13:54श्रोथ में प्रक्रतिक नियमक बध सुख्ष्म उदारन दिलगे लगे लची
- 13:54–13:57जेना वसंत में कोईलिक कुजब आवर्षाक आरंभ में
- 13:57–14:00में बग गरजनक कारन बगुलाक गरवादान
- 14:00–14:04वसंतक आग्मनन संगे कोईलिक स्वर खुजनाई
- 14:04–14:08वा मेग गर्जनन सुनी के बगलाक शरीर में
- 14:08–14:10गर्बादानक प्रक्रिया आरम्भेनाई
- 14:10–14:13इकोनो काक्तालिये वा सयोग नहीं आची
- 14:13–14:15नहीं, एक दम नहीं
- 14:15–14:18इप्रक्रती चित्र इबुज्याईबाक लेल आची
- 14:18–14:24जे इस सम्पूर्न श्रिष्टी एक ता बद्द व्यवस्तित अ भूद्दिमता पूर्न नियम से चली रहले ची.
- 14:24–14:32आजान श्रिष्टी एक व्यवस्तित आची, ता एकर मूल कारन कोनो ज़ वस्तू नहीं भहस्थे तची, उचेतन ब्रम्म है आची.
- 14:32–14:45अजकन इबुजी में आवी जायता ची, जे ब्रम्हे एक मात्र सत्ते आची, अजकतक मुल कारना ची, तकन इप्रष्न उठठे ची, जे ओब ब्रम्ह ज्यान वा मुख्ष प्राप्त कोना हो आप ची.
- 14:45–14:49एते सा हम्रा लोगनी तेसर आज चारिम सुथ्र पर आवेच ची.
- 14:49–14:57तट्तु समन्वयात, श्रोत में इसिद्डक्यल्गल अची, जे ज्यान स्वयमेव आपन लक्ष्दरी पहुचा देट अची.
- 14:57–15:01एकर लिल कोनो अत्रिक्त कर्मक आवशकता नहीं अची.
- 15:01–15:02एक्दम सही.
- 15:02–15:08मुदा मोक्ष जो कोनो करमक फल नहीं अची तो उप्राप्त कोना होई तची?
- 15:08–15:13इक रब भुजवाक लेल मोक्षक सुबहावक के जिननाई अवष्षकच.
- 15:13–15:19वाच्ष पती मिष्र सपष्ट कर अच्छती जे मोक्ष ना तो उपपद्दे अची जे नाउ निरमान हो,
- 15:19–15:49अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
- 15:49–16:19उब दोगा बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बा
- 16:19–16:23अगरे तची अगरे तची चश्मा तवाद पर है आचे बदनी गब खालीए
- 16:23–16:27विचार करू एटे कुनो नव वस्तू नहीं बनल
- 16:27–16:30अव्यक्ती कुनो यात्रा नहीं कैल
- 16:30–16:34मात्र एक्ता वाख्के एक्ता ग्यान से उक्रा अपन चच्मा प्राप्त बहुगेल
- 16:34–16:39जे वस्तु पहले सु लगा में चल, उ गयान से फिर सु प्राप्त बहुगेल.
- 16:39–16:50इच्छ्माग द्रिश्टान्त उही दार्षनिक तत्याके आदूनिक रूप में प्रस्तूत करे तची, जक्रा वाच्ष्पती मिश्र चतूर्त् सुत्र में एक ता बद्प्रस्षिद आख्यान से सिद्द करे चती.
- 16:50–16:52उद्रविद पिताक आख्यान?
- 16:52–17:22अगर वाखिन निरद़ाग बाज़ाग अदारन देईच्छती अदारन बद प्रभाव्षा लियाचे जकन कोनो द्रविड व्यक्ती जे आर्यबाशा नहीं जाने तच्छे देखत अची जे एक ता पिता के वागिन वागिन निरद़ाग वागिन देखत देखत देखत देख
- 17:22–17:27जखन दूत आबिके कहेत ज़े देवदद्त पुट्र जन्मल आची
- 17:27–17:31तपिताक चेहरा पुरन विक्सित कमल जगका खिल जाए तचे
- 17:31–17:33औही द्रविड वेक्तिक द्रिष्टी के बुजूं
- 17:33–17:35उ भाशा ने जाने तची
- 17:35–17:40मुदा उ पिताक मुख्मन्डल पर जे अद्बूत आनन्द्ख प्रस्पूटन देखट अची
- 17:40–17:42ताही से उ अनुमान लगावत अची
- 17:42–17:44जे इजे वाग के दूत भाजल अची
- 17:44–17:46उकर प्रभाव के हान अची
- 17:46–17:46हाँ
- 17:46–17:50एते उ दूत कोनो अदेश नहीं दे रोहल अची
- 17:50–17:52अगर प्रशन्न भोजावा उच्सम मनाउ
- 17:52–17:57बलकु नहीं, उवा मात्र एक ता विद्द्यमान सत्यक उद्खाटन को रहा लाची
- 17:57–17:59एक ता सिथ वस्तुक ज्यान्द रहा लाची
- 17:59–18:03विचार करू एक उनो शारी रिख काज नहीं भेल
- 18:03–18:05कोनो वस्तू नहीं बदल लल
- 18:05–18:12मात्र एक ता शब्दक शवन भेल आ ओकर प्रभावसा मनुश्ष्यक समपून अन्तरिक अवस्ता बदली गेल
- 18:12–18:19इस निद्ध करेत आची जे सत्यक उद्खातन लेल कर्मक नहीं केवल द्रिष्टिक आवस्ष्टाची
- 18:19–18:26आई इ अद्वैद दर्षन का सब सब पहग सन्देश आची, ज्यान वस्तूतन्त्र आची पूरुष्तन्त्र नहीं.
- 18:26–18:29वस्तूतन्त्र? एकर की आर्थबेल?
- 18:29–18:36आने ज्यान उही वस्तूपर निरवर करेत आची, जे उआची, नाकी मनुश्षक कर्म वध इच्छापर.
- 18:36–18:39आगी गरम अची इवस्तु तन्त्र यान अची
- 18:39–18:41आँगा किच्छा से अद्धन्डा नहीं भोजाएद
- 18:41–18:43अहो बद्द्स्पश्ट
- 18:43–18:46मोख्ष कोनो गंतवे नहीं आची जटे पहुच बक अची
- 18:46–18:49इगे वल आपन अद्ध्यास्वा ब्रहम के त्यागी
- 18:49–18:52अपन अस्ली सो रुपके जननाई मात्र आची
- 18:52–18:54जखनी ज्यान होगताची
- 18:54–18:55जे हम ब्रम्म ची
- 18:55–18:57तई ही ज्यान में
- 18:57–19:00सब विदि आनने समस्त प्रमान समाप्तब हो जाए तची
- 19:00–19:04इविमर्ष यज्च्मुच चेतना के जगजुरी देवाला आची
- 19:04–19:09एही पुरा गेहन अद्यायना की समेटेइत, एई स्पष्ट होई तची,
- 19:09–19:15जे वाचस्पती मिश्रक सुक्ष्मत्तरक अगगजेंद्र ठाकुरो कुषल देशज अनुवाद रननीती.
- 19:15–19:21आजेन अनहरक शिंखला वा बामभी पर म्रित्त केंचुली सन्शब्दक प्रयोग.
- 19:21–19:24बाशा कोना केवल विचार विनिमाई का सादन नहीं,
- 19:24–19:28अग ता स्ध्ध्स्राब्दी पुराणचितना के आदूनिक मनुश्षकाँ रदाय में प्रत्या रोपित कर रहा ज़ती।
- 19:28–19:31अगर खोना केवल विचार विनिमाए का सादन नहीं
- 19:31–19:37बलकिल सत्यक अनुबूतिक माद्यम बहुज्ट अची से हम्रा लोकनी एही अनुवाद में देख्ला हूँ.
- 19:37–19:38एक दम.
- 19:38–19:42अनुवाद केवल संस्क्रितते मैठली में नहीं बदली रहल्चत्ती,
- 19:42–19:46उ एक ता सहस्राब दी पुराण चितना के आदोनिक मनुश्षक अग्रिदे में
- 19:47–19:48प्रत्या रोपित कर रहल चती.
- 19:48–19:51आए इशिद करीत आची,
- 19:51–19:55जे मैठिली के वल साहित ये गीप वकताक बाशा नही आची,
- 19:55–20:00इग ख़ोर्तम शास्त्र विमर्ष अब्रम्हन्दिय सत्यक के वेक्त करवाक लेल से हो,
- 20:00–20:02पूर्न रूपें सक्षम आची.
- 20:02–20:05आप, मित्लाक जे प्राचीन दार्षनिक दरोहर चल,
- 20:05–20:09जे सदिकन सा पन्दित लोकनिक भीच सीमिट चल,
- 20:09–20:13तो आप पुनह मित्लाक आपन माटिक भाशा मे प्राप्त भूराल आचे
- 20:13–20:15ये एक ता बोद्धिक पूनर जागरन आचे
- 20:15–20:19ये निष्छित रूपेन एक ता बोद्धिक पूनर जागरन आचे
- 20:19–20:22मुदा एही विमर्ष्के समेट बास पहने
- 20:22–20:26अगता अंतिम बिचार आहा सबक समक्ष रखबावश्षक अची
- 20:26–20:29समपुण विमर्ष में हम्रा लोकनी एग देख लोगु
- 20:29–20:34जे प्राषीन काल में अद्दियास वब्रम अग्यान ककारनचल
- 20:34–20:37जेन रस्सी में साभ देखव वसीप में चान्दी
- 20:37–20:42मुता आई सोचबाग बात इयाच जे एक विस्मा सताबदी में
- 20:42–20:45जते हम्रा लोकनी चारो कातस है,
- 20:45–20:48दिजितल भ्राम, क्रित्रिम भुद्दिमद्ता,
- 20:48–20:52दीप फेक, अस्वोष्यल मीट्याग बनावती जीवन से गेराएल ची,
- 20:52–20:59की इटक्नी की योग हम्रा लेल एक तनाव अ बेसिख खतर नाग, दिजितल अद्ध्यास नहीं रच्रालज?
- 20:59–21:02बाप्डे इट बद गमभीर प्रष्नाची.
- 21:02–21:04प्राछीन काल में अग्यान प्राक्रितिच्छल,
- 21:04–21:09मुदा आई हम्रा लोकनी सुईम आपन अग्यानक यंप्र गड रहल ची.
- 21:09–21:13जत आ इस्क्रीन पर देखाएल गल म्रिग त्रष्ना हम्रा अस्ली लागे तची.
- 21:13–21:16और हम्रा लोकनी उही ब्रमक पाचा दोड रहल ची.
- 21:16–21:17सत्यगव.
- 21:17–21:23की एक्रा कटबाक लेल हम्रा लोकनी के आप कोनो दिजितल वेदान्त के आवशकता ची?
- 21:23–21:28इएक्ता एहन प्रष्ना ची, जेक्रा पर प्रत्तेक मनुष्यके विचार करे परत.
- 21:28–21:34इएक्ता एहन चष्मा आची, जोक्रा हम्रा लोकनी के अपन माथ पर तबाक आवशकता ची.
- 21:34–21:40ग्यानक इयात्रा बाहे ब्रम्मान से आरंब भागे, अंतता अपन भीतर है समाप चोईता ची.
Plain text
यह मरुवुमी मेट रहा बनके जब पानी देखार लाची तिमने जब पानी लागे ते चीजे, उ लगे लापर बालु कोना बैंजाईते चीजे. आप यह बद रास लोका के अचम्हा लागे चीजे. वा बीचार करु जे अंदेरा गरम में बूईया पर खसलक्त रस्सी उ आचानक साप कोना बन जाईता चे बापरे चाही से दधकन यक दम तेज भाजाईती चे वा जना कोनो पिता के जकन इस समाचार भेटेटी चे जे देवदत पुत्र जन मल आची तो उकर चेरा भीना कोनो भोटिक लाब कोनेक्ता कमल जका के लूटेटेचे बलकल इसब अनुबहू, किवल मने किवल द्रस्टी दोष्वा मनो वैग्ण्यानिक प्रतिक्रिया मात्र न नहीं अची बुजलो तो इस की अची इसम्पुड ब्रम्मान्द के ब्रमबाँग, वास्तविक्ता के बुज्बाँग, आश्वद के शक्ती के छिन्नवाँग कुन्जी अची. इस उस्वीमारेखा ज़ाई हमर भाँतिक सन्सार अच्छेतना को भेद समाप्त बहुजाई तची. मैंजे हम्रा लोकनी देखाई च्ये आजे वास्तव में आच्ये तकर भीच का इजे खाई आच्ये उक्रा भुजनाई तम माने विदियास कर सब सब पैग डच्निक चुनाती रहा लग च्ये एक दम सत्त कहलिए इब्रम कुना उत्पन रहे तची अग्यान कुना अख्रा काटेत अची, इकुन अ सादारन गप नहीं है। आजी जटिला के सुलजे बाक लेल, हम्रा लोकनी आई इ विषेश गज़न अद्यशार रहा रहा लगजी हम्रा लोक्निक लग जि स्रोथ अचे उ नवम शताब्दिक महान दाशनिक वाचस पती मिष्ष्खा अध्वेट वेदान्त ग्रन्त अची बहामती माने चतृर्सूट्री अदि शंक्रा चारिक ब्रहम्सूट्र भाश्ष्पर इक ता युगान्त कारी तीका जे. मुदा एते जे सबहसा आकर्षक बात आच्छी, औई जे हम्रा लोकनी एकर कोनो संस्क्रित वा अन्ने बाशा क्रूप नहीं देख्र रहल ची. हम्रा लोकनी विमर्ष कररहल ची, गजेंद्र ताकुर दूरा केलगेल एकर नव शुद अट्टेट मेट्ली अनुवादक इब भध महत तो पुरन काज भेल अचे बूजुजे कोना हजार वर्ष पुरान दार्षनिक सिद्धान्त अग्यानस अन्देरास यानक प्रकाष दरी हमर गाँं गरग भाशा में जीवन्त भावो टा लचे आँई आँ, प्राचीन दर्षन जखन्दरी आम जन मानसकक बाशा मे नहीं आई तची, तखन्दरी उ मात्रक गिछ विद्वान लोकनिक पुस्तिकाल्यमे बंद रहे तची. बिल्कु, कुनो महान ग्रन्त का वास्तविक जीवन तखन आरमब है तची, जखन उकर सिद्धान्त लोकक आपन माटिक भाशा में सपरष करे तची इई अनुवाद उई बन्दर्वाजा के खुलबाख काजके लगा ची ता सबहासा पहिले वाच्पती मिष्विक्टित्वो पर विचार कर अब आवश्ष्षक चे नोम शताब्दिक मित्छला के एं महान व्यक्तित्वा श्रूत में हुनका सर्वतंत्र स्वतंत्र कहल गेल आज आई इव आदी सुन्वा में बद गंभीर लगाई तची ने एक दम लगत आज ही, मुदायकर वास्तविक दाशनिक तात्पर या की आज देखो, इकोन सादारन सम्मान नहीं एजी, सर्वतंत्र स्वतंत्र का अर्थ है उ ब्यक्ती जे दर्षन का प्राया सब शाखा, माने सवतंत्र पर समान आस्वतंत्र अदिकार रख़े थो. अच्छा, माने केवल वेदान्त नहीं? नहीं नहीं, वाच्छस्पती मिष्र केवल अद्वाइत वेदान्त पर नहीं लिखलने, उ नियाय, सांख्य, योग, मिमान्सा, सब आस्तिक प्रस्थान पर अदिकार पूर्न तीका लिखलने. आँनाक इग्रन्त, भामती, उनका जीवन का सरवष्रेष्ट और अंतिम क्रती मानल जायतचे. माने जोगन के ओ समपुरन दाशनिक परिद्रिष्खाँ देख चुकल होई तची, तकन उकर जे अंतिम निशकर स होई तची उबामती आज. एक दम सही पकल लिया. आई लग बग एक सहस्राब्दी दभी, इं महान ग्रन्त मात्र संसक्रत जान्निहार पन्ट्ट लोकनिक किलिल्सी मिट्चल, मुदा आब विदे इ पत्रिका के माद्दिम सग, गजेंद्र ताकर एक राम मेठली में अनवादित केलने आची. अग, 2004 को प्रथम संसकरन और आप 2016 का परीववर्दित संसकरन तए एजे अनुवादक रननीती आचे, इघम रालेल बद रोचक आचे. मैं इगोनो जटिल वेग्यानिक शोद पत्रके एक ता सुन्दर प्रवाह मैं लोक कताक रुप में कहबाक प्रयास जका आया ज़े, जदे वोकर आत्मा क्शन्दित नहीं होई तची. एते इ अनुवादक के द्रिष्टी बडड इस्पष्ट छे. मुजे लो, श्रोथ में इब दताल गे लगे लची, जे उ च्चन्द सुवक्षाक बदला अर्थ सुवक्षापर भीशी द्यान देलनी. आच्चा, मैंने च्चन्द बनेवाग चकर में मुल अर्थ नहीं बद्ट की जाए. आप प्रायव अर्थ विक्रित भोजाए तची. मुदद जे चीस सब से भीशी द्याना कर्षन करेता ची औव आची हुनक शब्द चैन जैना की उ पारी भाशिक शब्दावली के तो बचेलनी जैना अद्द्यास अतात्विक मुदद संगे संग ब्रम्मान्दिये लीलाक वर्डन करवालेल मुस्की, इजोत, भूसी सन, गरेलु शब्द्ख प्रयोक लेएग. वाज. विचार करूँ, एक ता श्लोकक अनवाद में, उही कहत शती, जे वेद हुनक श्वास छती, अच्छल अच्छल जगत हुनक मुस्की आची. मुस्कान, वस्मित, कलेल, मुस्की. इसुनिता ही लागत असी जना इश्वर कोनो दूरक आमुर्त सत्ता नहीं बलकी हमर बड आत्मी अच्छती. बलकु अब ब्रमान्द कनिर्मान केवल एक ता मुस्की से बहुर रहल चे इच्ट्रन दर्षनक के कते ख्सुप आच्च बना दे तचे आईकर संगे संगे लोकोक्तिक जे प्रयोग आचे जेना जोक, खीर, नोंगर नहीं आची. मुदा इज शब्दक सरलता आचे उवास्तमे दर्षनक सब से जटिल गुथ्ती के सुल्जेबा में मददती करे तची. एक दम. उमुल समस्या जगरा इग्रन्त सुल्जावा चाहेत अची जगरा वेदान्त में अद्द्यास कहल गेल अची ता इए अद्द्यास वास्तमे की अची दिखो अद्द्यास अच सेद्दान्ते करत ची जे वस्तुजे नहीं अची ताही में उकर बुद्दी के नहीं यी चेतनाक ब्रम आची, वेदान्त में एक राख राद क्याती वाद कनत्रगत वीचारल जाए तची, जे यी अनवेशन करत जी, जे मानव मस्तिषक वास्तविक्ता के कुना गड़़़ची. इत उईना भेल जेना राती में सुतलाक बाद अचानक आखुज़य आप अन्देहार में खुटी पर तंगल कप्रा किन देख क्छोरक ब्रम बजाय वोनो व्यक्तिक पसीना चुडजय दधकन तेज बजाय मुदा तकन बत्ती जराएत थाची अदेखाए एद जे उतमात्र कप्राच्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� या ता खुटी पर चोर आची या नहीं आची तुनु के बीच में कोना की चुब आचाखे ता ची ये एक ता सुख्श्म भेद आची जक्रा भूज़ाब आवश्यक आची जे म्रिएग त्रिषनाक पानी पूरनता हा सत्ती होईत आपी चुब हा सके तची? इते एक ता सुख्श्म भेद आची जक्रा भुज़व आवश्यक अचे जे म्रिएग त्रिष्नाक पानी पुर्नता हसते होईत तब अकर पानी पीब कब प्यास भूजी जाएत जी मुदा प्यास नहीं भुज़ाएत ची तो उसत्ते नहीं भेला आचा, ही तो तर्क संगत अची आद्दुसर दिस, जो उ पूर्न ता असत्ते होगत, जिन अकाशक फूल वा बंद्याक पुत्र, जकर कुनो अस्तित वे नहीं आची, तो उ देखाई है नहीं दित, मुदा म्रिएद्रिष्नाक पानी देखा रहा लाची, खुडि परक चोर दरा रहा लाची, अकर शारीरीक आमानसिक प्रभाव बहर रहा लाची. बिल्कोल. ताहिले लिए पूरन आसत्ते से हो नहीं आची, इस सत्त्या आआऊऊषत्ते सबहिन आची, इई आनिर्वाचनीय अची जक्रा शब्दमे बान्हल्वा परिबाशित नहीं कहिल जासा कै तचे बाप्रे, इस सत्या आ असत्यक भीच्क जे अनिर्वाचनीय इस थी अचे इता कप्डाक, चोर, वा भालुक, पानिदरी सिम्थ नहीं अचे बामती एक रा जीवनक मुल सत्यस जोडी रहाल जे नहीं आत्मापर अद्ध्यास. हम्रा लोकनी कोना देः अद्ध्या के आत्मा मानी लेद ची एक कोना गती थोई तची. वाचस्पती मिष्र एकर बद्द सुन्दर विष्लेषन करे चती. उ बुज्यावेत छती जे जेना अ प्रत्ष्ष्व आकाशपर अग्यानी लोग नील्क कतोरा वा मलिन्ता का अरोप करे तची, जखन की आकाशप कोनो रंग नहीं होई तची. आखाश तनिराका रचे. अद्मा जे नित्य शुद्ध आमुक्त जे उईपर आजम भाव भावी भोजाई दची मनुश्षे कहे तची हम गुंग ची हम अनरची वहमर देह में कष्ट ची अच्छा मने अनहर वा गुंग हिनाई अद्ग्विएच अद्माक नहीं अविपर आँम भाव भाविबोजाई तची मनुश्षे कहे तची, हम गुंग ची, हम अनहर ची, वहमर देहमे कष्ट तची अच्छा, मने अनहर वा गुंग हैनाई अद्रियक दर्म अच आतमाक नही बिल्कल, मुदा देहेक दर्म केन आत्माक दर्म मानी लेबे ता अग्जियानिक मुल अच्छे. और एक रा वाचस्पती मिष्ष्ड एक ता बद्म मार्मेक लोकोक्ती सा समवोदित करे चती. अन्हर-अन्हर के हात पकडी प्रत्तिक देग पर ख़्सेत जग्डा अंद परमपरा दोष कहल गेल आचे. अई जखन समपुन न मानव जाती एहे देहकेन आत्मा मानी केन जीवी रहल आची तई अन्हर केन अन्हर दोरा बात देखेबा जखबेल. जखन एक ता ब्रमित वक्ती, तो सर भ्रमित वक्तिक सत्यक मार्क देखे बाक प्रयास करे तची, तची तुन्नो गोते गडहा में खसाइत चत्थी. इए अग्यानक श्रिंखला अनन्त काल सचली आभे रहो लग. सत्यक ब. तचचन इबुज मे आभी जाए तची, अद्या इते सा लग ब्रम्म्सुत्र, प्रथम्सुत्र क्यात्रा आरम्भ होईता ची. अच्छा किया ची उसुत्र? प्रथम्सुत्र आईच अठा तो ब्रम्म्जिग्यासा अठा आब ब्रम्म्म के जान्बाक इच्छा. इते जे अथ शब्द थी एकर की महत्वाची देखू मी मान्सक लोकनी एक राश्श्वादन जका कोनो मंगल दोनी मानिच्छला जेना कोनो शुब काजक आरंभ भारो हो मुथा वाचस्पती मिश्र इस पस्ट करे चती अगर बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान्ता बज़ान् दान, दर्म, किलासे मोक्ष्वा परम जान बेटी जाईताच, मिमान्सक दर्षनक सो हो ईमान अप्चल जे कर्म से मोक्ष बेटत, रहा, इबहुत पएग ब्रहम अची. तक वी केवल नीक कर्म सा इग्यान वा अद्यास की एक ने कर्टी सकेत अची, यान किले लेते क अनिवार्याता की अखछी? इदर्षनक सब सक्रानतिकारी विचार अखछी भूजलो. कर्म आए अग्यानक भीच कजी समबन्द अखछी उखछब अवष्षक अखछी. विचार करो जो अनिजार में रस्सी के साभ मान के, वो ब्रम ब्रम के सबते मानी के कयाल जायतची वो ब्रम के जानब पुष्ट करे तची एक दम केवल इजोथ, केवल प्रकाष वा जान है वो ब्रम के वो ब्रम के वागान वागान वागान वागान वागान वागान वागान वागान वागान वागान वागान अहो! माने लाथी मार्वा का कर्म ब्रम के जानब पूष्ट करे तच्छी, एक्दम! केवल इजोथ, केवल प्रकाष, वा ग्यान है, उई ब्रम के काटी सके तच्छी. वाचस्पती मिस्र, बुज़ावैच्ठतिन, जे मोख्ष कोनो उठ्पात देवस्त। नहीं आची जे दूथ से दही बने बाजा का कर्म से उपन होईत. इ़ रसी अ लाथी के द्रिश्टान्त से इए एक दम सपष्ट बहजात आची जे कर्म कोना अग्यानक के पोषित कर सके तची कर्म केवल हमर अंत्ह करन के शुद करे तची मुदा अग्यानक के अंदारा के केवल यानक प्रकास काटी सके तची हाँ आब हामती में एक रेक्ता बद्द सुंदर द्रिश्टान्त दिल गे लगाजी मदू में विश्मिलल भोजन से श्रिष्ट्त्म पाक्कुशलो विश अलग कब, केवल मदू नहीं कहासके दची. बाप्रे! मैंने उद्रिश्टान्त इबुजावेइ तची, जे अग्यानी विक्तिक नीक से नीक तर्म, से हो उई विश्मिलल मदू के समान अची. बिल्ल्कुल! जावद्द्द्री अग्यान रूपी विष अची कर्मक्मदू मोख्ष नहीं दो सके तची. ताही लिल ब्रम्मजिग्यासा माने सत्ते के जान्बा की इच्छा अनिवार रे आची. तच्छ यान के आविष्खता अची, तो उग्यान कक्रा दिस लगाई तची. दोसर सुत्र की कहेत जी? दोसर सुत्र जी जन्माद्यज से यता अथात जाहे से एह जगत के जन्म स्तिती अलै होई तचे मने इप ब्रमहन्ड कर जचना कार दिस इशारा के रहे जी? आप इस सुत्र उस पष्ट करे जी जे इस सम्पुल्न ब्रम्हांद कोनो अंद प्रक्रियावा ज़द प्रक्रिति के परिनाम नही आची. एक रा संचालित करे वाला एक ता सरवग्य अ सरव शक्तिमान कारन आची. ब्रम्व औहो. श्रोथ में प्रक्रतिक नियमक बध सुख्ष्म उदारन दिलगे लगे लची जेना वसंत में कोईलिक कुजब आवर्षाक आरंभ में में बग गरजनक कारन बगुलाक गरवादान वसंतक आग्मनन संगे कोईलिक स्वर खुजनाई वा मेग गर्जनन सुनी के बगलाक शरीर में गर्बादानक प्रक्रिया आरम्भेनाई इकोनो काक्तालिये वा सयोग नहीं आची नहीं, एक दम नहीं इप्रक्रती चित्र इबुज्याईबाक लेल आची जे इस सम्पूर्न श्रिष्टी एक ता बद्द व्यवस्तित अ भूद्दिमता पूर्न नियम से चली रहले ची. आजान श्रिष्टी एक व्यवस्तित आची, ता एकर मूल कारन कोनो ज़ वस्तू नहीं भहस्थे तची, उचेतन ब्रम्म है आची. अजकन इबुजी में आवी जायता ची, जे ब्रम्हे एक मात्र सत्ते आची, अजकतक मुल कारना ची, तकन इप्रष्न उठठे ची, जे ओब ब्रम्ह ज्यान वा मुख्ष प्राप्त कोना हो आप ची. एते सा हम्रा लोगनी तेसर आज चारिम सुथ्र पर आवेच ची. तट्तु समन्वयात, श्रोत में इसिद्डक्यल्गल अची, जे ज्यान स्वयमेव आपन लक्ष्दरी पहुचा देट अची. एकर लिल कोनो अत्रिक्त कर्मक आवशकता नहीं अची. एक्दम सही. मुदा मोक्ष जो कोनो करमक फल नहीं अची तो उप्राप्त कोना होई तची? इक रब भुजवाक लेल मोक्षक सुबहावक के जिननाई अवष्षकच. वाच्ष पती मिष्र सपष्ट कर अच्छती जे मोक्ष ना तो उपपद्दे अची जे नाउ निरमान हो, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� उब दोगा बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बाद्याना दिए बा अगरे तची अगरे तची चश्मा तवाद पर है आचे बदनी गब खालीए विचार करू एटे कुनो नव वस्तू नहीं बनल अव्यक्ती कुनो यात्रा नहीं कैल मात्र एक्ता वाख्के एक्ता ग्यान से उक्रा अपन चच्मा प्राप्त बहुगेल जे वस्तु पहले सु लगा में चल, उ गयान से फिर सु प्राप्त बहुगेल. इच्छ्माग द्रिश्टान्त उही दार्षनिक तत्याके आदूनिक रूप में प्रस्तूत करे तची, जक्रा वाच्ष्पती मिश्र चतूर्त् सुत्र में एक ता बद्प्रस्षिद आख्यान से सिद्द करे चती. उद्रविद पिताक आख्यान? अगर वाखिन निरद़ाग बाज़ाग अदारन देईच्छती अदारन बद प्रभाव्षा लियाचे जकन कोनो द्रविड व्यक्ती जे आर्यबाशा नहीं जाने तच्छे देखत अची जे एक ता पिता के वागिन वागिन निरद़ाग वागिन देखत देखत देखत देख जखन दूत आबिके कहेत ज़े देवदद्त पुट्र जन्मल आची तपिताक चेहरा पुरन विक्सित कमल जगका खिल जाए तचे औही द्रविड वेक्तिक द्रिष्टी के बुजूं उ भाशा ने जाने तची मुदा उ पिताक मुख्मन्डल पर जे अद्बूत आनन्द्ख प्रस्पूटन देखट अची ताही से उ अनुमान लगावत अची जे इजे वाग के दूत भाजल अची उकर प्रभाव के हान अची हाँ एते उ दूत कोनो अदेश नहीं दे रोहल अची अगर प्रशन्न भोजावा उच्सम मनाउ बलकु नहीं, उवा मात्र एक ता विद्द्यमान सत्यक उद्खाटन को रहा लाची एक ता सिथ वस्तुक ज्यान्द रहा लाची विचार करू एक उनो शारी रिख काज नहीं भेल कोनो वस्तू नहीं बदल लल मात्र एक ता शब्दक शवन भेल आ ओकर प्रभावसा मनुश्ष्यक समपून अन्तरिक अवस्ता बदली गेल इस निद्ध करेत आची जे सत्यक उद्खातन लेल कर्मक नहीं केवल द्रिष्टिक आवस्ष्टाची आई इ अद्वैद दर्षन का सब सब पहग सन्देश आची, ज्यान वस्तूतन्त्र आची पूरुष्तन्त्र नहीं. वस्तूतन्त्र? एकर की आर्थबेल? आने ज्यान उही वस्तूपर निरवर करेत आची, जे उआची, नाकी मनुश्षक कर्म वध इच्छापर. आगी गरम अची इवस्तु तन्त्र यान अची आँगा किच्छा से अद्धन्डा नहीं भोजाएद अहो बद्द्स्पश्ट मोख्ष कोनो गंतवे नहीं आची जटे पहुच बक अची इगे वल आपन अद्ध्यास्वा ब्रहम के त्यागी अपन अस्ली सो रुपके जननाई मात्र आची जखनी ज्यान होगताची जे हम ब्रम्म ची तई ही ज्यान में सब विदि आनने समस्त प्रमान समाप्तब हो जाए तची इविमर्ष यज्च्मुच चेतना के जगजुरी देवाला आची एही पुरा गेहन अद्यायना की समेटेइत, एई स्पष्ट होई तची, जे वाचस्पती मिश्रक सुक्ष्मत्तरक अगगजेंद्र ठाकुरो कुषल देशज अनुवाद रननीती. आजेन अनहरक शिंखला वा बामभी पर म्रित्त केंचुली सन्शब्दक प्रयोग. बाशा कोना केवल विचार विनिमाई का सादन नहीं, अग ता स्ध्ध्स्राब्दी पुराणचितना के आदूनिक मनुश्षकाँ रदाय में प्रत्या रोपित कर रहा ज़ती। अगर खोना केवल विचार विनिमाए का सादन नहीं बलकिल सत्यक अनुबूतिक माद्यम बहुज्ट अची से हम्रा लोकनी एही अनुवाद में देख्ला हूँ. एक दम. अनुवाद केवल संस्क्रितते मैठली में नहीं बदली रहल्चत्ती, उ एक ता सहस्राब दी पुराण चितना के आदोनिक मनुश्षक अग्रिदे में प्रत्या रोपित कर रहल चती. आए इशिद करीत आची, जे मैठिली के वल साहित ये गीप वकताक बाशा नही आची, इग ख़ोर्तम शास्त्र विमर्ष अब्रम्हन्दिय सत्यक के वेक्त करवाक लेल से हो, पूर्न रूपें सक्षम आची. आप, मित्लाक जे प्राचीन दार्षनिक दरोहर चल, जे सदिकन सा पन्दित लोकनिक भीच सीमिट चल, तो आप पुनह मित्लाक आपन माटिक भाशा मे प्राप्त भूराल आचे ये एक ता बोद्धिक पूनर जागरन आचे ये निष्छित रूपेन एक ता बोद्धिक पूनर जागरन आचे मुदा एही विमर्ष्के समेट बास पहने अगता अंतिम बिचार आहा सबक समक्ष रखबावश्षक अची समपुण विमर्ष में हम्रा लोकनी एग देख लोगु जे प्राषीन काल में अद्दियास वब्रम अग्यान ककारनचल जेन रस्सी में साभ देखव वसीप में चान्दी मुता आई सोचबाग बात इयाच जे एक विस्मा सताबदी में जते हम्रा लोकनी चारो कातस है, दिजितल भ्राम, क्रित्रिम भुद्दिमद्ता, दीप फेक, अस्वोष्यल मीट्याग बनावती जीवन से गेराएल ची, की इटक्नी की योग हम्रा लेल एक तनाव अ बेसिख खतर नाग, दिजितल अद्ध्यास नहीं रच्रालज? बाप्डे इट बद गमभीर प्रष्नाची. प्राछीन काल में अग्यान प्राक्रितिच्छल, मुदा आई हम्रा लोकनी सुईम आपन अग्यानक यंप्र गड रहल ची. जत आ इस्क्रीन पर देखाएल गल म्रिग त्रष्ना हम्रा अस्ली लागे तची. और हम्रा लोकनी उही ब्रमक पाचा दोड रहल ची. सत्यगव. की एक्रा कटबाक लेल हम्रा लोकनी के आप कोनो दिजितल वेदान्त के आवशकता ची? इएक्ता एहन प्रष्ना ची, जेक्रा पर प्रत्तेक मनुष्यके विचार करे परत. इएक्ता एहन चष्मा आची, जोक्रा हम्रा लोकनी के अपन माथ पर तबाक आवशकता ची. ग्यानक इयात्रा बाहे ब्रम्मान से आरंब भागे, अंतता अपन भीतर है समाप चोईता ची.