विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
'स्वेदजीवी’ औपन्यासिक कृतिक तात्विक विश्लेषण

- अभिनंदिनी कुमारी
शोधार्थी
मैथिली विभाग
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
सारांश
'स्वेदजीवी’ मधुकान्त झाक उपन्यास छनि। एहि उपन्यासमे उपन्यासकार कलकत्ताक ओरिएन्ट फैनक कारखानामे घटित घटनाकेँ औपन्यासिक रूप देलाह अछि। एहिमे मजदूरक हड़ताल आ ओकर कारण एवं निदान कोना भेलैक तकर चित्रण बड़ मार्मिक रूपसँ कयने छथि। ई उपन्यास मार्क्सवादक सम्पोषक अछि।
कुंजी-शब्द
मैथिली उपन्यास, स्वेदजीवी, मजदूर, श्रमिक, हड़ताल, उत्पीड़न, शौषण, लेबर सप्लायर, दबंग, दैनिक वेतनभोगी, कलमठेल्लू वर्ग आदि।
कथासार
एहि उपन्यासक कथा मिथिलक जीवनसँ आरम्भ कयल गेल अछि। मिथिल अदालतमे सरकारी पक्षक ओकीलसँ जिरहमे हरा क केश जीति जाइत छथि आ एहि शुभ अवसरपर "सम्पूर्ण कादापारामे ओरियन्टक मजदूरगण दिनमे फगुआ आ साँझमे दियाबाती मनओलनि।"1
यूनियनक अध्यक्ष मिथिलक जीतसँ क्षुब्ध भऽ जाइत छै आ सोचैत छथि जे— "मिथिल हमरा सभ पर सभ दिन हँसैत छलाह, हम सभ छी जे हुनका धोती-गमछावला अनपढ़ बुझैत छलहुँ।"2
भोरक सात बजे गिरधारी बाबू शुभांगीक घरबाला ड्यूटीसँ आबि जाइत छथिन तऽ शुभांगी गिरधारी बाबूसँ कहैत छथिन जे मिथिल जी कें बजा लिऔन। तखन चाह पीयल जेतै। एहिपर गिरधारी बाबू शुभांगी संग हँसी-मजाक सेहो करैत छथिन। बादमे मिथिलकेँ बजाओल जाइत छनि आ सभ चाह पीबैत छथिन। चाह चलिते छलै कि राम-कृष्ण आबि जाइत छथिन। एकर अयबाक कारण रहैत छैक जे भोलाबाबाक अष्टयाम कीर्तन करयबाक लेल चंदा लेबाक लेल पठओने छलथिन।
चंदाक राशि जखन मिथिलकें ज्ञात होइत छैक तखन मिथिल तमसा जाइत छै आ सभ स्पष्ट करैत कहैत छै- “सुधीर महतो जी ई कोन सुनीति चलओलनि अछि जे जखन तखन काली पूजा, दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा, शिवरात्रि अष्टयाम आ नवाह ठानि लैत छथि आ चन्दा असुलने फिरैत छथि? आ सेहो पाँच टाका। हमरा सभहक मजदूरी अछि प्रति दिन दू टाका आ चन्दा दियौक पाँच टाका। दू दिन अपने भुखल रहू आ बाल बच्चाक मुँहमे जाबी लगाउ जकरा लेल परदेश ओगरने छी। धोती तँ एकटा दढ़ पहिरै ले नहि भेल जोगार, मगर चन्दा पाँच टाका…”3
मिथिल नओ वर्षक अवस्थामे गामक दबंग लोकसँ अपन टाका लेल शत्रुता मोल लेने छलाह आ एहि बातक चर्चा एहि प्रसंगपर आयल छलैक। शुभांगी कहलखिन— "कहू ने कोन झगड़ा भेल जे गाम नौ वर्षमे छोड़ि देलियैक?"4
एहिपर मिथिल अपन नेनपनक दिनक ओ घटना सभटामेघ जकाँ उमरय-घुमरय लागत छै आ किछु कथा कहबो करैत छैक मुदा कथा कहैत-कहैत मिथिलक गरा बाझि जाइत छै। कथा अधूरा छोड़ऽ पड़ैत छै मुदा ओतबे सँ बुझना जाइत छै जे ई उचितक लेल शत्रुता मोल लेने छलाह।
मिथिलक कथा सुनि शुभांगी कहैत छथिन जे— “ई साहस कनी हमरो प्राणनाथ के दियौने ने। एकटा रोग लऽ के बइसल छथि आ जीवन सँ हारि चुकल छथि।”5
एकर बाद शुभांगी मिथिलकेँ अपना ओतय भोजन नहि बनयबाक बात करैत छथि, अपने ओतय खयबाक लेल कहैत छथिन मुदा मिथिल नहि मानत छै।
राम-कृष्ण अवसर पाबि ई बात महतोकेँ कहि दैत छै जे मिथिल चंदा नहि देने छै। एहिसँ वातावरण खराप भऽ जेतै। "आगू कोनो समारोहमे चन्दा असुलब मोश्किल भ जायत।"6
चिट्ठी लिखबै कालमे शुभांगीक वक्षकेँ अनचोकेमे देखि मिथिलक भीतरक पुरुष आकर्षित होइत छै मुदा मिथिल अपनाकेँ रोकि लैत छै। ओना शुभांगी तऽ चाहिते छलै जे मिथिल एहि लेल तैयार नहि होइत छै।
दूनू गोटे अपन-अपन नेनपनक बात एक-दोसरासँ साझा कयलकै संगहि ईहो विचार कयल गेले जे “प्रत्येक शनि कऽ साँझमे महल्लामे कतहु ने कतहु कीर्तन जरुर होअय आओर ओहिमे अहाँ जरूर रही जाहिसँ लोक भगवानोकेँ नाम लिअय आओर अहूँक दर्शन कऽ मजगुत महसूस करय।”7
मिथिल शुभांगीकेँ कहैत छै जे जखन चिट्ठी पढ़ि लेलहुँ तऽ लगले जबाब सेहो लिख दिऔ। एहिपर शुभांगी कहैत छै जे— “बाप रे बाप! एतेक आगि। काल्हि-परसू जवाब देबैक। जल्दी की छै?”8
मिथिलक पत्नी शुभांगीक संबंधमे जे जिज्ञासा कयने छलै तकर उत्तर सेहो लिखबैत छै जे शुभांगीकेँ उचित नहि बुझना जाइत छै ताहिपर मिथिलक कहब रहैत छै जे— “यै, मसखरी नहि करैत छी। हम त' उषाक स्वीकृति बिना अहाँ लेल किछु नहि कऽ सकैत छी। तें भूमिका बान्हि रहल छी। धीरे-धीरे पत्नीव्रत तोड़बाक परमिशन ने लेबैक? अहाँकेँ कष्ट देखिकेँ ककर ने दिल पघिल जयतैक।”9
मिथिलकेँ जखन एहि हमलाक समाचार ज्ञात छै तऽ ओ अस्पताल जा कऽ नेता आ ओकर परिवारसँ समाचार प्राप्त करैत छै। बादमे मिथिल योजना बनबैत छै जे “महतोक आमदनीक एक-एक स्रोत पर चोट लगाबय पड़त। हिंसाक बदला हिंसासँ लऽ केँ युद्ध समाप्त नहि होयत। मालिकक दिमाग ठेकान पर नहि आओत। भट्टर साहेबक दिमागी षड्यंत्रक दवाइ महतोक पराजयेसँ होयत।”10
हड़ताल समाप्त करबाक लेल मिथिल किछु शर्त राखैत छैक जे यूनियन नेता मानि कऽ वार्ता करबाक लेल तैयार भऽ जाइत छै। बादमे वार्ता विफल भ जाइत छै आ ओतयसँ सभ विदा भऽ जाइत छै। बादमे भीड़ बेकाबू भऽ कऽ महतोक घरपर ईंटा-पाथर फेकय लागैत छै जाहिसँ दंगाक वातावरण बनि जाइत छै। दूनू दिससँ मारि बजरि जाइत छैक। जुलुसक नेता लोकनिकेँ गिरफ्तार क लेल जाइत छै। बादमे महत्तोक लठैत सभ बदला लेतै से सोचि कतेको "नेता लोकनिक परिवार मोहल्ला छोड़ि पलायन प्रारंभ कऽ देलक।"11
बंगालमे लालझंडाक प्रभाव बढ़ि रहल छलैक। तेँ महतोक थाना-थाना जायब व्यर्थ भऽ गेलै। कतहु विशेष सुरक्षाक व्यवस्था नहि भऽ सकलै। "कामगार यूनियन द्वारा भट्टर साहेबकेँ देल देल ओ प्रस्ताव बेस वजनगर भऽ गेल जाहिमे कहल गेल छल जे महतोक लेबर कन्ट्रेक्टरीक एग्रीमेंट खत्म कऽ देल जाय तँ अन्य मांग पर युनियन तत्काल जोर नहि देत।"12
मिथिल सोचय लागैत छै जे टेक्सीक भाड़ा कोना देल जेतै? घोषक परिवारक खर्चा कोना चलतै? मिथिल नहि चाहैत छै जे घरमे बेटाकें पढ़यबाक लेल जे पेट काटि कऽ टाका रखने अछि ओ दोसर कोनो आओर काजमे नहि खर्च करय पड़य मुदा हुनक स्वभाव हुनका रोकि नहि सकलनि। ओ "टाका निकालि धोतीक हेरड़ामे बन्हबाक लेल ठाढ़े भेलाह कि शुभांगिनी घरमे प्रवेश कयलनि।
- हे एना पागल जेना नहि करु। सुधाकातक पढ़ाई लेल राखल टाका खर्च नहि करु। हम दैत छी पचास टाका। हमरा कोन संतान अछि जे टाकाक काज पड़त। ई लऽ कऽ काज करू। जहिया मिल खुजतैक तहिया घोषबाबूसँ दिया देब।"13
बादमे मिथिल अपनाकेँ सामान्य कऽ कऽ शुभांगीकेँ कहैत छै - “अहाँ एकरा सुधाकान्तक लेल सुरक्षित राखू। ओ जँ मैट्रिक पास कयलक तँ कलकत्तामे ओकर नाम लिखाइ, किताब-कॉपी, ड्रेस आ नवका डेरा लेल बड्ड खर्च होयत। टाकाक काज पड़त। कारखाना खुजबो करत तैयो ककरोसँ लेबय पड़त। तेँ अहाँ एहि टाकाकें हमर बुझि सुरक्षित राखि दियौक। बड्ड उपकार मानब। उषा कुमरिक एक ई सपना जे बेटाकेँ कलकत्तामे पढ़ायब पूर्ण होमयमे मदति करू।”14
मिथिल जखन बाहर निकलैत छै तऽ समाचार-पत्र देखबैत कहैत छै जे ई समाचार अहींसँ संबंधित अछि जकरा मिथिल झूठ कहैत छै मुदा एहि समाचारसँ गामक लोक मिथिलक नारा लगबय लागैत छै आ उषाकुमरिकेँ बुझि पड़ैत छै जे ओकर पति “महाभारतक वीर अर्जुन होथि। उषाक खुशी देखि मिथिल मनल बात मनहि रखलनि आ तत्काल बीमारीक निपटारा भेलोपरांत गाम-घरक आन समस्यासँ टकड़यबाक लेल काल्हि मुकरर कयलनि।"15
मिथिल सोचय लागय छै जे गाम एना बेसी दिन भऽ गेल। आब कलकता चलबाक चाही। एहि बीच ज्ञात होइत छै जे गिरधारी गाम आयल अछि। तेँ ओ गिरधारीसँ भेंट कऽ सभ समाचारसँ अवगत होइत छै आ नियार करैत छै दूनू गोटे संगे कलकत्ता जायब।
मिथिल अस्पतालमे भर्ती करबैत छै। शुभांगी दिन-राति सेवा करैत रहैत छै आ अपनापर कम ध्यान दैत छै जाहिसँ मिथिलकेँ शुभांगीसँ कहय पड़ैत छै — "ई की कऽ रहल छी शुभांगिनी? गिरधारी बाबूक रोग ठीक करयबनि की अपने जान गमा लेब। अहाँ नहि ठीक रहबनि तँ एहि पाँच हाथक मर्दक देख-रेख के कऽ सकतनि? हिनका के छनि आओर से कहू?"16 एतेक सुनि शुभांगी दहो-बहो नोरसँ कानय लागैत छै।
अगिला दिन सरकारक हस्तक्षेपसँ मांगक अनुरुप समझौता पत्र तैयार होइत छै आ हड़ताल समाप्त कयल जाइत छै। घरे-घरे मिथिलक प्रशंसा होबय लागल छलै मुदा महतोक बेटा "मिथिलक खूनक प्यासल सन देखायल। लेकिन महतो जी एवं हुनक पत्नीगण बहुत प्रसन्न छलथि।"17
श्राद्धक बाद मिथिलकेँ गिरफ्तार करबाक लेल पुलिस आबि जाइत छै मुदा श्रमिकक विरोध करणेँ गिरफ्तार नहि कऽ पाबैत छै आ मिथिल अपन बन्धु लोकनिकेँ सभ बात बुझबैत छै। बादमे अपन गिरफ्तारी दऽ दैत छै।
बादमे महतोक बेटा मिथिलसँ क्षमा याचना करैत छै। एतहि उपन्यास समाप्त भऽ जाइत अछि।
शैली
एहि उपन्यासमे एकालाप शैली, मनोविश्लेषणात्मक शैली, पत्रात्मक शैली, पूर्वदीप्ति शैली आदिक प्रयोग देखबामे आबैत अछि।
परिवेश
एहि उपन्यासक परिवेश ग्रामीणसँ लऽ कऽ नगरीय धरि अछि। एकर परिवेश मिश्रित अछि।
पात्र
'स्वेदजीवी' उपन्यासक पात्र सभ अछि-
1. मिथिल (मिथिलेन्दू) — दुखभंजन बाबूक बेटा, कुलीक काज करैत छै। कथानायक।
2. यूनियनक अध्यक्ष – गौण पात्र।
3. शुभांगी — सुधाकान्तक मानय माय। मिथिल सारि।
4. सुधाकान्त —मिथिलक बच्चा। नेना पात्र।
5. उषाकुमारी — मिथिलक पत्नी।
6. गिरधारी बाबू — शुभांगीक पति, मिथिलक साढ़ू।
7. मृणाल सेन — नेता।
8. मिथिलक बेटी — राधा। नेना पात्र।
9. राम — महतोक पछिलग्गू।
10. कृष्ण — महतोक पछिलग्गू।
11. नेपाल राय — एम.एल.ए.।
12. सुमित चक्रवर्ती — पुलिस कमीश्नर।
13. बिड़ला जी – करखाना मालिक।
14. सुधीर महतो — करखाना मालिकक गुंडा आ लेबर सप्लायर।
15. जगन्नाथ जी — करखानाक श्रमिक।
16. सुच्चा बाबू — कृष्णक बाबू, मिथिलक ग्रामीण।
17. पशुपति — ठाकुर जीक बेटा — मिथिलसँ जेठ।
18. सीताराम — सुधीर महतोक बेटा।
19. सुधनमा खतबे — मिथिलक ग्रामीण।
20. महेश — मिथिलक छोट भाय।
21. सुधनमा खतबेक जेठ विवाहित बहीन।
22. मसौधिया पहलवान — बलत्कारी।
23. सत्यनारायण पार्कक मरबड़िया जे मिथिलकें अक्षर चिन्हब सिखौने छलैक।
24. धीरेन्द्र — मिथिलक भाय।
25. रहमान — हिन्दू स्त्रीगणक छाती काटनिहार।
26. भुटकुन बाबू — महाजन।
27. मधुसुदन भैया — मिथिलक ग्रामीण।
28. शत्रुभैया – मिथिलक जेठ भाय।
29. भट्टर साहेब — ओरियन्टक मैनेजर।
30. हरेकृष्ण मजुमदार — यूनियनक प्रेसिडेंट।
31. जीवछलाल — महतोक ग्रामीण।
32. जीवन लाल — जीबछ लालक बाप।
33. बड़की काकी — मिथिलक।
34. अर्जुन भैया — मिथिलक।
35. समरेन्द्र मुखर्जी — यूनियनक नेता।
36. सुनीता — महतोक दोसर पत्नी।
37. नन्दिनी — महतोक तेसर पत्नी। सुनीताक बेटी।
38. सुखेश्वर बाबू — मिथिलक ग्रामीण।
39. पोटन भंडारी — मिथिलक ग्रामीण।
40. चिकनाबाली — शत्रु भैयाक कनियाँ।
41. हृदयनारायण — मिथिल भातिज।
42. शकुन्तला — शुभांगीक नहिराक विधवा।
43. जीवन जी — मिथिलक ग्रामीण।
44. भवनाथ बाबू — मिथिलक ग्रामीण।
भाषा
एहि उपन्यासमे अलंकृत भाषाक प्रयोग सेहो ठाम-ठाम देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “मजदूर संघक नेता लोकनि चकित छलाह जे मिथिल सन एक अनपढ़ मजदूर सरकारी पक्षक ओकीलक विरुद्ध कोना अपन बहस अपनहि कयलक आ कोना सभकें मोहि लेलक?”18
2. “मजदूरक पशु सदृश जीवन स्तर देखल अछि, जीवनदायिनी देवत्व नहि।”19
3. “किसान-मजदूरोक जीवन स्तर बिड़ला-टाटा सन सुखमय हो ताहि लेल लड़ब।”20
4. “हमर सोन सन बेटा पढ़बै लेल घरे-घरे बौआयल नहि फिरत।”21
5. “मिथिलक केवाड़ देखलनि तँ खुजले रहि गेल छलनि आ ओ ओछाइन पर जाइत देरी काटल गाछ जकाँ अरड़ाके पड़ि रहल रहथि।”22
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे काव्यात्मक भाषाक प्रयोग सेहो ठाम-ठाम देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “हमरा भऽ गेल बेटा।”23
2. “हमरा नहि चाही अपन जनमल।”24
3. “सन्न रहि गेलाह मिथिल।”25
4. “एतेक सुनैत देरी मिथिलक मन दर्पण मे उतरय लागल ओ सभ तीत-मीठ दृश्य जकर नायिका छली शुभांगी। गवाह छलीह शुभांगी। संकटमोचक छली शुभांगी।”26
5. “उमस भरल एहि कलकतिया गर्मीसँ बेचैन भऽ उठल छथि मिथिल जी।”27
'स्वेदजीवी'उपन्यासमे पात्रानुकुल भाषाक प्रयोग देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “जनाना में कोई गड़बड़ी नहीं है।”28
2. “आप लोग दोषी को पकड़ना नहीं चाहते हैं। पैसा खा गए हैं। उसको मारा तो होगा दियादवाद, अड़ोसिया-पड़ोसिया और आप झूठ में हमारे गाँव में आकर लोगों को तंग करते हैं। सुधनमा की माँ को पुछिये और उसे जिस किसी पर शंका हो उसे पकड़िए ना।”29
3. “ई नहीं चलेगा। हमारा दाबी देना होगा।”30
4. “रौआ चन्दा काहे न देली ई तँ हमर अपमान भइल नू?”31
5. "आमार दाबी दीते होबे।"32
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे लेखक जीवनानुभुतिक वचन सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. "आशे पर तँ जीवन छैक।"33
2. “जीवनसँ नहि भागी।”34
3. “जीवनक सुख-दुखकें नपबाक लेल कोनो एक तराजू कारगर नहि होइत छैक।”35
4. “जीवन अनेक वस्तुक सहयोग, सहभागिता एवं शक्ति सँ निर्मित होइत छैक।”36
5. “जीवनक सुख-दुखक अनेक कारण होइत छैक।”37
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे मुहावराक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “अहूँ सभ ताल करैत छी।”38
2. “एतेक सुनिते मिथिल आगि भऽ गेलाह।”39
3. “बाल-बच्चाक मुँहमे जाबी लगाउ।”40
4. “हमरा बात लेल अहाँ दुनू गोटा किएक उत्तरा-चौरी करैत छी।”41
5. “बात लोकैत कहि उठली।”42
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे कहबी/लोकोक्तिक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “दरिद्रताकें यौवन लेल कहिया दर्द भेलैक?”43
2. “कष्टक फल मीठे होइत छैक।”44
3. “मंगला मुखी सदा सुखी।”45
4. “चोर चोरी सँ जाय हेरा फेरी सँ नहि।”46
5. “जाहि अस्त्रक बलसँ लोक जीबैत अछि अक्सरहाँ वैह अस्त्र ओकर अन्तो करैत छैक।”47
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे युग्म शब्दक प्रयोग ठाम-ठाम देखबामे आबैत अछि। जेना- वस्तु-जात, किसान-मजदूर, बिड़ला-टाटा, बेर-बेर, घरे-घरे, नव-नव, अबैत-जाइत, बाल-बच्चा, आस्ते-आस्त, कुशल-क्षेम, बेटा-बाप, इज्जति-प्रतिष्ठा, धन-दौलति, चोरा-नुका, पत्नी-बेटा, करैत-करैत, खुशी-खुशी, तीत-मीठ, की-की, थाकल-झमारल, दिन-प्रति-दिन, थाकक-हारल, पड़ोसिया, अता-पता, दोस्त-दुश्मन, पूछा-पाछी आदि।
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे अरबी-फारसी-उर्दू भाषाक शब्दक प्रयोग ठाम-ठाम देखबामे आबैत अछि। जेना- मजदूर, खुशी, बहस, दाम, बेकार, खर्च, मगर, खबरि, खिलाफ, परवाह, जरुरत, आराम, हराम, मोकदमा, शिकायत, फुरसत, मोकिल, आस्ते, खराप, शुक्र, समुचा, जानकारी, ताकत, सलामी आदि।
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे अंग्रेजी भाषाक शब्दक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- ओरियन्ट, डिग्री, फैक्ट्री, गेट, बोनस, स्पेशल, बी.ए., पास, ट्युशन, रील, ऑपरेशन, साइरन, सेड, फेन, ड्यूटी, नाइट शिफ्ट, रिपोर्ट, डाक्टर, मेडिकल साइन्स, फेल, फेस, स्कूल, ओभर टाइम, रेडीमेड, आदि।
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे संस्कृत भाषाक शब्द (तत्सम)क प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- अवश्य, परन्तु, संग्राम, स्मरण, अष्टयाम, सम्पूर्ण, क्रोध, शिवरात्रि आदि।
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे विशेषण शब्दक प्रयोग देखबामे आबैत अछि। जेना- संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा, आश्चर्यजनक घटना, विस्मयकारी, सम्पूर्ण, ससम्मान, चकित, अनपढ़, प्रजातान्त्रिक पद्धति, अभिनव सूत्रपात, निरोग, अचंभित, कलयुगी वनवासी, मारल, दुत्कारल, बाँझ शरीर आदि।
‘स्वेदजीवी’ उपन्यासमे गारिक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. "ई सुनिते मस्टरबा सरधुआ एकर फीस माफ नहि कयलकैक।"48
2. “सरधुआ मरबो नहि करैत अछि जे चैनसँ जीवितहुँ।”49
3. “हँ, सार सभकें पेटमे तँ अन्न नहि छनि तकर इन्तजाम नहि सुझैत छनि।”50
4. "रे रामा! की देखखैत छें लगा पचास कोड़ा एहि गिरधरिया केँ। मार सार कें। खत्म कऽ दे।”51
5. “रे रामा-किसना शाला। तू सभ भगवे की नहि रे।”52
संदर्भ सूची
1. झा, मधुकान्त, वर्ष: 2008, स्वेदजीवी, शेखर प्रकाशन, पटना, पृष्ठ सं०—11.
2. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-11.
3. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-21.
4. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
5. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29.
6. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-45.
7. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-49.
8. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-51.
9. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-55.
10. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-57.
11. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-58.
12. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-66.
13. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-66.
14. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-103.
15. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-127.
16. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-127.
17. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-127.
18. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-129.
19. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-11.
20. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-11.
21. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-12.
22. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-12.
23. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-13.
24. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-15.
25. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-20.
26. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-21.
27. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-22.
28. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
29. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-24.
30. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-24.
31. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26.
32. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-28.
33. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-28.
34. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-28.
35. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-30.
36. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-32.
37. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-34.
38. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-39.
39. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-13.
40. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-13.
41. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-13.
42. उपरोक्त, पृष्ठ सं०- 14.
43. उपरोक्त, पृष्ठ सं०- 15.
44. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-15.
45. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-17.
46. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-17.
47. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-22.
48. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-22.
49. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
50. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-24.
51. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-27.
52. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-67.
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