विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
गजेन्द्र ठाकुर
कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · सप्तम (अंतिम) नाटक
प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र
एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे
प्रकाशन : अंतिका, जुलाई-सितंबर २०१४ · स्थान : वन-आश्रम/मिथिला/स्वर्ग · चौदह दृश्य
१. परिचय, कथा-संरचना आ संग्रहक परिप्रेक्ष्यमे स्थान
प्रेम-चतुष्टयक अंतिम नाटिका ‘प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र’ समग्र संग्रहक अंतिम कृति थिक आ एहि नाते एकर स्थान प्रतीकात्मक अछि—ई ‘प्रेमक विस्तार’ (षष्ठ)क बाद ‘प्रेमक परीक्षा’ थिक। एहि नाटकक महाकाव्यात्मक विस्तार (चौदह दृश्य, पाँच स्थान—आश्रम/मिथिला-नगर/जनक-दरबार/स्वर्ग/वन; कम-से-कम दस पात्र) प्रेम-चतुष्टयमे असाधारण अछि।
कथाक स्रोत महाभारतक अष्टावक्र-आख्यान थिक (वन-पर्व), मुदा कुणाल एकरा एक सम्पूर्ण प्रेम-नाटक बना दैत छथि जाहिमे जनक-दरबार आ वंदी-शास्त्रार्थक ऐतिहासिक-पौराणिक कथा एक ‘प्रेम-परीक्षा’क फलकमे समाहित होइत अछि। नाटकक बारह दृश्य अष्टावक्रक—आ तेरहम-चौदहम सुप्रभाक—कथा थिक।
नाटकक सात प्रमुख नाट्य-क्रम—(१) गर्भमे ज्ञान-श्राप + जन्म; (२) उद्दालक आश्रम, पिता-अनुपस्थिति आ सुप्रभासँ प्रथम-मिलन; (३) मिथिला-यात्राक योजना; (४) महाराज जनकसँ सड़क-विवाद, वंदी-शास्त्रार्थ, पिता-मुक्ति; (५) नदी-स्नानसँ अष्टावक्रकेँ यौवन; (६) वदन्यक वर्ष-भर-परीक्षा + सुप्रभाक एकांत-प्रतीक्षा; (७) उर्वशी-अस्वीकार, वापसी आ श्वेत-कमल-माल्यसँ विवाह।
२. भारतीय नाट्य-सिद्धांत
२.१ महाभारत-पुनर्पाठ : विकलांग नायककेँ केन्द्रमे आनबाक साहस
महाभारतमे अष्टावक्र-आख्यानक प्रयोजन मुख्यतः दार्शनिक थिक—‘अष्टावक्र-गीता’ (जनकसँ वार्तालाप) आत्म-ज्ञानक ग्रन्थ थिक। वंदी-शास्त्रार्थ एक द्वितीय कथा-स्तर थिक। कुणाल एहिमे एक तृतीय स्तर जोड़ैत छथि—प्रेम-परीक्षा। एहिसँ उत्पन्न होइत अछि एक त्रि-स्तरीय नाटक—ज्ञान (वंदी-शास्त्रार्थ) + कर्तव्य (पिता-मुक्ति) + प्रेम (सुप्रभा-विवाह)।
एहिसँ अधिक महत्त्वपूर्ण—कुणाल एक ‘विकलांग नायक’केँ रंगमंचक केन्द्रमे रखैत छथि। भारतीय नाट्य-परम्परामे नायकक ‘शरीर-सम्पत्ति’ (नाट्यशास्त्रानुसार) एक मानदण्ड थिक—‘धीरोदात्त’ नायक बलशाली, सुन्दर, शूरवीर होइत अछि। अष्टावक्र एहि मानदण्डकेँ पलटि दैत छथि—आठ ठाम टेढ़ शरीर, मुदा असाधारण ज्ञान। भरतक नाट्यशास्त्रमे एहन ‘विकलांग नायक’क स्पष्ट श्रेणी नहि अछि—कुणाल एक नव नाट्य-प्रतिमान रचैत छथि।
२.२ अग्नि-परीक्षाक रूपान्तरण : सोन-कसौटी
भारतीय काव्य-नाट्य-परम्परामे ‘अग्नि-परीक्षा’ एक प्रमुख मोटिफ थिक—रामायणमे सीताक अग्नि-परीक्षा प्रेम-निष्ठाक प्रमाण थिक। कुणाल एहि मोटिफकेँ रूपान्तरित करैत एक ‘शीत-परीक्षा’ रचैत छथि—अग्निमे नहि, विरहक एकांतमे, वर्ष-भरक अनदेखारमे। समापन-दोहा एहि रूपान्तरणकेँ स्पष्ट करैत अछि—
जहिना स्वर्ण मे आगि सँ आबए आर निखार / प्रेम, परीक्षा दैत अछि, तेँ होइछ आर प्रगाढ़।
एहि दोहामे ‘सोन-कसौटी’ (स्वर्णक अग्नि-परीक्षा)क रूपक प्रेमक परीक्षापर लागू होइत अछि। ई रूपकात्मक अग्नि (विरह-परीक्षा) सीताक शाब्दिक अग्नि-परीक्षासँ अधिक सूक्ष्म आ दार्शनिक थिक।
२.३ रस-महोत्सव : सात रसक सम्मिलन
एहि संग्रहक सातो नाटकमे एहिमे सर्वाधिक विस्तृत रस-महोत्सव अछि। ‘वीर’—अष्टावक्रक दरबार-संघर्ष आ वंदी-विजय; ‘करुण’—गर्भमे श्राप, पितृ-वियोग, सुप्रभाक प्रतीक्षा-व्यथा; ‘अद्भुत’—नदी-स्नानसँ यौवन-प्राप्ति, वंदीक जल-समाधि रहस्य-उद्घाटन; ‘हास्य’—दरबार-दृश्यमे उपस्थित जनताक ‘कूबड़ महाराज’ सम्बोधन आ वंदीक हँसी; ‘शृंगार’—सुप्रभा-अष्टावक्रक प्रेम; ‘शान्त’—अष्टावक्रक उर्वशी-अस्वीकार; ‘भयानक’—पिता जल-समाधिमे।
भरत ‘अंगी-रस’ + ‘अंग-रस’क सिद्धांत कहलाह—एहि नाटकमे ‘वीर’ आ ‘शृंगार’ परस्पर अंगी-रस बनैत अछि। वीरताक ज्ञान-संघर्ष प्रेमक पात्रताक प्रमाण थिक; आ प्रेम वीरताक प्रेरणा।
२.४ अष्टावक्रक उर्वशी-अस्वीकार : भारतीय साहित्यमे एक दुर्लभ क्षण
भारतीय साहित्य-परम्परामे उर्वशी सर्वोच्च सौन्दर्यक प्रतीक थिकाह—पुरूरवाक उर्वशी-प्रेम, कालिदासक ‘विक्रमोर्वशीय’ एहि आकर्षणक शास्त्रीय नाट्य-रूप थिक। अष्टावक्रक उर्वशी-अस्वीकार एहि दीर्घ परम्पराक विरुद्ध एक साहसिक नाट्य-निर्णय थिक। ओ कहैत छथि—“हमर उर्वशी, मेनका, रंभा...सब सुप्रभा छथि। मात्र सुप्रभा।”—ई वाक्य शास्त्रीय ‘अप्सरा-आकर्षण’ परम्पराक एक सचेत नाट्य-विखण्डन थिक।
३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत
३.१ विक्टर फ्रैंकल : अर्थ-खोज आ पीड़ाक रूपान्तरण
ऑस्ट्रियाई मनोचिकित्सक विक्टर फ्रैंकल (Viktor Frankl, १९०५–1९९७) अपन ‘मैन’स सर्च फॉर मीनिंग’ (Man’s Search for Meaning)मे अपन नाजी-कारागार-अनुभवसँ सीखल सिद्धांत प्रस्तुत कएलनि—‘लोगोथेरापी’ (Logotherapy) : मानव ‘अर्थ’क खोजमे जीबैत अछि; जे व्यक्ति अपन पीड़ामे ‘अर्थ’ पाबैत अछि ओ ओकर सामना कर’ सकैत अछि।
अष्टावक्रक जन्म एक पीड़ामे होइत अछि—पितृ-श्राप। मुदा माताक परिचय (श्वेतकेतुक कठोर वचनसँ) ओकर पीड़ाकेँ ‘अर्थ’ दैत अछि—“पिताश्रीकेँ मुक्त करब।” फ्रैंकलक भाषामे—‘आत्म-अतिक्रमण’ (self-transcendence)—स्वयंसँ परे एक ‘अर्थ’क सेवामे अपनाकेँ समर्पित करनाइ—अष्टावक्रक सम्पूर्ण नाट्य-यात्रा एहि आत्म-अतिक्रमणक कथा थिक।
उर्वशी-अस्वीकार एहि दृष्टिसँ फ्रैंकलक ‘अर्थ-पूर्ण जीवन’क सर्वोच्च अभिव्यक्ति थिक—ब्रह्माण्डक सर्वोच्च सौन्दर्य (उर्वशी) आ वैभव (स्वर्गसुख)केँ ठुकरा क’ एक ‘अर्थपूर्ण’ सम्बन्ध (सुप्रभासँ प्रेम)केँ चुनब।
३.२ सोफोक्लीज : शारीरिक दोषक त्रासदी आ ज्ञान-विजय
ग्रीक त्रासदीकार सोफोक्लीज (Sophocles, ४९७–४०६ ई.पू.) अपन ‘ईडीपस रेक्स’ (Oedipus Rex)मे एक ऐसे नायककेँ प्रस्तुत कएलनि जे एक ‘जन्म-दोष’ (लँगड़ापन, ‘swollen foot’) लेक’ जन्मल आ जकर पूरा जीवन एक श्राप-पूर्वनिर्धारित—ओकर जन्मसँ उत्पन्न ज्ञान-खोज ओकर विनाश बनि जाइत अछि।
अष्टावक्रसँ तुलना करनाइ रोचक थिक—दुनूक जन्म एक श्रापसँ जुड़ल (ओडिपस = पिता-श्राप, अष्टावक्र = पिता-श्राप); दुनूक जीवन पिता-खोजसँ आरम्भ; दुनू ज्ञान-केन्द्रित। मुदा निर्णायक भेद—ओडिपसक ज्ञान-खोज विनाशक ओर लेजाइत अछि; अष्टावक्रक ज्ञान-खोज मुक्ति आ प्रेमक ओर। एहि भेदमे भारतीय आशावादी नाट्य-दर्शन आ ग्रीक विडम्बनापूर्ण नाट्य-दर्शनक मूलभूत अंतर प्रकट होइत अछि।
३.३ बाख्तिन : ‘दूर भगनाइ’ आ ‘मिलन’क कार्निवालेस्क
बाख्तिनक ‘कार्निवालेस्क’ सिद्धांत एहि नाटकमे एक विशेष रंगमंचीय क्षणमे प्रकट होइत अछि—अष्टावक्रक दरबार-भेंट। द्वारपाल ‘कूबड़ महाराज’ कहि बाट देलकतहि; मुदा ओही ‘कूबड़’ व्यक्ति बाटक अधिकारक क़ानूनी-नैतिक तर्क दैत छथि। ई कार्निवालेस्क उलटफेर थिक—समाजक ‘निम्नतम’ (विकलांग) समझाओल व्यक्ति समाजक ‘उच्चतम’ (महाराज)केँ ज्ञान सिखाबैत अछि।
अष्टावक्रक वंदी-विजयक बाद समवेत-हँसी क्षण—“नीक भेलनि, बड़ अतत्तह करैत छलाह”—बाख्तिनक ‘रिलीविंग लाफ्टर’ (मुक्तिदायक हँसी) थिक। जे समाज विकलांग बालककेँ दरबारसँ बाहर करबाक प्रयास केलक, ओही समाज हुनकर विजयमे आनन्दित होइत अछि—कार्निवालेस्क सामाजिक-न्याय।
३.४ पीटर ब्रूक : ‘महाभारत’ आ पौराणिक रंगमंच
पीटर ब्रूकक ‘महाभारत’ (१९८५, रंगमंच + फिल्म) एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग थिक—महाभारतक विशाल आख्यानकेँ एक सार्वभौम मानवीय नाट्य-अनुभवमे परिणत करबाक प्रयास। ब्रूक एहि प्रक्रियामे पूरी तरह भारतीय नाट्य-परम्परासँ तत्त्व लेलनि, मुदा एहि परम्परामे बाहरसँ प्रवेश केलाह।
कुणाल ब्रूकसँ भिन्न—ओ एहि परम्पराक भीतरसँ लिखैत छथि। एहि नाटकमे महाभारतक ‘वन-पर्व’क अष्टावक्र-आख्यानकेँ मिथिला-केन्द्रित बनाएब (जनक = मिथिलाक राजा), वंदीक रहस्य-उद्घाटन (ओ वरुण-पुत्र छथि, जल ओकर घर)केँ एक हास्य-सह-अद्भुत दृश्यमे परिणत करनाइ—ई ब्रूकक ‘बाहरी पुनर्व्याख्या’सँ भिन्न एक ‘आन्तरिक पुनर्जीवन’ थिक।
४. चीनी नाट्य-सिद्धांत
४.१ 贬谪 (बियान-झे) : निर्वासित-प्रतिभाक परम्परा
चीनी साहित्य-परम्परामे ‘बियान-झे’ (贬谪, exile of talented official / प्रतिभावान-व्यक्तिक निर्वासन/अपमान) एक प्रमुख विषयवस्तु थिक। कवि कू-युआन (屈原, ३४०–२७८ ई.पू.) सँ ल’ क’ सु-डोंगपो (苏东坡, १०३७–1१०१) धरि—अनेक महान चीनी कवि-विद्वान अन्यायपूर्वक निर्वासित भेलाह, मुदा अपन प्रतिभासँ अमर भेलाह।
अष्टावक्रक जन्म-श्राप एक ‘बियान-झे’ थिक—ओ गर्भहि टासँ ‘निर्वासित’ छलाह (अपन ही शरीरसँ)। मुदा चीनी ‘बियान-झे’ परम्पराक जेकाँ हुनकर प्रतिभा ओहि निर्वासनकेँ एक ‘महाकाव्यात्मक यात्रा’मे बदलि दैत अछि। वंदी-विजयक बाद नदी-स्नानसँ यौवन—ई चीनी ‘बियान-झे-साहित्य’क अन्तिम मुक्ति-क्षणक समरूप थिक।
४.२ 忠 (झोंग) : निष्ठा आ एकान्त-साधना
कन्फ्यूशियाई नैतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘झोंग’ (忠, loyalty/faithfulness / निष्ठा) एक केन्द्रीय मूल्य थिक—एकरा प्रायः ‘शासक-प्रति-निष्ठा’ कहल जाइत अछि, मुदा मूल अर्थमे ई ‘अपन वचनक प्रति निष्ठा’ थिक।
वर्ष-भरक परीक्षामे दुनूक ‘झोंग’ परिलक्षित होइत अछि—अष्टावक्र वदन्यक शर्तक ‘अक्षरशः पालन’ करैत छथि (सुप्रभाक लग रहैतहुँ, जानि-बूझि देखैत-भागैत छथि); सुप्रभा पिताक इशाराकेँ गमि ल’ ‘सायास आश्रम सँ बहरेनाइ कम क’ दैत छथि’। दुनूक ‘झोंग’ भिन्न-भिन्न दिशामे थिक मुदा एकहि ‘अर्थ’ (प्रेमक प्रमाण) प्रकट करैत अछि।
४.३ 折子戏 (झेज़ीशी) आ नाटकक खंड-संरचना
चीनी ‘झेज़ीशी’ (折子戏, excerpt play)क परम्परा एहि नाटकक चौदह-दृश्यीय विस्तारकेँ बुझबामे सहायक अछि। एहि नाटकमे तीन स्वतंत्र ‘झेज़ीशी’ स्पष्टतः अछि—(क) वंदी-शास्त्रार्थ (जनक-दरबारक दृश्य—सम्पूर्णतः स्वायत्त नाट्य-खंड); (ख) वर्ष-परीक्षा (अष्टावक्र-सुप्रभाक एकांत-संघर्ष); (ग) उर्वशी-अस्वीकार। ई तीनू खंड स्वतंत्र ‘झेज़ीशी’ जेकाँ खेलल जा सकैत अछि मुदा एकहि संग मिलि क’ एक विराट ‘प्रेम-परीक्षा’ बनाबैत अछि।
४.४ 问答 (वेन-दा) : प्रश्न-उत्तर-दर्शन आ शास्त्रार्थ
चीनी दार्शनिक परम्परामे ‘वेन-दा’ (问答, question-answer dialogue) एक प्रमुख ज्ञान-विधि थिक—झुआंगज़ी (庄子)क संवाद, कन्फ्यूशियसक ‘एनालेक्ट्स’, आ झान बौद्धक कोआन। वंदी-शास्त्रार्थ एहि ‘वेन-दा’ परम्पराक एक नाट्य-संस्करण थिक। उद्घोषकक भाष्य—“शंका आ समाधान, खंडन आ मंडन, प्रश्न आ प्रतिप्रश्न”—यैह ‘वेन-दा’क संरचना थिक।
अष्टावक्रक वंदीसँ पहिल वार्तालाप चीनी झान-दर्शनक ‘कोआन’ (공안, paradoxical riddle) जेकाँ थिक—बंदी हँसैत छथि ‘कूबड़ बालकसँ शास्त्रार्थ’ पर, अष्टावक्र उत्तर दैत छथि—“वक्रोक्ति आ हास सँ कोनहु लाभ नहि, शास्त्रार्थक अपेक्षा अछि।” ई ‘वेन-दा’ परम्पराक मूल आत्मा थिक—प्रश्नक गाम्भीर्य हँसीकेँ अप्रासंगिक बना दैत अछि।
५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत
५.१ डिसेबिलिटी आ इजरायली रंगमंच : अष्टावक्रक शारीरिकता
इजरायलमे ‘डिसेबिलिटी थिएटर’ (Disability Theatre) एक महत्त्वपूर्ण समकालीन आन्दोलन थिक—‘इशुव नागेश’ (נגיש, accessible/inclusive) रंगमंच जे विकलांग कलाकारकेँ केन्द्रमे रखैत अछि। एहि परम्परामे शरीर एक ‘कमतरी’ नहि, एक ‘भिन्न क्षमता’ (different ability) थिक।
अष्टावक्रक नाट्य-प्रस्तुति एहि आन्दोलनसँ तीन दशक पूर्वक एक भारतीय-पौराणिक संस्करण थिक। ओ ‘आठ ठाम टेढ़’ शरीरकेँ न ‘छिपाबैत छथि, न ‘क्षमा माँगैत छथि—ओ कहैत छथि—“शरीर सँ आठ ठाम टेढ़ सेहो छी। परंतु बुद्धि के वयस आ रूप सँ संबंध नहि।” एहि एक वाक्यमे सम्पूर्ण ‘डिसेबिलिटी जस्टिस’ (disability justice)क दर्शन थिक।
५.२ एली रोज़िक : नदी-स्नान आ ‘रूपान्तरण-प्रतिमा’
एली रोज़िकक प्रतिमात्मकता-सिद्धांतमे ‘रूपान्तरण-प्रतिमा’ (transformation-icon) एक महत्त्वपूर्ण श्रेणी थिक—ओ क्षण जाहिमे रंगमंच पर एक पात्रक ‘छवि’ एकाएक बदलि जाइत अछि आ दर्शक एहि परिवर्तनक ‘साक्षी’ बनैत छथि।
नदी-स्नानक बाद अष्टावक्रक ‘सोझ आ स्वस्थ भ’ जाएब’ एक ऐसी ‘रूपान्तरण-प्रतिमा’ थिक जे रंगमंचमे अभिनयक माध्यमसँ दृश्यात्मक रूपमे प्रस्तुत होइत अछि। रोज़िकक परिप्रेक्ष्यमे एहि क्षणक दोहरा प्रतिमात्मकता अछि—(क) शारीरिक रूपान्तरण (टेढ़->सोझ) आ (ख) आत्मिक रूपान्तरण (पुत्र->ज्ञानी)। दर्शक दुनूकेँ एकहि संग देखैत अछि।
५.३ यहूदी तालमुद-परम्परा आ शास्त्रार्थ : वंदी-विजयक समानांतर
यहूदी धर्म-परम्परामे ‘तालमुद’ (Talmud) एक विशिष्ट शास्त्रार्थ-परम्परामे संकलित अछि—‘पिल्पुल’ (פלפול, pilpul / dialectical disputation) जाहिमे दू विद्वान एक विषयपर तर्क-प्रतितर्कसँ सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि। एहि परम्परामे कनिष्ठ वा असम्भावित विद्वानक विजय एक नाट्य-परम्परा थिक।
वंदी-शास्त्रार्थ ‘पिल्पुल’क एक हिन्दू-पौराणिक समानांतर थिक—एक अल्पवयस्क, विकलांग बालक (अष्टावक्र) एक ‘महापंडित’ (वंदी)केँ तर्क-प्रतितर्कसँ परास्त करैत अछि। जनकक मध्यस्थता पिल्पुलक ‘बेत-दिन’ (בית דין, house of judgment / न्याय-मण्डली)क समरूप थिक।
५.४ इजरायली ‘होप थिएटर’ : प्रेमक परीक्षामे आशावाद
इजरायली रंगमंच-विद्वान नाओमी लापिद (Naomi Lapid) जेकाँ विचारक लोकनि एक विशेष धारा रेखांकित कएलनि—‘होप थिएटर’ (Theatre of Hope) जाहिमे विपरीत परिस्थितिमे सेहो आशाक अटूट धागा बनल रहैत अछि। ई ‘होप’ नैव, सरल आशावाद नहि—ओ एक ‘परीक्षित आशा’ थिक।
एहि नाटकक समापन-दोहा—“जहिना स्वर्ण मे आगि सँ आबए आर निखार / प्रेम, परीक्षा दैत अछि, तेँ होइछ आर प्रगाढ़”—इजरायली ‘होप थिएटर’क आत्मिक घोषणा थिक। सम्पूर्ण संग्रहक अंतिम वाक्य—“प्रेम सँ बढ़िक’ भाव ने दोसर, महिमा अपरंपार / आउ करी सब मिलि एक स्वर सँ, प्रेमक जय-जयकार!”—सप्तम नाटकक नहि, समग्र संग्रहक जय-घोषणा थिक।
६. चतुर्भुज-संश्लेषण : ‘परीक्षा’ किएक अनिवार्य थिक?
चारू नाट्य-परम्पराकेँ एकठाम राखि देखल जाए तँ एहि नाटकक (आ समग्र संग्रहक) केन्द्रीय प्रश्नक उत्तर भेटैत अछि—‘परीक्षा’ प्रेमकेँ ‘प्रमाणित’ नहि करैत, ओकरा ‘परिपक्व’ करैत अछि।
भारतीय दृष्टि—विकलांग नायककेँ केन्द्रमे आनबाक नाट्यशास्त्रीय साहस; सप्त-रस-महोत्सव; अग्नि-परीक्षाक शीत-परीक्षामे रूपान्तरण; उर्वशी-अस्वीकार = अप्सरा-परम्पराक विखण्डन।
पाश्चात्य दृष्टि—फ्रैंकलक लोगोथेरापी (पीड़ामे अर्थ); ओडिपस-साम्य आ भेद (विनाश बनाम मुक्ति); बाख्तिनक कार्निवालेस्क (कूबड़ बालक -> दरबार-विजेता); ब्रूकक बाहरी बनाम कुणालक आन्तरिक पुनर्जीवन।
चीनी दृष्टि—贬谪 (बियान-झे / निर्वासित-प्रतिभा) परम्परा; 忠 (झोंग / निष्ठा) = दुनूक वर्ष-परीक्षा; 折子戏 (झेज़ीशी) त्रि-खंड; 问答 (वेन-दा / झान-शास्त्रार्थ) = वंदी-विजय।
इजरायली दृष्टि—डिसेबिलिटी जस्टिस (‘बुद्धि के वयस आ रूप सँ संबंध नहि’); रोज़िकक रूपान्तरण-प्रतिमा (नदी-स्नान); तालमुदिक पिल्पुल = वंदी-शास्त्रार्थ; होप थिएटर = समापन-दोहाक आशा-घोषणा।
चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—प्रेमक ‘परीक्षा’ एक बाह्य-थोपल यातना नहि, एक अन्तर-उत्पन्न ‘निखार’ थिक। जहिना अग्नि सोनकेँ नष्ट नहि, शुद्ध करैत अछि—तहिना वर्ष-भरक विरह-एकांत प्रेमकेँ नष्ट नहि, ‘प्रगाढ़’ करैत अछि। एहि अंतिम नाटकमे कुणाल समग्र संग्रहक वैचारिक धुरीकेँ—‘प्रेम सत्य छै’—एक बेर अंतिम रूपसँ घोषित करैत छथि।
७. संग्रह-समाहार : सातो नाटकक वैचारिक एकता
सातो नाटकक चतुर्भुज-समीक्षाक उपरांत, एक समग्र दृष्टिसँ देखला पर, ‘कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक’ एक सुसंगठित वैचारिक यात्रा थिक।
लोकनाट्य-त्रयीक वैचारिक क्रम : ‘चालिस चोर’ (बुद्धि) -- ‘बिदापत’ (काव्य-अमरता) -- ‘कुसमा-सलहेस’ (प्रेम-लोक-सेवा) : एक नैतिक-दार्शनिक चाप।
प्रेम-चतुष्टयक वैचारिक क्रम : श्रुवावती (आत्मबल) -- सुकन्या (विश्वास) -- श्वेता (प्रेमक विस्तार) -- सुप्रभा (प्रेमक परीक्षा-परिपक्वता) : एक दार्शनिक विकास-क्रम।
समग्र संग्रहकेँ जोड़’वला धागा थिक समापन-टेक—“प्रेम सत्य छै, प्रेम छै सौरभ, प्रेमक भाव चिरंतन / बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन”—जे ‘कुसमा-सलहेस’ (तृतीय)क समापन-गीतसँ ‘श्वेताक आविष्कार’ (षष्ठ)क आत्म-घोषणा धरि प्रतिध्वनित होइत अछि। कुणालक समग्र नाट्य-कर्मक घोषणापत्र थिक—‘प्रेम सर्वोच्च मानव-मूल्य थिक।’ एहि मूल्यकेँ लोक-परम्परा, शास्त्र-परम्परा, आ स्वतंत्र-कल्पना—तीनू माध्यमसँ, चारू नाट्य-सभ्यताक कसौटी पर खरा उतरि, सिद्ध करनाइ—यैह एहि संग्रहक अवदान थिक।
॥ सप्तम आ अंतिम नाटकक समीक्षा समाप्त ॥
कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला (नाटक १–7) · सम्पूर्ण
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
विदेहमे सभठाम ताकू / Search all Videha
Static full-text search · Pagefindलेखक/शीर्षक/अंक/वर्ष — खोज-विधा। गद्य/पद्य/शोध current/static + पुरान Videha/Sadeha contents खोजैत अछि। पोथी pothi.htm केर पूर्ण listing, श्रव्य-दृश्य Audio_Video.htm केर पूर्ण listing, पञ्जी videha-sadeha/panji-shards GitHub data, आ थेसारस/शब्दकोश videha-ejournal.github.io/data GitHub JSON corpus केँ query करैत अछि आ दूनू Quiz corpus मे dictionary/vocabulary/शब्दार्थ-सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी परिणाम सेहो जोड़ैत अछि। Quiz videha-quiz आ GitHub user-site दूनू bilingual quiz corpus खोजैत अछि। Roman/IAST + देवनागरी cross-script search समर्थित। Issue/Year लेल संख्या दिअ। PDF-अभिलेख archive.org/VidehaAndSadeha सूची खोजैत अछि।