विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

(मानवशास्त्री, भारतक विभिन्न अदिवासी समूहक विद्वान, शोधकर्ता। संपर्क-8076208498)
रामानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्य आ मिथिला संस्कृति केर अनुपम अभिलेखपाल
रामानन्द झा “रमण” सुविज्ञ आ गंभीर लोक छथि। गभीर रहब आ विषय वस्तु संग तारतम्य स्थापित करब हिनक आवश्यक व्यक्तित्व केर लक्षण छनि। साहित्य केर केँ कहैत अछि समस्त मैथिली वाङ्मय सँ परिचित छथि। मैथिली साहित्यमे के की लिख रहल छथि, कोन तरहक गतिविधि चलि रहल छैक, मैथिली केर इतिहास, मिथिला केर इतिहास, सभ वर्ग आ समुदाय केर इतिहास, सभ किछु पर मैक्रो दृष्टि राखैत छथि। किछु समूह अथवा समुदाय पर अघोषित माइक्रो दृष्टि से राखैत छथि। अनेक साहित्यकार, विद्वान अथवा अति विशिष्ट मैथिल सभक रचना प्रकाशित करबामे, संपादित करबामे हिनक भूमिका अनुपम छनि। हिनके कृपा सँ हम लिली रे आ अनेक विद्वान लोकनि केर रचना पढ़ि चुकल छी। हमरा इच्छा भेल जे हम लिली रे केर समग्र रचना पढ़ब। भेल, कोना पढ़ब? कतऽ भेंटत सभ पोथी? एक व्यक्ति कहलनि: “रमण जी सँ संपर्क करू ओ व्यवस्था कऽ देताह।” हम रमण जी सँ दूरभाष पर गप्प केलहुँ तँ पता चलल जे अनेक ठाम सँ हुनक अर्थात् लिली रे केर रचना सभकेँ एकत्रित कऽ फेर ओकरा संपादित करैत रमण जी लिली रे केर समग्र रचना केँ प्रकाशित केने छथि। हम ओ रचना सभ मंगा पढ़ने रही आ पहिल बेर लिली रे केर रचना संसार सँ अवगत भेल रही। ई संभव भेल तकर जड़िमे छलाह रामानन्द झा रमण।
अतबे नहि रमण जी अनेक विधा केर नव-पुरान लोक आ विद्वान केँ मैथिली केर विभिन्न विधा पर लिखबा हेतु प्रोत्साहित करैत छथि। हिनक एहि नीक काजक प्रमाण हम स्वयं छी। हमर फेसबुक केर पोस्ट सभ देखि पढ़ि रमण जी हमरा अपन मोबाइल नंबर आ ईमेल पता पठा देलनि। फेर लिखबाक आग्रह केलाह। किछु दिनक बाद हम लिखनाइ प्रारंभ कएल। तकर भाषा आ वर्तनीमे सुधार करैत ई ओहि आलेख केँ चेतना समिति पटना केर पत्रिका “घर बाहर” मे छपलनि। हम नहुँ-नहुँ लिखनाइ शुरू केलहुँ। हमर जे मैथिली भाषा साहित्यमे लेखन केर यात्रा विदेह सँ शुरू भेल तकरा रमण जी ठोस रस्ता प्रशस्त केलाह।
रमण जी, जेना कहि चुकल छी मैथिली वांग्मय केर इनसाइक्लोपीडिया छथि। से अहि लेल छथि जे हिनका लग समग्रतामे सभ सामग्री व्यवस्थित रूप सँ उपलब्ध छनि। अपन सामग्री सँ ई वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक आ आत्मिक रूप सँ संलग्न छथि। एक- एक डाक्यूमेंट हिनका लग कैटलॉग केर फॉर्मेटमे उपलब्ध छनि। एक संस्मरण याद आबि रहल अछि। 2019 मे हम प्रोफेसर देवशंकर नवीन जी केर संग पटना गेल रही। पटनामे टाइम्स ऑफ इंडिया केर एक स्पोंसर्ड कार्यक्रममे हमरा नवीन जी संग साक्षात्कार करक छल। हमरा संग आराधना प्रधान से छलीह। कार्यक्रम सँ एक दिन पहिने हम आ नवीन जी पटना पहुँच गेल रही। साँझुका पहर रमण जी अशोक कथाकार संग भेंट करबाक हेतु एलाह। हमर जिज्ञासा ई जनबाक छल जे नवीन जी अपन साहित्य लेखन केर यात्रा मैथिलीमे गद्य सँ शुरू केने छथि अथवा पद्य सँ। तकर प्रमाण के देत? एक मोन भेल जे नवीन जी सँ जानकारी हासिल करी। फेर भेल, अगर ओ सही जानकारी नहि देलनि तखन की करब? हुनकर बात केर अवहेलना करबाक सामर्थ्य हमरामे कहियो नहि भेल। फेर की समाधान हो? भेल, “रामानन्द झा रमण हमर समस्या केर समाधान कऽ सकैत छथि।” यद्यपि हम पूर्ण आश्वस्त नहि रही। हम रमण जी आ अशोक जी केँ नवीन जी लग गप्प करैत छोड़ि बाहर आबि गेलहुँ आ डॉ. ऊषाकिरण खान सँ फोन पर गप्प कर लगलहुँ। हुनका सँ ज्ञात भेल जे प्रारंभिक जीवनमे नवीन जी कविता केर एक लघु संग्रह प्रकाशित केने छलाह मुदा संग्रह केर नाम आ पोथी केर उपलब्धता केर जानकारी उषाकिरण खान लग नहि छलनि। जखन हम कहलियनिछ “ रमण जी लग ई पोथी भेटबाक संभावना भऽ सकैत अछि की?”
ऊषाकिरण खान आत्मविश्वास सँ बाजि उठलिह: “अवश्य हेबाक चाही। आ अगर इ पोथी रमण जी लग उपलब्ध नहि छनि तँ कतहुँ नहि भेटत।”
हम आब आश्वस्त होइत अपन होटल केर कक्षमे आबि गेलहुँ। रमण जी आ अशोक जी नवीन जी संग नाना तरहक साहित्यिक आ पारिवारिक वार्तालापमे मग्न छलाह। हम आबिते देरी कॉफी केर आर्डर दैत बाहर जेबाक लेल क्षमा मांगि लेल। जखन ई सब अपन-अपन घर लेल प्रस्थान करऽ लगलाह तखन हम कात लऽ जाकऽ हिनका सँ निवेदन कएल: “अहा लग नवीन जी केर अपन साहित्यिक यात्रा केर ऊषाकालमे लिखल कोनो कविता संग्रह अछि की?”
कनेकाल सोचैत रमण जी उत्तर देलनि; “जखन नवीन जी डाल्टनगंज केर कॉलेजमे लेक्चरर छलाह ताहि समय एक कविता केर लघु पोथी प्रकाशित केने छलाह। हमर संग्रहमे ई पोथी उपलब्ध अछि। मुदा हमरा ताक पड़त।”
“हमरा हर हालत मे ई पोथी चाही। हम हुनकर प्रारंभिक रचना केर विषय, शब्द संधान, उपमा, शैली आ अलंकार आदि के देख चाहैत छी। हमर उद्येश्य नवीन जीमे एक साहित्यकार केना समय संग अलग-अलग पड़ाव, अलग-अलग विषय, विधा, मनोभाव, साहित्य चेतना संग आगा बढ़ेत छनि तकरा देखए आ बुझए चाहैत छी। ई बिना अहाँक सहयोग सँ संभव नहि अछि।”
हमर कथ्य केर अपन मौन स्वीकृति दैत रमण जी गंभीर भेल अपन गर्दनि हिला देलाह। आब हमरा लगभग 90 प्रतिशत विश्वास भऽ गेल जे रमण जी दोसर दिन ओ पोथी हेरि लेताह।
सएह भेलैक। दोसर दिन रमण जी कार्यक्रम केर प्रारंभ होब सँ डेढ़ घंटा पहिने आबि गेलाह आ पोथी जेना हम निवेदन केने छलियनि तहिना चुपचाप हमरा दऽ देलाह। एहि बातक जानकारी आई धरि हमरा, रमण जी आ ऊषा दीदी केर अलावे ककरो नहि छनि।
डेढ़ घंटा हमरा लेल पर्याप्त समय छल ओहि पोथी केर टेक्सचर बुझबाक लेल। जखन हम नवीन जी सँ पद्य रचना पर बात करब शुरू कएल तँ ओ अपन बात बहुत गंभीरता दिस लऽ जेबाक उद्यम कर लगलाह। तखने हम हुनक पोथी सँ तीन अथवा चारि कविता केर किछु अंश सुना देलयनि। हमरा लग नवीन जी केर प्रारंभिक रचना सेहो कविता संग्रह उपलब्ध अछि ई बात हुनक कल्पना तकमे नहि छलनि। नवीन जी नित्य शोध कर्म केर घोर साधक छथि। स्वीकार केलाह जे प्रारंभ भले किशोर मनक झंझावात केर वेगमे प्रेम सँ केने छलाह मुदा किछुए दिनक बाद ई अनुभव भेलनि जे हुनक सोच आ दिशा कतहुँ आन ठाम छनि।
हालहिमे हमरा प्रोफ़ेसर मुक्तिनाथ झा केर बारेमे किछु जनबाक प्रयोजन भेल। हुनका नाम सँ पुरस्कार इत्यादि जे देल जाइत छैक तकर चयन प्रक्रिया केर हम एक रेफरी रही। हम ओहिना रमण जी लग एकर चर्च केने रही। किछुए दिनक बाद रमण जी हमरा लग एक पीडीएफ फाइल प्रेषित केलनि जाहिमे स्वर्गीय प्रोफ़ेसर मुक्तिनाथ झा पर कोनो अवसर पर जे हुनक व्यक्तित्व आ हुनका पर जे हिनक व्यक्तिगत अवधारणा छलनि तकरा स्पष्ट केने छलाह। ओहि पीडीएफ फाइल बला कागत केर प्रिंट करा हम तीन-चारि बेर पढ़ने रही आ अपन अज्ञानता बहुत हद धरि दूर करबाक प्रयास केने रही।
हम बेर-बेर एहि बात केँ स्वीकार करैत छी जे हम मंदगति केर पाठक छी। साहित्य केर अनेक गुढ़ बात सभ नहुँ-नहुँ हमर माथामे घुसैत अछि। सत्य स्वीकार करबामे कहेनलाज! भले किछु लोक गैंग बना ककरो लेल अंट-शंट लिखैत छथि मुदा अपन समूह केर संस्कार नहि देखैत छथि, हमरा अपन सीमा रेखा बुझल अछि। ताहिं बहुत पोथी सभ पढ़मे बहुत अधिक समय लगैत अछि। ई बात लिखबाक उदेश्य अतबे जे रमण जी अपन दू पोथी हमरा पठेने छथि, मुदा हम एखन धरि ओकरा नहि पढ़ि सकल छी। आब ओकरो पढ़ब आ अपन ज्ञान आ सोचक मर्यादामे रहैत ओहि दुनू पोथी पर विस्तार सँ लिखबाक यत्न करब।
उपरोक्त प्रसंग अथवा उद्धरण त एक छोट प्रसंग अछि। अतेक अनेक प्रसंग हमरा लग अछि। हमर चर्चे की, अनेक साहित्यकार, पाठक, शोधार्थी, विद्यार्थी आ समालोचक रमण जी केर उत्कृष्ट संकलन आ हुनक सहयोग सँ लाभान्वित भेल हेताह। बहुत लोक एखनो भऽ रहल अछि। हमरा जखन कखनो कोनो गंभीर लेख आदि केर लेखन केर समय कोनो संदर्भ केर दरकार होइत अछि त हम आँखि मुनि रमण जी केँ फोन लगा लैत छी। अधिकांश समय रमण जी हमर जिज्ञासा केर समाधान प्रामाणिक संदर्भ सँ करैत छथि। हिनक सौम्य स्वभाव, उदारता, ज्ञानक प्रति अहर्निश संलग्नता हिनका भीड़ सँ अलग ठाढ करैत छनि। हमरा विश्वास अछि पाठक सभ पढ़ैत काल अपन-अपन अनुभव सँ हमर कथ्य केर प्रामाणिकता केर अनुभव करैत हेताह।
अतबे नहि, जाहि तरहे रमण जी मैथिली भाषा केर साहित्यकार, मिथिला केर विद्वान चाहे ओ कोनो विधा आ क्षेत्र केर होथि, अति प्राचीन सँ नव लेखक सभक जन्म दिवस, जे दिवंगत भऽ गेल छथि तिनकर अवसान दिवस, एक- एक आदमी केर रचना केर नाम, गाम आदि केर अतिरिक्त हुनका सँ संबंधित प्रसंग, हुनक छवि, पोथी केर छवि आदि अनेक चीज सब दृष्टांत लेल रखैत फेसबुक अथवा आन सामाजिक संजाल पर अपन पोस्ट केर मादे लोक केर मानस पटल पर साहित्यकार केँ जियोने रहैत छथि से अपना आपमे बहुत पैघ बात छैक। सामग्री, सामग्री केर छवि, सामग्री संग साहित्यकार केर प्रमाणिकता सभ किछु एक ठाम परोसऽ केर कला आ वैज्ञानिक दृष्टि छनि रमण जी केर।
अंतमे कहब जे रमण जी सन मैथिल साहित्यकार केँ पाबि चेतना समिति पटना अथवा कोनो संस्था गर्वक अनुभव कऽ सकैत अछि। हम सभ रमण जी केर कारण अनेक साहित्यकार आ मिथिला केर मनीषि लोकनि केँ नियमित स्मरण करैत छी, हुनका बारेमे, हुनक रचनाक बारेमे बुझैत छी।
हम तँ अपन कुलदेवी सँ बेर-बेर प्रार्थना करब जे रमण जी बहुत दिन धरि दैहिक, मानसिक स्तर पर स्वस्थ्य, प्रसन्न आ सदैव एक्टिव रहथि जाहि सँ साहित्य प्रेमी लोकनि केँ हिनक वैदुष्य आ संग्रह केर लाभ भेटैत रहनि।
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