विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
प्रणव कुमार झा
अंतिम किस्त
सोमेश्वर पहाड़ी के बीच बसल मिथिलाक एकटा गाम छल रामपुरा। गामक पछवरिया टोला में रामलखनक एकटा छोट सन घर छल। घरक छप्पर पुरान, आँगनक माटि बरखाक पानि सँ बार-बार कटैत छल। मुदा परिवार आ घर-आँगन प्रेम आ संतोष से जुडल रहय छल। रामलखन नरकटियागंजक सड़क पर ऑटो चलबैत छल। भोरक पहिल उजासक संग घर सँ निकलि जाइत आ राति थाकल देह लऽ कऽ घुरैत। दिन भरि यात्रिक बोझ ढोबैत-ढोबैत ओ अपन परिवारक सपना सेहो ढोबैत छल। ओकर बौह फूलमती घर-गृहस्थी सम्हारैत छल। दुनूक एकमात्र बेटा छल उन्नैस बरखक केशव।
केशव 12वी पास छल, आ ग्रेजुएशन कऽ रहल छल। बापक उम्मीद छल जे बेटा जिनगी मे हमरा से नीक किछु करय। मुदा गामक नव पीढ़ीक संग-संग केशवो के मोबाइलक चमक अपन दिस खींचय लागल छल। ओकर किछु संगी सभक हाथ में महँग फोन छल। ओ सभ फोन से रील बनबैत, नव-नव चीजक प्रदर्शन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सभ पर करैत छल। गोटैक संगी के बहुत रास फोलोवर सेहो छल। ओकर सबहक दाबी इहो छल जे ओ सब रील बना के पाई कमा रहल अछि।
केशवक मन में सेहो एकटा इच्छा पलि रहल छल आईफोन लेबाक। केशव अपन साधारण फोन से कखनो काल वीडियो बनाबई मुदा ओई मे ओ बात कहाँ जे आईफोन मे! एहि बीच बिहार मे चुनावक गहमागहमी जोड़ पकड़ने छल। दिल्ली से एकटा बड़का भौकाली नेताजी रैली करय लेल बेतिया आयल छलाह। नेताजी नवतुरिया सभके रिझाबय लेल भाषण देलखिन जे बिहारक युवा के लेल ओ इन्टरनेट कनेक्टिविटी के एहन व्यवस्था कऽ देने छथीन जे एतुका युवा सभ मोबाइल मे रील बना कऽ आ रील देख कऽ खूब पाई कमा रहल छथि। भौकाली नेता के ई भाषण केशव के इच्छा के आर बेसी हिलोरि देने छल। ओ आपन बाप लग जिद करय लागल जे एकटा आईफोन दिया दियऽ। बाप कहथिन बेटा अपन औकाइत नै अछि, पढ़ू लिखू किछ काज सीखु, कत्त ई मोबाइल के फेरी मे पड़ल रहय छि। नेताजी के भाषण से फूलमाती आ रामलखन के मोन सेहो डोलल छल, मुदा घरक़ आर्थिक स्थिति आईफोन किनबाक अनुमति नै दैत छल। मुदा आजुक मार्केट मकड़ाजाल जेकाँ बहुत रास समस्या के समाधान लऽ कऽ आबय अछि, जे देखू तऽ समाधान लागे अछि मुदा बिनु सावधानी कतेको लोक ओहि मकड़ा जाल मे ओझरा जाय अछि। बाजारवाद एहने एकटा समाधान लऽ कऽ आयल अछि किस्त पर फोन सेट उपलब्ध करेनाइ। केशव एक दिन बिना माता-पिताक अनुमति लेने किस्त पर आईफोन खरीद लेलक। कोनो बेसी डॉक्यूमेंट थोड़े नऽ लागल छल। बस एकटा आधार कार्ड से काज भऽ गेलय।
घर पहुँचैत देरी फूलमती फोन देखलक। “ई कतऽ सँ एल?”
केशव मुस्कुराइत कहल “माँ, हमरा लेल अछि। बहुत दिन सँ चाहैत रही। दोकान मे किस्त पर भेटि गेल।”
फूलमती चुप भऽ गेलिह। रामलखन राति में ऑटो सँ घुरल। फूलमतीक चेहरा देखिते बुझि गेल जे घर में किछु गड़बड़ अछि। “की भेल?”
फूलमती धीरे सँ कहलिह “केशव आईफोन लेने अछि। किस्त पर।”
रामलखनक माथ पर बल पड़ि गेल। ओ केशव दिस तकैत रहल। “बौआ, ई फोनक की दरकार छल? तोरा लग जे फोन छौ से तऽ चलिए रहल छौ। हमरा दिन भरि ऑटो चला कऽ जे कमाइ होइत अछि, ओहि सँ घर चलैत अछि। तोहर पढ़ाइक खर्च, घरक खर्च...”
केशव बीचहि में बाजि उठल “तऽ की भेल? अहाँ चिंता जुनि करू। किस्त तऽ हम देब।”
रामलखन ओकर आँखि में देखैत कहलक “किस्त देब से तँ ठीक अछि, मुदा कोना के देब? अहाँ पाई कतय से आनब?”
“पापा, अहाँ चिन्ता नहि करू। अहाँ नेताजी के भाषण नै सुनने छलहु? नेताजी युवा सभक विकास के लेल कतेक काज करय छथीन। अहाँ कहियो सोचनेहो नै हेबय, आब देखियौ हमरो लग आईफोन छैक। आब हमहु रील बना के पाई कमेबई।”
“मुदा यदि कोनो महीना पाई कम पड़ि गेल तँ?
“ओह! आब अहाँ फालतू के सवाल से रंग मे भंग नै करू, जाऊ खाऊ आ सुतुग।“ एहिबर केशव तल्खी से बाजल। बात ओतहि रुकि गेल।
फोन हाथमे आबैते केशवक दुनिया बद्लि गेल। ओकर पहिल काम भेल आईफोनक कैमरा सँ सेल्फी लेबय आ रील्सन बनाबय। “आईफोन सँ शूट कएल गेल” - इहै लिखि कऽ ओ यूट्यूब आ इंस्टाग्राम पर रील्स अपलोड करए लागल। कखनों सड़क पर, कखनों चौर मे, तँ कखनों कोनो पोपुलर गीत पर लिपक सिंक करैत ओ दिन-रात एक करि देलक। पहिने तँ लोक हँसैत छल, मुदा आईफोनक चमक आ ओकर वीडियोक क्लैरिटी आ एडिट देखि कऽ किछु लोकक धियान सेहो खिचाएल। धीरे-धीरे, एल्गोरिदम पर कृपा भेल। किछु रील्स पर हजार-दु हजार व्यूज आएब सुरु भेल। केशवक खुसीक ठिकाना नहि रहि गेल। ओकरा लागल जे ओ राता-राति स्टार बनि गेल अछि। आब ओ और बेसी मेहनत करए लागल। दिनभरि रीलक आइडिया सोचब, रातभरि एडिटिंग करब। व्यूज बढ़ैत देखि कऽ यूट्यूब सँ पहिल आमदनी - मानू दु-चारि हजार रुपैया आएब सेहो सुरु भेल। मुदा, सिक्काक दोसर पट्टा बड़ कड़ु छल। ओकर ई खुशी बेसी दिन धरि नहि टिकल। जखन हिसाब लगाबय चललक तँ माथा घूम गेल। फोनक ईएमआई, महँग मोबाइलक डेटा पैकक खर्चा, आ रील्स बनाबय मे भेल अन्य छोट-मोट खर्च जोड़ि कऽ जतेक आमदनी यूट्यूब सँ अबैत छल, ओकरा सँ ओकर अपन खर्च सेहो नहि निकलि रहल छल।
जे पाई अबैत छल, ओ तँ बस फोनक किस्त चुकता करैत-करैत सधि जाइत छल। हाथमे तँ कोनो बचत नहि होई छल। आब तँ रातुक नींद सेहो उड़ि गेल छल, कारण सदिखन ई चिंता सताबैत रहैत छल जे काल्हि कोन नया रील्ह बनाउ जे वायरल भऽ जाइ।
समय बीतैत गेल। किस्त सभ कोहुना भराइत रहल। रामलखन अपन कमाइ में सँ यथासम्भव बेटाक हाथ मजबूत करैत रहल। मुदा महँगाई, ऑटो केर मरम्मति, घरक खर्च सभ मिलि कऽ कमाइ कोहुना बाँटि रहल छल।
अन्तिम किस्तक समय आबि गेल। ओहि महीना रामलखनक ऑटो खराब भऽ गेल छल। मरम्मति में बहुत पाई चलि गेल। घर में सेहो किछु जरूरी खर्च आबि गेल। एमहर केशव के सेहो कमाई बढईत की तऽ आरो अनियमित सन भऽ गेल छल। मुदा खर्चा तऽ नियमीते छल आ ईएमआई तऽ अपन दिन पर सुरसा सन मुँह खोलिए दैत छल।
केशव बाप से ईएमआई लेल पाई माँगल। “पपा, अन्तिम किस्त भरबाक अछि।”
रामलखन किछु देर चुप रहल। फेर नहुए नहुए बाजल “बौआ... एहि बेर हमरा लग पाई नहि अछि।”
केशवक चेहरा बदलि गेल। “की मतलब?”
“कनी समय दऽ दे। दू-चारि दिन में जोगाड़ कऽ देब।”
“अहाँ सदिखन एहिना करैत छी!”
“हम की करैत छी?”
“लोक अपन बेटा लेल की नै करय अछि आ अहाँ से केखनो किछु मांगु त हर समय बहाना!”
रामलखनक आँखि भरि गेल। “बौआ, बहाना नहि अछि। सरिपहु हमरा लग पाई नहि अछि।”
केशव झुँझला उठल। “हमरा एहन जीवन नहि चाही!”
फूलमती डरा गेल। “केशव! की बाजि रहल छह?”
मुदा केशव घर सँ निकलि गेल। रामलखन ओकर पाछाँ दौड़ल। “बौआ! रुक!” फूलमती सेहो दौड़ि पड़ल।
केशव गामक बाहर ओहि पहाड़ी दिस चलि गेल जतऽ लोक प्रायः पिकनिक अथवा चरवाही लेल जाइत छल। किछु देर में गाम में खबर फैलि गेल। “केशव पहाड़ पर चढ़ि गेल अछि... बहुत तमसायल अछि।”
पहाड़क मुहाना पर केशव ठाढ़ छल। ओकर चेहरा तामस, अपमान आ भीतरक टूटन सँ भरल छल। फूलमती दूर सँ चिचियाइत कहलिह “बौआ! नीचा आबऽ। माँक बात मानऽ।”
केशव चुप।
रामलखन हाथ जोड़ि कऽ कहलक “बौआ, तोहर किस्त हम देब। कत्तहु से आनि के देब। मुदा पहिने नीचा आबऽ।”
देखैत-देखैत गामक लोक सभ सेहो जमा भऽ गेल। गामक एकटा बुजुर्ग कहलक “बेटा, पाई फेर आबि जायत। जिनगी नहि।”
दोसर आदमी कहलक “हम सभ मिलि कऽ पाई जुटा देब।”
कियो कहलक “तोहर पिता गरीब छथि, मुदा तोहर शत्रु नहि।”
केशवक मोन मे लोकक बात सुनी दुविधा आबि गेल। मुदा ओकर भीतरक जिद्द आ निराशा ओकरा रोकि रहल छल। “हमरा केओ नहि बुझैत अछि!”
रामलखन टूटल आवाज मे बाजल “हम बुझैत छी बौआ... शायद तोहर मनक बात पूरा बुझि नहि सकलहुँ। मुदा एक बात बुझैत छी तोरा बिना ई घर घर नहि रहत।”
किछु क्षण लेल केशव स्थिर भऽ गेल। रामलखन धीरे-धीरे ओकर दिस बढ़ल। “चल बौआ... घर चल। फोन रहत, नहि रहत की फरक पड़ैत अछि? तूँ रहऽ।”
केशव अचानक से एक कदम पाछाँ हटि गेल। “पापा, लगिच नहि आउ।”
“ठीक अछि, हम लगिच नहि अबैत छी। बस तूँ ओतहि ठाढ़ रहऽ।” मुदा भय आ प्रेम दुनू सँ अधीर रामलखन अपन बेटा तक पहुँचबाक प्रयास कएलक। अचानक पहाड़क किनार पर माटि खिसकि गेल।
एक क्षणक शांति..... आ फेर एकटा चीख। आ फेर....सब किछु समाप्त।
फूलमतीक आँखि सामने ओकर बेटा आ दूल्हा दुनु लेने देने गहिर खाइ में खसि गेल।
फूलमती दौड़ि कऽ ओहि मुहाना पर पहुँचल। अपन बेटा आ दूल्हा के खाइ मे खसैत देखिकऽ ओकर संसार एक क्षण में उजड़ि गेल। गामक लोक ओकरा पकड़बाक प्रयास कएलक। “फूलमती ! रुकू!” मुदा सदमा ओकर विवेक छीनि लेने छल। क्षण भरक असावधानी में ओहो पहाड़क किनार दिस बढ़ि गेल आ गामक लोकक आँखि सामने ओकर जीवनक अन्त भऽ गेल।
पहाड़ पर सन्नाटा पसरि गेल। कनी काल पहिने जतऽ लोक केशवक किस्तक बात करैत छल, ओतऽ आब तीनटा जीवनक कीमत चुकाओल जा चुकल छल एक पिता, एक माँ, आ एकटा युवा जिनगी ... पूरा परिवारक अंत।
कतेक विचित्र छल इ दृश्य! जकरा लेल पिता अपन पूरा दिन रौद में ऑटो चलबैत बितौलनि, जकरा लेल माँ अपन इच्छा सभ दबौलनि, ओहि परिवारक खुशी एकटा फोनक किस्त लील गेल! झूठ आश्वासन आ बाजारवादक मकड़जाल आई एकटा हँसैत खेलैत परिवारक अंत करबाक घटक बनल। एकटा फोनक अंतिम किस्त पूरा परिवार के अंत के कारक बनल। अगिला दिनक लोकल दैनिक लेल इ खबर लिखईत लोकल पत्रकार मनोहर के मोन मे सहसा विचार आयल छल जे चुनाव रैली मे दिल्ली से एकटा आरो नेता आयल छल, जे रील के 21म सदी के नशा कहने छल आ कहने छल जे युवा के ऐ नशा से दूर रहबाक चाहिए आ कौशल सिखबा पर ध्यान देबा के चाहिए। काश! केशव जौं ओकर बात सुनने रहितै तऽ आई इ परिवारक एहन दुखद अंत नहि होईतैक!
-प्रणव कुमार झा, ग्राम गोरापुर जिला बेगूसराय | संप्रति: एनबीईएमएस, नई दिल्ली
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