विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान २८
प्रभातमे प्रकाशित निबन्धमे विविध विषयक समावेश एक प्रकारसँ सभकेँ दृष्टिमे रखैत
लेखक/रचनाकारसँ लिखाओल जाइत छल,
जे तत्कालीन समयक विकासोन्मुख समाज लेल अत्यन्त आवश्यक छल। ओहि समयमे अधिकांश
संस्कृतक अध्येता रहथि,
अंग्रेजी दिस झुकाव प्रारम्भ भ'
गेल छल मुदा अंग्रेजी पढ़नाइ साधारणतया आर्थिक दृष्टिकोणसँ सर्वसुलभ नहि छल,
तेँ बहुत कमे गामक लोक अंग्रेजी पढ़ैत छलाह। कोइलख गाममे प्रारम्भिक कक्षामे
अंग्रेजी पढ़निहार लोकक संख्या एहि हेतुएँ बेसी छल,
कारण रानी चन्द्रावती
1924मे
चंद्रानंद फ्री मिडिल इंग्लिश स्कूलक स्थापना कयने छलीहि। पूर्व प्रकाशित रचना सभसँ
तँ ई बात स्पष्ट भए चुकल अछि जे प्रभातक रचनाकारमे मात्र कोइलखेक टा नहि रहैत छलाह,
आनो-आनो गामक रचनाकारक बहुलतामे भेटैत अछि,
जाहिमे मंगरौनीक केदारमणि झा प्रमुखतममे सँ एक छलाह। हिनक विविध विषयपर रचना अछि आ
से पर्याप्त संख्यामे। एहि अंकमे दू अंकक प्रकाशित रचना अछि-
प्रकृति और पृथिवी
केदार मणि झा(मंगरौनी)
प्रकृति आकाशमय अछि।आकाश वायुमय। आकाशमे नवग्रह( सूर्य्य,
पृथ्वी,वुध,
मंगल,
वृहस्पति,
शनि,
युरेनस,
नेपच्युन)क अतिरिक्त औरो उपग्रह चन्द्रादि एवं तारागण छथि। प्रत्येक ग्रहमे एक
प्रकारक आकर्षण शक्ति छैन्हि जे कि एक दोसर काँ चुम्बक जकाँ शून्य आकाशमे अंटकौने
रहैछ। सूर्य्य सभ ग्रहसँ पैघ तेजोमय छथि अतः ज्योतिष शास्त्रमे हुनक नाम ग्रहराज
पड़ल अछि।
सूर्य्य पृथिवी सँ ९२००००००(92000000)
मील दूर छथि। सूर्य्यमे एक अपूर्व तेज छैन्हि जे कि संसारक जावन्तो प्राणीमे गर्मी
पहुँचवैत अछि। जढ़ चैतन्य जतेक पदार्थ अछि से सूर्य्यैक गर्मीपर अवस्थित अछि।ई
सूर्य्यैक रश्मिक गुण थीक जे हमरा लोकनि पृथिवी काँ शस्य-श्यामला वसुन्धराक नामसँ
सम्बोधित कए प्राण रक्षा करै छी।सूर्य्यक रश्मि आदमीक शरीरक दुष्कीट काँ नाश कए
निरोग बनबैत अछि। प्रत्यक्ष प्रमाण हमरा लोकनिक सम्राट पंचम जॉर्ज छथि,
जनिक विकट व्याधि एलेक्ट्रिक द्वारा सूर्यताप शरीरमे विद्वद डाक्टर द्वारा पहुँचाय
दूर कैल गेल। सूर्य्य लोकमे प्राणी अछि वा नहि तकर निश्चय करब दुर्ग। तथापि आधुनिक
विद्वान अनेको यन्त्रक सहायता सँ एतवा कहैत छथि जे सूर्य्यलोक प्राणी शून्य नहि। ई
सिद्धि डार्विन गणना वा अन्य वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्ध भेल हो तँ कोनो
आश्चर्य नहि। पृथिवी गोल अछि। हमरा लोकनिक स्कूलमे एकर
10,12
प्रमाण अछि जाहिमे एकाध उद्धृत करैत छी।
01.संसारक
सभ ग्रह गोल छथि,
अथच यैह एक टा नहि होथि से असंगत।
02.
चन्द्रग्रहणमे पृथ्वीक छाया चन्द्रमा पर पड़ैत अछि,
से छाया गोल अछि। गोले चीजक गोल छाया हो।
03.बहुत
व्यक्ति जहाजसँ एके स्थानसँ सरल रेखा बनबैत बिदा भेलाह अछि,
और अनेक दिन बाद पुनः ओतहि पहुँचि गेलाह जहाँसँ चलल छलाह।यदि पृथ्वीक आन आकार रहैत
तँ नहि पहुँचि सकितथि।
सूर्य अचल छथि।पृथिवी वा अन्य ग्रह हुनक परिक्रमा करैछ।पृथिवीयोक एक उपग्रह
परिक्रमा करैछ जाहिसँ तिथिक उत्पत्ति होइछ,
तनिक नाम थिक चन्द्रमा। हुनका करीब
30
दिन लगैत छैन्हि। पृथ्वीक दू गति। दैनिक और वार्षिक। अपना परिधिपर
24
घण्टामे पृथ्वी एक चक्कर दैत छथि जाहिसँ रातिदिन होइत अछि।सूर्य्यहु विम्ब जाहि
भागपर पड़ैछ से दिन जाहिपर नहि से राति।
चित्र
संख्या:01
पृथिवी द्वितीय गति वार्षिक थीक।
365
दिन
6
घण्टा करीबमे पृथिवी सूर्यक चारूकात घूमि अबैत छथि ताहिसँ ऋतुक उत्पत्ति होइत अछि।
यदा
चित्र
संख्या:02
जखन पृथिवी अ स्थानमे रहैत छथि तेँ सूर्य्यक गर्मी पृथिवी दक्षिण(नीचाँ) भागमे
लम्बाकार मे पड़ैछ अतः ताहि भागमे गर्मी ऋतु होइछ। पुनः पृथिवी तीन मासमे व स्थानमे
अबैत छथि। सूर्य्यक किरण सोझ नहि पड़ैछ अतः पृथिवीक ओहि भागमे वर्षा ऋतु होइत अछि।
पुनः तीन मासक बाद जखन पृथिवी सँ स्थानपर अबैत छथि तेँ पृथिवीक स भाग विपरीत दिशामे
पड़ि जेबाक कारणसँ सूर्यक प्रखरतासँ वंचित रहैत अछि और शरद ऋतु होइछ। ताहिमे द
स्थानपर वसन्त ऋतु ।
जखन पृथिवी चन्द्र और सूर्य्यक बीचमे अबैत छथि तखन चन्द्रग्रहण लगैत अछि।कारण
चन्द्रमामे अपना प्रकाश नहि छैन्हि। सूर्येक़ प्रकाशसँ ओ प्रकाशित होइत छथि। किन्तु
ग्रहणक समय पृथिवी सूर्य्यक प्रकाश के अवरुद्ध कए दैछ।ई कोनो बात नहि थीक जे ग्रहण
पृथिवीक समस्त भागमे हो और सभ स्थानक व्यक्ति एके रंग ग्रहण देखै। नक्सासँ स्पष्ट
होइत अछि।
चित्र
संख्या :
03
चन्द्रमामे अपन प्रकाश नहि से कहि आएल छी। सूर्य्यैक प्रकाशसँ प्रकाशित होइत छथि।
नक्शा नम्बर
3मे
देखू - सूर्य्यक प्रकाश चन्द्रमाक बहुत कम भागमे पड़ैत छैन्हि तेँ हेतु ओतबे भाग
दृश्य होइछ। क्रमिक जखन एकदम सूर्य्यक प्रकाश नहि पड़तैन्ह तँ सर्वग्रास भए जायत।
एहि क्रमे जखन चन्द्रमा घुमैत-घुमैत सूर्य्य और पृथिवीक।बीच पड़ै छथि तँ सूर्य्य
ग्रहणक संयोग होइछ। यथा-
चित्र
संख्या
04
नक्शा नम्बर
04मे
देखू। जखन चन्द्रमा पृथिवी और सूर्य्यक बीचमे पहुँचल छथि तँ सूर्य्यक प्रकाश
चन्द्रमा द्वारा अवरुद्ध भए जाइछ। अतः सूर्य्य सम्पूर्ण देखै मे नहि अबैत छथि। एहि
क्रमे जखन समस्त प्रकाश अवरुद्ध भए जाइछ तखन सर्वग्रास थीक।
पृथिवीक तीन हीस जंल और एक हीस थल अछि। पृथिवी गेंद जकाँ गोल नहि। नारंगी जकाँ
पृथिवी दू दू भाग चिपटा अछि जकर नाम उत्तर ध्रुव एवं दक्षिण ध्रुव थीक। ई स्थान
सूर्य्य सँ बहुत दूर पर अछि। जखन सूर्य्य भूमध्य रेखा पर रहैत छथि तखन बड़े तेज। ओ
स्थल बड़े गर्म अछि।।ध्रुवमे
06
मासक दिन एवं
06
मासक राति होइत अछि। कारण सूर्य्य
06
मास भूमध्य रेखाक उत्तर एवं
06
मास दक्षिण रहैत छथि।
केदार मणि झा(मंगरौनी)
(प्रभात
वर्ष
01,
अंक -
09,
सितम्बर1933
ई.)
साँप और साँपक मंत्र
(श्री
केदार मणि झा) मंगरौनी
साँप काल थीक। ई जीव ओना न प्राणीमात्रक शत्रु थीक विशेषतः आदमीक। एकर धैल आदमी
विरले बचै छथि। साँपक धैलासँ जे व्यक्ति मरै छथि,
कहल अछि जे तनिकाँ अकाल मृत्यु होइत छन्हि। अकालमे जे मरै छथि तनिकाँ मुक्ति नहि।
सभसँ बेसी जखन जाहि व्यक्तिकाँ सर्प धैने रहैत छैक और विष बढ़ले जाइत छैक ओकर मन
केहेन भए जाइत हेतैक
?
जानि कै जे आब हम मरै छी तैयो दुख नहि हैत। एहन पूर्ण ज्ञानी योगीक अतिरिक्त और के
?
ओना तँ एक टा नागलोके बनल अछि जे हमरा मिथिलामे सम्प्रति चारि प्रकारक साँप विषधर
अछि।यद्यपि देखै मे बहुतो प्रकारक सर्प अबैत अछि यथा ढोंढ़,हरहरा,
गनगुआरि,
मछगिधी,
धामन इत्यादि किन्तु ई लोकनि प्राणान्तक नहि। ढोंढ़ बहुशः पानियेमे रहैत अछि।
देखबामे भयंकर और पैघ। तमसाहो आखरी। सुनै छी जे ढोंढ़क विष आदमीक शरीरकाँ नहि असर
करै छैक। किन्तु मालजाल लेखें काल। जखन राजा जनमेजय यज्ञ करै छलाह ओहि समयमे
तक्षक(नागराज) इन्द्रक सिंहासन मे लपटि गेलाह।राजा जनमेजय पितृ प्रतिशोधक योशमे तँ
छलाहे जे ई क्रिया हुनका और उत्तेजित कए देलक। क्रोधाभिभूत भए ओ इन्द्र सहित तक्षक
काँ आवाहन कए श्रुव केँ टेढ़ करै लगलाह किन्तु आस्तिक ऋषि ता बीचहि सम्हारल। जे हो,
किन्तु ओही काल मे जे तक्षक होम शिषा तक पहुँचि गेल छलाह( मन्त्रक प्रभावसँ) ताहि
सँ हुनक विष दग्ध भए गेलैन्हि। यद्यपि प्राण सब विमुक्त भेलाह किन्तु विषहीन। कपोल
कल्पना अछि जे सैह तक्षक कलियुगीय ढोढ़ थिकाह।
हरहरा साँप लम्बा यद्यपि वेश होइत अछि किन्तु मोंट नहि। रंग गहुमा। कथा अछि जे ई
साँप मध्य ब्राह्मण थिकाह। पीठ पर जे तीनि धारी दृष्टिगोचर होइछ से थिकन्हि
यग्योपवीत। हिनक पूजा प्रायः प्रत्येक आस्तिक मैथिलक घर नागपंचमीमे होइते छैन्हि।
हिनका संतुष्ट रखलासँ सर्पक उपद्रव नहि होइत छैक। कतेक तँ हिनका दूध लावा सँ स्वागत
करैत छैन्हि। जे किछु,
किन्तु ई कटै नहि छथि। कतेक तँ कहैत अछि जे हरहरा कटबे नहि करै,
यदि रवि कै काटै तँ बचबो नहि करी। किन्तु एखन तक एकौटा एहन विषय देखै मे के0वा
सुनै मे नहि आयल अछि।
गनगुआरि साँप केँ पीठपर कारी और पीयरक छाप रहैत छैक। वेश लम्बा और मोंट। ई साँप केँ
तकैत फिरैत छैन्हि। केहनो- केहनो विषधर खा जाइत छैन्हि। जाहि ठाम ई साँप हो,
ततय आन साँपक प्रायः उपद्रव नहि। सुनै छी जे ई साँप जतय रहैतअछि ततय लक्ष्मीक वास
रहैत छैन्हि। कतेक तँ खास कए ई साँप पोशैत अछि। गनगुआरि साँप ककरो कटैत नहि छैक। ई
लोककेँ देखि पड़ा जेबाक चेष्टा करै लगैत अछि। एकरा ठंढा जगह वेशी पसन्द।
मछगिधी साँप जाहिठाम कनेक -कनेक पानि बहैत रहैत छैक,
छोट-छोट माछकेँ पकड़बाक लोभें ताहिठाम अधिक पाओल जाइछ। ई साँप बहुत छोट और पातर होइत
छैक। आदमीक प्रायः गंधेसँ कोषों भागि जाइछ। एहि साँप काँ विष नहि ।
धामन साँप सँ पैघ एहि देशमे प्रायः कोनो साँप देखै मे नहि अबैत अछि। ओना तँ
तेहन-तेहन अजगड़ अछि जे हाथीकेँ गीड़ि जाइछ वा कतेकक मत छैन्हि जे संसारक सभसँ
पैघ(वृहतकाय) प्राणी साँपे थीक।किन्तु से सभ साँप पहाड़ी किंवा सामुद्रिक थीक। हमरा
देशमे प्रायः नहि पाओल जाइछ । धामनमे विष नहि और ई आदमी केँ देखि लंक लागि पड़ाइत
अछि। ई सांप करीब
5, 6
हाथ लम्बा और एक डेढ़ बीत मोट होइत अछि। एहिमे सभसँ भयंकर आपत्ति यैह जे ई
प्रसूतिपीड़ा केँ छानि कए स्तनपान कए लैछ। ताहिसँ एल तँ सहज-
,दुर्वला
प्रसूतिका प्रायः भयहि मूर्छिता भए जाइत छथि दोसर हुनक से स्तन सर्वदाक हेतु नीरस
भए जाइछ।
एक प्रकारक साँप अछि जे कि अधसर कहबैत अछि। ओकरा दू मुँह।आधा धड़ गहमन आधा धड़ धामन।ई
आदमीपर चोट खूब करैत अछि। एहि देशमे तकर संख्या वेशी नहि।
अपनादेशक विषधर साँप ई थीक -
1.गहुमन
2.करैत(घोड़करैत)
3.सांखड़
4.
तेलिया
01.
गहुमनक विष बड़ा तेज। सुनै छी जे गहुमन ककरो पर चोट नहि कैने रहैए से विष सँ असह्य
भए पानिमे कूदि पड़ैये और सैह पनियाँ दराद कहबैछ। गहुमनक माथपर विष्णुक पैरक छाप
दृष्टिगोचर होइछ। एकरा धैला सँ बहुत कम लोक बचैत अछि। ई आदमीकेँ देखि तुरत फेंच
काढ़ि ठाढ़ भए जाइत अछि।
2..
करैत,
बहीर होइत अछि। एकर विष दीर्घ कालें चढ़ै एवं उतरै छैक। एहिमे तीन भेद छैक।
(अ)
करैत (ब) बहिरा करैत (स) घोड़करैत।
तीनूमे घोड़करैत भयंकर। ओ गाछे पर रहैए और घोड़ा जकाँ आदमीकेँ खिहारैत छैक। ई आदमीकेँ
काटि पुनः गाछपर चढ़ि जाइत अछि। तखन एकर विष यावत गाछ सँ ओ उतरै नहि,
नहि उतरैत छैक। करैतक रंग कारी होइत छैक।
3.सांखड़-सांखड़
साँप ततेक मोट नहि किन्तु लम्बा वेश होइत अछि।एकरा धैलासँ आदमी मरितो अछि। ई बहुशः
नारमे,
खढ़ मे,
घरमे पाओल जाइछ।
4.
तेलिया - ई करीब एक बीत लम्बा और कारी होइत अछि। एकरो विष बहुत तेज। देखै मे ई चाली
सदृश होइत अछि। बहुशः आमक पिपही,
पानि इत्यादिमे रहैत अछि।कतेक अन्यमनस्क व्यक्ति पानिक सङ्ग एकरा पीवि जाइत छथि और
ई जीभमे तिनका काटि लैत छैन्हि।
अपना देशमे यैह सभ विषैला साँप थीक।किन्तु कलकत्ताक चिड़ियाखाना देखलासँ बूझि पड़ैत
अछि जे अनेको प्रकारक साँप एखनहुँ पृथिवी पर मौजूद अछि। बंगालमे एक प्रकारक साँप
होइत छैक जकर नाम सुगवा थिकैक। हमरालोकनि देशमे ओ साँप क्वचिते पाओल जाइछ। ई साँप
शाल,
बैर,
साखु,
इत्यादि वृक्षपर रहैछ। रंग हरियर और लंबाई करीब एक डेढ़ बीत मात्र। मुखादिक आकृति
स्पष्ट नहि। ओहि रास्ते गेनिहार पथिक काँ ई साँप अक्सरहाँ मगजपर काटि लैछ। एहिसँ
कमे व्यक्ति बचै अछि।
बंगालमे औरो कैकटा भयंकर साँप होइत छैक। एक साँप जे कि बाँसमे रहैत अछि। करीब
8, 9
हाथ लम्बा खढ़ सन रंग और खढ़े सन मोटो होइत अछि। ई आदमी पर बहूत चोट करैए। काटि क'
पुनः गाछपर चढ़ि जाइत अछि और पुनः बिना धुआँ देखने नीचा नहि उतरत। कतेक व्यक्ति एकरा
खढ़ बूझि हटा दैत छथिन्ह किन्तु ताहिसँ प्राण परक नौवत भए जाइत छैन्हि। बंगाल साँपक
माय थिकीह। एक व्यक्ति रास्तामे एक स्वर्णकंकर केँ देखि ओकरा गीरहमे बान्हि धैल।
बन्हितहि मूर्छित भए गेलाह। अन्य पथिक ई देखि हल्ला उठौलक। लोक जमा भेला पर सावित
भेल जे ओ स्वर्ण कंकर,
कंकर नहि
,
सर्प छल। ओकरा मे एतेक विष होइत छैक जे स्पर्श मात्र सँ लोक सविष भए जाय। बंगाली सभ
हमरा देशक जुआयल गहुमनकेँ चाली कहैत अछि।
मन्त्रपर बहुत व्यक्ति काँ विश्वास नहि छैन्हि।विशेषतः साँपक मन्त्र तँ फकड़ा मात्र
थीक।
एक मीयाँ अपना स्त्रीक संग खाट पर सूतल छल।स्त्रीक केश खूजल भूमिपर खसैत छलैक।
मीयाँ बीबी केँ गाढ़ निद्रा मे देखि एक विषधर ओहि केशपथ दए मीयाँक मगजपर चोट कैल।
मीयाँ बेचारे सुतले रहि गेलाह। बीबी
'हा
नाथ,
हा नाथ
'
कए राति बितौलक।मांटिक तैयारी होमय लागल। बेचारे मीयाँ गेलाह मांटिक तर।
15, 20
दिनक बाद एक बंगाली मन्त्री ओहि रास्ते जाइत छलाह। चरवाह सभसँ पता लगलैन्हि जे ई
गोड़ि एक साँपक धैलासँ मुइल मीयाँक थीक ।
?मन्त्री
घरपर खबरि दए ओकरा उखड़बा पुनः स्नानादि करा जहिना स्त्रीक संग साँप कटवाक राति सूतल
छल
,
सुता चित्ती फेंकि साँप केँ मंगा ओही स्थानमे पुनः कटबा ओकर विष उतारि दुनियाँ केँ
देखा देलक जे एखनहुँ संसारमे मन्त्रक प्रभाव छैक।
~केदारमणि
झा
(प्रभात,
वर्ष -1,
अंक
10,
अक्टूबर1933)
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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