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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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लालदेव कामत

पोथी' चर्चा; मोनक देहरिपर / पोथी चर्चा - संयोग / पुत्रक - पत्र मायके नामे

१

पोथी' चर्चा; मोनक देहरिपर
ई पोथी मैथिली कविता नहिं, मैथिली भाषा मेँ 'गजल' थीकैक। पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ २०२० ई० मे प्रकाशित एहि पोथी केँ फेरसँ मुद्रण सन् २०२५ मे मानव आर्ट ( पल्लवी प्रकाशन) छापलक, जे गजलकार श्री प्रदीप पुष्प जी अपन मैयाँ - बाबा जीकेँ समर्पण कयलाह अछि। १०३ पृष्ठक' पोथीक दाम २९० टाका भारू तय छै ,जाहि केँ ISBN. ९७८-९३-८८८११- ५२-१ भेटल छैक। ग़ज़ल विशेषज्ञ आशिष अनचिन्हार जी मतला आ बहरके संदर्भ बताबैत पोथीक विस्तृत चित्रण 'गजल पुष्प 'नामे आमुख लिखने छथि। प्रदीप जी स्वयं 'अपन किछु बात' शिर्षक सँ पाठक बीच एहिक निर्माण बावत सविस्तार आभार संग लिखने छथि। पोथी हमरा पढ़ल रहय ,फेरो सँ मनोयोग पूर्वक पढलहुँ अछि। पाठ सं० १ सन् ८० केर अतिरिक्त जे सुधि पाठककेँ
दृष्टिपात होयत से एहि तरहक पाँति अछि -:
(१)
गुदगुदौने जे रहियौ, की नहिं मोन छौ?
हम हँसौने जे रहियौ , की नहिं मोन छौ?
हँ, सुखक क्षण हेतौ सत्ते बिसरा गेल ,
हम कनौने जे रहियौ, की नहि मोन छौ?

(२)
छौ कोन बाट ने आइयो तोहर बाट तकैत
छौ कोन फुल ने एखनो तोहर मुस्की सिखैत
केहेन निठूर छें तों बदरीमे चान भेल
कलम उगलि देत खून पाँती लिखैत लिखैत

(३)
तोरा हमरा सँ पियार नइ , गप्प ई सत्ते ।
कहियो कोनो सरोकार नइ, गप्प ई सत्ते।
मुदा जिनगीक बाट पर कहियो भेटबें ।
तँ लगबें अनचिन्हार नइ , गप्प ई सत्ते।

प्रदीप जीक पाँति रचना'क हम कायल छी,हिनक अद्भूत प्रेरणा सँ भरल ग़ज़ल कोनू जोड़ी लेल आकर्षण बढ़ौने अछि। तेँ पोथी विशेष रूपेँ नायक - नायिका केर प्रेमकेँ सम्बल प्रदान करैछ। धकजरी विद्यालयके अध्यापक आ कविजी एक कविता संग्रह (मैथिली पोथी) सँ साहित्य सृजनमे सहयोग बनेलनि अछि। हम बधाय दैत छीयैन!

३
पोथी चर्चा - संयोग

श्रीयुत् उदय शंकर झा जी कृत नव मैथिली भाषा मेँ सद्यप्रकाशित सामाजिक उपन्यास 'संयोग' नवारम्भ प्रकाशन सँ बहरायल हेन। ऐ पोथीमे १०३ गोट पृष्ठ छै,जकर दाम दू सय टाका भारु य। एहि पोथी केँ आई एस बी एन ९७८- ९३- ४९८६७- ९२-५ नं० भेटलैक हय। एहि उपन्यास केँ अपन पिताजी स्व० रविन्द्र नाथ झाकेँ समर्पित कयने छथि।मुख्यत: स्त्री पात्रमे प्रिया, कामनी आओर शुभेश्वरी छै। आरो आह्लादित सम्बोधन जे सर्वनाममे कनियाँ कुमरि,राधा कुमरि,श्यामा कुमरि सँ वाक्य निर्माणमे उपमा उपमेय अलंकारक काज करैछ। पुरुख पात्रमे , यथा -: खुबा, शिबन बाबू , जीतन बाबू , मधुकर बाबु, मदन मामा, विनय , विनोद , रामचन्द्र बाबु, मखना डाकदर, विजन भाय, भोजवाला,लखन सावके मिठाई दोकान, खबाश,बहिकरबा, भूवन बाबू , विवेक , श्याम नारायण, शिव बाबु, मनन, कमतिया खेती, कथानक केँ घोनगर कऽ देने य। दोती बाल- बच्चेदार वर ले घटक आगमन सँ कथा प्रशन्नता सँ आरंभ होईछ। तहिना कथाक अन्त हृदयविदारक परिघटना भौजी'क आकस्मिक निधनके कारण दुखान्त भावमे होईछ। से इयह कोनू उपन्यासक लक्षण कहल गेल छैक।जौं कथा आरम्भ दुखित भावे होय तँ अन्त उपन्यासमे सुखद भावे देखाओल जाइत अछि। पाठक ऐ पोथी मे पढब जे तीन मासक छौड़ीके माय मरि जाई छै,आ ओ ढेड़बा वयक्रममे बियाहल जाई य एकटा एहन वर सँ जे बालपनमे मयटुअर भेल रहय। ऐ पोथीमे से अनेकों ठाम संयोगे - संयोग प्रसंग आयल छैक। पोथी हमरा पढ़ल अछि,ई बढ़ मनलगू अछि।


४
पुत्रक - पत्र मायके नामे

अंग्रेज जेलर धरि ओहि चिट्ठी केँ पढ़ि कऽ कानि उठलाह ,जे सुखदेव अपन फाँसी सँ एक राति पहिने अपन माय केँ लिखने छलाह ।

लाहौर जेल, 23 मार्च, 1931.
एक अन्हार राति।

दोसर दिन भोरे तीन टा सिंह-भगत सिंह, राजगुरु, आ सुखदेव- केँ फाँसी देबाक रहैय। जहलक देबाल काँपि रहल छल, तइयो तीनू गोटे अपन बैरकमे खुशी-खुशी "इन्क्विलाब जिन्दाबाद"नारा गाबि रहल छलाह |

ओही राति सुखदेव अपन अंतिम पत्र अपन ममतामई माय केँ लिखलनि । ई कोनो चिट्ठी नहि छल, धधकलआगिसन छल –
"हमर प्रिय माँ!"

हमर देह जखन अहाँक आँगनमे पहुँच जायत, तखन अहाँ अपन आँखिमे एको ठोप नोर नहि देखाय दियौक। ओ नोर पोछि लियौक, कारण ई हमर शहादतक अपमान होयत।

मोहल्ला टोलाके सब आई- मायकेँ सूचित कs शुभ गीत गाबय लेल कहबनि। सजि-धजि कऽ आऊ माँ... किएक तँ अहाँक क्रान्तिकारी बेटा आब साधारण नहि अछि।

 

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