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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर

रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व आरो ओकर सीमा-रेखा — एगो संपादकीय पुनरवलोकन (ठेठी-अंगिका मैथिली)

जे आदमी एहि ग्रन्थ के गुन बुझै लायक नै छै, ओकर प्रशंसा सें हम खुश नै होब। अन्हरा सिनी के झुंड जों कोय चित्र के प्रशंसा करै, तें चित्रकार के गौरव कइसे बढ़तै? लोग एहि ग्रन्थ के दोष देखाबै भर आलोचना करै। ज्ञानी लोग अनजान में कैलों अपन तथ्यगत भूल दिसाय ध्यान खींचलों जाए सें निस्चय खुश होय छै। — [आत्मतत्त्वविवेक ग्रन्थ के आलोचना सम्बन्धी अन्तिम वचन — उदयनाचार्य]

 

एहि विशेषांक लेली आएल रचना — परिचय वाला आलेख सें लैकें दू गो लम्बा पुस्तक-समीक्षा ('अखियासल' आरो 'हिआओल' पर), साक्षात्कार, संस्मरण आरो मूल्यांकन वाला निबन्ध तक — एक ठाम राखी कें पढ़ला के बाद एगो बात साफ होय छै : रमण जी के मैथिली साहित्य में जे स्थान छै, से बिन-विवाद छै; मतरकि एहि विशेषांक के सार्थकता तबेंही पूरा होतै जबें प्रशंसा के संग-संग ऊ सीमा भी चिन्हलों जाय, जे योगदानकर्ता सिनी अपने, आरो रमण जी के अपन आलोचना-पद्धति के भीतरे सें, बार-बार रेखांकित करैछै। नीचे वहै सब्भे सीमा के चार खण्ड में एक ठाम रखलों जाय छै — पहिलों, समालोचना-पद्धति के सीमा (मुख्य रूप सें 'अखियासल' पर समीक्षा सें); दोसरका, 'हिआओल' पर अध्यायवार समीक्षा सें; तेसरका, व्यक्तित्व-कृतित्व आरो संस्थागत मूल्यांकन सें जुड़लों सीमा; आरो चौथका, संपादकीय-शैली आरो पाठक के असहमति सें जुड़लों बिन्दु।

पहिलों खण्ड : 'अखियासल' आरो समालोचना-पद्धति के मौलिक सीमा

'अखियासल' (1995) पर आएल विस्तृत समीक्षा (रचना ४) एहि सतरहो में सबसें बेसी सुघरल ढाँचा वाला आरो कड़ा समीक्षा छै। एहि समीक्षा के पछिलका हिस्सा पूरा तौर पर 'अखियासल' के सीमा, कमजोरी आरो पद्धति-संकट के समर्पित छै, आरो ओहिजा आठ गो "सीमा" सिलसिलेवार गिनलों गेलै छै।

(क) पाठ बिना समीक्षा

सबसें गंभीर सीमा ई छै कि लगभग हरेक सुरुआती निबन्ध में समीक्षक अपने मूल रचना के 'अनुपलब्धता' मानी लैछै। 'चन्द्रप्रभा' के परसंग में अपने लिखलों गेलै छै — "चन्द्रप्रभा के अध्ययन-विश्लेषण बढ़िया ढंग सें नै होय सकलै, एकर मुख्य कारण छै अनुपलब्धता"; त्रिलोचन झा के परसंग में — "बहुत कम सामग्री उपलब्ध छै"; यदुवर के परसंग में — "यदुवर के परसंग में अखनी तक बहुत कम सोध भेलै छै"; बिसरल जनार्दन झा के परसंग में — "पत्र-पत्रिका में जे रचना छपलों होतै, अब सबके लेली सहज उपलब्ध नै छै।" एहिजा एगो गहरा विरोधाभास उभरैछै — जों मूल कृति समीक्षक के अपने नै मिललों छेलै, तें ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यांकन कोन आधार पर सम्भव भेलै? बहुतो ठाम समीक्षा असल में दोसरका स्रोत पर — जयकान्त मिश्र के मैथिली साहित्य-इतिहास, करुणाकान्त झा के सोध-प्रबन्ध, दोसरका समीक्षक के उद्धरण पर — टिक जाय छै। पाठ-केन्द्रित समीक्षा के नजर सें ई एगो मौलिक कमजोरी छै — पाठ बिना समीक्षा।

(ख) मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता आरो भीतरी अन्तर्विरोध

रमानन्द झा एगो निबन्ध में जे गुन के सबसें ऊँचा मानैछै, दोसरका में ओकरे उलटा बात के प्रशंसा करैछै। गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र, ललित आरो धीरेन्द्र के विवेचन में समसामयिक यथार्थ-बोध, परिवेश सें जुड़ाव आरो युग-जीवन के झलक के सबसें ऊँचा मूल्य मानलों गेलै छै; मतरकि व्यास के कथा के ठीक एहि कारणें प्रशंसित कैलों गेलै कि ऊ समसामयिक जिनगी सें खास प्रभावित नै होय छै आरो बदललों युग-जीवन के बिगाड़ सें अप्रभावित रहैछै। ई सोझा आत्मविरोध छै — यथार्थ सें जुड़ाव कभी गुन, कभी ओकर अभाव गुन। ओइसने, हरिमोहन झा के हास्य के "विचार के उन्मेष नै करब" के कारणें कम मूल्य देलों गेलै, मतरकि मधुप के गीत के "तुरते हृदय-प्रभाव" आरो आनन्द के कारणें ऊँचा मूल्य देलों गेलै — जबकि गीत भी अकसर वैचारिक मन्थन पर नै, बल्कि भाव के तुरत असर पर टिकैछै। 'कोबर-गीत' जइसन अपने-सें-विरोधी, प्रयोजन सें प्रेरित रचना के "व्यक्ति सें बड़का समाज" के तर्क सें ठीक ठहरायलों गेलै, मतरकि क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार के नजर सें आत्मा के प्रतिकूल रचना भाव-औचित्य के मूल भंग छै — समीक्षक एहिजा सैद्धान्तिक साफगोई नै दै पाबैछै। ई अस्थिरता एहि कारणें छै कि रमानन्द झा कोय एगो घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नै अपनाबैछै — ऊ परसंग के हिसाब सें कभी प्रभाववादी, कभी समाजशास्त्रीय, कभी जीवनीमूलक, कभी रूपवादी नजर अपनाबैछै। ई पद्धति वाला सार-संग्रहवाद एक ओर लचक दैछै, तें दोसर ओर मूल्यांकन के अनुमान सें बाहर आरो बेमेल बना दैछै।

(ग) सैद्धान्तिक सबदावली के अनुपस्थिति

हालाँकि रमानन्द झा के समीक्षा में रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्र के धारणा भीतर छिपलों रूप सें मौजूद छै, तइयो ऊ एहि शास्त्रीय प्रतिमान के कहीं साफ सैद्धान्तिक औजार के रूप में परयोग नै करैछै। "व्यञ्जित", "सम्प्रेषण", "भावाश्रित" जइसन सबद तें आबैछै, मतरकि आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्य के नाम आरो हुनकर सिद्धान्त के सिलसिलेवार परयोग नै मिलैछै। पाश्चात्य सिद्धान्त के भी कहीं नामोल्लेख चाहे सोची-विचारी के परयोग नै मिलैछै। एहिसें एगो दुहरा हालत उभरैछै — एक ओर ई सैद्धान्तिक हलकापन समीक्षा के सहज पढ़ै लायक आरो पत्रकारीय-सुलभ बनाबैछै, मतरकि दोसर ओर अकादमिक गहराई के कमी पैदा करैछै। समीक्षा वर्णन वाला आरो मूल्यांकन वाला तें छै, मतरकि सैद्धान्तिक-विश्लेषण वाला कम छै।

(घ) नजरिया के संकीर्णता — पुरुष-केन्द्रिकता आरो वर्ण-केन्द्रिकता

पचीस निबन्ध में चौबीस पुरुष-रचनाकार पर छै; खाली एगो — हरिलता — स्त्री-रचनाकार पर। ओकरा में भी हरिलता के विवेचन मुख्य रूप सें वैष्णव भक्ति तक सीमित रही जाय छै, ओकर समाजी-आलोचनात्मक सम्भावना — बाल-विवाह, विधवापन आरो स्त्री-शिक्षा के मनाही के खिलाफ चोरी-छिपे अक्षर सीखै के संघर्ष — अनदेखा रही जाय छै। स्त्री अकसर पात्र चाहे प्रेरणा के रूप में मौजूद छै, अलग लेखिका, सम्पादिका आरो आलोचक के रूप में कम। ओइसने विवेचित लगभग सब रचनाकार एगो खास सामाजिक स्तर सें आबैछै — मिथिला के दलित, अति-पिछड़ा, अल्पसंख्यक आरो लोक-परम्परा के बेनाम रचनहार एहि समान्तर इतिहास सें अकसर गायब रही जाय छै।

(ङ) संकलन के असंगति आरो पाठ-परमाणिकता के सवाल

ई पचीस निबन्ध सन् 1972 सें 1989 तक अलग-अलग पत्र-पत्रिका में, अलग-अलग मौका पर, अलग-अलग पाठक-वर्ग के ध्यान में राखी कें, स्वतंत्र रूप सें लिखलों गेलों छेलै। एकरा एक ठाम राखी कें 'ग्रन्थ' बना देला सें एगो भीतरी असंगति उभरैछै — कहीं व्यक्तित्व-प्रधान, कहीं कृति-प्रधान, कहीं विधा-प्रधान, कहीं प्रवृत्ति-प्रधान समीक्षा। कोय एके-जइसन सैद्धान्तिक ढाँचा सब निबन्ध के नै बान्हैछै, आरो एगो सिलसिलेवार बनलों ग्रन्थ में जे भूमिका, पद्धति-कथन आरो उपसंहार चाही, से एकरा में नै छै। संगही, कृति में उद्धृत पद्यांश आरो गद्यांश के पाठ-परमाणिकता भी संदेह वाला बनी जाय छै, कैलेकि समीक्षक अपने मानैछै कि बहुतो रचना पत्र-पत्रिका में छितराइलों आरो अनुपलब्ध छै; तें उद्धृत अंस के मूल पाठ सें तुलना-जाँच अकसर असम्भव छेलै। "प्रथम" आरो "मौलिक" जइसन पद लेली जे कड़ा पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आरो प्रकाशन-इतिहास जरूरी छै, से एहि सुरुआती कृति में अधूरा रही जाय छै।

(च) समान्तर इतिहास-प्रतिमान के अधूरा सैद्धान्तिकीकरण

आखिर में, सबसें मौलिक सीमा ई छै कि रमानन्द झा समान्तर इतिहास के धारणा के व्यवहार में तें जीबैछै, मतरकि ओकरा सिद्धान्त के रूप में साफ-साफ नै रखैछै। "दू कोटि के साहित्यकार" के सिद्धान्त एकर सबसें नजदीक छै, मतरकि ऊ मुख्यधारा के कैनन — जयकान्त मिश्र के इतिहास — के विकल्प चाहे विरोध नै, बल्कि ओकर पूरक बनी कें रही जाय छै। समीक्षक बार-बार जयकान्त मिश्र के परमाणिक आधार मानी कें हुनकरे सूचना पर टिकैछै, जबकि समान्तर इतिहास के असली जिम्मेवारी मुख्यधारा के कैनन के आधार-मान्यता के अपने सवाल के घेरे में लाना छै।

दोसरका खण्ड : 'हिआओल' पर आएल अध्यायवार समीक्षा सें उठलों सीमा

'हिआओल' (2012) पर आएल समीक्षा (रचना १६) एहि विशेषांक के सबसें लम्बा आरो पद्धति वाला रचना छै, जेमें भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आरो विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि — तीनू कसौटी पर सतरहो अध्याय के अलग-अलग परखलों गेलै छै। एहिजा भी हरेक अध्याय के उपलब्धि के संग-संग ओकर सीमा गिनायलों गेलै छै, जेकर कुछ मुख्य बिन्दु एहिजा रखलों जाय छै।

मैथिली भाषा के अध्ययन सें जुड़लों सीमा

सुरुआती अध्याय मुख्य रूप सें पच्छिमी विद्वान — कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन — के सबूत पर ठाढ़ छै; दीनबन्धु झा सें पहिलका देसज व्याकरण-चेतना अकसर अनछुआ रही गेलै। नतीजा में जे औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा के आलोचना निबन्ध करैछै, ओकरे स्रोत-सामग्री पर ऊ अपने टिक जाय छै — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के पुरनका जानल-पहिचानल आत्म-विरोध छै। मानक मैथिली तय करै में दोसर उपभाषा-रूप के समाजी अधिकार के सवाल — मानक कोन शक्ति-संरचना सें बनैछै — बिन-जबाब रही जाय छै।

रमानाथ झा आरो किरणजी वाला अध्याय के सीमा

संग्रह के सबसें लम्बा अध्याय (रमानाथ झा आरो मिथिला भाषा) बनावट के नजर सें ढीला छै — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आरो भाषा-प्रबन्धन — छह अलग निबन्ध के सामग्री एके छतरी में अटकायलों गेलै छै। संतुलन के घोषित परन के बादो सुर कइ ठाम आलोचनात्मक जीवन-विवेचन सें बेसी बचाव वाला श्रद्धांजलि बनी जाय छै — किरणजी के मत-खण्डन के "आवेगात्मक" कहल गेलै, मतरकि विरोधी पक्ष लेली लेखक के अपन सबदावली भी आवेग सें बिलकुल मुक्त नै छै। 'प्रत्यालोचक किरणजी' अध्याय में भी विरोधाभास देखाबै में उद्धरण के चुनाव एकतरफा छै — किरणजी के जे ठाम अपने-सुधार चाहे मत-सुधार भेलों हो, से खोजलों नै गेलै; चालीस बरिस के लेखन में मत के फरक विकास भी होय सकैछै, खाली विरोधाभास नै।

'कन्यादान'-पाठ आरो यात्री-भाषा वाला अध्याय के सीमा

'उपेक्षित के आँखि सें कन्यादान पढ़लों जाय' — जे नारीवादी पुनर्पाठ के नजर सें संग्रह के सबसें चुनौती वाला अध्याय मानलों गेलै — ओकरा में भी सवाल के सिलसिला के बिन-जबाबी एगो सीमा छै। "एकर जिम्मेवार के?" बार-बार पूछलों गेलै, मतरकि लेखक अपन फैसला सबूत के संग नै देलकै — उपेक्षित के आँखि सें पढ़ै के जे परन छेलै, से आखिर में सवालिया मुद्रा में रुकी गेलै। 'कन्यादान' के हास्य-रस वाला पक्ष — जे कृति के लोकप्रियता के मूल आधार छै — के रस-शास्त्र वाला जाँच नै भेलै, आरो कइ ठाम पुनर्पाठ इलजाम-पत्र बनी जाय छै। ओइसने, यात्री के भाषा वाला अध्याय में चारू शैली-विज्ञान के औजार पच्छिमी स्रोत सें आनलों गेलै छै, आरो भारतीय काव्यशास्त्र सें मेल बैठाबै खाली संकेत तक रही गेलै — कुन्तक के छह वक्रता-भेद सें चयन-विचलन के सिलसिलेवार मिलान भेलों रहितै तें पूरब-पच्छिम के सेतु पूरा बनितै; ई मौका छूटी गेलै।

अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह आरो मनमोहन झा वाला सीमा

लक्ष्मीपति सिंह पर लिखलों अध्याय में लेखक अपने मानैछै कि छितराइलों कविता में सें "कुछे झोड़ी" सकलै — ई इमानदार मान्यता सराहै लायक छै, मतरकि एकर नतीजा ई छै कि निष्कर्ष सिनी सीमित नमूना पर ठाढ़ छै आरो सामान्यीकरण के वैधता संदेह वाला रहैछै। कुछ परकृति-परतीक के सोझा राजनीतिक रूपक मानलों गेलै छै, मतरकि परतीक के ई अरथ कविता के भीतरी बनावट आरो दोसर कविता के सबूत सें सब ठाम पक्का नै। मनमोहन झा वाला अध्याय संग्रह के सबसें छोटका अध्याय छै, आरो ओकर छोटकाइये ओकर मुख्य सीमा छै — "अनालोचित पक्ष" के घोषणा भेलै, मतरकि विश्लेषण कथा-सार के दरजा पर रही गेलै; निधन के दसम दिन लिखलों होय के कारणें श्रद्धांजलि के भावुक सुर आलोचना के तटस्थता पर भारी छै।

कुल मिला कें, 'हिआओल' के समीक्षक अपने आखिर में लिखैछै — "समान्तर धारा के पूरा पद्धति ओहिजा पहुँचैछै जहाँ हाशिया के सुर अपने बोलै — 'हिआओल' में हाशिया लेली बोललों गेलै छै, हाशिया के बोलाबै कम गेलै छै।" ई एगो वाक्य पूरा संग्रह के सीमा के संछेप में समेटी दैछै।

तेसरका खण्ड : व्यक्तित्व-कृतित्व आरो संस्थागत मूल्यांकन सें जुड़लों सीमा

समर्पण आरो परिणाम के बीच के खाधि

प्रवीण कुमार झा के आलेख (रचना १५) एहि विशेषांक के सबसें बेबाक सुर छै। लम्बा प्रशंसा के बाद "मतरकि मतरकि मतरकि!" कही कें ऊ साफ लिखैछै — "एगो होय छै योगदान आरो दोसरका होय छै बड़का योगदान।" चेतना समिति आरो मैथिली लेखक संघ जइसन संस्था में एतना दिन तक जरूरी पद पर, बड़ा बौद्धिक क्षमता के संग रहते भी, मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में रखै के संघर्ष में रमण जी के कोय निर्णायक भूमिका सोझे साफ नै दिखैछै; चेतना समिति जइसन संगठन में रहते भी मैथिली-शिक्षा के क्षेत्र में कोय एहन बड़का परिणाम सोझे नै दिखैछै, जेकरा हुनकर नेतृत्व के सीधा नतीजा कहल जा सकै। लेखक साफ करैछै कि सवाल समर्पण पर नै, बल्कि वहै समर्पण के नतीजा पर छै — कोय कतेक समय देलकै आरो कतेक मेहनत कैलकै, ई एगो पक्ष छै; मतरकि वहै मेहनत सें भाषा, शिक्षा, साहित्यकार आरो समाज के की ठोस उपलब्धि मिललै, ई दोसरका आरो बेसी जरूरी पक्ष छै। एहि आलेख में चेतना समिति के संग रहते पुस्तक-साहित्य के बढ़ावा आरो संस्थागत गतिविधि के लैकें रमण जी के कार्यकाल सें जुड़लों कुछ विवाद-इलजाम, आरो सरकार-सत्ता-प्रतिष्ठान के संग संघर्ष के बदला कूटनीतिक बातचीत के बेसी महत्त्व दै के आलोचना भी चर्चा में रहै के उल्लेख छै — हालाँकि लेखक अपने ई भी जोड़ैछै कि एहि इलजाम के आखिरी सच मानै सें पहिले अलग जाँच जरूरी छै।

मौनता के व्यंग्य

डा. धनाकर ठाकुर के आलेख (रचना ११) शैली में व्यंग्य-परधान छै, मतरकि ओकर भीतर एगो तेज संकेत छिपलों छै। रमण जी के चेतना समिति के "गुरु द्रोणाचार्य" कही कें लेखक मिथिला राज्य के सवाल पर चेतना समिति — आरो तें रमण जी — के मौनता के द्रोणाचार्य के वहै परसंग सें तुलना करैछै, जहाँ गुरु आँखी मूनी के रही गेलै। "मिथिला राज्य के बात तें चेतना समिति लेली साँढ़ के लाल कपड़ा" — ई पाँति साफ कहैछै कि संस्था आरो ओकर मुख्य साहित्यिक खम्भा राजनीतिक रूप सें संवेदनशील सवाल पर चुप रहै के पहिलौती दैछै।

निष्पक्षता के सवाल आरो पंजीकरण के अधूरापन

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र के आलेख (रचना १२) में उद्धृत राजलीन ठाकुर के मत साफ छै — "रमण जी हुनकर प्रिय आदमी आरो बढ़िया समीक्षक दुन्नु, मतरकि एगो दोष ई कि ऊ आन लोग के तुलना में सीमित समाज के काम के बेसी उघार करैछै, ओहिजा ऊ निष्पक्ष नै रही पाबैछै।" नबोनारायण मिश्र के संस्मरण वाला आलेख (रचना १३) में भी साहित्यकार-पंजीकरण के जे सूची देलों गेलै, ओकरा में बाबूसाहेब चौधरी जइसन आन्दोलनकारी-नाटककार के नाम सामिल नै होय के दिसाय संकेत छै, जे रमण जी के पंजीकरण-काम के चयनात्मकता पर एगो मौन सवाल-चिन्ह छै।

चौथका खण्ड : संपादकीय-शैली के सीमा आरो पाठक के असहमति

पद्धति के अनुशासनहीनता के स्वीकृति

कुमार राहुल के आलेख (रचना ६) एहि दिसाय सबसें सोझा छै। "हम हुनकर सीमा तें रेखांकित करी सकै छी" कही कें ऊ साफ लिखैछै कि रमण जी के समालोचना में विद्वान आलोचक कोय बान्हलों-छेकलों नियम के पालन करै नै दिखैछै, बल्कि कोय एके तत्त्व सें परभावित होय कें अपन फैसला दै दैछै। कुछ ठाम टिपाउट जइसन रमण जी कोय रचना चाहे रचनाकार पर कम सबद में काम चला लैछै आरो अपन बात बेसी लिखैछै। हडसन के ऊ मत उद्धृत करै — कि आलोचना के काम खाली कृति के ठीक-बेठीक देखब नै, बल्कि तय मानदंड स्थापित करब छै — लेखक ई मानी लैछै कि रमण जी के कइ गो आलेख एहि सैद्धान्तिक कसौटी पर पूरा नै उतरैछै।

सम्पादकीय काम के असमानता

प्रदीप बिहारी के आलेख (रचना १४) एक ठाम साफ कहैछै कि 'घर-बाहर' पत्रिका के सम्पादन में ऊ हुनर नै झलकैछै, जे रमण जी के विवेचनात्मक-सोध वाला पोथी में दिखैछै। भूमिका आरो संपादकीय लेखन में — "कोय लेखक के एहि दुन्नु लेखन में कतेक निखरल होय के चाही, से रमण जी बेसी ठाम दिखैछै, सब ठाम नै। कुछ ठाम एकभगहा भेलै छै।" एहि संग ई बात के भी उल्लेख छै कि हुनकर साहित्यिक सेवा लेली हुनका प्रशंसा जेतना होय छै, आलोचना आरो खिधांस भी ओतने होय छै; मतरकि एहिपर ऊ कतेक गंभीरता सें विचार करैछै, से हुनकर चेहरा के भाव सें बुझलों नै जा सकैछै।

तथ्यगत आरो व्याख्या वाला असहमति

कीर्तिनाथ झा के 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) में एक ठाम साफ असहमति दर्ज छै — जबें रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिका के आजादी-आन्दोलन के प्रति "पूरा संवेदनशील आरो जिम्मेवार" कहैछै, तबें समीक्षक टिप्पणी करैछै — "मतरकि, ई विचार एहि विषय पर सबके मानलों छै कि नै, कहब कठिन।" अजित कुमार झा के आलेख (रचना ५) में 'कन्यादान' पर रमण जी के पुनर्पाठ सें आरो साफ असहमति व्यक्त छै — समीक्षक के तर्क एकतरफा बुझाबैछै, आरो रमण जी के हाथें हरिमोहन झा के पाठक के जे तीन सरेनी कैलों गेलै, ओकरा में एगो चौथका वर्ग (जे रमण जी के अपन साहित्य के मिथिला-संस्कृति पर चोट बुझैछै) के चर्चा नै भेलै — "रमण जी अपन आलेख में चौथका सरेनी के चर्चा नै कैलकै छै।" हितनाथ झा के आलेख (रचना १७) में भी एगो साफ असहमति छै — रमण जी अपन बीज-भाषण संग्रह के प्रस्तावना में साहित्यिक राजनीति पर जे चोट कैलों छै, ओकरा लेली समीक्षक लिखैछै — "ई मंच छेलै आरो ई जइसन किसिम के पोथी छै, ओकरा लेली हमरा बुझै में ठीक नै... परहार सें पहिले सुधार के भी गुंजाइस होय के चाही।"

आशीष अनचिन्हार के नजर मँ रमानन्द झा ‘रमण’ के आलोचना-इतिहास लेखन के कमी सभ

आशीष अनचिन्हार के लेख के मूल बात ई छै कि साहित्य के इतिहास लिखना खाली पोथी जमा करना, नाम गिनना आरो बाद मँ छपल किताब के शुरुआत मान लेना नै छै। इतिहास लिखै वाला के लगे “इतिहासबोध” रहना चाही—माने घटना, पहिल प्रकाशन, पहिल प्रयोग, असर, स्रोत आरो श्रेय के क्रम ठीक ढंग सँ बुझना। एही कसौटी पर ऊ खास करि धर्मेन्द्र विह्वल के “व्योमक ओहिपार” पर रमानन्द झा ‘रमण’ के लिखल भूमिका मँ कई कमी देखै छै।

1. इतिहासबोध के कमी

अनचिन्हार के सबसँ पैघ आपत्ति ई छै कि रमण जी एहि प्रसंग मँ इतिहासबोध बिसरी गेलै। कोनो विधा के पहिल छपना, ओकर शुरुआती प्रयोग, नियम के चर्चा आरो बाद मँ एकछाहा किताब बनना—ई सभ अलग-अलग पड़ाव छै। बाद के किताब के आधार बना के पहिलका पड़ाव के ओझरा देना इतिहास के क्रम बिगाड़ै छै।

2. शुरुआत तय करै के मापदण्ड एक जइसन नै

अनचिन्हार कहै छै कि कोनो विधा के शुरुआत ओकरे पहिल प्रमाणित प्रकाशन सँ मानल जाय—पत्रिका मँ छपल होय कि पोथी मँ। जँ एक लेखक लेली “पहिल किताब” नियम होय आरो दोसर लेली “पहिल प्रकाशन”, तें दूहरा मापदण्ड होय छै। रमण जी के भूमिका ई फर्क साफ-साफ नै खोलै छै—अनचिन्हार के शिकायत ईयै।

3. पहिलका प्रकाशन आरो प्रयोग के अनदेखी

अनचिन्हार 2009 के गजेन्द्र ठाकुर के “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” किताब मँ “मैथिली हाइकू हैकू क्षणिका” आलेख के जिक्र करै छै, जइ मँ टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका आदि पर चर्चा बतावल गेल छै। ऊ विदेह के फेसबुक समूह मँ लगभग 2012 तक ई विधा सभ सिखावल जाय के आरो कई रचनाकार जुड़ै के बातो रखै छै। ओकर नजर मँ रमण जी के भूमिका मँ ई पहिलका सार्वजनिक इतिहास के सही जगह नै मिलल।

4. स्रोत आरो रेफरेंस के कमी

अनचिन्हार के आरोप छै कि रमण जी टंका आदि के नियम बतावै छै, लेकिन पहिलका मैथिली स्रोत के रेफरेंस नै दै छै। इतिहास या आलोचना मँ खाली तथ्य कहि देना काफी नै; तथ्य कहाँ सँ आयल, पहिने के लिखने छलै, केतना पुरान प्रमाण छै—ई सभ बताना चाही। एहि जगह पर स्रोत-जाँच कम पड़ै छै।

5. श्रेय बाँटै मँ गड़बड़ी

अनचिन्हार के पढ़ाई मँ भूमिका सँ एहन भाव निकलै छै जइसे धर्मेन्द्र विह्वल ई जापानी विधा सभ मैथिली मँ आनलै। अनचिन्हार एकरा गलत इतिहासबोध मानै छै, काहे कि ओकर अनुसार ई सभ विधा पर पहिने चर्चा आरो रचना-प्रयोग होय चुकल छलै। “के पहिने परिचय देलकै”, “के पहिल एकछाहा पोथी देलकै”, “के लोकप्रिय बनैलकै”—ई तीनू बात अलग करके लिखना चाही छलै।

6. “पहिल किताब” आरो “पहिल उपस्थिति” के फर्क साफ नै

आलेख के परिशिष्ट मँ देल फेसबुक बातचीत के अनचिन्हार सहायक प्रमाण जइसन रखै छै। ओकर आशय ई छै कि धर्मेन्द्र विह्वल अपन पोथी के एहि विधा के पहिल पुस्तकाकार/एकछाहा कृति कहै छै, लेकिन ई नै कहै छै कि मैथिली मँ ई विधा ओकरा सँ पहिने नै छलै। अनचिन्हार के नजर मँ रमण जी के भूमिका ई जरूरी फर्क ठीक सँ नै बैठाबै छै।

7. निजी या वैचारिक असहमति के असर के आरोप

अनचिन्हार ईहो आरोप करै छै कि गजेन्द्र ठाकुर सँ असहमति या तामस के चलते हुनकर नाम आरो योगदान के छोड़ी देल गेल। ई आरोप गंभीर छै, मुदा अनचिन्हार के तर्क ई छै कि इतिहास लिखै मँ निजी पसन्द-नापसन्द के जगह नै होना चाही; जेकर श्रेय छै, ओकर नाम तथ्य के आधार पर आना चाही।

8. विरोधी प्रमाण के सामना नै

अनचिन्हार खुला चुनौती दै छै कि जँ गजेन्द्र ठाकुर सँ पहिने मैथिली मँ टंका, शेनर्यू, हैबून, हैगा, वाका रहलै आरो नियम पर चर्चा भेलै, तें ओकर प्रमाण सामने आनल जाय। माने, इतिहास मँ नाम छोड़ी देना से काम नै चलै; विरोधी दाबी के दस्तावेज से जाँचै के चाही।

9. भूमिका लिखै वाला के जाँच-पड़ताल अधूरा

जखन भूमिका मँ विधा के इतिहास आरो नियम पर बात होय छै, तखन लेखक के पुरान प्रकाशन, तारीख, रचनाकार, सार्वजनिक पोस्ट आरो किताब सभ देखै के जिम्मेदारी बढ़ि जाय छै। अनचिन्हार के नजर मँ रमण जी एहि स्रोत-जाँच मँ पूरा सावधानी नै रखलै, से भूमिका के इतिहासिक भरोसा कमजोर होय छै।

10. इतिहास-सुधार के जरूरत

अनचिन्हार के आखिर बात ई छै—जँ गजेन्द्र ठाकुर सँ पहिने के प्रमाण छै तें सामने आनू; नै तें जेकर योगदान छै ओकर नाम आरो श्रेय ठीक जगह पर दी। ओकरा हिसाब से समस्या के समाधान इतिहास-सुधार, सही स्रोत आरो साफ श्रेय-बँटवारा छै।

निचोड़: अनचिन्हार रमानन्द झा ‘रमण’ के पूरा साहित्य के नकारै नै छै। ओकर आलोचना खास एहि भूमिका के इतिहासिक दाबी पर छै। मुख्य कमी—इतिहासबोध के कमी, पहिल प्रकाशन के अनदेखी, स्रोत-रेफरेंस के अभाव, श्रेय के उलझाव, “पहिल किताब” आरो “पहिल विधा-प्रयोग” के फर्क नै करना, आरो निजी असहमति के असर के आरोप। एही आधार पर ऊ एहि लेखन के अधूरा आरो सुधार योग्य इतिहास मानै छै।

उपसंहार

एहि सब्भे सीमा के एक ठाम राखै के बाद एगो साझा सूत्र साफ होय छै। रमण जी के काम मात्रा के हिसाब सें बहुत बड़का, अभिलेख के नजर सें अनमोल, आरो मातृभाषा-परेम सें प्रेरित छै — एहिपर विशेषांक के कोय योगदानकर्ता सवाल नै उठाबैछै। मतरकि जबें वहै काम के सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-परमाणिकता, पूरा निष्पक्षता आरो संस्थागत नतीजा के कड़ा कसौटी पर कसलों जाय छै, तबें ऊ बहुत गुंजाइस छोड़ी दैछै — पाठ बिना समीक्षा के जोखिम, मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता, आत्मीयता सें उपजल प्रशंसा के अधिकता, हाशिया के कम मौजूदगी, संस्थागत चुप्पी, आरो चुनिंदा निष्पक्षता — ई सब्भे बिन्दु आगू के सोध के नेवता छै, सजा नै। 'हिआओल' के समीक्षक अपने जे कहलकै, से पूरा विशेषांक पर भी लागू होय छै — "एकर खूबी ओहिजा छै जहाँ लेखक अभिलेख खोजैछै, चलन वाला भूल सुधारैछै, बिसरल लेखक के फेर हाजिर करैछै... एकर सीमा ओहिजा छै जहाँ अनुमान परमाण के जगह लैछै, जीवनी कृति के विश्लेषण पर भारी पड़ैछै।" रमण जी के अपने सबद में कही तें — "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः" — एहि विवाद आरो परतिवाद सें उपजैवाला तत्त्व-बोधे एहि विशेषांक के असल उपलब्धि छै।

 

 

रमानन्द झा 'रमण' : कृतित्व के सीमा-रेखा पर एगो संपादकीय नजर

 

रमण जी के मैथिली साहित्य में जे स्थान छै, से एहि सतरहो रचना सें बिन-विवाद बुझाय पड़ैछै — मतरकि एहि विशेषांक के सार्थकता तबेंही पूरा होतै जबें प्रशंसा के संग-संग ऊ सीमा भी चिन्हलों जाय, जे योगदानकर्ता सिनी (आरो रमण जी के अपन आलोचना-पद्धति) रेखांकित करैछै।

 

१. आलोचना-पद्धति के सबसें मौलिक सीमा — पाठ बिना समीक्षा

'अखियासल' पर आएल विस्तृत समीक्षा में (रचना ४) ई तथ्य साफ उघरल छै कि रमण जी अकसर जे रचना के आलोचित करैछै, ओकर मूल पाठ हुनका लग उपलब्धे नै रहैछै — 'चन्द्रप्रभा', त्रिलोचन झा, यदुवर, बिसरल जनार्दन झा — सब ठाम समीक्षक अपने 'अनुपलब्धता' मानी लैछै। जबें मूल कृतिए समीक्षक के मिललै नै, तें ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्यांकन कोन आधार पर सम्भव, ई सवाल बिन-जबाब रही जाय छै। बहुतो ठाम समीक्षा जयकान्त मिश्र के इतिहास चाहे दोसरका द्वितीयक स्रोत पर टिक जाय छै।

 

२. मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता

एहि दुन्नु पोथी के समीक्षा में (रचना ४ आरो १६) बार-बार देखायलों गेलै छै कि रमण जी एगो निबन्ध में जे गुन के सबसें ऊँचा मानैछै, दोसरका में ओकरे उलटा बात के प्रशंसा करैछै — जइसन गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' आदि में समसामयिक यथार्थ सें जुड़ाव के गुन मानब, मतरकि व्यास के कथा के ठीक ओही कारणें प्रशंसा करब कि ऊ समसामयिक यथार्थ सें अप्रभावित रहलों। एहि तरह के आत्मविरोध देखाबैछै कि कोय एगो घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नै छै — समीक्षा कभी प्रभाववादी, कभी समाजशास्त्रीय, कभी जीवनीमूलक होय जाय छै।

 

३. आत्मीयता आरो आलोचनात्मक दूरी के अभाव

लक्ष्मीपति सिंह, मोहन, राजेश्वर झा जइसन अध्याय में व्यक्तिगत स्नेह समीक्षा के संस्मरणात्मक श्रद्धांजलि के रूप दै दैछै, जेसें वस्तुनिष्ठता पर असर पड़ैछै। एकर ठीक उलटा हरिमोहन झा पर जे आलोचनात्मक साहस देखायलों गेलै, से पूरा संग्रह में एके जइसन नै छै।

 

४. सैद्धान्तिक सबदावली के अनुपस्थिति

रस, ध्वनि, व्यञ्जना आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय तत्त्व भीतर छिपलों रूप सें तें छै, मतरकि आनन्दवर्धन, कुन्तक, क्षेमेन्द्र आदि के सिलसिलेवार सैद्धान्तिक परयोग नै मिलैछै। पाश्चात्य सिद्धान्त के भी सोची-विचारी के परयोग नै छै। ई समीक्षा के सहज पढ़ै लायक तें बनाबैछै, मतरकि अकादमिक गहराई के कमी पैदा करैछै।

 

५. नजरिया के संकीर्णता — स्त्री आरो हाशिया के कम उपस्थिति

'अखियासल' के पचीस में चौबीस पुरुष-रचनाकार, खाली एगो स्त्री (हरिलता) — ओकरा में भी विवेचन वैष्णव भक्ति तक सीमित। मिथिला के दलित, अति-पिछड़ा आरो मौखिक-परम्परा के बेनाम रचनहार एहि समान्तर इतिहास सें अकसर गायब रही जाय छै। कुमार राहुल के आलेख (रचना ६) में भी ई कहल गेलै कि रमण जी कोय बान्हलों सैद्धान्तिक नियम के पालन करै नै दिखैछै, बल्कि एके तत्त्व सें परभावित होय कें अपन फैसला दै दैछै, आरो कुछ ठाम टिपाउट जइसन कम सबद में रचनाकार के काम चला लैछै आरो अपन बात बेसी लिखैछै।

 

६. संकलन के असंगति

पचीसो निबन्ध अलग-अलग समय में, अलग-अलग पत्रिका लेली स्वतंत्र रूप सें लिखलों गेलों छेलै — एक ठाम राखी कें 'ग्रन्थ' बना देला सें कोय एके-जइसन सैद्धान्तिक ढाँचा नै बचल। भूमिका, पद्धति-कथन आरो उपसंहार के अभाव एहि जोड़ा-जाड़ी परकृति के उघारी दैछै — ई बात 'हिआओल' पर भी लागू होय छै, जहाँ एक-एक अध्याय के विस्तार, पद्धति आरो गहराई असमान छै।

 

७. व्यक्तिगत समर्पण आरो संस्थागत परिणाम के बीच के खाधि

प्रवीण कुमार झा के आलेख (रचना १५) एहि विशेषांक के सबसें बेबाक सुर छै। "मतरकि मतरकि मतरकि!" कही कें ऊ साफ लिखैछै कि चेतना समिति आरो मैथिली लेखक संघ जइसन संस्था में एतना दिन तक जरूरी पद पर रहते भी, मैथिली के संविधान के अष्टम अनुसूची में रखै के संघर्ष में आरो मैथिली-शिक्षा के क्षेत्र में रमण जी के कोय निर्णायक, ठोस नतीजा साफ-साफ सोझे नै दिखैछै — सवाल समर्पण पर नै, नतीजा पर छै। एहि आलेख में चेतना समिति के कार्यकाल सें जुड़लों कुछ विवाद-इलजाम आरो सत्ता-प्रतिष्ठान के संग कूटनीतिक सम्बन्ध के पहिलौती दै के आलोचना भी चर्चा में रहै के उल्लेख छै। डा. धनाकर ठाकुर के व्यंग्य-परधान आलेख (रचना ११) एहि दिसाय के आरो तेज करै, मिथिला राज्य के सवाल पर रमण जी आरो चेतना समिति के मौनता के द्रोणाचार्य के 'आँखी मूनी के रहब' सें तुलना करैछै।

 

८. निष्पक्षता के सवाल

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र के आलेख (रचना १२) में उद्धृत राजलीन ठाकुर के मत साफ छै — "रमण जी हुनकर प्रिय आदमी आरो बढ़िया समीक्षक दुन्नु, मतरकि एगो दोष ई कि ऊ आन लोग के तुलना में सीमित समाज के काम के बेसी उघार करैछै, ओहिजा ऊ निष्पक्ष नै रही पाबैछै।" नबोनारायण मिश्र के आलेख (रचना १३) में भी साहित्यकार-पंजीकरण के सूची सें बाबूसाहेब चौधरी जइसन आन्दोलनकारी-नाटककार के अनुपस्थिति दिसाय संकेत छै।

 

९. संपादकीय काम के असमानता

प्रदीप बिहारी के आलेख (रचना १४) एक ठाम साफ कहैछै कि 'घर-बाहर' पत्रिका के सम्पादन में ऊ हुनर नै झलकैछै, जे विवेचनात्मक-सोध वाला पोथी में दिखैछै — भूमिका आरो संपादकीय लेखन में जेतना वैचारिक तेजी चाही, से सब ठाम एके जइसन नै। कीर्तिनाथ झा के 'विवर्त'-समीक्षा (रचना १०) में भी एक ठाम असहमति दर्ज छै — "ई विचार सबके मानलों छै कि नै, कहब कठिन" — जबें रमण जी मैथिली पत्र-पत्रिका के आजादी-आन्दोलन के प्रति "पूरा संवेदनशील आरो जिम्मेवार" कहैछै।

 

१०. पाठक के असहमति

अजित कुमार झा के आलेख (रचना ५) में 'कन्यादान' पर रमण जी के पुनर्पाठ सें साफ असहमति व्यक्त छै — समीक्षक के तर्क एकतरफा बुझाबैछै, आरो रमण जी के हाथें हरिमोहन झा के पाठक के जे तीन सरेनी कैलों गेलै, ओकरा में एगो चौथका वर्ग (जे रमण जी के अपन साहित्य के मिथिला-संस्कृति पर चोट बुझैछै) के चर्चा नै भेलै।

 

संगति — ई सब्भे सीमा एगो साझा सूत्र सें बान्हलों छै : रमण जी के काम मात्रा के हिसाब सें बहुत बड़का, अभिलेख के नजर सें अनमोल, आरो मातृभाषा-परेम सें प्रेरित छै; मतरकि सैद्धान्तिक अनुशासन, स्रोत-परमाणिकता, पूरा निष्पक्षता आरो संस्थागत नतीजा के स्तर पर ऊ आगू बढ़ै के गुंजाइस छोड़ी दैछै — जेकरा हुनकरे सबद में कही तें "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः"।

 

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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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