विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मयंक कुमार झा
परिचय
किछु दिन पहिने एक टा आलेख लिखने रही । पत्रिकाक संपादक कहलनि जे अपन एक टा ‘परिचय‘ पठाउ। माँग तऽ सहज रहनि मुदा जखन एहि तथाकथित सोझ शब्द - परिचय- पर कनि मोन ध्यानस्थ कयलहुँ तऽ मोन मे छोट सन एक टा बिहाड़ि उठल । नेनपन में जखन ई प्रश्न पूछल जाइत छल तऽ सोझ उत्तर रटा देल गेल रहय- हमर नाउँ फलाँ, बाबूक नाउँ फलाँ, बाबाक नाउँ फलाँ, घर-गाम फलाँ ठाम आदि । पैघ भेला पर लोक, आ हमहू, एहि प्रश्नक उत्तर प्रायः अपन व्यवसाय सँऽ देबय लगलहुँ । हम जाहि नौकरी मे छी ताहि मे तऽ ईहो प्रशिक्षण देल जाईत अछि जे अपन परिचय कोना दी। परंतु एहि बेर पूछल ई प्रश्न मोन मे उत्सुकताक संग कनी बेचैनी सेहो उत्पन्न कयलक।व्यावहारिक स्तर पर तऽ हम नाम, ठेकाना, व्यवसाय आदि पठा देलियनि मुदा स्वयं संतुष्ट नई भऽ पेलहुँ।
परिचय वस्तुतः जटिल विषय थिक। हम के छी - ई मनुक्ख जातिक सभ सँऽ पुरान, मौलिक आ विवादित प्रश्न अछि। एकर उत्तरक प्रयास मनोविज्ञान सँऽ आरम्भ होईत, समाज,राजनीति आ धर्मक बाट धरैत, दर्शनक दुआरि पर आबि आध्यात्मक दरवजा केँ खटखटबैत आत्मनज्ञानक गर्भगृह मे प्रवेश क जाइछ ।
परिचयक प्रारंभिक परिचायक होइत अछि जन्म। कुल-परिवार, सामाजिक स्तर, आर्थिक वर्ग, धर्म, जाति-पाति, पंथ, आदि सभ सँऽ परिचयक महत्वपूर्ण अंग जन्महि सँऽ निर्धारित भऽ जाइत अछि आ बेसी लोकसभ एही जन्मनिर्धारित परिचयक रक्षा में आजन्म संलग्न देखल जाइत छथि । मुदा जखन कोनो नवजातक जन्म होइत अछि तखन ओकर मानस पटल एक टा खाली स्लेट रहैत अछि- ओकरा ईहो अवगति नई रहैत छैक जे ओ अपन माय सँ पृथक कोनो जीव थिक। ओकर चेतनाक अंकुरण आ माय सँऽ पार्थक्यक बोध एकहि संग उत्पन्न होइत अछि। कनि पैघ भेला पर, व्यक्ति (बालक) शनैः-शनैः संसारकेँ स्वीकार करय लगैत अछि। संसार माने अपन-आनक पार्थक्य (कोना से पाछू फरछियेब)। एही पार्थक्यक अवगति सँऽ ओ स्वयंकेँ परिभाषित केनाई आरम्भ करैत अछि- हम, आन सँऽ भिन्न।
नेनपनि सँऽ व्यक्ति अपन पहचान वा परिचयकेँ अपन परिवेशक अनुरूपेँ मिलयबाक अथवा तादात्म्य बैसेबाक प्रयत्न करय लगैत अछि। वा एकरा उलटि कऽ सेहो कहि सकैत छी जे व्यक्तिक परिवेशे ओकरा अपन अनुसार ढालबाक लेल बाधित कऽ दैत छैक। एहि परिवेश मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान होइत अछि माय-बाप वा प्राथमिक पोसनिहारक । क्रमशः नेनाकेँ जेना जेना सामाजिक हवा-बसात लगैत अछि , प्रकृति आ पोषणक समन्वय सँऽ, ओकर व्यक्तित्वक निर्माण तदनुरूप होइत रहैछ ।
एहि आधुनिक संसार में परिचय निर्माण करबा में विद्यालयक बड़ महत्वपूर्ण भूमिका होइत अछि । कोन कक्षा आ वर्गक मे पढ़ैत छी से कोनो छात्रक स्वाभाविक परिचय होइत अछि। तकर बाद परीक्षा में कोन स्थान भेटल आ कतेक अंक पाओल आदि मूल्यांकन आधारित वर्गीकरण आ ओही सँऽ सृजित आत्मसम्मान विद्यार्थीक आत्मपरिचय बनि जाइuत अछि। इएह प्रक्रिया किशोरावस्था आ महाविद्यालय मे आओर बेसी प्रबल भऽ जाइत छैक ।
एकर समानांतर घर, परिवार आ समाजक परिवेश में व्यक्तित्वक केन्द्रीय स्तम्भक निर्माण होइत रहैत अछि। सामाजिक-शैक्षणिक जीवन किशोरसभक धार्मिक, जातीय आ राष्ट्रीय अस्मिताक निर्माण करैत अछि आ वस्तुतः ईएह व्यक्तिकेँ एक टा नीक वा अधलाह नागरिक बनबैत अछि। राष्ट्रीय अस्मिता कतेक प्रभावशाली भऽ सकैत अछि से एहि तथ्य सँऽ प्रमाणित भऽ जाइत अछि जे लोकसभ राष्ट्र लेल सहजहि जीवनक आहुति दैत अछि आ संगहिं अनकर प्राण हरय में सहो कोनो ग्लानि नई करैत अछि।
विद्यार्थी काल शेष भेला पर व्यक्तिक व्यवसायिक जीवन आरम्भ होइत छैक । आधुनिक युग में सरिपहुँ इएह भेल सभ सँऽ प्रयोजनीय परिचय। एहि परिचय में दरमहा, बैंक खाता में जमा पाईक पाछू लागल सुन्ना, फ्लैट-जमीन आदिक वर्गक्षेत्र, गाड़ीक इंजनक सीसी सनहक किछु अंकगणितीय तथ्य बेस योगदान दैत अछि। प्रायः लोक एही अंकगणितकेँ मिलबैत-मिलबैत गृहस्थाश्रम खपा दैत अछि। एही परिचयकेँ समाज असल, व्यावहारिक आ काजक परिचय बुझैत अछि। सामाजिक वर्गक निर्धारण आ ओहि सँऽ जुड़ल फ़ायदा आ गरफ़ायदा व्यवसाये द्वारा निर्धारित होइत अछि। मुदा दुर्भाग्यवश आत्मबोधक ई विकृति आधुनिक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाक आधारशिला थिक आ ई व्यवस्था सर्वाधिक प्रबल होइत अछि जनसंचार माध्यम (mass media) सँऽ। जनसंचार माध्यम व्यक्तिकेँ अवचेतन रूप सँऽ प्रभावित कऽ ओकर पहचानकेँ एक टा उपभोक्ताक साँच में ढालैत रहैत अछि। नीक वा बेजाय-परंतु एही प्रणाली पर आधुनिक अर्थव्यव्स्था ठाड़ अछि।
कियेक तऽ मनुक्ख सामाजिक जीव होइत अछि, तेँ लेल संबंधक परिधि अथवा परिवेश परिचय आ पहचानक महत्वपूर्ण अंग होइत अछि। सभ सँऽ आरंभक संबंध होइत अछि माय-बापक। कोनो कानूनी कागज वा औपचारिक परिचय मे व्यक्तिक नामक संगहि माता-पिताक नाम सेहो उल्लेख रहिते छैक। मनोवैज्ञानिक सिद्धांत सभक अनुसार नेनपनक माय-बाप सँऽ संबंध लोकक व्यक्तित्व आ वयस्क जीवनक आन महत्वपूर्ण संबंध सभक दिशा निर्धारित करैत अछि। विवाह आ परिवार भेला पर सेहो व्यक्तिक परिचय में नब आयाम आबि जाइत अछि । जे कहियो पुत्र रहय से आब पिता आ पति भऽ जाइत अछि । ई वस्तुतः व्यक्तिक गतिमान परिचय धारा मे आबय वाला सभ सँऽ पैघ मोड़ होइत अछि। जीवन पर्यंत अपना आपकेँ एक टा चिरपरिचित तरीका सँऽ चिन्हयवाला व्यक्ति कखनो अपने लेल अनचिन्हार भऽ जाइत अछि । अवचेतन रूप सँऽ प्रायः इएह परिचय परिवर्तन पारिवारिक जीवन में संघर्ष आ कटुताक एक टा अव्यक्त मुदा केन्द्रीय कारण होइत अछि।
बाहरी संबंध जकाँ मनुक्ख अपन मोनक अंतर सँऽ सेहो चिह्नित होइत अछि। इहो देखल जाइछ, जे लोक सभक अपन आदर्श विचार अथवा विचारधाराक प्रति प्रतिबद्धता सेहो ओकर व्यक्तित्वक अभिन्न अंग भऽ जाइत छैक। तेँ कतेको लोक लेल ओकर विचारधारा ओकर माता-पिता अथवा संतान सँऽ कोनो तरहेँ कम प्रिय नई होइत छैक।
विचारधाराक प्रभाव ततेक जोरगर होइत छैक की लोक एहि लेल प्राण आहुति देबा लेल तैयार भऽ जाइत अछि। साम्यवाद, राष्ट्रवाद, पूँजीवाद सनहक अनेक विचारधारा एकर सुगम उदाहरण थिक जाहि लेल असंख्य लोकसभ प्राणक बलिदान सहजता सँऽ दऽ दैत रहल अछि आ कएक टा नरसंहार पाछा सेहो एही विचारधाराक संघर्ष रहल अछि ।
एखन धरि परिचयक जतेक आयामक विश्लेषण भेल से सभ परिवर्तनशील आ अस्थायी छल। जन्म सँऽ मृत्यु धरि लोकक बाह्य आ आंतरिक अस्मिताक धारा गतिमान होय एम्हर-ओम्हर बहैत रहैत अछि। महान पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग कहने छथि जे जीवनक बाट पर हमसभ स्वयं सँ बेर-बेर हजारो अलग अलग भेषमे भेट करैत रहैत छी। मुदा की एहन कोनो गंभीर उदधि अछि जतय ई मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक, जातीय, आर्थिक आदि मूलक परिचयक धारा विलीन भऽ जाइत अछि आ यदि भऽ जाइत अछि तऽ रहि की जाइत अछि ? की हमरसभक एहन कोनो परिचय अछि जे एहि लौकिक संबंध आ कार्यकलाप सभ सँऽ अछूत होय ? भारतीय दर्शन मे एहि विषय पर अत्यंत विस्तार आ गंभीरता सँऽ चर्चा, विचार, तर्क आ शास्त्रार्थ भेल अछि। षठ-दर्शन प्रणाली केर छओ शाखा मे सँऽ एक वेदांत अछि जे वेद आ उपनिषद् सभ पर आधारित अछि। वेदांत मे सर्वाधिक परिष्कृत परंपरा अछि अद्वैत वेदांत जाहि में आत्मज्ञानक बड़ क्रांतिकारी आ मौलिक चिंतन भेटैत अछि।
अद्वैत वेदांत “स्वयं” केर जे आम परिभाषा आ धारणा अछि, तकरा चुनौती दैत कहैत अछि जे यथार्थ मे जे हमर सभक परिचय अछि से एहि भौतिक,मानसिक आ लौकिक क्षेत्र सँऽ पार अछि। हम सभ जकरा “हम” वा “स्वयं” बुझैत छी ओ अनित्य- अस्थायी आ मात्र एक टा भ्रांति अछि। ईएह भ्रांति सभ प्रकारक दुखक कारण होइत अछि। किंतु यदि ई मानसिक-पार्थिव “स्वयं” यथार्थ नई भ्रांति थिक तऽ फेर यथार्थ “स्वयं” के अछि ? देह तऽ नेनपन सँ बुढ़ारी धरि निरन्तर परिवर्तित होइत रहैत अछि। हमरसभक विचार आ विचारधारा दूनू बदलैत रहैत अछि, कखनो काल तऽ पूर्ण १८० डिग्री मोड़ लय लैत अछि। अनेक विचार उत्पन्न होइत अछि आ पुनः मानस में विलीन भऽ जाइत अछि। भावनासभ क्षण-क्षण परिवर्तित होइत रहैत अछि। सामाजिक परिचयसँ लऽ कऽ व्यक्तित्वक विविध रूप धरि समयक संग परिवर्तित होइत रहैत अछि। अतः जँ मनुष्य अपन आत्मपरिचय एहि परिवर्तनशील धारा पर आधारित करैत अछि, तऽ ओकर आत्मबोध सेहो अनिवार्यतः अस्थिर भऽ भसिया जाइत अछि।
एहि विषय पर वैदिक ऋषिलोकनि गम्भीर आत्मानुसन्धान कयलनि। हुनकर मौलिक प्रश्न छल—समस्त परिवर्तनक मध्य ओ कोन तत्त्व अछि, जे कदापि परिवर्तित नहि होइत अछि? एकर उत्तर वेदांत दर्शन मे भेटैत अछि। वेदान्तदर्शनक मूल प्रतिपादन ई अछि जे मनुष्यक समस्त दुःखक मूल कारण अपन यथार्थ स्वरूपक विषयमे अज्ञानता अथवा मिथ्या आत्मबोध अछि। मनुक्ख देह , मोन, भावना तथा अहंकारकेँ अपन वास्तविक स्वरूप मानि लैत अछि, जखन कि ई सभ अनित्य तथा परिवर्तनशील अछि।एहि अनुसन्धानक पद्धतिक संक्षिप्त सूत्र अछि—“नेति, नेति”, अर्थात् “ई नहि, ई नहि।” साधक अपन अनुभवक प्रत्येक पक्षक सूक्ष्म परीक्षण करैत छथि आ अपनहि सँ प्रश्न करैत छथि—“की ई हमर यथार्थ स्वरूप भऽ सकैत अछि?” देह अवलोकनक विषय अछि; अतः अवलोकनकर्ता शरीर नहि भऽ सकैत अछि। विचार अवलोकित होइत अछि; अतः विचारक साक्षी विचार नहि भऽ सकैत छथि। भावनासभ अनुभवक विषय अछि; अतः ओकर साक्षी भावना नहि भऽ सकैत छथि। मोनकेँ सेहो अनुभव कयल जाइत अछि, ताहि लेल मोन सेहो परम अनुभवकर्ता नई अछि। एतय धरि कि अहंकार—‘हम’ होएबाक अनुभूति—ओहो अवलोकित होइत अछि। अतः अहंकार सेहो अन्तिम द्रष्टा अथवा साक्षी नहि भऽ सकैत अछि।
एहि प्रकारेँ क्रमशः समस्त उपाधिसभक निषेधक उपरान्त जे शेष रहैत अछि, से शुद्ध चैतन्य, साक्षीस्वरूप चेतना अछि। ओ समस्त अनुभवसभकेँ प्रकाशित करैत अछि, किन्तु स्वयं कदापि परिवर्तनक अधीन नहि होइत अछि। वेदान्त एहि नित्य, शुद्ध, मुक्त साक्षीस्वरूप सत्यकेँ आत्मन् वा ब्रह्मन् कहैत अछि। इएह ब्रह्मन् हम (आ हम सभ गोटे ) छी। एहि तथ्यकेँ सुगमता सँऽ बुझेबाक लेल बृहदारण्यक उपनिषद्क महावाक्य अछि- ‘अहम् ब्रह्मास्मि’। आ संपूर्ण सृष्टिक कण-कण इएह ब्रह्मन् थिक- यथार्थ मे आन किछु अछिये नई। ब्रह्मनक स्वभाव अछि- सच्चिदानंद- सत्, चित आ आनंद। सत् मने अस्तित्व, चित मने चेतना आ आनंद मने पूर्णताक भाव। हम सभ मात्र हाड़-माँसुक बनल ई देह टा नई छी- यथार्थ में हम ओ शुद्ध अस्तित्व छी जे एहि सभ लीलाकेँ अनुभव कऽ रहल अछि। संसार- अर्थात् भ्रांतिपूर्ण अनेकता वा अपन आनक पार्थक्य। ई संसार मायाक प्रभाव सँऽ अनुभव आ प्रकट होइत अछि। आज्ञानताक आवरणक कारण हम सभ एहि संसार मे नाम आ रूपक विविधता आ अनेकताकेँ अनुभव करैत छी किंतु अस्तित्वक आधार- अपन यथार्थ-केँ बिसरि जाइत छी।
स्वयंक एहि सर्वसमावेशी परिभाषा आ ओकर धारणा में मौलिक परिवर्तन सँऽ सांसारिक जगत में बड़ रास झंझट, क्लेश आ द्वंद्व स्वतः समाप्त भऽ जाइत अछि।यदि लोकसभ ई बुझय मे समर्थ भऽ जाय जे जकरा सँऽ हमर संघर्ष कऽ रहल छी ओकर आ हमर यथार्थ एके अछि तहन संघर्षों में कम सँऽ कम कनि सहानुभूतिक स्थान बाँचि जाइत छैक। एहि दर्शनक अनुकरण सँऽ नैतिक आचरण सहज भऽ सकैत अछि। जखन हम जीवन यापन लेल की कऽ रहल छी ओ हमर असली पहचान नई अछि तखन अनेरो हाय-हाय कयला सँऽ की फेयदा? पैसा-कौड़ी, जाति-पाति, मूर्ख-विद्वान, तेज-भुसकौल वा अन्य कोनो मनुक्खकेँ जोखय वाला मानक सँऽ यदि यथार्थक कोनो सरोकार नई तखन लोक सभक एहि आधार पर मूल्यांकन कयनाई अनुचित होयत। वस्तुक स्वामित्वक लालसा आ वासना स्वतः शिथिल भऽ जाइत अछि जखन ई स्पष्ट ज्ञान होइत अछि जे सभ टा सांसारिक वस्तु अनित्य अर्थात् क्षणभंगुर अछि। व्यावहारिक जीवन में एहि दर्शनक अनुकरण कयला सँऽ सांसारिक दुख आ क्लेश बहुत किछु कमाओल जा सकैत अछि। बाह्य संसारक जे मनुक्खक अंतःकरण पर लौह जकड़ रहैत अछि तकरो बेश ढील कयल जा सकैत अछि। शेष करबाक लेल महान धर्मगुरु आ वेदांती आदि शंकराचार्यक ओहि कथक आवाहन करब जे निर्वाण षट्कम में वेदान्तसार केँ बड़ लालित्य सँऽ कहने छथि- “चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम”। इएह थिक हमर, अँहा आ सभक असल परिचय।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
--मयंक कुमार झा, पिता- सत्येंद्र कुमार झा, निवास- बोरिंग रोड, पटना, ग्राम- बक्सी टोल, हरिपुर, मधुबनी; भारतीय पुलिस सेवा, असम मे कार्यरत
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