विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
विदेह अंक ४४७ पर पाठकीय मन्तव्य
प्रणव कुमार झा
कैलाश कुमार ठाकुर के लेख “विद्यापतिक धरा पर मैथिलीमे रैप-संगीत” बहुत शोधपरक, रोचक आ इन्फोर्मेटिव लागल। गजेन्द्र ठाकुर द्वारा संस्कृत सँ मैथिली मे अनूदित व्यंग्यात्मक प्रहसन 'पालाण्डुमण्डनप्रहसनम्' मे प्याज आ लहसुन के केंद्र मे रखि कऽ सामाजिक ढकोसला, रूढ़िवाद, खान-पान सं जुड़ल अन्धविश्वास आ तथाकथित पाखंडी विद्वता पर तीक्ष्ण व्यंग्य कएल गेल अछि। आशीष अनचिन्हार के गजल के लाइन “मिश्री जकाँ आँखि लागल, सपना बताशा भऽ गेलै” मजेदार लागल। राजदेव मंडल के कविता ‘संबोधन’ रोचक छैक। संबोधन, संबंध पर खूब निर्भर करय छैक संगहि पेशेवर सफलता मे सेहो संबोधनक महती भूमिका छैक। मैथिली के आम जीवन आ भाषा मे अदका-फदका के एक समय तक खूब भूमिका देखल जाय, परमेश्वर कापड़ि के “हमर रचनागत अदका-फदका” मजेदार लागल।
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