विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)]
मूल तेलुगु लेखक

नग्नमुनि एक परिचय
नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव
जन्म: 15 मई 1940
जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश)
वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि
लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट)
संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990
आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965
लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित
कृति:
उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल)
पूर्वा हवा
जम्मि चेट्ट
विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि।
मैथिली अनुवादक

नाम: मानेश्वर मनुज
जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)।
वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)।
कृति:
'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007
'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011
'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019
'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022
'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024
अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित।
अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज
सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-१०)
कविक बालसुलभ निश्छलता — समुद्रकेँ "झबड़ा कुकुर" जकाँ सरल आ आत्मीय बूझि ओकरा दोस्त बनेबाक आकांक्षा — एकटा गहींर रूपकक रूपमे उभरैत अछि, जाहिमे प्रकृतिक प्रति मनुक्खक बालोचित, अबोध श्रद्धा प्रतिबिम्बित होइत अछि। मुदा एहि सरलताक तत्काल खण्डन होइत अछि जखन कवि स्वीकार करैत छथि जे "बुझि नहि पौलहुँ जे हवा मे छूरी होइ छै" — इएह पंक्ति सम्पूर्ण कविताक मर्म थिक, जतय प्रकृतिक शान्त बाह्य रूप आ ओकर भितरिया विनाशकारी सामर्थ्यक बीचक द्वन्द्व उजागर होइत अछि। कविताक सभसँ मार्मिक आ प्रभावशाली प्रयोग अछि बारम्बार आबयवला टेक "चिंताक कोनो बात नहि"। एहि व्यंग्यात्मक पुनरावृत्तिक माध्यमसँ कवि प्रलयंकारी विनाश आ मानवीय संवेदनहीनताक बीचक विरोधाभासकेँ उजागर करैत छथि — सौ वर्षक वटवृक्षक खसब होअय, चिड़ैक टपटप मृत्यु होअय, वा असंख्य दीनहीन प्राणीक जलसमाधि, सभटा एकहि उदासीन स्वरमे कहल गेल अछि, जे आपदाक सामूहिकता आ ओकर प्रति समाजक विरक्ति दुनूकेँ उजागर करैत अछि। अन्तमे "काठक घोड़ाक सवारी" आ मनुक्खक अहंकारक बिम्ब विशेष ध्यान देबय जोग अछि — इएह पंक्ति प्रकृतिक विनाशसँ आगू बढ़िकऽ मानवीय अहंकार आ शक्तिक भ्रमपर प्रहार करैत अछि, जतय विनाशक कारण केवल बाह्य प्रकृति नहि, अपितु मनुक्खक अपन अहंकार सेहो होइत अछि। भाषिक स्तर पर कविताक गति आ लय बिम्बसँ बिम्ब धरि तीव्र संक्रमणसँ गुजरैत अछि, जे पाठककेँ ओहि आकस्मिक आ अनियंत्रित विनाशक अनुभूति दैत अछि जकर वर्णन कवि कऽ रहल छथि। - गजेन्द्र ठाकुर
नग्नमुनिक तेलुगु काव्य
'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम)
खण्ड-१०
समुंदर! याद छौ तोरा
उज्जर फेन सँ सुसज्जित तोँ
झबड़ा कुकुर जकाँ
… नाँगड़ि हिला हमर पैर चाटैत छलँ
हम सोचैत छलौं जे तों सरल स्वभावक छाँ
सोचैत छलौँ जे तोहर देखभाल होबय
किलोल करऽ सँ तोरा रोकी
तोहर प्रतिपाल करी
सत्ते
हम समुद्र केँ अप्पन दोस्त बनबऽ चाहलौं
बुझऽ सँ बाज एलौं जे सागरक दाँत कराल!
बुझि नहि पौलहुँ जे हवा मे छूरी होइ छै
बुझि नहि पौलहुँ जे नोरो मे राजनीतिक कुटनीति
ओहि क्षण!
सागरक विकराल नग्ननाचक ओ क्षण
सूर्य आ चंद्रमा कोइला सन भऽ जैतै
नाश, सर्वनाश, सत्यानाश
पृथ्वी आ आकाश पर विश्वास कऽ जिवैत जीव
क्षण भरि मे छतविछत भऽ समाप्त
मरऽवला केँ पता नहि छलनि
पल मे प्रलय भऽ जैतै
पेटक खाधि केँ भरय लाए रोटिक तलाश मे
दरदर ठोकर खाइत दीनहीन जतेक जे मरलथि
चिंताक कोनों बात नहि।
सौ वर्ष सँ जे छाया दैत छल वरक गाछ
खसि पड़ल, चिंताक कोनो बात नहि
झोंकाक शिकार भऽ चिड़ै टपटप खसि पड़ल
चिंताक कोनो बात नहि
विजुरीक खाम्ह वृक्ष जकाँ खसि पड़ल
चिंताक कोनो बात नहि।
विश्वक चितकार अन्हार मे समा गेल
पल भरि मे सब प्राणी पानि मे डुबि गेल
चिंताक कोनो बात नहि।
पता नहि चलल
ओतुक्का शृष्टि कोन द्वीप मे पहुँच गेल
आँखिक पुतली, चिड़ै जकाँ पाँखि फड़फड़ा कऽ
गला घोँटऽवला हाथ केँ रोकक प्रयास मे
हवाक तेज आ घातक छूरी केँ रोकऽ सँ
प्रभास मे छतविछत खसि पड़ल
ओहि विकराल मृत्युक समक्ष
पशु पक्षी आ मनुक्ख
सब माथ झुकाकऽ मरि गेलथि
ओ सब काया
जीवनक सुरक्षाक जिम्मेवारी लऽ कऽ
लोकक पीठ पर सवारी कसि
काठक घोड़ाक सवारी
आ ओकर अहंकारक प्रत्यक्ष साक्षी अछि
तैओ चिंताक कोनो बात नहि
कियाक कि कलेवर कैफियत नहि मंगतै
-मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106
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