गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व आ ओकर सीमा-रेखा — एक संपादकीय पुनरवलोकन (केन्द्रीय मैथिली बोली)
जे व्यक्ति एहि ग्रन्थक गुण बुझबाक योग्य नहि, ओकर प्रशंसासँ हम प्रसन्न नहि होयब। अन्हरा सभक झुंड जँ कोनो चित्रक प्रशंसा करए, तँ चित्रकारक गौरव कोना बढ़त? लोक एहि ग्रन्थक दोष देखबैत मात्र एकर आलोचना करथि। ज्ञानी लोक अनजानमे कएल अपन तथ्यगत भूल दिस ध्यान आकृष्ट कएल जाएबासँ निश्चय प्रसन्न होइत छथि।- [ आत्मतत्त्वविवेक ग्रन्थक आलोचनासम्बन्धी अन्तिम वचन- उदयनाचार्य]
एहि विशेषांकक लेल आएल रचना— परिचयात्मक आलेखसँ लऽ कऽ दूटा दीर्घ पुस्तक-समीक्षा (अखियासल आ हिआओल पर), साक्षात्कार, संस्मरण, आ मूल्यांकनपरक निबन्ध धरि — एकठाम राखि पढ़ला उत्तर एकटा बात स्पष्ट होइत अछि : रमण जीक मैथिली साहित्यमे जे स्थान अछि, से निर्विवाद अछि, मुदा एहि विशेषांकक सार्थकता तखनहि पूर्ण होएत जखन प्रशंसाक संग-संग ओ सीमा सेहो चिह्नित होअए जे स्वयं योगदानकर्ता सभ, आ रमण जीक अपने आलोचना-पद्धतिक भीतरहि सँ, बेर-बेर रेखांकित होइत रहल अछि। नीचाँ ओहि सभटा सीमाकेँ चारि खण्डमे बाँटि एकठाम राखि रहल छी — पहिल, समालोचना-पद्धतिक सीमा (मुख्यतः 'अखियासल' पर समीक्षासँ); दोसर, 'हिआओल' पर अध्यायवार समीक्षासँ; तेसर, व्यक्तित्व-कृतित्व आ संस्थागत मूल्यांकनसँ जुड़ल सीमा; आ चारिम, संपादकीय-शैलीगत आ पाठकीय असहमतिसँ जुड़ल बिन्दु।
पहिल खण्ड : 'अखियासल' आ समालोचना-पद्धतिक मौलिक सीमा
'अखियासल' (1995) पर आएल विस्तृत समीक्षा (रचना ४) एहि सतरहोमेसँ सभसँ बेसी संरचित आ निर्मम अछि। एहि समीक्षाक उत्तरार्ध पूर्णतः 'अखियासल'क सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकटकेँ समर्पित अछि, आ ओतय आठ गोट "सीमा" क्रमबद्ध रूपसँ गनल गेल अछि।
(क) पाठ बिना समीक्षा
सभसँ गम्भीर सीमा ई जे लगभग प्रत्येक प्रारम्भिक निबन्धमे समीक्षक स्वयं मूल रचनाक 'अनुपलब्धता'केँ स्वीकार करैत छथि। 'चन्द्रप्रभा'क प्रसंगमे स्वयं लिखल गेल अछि — "चन्द्रप्रभाक अध्ययन-विश्लेषण नीक जकाँ नहि कएल जा सकल अछि, एकर प्रमुख कारण थिक अनुपलब्धता"; त्रिलोचन झाक प्रसंगमे — "बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि"; यदुवरक प्रसंगमे — "यदुवरक प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल अछि"; बिसरल जनार्दन झाक प्रसंगमे — "पत्र-पत्रिकोमे जे रचना प्रकाशित भेल होएत, आब सर्वसुलभ नहि अछि।" एतय एक गहन विरोधाभास उत्पन्न होइत अछि — जँ मूल कृति समीक्षककेँ स्वयं उपलब्ध नहि छल, तँ ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधारपर सम्भव भेल? बहुत ठाम समीक्षा वस्तुतः द्वितीयक स्रोतपर — जयकान्त मिश्रक मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झाक शोध-प्रबन्ध, अन्य समीक्षकक उद्धरणपर — आश्रित भऽ जाइत अछि। पाठ-केन्द्रित समीक्षाक दृष्टिसँ ई एक मौलिक दुर्बलता थिक — पाठ बिना समीक्षा।
(ख) मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
रमानन्द झा एक निबन्धमे जाहि गुणकेँ सर्वोच्च मानैत छथि, दोसरमे ओकरे विपरीतकेँ प्रशंसित करैत छथि। गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्रक विवेचनमे समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवनक प्रतिबिम्बनकेँ सर्वोच्च मूल्य मानल गेल अछि; किन्तु व्यासक कथाकेँ ठीक एहि कारणें प्रशंसित कएल गेल जे ओ समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होइत अछि आ परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहैत अछि। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध थिक — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनहु गुण, कखनहु ओकर अभाव गुण। तहिना, हरिमोहन झाक हास्यकेँ "विचारक उन्मेष नहि करब"क कारणें न्यून मूल्य देल गेल, किन्तु मधुपक गीतकेँ "तत्काल हृदय-प्रभाव" आ आनन्दक कारणें उच्च मूल्य देल गेल — जखन कि गीत सेहो प्रायः वैचारिक मन्थन नहि, अपितु भाव-तात्कालिकतापर आश्रित होइत अछि। 'कोबर-गीत' सन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचनाकेँ "व्यक्तिसँ पैघ समाज"क तर्कसँ उचित ठहराओल गेल, किन्तु क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचारक दृष्टिसँ आत्माक प्रतिकूल रचना भाव-औचित्यक मूल-भङ्ग थिक — समीक्षक एतय सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान नहि कऽ पबैत छथि। ई अस्थिरता एहि कारणें अछि जे रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नहि अपनबैत छथि — ओ प्रसंगानुसार कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक, कखनहु रूपवादी दृष्टि अपनबैत छथि। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक दिस लचीलापन दैत अछि, तँ दोसर दिस मूल्याङ्कनकेँ अप्रत्याशित आ असंगत बना दैत अछि।
(ग) सैद्धान्तिक शब्दावलीक अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झाक समीक्षामे रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूपेँ विद्यमान अछि, तथापि ओ एहि शास्त्रीय प्रतिमानकेँ कतहु सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरणक रूपमे प्रयोग नहि करैत छथि। "व्यञ्जित", "सम्प्रेषण", "भावाश्रित" सन शब्द तँ अबैत अछि, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्यक नाम आ हुनक सिद्धान्तक व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक सेहो कतहु नामोल्लेख अथवा सुविचारित प्रयोग नहि भेटैत अछि। एहिसँ एक द्वैध स्थिति उत्पन्न होइत अछि — एक दिस ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षाकेँ सुपाठ्य आ पत्रकारीय-सुलभ बनबैत अछि, मुदा दोसर दिस अकादमिक गहनताक अभाव उत्पन्न करैत अछि। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक तँ अछि, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम अछि।
(घ) परिप्रेक्ष्यक संकीर्णता — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
पचीस निबन्धमे चौबीस पुरुष-रचनाकारकेँ समर्पित अछि; मात्र एक — हरिलता — स्त्री-रचनाकारकेँ। ओहूमे हरिलताक विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति धरि सीमित रहि जाइत अछि, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावना — बाल-विवाह, वैधव्य आ स्त्री-शिक्षाक निषेधक विरुद्ध चोरा कऽ अक्षर सीखबाक संघर्ष — अनदेखा भऽ जाइत अछि। स्त्री अधिकतर पात्र अथवा प्रेरणाक रूपमे उपस्थित छथि, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचकक रूपमे कम। ओहिना विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तरसँ अबैत छथि — मिथिलाक दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्पराक अनाम रचयिता एहि समान्तर इतिहाससँ प्रायः अनुपस्थित रहि जाइत छथि।
(ङ) संकलनात्मक असंगति आ पाठ-प्रामाणिकताक प्रश्न
ई पचीस निबन्ध सन् 1972 सँ 1989 धरि विभिन्न पत्र-पत्रिकामे विभिन्न अवसरपर, विभिन्न पाठक-वर्गकेँ ध्यानमे राखि, स्वतन्त्र रूपेँ लिखल गेल छल। एकरा एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देलासँ एक अन्तर्निहित असंगति उत्पन्न होइत अछि — कतहु व्यक्तित्व-प्रधान, कतहु कृति-प्रधान, कतहु विधा-प्रधान, कतहु प्रवृत्ति-प्रधान समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्धकेँ नहि बान्हैत अछि, आ एक सुनियोजित ग्रन्थमे जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होइत अछि, से एहिमे अनुपस्थित अछि। संगहि, कृतिमे उद्धृत पद्यांश आ गद्यांशक पाठ-प्रामाणिकता सेहो सन्दिग्ध रहि जाइत अछि, किएक तँ स्वयं समीक्षक स्वीकार करैत छथि जे बहुतो रचना पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल आ अनुपलब्ध अछि, तेँ उद्धृत अंशक मूल पाठसँ तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव छल। "प्रथम" आ "मौलिक" सन पद लेल जे कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास आवश्यक अछि, से एहि आरम्भिक कृतिमे अविकसित रहि जाइत अछि।
(च) समान्तर इतिहास-प्रतिमानक अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्ततः, सर्वाधिक मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहासक अवधारणाकेँ व्यवहारमे तँ जीबैत छथि, मुदा ओकरा सिद्धान्तक रूपमे स्पष्टतः प्रतिपादित नहि करैत छथि। "दू कोटिक साहित्यकार"क सिद्धान्त एकर सर्वाधिक निकट थिक, मुदा ओ मुख्यधाराक कैननक — जयकान्त मिश्रक इतिहासक — विकल्प अथवा विरोध नहि, अपितु ओकर पूरक बनि रहि जाइत अछि। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्रकेँ प्रामाणिक आधार मानि हुनकहि सूचनापर आश्रित रहैत छथि, जखन कि समान्तर इतिहासक असली दायित्व मुख्यधाराक कैननक आधार-मान्यताकेँ स्वयं प्रश्नाङ्कित करब थिक।
दोसर खण्ड : 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षासँ उठल सीमा
'हिआओल' (2012) पर आएल समीक्षा (रचना १६) एहि विशेषांकक सभसँ दीर्घ आ पद्धतिगत रचना अछि, जाहिमे भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि — तीनू कसौटीपर सत्रहो अध्यायकेँ अलग-अलग परखल गेल अछि। एतय सेहो प्रत्येक अध्यायक उपलब्धिक संग-संग ओकर सीमा गनाओल गेल अछि, जकर किछु मुख्य बिन्दु एतय राखल जाइत अछि।
मैथिली भाषाक अध्ययनसँ जुड़ल सीमा
उद्घाटक अध्याय मुख्यतः पश्चिमी विद्वान् — कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन — क साक्ष्यपर ठाढ़ अछि; दीनबन्धु झासँ पूर्वक देशी वैयाकरण-चेतना प्रायः अस्पर्शित रहि गेल। फलतः जाहि औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसाक आलोचना निबन्ध करैत अछि, तकरहि स्रोत-सामग्रीपर ओ स्वयं आश्रित भऽ जाइत अछि — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शक चिर-परिचित आत्म-विरोध थिक। मानक मैथिलीक निर्धारणमे अन्य उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकारक प्रश्न — मानक कोन शक्ति-संरचनासँ बनैत अछि — अनुत्तरित रहि जाइत अछि।
रमानाथ झा आ किरणजी सम्बन्धी अध्यायक सीमा
संग्रहक सभसँ दीर्घ अध्याय (रमानाथ झा आ मिथिला भाषा) संरचनाक दृष्टिएँ शिथिल अछि — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन, छह स्वतन्त्र निबन्धक सामग्री एकहि छत्रमे अटकाओल गेल अछि। सन्तुलनक घोषित प्रतिज्ञाक बादो स्वर कतोक स्थानपर आलोचनात्मक जीवन-विवेचनसँ अधिक प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बनि जाइत अछि — किरणजीक मत-खण्डनकेँ "आवेगात्मक" कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष लेल प्रयुक्त लेखकक अपन शब्दावली सेहो आवेगसँ सर्वथा मुक्त नहि। 'प्रत्यालोचक किरणजी' अध्यायमे सेहो विरोधाभास-प्रदर्शनमे उद्धरण-चयन एकतरफा अछि — किरणजीक जाहि स्थल सभमे आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, से खोजल नहि गेल; चालीस वर्षक लेखनमे मत-भिन्नता विकास सेहो भऽ सकैत अछि, केवल विरोधाभास नहि।
'कन्यादान'-पाठ आ यात्री-भाषा सम्बन्धी अध्यायक सीमा
'उपेक्षितक आँखिसँ कन्यादान पढ़ल जाए' — जे नारीवादी पुनर्पाठक दृष्टिसँ संग्रहक सभसँ चुनौतीपूर्ण अध्याय मानल गेल — ओहूमे प्रश्न-शृंखलाक अनुत्तरता एक सीमा थिक। "एकर उत्तरदायी के?" बेर-बेर पूछल गेल, मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण नहि देलनि — उपेक्षिताक आँखिसँ पढ़बाक जे प्रतिज्ञा छल, से अन्ततः प्रश्नवाचक मुद्रामे स्थगित भऽ गेल। कन्यादानक हास्य-रसक पक्ष — जे कृतिक लोकप्रियताक मूलाधार थिक — क रस-शास्त्रीय परीक्षा नहि भेल, आ कतोक स्थानपर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बनि जाइत अछि। तहिना, यात्रीक भाषासम्बन्धी अध्यायमे चारू शैलीविज्ञानिक उपकरण पश्चिमी स्रोतसँ आनल गेल अछि, आ भारतीय काव्यशास्त्रसँ संगति-स्थापन संकेत-मात्र रहि गेल — कुन्तकक छह वक्रता-भेदसँ चयन-विचलनक व्यवस्थित मिलान भेल रहितैक तँ पूर्व-पश्चिम-सेतु पूर्ण बनितैक, से अवसर छूटि गेल।
अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह आ मनमोहन झा सम्बन्धी सीमा
लक्ष्मीपति सिंह पर लिखल अध्यायमे लेखक स्वयं स्वीकारैत छथि जे छिड़िआएल कवितामेसँ "किछु मात्रे झोड़ि" सकलाह — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय अछि, मुदा एकर परिणाम ई जे निष्कर्ष सभ सीमित नमूनापर ठाढ़ अछि आ सामान्यीकरणक वैधता संदिग्ध रहैत अछि। कतोक प्राकृतिक प्रतीककेँ प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल अछि, मुदा प्रतीकक ई अर्थ कविताक आन्तरिक संरचना आ अन्य कविताक साक्ष्यसँ सभठाम पुष्ट नहि। मनमोहन झा सम्बन्धी अध्याय संग्रहक लघुतम अध्याय थिक, आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा थिक — "अनालोचित पक्ष"क घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सारक स्तरपर रहि गेल; निधनक दसम दिन लिखल गेलाक कारण श्रद्धांजलिक आर्द्र स्वर आलोचनाक तटस्थतापर भारी अछि।
समग्रतामे, 'हिआओल'क समीक्षक स्वयं अन्तमे लिखैत छथि — "समानान्तर धाराक पूर्ण पद्धति ओतऽ पहुँचैत अछि जतऽ हाशियाक स्वर अपने बाजए — 'हिआओल'मे हाशिया लेल बाजल गेल अछि, हाशियाकेँ बजाओल कम गेल अछि।" ई एकटा वाक्य समस्त संग्रहक सीमाकेँ संक्षेपमे समेटि दैत अछि।
तेसर खण्ड : व्यक्तित्व-कृतित्व आ संस्थागत मूल्यांकनसँ जुड़ल सीमा
समर्पण आ परिणामक बीचक खाधि
प्रवीण कुमार झाक आलेख (रचना १५) एहि विशेषांकक सभसँ बेबाक स्वर अछि। दीर्घ प्रशंसाक बाद "मुदा मुदा मुदा!" कहि ओ स्पष्ट लिखैत छथि — "एक होइत अछि योगदान आ दोसर होइत अछि वृहद योगदान।" चेतना समिति आ मैथिली लेखक संघ जेहन संस्थामे एतेक दिन धरि महत्त्वपूर्ण पदपर, व्यापक बौद्धिक क्षमताक संग रहितहुँ, मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचीमे राखबाक संघर्षमे रमण जीक कोनो निर्णायक भूमिका स्पष्ट रूपेँ सोझाँ नहि अबैत अछि; चेतना समिति सन संगठनमे रहितहुँ मैथिली-शिक्षाक क्षेत्रमे सेहो कोनो एहन पैघ परिणाम सोझाँ नहि अबैत अछि, जकरा हुनकर नेतृत्वक प्रत्यक्ष परिणाम कहल जा सकय। लेखक स्पष्ट करैत छथि जे प्रश्न समर्पणपर नहि, अपितु ओहि समर्पणक परिणामपर अछि — केओ कतेक समय देलनि आ कतेक मेहनत कएलनि, ई एकटा पक्ष अछि, मुदा ओहि मेहनतसँ भाषा, शिक्षा, साहित्यकार आ समाजकेँ की ठोस उपलब्धि भेटल, ई दोसर आ बेसी महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि। एहि आलेखमे चेतना समितिक संग रहैत पुस्तक-साहित्यक संवर्धन आ संस्थागत गतिविधिकेँ लऽ कऽ रमण जीक कार्यकालसँ संबंधित किछु विवाद-आरोप, आ सरकार-सत्ताप्रतिष्ठानक संग संघर्षक बदला कूटनीतिक संवादकेँ बेसी महत्त्व देबाक आलोचना सेहो चर्चामे रहलाक उल्लेख अछि — यद्यपि लेखक स्वयं ई सेहो जोड़ैत छथि जे एहि आरोपकेँ अंतिम सत्य मानबासँ पहिने स्वतंत्र जाँच आवश्यक अछि।
मौनताक व्यंग्य
डा. धनाकर ठाकुरक आलेख (रचना ११) शैलीमे व्यंग्य-प्रधान अछि, मुदा ओकर भीतर एकटा तीक्ष्ण संकेत छिपल अछि। रमण जीकेँ चेतना समितिक "गुरु द्रोणाचार्य" कहि, लेखक मिथिला राज्यक प्रश्नपर चेतना समितिक — आ तेँ रमण जीक — मौनताकेँ द्रोणाचार्यक ओहि प्रसंगसँ तुलित करैत छथि जतय गुरु आँखि मुनने रहि गेला। "मिथिला राज्यक बात त चेतना समिति लेल सांढ़क लाल कपड़ा" — ई पंक्ति स्पष्ट कहैत अछि जे संस्था आ ओकर प्रमुख साहित्यिक स्तम्भ राजनीतिक रूपेँ संवेदनशील प्रश्नपर मौन रहबाकेँ प्राथमिकता दैत छथि।
निष्पक्षताक प्रश्न आ पंजीकरणक अपूर्णता
डॉ. कैलाश कुमार मिश्रक आलेख (रचना १२) मे उद्धृत राजलीन ठाकुरक मन्तव्य स्पष्ट अछि — "रमण जी हुनक प्रिय लोक आ नीक समीक्षक दुनू, मुदा एकटा दोष जे ओ आन लोकक अपेक्षा सीमित समाजक कार्यकेँ बेसी उजागर करैत छथि, ताहि ठाम ओ निरपेक्ष नहि रहि पबैत छथि।" नबोनारायण मिश्रक संस्मरणपरक आलेख (रचना १३) मे सेहो साहित्यकार-पंजीकरणक जे सूची देल गेल अछि, ओहिमे बाबूसाहेब चौधरी सन आन्दोलनकारी-नाटककारक नाम सम्मिलित नहि होएबाक ओर संकेत अछि, जे रमण जीक पंजीकरण-कार्यक चयनात्मकतापर एकटा मौन प्रश्नचिह्न थिक।
चारिम खण्ड : संपादकीय-शैलीगत सीमा आ पाठकीय असहमति
पद्धतिगत अनुशासनहीनताक स्वीकृति
कुमार राहुलक आलेख (रचना ६) एहि दिशामे सभसँ प्रत्यक्ष अछि। "हम हुनकर सीमाकें तं रेखांकित कए सकैत छी" कहि ओ स्पष्ट लिखैत छथि जे रमण जी समालोचनामे विद्वान आलोचक कोनो बान्हल-छेकल नियमक पालन करैत नहि देखाइत छथि, बल्कि कोनो एके टा तत्त्वसँ प्रभावित भऽ अपन निर्णय दऽ दैत छथि। किछु ठाम टिपाउट जेकाँ रमण जी कोनो रचना अथवा रचनाकारपर कम शब्दमे काज चला लेल करैत छथि आ अपन बात बेसी लिखैत छथि। हडसनक ओ मत उद्धृत करैत — जे आलोचनाक काज मात्र कृतिक उचित-अनुचित देखब नहि, बल्कि निश्चित मानदंड स्थापित करब थिक — लेखक ई स्वीकार करैत छथि जे रमण जीक कतोक आलेख एहि सैद्धान्तिक कसौटीपर पूर्ण नहि उतरैत अछि।
सम्पादकीय कार्यक असमानता
प्रदीप बिहारीक आलेख (रचना १४) एक ठाम स्पष्ट कहैत अछि जे 'घर-बाहर' पत्रिकाक सम्पादनमे ओ कौशल नहि झलकैत अछि, जे रमण जीक विवेचनात्मक-अनुसंधानात्मक पोथीमे देखाइत अछि। भूमिका आ संपादकीय लेखनमे "कोनो लेखककेँ एहि दुनूक लेखनमे कतेक बेराएल होमक चाही, से रमण जी बेसी ठाम देखाइत छथि, सभ ठाम नहि। किछु ठाम एकभगाह भेलाह अछि।" एहि संग एहू बातक उल्लेख अछि जे हिनक साहित्यिक सेवा लेल हिनका प्रशंसा जतेक होइत छनि, आलोचना आ खिधांस सेहो होइत छनि, मुदा एहिपर ओ कतेक गंभीरतापूर्वक विचार करैत छथि, से हिनका चेहराक भावसँ बुझल नहि जा सकैछ।
तथ्यगत आ व्याख्यागत असहमति
कीर्तिनाथ झाक 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) मे एक ठाम स्पष्ट असहमति दर्ज अछि — जखन रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ स्वाधीनता-आन्दोलनक प्रति "पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण" कहैत छथि, तखन समीक्षक टिप्पणी करैत छथि — "मुदा, ई विचार एहि विषयपर सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन।" अजित कुमार झाक आलेख (रचना ५) मे 'कन्यादान' पर रमण जीक पुनर्पाठसँ आरो स्पष्ट असहमति व्यक्त अछि — समीक्षकक तर्क एकाङ्गी बुझबैत, आ रमण जी द्वारा हरिमोहन झाक पाठकक जे तीन श्रेणी कएल गेल, ओहिमे एक चतुर्थ वर्गक (जे रमण जीक अपन साहित्यकेँ मिथिला-संस्कृतिपर आघात बुझैत छथि) चर्चा नहि भेल — "रमण जी अपन आलेखमे चारिम श्रेणीक चर्चा नहि केलनि अछि।" हितनाथ झाक आलेख (रचना १७) मे सेहो एक स्पष्ट असहमति अछि — रमण जी अपन बीज-भाषण संग्रहक प्रस्तावनामे साहित्यिक राजनीतिपर जे चोट कएने छथि, तकरा लेल समीक्षक लिखैत छथि — "ई मंच छल आ ई जाहि तरहक पोथी अछि, ओहि लेल हमरा जनैत उपयुक्त नहि... प्रहारसँ पहिने सुधारक सेहो गुंजाइस होयबाक चाही।"
आशीष अनचिन्हारक दृष्टिमे रमानन्द झा ‘रमण’ केर आलोचनात्मक-इतिहासलेखनक कमीसँ
आशीष अनचिन्हारक आलेखक मूल आग्रह ई अछि जे साहित्यक इतिहास लिखब केवल पोथी जमा करब, नाम गिनब वा बादमे प्रकाशित पुस्तककेँ आरम्भ-बिन्दु मानि लेब नहि थिक। हुनका अनुसार इतिहासकारक पहिल शर्त “इतिहासबोध” अछि—अर्थात् घटना, प्रकाशन, प्रभाव, पूर्ववर्ती प्रयोग, स्रोत आ श्रेयक क्रमकेँ निष्पक्ष ढङ्गसँ बुझब। एहि कसौटीपर ओ खास कऽ रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा धर्मेन्द्र विह्वलक पोथी “व्योमक ओहिपार” लेल लिखल भूमिकामे कतेको कमी देखैत छथि।
1. इतिहासबोधक अभाव
अनचिन्हारक सभसँ पैघ आपत्ति ई अछि जे रमण जी एहि प्रसंगमे “इतिहासबोध” बिसरि गेल छथि। अनचिन्हारक मते इतिहासकार वा भूमिका-लेखककेँ ई देखबाक चाही जे कोनो विधाक पहिल प्रकाशन, प्रारम्भिक प्रयोग, नियम-विवेचन आ बादक पुस्तकाकार विस्तार—ई सभ अलग-अलग चरण अछि। बादमे आयल एकटा पोथीकेँ आधार बनाकऽ पूर्वक चरणकेँ ओझरायल इतिहासक क्रमकेँ बिगाड़ैत अछि।
2. विधाक आरम्भ तय करबाक मापदण्डमे असंगति
अनचिन्हार स्पष्ट करैत छथि जे कोनो साहित्यिक विधाक आरम्भ ओहि समयसँ मानल जेबाक चाही जखन ओकर पहिल प्रमाणित प्रकाशन भेल—पत्रिकामे हो वा पुस्तक रूपमे। हुनकर आपत्ति ई अछि जे जँ एक लेखक लेल “पहिल पुस्तक” मानदण्ड बनाओल जाए आ आन लेखक लेल “पहिल प्रकाशन”, तँ इतिहासलेखनमे दूहरा मापदण्ड आबि जाइत अछि। रमण जीक भूमिका एहि भेदकेँ पर्याप्त स्पष्ट नहि करैत अछि—एहने अनचिन्हारक आरोप अछि।
3. पूर्ववर्ती प्रकाशन आ प्रयोगक उपेक्षा
अनचिन्हार 2009 मे प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुरक “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” पोथीक “मैथिली हाइकू हैकू क्षणिका” आलेखक उल्लेख करैत छथि, जतय टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि जापानी विधापर चर्चा भेल बताओल अछि। ओ विदेहक फेसबुक समूह पर लगभग 2012 धरि एहि विधासभक प्रशिक्षण आ अनेक रचनाकारक भागीदारीक सेहो उल्लेख करैत छथि। अनचिन्हारक दृष्टिमे रमण जीक भूमिकामे एहि पूर्ववर्ती सार्वजनिक इतिहासक समुचित उल्लेख नहि भेनाइ एक महत्त्वपूर्ण कमी अछि।
4. स्रोत-सन्दर्भक अभाव
अनचिन्हारक आरोप अछि जे रमण जी टंका आदि विधाक नियम बतबैत छथि, मुदा ओहि नियमक मैथिलीमे पूर्व प्रस्तुति वा उपलब्ध स्रोतक संदर्भ नहि दैत छथि। साहित्येतिहास अथवा आलोचनात्मक भूमिकामे तथ्य मात्र कहब पर्याप्त नहि; ओकर स्रोत, पूर्वप्रयोग आ प्रमाण सेहो देब आवश्यक होइत अछि। अनचिन्हार एहि संदर्भहीनताकेँ विद्वतापूर्ण लेखनक कमजोरी मानैत छथि।
5. श्रेय-निर्धारणमे गड़बड़ी
अनचिन्हारक पठन अनुसार “व्योमक ओहिपार” केर भूमिका एहन प्रभाव दैत अछि मानो धर्मेन्द्र विह्वल टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि विधाकेँ मैथिलीमे अनने होथि। अनचिन्हार एहि प्रभावकेँ ऐतिहासिक रूपेँ भ्रामक मानैत छथि, कारण हुनका अनुसार ई विधासभक चर्चा, नियम आ रचना-प्रयोग पहिने भऽ चुकल छल। तैँ भूमिका-लेखनमे “के पहिने परिचय देलनि”, “के पहिल एकछाहा संग्रह देलनि”, “के विधाकेँ लोकप्रिय बनौलनि”—ई अलग-अलग श्रेय स्पष्ट करब आवश्यक छल।
6. “पहिल पुस्तक” आ “विधाक पहिल उपस्थिति”क भेद अस्पष्ट
आलेखक परिशिष्टमे देल फेसबुक संवादकेँ अनचिन्हार अपन तर्कक समर्थनमे प्रस्तुत करैत छथि। ओहि संवादक आशय ई अछि जे धर्मेन्द्र विह्वल अपन पोथीकेँ एहि विधाक पहिल पुस्तकाकार/एकछाहा कृति कहबाक दाबी करैत छथि, मुदा विधा मैथिलीमे हुनकासँ पहिने नहि छल—एहन दाबी नहि करैत छथि। अनचिन्हारक मते रमण जीक भूमिका एहि अत्यन्त जरूरी भेदकेँ स्पष्ट रूपेँ स्थापित नहि कऽ सकल।
7. व्यक्तिगत वा वैचारिक असहमतिक प्रभावक आरोप
अनचिन्हारक आलोचना केवल तथ्यात्मक भूल धरि सीमित नहि अछि। ओ आरोप लगबैत छथि जे गजेन्द्र ठाकुरसँ वैचारिक असहमति वा “तामस”क कारण नाम आ योगदानकेँ नजरअन्दाज कएल गेल। ई एक गम्भीर आरोप अछि; अनचिन्हारक दृष्टिमे इतिहासकारक काज व्यक्तिगत पसन्द-अनपसन्दसँ ऊपर उठि श्रेयक निष्पक्ष निर्धारण करब थिक।
8. विरोधी प्रमाणक सामना नहि करब
अनचिन्हार चुनौती दैत छथि जे जँ गजेन्द्र ठाकुरसँ पहिने मैथिलीमे टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि उपलब्ध छल आ ओकर नियमपर चर्चा भेल छल, तँ ओकर प्रमाण सामने आनल जाए। अर्थात् केवल मौन वा नाम-लोप पर्याप्त नहि; इतिहासलेखनमे वैकल्पिक दावाक दस्तावेजी प्रमाण देबाक चाही। अनचिन्हारक अनुसार रमण जीक भूमिकामे एहि स्तरक प्रमाण-विवेचन अनुपस्थित अछि।
9. भूमिका-लेखकक स्रोत-जाँचक जिम्मेदारी पूरा नहि भेनाइ
किसी पोथीक भूमिका केवल प्रशस्ति नहि, खास कऽ जखन ओ विधाक इतिहास आ नियमक दावा करैत हो। अनचिन्हारक दृष्टिमे रमण जीकेँ पूर्व प्रकाशन, कालक्रम, रचनाकारक सूची, सार्वजनिक पोस्ट, पुस्तक आ उपलब्ध प्रमाण सभक जाँच कऽ कतेक सावधानीसँ निष्कर्ष देबाक चाही छल। एहि स्रोत-जाँचक अभाव भूमिकाकेँ आलोचनात्मक दस्तावेजक अपेक्षा कमजोर बनबैत अछि।
10. इतिहासशुद्धिक आवश्यकता
अनचिन्हार अन्ततः सुधारक रास्ता सेहो सुझबैत छथि: जँ पूर्वक तथ्य गलत अछि तँ नब प्रमाण आनू; जँ पूर्ववर्ती योगदान अछि तँ ओकर नाम आ श्रेय पुनर्स्थापित करू। तैँ हुनकर दृष्टिमे रमण जीक उक्त लेखनक मूल कमी केवल “भूल” नहि, बल्कि सुधार योग्य ऐतिहासिक असंतुलन अछि।
निष्कर्ष: आशीष अनचिन्हारक आलोचनाक केन्द्र रमानन्द झा ‘रमण’ केर भाषा, शैली वा समग्र साहित्यिक कृतित्व नहि, बल्कि एहि विशिष्ट भूमिकामे इतिहासबोध, स्रोत-सन्दर्भ, कालक्रम, श्रेय-निर्धारण आ निष्पक्षताक प्रश्न अछि। हुनकर आरोपक सार ई अछि जे मैथिलीमे जापानी काव्य-विधासभक पूर्व इतिहासकेँ समुचित स्थान नहि देल गेल आ “पहिल पुस्तक” तथा “विधाक पहिल आगमन”क अन्तर धुँधला भेल। एही कारण ओ एहि लेखनकेँ इतिहासलेखनक दृष्टिसँ अपूर्ण आ पक्षपात-प्रभावित मानैत छथि।
उपसंहार
एहि सभटा सीमाकेँ एकठाम राखला उत्तर एकटा साझा सूत्र स्पष्ट होइत अछि। रमण जीक कार्य मात्रात्मक रूपेँ विपुल, अभिलेखीय दृष्टिसँ अमूल्य, आ मातृभाषा-प्रेमसँ प्रेरित अछि — एहिपर विशेषांकक कोनो योगदानकर्ता प्रश्न नहि उठबैत छथि। मुदा जखन ओहि कार्यकेँ सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-प्रामाणिकता, पूर्ण निष्पक्षता आ संस्थागत परिणामक कठोर कसौटीपर कसल जाइत अछि, तखन ओ पर्याप्त गुंजाइश छोड़ि दैत अछि — पाठ बिना समीक्षाक जोखिम, मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता, आत्मीयता-जनित प्रशंसाक अतिरेक, हाशियाक अल्प उपस्थिति, संस्थागत मौनता, आ चयनात्मक निष्पक्षता — ई सभटा बिन्दु आगामी अनुसन्धानक निमन्त्रण थिक, दण्ड नहि। 'हिआओल'क समीक्षक स्वयं जे कहलनि, से एहि समस्त विशेषांकपर सेहो लागू होइत अछि — "एकर श्रेष्ठता ओतए अछि जतए लेखक अभिलेख खोजैत छथि, प्रचलित भूल सुधारैत छथि, विस्मृत लेखककेँ पुनः उपस्थित करैत छथि... एकर सीमा ओतए अछि जतए अनुमान प्रमाणक स्थान लैत अछि, जीवनी कृतिक विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि।" रमण जीक अपने शब्दमे कही तँ — "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः" — एहि विवाद आ प्रतिवादसँ होइत तत्त्व-बोधे एहि विशेषांकक असली उपलब्धि थिक।
रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्वक सीमा-रेखा पर एक संपादकीय दृष्टि
रमण जीक मैथिली साहित्यमे जे स्थान अछि, से एहि सतरहो रचनासँ निर्विवाद बूझि पड़ैत अछि — मुदा एहि विशेषांकक सार्थकता तखनहि पूर्ण होएत जखन प्रशंसाक संग-संग ओ सीमा सेहो चिह्नित होअए जे स्वयं योगदानकर्ता सभ (आ रमण जीक अपन आलोचना-पद्धति) रेखांकित करैत अछि।
१. आलोचना-पद्धतिक सबसँ मौलिक सीमा — पाठ बिना समीक्षा
'अखियासल' पर आएल विस्तृत समीक्षामे (रचना ४) ई तथ्य साफ उजागर भेल अछि जे रमण जी प्रायः जाहि रचनाकेँ आलोचित करैत छथि, ओकर मूल पाठ हुनका लग उपलब्धे नहि रहैत छनि — 'चन्द्रप्रभा', त्रिलोचन झा, यदुवर, बिसरल जनार्दन झा — सभठाम समीक्षक स्वयं 'अनुपलब्धता' स्वीकारैत छथि। जखन मूल कृतिए समीक्षककेँ भेटले नहि, तँ ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधार पर सम्भव, ई प्रश्न अनुत्तरित रहि जाइत अछि। बहुतो ठाम समीक्षा जयकान्त मिश्रक इतिहास वा अन्य द्वितीयक स्रोत पर आश्रित भऽ जाइत अछि।
२. मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता
एहि दुनू पोथीक समीक्षामे (रचना ४ आ १६) बेर-बेर देखाओल गेल अछि जे रमण जी एक निबन्धमे जाहि गुणकेँ सर्वोच्च मानैत छथि, दोसरमे ओकरे विपरीतकेँ प्रशंसित करैत छथि — जेना गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण आदिमे समसामयिक यथार्थ-सम्पृक्तिकेँ गुण मानब, मुदा व्यासक कथाकेँ ठीक ओही कारणें प्रशंसा करब जे ओ समसामयिक यथार्थसँ अप्रभावित रहल। एहि तरहक आत्मविरोध ई देखबैत अछि जे कोनो एकटा घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नहि अछि — समीक्षा कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक भऽ जाइत अछि।
३. आत्मीयता आ आलोचनात्मक दूरीक अभाव
लक्ष्मीपति सिंह, मोहन, राजेश्वर झा सन अध्यायमे व्यक्तिगत स्नेह समीक्षाकेँ संस्मरणात्मक श्रद्धांजलिक रूप दऽ दैत अछि, जाहिसँ वस्तुनिष्ठता प्रभावित होइत अछि। एकर ठीक उलट हरिमोहन झा पर जे आलोचनात्मक साहस देखाओल गेल, से समस्त संग्रहमे समान रूपेँ नहि अछि।
४. सैद्धान्तिक शब्दावलीक अनुपस्थिति
रस, ध्वनि, व्यञ्जना आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय तत्त्व अन्तर्निहित रूपेँ तँ अछि, मुदा आनन्दवर्धन, कुन्तक, क्षेमेन्द्र आदिक व्यवस्थित सैद्धान्तिक प्रयोग नहि भेटैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक सेहो सुविचारित प्रयोग नहि। ई समीक्षाकेँ सुपाठ्य तँ बनबैत अछि, मुदा अकादमिक गहनताक अभाव उत्पन्न करैत अछि।
५. परिप्रेक्ष्यक संकीर्णता — स्त्री आ हाशियाक अल्प उपस्थिति
'अखियासल'क पचीसमे चौबीस पुरुष-रचनाकार, मात्र एक स्त्री (हरिलता) — ओहूमे विवेचन वैष्णव भक्ति धरि सीमित। मिथिलाक दलित, अतिपिछड़ा आ मौखिक-परम्पराक अनाम रचयिता एहि समान्तर इतिहाससँ प्रायः अनुपस्थित रहि जाइत छथि। कुमार राहुलक आलेख (रचना ६) मे सेहो ई कहल गेल जे रमण जी कोनो बान्हल सैद्धान्तिक नियमक पालन करैत नहि देखाइत छथि, बल्कि एकहि तत्त्वसँ प्रभावित भऽ अपन निर्णय दऽ दैत छथि, आ किछु ठाम टिपाउट जेकाँ कम शब्दमे रचनाकारक काज चला लैत छथि आ अपन बात बेसी लीखि दैत छथि।
६. संकलनात्मक असंगति
पचीसो निबन्ध विभिन्न कालमे, विभिन्न पत्रिकाक लेल स्वतंत्र रूपेँ लिखल गेल छल — एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देलासँ कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा नहि बचल। भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहारक अभाव एहि जोड़ा-जाड़ी प्रकृतिकेँ उघारि दैत अछि — ई बात 'हिआओल' पर सेहो लागू होइत अछि, जतय एक-एक अध्यायक विस्तार, पद्धति आ गहराइ असमान अछि।
७. व्यक्तिगत समर्पण आ संस्थागत परिणामक बीचक खाधि
प्रवीण कुमार झाक आलेख (रचना १५) एहि विशेषांकक सभसँ बेबाक स्वर अछि। "मुदा मुदा मुदा!" कहि ओ स्पष्ट लिखैत छथि जे चेतना समिति आ मैथिली लेखक संघ जेहन संस्थामे एतेक दिन धरि महत्त्वपूर्ण पदपर रहितहुँ मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचीमे राखबाक संघर्षमे, मैथिली-शिक्षाक क्षेत्रमे रमण जीक कोनो निर्णायक, ठोस परिणाम स्पष्ट रूपेँ सोझाँ नहि अबैत अछि — समर्पण पर प्रश्न नहि, परिणाम पर प्रश्न। एहि आलेखमे चेतना समितिक कार्यकालसँ जुड़ल किछु विवाद-आरोप आ सत्ता-प्रतिष्ठानक संग कूटनीतिक सम्बन्धकेँ प्राथमिकता देबाक आलोचना सेहो चर्चामे रहलाक उल्लेख अछि। डा. धनाकर ठाकुरक व्यंग्य-प्रधान आलेख (रचना ११) एहि दिशाकेँ आरो तीक्ष्ण करैत मिथिला राज्यक प्रश्न पर रमण जी आ चेतना समितिक मौनताकेँ द्रोणाचार्यक 'आँखि मुनने रहब' सँ तुलना करैत अछि।
८. निष्पक्षताक प्रश्न
डॉ. कैलाश कुमार मिश्रक आलेख (रचना १२) मे उद्धृत राजलीन ठाकुरक मन्तव्य स्पष्ट अछि — "रमण जी हुनक प्रिय लोक आ नीक समीक्षक दुनू, मुदा एकटा दोष जे ओ आन लोकक अपेक्षा सीमित समाजक कार्यकेँ बेसी उजागर करैत छथि, ताहि ठाम ओ निरपेक्ष नहि रहि पबैत छथि।" नबोनारायण मिश्रक आलेख (रचना १३) मे सेहो साहित्यकार-पंजीकरणक सूचीसँ बाबूसाहेब चौधरी सन आन्दोलनकारी-नाटककारक अनुपस्थितिक ओर संकेत अछि।
९. संपादकीय काजक असमानता
प्रदीप बिहारीक आलेख (रचना १४) एक ठाम स्पष्ट कहैत अछि जे 'घर-बाहर' पत्रिकाक सम्पादनमे ओ कौशल नहि झलकैत जे विवेचनात्मक-अनुसंधानात्मक पोथीमे देखाइत अछि — भूमिका आ संपादकीय लेखनमे जतेक वैचारिक त्वरा चाही, से सभठाम समान नहि। कीर्तिनाथ झाक 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) मे सेहो एक ठाम असहमति दर्ज अछि — "ई विचार सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन" — जखन रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ स्वाधीनता-आन्दोलनक प्रति "पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण" कहैत छथि।
१०. पाठकीय असहमति
अजित कुमार झाक आलेख (रचना ५) मे 'कन्यादान' पर रमण जीक पुनर्पाठसँ स्पष्ट असहमति व्यक्त अछि — समीक्षकक तर्क एकाङ्गी बुझबैत, आ रमण जी द्वारा हरिमोहन झाक पाठकक जे तीन श्रेणी कएल गेल, ओहिमे एक चतुर्थ वर्गक (जे रमण जीक अपन साहित्यकेँ मिथिला-संस्कृति पर आघात बुझैत छथि) चर्चा नहि भेल।
संगति — ई सभटा सीमा एक साझा सूत्रसँ बान्हल अछि : रमण जीक कार्य मात्रात्मक रूपेँ विपुल, अभिलेखीय दृष्टिसँ अमूल्य, आ मातृभाषा-प्रेमसँ प्रेरित अछि, मुदा सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-प्रामाणिकता, पूर्ण निष्पक्षता आ संस्थागत परिणामक स्तर पर ओ आगू बढ़बाक गुंजाइश छोड़ि दैत अछि — जकरा स्वयं हुनकहि शब्दमे कही तँ "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः"।
-Gajendra Thakur, editor, Videha [be part of Videha www.videha.co.in JOIN VIDEHA WHATSAPP CHANNEL
-गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह, whatsapp/ Arattai no +919560960721 HTTP://VIDEHA.CO.IN/ ISSN 2229-547X VIDEHA
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