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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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लालदेव कामत

'आँचर तर'के पोथीमे सामाजिक संदेश

आँचर तर सँ तात्पर्य अछि स्त्री वर्गक अँचरा जे पहिरल नुआँ सँ झांपनके प्रतिक रूपेँ मुख्य काज करैछ। एहि उपन्यास'क नामकरणके पाँछा उपन्यासकारक ध्येय छन्हि, पुरुष तँ अपन छाती झांपय ले आँचर जनिजात जेकाँ परिधानमे नहिं करैत छैक, आ महिला वर्ग तत्काल महत्वपूर्ण वस्तु आंचर तरमे नुकाकेँ रखैत अछि। से मानहानि सँ बचय लेल किछु विषय वस्तुक गप्प सेहो आंचरे तर समेटने रहैछ। एहि उपन्यास'क केन्द्रीय पात्र मसोमात चानदायके जीवनक घटनाक्रमके उल्लेखमे प्रमुख कथानकके सँग - सँग तहियाएल आरो उपकथा सब जुटैत बढ़ सोहनगर पाठककेँ लागैत छैक। नवारम्भ प्रकाशन सँ सद्यप्रकाशित मैथिलीमे साहित्यक ८० पृष्टक पोथी जकर दाम २०० टाका छैक, आ आईएसबीएन ९७८-८१-९४३०५२- ६-२ य; २०२६ ई० म मधुबनी सँ बहराएल हेन। एहि सामाजिक उपन्यासक लेखक ७६ वर्षीय श्री उदय शंकर झा अपन एहि कृतिकेँ माय स्व० अनन्त कला देवीजीकेँ समर्पण कयने छथि। 'आँचर तर' के परोछ तथ्यकेँ कियो - कियो उघार कय ,सकल - समाजक समक्ष रखैत अछि, ताहिमे उपन्यासकार वयोवृद्ध श्री झाजी सेहो एहि माध्यम सँ समाज सुधारक लेल अपन कालजयी रचना समक्ष आनलनि हेन। हिनक उपन्यास विधामे 'संयोग' आ पतीत क' संगहि नैका पोथी 'आँचर तर' एक समाज शास्त्रीय विश्लेषणके दस्तावेज छी।
एहि उपन्यास'क पुरुष पात्रमे फगुनियाँ, मौली, पंडित काका, मुन्ना बाबू, नरेन, भानू, बिनोद, श्याम प्रसाद, बुधना, भतुआ, मंगला, हरिनन्दन बाबू, आ प्रेम बाबू गमैया नाम उल्लेखित छैक। तहिना संवंधक सम्बोधनक अतिरिक्त नाम स्त्री पात्रमे विधवा कनियाँ- चानदाई, तरिया उर्फ तारा, वृन्दा केर भूमिका झलैक उठैत छैक। उपन्यासके रोचकताकेँ निम्न चर्चित गीत, लोकोक्ति आ फकरा आकर्षित कयने रहैत छैक,यथा -:
"मोहि लेलकै हमरो मनवाँ पहुनमा राघो।"

"पहिले पहिले हम गवनाकेँ छल्ली है,से लगली ब्रह्मबाबा केँ रे गोड़।"

"बुलकी बाली गे,साधू बाबा हो! हम रूपैया देबौ, हम तँ नहिये लेबौ।"

" बौआके मामी हजमा तोरे देबौ रे, रे मौसी तोरे देबौ रे ।"

बिधनाक लिखल मेंटल नै जाई ।"

जै जै भैरवी…......…… पशुपति भामिनी माया।"

प्रथमत: सामाजिक सांस्कृतिके रुपमे वियाह - बराती'क सुआगत सँ आ नाच गान स्टेज(मँच) लेल चौकिक ओरियाउन, ओकरा पौआमे बाँसक सौंगर नापिके लगौनाई ,उपनायनके आयोजनमे मातृक पक्षक सम्पूर्ण सहयोग आ एकनाच पार्टीक ओस्ताज मौली मंडल ओहिठामक पंचैती, एकटा दोसर पंचैतीमे स्व० मित्रके पत्नी'क हक- हिस्सा अधिकार लेल बैसारी आदि सँ ग्रामीण अंचलके जीवनक दृश्य जीवन्त भऽ उठैत छैक।
एहि पोथीमे मिथिला'क लोक जीवनमे केहन - केहेन प्रथा अपनाएल जाईत रहैत छैक,तकर समाबेशी अध्ययन होईछ। ग्रामीण बुझारतमे सामूहिक निर्णयानुसार सब जमीन भैंसुरे राखत, अन्न आ घर - ओसाराक' बंटवारा होईछ। डिबिया आ दीप बरैत घर - घर अन्हरिया रातिमे ८ वजे विरान रस्ते मौली - चानदाय लग पहुंच कय साटा पर गेलहा जगहके खेरहा जे दू फरीक'क बीचमे खुनी संघर्षक २ टा लहास खसल बाला वृतांत सुनाबैछ। जगह जमीनक आफत बताकय एक तरहेँ साकांक्ष करैछ। प्रेममे पड़ल गाम छोड़ि पलायन सँ पूर्व चान मसोमात सँ जमीन बेचबाकय कैँचा हथिया सकैत रहय मौली, ता नव जीवन आरंभमे टाका पाई सँ दूओ प्राणी मजगूत रहैत! से अनैतिक संवंधक नैतिक विचार अक्षुण्ण राखैत य।
मिथिलांचलमे अमीर लोककेँ मातबर कोनू- कोनू गाममे एखनो कहल जाईछ। जहिया सँ धानक खेती अधिक भेल, ओकर उपजेनहार विशेषज्ञ केँ धानुक कहल गेल। आ वेसी धान उत्पादक केर स्त्रीकेँ धनुकाईन एक नव नाम सँ आह्लादित होय। ब्राह्मणकेँ दानमे जे जमीन भेटनि तँ ओ हर- बरद ,कोदारि नहिं चलाबैत; खेती धानुक अमात केवट सँ कराबथि। कालान्तरमे धनुषधारी पुरूष ब्राह्मणक स्त्रीगणक घरेलू सेवार्थ लागि गेलैक। से एहि पुस्तककेँ लालित्य ओ प्राणवान बनौने छैक। तेँ अधिक धान उबजेनहार सफल किसानकेँ धनिक कहल गेल ,जे मातवर शव्दक स्थान लेने अछि। तीन - चारि जातिक मुख्यत: नौआ, बरही, चिरौठ - मघैया (धानुक) आदि केँ ब्राह्मण समाजक नजदिकी कहल गेल छैक। परोक्ष रूपेँ अदौ सँ लालित्य संवंध कमोवेश चलि आबि रहल छै, तकर जीवन्त वर्णन एहि सामाजिक उपन्यासमे पाठककेँ भेटैत छन्हि। पूर्वमे शिक्षण लेल ग्राम शालामे ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ'क धीयापुता केँ पढ़ैक गुरूकुल बनि गेल रहय। वालिकाकेँ साक्षरता सँ अधिक शिक्षित नहिं कयल जाईक। रटन्त विद्या संस्कृत श्लोक सोल्हकन - बहिकरणीक बाल बच्चा ठाढ़ भऽ पाठ सुनि मनन करय, पढुआ गुण हेबाक कारणेँ पूर्णियाँ'क ब्राह्मणक समकक्ष बुध्दिमान बनि जाए। पंजीप्रथा'क विकास भेलासन्ता किछु गोत्र - मूलक लोककेँ ऊँच्च - नीच भावके स्तरीयता बनाओल गेल रहैक। से तकर दुष्परिणाम १२ वरखक धियाके ७५ वरखक बूढ़ा सँ बियाहैत कूलशील पैघौतक चर्चा बढल रहैन। से तेहेन हश्र होय जे हाथ मलैत जीवन पर्यन्त विधबा बेटी'क हालत पर नोर बहबैत रहल छलैक। ई उपन्यास एक तरहेँ तत्कालीन समाजक नव इतिहास कहल जयबामे कोनू अतिश्योक्ति नँय। सामाजिक दशा पर प्रो० हरिमोहन बाबू अपन हास्य कथा माध्यमे जे रचना कयलनि आ मुंशी प्रेमचंद साहित्यक माध्यम दशा - दिशा देखेलनि ,से वर्वरताक शिकार भेल रहथि। श्री उदय शंकर झा जी सेहो अपन लेखनी सँ समाजिक उपहास सहय लेल आगू पटल पर अयलाह ,मुदा रचना पुरान भेलापर आब एहन अनेक उदाहरण गामे गाममे पसरि गेल छैक। समालोचक कुमार विक्रमादित्य ऐ पोथी मादे कहैत छथि "सर्वाधिक प्रभावशाली पक्ष विधबा स्त्रीक सामाजिक स्थितिक चित्रण भेल छै।"
पुरान- धुरान लिखल कथा (पाण्डुलिपी) परता पड़ल रहनि,से नव पोथी प्रकाशित कयला पर आब देहातोक गामघरक रुप रंग परिवर्तित भेल अछि। कथाक खलनायक मौली धानुक जाति सँ छै ,तँ नायिका चानदाय नि: संतान वालविधवा ब्राह्मणी थीकिह। दूनू गोटेयके युवा देहकेँ एक दोसरक आवश्यकता आ समाजमे आबय बाला समयके झलक एहि उपन्यासमे पाठक केँ भेटैछ। अनैतिक समधकेँ सामाजीक मान्यता नहिं भेटबाक अंदेशामे रातिमे दूनू अपना डीह पर सँ पलायन करैत अन्तय जीवन गुजर - बसर लेल चलि जाईछ। नींनक सुतल आ गामसँ पराएल केर की कहब! पाठककेँ आगूक हाल स्वयं सोचय लेल उपन्यासकार छोड़ि देलनि अछि।
से चानदायके भैंसुर गौंआँक समर्थन सँ विधवा कनियाँ 'क अवासीय गृहीकेँ ध्वस्त करैत जगह जमीन हरपबामे समर्थ होय छथि। कथानक केर पुष्टि लेल अनेकों अन्त:कथा घोंसियेबाक काज भेल अछि, जाहि सँ उपन्यासक आंचलिक रोचकता बढ़ि गेल छैक। एहने 'लाईट स्टोरी ' आजुक युवा पिढ़ि पढ़ि बोरियत नहिं होयत। तेँ ई कानेकान बहुचर्चित भेल उपन्यास रेलवे टीशनक बुक स्टाल पर सँ छुहक्का उड़ि रहलैक हेन।
६०-७० गोट बरियातीके लेल पुरनीपात - केरापातक ओरियाउन ,दू नाच पार्टी लेल ईजोतक हेतु १० टा पेट्रोमेक्स लाईटक इन्तजाममे मटियातेल ,मेंटल सलाई आ बारै बाला - मुन्ना बाबूके बजाहट सँ फणिश्वरनाथ रेणुजी'क 'पँचलाईट' अन्त:कथा रूपेँ मानस पटल पर पढ़ाकू पाठककेँ रोमांचित कऽ उठैत छैक।
छोट - छोट लघुकथा रूपेँ सेहो अनेकों उपकथा एहिमे समाएल छैक‌ ,जे उपन्यासक भाव भंगिमा केँ कसने रहैत छैक। यथा-:
भानपुर गामक भलमानुष ब्राह्मणक घरमे ओम्हर आगि लागल लोक घैलक जल सँ लफरि - लफरि मिझबैत आ घरबारी पान माँगि पनखौक सँ खायमे लागल प्रसंगक चर्चा, कलाकार मौली साटा पर सँ आबि अपने चाँनोकेँ एकान्तमे सुनबैत छै। तरूणी कन्याकेँ वेबर्दास्त कारणेँ यौन संबंधक लेल एम्हर - ओम्हर भटकय आ तइयो वृधपति नहिं आबैन वा मृत्यु भऽ जाए तँ कन्याकेँ गर्भ ठहरला सँ घरवारी विशेष जूईत अपनाबैथ। रातिमे कय तरहक व्यंजन बना ,रस्ताकातमे केरा पातक खंड सहित सिध्द अन्न, तरुआ - बरूआ,भुजूवा आ पापड़,दनौरी - तिसयौरी चिप्स, पेराकातमे छीटल; प्राते सँ सस्ता प्रचार कय लेथि जे बरू ओझाजी रातिये आयल रहथि आ अनरोखे चलि गेलाह। से जनमल शिशु भगिनमान बनि डीहीकेँ काजमे बढ़ि-चढ़ि हिस्सा लैक। भगिनमान नोतिहारी मिथिलामे बढ़ दियेमान धरम मानल जाई छै। भतुआ सरबेटाक जनेऊ पूजा मेँ सासुरमे सरहोजिके सोनाक अशर्फी टकछर पाबि रातिये राति चल आयल आ फेर कहियो सुसुराईर नँय गेल। मैयाँक बेटी वृन्दा दिदिक ४५ वर्षीय बेटा मातृकमे आब रहिते छैक। ओ पुश्तैनी बपहरक डीह डाबर धरि हिस्सा अनुसारे बेचनामा कय आयल छै। चनियांके बालसंगी कानैत भेटला सन् ओकर बियौहति गप्प अपन माय सँ जानि दुःख होय छैन। सखीके भायक कालेजक संगी हम केर ठाकुर जी सँ पकरुआ वियाह भेल रहैक,ओ जाति सँ ब्रहृमण नहिं रहैक। से नवोदित दूल्हा नाई समाजक पौनीपसारिन कूलक बेटाक बढ़ दुर्गति कयल गेलैक। मुदा विध अनुसारे आब पति- पत्नी तँ बनिये गेल रहैक। एतय सिंथक' सेनूरक महौत अक्षुण्ण राखल देखेबामे उपन्यासकार समर्थ भेलाह अछि। बुधनक बेटी तिरियाके ५ साल बादो गौना (द्विरागमन) -दिन नँय भेला सँ दोसर एक वर खोजि पुनर्विवाह कराओल जाईछ! जँ पहिलका कुटुम्ब अपन बेटाक मादे जहलके बात बुझा देने रहितैक तँ संभव छलै ओ अपना बेटी'क ६ मास ले वियाह खातीर नहिं अगुताबैत। आखिर पूर्व स्वामी संग अपना दाम्पत्य जीवन केँ स्थापित करबामे सामाजिक सरोकार एतय मजगूत सँ देखाएल गेलैक हेन।
उपन्यासक सौन्दर्य सासित्यिकी जे भाषा शव्द शैली चयन कयल गेल छैक से अद्भुत प्रशंसनीय छैक। पाठक लेल पृष्ठ सँ० ७९ सँ उद्धृत प्रसंग एहि तरहेँ अछि-:
"चलू" घर सँ संगहि निकलि गेलीह। भिनसरे करीब दस बजे जेठकी देयादनी उठबैज्ञलेल गेलीह, "कनियाँ ! कनियां!! एखन तक सुतले छिऐ?" कतेक काल धरि कनियां - कनियां करैत रहलीह। घरमे केओ रहै तखन ने! घरक फटककेँ हटाकऽ देखलनि तऽ घरमे तऽ केयो नहिं। भऽ सकैए कलम- गाछी दिश निवृत होई लेल गेल हेतीह। करीब दूई घंटा तक देखैत - देखैत अपना घरबलाकेँ कहलनि, "यौ कनियाँ घरमे नहिं छथि।" आब खोजबीन होमय लागल। ओम्हर पता लगाओल गेल ,मौली सेहो घर पर नहिं अछि। गामक लोककेँ बुझैमे देरी ...........
 

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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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