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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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कल्पना झा

मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक सफल प्रयास

रमानन्द झा 'रमण' जीक रचना संसार बेस नमहर छनि। हुनकर रचना-संसारक नमहर लिस्ट मे सँ मात्र एकटा पोथी "मैथिली कथाक धाप" हम किनने छी। पढ़ने छी। सम्पादकक लिखल पचास पन्नाक भूमिका एहि पोथी केँ 'विशेष' बना देलक अछि। 'महत्वपूर्ण' बना देलक अछि। एहि पोथीक प्रकाशन मे सम्पादकक जे समय आ श्रम लागल छनि, से स्पष्ट देखा पड़तनि पाठक केँ। एहि पोथीक अतिरिक्त रमानन्द झा 'रमण'क लिखल नमहर-नमहर आलेख सभ निरन्तर पढ़ैत रहल छी हम पछिला पाँच-छओ बरख सँ। फेसबुक पर। बहुत लोक पढ़ैत होएब। गहन अध्येता छथि, से बुझबा मे तँ ककरो भाङ्गठ नहिए होएत। हुनकर लिखल कइअक टा शोधपरक आलेख सभ पढ़ि अजगुत मे पड़ि जाइत छलहुँ/छी, ई सोचि जे कोना एतेक समय निकालैत छथि पढ़बा-लिखबा लेल। ओएह चौबीस घंटाक दिन-राति सभ लेल होइत छै ने...ओही चौबीस घंटा मे नित्य प्रतिक क्रिया-कलाप रहैत छै, सुतबाको रहैत छै लोक केँ आ तखन पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारी निभाबैत साहित्य लेल एतेक समय निकालब वास्तव मे प्रशंसनीय अछि। अनुकरणीय सेहो।

तँ सएह जतबा-जे पढ़ल अछि हमर, ताहि पर अपन सीमित ज्ञान-बुद्धिक अनुरूप किछु प्रतिक्रिया टीपि रहल छी विदेहक डॉ. रमानन्द झा 'रमण' विशेषांक लेल।

मैथिलीक हेराएल-भोतिआएल, अनुपलब्ध कथा सभ केँ सङ्कलित-सम्पादित कऽ एहि वृहत् संग्रह 'मैथिली कथाक धाप'क प्रकाशन महत्वपूर्ण काज छनि रमानन्द झा 'रमण'क। ई काज एहन छलए जे प्रायः हिनकहि बुत्ताक बात छलए (हमर अनुमान)। आर ककरो बुतेँ किन्साइते पार लगितनि। कारण विभिन्न पत्र-पत्रिकाक दोग-दाग आ झोंझ मे पड़ल, कुहरैत मैथिली कथा-साहित्यक एहन अमूल्य धरोहरि केँ ताकि-हेरि इकट्ठा करब श्रमसाध्य काज छलए। एहि काज लेल श्रमक संग समय सेहो पर्याप्त मात्रा मे खर्च कएलनि अछि रमानन्द झा 'रमण'। पूरे पचास साल। हिनकर ई महत्वपूर्ण काज भाषा-साहित्यक अध्ययन-विवेचन कएनिहारक लेल निस्सन्देह सहयोगी सिद्ध हेतनि।

 "मैथिली कथाक धाप" पोथीक विषय-वस्तु केँ दू खण्ड मे विभक्त कएल गेल अछि। पहिल खण्ड मे कुल छब्बीस गोट कथाकारक पूर्ण/अपूर्ण कथा सभ संलग्न कएल गेल अछि। किछु अपूर्ण कथा सेहो संकलित करबाक पाछाँ सम्पादकक ध्येय ई छलनि जे भविष्यक अनुसन्धानकर्ताक समक्ष एतबो तँ रहतनि। उपलब्ध अंशहु सँ कथा आ कथाकारक अभीष्टक बोध अव्यक्त नहिए रहतनि अनुसन्धानकर्ता लोकनि केँ, सएह सोचि अपूर्णहु कथा केँ स्थान देल गेल अछि पोथी मे। एहि छब्बीस गोट कथाकारक कथा सभ मे सँ एक-दू टा छोड़ि सभटा कथाक प्रकाशन अवधि 1940 ई. अभ्यन्तर कहलनि अछि सम्पादक महोदय। संगहि इहो कहलनि अछि, एहन बात नहि जे एहि पोथी मे जतेक कथा संकलित अछि, ततबे ओहि अवधि मे लिखाएल आ छपल। सम्पादक स्वीकार कएलनि अछि जे ई हमर अक्षमता आ संसाधनहीनता थिक जे हम एतबे लोढ़ि सकलहुँ। एहि तरहक कैक टा संग्रह तैयार कएल जा सकैत अछि एखन, से कहब छनि सम्पादकक।

एहि पोथीक दोसर खण्ड (पृष्ठ संख्या 495 सँ 560) मे संकलित अछि किछु आख्यायिका, आख्यान एवं उपाख्यान, जे समय-समय पर पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित भेल छल। जाहि सात गोट लेखकक महत्वपूर्ण आख्यान, उपाख्यान केँ एहि पोथी मे संलग्न कएल गेल अछि ताहि मे छथि लालदास, म.म.परमेश्वर झा, पं. हरिनारायण झा, म.म.मुरलीधर झा, पं. मनमोहन मिश्र, पं. त्रिलोचन झा आ पं. मुकुन्द झा। ई आख्यान, उपाख्यान सभ पोथी मे संकलित करबाक उद्देश्य संरक्षणक संग अध्ययन-विवेचन लेल सुलभ करब छनि। एहन कहब छनि सम्पादकक। मैथिली साहित्यक इतिहास मे एहि सभ काजक उल्लेख अवश्य भेटत मुदा पाठ लेल उपलब्धता दुर्लभ छलए। सएह दुर्लभ बस्तु सभक संकलन कऽ कऽ बड़का उपकार कएलनि अछि सम्पादक रमानन्द झा 'रमण'क। प्रायः पहिल बेर आख्यायिका, आख्यान एवं उपाख्यानक आस्वादनक अवसर सुधी पाठक केँ भेटि रहल छनि, एहन दावा कऽ रहल छथि सम्पादक अपन लिखल भूमिका मे।

मिथिला मे तीन कोटिक कथाक प्रचलन अदौ काल सँ रहल अछि। पहिल, शिष्टवर्ग द्वारा कहल, संकलित वा लिखित कथा। दोसर कोटिक कथा ख्यात भेल 'लोककथा'क नाम सँ, जे एक कण्ठ सँ दोसर कण्ठ धरि जाइत संक्रमित भेल। आ तेसर कोटि मे आबैत अछि व्रत एवं पाबनि-तिहारक कथा। जेना-मधुश्रावणी कथा, वटसावित्री व्रत कथा, सपता-विपताक कथा। मिथिलाक स्त्री-पुरुष दुनू, आइ सँ नहि अदौ काल सँ कथा-कौशल मे दक्ष रहैत आएल छथि। तैं ने मिथिलाक लोक 'गप्पी' कहबैत अछि। 'गप्प' हाँकब सेहो एक तरहक कथे कहब ने कहल जाएत। आ तैं मैथिली कथाक धाप ठेकनाबैत-ठेकनाबैत सम्पादक रमानन्द झा 'रमण' केँ वर्तमान सँ बहुते पाछाँ जाए बहुत किछु ताकए-हेरए पड़लनि। कठिन श्रमक उपरान्तहि मैथिली कथाक विकासक कारणक चर्चा करैत मैथिली कथाक विकासक चरण धरि स्पष्ट कऽ देलनि अछि। मैथिलीक आद्यकथा पर पसरल 'भ्रम'क चर्चा, संगहि भ्रम-निवारणक प्रसंग, सभ किछु फड़िछा कऽ पाठकक सोझाँ रखबा मे सफल भेलाह अछि सम्पादक। मैथिली कथाक प्रस्थान बिन्दु 'पुरुष-परीक्षा' नहि अछि, सेहो स्पष्ट कएल गेल अछि सम्पादक द्वारा। आ मैथिली कथाक प्रस्थान बिन्दु 'पुरुष-परीक्षा' केँ किएक मानल जा रहल छलए, तकर कारण सेहो स्पष्ट कएल गेल अछि। सन्दर्भ-ग्रन्थ, सन्दर्भ पत्रिकाक प्रकाशन-वर्ष पर्यन्तक उल्लेख करैत अपन बात रखलनि अछि सम्पादक।

मैथिली कथाक विकासक कारण पर प्रकाश दैत सम्पादकक कहब छनि जे जहिना अन्य-अन्य क्षेत्र मे विकास होइत गेल छैक, तहिना कथाक विकास सेहो विभिन्न कारण सँ भेल अछि। डॉ. जयकान्त मिश्र मैथिली कथाक विकासक तीन कारण मानलनि अछि -

1. संस्कृत कथा-साहित्यक अनुवाद एवं ओहिपर आधारित कथा

2. संस्कृत कथा-साहित्यक विषय-वस्तुक आधार पर लिखित कथा, एवं

3. संस्कृत आख्यान-उपाख्यान आदि शैली मे स्वतंत्र विषय-वस्तुक आधार पर लिखित कथा।

सम्पादकक कहब छनि जे जखन ज्योतिरीश्वरक समय मे मैथिल समाज मे कथा-वाचनक प्रचलन छलैक एवं चौंसठि कला मे कथा-कौशल परिगणित छल, तखन संस्कृत कथा-साहित्यक अनुवाद एवं ओहिपर आधारित कथा वा अन्ये शेष दू कारणेँ मैथिली कथाक विकास भेल अछि, से मानब कतेक ऐतिहासिक एवं औचित्यपूर्ण अछि ? की ज्योतिरीश्वरक बाद लोकानुरञ्जनक कथा-कौशल साधन समाप्त भऽ गेलैक ? मैथिलक जीवन मे लोकानुरञ्जनक हेतु प्रयुक्त हास्य-व्यंग्यक महत्व नहि रहल ?

डॉ. रामानन्द झा 'रमण'क कहब छनि जे कथा-वाचनक मुख्य प्रयोजन छल लोकानुरञ्जन। अर्थात् लोकानुरञ्जनकता कथाक प्रमुख विशेषता भेल। साहित्यक अनेक प्रयोजन मे 'शिवेतर क्षतये' सेहो एक प्रयोजन अछि। अर्थात् लोकक मंगल-कामना हेतु ''शिवक क्षति कऽ, शिवक प्रतिस्थापन करब। कथाक माध्यम सँ विघटनकारी तत्व पर प्रहार एवं तकर निराकरण सहज एवं सुलभ होइत अछि। मनोरञ्जक एवं लोक-मंगलकारी तत्वक सम्मिलन सँ पाठक/श्रोता पर स्थायी प्रभाव सुगमतापूर्वक पड़ैत छैक। श्रोता वर्गक मानसिक धरातल एक समान नहि रहैत छल, तैं विषय-वस्तुक विविधताक संगहि ओ अनेक दिशा मे होइत गेल।

मिथिलाक जन-जीवन मे व्रतकथा एवं हास्य-व्यंग्य कथाक महत्व कने बेसीए रहल अछि। विशेष रूप सँ व्रतकथा सभ कमोबेश सम्पूर्ण मिथिलाक गाम-घर मे, घर-घर मे समान रूप सँ कहल-सुनल जाए लागल। के कहैत छथि आ ककरा सम्बोधित अछि, तकर संकेत वाचकक कथन-भंगिमा सँ बूझल जा सकैछ। एहि व्रतकथा सभक लक्ष्य आदर्श जीवन-मूल्यक अनुसरण करबा लेल प्रेरित करब थिक। मैथिल समाज मे लोकानुरञ्जनक हेतु हास्य-व्यंग्यक प्रयोगक सुदीर्घ परम्पराक पुष्टि 'वर्णरत्नाकर' मे 'कुटिनी-वर्णन' सँ सेहो होइत अछि।

तहिना 'धूर्तसमागम' मे जाहि प्रकारेँ ज्योतिरीश्वर पात्रक निर्माण कऽ, सामाजिक विकृति पर व्यंग्य कएने छथि अथवा कवि कोकिल विद्यापतिक 'पुरुष-परीक्षा'क विभिन्न कथा मे हास्य-व्यंग्य अछि, से मैथिल जीवन मे हास्य-व्यंग्यक महत्वक सुदीर्घ परम्पराक परिचायक थिक। प्रोफेसर जयकान्त मिश्रक ई निष्पति तथ्याधारित अछि जे हमरा लोकनिक साहित्य मे जखन मिथिलाक चर्च होइत अछि, एहिठामक निवासीक समृद्धि एवं विनोदी प्रवृत्तिक वर्णन सेहो होइत अछि।

मैथिलीक कतेको बहुमूल्य साहित्य एवं सांस्कृतिक सम्पदा कालक्रमेँ विनष्ट होइत गेल, जकर अस्तित्व मे होएबाक सूचना आन-आन स्रोत सभ सँ भेटैत छैक। स्पष्टत: कहल जा सकैछ जे मिथिला मे कथा-वाचनक सुदीर्घ परम्परा रहल अछि। हँऽ...समय एवं समाजक प्रयोजनक अनुरूप ओकर विषय-वस्तु, भाषा-शैली एवं कथन-भंगिमा मे परिवर्तन अवश्य होइत रहल। आ जखन आधुनिक काल मे साहित्यक एहि लोकानुरञ्जक विधा केँ शास्त्रीय मान्यता प्राप्त भेलैक, तँ शास्त्रीय दृष्टि सँ साहित्यिक रचना पर विचारक लेल सभ सँ पहिने लिखित सामग्रीक आवश्यकता होइछ, कण्ठगत रहब पर्याप्त नहि रहैछ।

मैथिलीक आद्यकथा 'चन्द्रप्रभा'क प्रसंग अनेक भ्रम पसरल छल, ओहि भ्रम-निवारण आ 'चन्द्रप्रभा'क विषय-वस्तु आदि पर सम्पादक महोदय लगभग चारि पन्ना खर्च कएने छथि। से उचिते खर्च कएने छथि। सम्पादकक कहब छनि, "1880क धऽक मे वा ओहि सँ पहिने लिखित 'चन्द्रप्रभा' एक एहन कथाकृत थिक, जतए सँ मैथिली मे मौलिक कथा-लेखनक प्रस्थान-बिन्दु मानब सर्वथा तथ्यसंगत आ ऐतिहासिक होएत। 'चन्द्रप्रभा' कोनो पौराणिक कथा, आख्यान वा उपाख्यानक आधार पर लिखित नहि अछि, अपितु पञ्चतन्त्रक शैली मे एवं प्रतीकात्मक माध्यम सँ अपन समय आ परिवेश केँ अभिव्यक्त करैत अछि।

"मैथिली कथाक विकासक चरण" पर चर्चा करबाक क्रम मे दू टा विद्वानक मत सोझाँ आएल अछि। पहिल प्रोफेसर भक्तिनाथ सिंह ठाकुरक, जे मैथिली कथाक विकासक तीन चरण मानलनि अछि -

1. प्राचीन काल, अर्थात् प्राचीन काल सँ 1920 वा 1925 ई. धरि

2. मध्यकाल, अर्थात् 1920 वा 1925 ई. सँ 1935 ई. धरि, तथा

3. आधुनिक काल, अर्थात् 1930 वा 1935 ई. सँ अद्यपर्यन्त

 आ दोसर डॉ. जयधारी सिंहक मतक उल्लेख कएल गेल अछि। डॉ . सिंहक अनुसार मैथिली कथाक विकासक छओ टा चरण अछि -

1. प्रथम उत्थान - 1920 सँ 1938 ई. धरि

2. द्वितीय उत्थान - 1938 सँ 1945 ई. धरि

3. तृतीय उत्थान - 1945 सँ 1950ई. धरि

4. चतुर्थ उत्थान - 1950 सँ 1956 ई. धरि

5. पञ्चम उत्थान - 1960 सँ 1970 ई. धरि

6. छट्ठम उत्थान - 1971 सँ (भारती मण्डन भाषणमाला, 1973 ई.) अद्यपर्यन्त

हालांकि सम्पादक दुनू विद्वानक मत केँ अव्याप्तिदोष सँ युक्त कहलनि अछि। आ एकर पाछाँक मूल कारण विभिन्न पत्र-पत्रिका मे छिड़िआएल कथा सभक अनुपलब्धता केँ मानि रहल छथि सम्पादक। सम्पादक स्पष्ट कहलनि अछि जे मैथिलीक छिड़िआएल कथा सभ केँ ताकबाक प्रयास नहि कएल गेल, ओकरा प्रति उदासीन रहि, संकलन-प्रकाशन-संरक्षण केँ महत्व नहि देल गेल। एहि उदासीनताक प्रतिकूल प्रभाव मैथिलीक कथा-साहित्य मात्रे पर नहि, सम्पूर्ण मैथिली भाषा-साहित्य पर पड़ल।

आगाँ अपन लिखल भूमिका मे सम्पादक महोदय "कथाक प्रवृत्ति" आ "कथाक भाषा एवं शिल्प"क चर्चा सेहो कएलनि अछि। विस्तारपूर्वक चर्चा कएलनि अछि।

परतन्त्र भारत मे राष्ट्रीय क्षितिज पर घटैत घटना, सामाजिक सुधारवादी आन्दोलनक प्रभाव एवं ओहि प्रसंग विभिन्न विद्वानक मतक विवेचनक उपरान्त समीक्ष्य अवधिक कथाक प्रवृत्ति दू वृहत्तर कोटि मे विभाजित कऽ अध्ययन कएल जा सकैछ -

1. राष्ट्रीय चेतनामूलक कथा, एवं

2. सामाजिक सुधारवादी कथा।

सम्पादकक कहब छनि जे राष्ट्रीय चेतनामूलक कथाक संख्या अपेक्षाकृत कम अछि। अभावक मूल कारण थिकैक गुण-ग्राह्यक अभाव आ मैथिलक हास्य-व्यंग्यप्रियता। अनकर खसब आ अनकर टेटर देखि हँसबाक प्रवृत्ति। राजनीतिक-प्रशासनिक कारणेँ पत्र-पत्रिकाक सम्पादकक नीति झाँपले रहैत छलैक। तथापि जे किछु लिखल गेल आ उपलब्ध अछि, सएह प्रमाणित करैत अछि राष्ट्रीय चेतनामूलक कथाक धारा प्रवहमान छल, किन्तु सामाजिक सुधारवादी कथाक धारा जकाँ ओकर पाट चाकर नहि छलैक। एकर अनेक ऐतिहासिक, राजनीतिक आ सामाजिक कारण छलैक।

अपन लिखल पचास पन्नाक भूमिका मे सम्पादक राष्ट्रीय चेतनामूलक मैथिलीक आरम्भिक कथाक प्रवृत्तिक विवेचन किछु मुख्य बिन्दु केँ हाइलाइट करैत कएलनि अछि, जे एहि तरहेँ अछि -

1. राजनीतिक जागरण

2. न्याय-व्यवस्था पर प्रहार

3. पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालीक सांस्कृतिक दुष्प्रभाव

4. मिथिला मे पदस्थापित बहरिआ अमला-अधिकारी द्वारा मैथिलक उपेक्षा-अपमान

5. धर्म-स्थान सँ महिलाक अपहरण

6. स्थानीय रोजगारक अभाव, पड़ैनी

तहिना सामाजिक सुधारवादी कथाक कथानक कोन तरहक समस्या सभ पर आधारित रहैत छल, तकरहु विवरण क्रमवार तरीका सँ कएल गेल अछि सम्पादक द्वारा। किछु समस्या सभ तँ एखनहुँ जस-के-तस विद्यमाने अछि मैथिल समाज मे, भले ओकर रूप परिवर्तित भऽ गेल हो। निम्नलिखित बिन्दु पर सामाजिक सुधारवादी कथाक प्रवृत्तिक विवेचन कएल गेल अछि -

1. वैवाहिक समस्या (बहु-विवाह मतलब एकटा पुरुषक एक सँ अधिक कन्याक संग विवाह करब, बेमेल विवाह, शर्त-पूर्तिक लेल टाकाक व्यवस्था सँ उत्पन्न समस्या) 

2. अशिक्षा-निवारण

3. महिला-उत्पीड़न, घरेलू हिंसा

4. प्रतिवाद/विरोधक स्वर

5. प्रेम-समर्पण-मिलन-वियोग

6. अन्धविश्वासक खण्डन

7. माल-जालक चिन्ता

8. समय सँ आगाँक धाप

9. कथाक समाज आ लोक

मिथिलाक आरम्भिक कथाक माध्यम सँ मैथिल समाज केँ देखला पर समाजक जे चित्र समक्ष आबैत अछि, भयावह अछि। निराशाजनक अछि। मिथिला मूल समस्या भूख, अभाव, रोग-शोक, रौदी-दाही, बेरोजगारी, पड़ैनी, सभदिनाँ रहल अछि। मैथिली कथाक विकासक आरम्भिक दौर मे विदेशी शासकक शोषण एवं अत्याचार सँ मुक्तिक स्वर सेहो प्रखर छलैक। समस्त मिथिला शोषण एवं अत्याचार सँ आक्रान्त छल। मैथिलीक बेसी कथा एही समस्या सभ पर केन्द्रित भेटत। मुदा मैथिली साहित्यकार लोकनि अपन रचना सभ मे जाति-धर्म निरपेक्षताक भाव जीवन्त रखलनि। मात्र समस्या पर फोकस रहलनि साहित्यकार लोकनिक।

'भाषा-चिन्ता' पर मनन कएने बिना मैथिली कथाक धाप पर चर्चा अपूर्णे रहि जाइत, से स्मरण छलनि सम्पादक डॉ. रमण केँ। समाजक आवश्यक अंग थिक भाषा। इएह सम्पर्कक माध्यम थिक। मैथिलीक अनेक कथा सभ मे सेहो मैथिली भाषाक लेल चिन्ता पात्रक माध्यम सँ भेल अछि। चाहे ओ कटाक्ष रूप मे हो, सामान्य कथोपकथन मे सहज रूप मे चर्चा भेल हो।

'प्रवृत्तिक विकास'क क्रम पर सेहो लिखलनि अछि सम्पादक। समयक संग साहित्यक प्रवृत्ति सेहो बदलैत छै। एकर प्रमाण उक्त पोथी मे संकलित कथा सभ मे पर्याप्त मात्रा मे देखबा लेल भेटल। जेना तारा (ताराक वैधव्य) किछु नहि बजैत अछि। सभ किछु चुपचाप सहने जाइछ। मुदा कमला (कमला) बजैत अछि। अपन हृदयक बात सखि संग बतिआइत अछि। विषपानक उपरान्त अपन पिता आ विवाहक लेल आएल बूढ़ वर केँ सेहो कहि दैत अछि। गौरी (गौरी) चुपचाप सहि लैत अछि मुदा रेवा आत्मरक्षा लेल छूरी उठा लैत अछि। प्रेम मे असफल मानसी (अटूट प्रेम) प्रेमीक संग डूबि मरैत अछि मुदा सरोजनी अन्ततः एक भए गेलीह, 'महिलारत्न' कहएलीह। एहि सभ सँ बढ़ि 'विवाह' एवं 'चतुर्थी'क नवविवाहिता अपन माता-पिताक आर्थिक स्थितिक वर्णन पतिक समक्ष करैत अछि आ व्यवस्थाक टाका वापस भऽ जाइत छैक।

कथाक प्रवृत्तिक उपरान्त चर्चा अछि कथाक 'भाषा एवं शिल्प'क। मैथिली कथाक भाषा पर तीन प्रकारेँ विचार कएल जेबाक चाही -

1. भाषावैज्ञानिक दृष्टि सँ

2. साहित्यिक दृष्टि सँ

3. मैथिलक दृष्टि सँ।

एकर अतिरिक्त कथाक भाषाक विवेचनक प्रसंग मे लेखकीय भाषा आ पात्रक भाषाक प्रश्न सेहो आबैत अछि। लेखकीय भाषा व्याकरणिक दृष्टि सँ एक सीमा धरि शुद्ध आ मर्यादित/अनुशासित होएब आवश्यक रहैछ। पात्रक भाषाक लेल शुद्धता, मर्यादित आ अनुशासित होएब आवश्यक नहि। पात्रक भाषा ओ भेल जे पात्र बजैत अछि। पात्रक अतिरिक्त प्रयुक्त भाषा लेखकक भाषा मानल जाइत अछि। पहिने लेखक आ कथाक पात्र सामान्यतः एक्कहि पृष्ठभूमिक होइत छल। मुदा कालक्रमेँ आक्रान्ता एवं उपनिवेशवादी शक्तिक, भाषा एवं संस्कृति पर व्यापक प्रभाव पड़ल। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रक लोक सँ लोकक सम्पर्क बढ़ल। एहि सँ भाषा एवं संस्कृति प्रभावित भेल। एहि सँ कथाक विषय-वस्तु आ कथाक भाषा मे परिवर्तन आ विस्तार आएल।

'भाषा एवं शिल्प'क तहत कथाक आरम्भक प्रकार पर सेहो चर्चा कएल गेल अछि। कथा प्रारम्भ करबाक अपन-अपन तरीका होइत छै, सभ लेखकक। जेना - कथाक निष्कर्षात्मक आरम्भ, कथाक प्रश्नात्मक आरम्भ, कथोपकथन सँ कथाक आरम्भ, वातावरण निर्माण सँ कथाक आरम्भ, इत्यादि। कथा मे गीतक प्रयोगक परम्परा सेहो रहल अछि। कथा मे गीतक प्रयोग सँ कथाक रागात्मकता बढ़ि जाइत छै।

"मैथिली कथाक धाप" पोथी मे संकलित कथाक लेखन-शैली मे वैविध्य अछि, मतलब जे कथा जेना लिखल गेल छलए (ओहि समयक प्रचलित भाषा-शैलीक अनुरूप) तहिना प्रकाशित कएल गेल अछि। एकरूपता आनबाक लेल मूल रचनाक संग कोनो तरहक छेड़-छाड़ नहि कएल गेल अछि सम्पादक द्वारा। कोनो पोथीक चर्चा करैत डॉ रमण कहलनि अछि जे एकटा संग्रह देखल अछि, जाहि मे लेखन-शैली बदलि सम्प्रति प्रचलित लेखन-शैलीक अनुरूप कऽ देल गेल छलए, ओहि पोथीक सम्पादक आ हुनक सहयोगी द्वारा। मुदा "मैथिली कथाक धाप"क सम्पादक एहि तरहक कोनो प्रयोग करबाक प्रयास नहि कएलनि अछि। मैथिली कथाक वैविध्य आ गाम्भीर्य केँ रेखांकित करबाक एहि सफल प्रयासक सराहना कएल जेबाक चाही।

 

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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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