विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

डॉ. आभा झा (संस्कृतक शिक्षिका, विद्वान एवं समीक्षक)
’नान्य: पन्था: विद्यते अनयाय’
मनुष्यक रुचि-प्रवृत्तिक अनुसार जीवनयापनक साधन सुलभ हो, ई जरूरी नहि। खास क’ भारतमे बेरोजगारी आ अर्धबेरोजगारीक जे स्थिति आजादीक 79 बरखक बादो विद्यमान अछि ओहिमे त’ एकटा सामान्यो नोकरी पायब किंवा व्यक्तिगत आ पारिवारिक जिम्मेदारी पूरा करबा लेल अर्थोपार्जनक साधन जुटा लेब भगीरथ- प्रयत्नक अपेक्षा रखैछ। तेँ आजीविका लेल अभिरुचिक क्षेत्र तकबाक श्रममे हमरा लोकनि अपसियाँतो नहि होइ छी। अध्ययन-समाप्तिक उपरान्त जीविकोपार्जन लेल एकटा सम्मानजनक साधन भेटि जाय, ई मात्र ध्येय रहैत छैक मध्यमवर्गीय परिवारक। जॅं पलखति भेटय त’ काते-कात अपन प्रवृत्तिक अनुरूप हौबी ताकि मनस्तोष पबैत अछि सामान्य लोक। एहि क्रममे परिस्थितिवश कतोक बेर मनुष्य अपन समयक बहुलांश नोकरी मात्र लेल व्यतीत करैत अछि आ बाकी सभ सौख- मनोरथ मनक कोनमे उपेक्षित पड़ल रहि जाइत छैक। अस्तु, एहि स्थिति पर ध्यान देबाक किंवा किछु लिखबाक प्रयोजन एहि हेतु पड़ल जे एहि बीच श्री रमानन्द झा रमण केर पोथी सभक अध्ययन करैत ई प्रतीत भेल जे बैंक सन नीरस संस्थानमे काज करैत जे व्यक्ति साहित्यिक क्षेत्रमे एतेक रुचि रखैत छथि, उपलब्ध साहित्यक आलोचन-मूल्याङ्कनकेँ मैथिली साहित्यक भविष्य लेल हितकर बुझैत छथि, विलुप्तिक कछेर पर जाइत साहित्यिक संपदाक संरक्षणकेँ अपन चरम- परम कर्त्तव्य मानैत छथि आ उपलब्ध साहित्यक औचित्य-अनौचित्य, सार्थकता-निरर्थकता, सामाजिक प्रभावशालिता अथवा केवल वाग्विलासपरकताक निरपेक्ष निरीक्षण-परीक्षण करबाक साहसिक डेग उठबैत छथि, ओहि व्यक्तिकेँ जॅं अपन संपूर्ण समय साहित्यिक क्षेत्रमे यापित करबाक अवसर भेटितनि त’ ओ कतेक आओर उपादेय लेखादिक अवदान पाठककेँ द’ सकैत छलथि? अस्तु, ई सभ प्रश्न एक दिशि आ दोसर दिशि अछि बैंकिंग सेवामे कार्यरत (एखन सेवानिवृत्त) श्री रमानन्द झा रमण केर मैथिली साहित्यमे कएल विपुल समीक्षात्मक, आलोचनात्मक आ गवेषणात्मक काज! ई संख्यात्मक आ गुणात्मक दृष्टिमे एतबा जरूर अछि जे पढ़ि अनेक नव पाठक आ लेखक मैथिली साहित्यक परिचय एक झलकमे (At a glance) पाबि सकथि, जकरा आधार बना कए आलोचनात्मक काजक अगिला पड़ाव पर पहुँचि सकथि आ साधार सहमति वा असहमतिक अभिव्यक्तिक बल पाबि सकथि।
आइ जखन श्री रमण सरक पोथी विषयक किछु गप कए रहल छी त’ ईहो प्रतीत भेल जे मनुष्यक जन्मजात प्रकृतिक संग वृत्ति सेहो ओकर कार्यप्रणालीकेँ निर्देशित प्रभावित करैत छैक। एकटा बैंककर्मी लेल जहिना दस्तावेजी प्रमाण, सटीकता आ परिशुद्धता, तटस्थता आ अनुशासन ओकर कर्त्तव्य होइत छैक तहिना कोनो समीक्षक साहित्यकार सेहो अपन शोध आ लेखनमे व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनयबा लेल प्रतिबद्ध होइत अछि, अपन कथ्यक पुष्टीकरण लेल आवश्यक साहित्यिक प्रमाण सोझाँ रखैत अछि आ ओकर विवेचनक क्रममे पूर्वाग्रह मुक्त दृष्टिकोण रखबाक नैतिकताक पालन करैछ। संक्षेपमे, दुहू पेशामे गंभीरता, प्रामाणिकता आ सटीकताक आवश्यकता होइत छैक।
ई प्रायः हम सभ जनैत छी जे मैथिलीभाषामे आलोचना-विधाक प्रतिष्ठामे गंभीरता, संतुलन आ बौद्धिकताक समावेश होइ ,एहिमे श्री रमानंद झा रमण केर योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। हुनक पोथी सभक अध्ययनसॅं ई स्पष्ट होइत अछि जे लेखक मैथिली साहित्यक उपलब्ध कृतिक विवेचनाक माध्यमसॅं ओकर उपादेयतासॅं पाठककेँ अवगत त’ करबिते छथि,संगहि अनुपलब्ध साहित्यक खोज करैत छथि,ओकरा उपरयबाक श्रम करैत छथि, विभिन्न प्रकाशकक सहयोगसॅं ओकरा पुनः छपा पाठकक उपकार करैत छथि आ पूर्वज लेखकक कृतिकेँ नष्ट होयबासॅं यथाशक्ति बचा ऋषिऋणक शोधन सेहो करैत छथि। एहि तरहेँ ओ मात्र साहित्यक मूल्यांकनकर्ता नहि, अपितु एकटा दूरदर्शी चिंतकक भूमिका सेहो निमाहैत छथि।
साहित्यमे मात्र कथा आ कवित्तक रूपमे भावनाक कल्पनामय सुंदर अभिव्यक्ति नहि, अपितु संतुलित विचार,भाषिक संरचना, सामाजिक तथ्यात्मकता आदि विषयक समन्वित अध्ययन आवश्यक अछि। काव्यशास्त्रीय भाषामे कारयित्री ओ भावयित्री प्रतिभाक रूपमे एकर सम्मानजनक स्वीकृति प्राचीनकालहिसॅं अछि। भावयित्री प्रतिभाक धनी रमानंद झा रमण केर आलोचनाक महत्वपूर्ण विशेषता ओकर वस्तुनिष्ठता अछि। हुनक प्रयास रहलनि अछि निष्पक्षताक संग साहित्यक मूल्यांकन हो आ एहि क्रममे जतय आवश्यक बुझेलनि, ओतय स्पष्ट रूपसॅं अपन असहमति सेहो प्रकट कएलनि अछि। एकटा लेखमे ओ जीवित साहित्यकारक पोथीक आलोचनाक उपरान्त सोझाँ आयल अप्रिय स्थितिक चर्चा सेहो करैत छथि, जखन कि कोनो रचनाक आलोचना रचनाकारक आलोचना नहि होइत छैक। कोनहु साहित्यिक कृतिक मूल्यांकन ओकर कथ्य, शिल्प, भाषा, शैली आ सामाजिक संदर्भक आधार पर कएल जयबाक स्वस्थ परम्परा आगामी लेखक लेल एकटा आदर्श व्यवस्थित मानदण्डक निरूपण सेहो करैत अछि। एहि सभ तथ्यक यथाशक्ति ध्यान रखैत लेखक सरल, स्पष्ट आ प्रभावशाली भाषामे अपन कथ्य सटीक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। लेखकक शैली विश्लेषणात्मक छनि, कथन सप्रमाण आ कथ्य स्पष्ट, जाहिसॅं पाठक आ लेखक दुहू उपकृत होइत अछि आ साहित्यक प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखबा लेल प्रेरित होइत अछि। हिनका द्वारा लिखित, संपादित ओ अनूदित पोथी सभ शोधार्थी, साहित्यकार आ सामान्य पाठको लेल अत्यन्त उपयोगी अछि। एतय हम संक्षेपमे लेखकक किछु पोथी आ तकर वर्ण्य-विषयक संक्षिप्त परिचय देबाक प्रयास कए रहल छी, जाहिसॅं जिज्ञासु छात्र ओहि पोथीकेँ ताकि-हेरि पढ़बाक उपक्रम कए सकथि।
लेखकक पहिल आलोचनाक पोथी अयलनि 1981-82 मे ‘नवीन मैथिली कविता’। ई पोथी दू खण्डमे विभाजित अछि। पहिल खण्डमे दस गोट लेख अछि जे मैथिली साहित्यमे नवकविताक प्रवेशक पड़ताल करैत अछि, ओकर रूपविधान पर दृष्टि दैत अछि, प्रतिक्रिया आ विद्रोहक तरमे बौद्धिकता आ जीवन-मूल्यक अन्वेषण करैत अछि आ ओहिमे पाठकीय संकटक स्थितिक वास्तविकता आ तकर कारण धरि पहुँचबाक प्रयास करैत अछि। ताहि समयमे अन्य भारतीय भाषामे नवकविताक चलनिसारक देखा-देखी मैथिलीमे सेहो प्रयोगात्मक कविता लिखय जाय लागल छल, परम्परावादी कवि द्वारा एहि नवविधाक विरोध स्वाभाविके छल, मुदा एहि विधाक पक्षधर अपन प्रबल तर्कसॅं विरोधी मतावलम्बीकेँ पेटकुनियाँ दिअयबा लेल उताहुल छल। एहि परिस्थितिमे एकटा जागरूक लेखक अपन कर्त्तव्य निर्धारित करैत छथि कविताक प्रवृत्ति, शैली, वर्ण्य-विषय आ विद्रोही तेवरसॅं साक्षात्कार करबाक आ करैबाक। लेखक शीर्षक स्वयं विवेचित विषयक घोषणा करैत अछि तेँ एतय मात्र लेखादिक नाम मात्र सोझाँ राखि रहल छी -
नव लेखन, नव कवितामे अनास्था, अविश्वास आ असंतोष, नव कवितामे विद्रोह, काव्य-मिथक आ मैथिली नव कविता, नव कवितामे आत्मनिर्वासन, मैथिली नव कवितामे जीवनमूल्य, स्वतंत्र्योत्तर मैथिली कवितामे जीवनमूल्य, नव कविता आ रूपविधान, नव कविता आ पाठकीय संकट आ कवि किसुनक स्वर- परिवेश। लेखक सभ लेखमे सोदाहरण प्रतिपाद्य विषयक उपस्थापन करैत छथि, स्वतंत्रताप्राप्तिसॅं पहिने आ बादमे कविताक प्रतिपाद्य विषयमे परिवर्तन, जीवन-मूल्यक अन्वेषण आ परिस्थितिजन्य आक्रोश, हताशा, चिंताक स्पष्ट अभिव्यक्ति आदिकेँ अकानैत तकर विश्लेषण करैत छथि।
एतदतिरिक्त द्वितीय खण्डमे चारि गोट लेख अछि जे नव कविता सॅं इतर शैलीक काव्यक वर्ण्य-विषयक पड़ताल करैत ओकर वर्णन करैत अछि। पहिल लेख अछि ‘सौंदर्य चेतना आ राधा विरह’, दोसर ‘मोदवतीक गीति चेतना’, तेसर यदुवरक काव्यमे राष्ट्रीय चेतना आ चारिम अछि ‘मैथिली कवितामे उद्बोधन’।
नवकवितायुगक संपूर्ण स्थापनाक बादो ओहि प्रसंग गप औखन होइत अछि त’ अस्सी-नब्बेक दशकमे कतेक होइत होयत, कतेक वैचारिक घमर्थन आ पक्ष-विपक्षमे मतक प्रकटीकरण होइत होयत, तकर प्रमाण अछि एगारह बरखक बाद पुनः 1993 ईस्वीमे लेखक ‘मैथिली नव कविता’ शीर्षकसॅं आलोचनात्मक निबन्धक संग्रह अनैत छथि जाहिमे विस्तारसॅं नवकविताक पृष्ठभूमि, उन्मेष आ प्रवृत्तिक संग किछु प्रसिद्ध कवि आ हुनक कविताक उदाहरण दैत नव कविताक उत्कर्षक अन्वेषण करैत छथि। एत्तहु मात्र लेखादिक नामोल्लेख करैत आगू बढ़ैत छी। एहिमे छ: टा लेख अछि।
पहिल लेख ‘नव कविताक पृष्ठभूमि’ शीर्षकसॅं अछि जाहिमे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आ साहित्यिक पृष्ठभूमि ताकल गेल अछि। दोसर लेख ‘नव कविताक उन्मेष’ शीर्षकसॅं अछि जाहिमे नव कविता की थिक, एकर नामकरणक औचित्य की, कोन काल-सीमामे एकरा बान्हल जा सकैछ आ एकर उद्भवक राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक आ साहित्यिक स्रोतक पड़ताल कयल गेल अछि। तेसर लेख अछि ‘नव कविताक प्रवृत्ति’। एहिमे प्रगतिशील मूल्यमे आस्था, अखिल मानवताक भावना, सौंदर्यक क्षेत्र- विस्तार, आभिजात्यक स्थान पर साधारणक प्रतिष्ठा, कटु यथार्थक अभिव्यक्ति, क्षणक महत्त्व, राजनीतिक विसंगतिक उद्घाटन, संत्रास, कुण्ठा, धर्ममे अविश्वास, अनास्था आ असंतोष, विद्रोह तथा जिजीविषा आदि प्रवृत्तिक व्याख्या अछि। चारिम लेखमे नव कविताक शिल्पक वर्णन अछि जाहिमे प्रतीक विधान, बिम्ब विधान, छन्द आ भाषा आदिक अन्वेषणपरक चर्चा अछि। 1982 मे लेखककेँ नव कविताक सोझाँ जे पाठकीय संकट देखायल छलनि से 1993 धरि ओहिना विद्यमान छल।तेँ अहू पोथीमे पाठकीय संकटक चर्चापरक लेख सन्निहित अछि। छठम लेखमे लेखक किछु प्रमुख कवि आ हुनक कवितांशक चर्चा करैत छथि जाहिमे कवि यात्री, राजकमल, रामकृष्ण झा किसुन, डॉक्टर धीरेन्द्र, मायानन्द मिश्र, हंसराज, सोमदेव, रमानन्द रेणु, कीर्ति नारायण मिश्र, गंगेश गुंजन, जीवकान्त आ महाप्रकाश छथि।
ई पोथी पढ़ि पाठक नवकवितालेखनक तौर-तरीका, ओकर अनुशासन, शिल्प आ वैशिष्ट्यक परिचय प्राप्त करबाक संग संग पुरान कवि आ हुनक काव्य सौष्ठवसॅं सेहो परिचित होइत अछि आ हुनक पोथी पढ़बाक हेतु उत्सुक सेहो। 1994 मे प्रकाशित ‘मैथिली साहित्य ओ राजनीति’ मे 14 गोट आलोचनात्मक लेख संग्रहीत अछि-
अस्वीकृतिमूलक आलोचना, जनसाधारण लेल साहित्यक उपयोगिता, रास बिहारी लाल दास आ सुमति, नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति, समकालीन मैथिली उपन्यासमे विश्वदृष्टि, आपातकालमे मैथिली कविताक स्थिति, समकालीन कविताक परिवेश, मैथिली कवितामे अतिवाद, मैथिलीक दीर्घ कविता, मैथिलीक नवगीत, मैथिलीक यात्रा साहित्य, मैथिलीक भेंट वार्ता साहित्य, सांस्कृतिक संकट ओ रचना धर्मिता आ मैथिली साहित्य ओ राजनीति। साहित्यक विभिन्न विधामे मैथिली साहित्यमे कतेक लिखल गेल, कथा, कविता वा उपन्यासक भावभूमि की मिथिलाक भौगोलिक परिधिक चारू भरि घुमैत अछि अथवा विश्वदृष्टि संग कदमताल करबाक सामर्थ्य छैक आ बदलैत सामाजिक राजनीतिक परिस्थिति साहित्यमे कतेक स्थान पौने अछि, आदि आदि विषयक बोध लेल पाठक ई पोथी पढ़ि लाभान्वित भए सकैछ।
1995 मे प्रकाशित अखियासल में 25 लेख अछि - मैथिलीक पहिल कथाकार पंडित श्री कृष्ण ठाकुर आ चंद्रप्रभा, मैथिलीक पहिल उपन्यासकार पंडित जीवछ मिश्र आ रामेश्वर, रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास सुमति, जनार्दन झा जनसीदन आ निर्दयी सासु, पंडित जनार्दन झा: एक बिसरल साहित्य सेवी, पंडित त्रिलोचन झा बिसरल मातृभाषानुरागी, राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा कवि यदुनाथ झा यदुवर, कवि सेनानी छेदी झा द्विजवर,कुमार गंगानन्द सिंहक कथा संवेदना, कवीश्वरी हरिलताक वैष्णवता, कविवर श्यामानंद झाक काव्य वस्तु, बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता, कवि चूड़ामणि मधुपक गीति साहित्य, भट्टिकाव्यक परंपरा आ मधुपजी, कांचीनाथ झा किरणक कथा जगत्, मैथिली उपन्यासक आलोकमे चंद्रग्रहणक नारी पात्र, प्रोफेसर हरिमोहन झा आ हुनक चर्चरी, कविवर यात्रीक स्तंभलेखन, कविवर आरसी, उपेंद्र ठाकुर मोहन आ हुनक कविता, शुद्धतावादी कथाकार उपेंद्रनाथ झा व्यास, राजेश्वर झाक व्यक्तित्व आ कृतित्व, ललितक कथामे परिवेशक संक्रांत जीवन, धीरेंद्रक कथाक सामाजिक संदर्भ, प्रभासक कथायात्रा ।
एक संग एतेक रास लेखक आ हुनका द्वारा प्रणीत पुस्तकक विशिष्ट अन्वेषणपरक परिचय प्राप्त करबा लेल एहि पोथीक विशेष महत्त्व छैक। जिज्ञासु शोधार्थी एहिसॅं लाभ लैत छथि आ लैत रहताह।
2012 मे प्रकाशित आलोचनात्मक निबंध संकलन हिआओलमे सत्रह टा लेख संग्रहीत अछि, जकर नामोल्लेख मात्र एहिमे वर्णित विषयक परिचय दैत अछि -
ग्रियर्सन एवं मिथिला भाषा अध्ययन, रमानाथ झा आ मिथिला भाषा, प्रत्यालोचक किरण जी, अपेक्षितारय छोड़ि उपेक्षितक आंखिसॅं कन्यादान पढ़ल जाय, अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह, यात्रीक भाषा : शब्द चयन एवं शब्द निर्माण, मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष, मैथिली पत्रकारिताक विकासमे प्रवासीक योगदान, मैथिली लोक गाथामे दीना भद्री, मैथिली कथाक विकास : किछु नव तथ्य, मैथिली कवितामे मिथिलाक भूकंप, कथी ले लगेलियै हे कोसी माय, मैथिली महाकाव्यमे युगसन्दर्भ, नवगीतमे समाज चेतना, मैथिली कविताक वर्तमान धारा, मैथिली लोकगीत : अवस्था एवं संरक्षण आ उपनिवेशवादक नव चालि।
2014 मे प्रकाशित तितिर बितिरक प्रसंग ई कहब आवश्यक जे एकर शीर्षके एहिमे अन्तर्निहित विविध विषयक लेखक परिचय दैत अछि। भाषा आ संस्कृतिक संरक्षणक नाम पर होइत बाह्योपचारक निरर्थकताक चिंता, साहित्य सर्जनामे सांस्कृतिक चेतनाक समावेशक प्रेरणा आ तत्कालीन विभिन्न लेखकक रचनाक संक्षिप्त परिचयात्मक व्याख्यात्मक लेखादि एहि संग्रहमे अछि। एहिमे बत्तीस गोट महत्त्वपूर्ण लेख अछि -
विद्यापति पर्व : मिथिलाक सांस्कृतिक संपदाक संरक्षण,
संस्कृति : भूमासॅं सीमा नहि, सीमासॅं भूमा, सांस्कृतिक चेतना ओ साहित्य सर्जना, सांस्कृतिक संकट आ रचना धर्मिता, समाज आ रचनाकारक सामाजिकता, साहित्यक बजारवादी प्रवृत्ति ,मैथिली लेखन : आस्थाक संकट, मैथिली कवितामे प्रयोगधर्मिता, मैथिल संस्कृति पर संचार माध्यमक प्रभाव, मिथिलाक भाषा- संस्कृतिक विकास : अवरोध एवं निराकरण, राजा टंक नाथ चौधरी : कोलकाता विश्वविद्यालयमे मैथिली, सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतनाक कवि सुमन, डॉक्टर जयकांत मिश्र : मैथिली साहित्यक ग्रिअर्सन,मैथिली साहित्य- प्रबंधन एवं कृष्णकांत मिश्र, नाक धरि गड़ल,अङ्ग सभ सड़ल, पाठकक मौन भंग करैत कथा, आठम दशकक मैथिली कथाक पृष्ठभूमि, आठम दशकक स्वर- परिवेश : विनोद बिहारी लाल, कोमल भावक कथाकार अशोक, विभूति आनंदक धाप, उषा किरण खानक कथाक भूमि, सरंगियाक उग्रास, सात्विक विरोधक मुखर स्वर, विभा रानी: नारी विवशताक कथा मिथिला भाषाक सरलीकरण एवं आधुनिकीकरण : कतेक सरल कतेक कठिन ,संवादक भाषा एवं विकल्प चयन, शब्द- विभक्ति संवाद ,बालकथाक प्रयोजन की, मैथिली साहित्यमे समीक्षाक स्थिति, मैथिली अनुवाद साहित्य : पृष्ठभूमि एवं उत्कर्ष, मिथिला लोक चित्रकला, नेपाल में भाषाक राजनीति एवं मैथिली।
एतय ग्रियर्सन ओ डा. जयकांत मिश्रक मैथिली लेल कएल गेल काजमे समानताक संग टंकनाथ चौधरीक अवदानक चर्चा अछि, किछु भाषा ओ व्याकरण संबंधी लेख अछि, बालकथा, समीक्षा, अनुवाद, चित्रकला आदिक चर्चा अछि आ किछु कवि लेखकक कृतिक प्रसंगे हुनक लेखकीय प्रभावक चर्चा अछि।
2018 में ‘अनुसंधान प्रतिमान’ शीर्षकसॅं नव पोथी आयल। अहूमे एगारह टा विस्तृत लेख अछि। एगारह टा लेखक आ हुनक कृतिक अनुसंधानात्मक विवेचन पोथीक प्रतिपाद्य अछि। एतय मैथिली लोक गाथामे दीनाभद्री, मैथिली उपन्यासकार पंडित जीबछ मिश्र, तेजनाथ कवि भान, रासबिहारी लाल दास आ सुमति, पुण्यानन्द झाक मिथिला दर्पण, मैथिली कवितामे राष्ट्रीय चेतनाक विकास, महावीर झा वीरक कविताक व्याप्ति , श्री वल्लभ झाक अवदान- सर्वेक्षण, श्री श्यामानन्द झा : व्यक्तित्व ओ कृतित्व, हरिनंदन ठाकुर सरोजक कथा आ मिथिलामे स्त्री शिक्षा एवं सामाजिक सुधार।
एकर अतिरिक्त विभिन्न अवसर पर साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम सभमे प्रस्तुत बीज भाषणक पोथी रूपमे संग्रह, बेसाहल, भजारल, विवर्त आदि पोथीक अतिरिक्त विभिन्न अवसर पर लिखल आ प्रस्तुत लेख आ भाषण आदिक अध्ययन-मनन प्रत्येक गंभीर अध्येताकेँ आलोक दैत छैक। लेखकक अनुवादित आ संपादित पोथीक संख्या हिनक निरंतर गंभीर अध्ययन आ लेखनक तीव्रगतिक परिचय दैत अछि। ’यावज्जीवमधीते विप्र:’ ई मूलमंत्र संभवतः रमण सरकेँ आत्मसात् भेल छनि। मैथिली साहित्यक विषयमे गंभीरतापूर्वक बुझबाक आग्रही लोककेँ रमानन्द झा रमणक पोथी दिशि दृष्टि देबाक, ओकर गहराइमे पैसबाक आ ओहिसॅं मोती बहार करबाक चाही। ऊपर ऊपर हेलि समुद्रक गहराइ नपबाक दम्भ पोसनिहारसॅं ने साहित्यक वर्तमान समृद्ध होइत छैक आ ने भविष्य लेल किछु बहुमूल्य सुरक्षित रहैत छैक। तेँ जरूरी छैक बहुविध अध्ययन, जे प्रामाणिकताक संग गप कहि सकबाक सामर्थ्य दैत छैक, जरूरी छैक अधीत विषयक मनन जे ओहिमे निहित विषय-वस्तुक पक्ष आ विपक्षमे मति स्थिर करैत छैक आ ग्राह्य- त्याज्यक विवेकक संग ओकरा लोकक सोझाँ तार्किक ढंगसॅं रखबाक ऊहि दैत छैक, संगहि आवश्यक छैक निदिध्यासन जे अध्ययन आ मननक बाद प्राप्त ज्ञानकेँ अनुभवमे बदलबाक, आत्मज्ञान लेल गहन ध्यानक प्रक्रिया रूपमे तेसर चरण थिकै। एतय विषय तात्विक रूपसॅं आत्मसात् होइत छैक। अवश्य एहि शब्दक प्रयोग आत्मा आ ब्रह्मक एकताक प्रसंगमे भेल छैक, मुदा सामान्य विषयक ज्ञान लेल, ओहिमे अवस्थित नवनीतक अन्वेषण लेल, ओहि ज्ञानसॅं तादात्म्य वा खण्डन लेल, उपादेयता-अनुपादेयताक स्थापना लेल आ दोसरक सोझाँ उपस्थापित विषयसॅं पूर्व स्वयं अपन मनक दृढ़ीकरण लेल अध्ययनक अतिरिक्त आन कोनो बाट नहि छैक। श्री रमानन्द झा रमणक लेखन स्वयं हुनक निरंतर गंभीर अध्ययन-मननक सत्यापन करैत छनि। हमहूँ सभ जॅं वरिष्ठ लेखकगणसॅं किछुओ अंशमे स्वाध्यायक गुण ल’ सकी त’ नि:संदेह भविष्य लेल किछु साधार, सार्थक साहित्यिक धरोहरि छोड़ि सकबै। एकर अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि-’नान्य: पन्था: विद्यते अनयाय’।
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