MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
लोकवाणी_में_भामती_का_अद्वैत_दर्शन.m4a
Timestamped machine output
- 0:00–0:06अगर हम कलपना करीं के, मतलब किसी के हाथ में ब्रमान के सबसे गेरे,
- 0:06–0:08और अनसुलजे रहेस्सियों का एक आँसा नक्षा हो,
- 0:08–0:10जो हर ताले को खोल सकता है.
- 0:10–0:13इक मास्टकी की टरा.
- 0:13–0:16बलकोल, लेकिन मुषकिल यह है के वो नक्षा,
- 0:16–0:21यक आँईसी कुट बहाशा में या इतने बहारी बहरकम शबडो मे लिखा है
- 0:21–0:25जिसे प़ना एक आम अंसान के लिए लगभग असमबभ है
- 0:25–0:30और दूर भागे से सद्यों तक बहरत के सबसे महां दाशने गरन्तो के साथ कुछ अई साई हूए
- 0:30–0:36सईी कहा, मदलब एक असा गयान जिसकी जरें जिस मिट्ती में पनपी
- 0:36–0:40उसी मिट्ती के आमलोगो तक वो हजार सालों सी जाडा समय तक
- 0:40–0:43अपनी मात्र भाशा में नहीं पहोथ सका
- 0:43–0:46वह, ये एक बहुत बडी अतियासिक तरास्दी रही है
- 0:46–0:52तो आज हम अपनी जेहन चर्चा में उन पन्नोपर जमीदूल को हदाग़ तर ज्यान की गेरायो में उतरने वाले हैं
- 0:52–0:54मैं बहुत उच्साहित हूँ इसके लिए
- 0:54–0:58समजने की बात है कि जब उच्ट्खोटी के दर्षन या शास्ट्रार्थ को
- 0:58–1:01मतलः किसी गाँगों के खुले आंगन की बाशाँ में डाल दिया जाता है,
- 1:01–1:03तो उसका स्वरुब कितना बड़जाता है?
- 1:03–1:05आज उगडम जीवन छोड़ता है.
- 1:06–1:08तो आज की हमारी इस चर्चा का केंडर है,
- 1:09–1:13नोवी शताबदी के महन दाषनेक वाचसपती मिष्र का,
- 1:13–1:16प्रस्द्दि संट्स्क्रिद ग्रन्त बहामती
- 1:16–1:20जो की आदी शंक्राचारे के ब्रम्म्सुत्र भाश्ष्षे पर
- 1:20–1:23लिखिगई एक अथ्यंत जटिल और प्रामानिक तीका है
- 1:23–1:28जी, लिकि आज हम सर्फ वो स्प्राचीन संस्क्रिद ग्रन्त तक्सीमित नहीं है
- 1:28–1:34हम मुक्यरुब से गजेंर ताकृर दूरा कीई गय बामती के उस शुद्दम मेठली अनुवाद का विष्लेशन कर रहे हैं।
- 1:34–1:42जिसके 2004 और 2026 के संसकरोनों लें इस अद्वाय दर्षन को सीदे लोकवानी से जोर दिया है।
- 1:42–1:42बिल्कुल.
- 1:42–1:46और हमारा उदेश्य इस अनुवाद की केवल समिक्षा करना नहीं है.
- 1:46–1:48बलकी ये दिकोड करना है,
- 1:48–1:53कि ब्रहम, वास्तविक्ता और चेतना जैसे बहरी बरक्विष्यों को,
- 1:53–1:57मतलब आम जन मानस की रोज मर्रा की बाशा में कैसे समजगया आगया है.
- 1:57–1:58सही का.
- 2:12–2:18बार्तिय दर्शन के परद्श्श्श्वे उनका रुद्बा एसा था क्यूने सर्व तन्त्र स्थन्त्र क्योपादी दीगे थी.
- 2:18–2:27सर्व तन्त्र स्थन्त्र, यानिक एसा व्यक्ती जिसका सभी दाशनिक प्रनालियों पर समान और निर्विवाद अदिकार हो.
- 2:27–2:27बलकल.
- 2:27–2:29मतलब ये कोई चोटी बात नहीं है
- 2:29–2:34नियाए, सांख्य, योग, पुर्वमी मान्सा और वेदान्त
- 2:34–2:36इन सभी परस्पर, विरोदी
- 2:36–2:39और गल गडिशाँ में सोचने वाले दर्षनों पर
- 2:39–2:41उनो ने इतनी गेराए से लिखा
- 2:41–2:46की, हर दर्षन के अनियाई उनकी तीकाओ को अन्तिम प्रमार मानते है.
- 2:46–2:48ये अपने अपने के चमत कार है?
- 2:48–2:51तीके, आए ये से तोड़ा विस्तार से समचते है.
- 2:51–2:55ये तो कुछ एसा हुए की, कोई एक ही वेड्यानिक कौन्तम मेकनेक्स,
- 2:55–2:58रेलिटिविती और इवलुचनरी बायोलोगी
- 2:58–3:02तीनो में नोबल पुरुसकार जीतने वली रीशर्च लिग दे हैं आ?
- 3:02–3:03आ, एक दम वोही बात.
- 3:03–3:05तीनो में तोप की रीशर्च.
- 3:05–3:08यही वो बात है, जो नहीं अद्वितिया बनाती है.
- 3:08–3:38और इसी अद्वितियता के भीज एक बडी अटिहासिक विदंबना चिपि हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 3:38–3:42बिल्कुल और मेरे स्रोथ पटते हुए जो बाथ सब से जआदा हावी रही
- 3:42–3:49वो ये की अनुवाद की ये प्रक्रिया केवल दिक्षनरी खोल कर एक शब्द की जगा दूस्रा शब्द रखने जैसी नहीं है
- 3:49–3:52उगर देखान बाद के बिलकोज शुर्वाती हिसे मही बडी खुबसुरती से देखा जासकता है,
- 3:52–3:54जिसे हम मंगला चरन कहते हैं
- 3:54–3:56अच्छ, वहां कै?
- 3:56–4:00वहां अनुवादक ने सलुसक्रित के उस दार्षनिक फारीपन को,
- 4:00–4:02लोक वानी की जो सहज्टा दी है
- 4:02–4:07अग, उज़ा बाद को गरन्त के भिलको शुर्वाती हिसे मेही बडी खुबसुर्ती से देखा जा सकता है,
- 4:08–4:10जिसे हम मंगला चरन कहते हैं.
- 4:11–4:12अच्छ, वहां कै?
- 4:13–4:15वहां अनुवादक ने सवूस्क्रित के उस दार्षनिक फारीपन को,
- 4:16–4:18लोग वानी की जो सहज्ता दी है,
- 4:32–4:33मुस्की कहा गया है?
- 4:33–4:35मुस्की, यहनी मुस्कान.
- 4:35–4:36जी, मुस्की.
- 4:36–4:39औरे, वाज, ये शब्द अपने आपने कितना जादूई है.
- 4:40–4:42मतलब जब हम स्रिष्टी का निर्मान कहते है,
- 4:43–4:46तो दिमाग में गरहों का टकराना, बिग बाअँग,
- 4:46–4:50या किसी ब़ुद बडी यान्त्रेक प्रक्रिया की चवी बनती हैं
- 4:50–4:52बिल्कुल एक बारी बहर कम काम ज़सा लकता है
- 4:52–5:00आँ लेकिन ये मुस्की शवद इस अनन्त अग्कल्पनिय दर्षन को सीदा हमारे गर आंगन मे लाके कड़ा कर देता है
- 5:00–5:01सही कहा?
- 5:01–5:06ब्रम्हांद का निर्मान कोई बोज नहीं है, कोई प्कष्ट्री का काम नहीं है,
- 5:06–5:11ये बस अस्तित्व की एक सहेज नहीं मुस्कान का पर इनाम है.
- 5:11–5:14और आप देके ये कोई कवित्व की अतिशोग की लहीं है,
- 5:14–5:18ये अद्वायत दर्षन का मुल स्वभाव है,
- 5:18–5:24इश्वर को स्रिष्टी रष्टने के लिए किसी बाहरी सामगरी या प्रैयास के आवशकता नहीं है।
- 5:24–5:28जैसे मुस्कुराने के लिए हमें किसी तूल की जरूत नहीं होती।
- 5:28–5:31यह यह ब्रम्मान्ड उस ब्रम्म का स्वबहाविक उलास है
- 5:31–5:34एक टेट देसी शब्दने है
- 5:34–5:37हाजारो पन्नो के शास्ट्रारत का निचोड रग दिया
- 5:37–5:40यहां बाट सच्छ में बहुत रोचक हो जाती है
- 5:40–5:44अदर बाद शच में बहुत रोचक हो जाती है,
- 5:44–5:48कुकि अगर ब्रमान के उद्पती महेज एक मुसकान,
- 5:48–5:50जितनी सहज और सुन्दर है,
- 5:50–5:53तो फिर इस दून्या में इतना दोक,
- 5:53–5:56इतनी उलजहन और इतना संगर्ष क्यू है।
- 5:56–5:57इतना संगर्ष क्यु है?
- 5:58–6:00यही ही वो सवाल है, जो हमे गेराई में लेजाता है.
- 6:00–6:02हां, मतलब हम जो देखते है,
- 6:02–6:03क्या वो सच्छ है?
- 6:04–6:09और इसी सवाल के सात ये गरन्त अपनी सबसे मुख्यदाशनिक सिद्धान्त में प्रविष करता है,
- 6:09–6:14अद्द्यास, यानी सुपर्व्पुशिशन या ब्रहम का सिद्द्धान्त
- 6:14–6:14जी.
- 6:14–6:19और अद्वैद्विदान्त की पूरी इमारत इसी अद्द्द्यास को समजने पर टिकी है.
- 6:19–6:25अर इसी बिन्दु पर भामती अपनी एक एक दम अलग और विषिष्ट पहजान स्थापिद करती है.
- 6:25–6:26वो कैसे?
- 6:26–6:30दर्षन शास्तर में वेदान्त को समजने के तो प्रमुक प्रस्थान यह स्कूल रहें.
- 6:30–6:36एक है विव्रन प्रस्थान और दूस्रा है वाचस्पती मिष्र का बहामती प्रस्थान
- 6:36–6:40इन दोनो के भी जो सबसे बधी बहेस है, वो इस बात पर है कि अविद्ध्या,
- 6:40–6:42यानी अग्यान का आश्रे कोन है
- 6:42–6:44अग्यान रहता काँ है
- 6:44–6:49तर की करुब से सोचें तो विव्रन अप्रस्थान का मानना है कि अग्ज्यान सीदे ब्रम्मही स्तित है
- 6:49–6:53लेकिन भामती प्रस्थान इसे पुरी तरहे से पलड़ड़ देता है
- 6:53–6:57भामती कि अनुसार अविद्ध्या का आश्रे ब्रम्मही है बल की स्वयम जीव है
- 6:57–6:58यानी हम
- 7:14–7:26बदान्त का ही मुल्त सिद्धान्त कहता है कि जीव की आत्मा स्वयम प्रकाश्वान है, वो पुरी तरहे से शुद्ध और निर्विकार है.
- 7:26–7:27जबात है.
- 7:27–7:28सही बात है.
- 7:28–7:31तो अगर आत्मा अपने अपने इतनी शुद है,
- 7:31–7:36तो उष्द्द्धापर अग्यान का परदा या अद्यास पिक कैसे सकता है.
- 7:36–7:42अगल अब ये तो कुछ आज्सा हूँ अगा के कोई अईन्सान सूरच के अपट तोरच की रोष्नी डाल कर अंदेरा करने की कोशिष कर रहो?
- 7:42–7:43बहुत अच्चा सवाल है?
- 7:43–7:47अगन शुद प्रकाष पर अंदेरा कैसे तहर सकता है?
- 7:47–7:54इस स्वबहाविक शंका का समदान, वाचस पती मिष्र ने इतने सतीक और व्यावारेक उदाहरनो से किया है,
- 7:54–7:58कि वो तर्की कसोटी पर पूरी तरहें कहरा उतरता है.
- 7:58–8:03और अनुवादक ने उन उदाहरनो की जीवन्तता को मेठली में हुभभभई उके रहे.
- 8:03–8:05अचा कोई उदारन दीजे?
- 8:05–8:07इसका सबसे प्रमुक उदारन आखाश का है
- 8:07–8:09हम जानते है कि आखाश निराकार है
- 8:09–8:11अप्रत्यक्ष है
- 8:11–8:13उसका कोई अपना रंग नहीं है
- 8:13–8:14बलकुल
- 8:14–8:16लिकनेक नासमज बच्चा उस आखाश को देखकर
- 8:16–8:18क्या कलपना करता है
- 8:18–8:25या ज़सा गरन्त में उल्लेकित है, अद्र नील मनी से बने विशाल उल्ते कटोरे का रोप करता है।
- 8:25–8:55अहो अग आप आप बज़ा दब प्रज़ा पर लगु करें तो बच्चे के अजा जो जो अजाजा पर बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या च्चे �
- 8:55–8:59अद्मा की अद्यान का औरोब जीव की अपनी कलपिद द्श्टी के कारन होता है,
- 8:59–9:01अद्मा की शुद्टापर कोई दागनी लकता.
- 9:01–9:05क्या बात है, बहुती खुबसुरती से समजगया यहे से.
- 9:05–9:08अद्मा के विग्यान को और भी गेराए से पुखता करने किलिए,
- 9:08–9:13गरन्त में म्रिक्त्रिष्ना, यानी रेगिस्तान के मिराज का एक बहुती शान्दर विष्लिषन की आगया है.
- 9:13–9:15आच्छा, म्रिक्त्रिष्ना.
- 9:15–9:21गरन्त इस अनुबहव को समजाने के लिए और निरववचनिया ख्याती शब्द का प्रियोक करता है.
- 9:21–9:26अ निरवचनिया का आर्थ है, जिसे शब्डो मे पुरी तरह से परिबाशित ना किया जा सके.
- 9:26–9:27न व्मतलव?
- 9:27–9:32मतलव ये म्रिक त्रिष्ना ना तो पुरी तरह से सत्तिया है, और ना ही पुरी तरह से असत्तिया.
- 9:32–9:37जब मैंने पहली बार इस फिस्से को पडा तो सच बताओ ये एक पहले जैसा लगा था
- 9:37–9:38सब हाविक है
- 9:38–9:43मतलग कोई भी चीज या तो सचो सकती है या जुट वो दोनो के भीच में कैसे लटक सकती है
- 9:43–9:45तो बग़ प्यास व्यक्ती वहां जाखर सच्छ में प्यास बजा लेता
- 9:45–9:47चुकी वो प्यास नहीं बजासकता
- 9:47–9:49इसले वो सथ्ति तो कते है
- 9:49–9:51बिलकोल सही
- 9:51–9:53और दूसरी तरफ अगर हम उसे पूरी तरफ असत्यमान लें
- 9:53–9:55जैसे किसी इनसान के सिर पर सींख
- 9:55–10:01प्यास बुजा लेता. जुकी वो प्यास नहीं बुजा सकता, इसले वो सत्तितो कतः नहीं है.
- 10:01–10:05बिलकुल सहीं. और दूसरी तरव आगर हम उसे पुरी तरव से असत्तिमान लें.
- 10:05–10:09जैसे किसी इनसान के सरपर सींख जो अस्तित्व में होते ही नहीं है.
- 10:09–10:12तो फिर वो म्रिक्त्रिष्ना आखो को दिखाई नी देनी जाईईई.
- 10:12–10:14रहा, असत्तिचीस तो दिखेगी नहीं.
- 10:14–10:16लिक्डवाद दिखाई दे रही है,
- 10:16–10:18वो व्यक्ती को अपनी अगर दोडने पर मजबूर कर रही है,
- 10:18–10:21उश़रीर में तहकान और निराशा पैदा कर रही है
- 10:22–10:24एक आजी चीस जो वास्तविकता में है नहीं
- 10:24–10:27प्रभी हमारे भीटर वास्तविक प्रतिक्रियाई पैदा कर रही है
- 10:28–10:29उसे हम असत्ते कैसे कैदे?
- 10:30–10:31सही बात है
- 10:31–10:33इसलिये ये ब्रम अनिरवचनीया है
- 10:33–10:41वाचछस्पती मिष्ष्वर समज अदे हैं कि हमारे जीवन के अनुबव, हमारा तनाव, हमारा एहंकार, ये सब इसी म्रिगत्रिष्ना कि तरा हैं.
- 10:42–10:44जो हमें भेवजा दोडा रहे हैं.
- 10:44–10:51ये परम सत्ते नहीं हैं, लेकिन ये हमें तब तक दोडाते हैं, जब तक हम नक अस्ली स्वरूप नहीं पचान लेते हैं.
- 10:51–10:55ये मनोविग्यान और दर्षन का बहुत यी गेरा संगम है.
- 10:55–11:05और अ इस ब्रम की परद्दद़ परद जाज करने के बाद ये चर्चा हमे ग्रन्त के उस मुखे हिसे तक लेजाती है, जो इस पूरी इमारत की नीव है.
- 11:05–11:10आप ब्रम्सुत्र के पहले चार्सुत्र, जिने चतू सुत्री कहा जाता है.
- 11:10–11:15जी, गरन्त का एक बड़ा हिसा केवल इनी चार वाख्यों को खुलने में समर पित है.
- 11:15–11:20और चतु सुत्री का पहला ही सुत्र है, अठा तो ब्रम जिग्यासा.
- 11:20–11:23यानी अठा अब ब्रम को जानने के इच्चा.
- 11:23–11:32इसी सुत्र के विष्लेशन में वाचस्पती मिष्रने, कर्म और ग्यान तता मोक्ष के समबन्दों को बहुत ही सबस्छत्तरीके से अलगलक किया है.
- 11:32–11:35लिकिन दिके समाज में अकसर ये दारना रहती है,
- 11:35–11:40क्यम अच्छे कर्म करेंगे, यग दान यए अनुश्ठान करेंगे,
- 11:40–11:43तो हमें मोखष का पल मिल जाएगा.
- 11:43–11:47लिकिन भामती इस दारना को सिरे से कहारिज करती है.
- 11:47–11:51रामती इस पष्ट कहती है, के कर्मो से मुखती नहीं मिलती.
- 11:51–11:54इसे अगर हम केती के उदारन से समचें,
- 11:54–11:59तो कर्म केवल वहा हल है जो खेद की मिट्टी को बूर्भुरा और तग्यार करता है.
- 11:59–12:00बलकल.
- 12:00–12:02आप जीवन बर खेज जोद ते रहें.
- 12:02–12:05लेकिन अगर अप उस में भीज नहीं डालेंगे,
- 12:05–12:07तो फसल कभी नहीं होगेगी.
- 12:07–12:10बीज नहीं डालेंगे, तो फसल कभी नहीं होगेगी.
- 12:11–12:14कर्म केवल हमारे मन की जमीन को शुद्द करने वाले
- 12:14–12:16दूरस्त सहायक है.
- 12:16–12:20मोखष रूपी फसल तो केवल ग्यान के बीज से ही प्राप्तो सकती है.
- 12:21–12:22बहुत ही सटी कुदारन है.
- 12:22–12:26और इसी क्रम्मे जब हम ब्रम्मान्द क्युट्पत्तिय और वेदों के शुरोट पर आते है,
- 12:26–12:29तो दुस्रा और तीस्रा सुत्र ये साभित करता है,
- 12:29–12:32कि इस पूरी स्रिष्टी के पीछे एक सर्वग के कारन,
- 12:32–12:34एक इंटलिजन दिसाईनर मोईजुद है.
- 12:34–13:04अग, आद आद आद आद आग आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आ
- 13:04–13:10कोयल किसी भी बेटर्तीब मोसम में नहीं कुकने लकती, प्रक्रती एक अंदी और गुंगी प्रक्रीया नहीं है.
- 13:10–13:14बलक्ल नहीं, ये एक अट्यंत व्यवस्तित और सुविचारित रचना है.
- 13:14–13:21अदिए तर्कों को स्थापिट करने के बाद अँ पूँच्तें अँ सुत्र पर जो इस गरन्त का सबसे विस्त्रित अर गेहन हिस्था है ततू समन वयात
- 13:21–13:24इं सब तर्को को स्थापिट करने के बाद
- 13:24–13:26रहा हम पोचते हैं उस सुत्र पर
- 13:26–13:30जो इस गरन्त का सबसे विस्त्रित और गेहन हिस्चा है
- 13:30–13:32ततू समन वयात
- 13:32–13:35यही पर यह सबसे वडा सबाल कडा होता है कि आखिर
- 13:35–13:39ये मोख्ष्छ जिसकी तनी चर्चा होरी है, उसका वास्त्रिक सुरुब क्या है?
- 13:39–13:41मोख्ष्छ प्राप्त कैसे होता है?
- 13:41–13:43तो इस सब का अख्र मतलव क्या है
- 13:43–13:47मोख्ष्छ को लेकर वाचस्पती मिष्रने जो नकारात्मक तर्क दिया है,
- 13:47–14:17तो तो बज़ाजा पाईटा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा �
- 14:17–14:47अप आप बवाँबाँ बाँबाँ बाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबा
- 14:47–14:53अगर नावेक उस शोर को चोडगर अपनी नाव को नदी के उस शान्त मद्धिबाग में लेजाता है
- 14:53–14:59और सब से एहम बात ये है के उस नावेक ने नदी के उस शान्त हिसे को बनाया नहीं है
- 14:59–15:00बलकल नहीं
- 15:00–15:04वो शान्त हिसा लेहरों के तकराने से पहले भी वही ता
- 15:04–15:06और हमेशा वही रहेगा
- 15:06–15:09उसने बस शोर वाली जगग़ से अपनी नाव हटाए
- 15:09–15:12और वहा पहच गय जो पहले से मोजुद ता
- 15:12–15:16मोखष कही बाहर किसी तुसरे लोक में जाने की यात्रा नहीं है
- 15:16–15:25ये बस किनारे के उस शोर, उस अद्यास और म्रिएक त्रिष्ना को पहचानने और उसे अपनी नाव हता लेने की प्रक्रिया है.
- 15:25–15:26बज़द सुन्दर!
- 15:26–15:30यहां जो सबसे दिल्चास बात है वो यह थे है कि इतने उचे
- 15:30–15:36और पार लोकेक दर्शन को समजाने के लिए भाशा को कितना जमीनी होना परता है
- 15:36–15:36सच में
- 15:36–15:39गजेंद्रे ताकूर के मेठली अनुवाद ने
- 15:39–15:42दर्शन शास्त्र की जटिल बहसों को काटने के लिए,
- 15:42–15:44जिन देशज मुहावरों का प्रियोख किया है,
- 15:44–15:46वो सर्फ अनुवाद का कमाल नहीं,
- 15:46–15:50बलकी वो तर्कों को एक मनोवेग्यानेक दहर देता है.
- 15:50–15:52इस बाथ से मैं पुरी तरे सहवतो.
- 15:52–15:53उदारन के लिए,
- 15:53–15:58दर्शन में अकसर अनवस्ता दोश या इन्पनेट रिग्रेस की बात होती है
- 15:58–16:01आप एक आफी बहस जफार जबाब एक नया सवाल कड़ा कर दे
- 16:01–16:03और श्रिंक्ला कोई अंती नहुज
- 16:03–16:33बिल्कुल, और इसे समजाने के लिए अनुवाद में जो मैठली का मुहावरा अस्तिमाल हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 16:33–16:38अब भी बाशा और मलोविग्यान का जो सबसे गहरा सम्मन्द इस गरन्त में अगेरा गया है,
- 16:38–16:42वो पूर्व, मीमान्सा और विदान्त के बीच की बहेस में सामने आता है.
- 16:42–16:44अग, वो द्रविडवेक्ती वाली कहानी.
- 16:44–16:47तो बवाजार को एक ज़टके में जमीन पर लापबटकता है.
- 16:47–16:52लेकिन भाशा और मलो विग्यान का जो सबसे गेरा सम्मन दिस गरन्त में उकेरा गया है,
- 16:52–16:56वो पुर्व मीमान्सा और वेदान्त के बीच की बहेस में सामने आता है.
- 16:56–16:58वो द्रविड वेक्ती वाली कहानी.
- 16:58–17:04जी. ये हिस्सा आजके हमारे संचार और सोचने के तरीके पर बहुत सतीक बडदता है.
- 17:04–17:11पूर्व मीमान सा दर्षन का मानना था कि वेदो में या बाशा में मुल्रुब से केवल उनी वाख्यों का कोई महत्व है,
- 17:11–17:14जो हमें कोई आग्ग्या या आदेश देते है.
- 17:14–17:19उनक तर किये ता के बाशा का काम है, मनुश्षे को किसी क्रिया में लगाना
- 17:19–17:21ये करो या ये मत करो
- 17:21–17:21अग
- 17:21–17:24उनक अनुसार जो चीस पहले से ही सिद्ध है
- 17:24–17:26जो गतित हो चुकी है
- 17:26–17:31उसके बारे में सिर्फ जानकारी देने वाख्यों का कोई प्रेओजन या लाब नहीं होता
- 17:44–17:47द्रविडद व्यक्ती देव्दत नाम के पुता को देकता है,
- 17:47–17:51द्रविडद का चहरा किसी खिले हुए कमल कितरा चमक रहा है,
- 17:51–17:53वो खुषी से गदगद है.
- 17:53–17:56द्रविड़ व्यक्ती ये देक्र हैरान होता है,
- 17:56–18:26तब उसे पता चलता है कि तशी दूत ने आाके देवददद को बस एक पंगती कही ती तुमहारे पुत्र का जन्म हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 18:26–18:30उपने श़ो के महावाक्क्या जैसे तट्वम असी या तोम वही हो
- 18:30–18:34ये वागाटित कर देवादद की पूरी मनोवैग्यानिक वास्टविक्ता को बबडल कर रक्दिया
- 18:34–18:37वो अपार हर्ष्षे बभर गया
- 18:37–18:40इस कहानी से जो निषकर्ष निकलता है
- 18:40–18:45उपनिशडो के महावाक्या जैसे तत्वम असी या तुम वही हो
- 18:45–18:47ये कुई आदेश नहीं है
- 18:47–18:50उम वे हमे कुछ नया करने को नहीं कहते
- 18:50–18:53वे बस हमे वो जानकारी देते हैं
- 18:53–18:54जो हम भूल गयते है
- 18:54–18:57जैसे ही वो गयान मिलता है
- 18:57–19:05उम वे हमे कुछ नया करने को नहीं कहते, वे बस हमे वो जानकारी देते हैं, जो हम बूल गयते.
- 19:05–19:12जैसे ही वो गयान मिलता है, हमारी वास्ट्विक्ता का पुरा धाचा बदल जाता है, बिलकल देवददत की तरा.
- 19:12–19:17और अगर अप नूवी शताभदी के दरशन को आजके आदूनिक दोर के परीपेखष़ से जोडगगे देखें
- 19:17–19:23जहाँ हम हर दिन सुचनाँ, सोचल मीट्या और अंगिनद दारनाँ की बाड में दुबे रहते हैं
- 19:23–19:27तो ये गरन्त एक मनोव यग्यानिक रक्षा कवच काम करता है.
- 19:27–19:28कैसे?
- 19:28–19:31अग्यास के सिद्धान दमे लगातार ये चितावनी देता है,
- 19:31–19:35कि हम अपनी कन्टिष्निंग अपने पुर्वग गरहो को ही वास्तविक्तमान कर चल रहे है.
- 19:35–19:37ये तो बहुत गेहरी बात है.
- 19:37–19:41अदर, गुस्से, या आईजाइटी से बजर जाते हैं।
- 19:41–19:42बिना सोचे समजे?
- 19:42–19:45कोई खबर, कोई संदेश हम तक पहुचता है।
- 19:45–19:49अर हम बिना उसकी सच्चाई जाने प्रतिक्रिया दे दे देखे।
- 19:49–19:52ये बामती का दर्षन रहें, हमें थेहरना सिखाता है।
- 19:52–19:56ये बामती का दर्षन रह्वे तहेरना सिखाता है
- 19:56–19:57बिलकोल
- 19:57–19:59ये बताता है कि जो हमारी आखो को दिक्रहा है
- 19:59–20:01ये जो हमारा मन महसुस कर रहा है
- 20:01–20:03वो हमेशा सत्ते नहीं होता
- 20:03–20:05अदर्षनिक पुनर जागरन है।
- 20:05–20:07इक दम सही।
- 20:07–20:09या उस गयान को
- 20:09–20:11जिसे सद्यों तक केवल कुछ खास बुत्तीजीवियों
- 20:11–20:13तक सीमित रख हा आप उसे
- 20:13–20:15आम अजन्सान की रोज्मरा की
- 20:15–20:17जिन्गी के भीच त्स्थापित के
- 20:17–20:20ये बाशा से दुसरी बाशा में शब्दों का स्थानान्त्रन नहीं है
- 20:21–20:23ये एक सान्स्क्रतिक और दाशनिक पुनर जाग्रन है
- 20:23–20:24एक दम सही
- 20:24–20:25या उस ज्यान को
- 20:26–20:29जिसे सद्दियों तक केवल कुछ क्ष बुत्ती जीवियों तक सीमित रख हा गया था
- 20:29–20:35उसे आम अईन्सान की रोज्मरा की जिन्गी के भीच तबट्पित करने का एक बहुतिख श़क्त अर एतिहासिक कदम है.
- 20:35–20:41ये मित्ला की उस बोद्धिक परमपरा का अपनी ही विरासत पर फिरसे अदिकार जताना है,
- 20:41–20:43जो हमेशा से उसी समाज का हिस्था थी.
- 20:43–20:51आज की इस चर्चा से यह साबित होता है, की दून्या का कोई भी विचार इतना आमुर्थ या जटल नहीं होता,
- 20:51–20:56कि उसे लोग भाशा की मिठास और जमीनी हकीकत के सात नस नजगया जासके.
- 20:56–20:59बलकोल, लोग भाशा में कलगी ताकत होती है?
- 20:59–21:04तो अब इस गेहरी वैचारिक यात्रा को विराम देने से पहले
- 21:04–21:07हम एक अँसा विचार चोडकर जाना चाते है
- 21:07–21:10तो इस अभी सदान्तो को हमारे भीतर जीवन्त रके.
- 21:11–21:12वह क्या है?
- 21:13–21:14इस गरन्त ने हमें सिक्ठाया
- 21:14–21:20कि हमारा अग्यान हमारी अविद्या ही हमारे लिये एक सीमिद दुन्या का निरमान करती है.
- 21:20–21:23इसे एक दिश्खे के रूप में आगर हम सोचे,
- 21:23–21:25मान लीजे मिट्टी का एक गड़ा है,
- 21:25–21:28और उसे ये गेरा ब्रम हो गया है,
- 21:28–21:32कि उसने उस अनन्त असीम अकाश को अपने भीतर समेट रखठ है
- 21:32–21:34लग चोटा सा ग़ा
- 21:34–21:34जी
- 21:34–21:39वो ग़ा उस भीतर के अकाश को अपनी जागीर मानता है
- 21:39–21:42और सोचता है कि उसके दून्या बस उतनी ही है
- 21:42–21:44जितने उन मिट्टी की दिवारों के अंदर है
- 21:44–21:49लिकिन सरा सुची ए, जिस पल उस गडे को यग्यान हो चाए,
- 21:49–21:52कि उसके अंदर का अकाश, और बाहर का अनंध अकाश,
- 21:52–21:54अलग-लग नहीं बलकी एक ही हैं.
- 21:54–21:56और वो खुद भी और कुछ नहीं,
- 21:56–22:00बस उसी असी म्रमान्ड मे रख्खी मिट्टी का एक चोटा सा रूप है,
- 22:00–22:03तो क्या गड़े के बहुतिक रूप से तूटने से पहले ही
- 22:03–22:05उसकी उस छोटी सी
- 22:05–22:07गुटन बरी दून्या की सारी सीमाय क्या खडम नहीं जाएंगी?
- 22:07–22:09ये तो बहुत ही अदबद विचार है
- 22:09–22:12इस विचार को आज आज आज भीतर अदरने दीजे
- 22:12–22:19और हम सब खुट से यह सवाल पूछें कि अपनी दारनाओ, अपने एहंकारों, और अपने दर से
- 22:19–22:22हम सबने अपने जीवन में यह से कुण-कुण से गड़े बनारग हैं
- 22:22–22:24जिने आज तुटने की जरूरत हैं
- 22:24–22:27सोचना और समझने के लिए सच में बहुत कुछ हैं
- 22:27–22:27जी
- 22:27–22:31और बवाद बादबादा वो बवाद बादबादा वो बवाद बादबादा वो बवादबादा वो बवादादा वो बवादादा वो बवादादा वो बवादादा वो बवादादावो बवादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा
Plain text
अगर हम कलपना करीं के, मतलब किसी के हाथ में ब्रमान के सबसे गेरे, और अनसुलजे रहेस्सियों का एक आँसा नक्षा हो, जो हर ताले को खोल सकता है. इक मास्टकी की टरा. बलकोल, लेकिन मुषकिल यह है के वो नक्षा, यक आँईसी कुट बहाशा में या इतने बहारी बहरकम शबडो मे लिखा है जिसे प़ना एक आम अंसान के लिए लगभग असमबभ है और दूर भागे से सद्यों तक बहरत के सबसे महां दाशने गरन्तो के साथ कुछ अई साई हूए सईी कहा, मदलब एक असा गयान जिसकी जरें जिस मिट्ती में पनपी उसी मिट्ती के आमलोगो तक वो हजार सालों सी जाडा समय तक अपनी मात्र भाशा में नहीं पहोथ सका वह, ये एक बहुत बडी अतियासिक तरास्दी रही है तो आज हम अपनी जेहन चर्चा में उन पन्नोपर जमीदूल को हदाग़ तर ज्यान की गेरायो में उतरने वाले हैं मैं बहुत उच्साहित हूँ इसके लिए समजने की बात है कि जब उच्ट्खोटी के दर्षन या शास्ट्रार्थ को मतलः किसी गाँगों के खुले आंगन की बाशाँ में डाल दिया जाता है, तो उसका स्वरुब कितना बड़जाता है? आज उगडम जीवन छोड़ता है. तो आज की हमारी इस चर्चा का केंडर है, नोवी शताबदी के महन दाषनेक वाचसपती मिष्र का, प्रस्द्दि संट्स्क्रिद ग्रन्त बहामती जो की आदी शंक्राचारे के ब्रम्म्सुत्र भाश्ष्षे पर लिखिगई एक अथ्यंत जटिल और प्रामानिक तीका है जी, लिकि आज हम सर्फ वो स्प्राचीन संस्क्रिद ग्रन्त तक्सीमित नहीं है हम मुक्यरुब से गजेंर ताकृर दूरा कीई गय बामती के उस शुद्दम मेठली अनुवाद का विष्लेशन कर रहे हैं। जिसके 2004 और 2026 के संसकरोनों लें इस अद्वाय दर्षन को सीदे लोकवानी से जोर दिया है। बिल्कुल. और हमारा उदेश्य इस अनुवाद की केवल समिक्षा करना नहीं है. बलकी ये दिकोड करना है, कि ब्रहम, वास्तविक्ता और चेतना जैसे बहरी बरक्विष्यों को, मतलब आम जन मानस की रोज मर्रा की बाशा में कैसे समजगया आगया है. सही का. बार्तिय दर्शन के परद्श्श्श्वे उनका रुद्बा एसा था क्यूने सर्व तन्त्र स्थन्त्र क्योपादी दीगे थी. सर्व तन्त्र स्थन्त्र, यानिक एसा व्यक्ती जिसका सभी दाशनिक प्रनालियों पर समान और निर्विवाद अदिकार हो. बलकल. मतलब ये कोई चोटी बात नहीं है नियाए, सांख्य, योग, पुर्वमी मान्सा और वेदान्त इन सभी परस्पर, विरोदी और गल गडिशाँ में सोचने वाले दर्षनों पर उनो ने इतनी गेराए से लिखा की, हर दर्षन के अनियाई उनकी तीकाओ को अन्तिम प्रमार मानते है. ये अपने अपने के चमत कार है? तीके, आए ये से तोड़ा विस्तार से समचते है. ये तो कुछ एसा हुए की, कोई एक ही वेड्यानिक कौन्तम मेकनेक्स, रेलिटिविती और इवलुचनरी बायोलोगी तीनो में नोबल पुरुसकार जीतने वली रीशर्च लिग दे हैं आ? आ, एक दम वोही बात. तीनो में तोप की रीशर्च. यही वो बात है, जो नहीं अद्वितिया बनाती है. और इसी अद्वितियता के भीज एक बडी अटिहासिक विदंबना चिपि हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� बिल्कुल और मेरे स्रोथ पटते हुए जो बाथ सब से जआदा हावी रही वो ये की अनुवाद की ये प्रक्रिया केवल दिक्षनरी खोल कर एक शब्द की जगा दूस्रा शब्द रखने जैसी नहीं है उगर देखान बाद के बिलकोज शुर्वाती हिसे मही बडी खुबसुरती से देखा जासकता है, जिसे हम मंगला चरन कहते हैं अच्छ, वहां कै? वहां अनुवादक ने सलुसक्रित के उस दार्षनिक फारीपन को, लोक वानी की जो सहज्टा दी है अग, उज़ा बाद को गरन्त के भिलको शुर्वाती हिसे मेही बडी खुबसुर्ती से देखा जा सकता है, जिसे हम मंगला चरन कहते हैं. अच्छ, वहां कै? वहां अनुवादक ने सवूस्क्रित के उस दार्षनिक फारीपन को, लोग वानी की जो सहज्ता दी है, मुस्की कहा गया है? मुस्की, यहनी मुस्कान. जी, मुस्की. औरे, वाज, ये शब्द अपने आपने कितना जादूई है. मतलब जब हम स्रिष्टी का निर्मान कहते है, तो दिमाग में गरहों का टकराना, बिग बाअँग, या किसी ब़ुद बडी यान्त्रेक प्रक्रिया की चवी बनती हैं बिल्कुल एक बारी बहर कम काम ज़सा लकता है आँ लेकिन ये मुस्की शवद इस अनन्त अग्कल्पनिय दर्षन को सीदा हमारे गर आंगन मे लाके कड़ा कर देता है सही कहा? ब्रम्हांद का निर्मान कोई बोज नहीं है, कोई प्कष्ट्री का काम नहीं है, ये बस अस्तित्व की एक सहेज नहीं मुस्कान का पर इनाम है. और आप देके ये कोई कवित्व की अतिशोग की लहीं है, ये अद्वायत दर्षन का मुल स्वभाव है, इश्वर को स्रिष्टी रष्टने के लिए किसी बाहरी सामगरी या प्रैयास के आवशकता नहीं है। जैसे मुस्कुराने के लिए हमें किसी तूल की जरूत नहीं होती। यह यह ब्रम्मान्ड उस ब्रम्म का स्वबहाविक उलास है एक टेट देसी शब्दने है हाजारो पन्नो के शास्ट्रारत का निचोड रग दिया यहां बाट सच्छ में बहुत रोचक हो जाती है अदर बाद शच में बहुत रोचक हो जाती है, कुकि अगर ब्रमान के उद्पती महेज एक मुसकान, जितनी सहज और सुन्दर है, तो फिर इस दून्या में इतना दोक, इतनी उलजहन और इतना संगर्ष क्यू है। इतना संगर्ष क्यु है? यही ही वो सवाल है, जो हमे गेराई में लेजाता है. हां, मतलब हम जो देखते है, क्या वो सच्छ है? और इसी सवाल के सात ये गरन्त अपनी सबसे मुख्यदाशनिक सिद्धान्त में प्रविष करता है, अद्द्यास, यानी सुपर्व्पुशिशन या ब्रहम का सिद्द्धान्त जी. और अद्वैद्विदान्त की पूरी इमारत इसी अद्द्द्यास को समजने पर टिकी है. अर इसी बिन्दु पर भामती अपनी एक एक दम अलग और विषिष्ट पहजान स्थापिद करती है. वो कैसे? दर्षन शास्तर में वेदान्त को समजने के तो प्रमुक प्रस्थान यह स्कूल रहें. एक है विव्रन प्रस्थान और दूस्रा है वाचस्पती मिष्र का बहामती प्रस्थान इन दोनो के भी जो सबसे बधी बहेस है, वो इस बात पर है कि अविद्ध्या, यानी अग्यान का आश्रे कोन है अग्यान रहता काँ है तर की करुब से सोचें तो विव्रन अप्रस्थान का मानना है कि अग्ज्यान सीदे ब्रम्मही स्तित है लेकिन भामती प्रस्थान इसे पुरी तरहे से पलड़ड़ देता है भामती कि अनुसार अविद्ध्या का आश्रे ब्रम्मही है बल की स्वयम जीव है यानी हम बदान्त का ही मुल्त सिद्धान्त कहता है कि जीव की आत्मा स्वयम प्रकाश्वान है, वो पुरी तरहे से शुद्ध और निर्विकार है. जबात है. सही बात है. तो अगर आत्मा अपने अपने इतनी शुद है, तो उष्द्द्धापर अग्यान का परदा या अद्यास पिक कैसे सकता है. अगल अब ये तो कुछ आज्सा हूँ अगा के कोई अईन्सान सूरच के अपट तोरच की रोष्नी डाल कर अंदेरा करने की कोशिष कर रहो? बहुत अच्चा सवाल है? अगन शुद प्रकाष पर अंदेरा कैसे तहर सकता है? इस स्वबहाविक शंका का समदान, वाचस पती मिष्र ने इतने सतीक और व्यावारेक उदाहरनो से किया है, कि वो तर्की कसोटी पर पूरी तरहें कहरा उतरता है. और अनुवादक ने उन उदाहरनो की जीवन्तता को मेठली में हुभभभई उके रहे. अचा कोई उदारन दीजे? इसका सबसे प्रमुक उदारन आखाश का है हम जानते है कि आखाश निराकार है अप्रत्यक्ष है उसका कोई अपना रंग नहीं है बलकुल लिकनेक नासमज बच्चा उस आखाश को देखकर क्या कलपना करता है या ज़सा गरन्त में उल्लेकित है, अद्र नील मनी से बने विशाल उल्ते कटोरे का रोप करता है। अहो अग आप आप बज़ा दब प्रज़ा पर लगु करें तो बच्चे के अजा जो जो अजाजा पर बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या बच्चे या च्चे � अद्मा की अद्यान का औरोब जीव की अपनी कलपिद द्श्टी के कारन होता है, अद्मा की शुद्टापर कोई दागनी लकता. क्या बात है, बहुती खुबसुरती से समजगया यहे से. अद्मा के विग्यान को और भी गेराए से पुखता करने किलिए, गरन्त में म्रिक्त्रिष्ना, यानी रेगिस्तान के मिराज का एक बहुती शान्दर विष्लिषन की आगया है. आच्छा, म्रिक्त्रिष्ना. गरन्त इस अनुबहव को समजाने के लिए और निरववचनिया ख्याती शब्द का प्रियोक करता है. अ निरवचनिया का आर्थ है, जिसे शब्डो मे पुरी तरह से परिबाशित ना किया जा सके. न व्मतलव? मतलव ये म्रिक त्रिष्ना ना तो पुरी तरह से सत्तिया है, और ना ही पुरी तरह से असत्तिया. जब मैंने पहली बार इस फिस्से को पडा तो सच बताओ ये एक पहले जैसा लगा था सब हाविक है मतलग कोई भी चीज या तो सचो सकती है या जुट वो दोनो के भीच में कैसे लटक सकती है तो बग़ प्यास व्यक्ती वहां जाखर सच्छ में प्यास बजा लेता चुकी वो प्यास नहीं बजासकता इसले वो सथ्ति तो कते है बिलकोल सही और दूसरी तरफ अगर हम उसे पूरी तरफ असत्यमान लें जैसे किसी इनसान के सिर पर सींख प्यास बुजा लेता. जुकी वो प्यास नहीं बुजा सकता, इसले वो सत्तितो कतः नहीं है. बिलकुल सहीं. और दूसरी तरव आगर हम उसे पुरी तरव से असत्तिमान लें. जैसे किसी इनसान के सरपर सींख जो अस्तित्व में होते ही नहीं है. तो फिर वो म्रिक्त्रिष्ना आखो को दिखाई नी देनी जाईईई. रहा, असत्तिचीस तो दिखेगी नहीं. लिक्डवाद दिखाई दे रही है, वो व्यक्ती को अपनी अगर दोडने पर मजबूर कर रही है, उश़रीर में तहकान और निराशा पैदा कर रही है एक आजी चीस जो वास्तविकता में है नहीं प्रभी हमारे भीटर वास्तविक प्रतिक्रियाई पैदा कर रही है उसे हम असत्ते कैसे कैदे? सही बात है इसलिये ये ब्रम अनिरवचनीया है वाचछस्पती मिष्ष्वर समज अदे हैं कि हमारे जीवन के अनुबव, हमारा तनाव, हमारा एहंकार, ये सब इसी म्रिगत्रिष्ना कि तरा हैं. जो हमें भेवजा दोडा रहे हैं. ये परम सत्ते नहीं हैं, लेकिन ये हमें तब तक दोडाते हैं, जब तक हम नक अस्ली स्वरूप नहीं पचान लेते हैं. ये मनोविग्यान और दर्षन का बहुत यी गेरा संगम है. और अ इस ब्रम की परद्दद़ परद जाज करने के बाद ये चर्चा हमे ग्रन्त के उस मुखे हिसे तक लेजाती है, जो इस पूरी इमारत की नीव है. आप ब्रम्सुत्र के पहले चार्सुत्र, जिने चतू सुत्री कहा जाता है. जी, गरन्त का एक बड़ा हिसा केवल इनी चार वाख्यों को खुलने में समर पित है. और चतु सुत्री का पहला ही सुत्र है, अठा तो ब्रम जिग्यासा. यानी अठा अब ब्रम को जानने के इच्चा. इसी सुत्र के विष्लेशन में वाचस्पती मिष्रने, कर्म और ग्यान तता मोक्ष के समबन्दों को बहुत ही सबस्छत्तरीके से अलगलक किया है. लिकिन दिके समाज में अकसर ये दारना रहती है, क्यम अच्छे कर्म करेंगे, यग दान यए अनुश्ठान करेंगे, तो हमें मोखष का पल मिल जाएगा. लिकिन भामती इस दारना को सिरे से कहारिज करती है. रामती इस पष्ट कहती है, के कर्मो से मुखती नहीं मिलती. इसे अगर हम केती के उदारन से समचें, तो कर्म केवल वहा हल है जो खेद की मिट्टी को बूर्भुरा और तग्यार करता है. बलकल. आप जीवन बर खेज जोद ते रहें. लेकिन अगर अप उस में भीज नहीं डालेंगे, तो फसल कभी नहीं होगेगी. बीज नहीं डालेंगे, तो फसल कभी नहीं होगेगी. कर्म केवल हमारे मन की जमीन को शुद्द करने वाले दूरस्त सहायक है. मोखष रूपी फसल तो केवल ग्यान के बीज से ही प्राप्तो सकती है. बहुत ही सटी कुदारन है. और इसी क्रम्मे जब हम ब्रम्मान्द क्युट्पत्तिय और वेदों के शुरोट पर आते है, तो दुस्रा और तीस्रा सुत्र ये साभित करता है, कि इस पूरी स्रिष्टी के पीछे एक सर्वग के कारन, एक इंटलिजन दिसाईनर मोईजुद है. अग, आद आद आद आद आग आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आद आ कोयल किसी भी बेटर्तीब मोसम में नहीं कुकने लकती, प्रक्रती एक अंदी और गुंगी प्रक्रीया नहीं है. बलक्ल नहीं, ये एक अट्यंत व्यवस्तित और सुविचारित रचना है. अदिए तर्कों को स्थापिट करने के बाद अँ पूँच्तें अँ सुत्र पर जो इस गरन्त का सबसे विस्त्रित अर गेहन हिस्था है ततू समन वयात इं सब तर्को को स्थापिट करने के बाद रहा हम पोचते हैं उस सुत्र पर जो इस गरन्त का सबसे विस्त्रित और गेहन हिस्चा है ततू समन वयात यही पर यह सबसे वडा सबाल कडा होता है कि आखिर ये मोख्ष्छ जिसकी तनी चर्चा होरी है, उसका वास्त्रिक सुरुब क्या है? मोख्ष्छ प्राप्त कैसे होता है? तो इस सब का अख्र मतलव क्या है मोख्ष्छ को लेकर वाचस्पती मिष्रने जो नकारात्मक तर्क दिया है, तो तो बज़ाजा पाईटा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा तो बजाजा � अप आप बवाँबाँ बाँबाँ बाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबाँबा अगर नावेक उस शोर को चोडगर अपनी नाव को नदी के उस शान्त मद्धिबाग में लेजाता है और सब से एहम बात ये है के उस नावेक ने नदी के उस शान्त हिसे को बनाया नहीं है बलकल नहीं वो शान्त हिसा लेहरों के तकराने से पहले भी वही ता और हमेशा वही रहेगा उसने बस शोर वाली जगग़ से अपनी नाव हटाए और वहा पहच गय जो पहले से मोजुद ता मोखष कही बाहर किसी तुसरे लोक में जाने की यात्रा नहीं है ये बस किनारे के उस शोर, उस अद्यास और म्रिएक त्रिष्ना को पहचानने और उसे अपनी नाव हता लेने की प्रक्रिया है. बज़द सुन्दर! यहां जो सबसे दिल्चास बात है वो यह थे है कि इतने उचे और पार लोकेक दर्शन को समजाने के लिए भाशा को कितना जमीनी होना परता है सच में गजेंद्रे ताकूर के मेठली अनुवाद ने दर्शन शास्त्र की जटिल बहसों को काटने के लिए, जिन देशज मुहावरों का प्रियोख किया है, वो सर्फ अनुवाद का कमाल नहीं, बलकी वो तर्कों को एक मनोवेग्यानेक दहर देता है. इस बाथ से मैं पुरी तरे सहवतो. उदारन के लिए, दर्शन में अकसर अनवस्ता दोश या इन्पनेट रिग्रेस की बात होती है आप एक आफी बहस जफार जबाब एक नया सवाल कड़ा कर दे और श्रिंक्ला कोई अंती नहुज बिल्कुल, और इसे समजाने के लिए अनुवाद में जो मैठली का मुहावरा अस्तिमाल हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अब भी बाशा और मलोविग्यान का जो सबसे गहरा सम्मन्द इस गरन्त में अगेरा गया है, वो पूर्व, मीमान्सा और विदान्त के बीच की बहेस में सामने आता है. अग, वो द्रविडवेक्ती वाली कहानी. तो बवाजार को एक ज़टके में जमीन पर लापबटकता है. लेकिन भाशा और मलो विग्यान का जो सबसे गेरा सम्मन दिस गरन्त में उकेरा गया है, वो पुर्व मीमान्सा और वेदान्त के बीच की बहेस में सामने आता है. वो द्रविड वेक्ती वाली कहानी. जी. ये हिस्सा आजके हमारे संचार और सोचने के तरीके पर बहुत सतीक बडदता है. पूर्व मीमान सा दर्षन का मानना था कि वेदो में या बाशा में मुल्रुब से केवल उनी वाख्यों का कोई महत्व है, जो हमें कोई आग्ग्या या आदेश देते है. उनक तर किये ता के बाशा का काम है, मनुश्षे को किसी क्रिया में लगाना ये करो या ये मत करो अग उनक अनुसार जो चीस पहले से ही सिद्ध है जो गतित हो चुकी है उसके बारे में सिर्फ जानकारी देने वाख्यों का कोई प्रेओजन या लाब नहीं होता द्रविडद व्यक्ती देव्दत नाम के पुता को देकता है, द्रविडद का चहरा किसी खिले हुए कमल कितरा चमक रहा है, वो खुषी से गदगद है. द्रविड़ व्यक्ती ये देक्र हैरान होता है, तब उसे पता चलता है कि तशी दूत ने आाके देवददद को बस एक पंगती कही ती तुमहारे पुत्र का जन्म हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ उपने श़ो के महावाक्क्या जैसे तट्वम असी या तोम वही हो ये वागाटित कर देवादद की पूरी मनोवैग्यानिक वास्टविक्ता को बबडल कर रक्दिया वो अपार हर्ष्षे बभर गया इस कहानी से जो निषकर्ष निकलता है उपनिशडो के महावाक्या जैसे तत्वम असी या तुम वही हो ये कुई आदेश नहीं है उम वे हमे कुछ नया करने को नहीं कहते वे बस हमे वो जानकारी देते हैं जो हम भूल गयते है जैसे ही वो गयान मिलता है उम वे हमे कुछ नया करने को नहीं कहते, वे बस हमे वो जानकारी देते हैं, जो हम बूल गयते. जैसे ही वो गयान मिलता है, हमारी वास्ट्विक्ता का पुरा धाचा बदल जाता है, बिलकल देवददत की तरा. और अगर अप नूवी शताभदी के दरशन को आजके आदूनिक दोर के परीपेखष़ से जोडगगे देखें जहाँ हम हर दिन सुचनाँ, सोचल मीट्या और अंगिनद दारनाँ की बाड में दुबे रहते हैं तो ये गरन्त एक मनोव यग्यानिक रक्षा कवच काम करता है. कैसे? अग्यास के सिद्धान दमे लगातार ये चितावनी देता है, कि हम अपनी कन्टिष्निंग अपने पुर्वग गरहो को ही वास्तविक्तमान कर चल रहे है. ये तो बहुत गेहरी बात है. अदर, गुस्से, या आईजाइटी से बजर जाते हैं। बिना सोचे समजे? कोई खबर, कोई संदेश हम तक पहुचता है। अर हम बिना उसकी सच्चाई जाने प्रतिक्रिया दे दे देखे। ये बामती का दर्षन रहें, हमें थेहरना सिखाता है। ये बामती का दर्षन रह्वे तहेरना सिखाता है बिलकोल ये बताता है कि जो हमारी आखो को दिक्रहा है ये जो हमारा मन महसुस कर रहा है वो हमेशा सत्ते नहीं होता अदर्षनिक पुनर जागरन है। इक दम सही। या उस गयान को जिसे सद्यों तक केवल कुछ खास बुत्तीजीवियों तक सीमित रख हा आप उसे आम अजन्सान की रोज्मरा की जिन्गी के भीच त्स्थापित के ये बाशा से दुसरी बाशा में शब्दों का स्थानान्त्रन नहीं है ये एक सान्स्क्रतिक और दाशनिक पुनर जाग्रन है एक दम सही या उस ज्यान को जिसे सद्दियों तक केवल कुछ क्ष बुत्ती जीवियों तक सीमित रख हा गया था उसे आम अईन्सान की रोज्मरा की जिन्गी के भीच तबट्पित करने का एक बहुतिख श़क्त अर एतिहासिक कदम है. ये मित्ला की उस बोद्धिक परमपरा का अपनी ही विरासत पर फिरसे अदिकार जताना है, जो हमेशा से उसी समाज का हिस्था थी. आज की इस चर्चा से यह साबित होता है, की दून्या का कोई भी विचार इतना आमुर्थ या जटल नहीं होता, कि उसे लोग भाशा की मिठास और जमीनी हकीकत के सात नस नजगया जासके. बलकोल, लोग भाशा में कलगी ताकत होती है? तो अब इस गेहरी वैचारिक यात्रा को विराम देने से पहले हम एक अँसा विचार चोडकर जाना चाते है तो इस अभी सदान्तो को हमारे भीतर जीवन्त रके. वह क्या है? इस गरन्त ने हमें सिक्ठाया कि हमारा अग्यान हमारी अविद्या ही हमारे लिये एक सीमिद दुन्या का निरमान करती है. इसे एक दिश्खे के रूप में आगर हम सोचे, मान लीजे मिट्टी का एक गड़ा है, और उसे ये गेरा ब्रम हो गया है, कि उसने उस अनन्त असीम अकाश को अपने भीतर समेट रखठ है लग चोटा सा ग़ा जी वो ग़ा उस भीतर के अकाश को अपनी जागीर मानता है और सोचता है कि उसके दून्या बस उतनी ही है जितने उन मिट्टी की दिवारों के अंदर है लिकिन सरा सुची ए, जिस पल उस गडे को यग्यान हो चाए, कि उसके अंदर का अकाश, और बाहर का अनंध अकाश, अलग-लग नहीं बलकी एक ही हैं. और वो खुद भी और कुछ नहीं, बस उसी असी म्रमान्ड मे रख्खी मिट्टी का एक चोटा सा रूप है, तो क्या गड़े के बहुतिक रूप से तूटने से पहले ही उसकी उस छोटी सी गुटन बरी दून्या की सारी सीमाय क्या खडम नहीं जाएंगी? ये तो बहुत ही अदबद विचार है इस विचार को आज आज आज भीतर अदरने दीजे और हम सब खुट से यह सवाल पूछें कि अपनी दारनाओ, अपने एहंकारों, और अपने दर से हम सबने अपने जीवन में यह से कुण-कुण से गड़े बनारग हैं जिने आज तुटने की जरूरत हैं सोचना और समझने के लिए सच में बहुत कुछ हैं जी और बवाद बादबादा वो बवाद बादबादा वो बवाद बादबादा वो बवादबादा वो बवादादा वो बवादादा वो बवादादा वो बवादादा वो बवादादावो बवादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा