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🎭 खण्ड-३ : मतला, रदीफ, काफिया – विशेष नियम आ दोष

मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास (खण्ड-३) पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नोत्तरी

१. खण्ड-३ अनुसार, “मिला” (मतला) केर सही परिभाषा की अछि?
२. मतलाक बाद गजलक दोसर, तेसर आदि शेर सभमे कोन बात अनिवार्य अछि?
३. “हुस्ने मतला” (मतला-ए-सानी) कतेक कहल जाइत अछि?
४. “गैर मुरद्दफ गजल” के अर्थ छै?
५. रदीफ सम्बन्धी “तकाबुल-ए-रदीफ” नामक दोष के स्थितिमे होइत अछि?
६. तकाबुल-ए-रदीफ दोषसँ बचबाक उपाय की अछि (पोथी अनुसार)?
७. “तहलीली रदीफ” (तहलीली रदीफ) के विशेषता छै?
८. विजय नाथ झाक उदाहरण “शिवासन” मे रदीफ “सन” अछि आ काफिया “आ” अछि। एहन एकै शब्दसँ दूनूक पूर्ति के नियम के कहल जाइत अछि, आ एकर प्रयोग मैथिलीमे महत्वपूर्ण किएक अछि?
९. पोथीक अनुसार, केखनो-केखनो दीवान (उर्दू) सभमे बिना मतलाक गजल सेहो रहैत अछि। एकर कारण की अछि?
१०. मैथिली गजलमे “तहलीली रदीफ” के लेल लेखक केनऽ कारण देनाइ छै?
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