विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
'अखियासल' : भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
प्रस्तावना : कृति, कृतिकार आ समीक्षाक प्रस्थान-बिन्दु
डा॰ रमानन्द झा 'रमण'क 'अखियासल' मैथिली साहित्यक इतिहास, कथा-विकास, आरम्भिक उपन्यास, विस्मृत साहित्यसेवी, राष्ट्रीय चेतना, गीत-काव्य, पत्रकारिता, स्तम्भ-लेखन आ आधुनिक कथाक सामाजिक सरोकारक पुनर्मूल्याङ्कन करयवला आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह अछि। ई संग्रह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर सँ सन् १९९५ ई॰ मे प्रकाशित भेल आ एहिमे पचीस टा स्वतन्त्र आलोचनात्मक निबन्ध संकलित अछि। एहि सभ निबन्धक मूल प्रकाशन-स्रोत 'मिथिला मिहिर', 'मिथिलामोद', 'भाखा', 'मैथिली अकादमी पत्रिका', 'बसात', 'हालचाल', 'मैथिली प्रकाश' सन पत्र-पत्रिका आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलनक स्मारिका थिक। तात्पर्य ई जे ई कोनो एकहि बेर योजनाबद्ध रूपेँ लिखल गेल ग्रन्थ नहि, अपितु सन् १९७२ सँ लऽ कऽ १९८९ धरिक लगभग दू दशकक पत्रकारीय-आलोचनात्मक श्रमक संचयन थिक। एहि संकलनात्मक स्वरूपकेँ ध्यानमे रखने बिना एकर समुचित मूल्याङ्कन सम्भव नहि।
पोथीक आरम्भ पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा'केँ मैथिलीक आरम्भिक कथाकारिता आ कथा-संग्रहक परम्परामे प्रतिष्ठित करबाक प्रयाससँ होइत अछि आ समापन आधुनिकतम कथाकार प्रभास कुमार चौधरीपर — अर्थात् मैथिलीक पहिल कथाकारसँ लऽ कऽ समकालीन कथाकार धरि, प्रायः दुइ शताब्दीक विस्तार एहि पचीस निबन्धमे समाहित अछि। एहि दीर्घ पटलक कारणेँ 'अखियासल' मात्र समीक्षा नहि, अपितु एक प्रकारक समान्तर साहित्येतिहासक आधारशिला-प्रस्तर बनि जाइत अछि — आ इएह ओकर सभसँ पैघ मौलिकता तथा सभसँ पैघ सीमा दुनूक स्रोत थिक।
ई पोथी साहित्यक स्थापित शिखर-पुरुष सभक प्रशस्ति मात्र नहि करैत अछि। एकर मूल प्रश्न अछि — मैथिली साहित्यक इतिहासमे के स्मरणीय बनाओल गेल, के विस्मृत भेल, कोन रचना 'प्रथम' कहल गेल, कोन पाण्डुलिपि पाठक धरि नहि पहुँचल, आ साहित्यिक मान्यता निर्माणमे संस्था, पत्रिका, सम्पादक, प्रकाशक, प्रवासी केन्द्र आ सामाजिक सत्ता केहन भूमिका निभबैत रहल। कृतिक केन्द्रीय अभिप्राय स्पष्ट अछि — मैथिली गद्य आ पद्यक ओहि प्रारम्भिक तथा उपेक्षित रचनाकार लोकनिकेँ प्रकाशमे अनब, जिनका मुख्यधाराक साहित्येतिहास बिसरि गेल अथवा जिनका सम्बन्धी सामग्री 'अनुपलब्ध' रहि गेल।
'अखियासल'क पचीस अध्याय एकरेखीय इतिहासक बदला अनेक समान्तर धाराक उद्घाटन करैत अछि —
• मैथिलीक आरम्भिक कथा आ उपन्यासक खोज,
• विस्मृत रचनाकारक पुनर्प्रतिष्ठा,
• स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम आ मातृभाषा-जागरण,
• कथा, गीत, गप्प, स्तम्भ आ पत्रकारिताक विधागत विवेचन,
• नारी, गरीब, किसान, बेरोजगार युवक आ शोषित वर्गक अनुभव,
• स्वतन्त्रताक बादक राजनीतिक विडम्बना,
• सामाजिक संक्रमण, अस्तित्व-संकट आ नैतिक अवमूल्यन।
एहि अर्थमे 'अखियासल' आलोचना मात्र नहि, मैथिली साहित्यक अभिलेखीय पुनरुद्धार आ समान्तर इतिहास-लेखनक महत्त्वपूर्ण उपक्रम अछि।
प्रस्तुत मूल्याङ्कनमे तीन दृष्टि-प्रतिमानक एकसाथ प्रयोग कएल गेल अछि — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय प्रतिमान (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य, रीति, अलङ्कार, साधारणीकरण, लोकमङ्गल); (ख) पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त (ऐतिहासिकतावाद आ नव-ऐतिहासिकतावाद, मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय समीक्षा, रूपवाद, नारीवादी विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, अस्तित्ववादी-मनोविश्लेषणवादी दृष्टि, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त, विखण्डनवादक हाशिया-पुनरुद्धार आ कैननक राजनीति); आ (ग) विदेह समान्तर साहित्य-आन्दोलनक समान्तर इतिहास-प्रतिमान तथा गङ्गेश उपाध्याय-मूलक नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, जे मुख्यधाराक कैनन-निर्माणक विरुद्ध लुप्तप्राय, हाशियाकृत आ अभिलेखहीन रचनाकारक पुनःस्थापनाकेँ अपन घोषित लक्ष्य मानैत अछि, आ जे नव्य-न्यायक 'हेत्वाभास' आ 'शब्द-प्रमाण'क उपयोग कऽ साहित्यमे निहित वैचारिक छलकेँ अनावृत करैत अछि। एहि तेसर प्रतिमानक दृष्टिसँ 'अखियासल' एक अग्रगामी पूर्व-रूप (प्रोटो-पाठ) थिक — किएक तँ रमानन्द झा जे काज १९७० सँ ८० दशकमे व्यक्तिगत श्रमसँ केने छलाह, विदेह-आन्दोलन ओकरे संस्थागत, अभिलेखीय आ जनतान्त्रिक विस्तार दैत अछि।
एहि समीक्षाक संरचना दू भागमे विभक्त अछि। पूर्वार्धमे प्रत्येक अध्यायक विशिष्ट गुण, उपलब्धि आ सैद्धान्तिक महत्त्वक विवेचन अछि; उत्तरार्ध पूर्णतः सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकटकेँ समर्पित अछि।
आलोचनात्मक प्रतिमान
भारतीय साहित्यशास्त्रीय दृष्टि
रस — पोथीक विभिन्न अध्यायमे करुण, वीर, हास्य, शृङ्गार, भक्ति आ रौद्र रसक विवेचन भेटैत अछि। 'रामेश्वर'क भूख आ पारिवारिक विघटन करुण रस उत्पन्न करैत अछि; द्विजवरक राष्ट्रीय कविता वीर आ रौद्र रस जगबैत अछि; हरिमोहन झाक गप्प हास्य-व्यङ्ग्यक भूमि रचैत अछि; हरिलताक भजन भक्ति आ मधुर रसक धारा बहबैत अछि; आरसी आ मोहनक गीत शृङ्गार, प्रकृति आ भावमाधुर्यक अनुभव दैत अछि।
ध्वनि — अनेक रचनाक प्रत्यक्ष कथा पाछाँ अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ अछि। भूख केवल भोजनक अभाव नहि, आर्थिक संरचनाक अन्याय अछि। विवाह केवल घरेलू संस्कार नहि, स्त्रीक सामाजिक स्थिति आ जातिगत प्रतिष्ठाक क्षेत्र अछि। भाषा केवल सम्प्रेषणक साधन नहि, सांस्कृतिक स्वाधीनताक प्रतीक अछि।
वक्रोक्ति — यात्रीक स्तम्भ, हरिमोहन झाक गप्प, श्यामानन्द झाक व्यङ्ग्य, ललित आ धीरेन्द्रक कथा तथा आरसीक राजनीतिक कविता वक्र कथन, विडम्बना, व्यङ्ग्य आ प्रतीकक माध्यमसँ अपन अर्थ उत्पन्न करैत अछि।
औचित्य — रमणजी बेर-बेर ई प्रश्न उठबैत छथि जे रचनाक विषय, पात्र, भाषा, शैली, काल आ विधाक बीच औचित्य अछि कि नहि। कथाकेँ उपन्यास, गप्पकेँ कथा, अनुवादकेँ मौलिक कृति अथवा प्रभावकेँ अनुवाद कहब उचित अछि कि नहि — ई सभ औचित्यक प्रश्न अछि।
साधारणीकरण — एक व्यक्तिक भूख, बेरोजगारी, विवाह-दुःख अथवा सांस्कृतिक क्षोभ तखन साहित्यिक मूल्य ग्रहण करैत अछि जखन ओ सम्पूर्ण समुदाय अथवा युगक अनुभव बनि जाइत अछि। धीरेन्द्रक कथा-विवेचनमे लेखक स्पष्ट करैत छथि जे वैयक्तिक अनुभव सामाजिक मनक अभिव्यक्ति बनलापर साहित्य सामाजिक सन्दर्भ ग्रहण करैत अछि।
लोकमङ्गल — अखियासलक आलोचना साहित्यकेँ समाजसँ पृथक नहि मानैत अछि। मातृभाषा-सेवा, स्त्रीशिक्षा, जातिविरोध, श्रमक प्रतिष्ठा, गरीबक अधिकार आ राष्ट्रीय स्वाधीनता साहित्यिक मूल्याङ्कनक महत्त्वपूर्ण आधार बनैत अछि।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आधार
रूपवादी दृष्टि — कथानक, चरित्र-निर्माण, संवाद, वातावरण, कथा-गति, प्रतीक, पुनरावृत्ति, गीतात्मकता आ विधागत संरचनाक परीक्षण रूपवादी दृष्टिसँ कएल जा सकैत अछि।
नव-इतिहासवादी दृष्टि — प्रत्येक रचनाकेँ ओकर समयक सत्ता, संस्था, भाषा-राजनीति, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, सामाजिक सुधार, सामन्तवाद आ आर्थिक परिवर्तनसँ जोड़िकऽ पढ़ल गेल अछि।
मार्क्सवादी दृष्टि — भूख, निर्धनता, श्रम, सामन्ती शोषण, पुलिस-प्रशासन, पूँजी, चुनाव, बेरोजगारी आ वर्ग-विभाजन अनेक अध्यायक मूल प्रश्न अछि।
नारीवादी दृष्टि — 'निर्दयी सासु', 'सुमति', 'चन्द्रग्रहण', हरिलताक भजन, कुमार गंगानन्द सिंहक कथा आ ललितक कथा-विवेचन स्त्रीक शिक्षा, विवाह, देह, इच्छा, घरेलू श्रम, विधवापन आ सामाजिक नियन्त्रणक प्रश्न उठबैत अछि।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि — मैथिलीपर हिन्दी आ अङ्ग्रेजीक दबाव, मातृभाषाक उपेक्षा, देवनागरीक प्रसारक राजनीति, स्थानीय भाषा-साहित्यक अधिकार आ राष्ट्रीयताक भीतर भाषिक बहुलता — ई सभ उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शक विषय अछि।
अस्तित्ववादी आ मनोविश्लेषणवादी दृष्टि — ललित आ धीरेन्द्रक कथा-विवेचनमे निरर्थकता, एकाकीपन, बेरोजगारी, दायित्वक असह्य भार, यौनिक इच्छा, आत्मपरायापन आ सामाजिक असंगतिक विश्लेषण भेटैत अछि।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि — हरिमोहन झाक गप्प आ यात्रीक स्तम्भ-लेखनक अध्याय पाठक-समुदाय, पत्रिकाक संवादात्मकता, हास्यक लोकप्रियता आ पाठकीय रुचिक निर्माणपर ध्यान दैत अछि।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि आ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा
विदेह समान्तर इतिहासक मूल धारणा अछि जे साहित्यिक इतिहास केवल राजकीय मान्यता, पुरस्कार, विश्वविद्यालय आ प्रसिद्ध लेखकक इतिहास नहि होइत अछि। ओहि इतिहासमे निम्न सभक समान अधिकार अछि —
• दुर्लभ पाण्डुलिपि,
• अप्रसारित पोथी,
• स्थानीय पत्र-पत्रिका,
• ग्रामीण रचनाकार,
• मातृभाषा-सेवी,
• विस्मृत सम्पादक,
• आर्थिक अभावमे लिखैत कवि,
• स्त्री-पात्रक मौन,
• किसान आ मजदूरक पीड़ा,
• भाषिक पराधीनता,
• मिथिला आ प्रवासक सांस्कृतिक सम्बन्ध।
मैथिली साहित्यक इतिहास सदिखन एकटा वैचारिक संघर्षक क्षेत्र रहल अछि। एक दिस 'मुख्यधाराक परम्परा' अछि, जे शास्त्रीय सन्तुलन, संस्थागत मान्यता, ब्राह्मणवादी आभिजात्य आ अतीतकेँ परिमार्जित कऽ प्रस्तुत करबापर केन्द्रित रहल अछि, तँ दोसर दिस 'विदेह समान्तर परम्परा' अछि, जे जनमानसक धड़कैत हृदय, शोषित-वञ्चितक प्रतिरोध आ यथार्थवादी चित्रणसँ जुड़ल अछि। नव्य-न्यायक 'शब्द-प्रमाण' सिद्धान्तक अनुसार सत्य ओतय खण्डित होइछ जतय प्रमाणकेँ दबा देल जाइछ — जेना दूषण पञ्जीक छुपायब; आ 'हेत्वाभास'-विवेचनसँ साहित्यमे निहित तार्किक दोष आ वैचारिक छल अनावृत होइत अछि। 'अखियासल'क प्रधान उपलब्धि ई अछि जे ओ मैथिली साहित्यक मुख्य सड़कक बगलमे दबाओल अनेक पदचिह्नकेँ पुनः दृश्य बनबैत अछि।
पूर्वार्ध : अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
१. मैथिलीक पहिल कथाकार पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा'
संग्रहक प्रथम निबन्ध एक प्रकारेँ समस्त कृतिक बीजाध्याय थिक। ई अध्याय मैथिली कथा-साहित्यक आरम्भ-बिन्दु सम्बन्धी प्रचलित धारणाकेँ संशोधित करैत अछि। रमानन्द झा एहिठाम 'प्रथम'क अन्वेषणकेँ आलोचनात्मक कर्मक रूपमे प्रतिष्ठित करैत छथि — "कथा विकासक मार्ग पर सर्वप्रथम कोन मैथिली सेवी अग्रसर भेलाह, तकर अनुसंधान।" ई घोषणा-वाक्य पूर्ण संग्रहक पद्धतिगत घोषणापत्र थिक।
पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुरक जन्म १७५० ई॰ मे खण्डवलाकुलमे भेल छल; ओ सर्वसीमा निवासी पं॰ महेश्वर ठाकुरक पुत्र छलाह आ हुनक निधन १८२२ ई॰ मे भेल। हुनक ग्रन्थसभमे 'मिथिला तीर्थप्रकाश', 'नारी धर्मप्रकाश', 'शूद्र विवाह पद्धति', 'वैतरणीदानम्', 'शुद्ध निर्णय' आ 'शिवपूजा प्रदीपिका' प्रमुख अछि। हुनका मैथिलीक पहिल कथाकार आ 'चन्द्रप्रभा'केँ पहिल कथाकृति सिद्ध करबाक हेतु समीक्षक वंशावली, तिथि, गुरु-शिष्य-परम्परा आ खण्डनात्मक प्रमाण — जयकान्त मिश्रक 'चन्द्रभागा' नामकरणक भ्रम-निवारण — सभक सहारा लैत छथि। 'चन्द्रभागा'क बदला 'चन्द्रप्रभा' नामक ई शुद्धिकरण आलोचनाक अभिलेखीय सावधानी देखबैत अछि।
लेखक 'चन्द्रप्रभा'केँ उन्नैसम शताब्दीक मैथिली गद्यक नमूना तथा आरम्भिक कथा-संग्रहक रूपमे स्थापित करैत छथि। पाण्डुलिपि जीर्ण छल, कृतिक किछुए अंश उपलब्ध रहल आ एकर प्रकाशन लेखकक निधनक बहुत वर्ष बाद सन् १९३९ मे भेल। 'चन्द्रप्रभा'क संरचना गुरु-शिष्य संवाद आ एक कथासँ दोसर कथा निकलबाक पद्धतिपर आधारित अछि; एहिमे गुरु-शिष्या संवादक माध्यमसँ नीतिवचनक समर्थन कएल गेल अछि, जाहिमे प्राचीन गद्य-शैलीक उत्कृष्ट निदर्शन भेटैछ। एहि दृष्टिसँ एकर सम्बन्ध पञ्चतन्त्र, विद्यापतिक 'पुरुष-परीक्षा' आ संस्कृतक आख्यान-उपाख्यान-परम्परासँ जुड़ैत अछि — ई शुद्ध शास्त्रीय परम्परा-अन्वितिक दृष्टि थिक। कथा सभ शिक्षाप्रद, घटनाप्रधान आ नैतिक निष्कर्षवाली अछि।
भारतीय औचित्य-दृष्टिसँ एकर महत्त्व कथानकक जटिलतामे नहि, आरम्भिक मैथिली गद्यक ऐतिहासिक भूमिकामे अछि। पाश्चात्य दृष्टिसँ ई उद्गम-अन्वेषण थिक, जे ऐतिहासिकतावादी समीक्षाक केन्द्रीय प्रवृत्ति छी। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय सभसँ महत्त्वपूर्ण अछि — किएक तँ 'चन्द्रप्रभा'क "अनुपलब्धता"केँ समीक्षक स्वयं रेखाङ्कित करैत छथि, आ दुर्लभ पाण्डुलिपि, सम्पादक आ प्रकाशकक श्रमकेँ साहित्यिक इतिहासक अङ्ग बनबैत छथि। हाशियाकृत, अभिलेखहीन, लुप्त-पाठक पुनःस्थापना — इएह समान्तर इतिहासक मूल-मन्त्र थिक, आ रमानन्द झा एकर पहिल घोष एतय करैत छथि।
२. मैथिलीक प्रथम उपन्यासकार पं॰ जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर'
लेखक 'रामेश्वर'केँ सन् १९१६ मे मिथिला प्रिंटिंग वर्क्स, मधुबनी सँ प्रकाशित मैथिलीक प्रथम मौलिक उपन्यास मानैत छथि। पं॰ जीवछ मिश्रक जन्म १८६३ ई॰ मे भेल छल; पिताक असामयिक निधनक कारणेँ हुनक शिक्षा बाधित भेल, तथापि ओ संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आ उर्दूक गहन अध्ययन कएलनि। हुनक जीवन, साहित्यिक प्रेरणा आ मातृभाषाक प्रति प्रतिबद्धताकेँ विस्तारसँ प्रस्तुत कएल गेल अछि — हिन्दी-विस्तारवादक विरुद्ध प्रतिरोध आ 'मैथिल महासभा'क वंशानुगत नेतृत्वक विरोध, ई सभटा वस्तुतः औपनिवेशिक-कालीन भाषिक अस्मिता-संघर्षक जीवन्त दस्तावेज थिक।
उपन्यासक केन्द्रमे भूख, श्राद्धक आडम्बर, ऋण, पुलिस-प्रशासनक अत्याचार, झूठ अभियोग, कारावास, पारिवारिक विघटन आ अपराधक सामाजिक उत्पत्ति अछि। रामेश्वर अपन पिताक श्राद्धक लेल कर्ज लैत अछि, घर-घराड़ी बेचयपर विवश होइत अछि, आ अन्ततः पुलिसक प्रताड़नासँ क्षुब्ध भऽ डकैत बनि जाइछ; ओकर पत्नी पार्वती कमलामे कूदि आत्महत्याक प्रयास करैत अछि। रामेश्वर जन्मजात अपराधी नहि; आर्थिक विवशता, सामन्ती सत्ता आ प्रशासनिक छल हुनका अपराधक बाटपर धकेलैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ रामेश्वरक अपराध वास्तवमे वर्गीय शोषणक परिणाम अछि। करुण रसक निर्माण उपन्यासक आरम्भिक दृश्यसँ होइत अछि — श्राद्धक बाद फेकल भोजनपर कुकुर सभ टूटि पड़ैत अछि आ भूखल बालक दूरसँ देखैत रहैत अछि। लेखकक अनुसार संवाद सरल आ स्वाभाविक अछि तथा वातावरण-निर्माण प्रभावकारी।
मार्क्सवादी-नवऐतिहासिकतावादी दृष्टिसँ ई निबन्ध कृतिक सर्वश्रेष्ठ अध्याय-मध्ये एक थिक। समीक्षक 'रामेश्वर'केँ मात्र सौन्दर्यशास्त्रीय वस्तु नहि, अपितु सत्ता-संरचना — राज दरभंगा, मैथिल महासभा, हिन्दी साहित्य परिषद — क विरुद्ध ठाढ़ भेल प्रतिरोधी पाठक रूपमे व्याख्यायित करैत छथि। जीवछ मिश्रक निर्भीकता आ 'मठाधीशक षड्यन्त्रक भण्डाफोड़' — ई नव-ऐतिहासिकतावादक शक्ति-प्रवचन-विश्लेषणसँ अद्भुत रूपेँ मेल खाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ 'रामेश्वर' राजदरबारक नहि, भूखल ग्रामीण परिवारक इतिहास लिखैत अछि — यथार्थवादक ई विदारक प्रस्तुति मैथिली गद्यक स्वर्ण-शिखर थिक।
३. रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास 'सुमति'
'सुमति' (१९१८ ई॰) मैथिलीमे आधुनिक उपन्यासक विधा स्थापित करबाक आरम्भिक प्रयास अछि। लेखक रासबिहारी लाल दासक साहित्यिक अभाव-बोध, 'मिथिला दर्पण'सँ सम्बन्ध आ मातृभाषामे उपन्यास देबाक संकल्पकेँ रेखाङ्कित करैत छथि। समाजमे व्याप्त अपव्यय, दहेज आ प्रदर्शनकारी प्रवृत्तिक कारणेँ परिवारक कोना पतन होइछ, आ एक सुशिक्षिता नारी सुमति कोना अपन बुद्धिसँ खसैत घरकेँ सम्हारैत अछि, ई एहि उपन्यासक मूल स्वर थिक। सहेलोला बाबू आ मनोरथ लाभक बीच सिद्धान्त-विवाहक प्रसङ्ग, कर्ज लऽ कऽ बरियातीक स्वागत, आ अन्ततः सम्पूर्ण सम्पत्तिक विनाशक जे सजीव चित्रण अछि, ओ सामाजिक यथार्थवादक प्रखर उदाहरण थिक। सुमति सासुर अबितहि अपन गहना बेचि परिवारकेँ ऋणमुक्त करैत अछि आ समाजक लेल एकटा आदर्श स्थापित करैत अछि।
अध्याय पूर्ववर्ती इतिहासकारक मतकेँ सेहो समाहित करैत अछि। जयकान्त मिश्र कथानक-विन्यास, चरित्र-निर्माण आ कथन-कौशलकेँ अपरिपक्व मानैत छथि, मुदा विषयकेँ मैथिली उपन्यास लेल उपयुक्त स्वीकारैत छथि; राधाकृष्ण चौधरी एकरा आधुनिक मैथिली उपन्यास-लेखनक पहिल सफल प्रयास कहैत छथि। एहि निबन्धक एकटा विशेष शक्ति अन्तर्पाठीयताक सूक्ष्म बोधमे अछि — 'सुमति'मे हिन्दी कविताक प्रयोगकेँ जीवछ मिश्र 'मैथिली भाषा आ कविक अक्षमताक द्योतक' मानने रहथि, आ रमानन्द झा एहि समकालीन आलोचनात्मक संवादकेँ उद्घाटित करैत छथि। इएह आलोचना-क-आलोचना एहि निबन्धकेँ सैद्धान्तिक गहराइ दैत अछि। भारतीय औचित्य-सिद्धान्तक दृष्टिसँ हिन्दी-पद्यक मैथिली-गद्यमे प्रयोग भाषा-औचित्य-भङ्ग थिक — रमानन्द झा एहि दोषकेँ 'शैलीजन्य शिथिलता' कहि स्वीकार करैत छथि, तथापि सामाजिक जागरणक युग-स्वरकेँ प्रधान मानि कृतिकेँ महत्त्वपूर्ण घोषित करैत छथि। ई मूल्याङ्कन-सन्तुलन — दोष-स्वीकृति संगहि ऐतिहासिक-सामाजिक महत्त्वक रक्षा — समीक्षकक परिपक्वताक परिचायक थिक।
औचित्य-दृष्टिसँ अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व आ कलात्मक सिद्धि बीच भेद करैत अछि। कोनो कृति 'प्रथम' भऽ सकैत अछि, मुदा केवल प्रथम होयबाक कारण कलात्मक रूपसँ पूर्ण नहि बनि जाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ 'सुमति' विधागत संक्रमणक दस्तावेज अछि — नीति-आख्यानसँ आधुनिक सामाजिक उपन्यास धरि बढ़ैत मैथिली गद्यक अस्थिर, मुदा महत्त्वपूर्ण डेग।
४. जनार्दन झा 'जनसीदन' आ 'निर्दयी सासु'
ई अध्याय विवाह-व्यवस्था, घटक, कन्यापक्ष, सासु-पुतोहु सम्बन्ध आ घरेलू स्त्री-उत्पीड़नकेँ कथा-विवेचनक केन्द्रमे आनैत अछि। जनसीदन (१८७२–१९५१)क 'निर्दयी सासु' सन् १९१४ ई॰ मे 'मिथिला मिहिर'मे धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित भेल; एकर कथावस्तु सामाजिक घटनापर आधारित अछि आ चित्रण एतेक स्वाभाविक अछि जे घटना पाठकक सोझाँ घटैत प्रतीत होइत अछि। एहिमे सासु अनूपरानी आ ननदिक अत्याचार सहैत मूक नारी शारदाक कारुणिक चित्रण भेल अछि, जे तत्कालीन समाजमे स्त्री-शिक्षाक विरोध आ पितृसत्तात्मक क्रूरताकेँ प्रमाणित करैत अछि। ज्योतिषी चिन्तामणि झा द्वारा शारदाकेँ शिक्षित करब आ परिपाटी-विरोधी कन्यादान, तथा अनूपरानी द्वारा ओकर विरोध — वस्तुतः प्राचीन आ नवीन जीवन-मूल्यक द्वन्द्व थिक, जकरा समीक्षक 'प्रखर सामाजिक चेतनाक प्रतिफल' कहैत छथि।
जनसीदनक 'शशिकला', 'कलियुगी संन्यासी' आदिक विवेचनमे समीक्षक विधा-विवादकेँ — हरिमोहन झा 'निर्दयी सासु'केँ 'प्रहसन' कहलनि, आन 'उपन्यास' — सुन्दर ढंगेँ प्रस्तुत करैत छथि। मुख्य उपलब्धि ई जे रमानन्द झा जनसीदनक व्यक्तित्वक प्रखरता-सम्बन्धी अपन प्रारम्भिक सन्देहकेँ उपलब्ध साहित्यक विश्लेषणसँ स्वयं संशोधित करैत छथि — सामाजिक-सुधारवादी चेतनाक आलोकमे व्यक्तित्व प्रखर भेटैत छनि। ई आत्म-संशोधनकारी आलोचना-पद्धति कृतिक बौद्धिक ईमानदारीक प्रमाण थिक।
नारीवादी दृष्टिसँ कथा घरेलू सत्ताक जटिल रूप उद्घाटित करैत अछि। स्त्री केवल पुरुषद्वारा नहि, पितृसत्तात्मक संस्कार ग्रहण कएने दोसर स्त्रीद्वारा सेहो प्रताड़ित होइत अछि; सासु स्वयं व्यवस्थाक उत्पाद होइतहुँ पुतोहुपर व्यवस्थाक प्रतिनिधि बनि जाइत छथि। करुण रसक स्रोत नवविवाहिताक असहायता अछि। ध्वनि-सिद्धान्तसँ देखलापर विवाहक उत्सवक पाछाँ कन्याक आर्थिक मूल्याङ्कन, परिवारक प्रतिष्ठा आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रणक कठोर इतिहास सुनाइत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ 'मिथिलाक समाजकेँ कोला-कोलामे बाँटि शोषण करैत' व्यवस्थाक विरुद्ध शंखनादक रूपमे एकर पाठ वर्ग-चेतना आ सामाजिक अन्तर्विरोधक साहित्यिक अभिव्यक्तिक उत्तम उदाहरण थिक।
५. पं॰ जनार्दन झा — एक बिसरल साहित्यसेवी
एहि लघु किन्तु सैद्धान्तिक दृष्टिसँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निबन्धमे रमानन्द झा अपन समस्त आलोचनात्मक परियोजनाक सैद्धान्तिक आधार प्रस्तुत करैत छथि — 'दू कोटिक साहित्यकार'क सिद्धान्त। पहिल कोटिक (विद्यापति सन) रचनाकार ततेक व्यापक होइत छथि जे दोसर कोटिक रचनाकारकेँ आच्छादित कऽ दैत छथि, आ कालान्तरमे लोक हुनका बिसरि जाइत अछि। गङ्गा-कोशीक विशाल जल आ गाम-गामकेँ जोड़निहार छोट धारक स्थानीय महत्त्वक रूपक एहि सिद्धान्तकेँ अविस्मरणीय बनबैत अछि — इतिहासक वास्तविक नदीमे केवल विशाल प्रवाह नहि, छोट-छोट धार सेहो जल दैत अछि, आ पं॰ जनार्दन झा ओहि अदृश्य धाराक प्रतिनिधि छथि।
लेखकक तर्क अछि जे साहित्यक मुख्य धारा केवल प्रसिद्ध लेखकसँ नहि, अनेक स्थानीय आ 'दोसरा पाँति'क साहित्यसेवीक निरन्तर श्रमसँ बनैत अछि। पं॰ जनार्दन झाक रचना दुर्लभ भेला कारण हुनकर नाम इतिहाससँ लगभग लुप्त भऽ गेल। 'जानकी परिणय' सन खण्डकाव्यमे अकाल, जनकपुर, सीताजन्म, धनुषभङ्ग आ विवाह-संस्कारक चित्रण अछि; भाषिक सरलता, मौलिकता आ सांस्कृतिक विवरण एकरा साहित्येतिहासक उपयोगी सामग्री बनबैत अछि।
ई सिद्धान्त पाश्चात्य कैनन-निर्माण आ साहित्यिक-आर्थिकीक सिद्धान्तसँ आश्चर्यजनक रूपेँ साम्य रखैत अछि। रमानन्द झा जे कहैत छथि — प्रकाशनक अभाव, अनियतकालीन पत्रिका आ सर्वसुलभताक अभाव बहुतो रचनाकारकेँ प्रकाशसँ वञ्चित कऽ देलक — ई विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमानक केन्द्रीय अभिकल्पना थिक। सत्य कहल जाए तँ ई पूरा निबन्ध विदेह-आन्दोलनक पूर्व-घोषणापत्र थिक।
६. पं॰ त्रिलोचन झा, बेतिया — बिसरल मातृभाषानुरागी
त्रिलोचन झा (१८७८–१९३८ ई॰) अनुवादक, कवि, कथाकार-आख्यानलेखक, जीवनीकार, निबन्धकार, सामाजिक कार्यकर्ता आ संस्थापक व्यक्तित्वक रूपमे प्रस्तुत छथि। हुनकामे अपूर्व संगठन-शक्ति छल; 'सुबोधिनी सभा' आ मैथिली-आन्दोलनक संगठनात्मक इतिहासकेँ ई निबन्ध उद्घाटित करैत अछि। ओ मातृभूमि-वन्दना आ अतीत-गानक माध्यमसँ सुप्त मैथिल समाजकेँ जगाबय चाहलनि — "चण्डि तोहर मिथीला देश" जकाँ हुनक पङ्क्तिसभ जनमानसमे ऊर्जाक सञ्चार कएलक। ओ 'श्रीमद्भगवद्गीतादर्श' नामसँ गीताक मैथिली पद्यानुवाद सेहो कएलनि, जे हुनक प्रखर गवेषणात्मक दृष्टिक परिचायक अछि।
हुनकर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकामे बिखरल रहने समग्र मूल्याङ्कन कठिन भेल — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि', ई समीक्षक स्वयं बेर-बेर स्वीकार करैत छथि — मुदा उपलब्ध सामग्री मातृभाषा आ साहित्यक प्रति गाढ़ अनुराग प्रमाणित करैत अछि। हुनकर दृष्टिमे भाषा आ साहित्य समाजक प्रगतिक आधार छल। ओ मैथिल समाजक आलस्य, आत्मकेन्द्रितता आ सांस्कृतिक उदासीनताकेँ ललकारैत छलाह तथा मिथिलाक प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करबाक सामूहिक दायित्वक बोध करबैत छलाह। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ मातृभाषा-सेवा राजनीतिक स्वाधीनताक विस्तार अछि — भाषा-विहीन स्वराज अधूरा स्वराज अछि। एहिठाम सामग्रीक अभावक स्वीकृतिमे समान्तर इतिहास-लेखनक मूल संकट — अभिलेख-दारिद्र्य — प्रत्यक्ष होइत अछि।
७. राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर'
यदुवर (१८८८–१९३५ ई॰) 'मिथिला गीताञ्जलि' (१९२३)क माध्यमसँ राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्रामक चेतनाकेँ मैथिली काव्यमे स्थापित कएलनि। हुनकर कविता मिथिला, मैथिली आ भारतीय राष्ट्रीयताक संयुक्त स्वर अछि। ओ पुरान परम्पराकेँ तोड़ि राष्ट्रीय कार्यक सूत्रपात कएलनि आ संगीतक रागपाशसँ मैथिली कविताकेँ सर्वप्रथम मुक्त कएलनि। हुनक 'मैथिली साहित्य दिग्दर्शन' मैथिलीक प्रथम अनुसन्धानपरक निबन्ध मानल जाइछ, जाहिमे ओ साहित्यक समग्र लेखा-जोखा प्रस्तुत कएलनि अछि।
यदुवरकेँ 'राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा' घोषित करैत रमानन्द झा एक विशिष्ट स्थापना करैत छथि — 'कवीश्वर चन्दा झासँ चलल देश-कालसँ जुड़बाक प्रवृत्तिपरसँ धार्मिक लेप पोछि राष्ट्रीय आ देशोत्थान-विषयक रचनाक सुदृढ़ परिपाटी यदुवरक रचनासँ प्रारम्भ भेल।' 'धार्मिक लेप पोछब' — ई पदावली साहित्यिक प्रवृत्तिक धर्मनिरपेक्षीकरणक सूक्ष्म ऐतिहासिक बोधकेँ प्रकट करैत अछि आ नव-ऐतिहासिकतावादी प्रवृत्ति-रेखाङ्कनक उत्तम नमूना थिक।
ओ शिक्षित मैथिल समाजक मातृभाषा-विमुखता, आलस्य आ बाह्य भाषिक प्रभुत्वक विरुद्ध जागरणक आह्वान करैत छथि। हुनकर काव्यक वीर रस युद्धक्षेत्रक मात्र नहि, भाषिक-सांस्कृतिक संघर्षक वीर रस अछि। मातृभाषामे लिखब, साहित्य प्रकाशित करब आ मैथिल समाजकेँ जगायब हुनका लेल राष्ट्रसेवा छल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ यदुवर भाषाक हीनताबोधकेँ औपनिवेशिक मानसिकताक परिणाम मानैत छथि। विदेह समान्तर इतिहासमे हुनकर कविता राजनीतिक आन्दोलनक समानान्तर चलैत भाषिक स्वाधीनता-आन्दोलनक दस्तावेज बनैत अछि।
८. कवि-सेनानी छेदी झा 'द्विजवर'
अध्याय — मैथिली साहित्यकार सभ राष्ट्रीय चेतनासँ पृथक छलाह — एहि सामान्य आरोपक खण्डन करैत अछि। द्विजवरक जन्म १८९३ ई॰ मे सहरसाक वनगाँवमे भेल छल। ओ केवल राष्ट्रीय कविता लिखनिहार नहि, गान्धीजीक आह्वानपर सरकारी सेवा छोड़ि स्वतन्त्रता-सङ्ग्राममे सक्रिय भाग लेनिहार कवि-सेनानी छलाह आ चारि बेर जेल गेलाह। यदुवर आ द्विजवरक तुलना करैत समीक्षक एक सूक्ष्म भेद स्थापित करैत छथि — यदुवर सरकारी सेवक रहबाक कारणेँ मात्र साहित्यिक स्तरपर सक्रिय, जखन कि द्विजवर सरकारी सेवाकेँ त्यागि राजनीति आ साहित्य दुनू स्तरपर सक्रिय। 'एकहि व्यक्तिमे सर्जनात्मक प्रतिभा आ आन्दोलनात्मक क्षमताक संगम'केँ 'बिरल घटना' कहब — ई मूल्याङ्कन साहित्य आ कर्मक अद्वैतकेँ प्रतिष्ठित करैत अछि, जे प्रतिबद्ध-साहित्यक अवधारणासँ मेल खाइत अछि।
स्वदेशी, चरखा, आर्थिक स्वतन्त्रता आ ग्रामजीवन हुनकर राष्ट्रीयताक आधार अछि — 'चरखा चौमासा' जकाँ कवितामे स्वदेशी आन्दोलनक गूँज स्पष्ट सुनल जा सकैछ। राष्ट्र हुनका लेल अमूर्त सत्ता नहि, गाम-घर, नदी, खेत, मनुष्य आ प्रकृतिक संयुक्त जीवन अछि। हुनक रचना 'छूतहर' समाजक अस्पृश्यता आ सामन्ती क्रूरताक विरुद्ध प्रहार थिक — "अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप? मृतिका एक एके कुम्हार" — ई पङ्क्ति सामाजिक विषमतापर प्रखर प्रहार करैत अछि आ हुनक कवितामे वञ्चित वर्गक स्वर स्पष्ट अछि। वीर रसक सङ्ग करुण आ रौद्र रसक मेल हुनकर कविताकेँ प्रचार-पदसँ ऊपर उठबैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे द्विजवर साहित्य आ राजनीतिक कर्मक मध्यक कृत्रिम विभाजन तोड़ैत छथि।
९. कुमार गंगानन्द सिंहक कथा-संवेदना
कुमार गंगानन्द सिंहक कथा-यात्रा दीर्घ काल (१९२४–१९६५) धरि पसरल अछि। 'मनुष्यक मोल', 'विवाह', 'बिहाड़ि', 'पण्डितपुत्र', 'पञ्च परमेश्वर', 'आमक गाछी' आदि कथामे सामाजिक सुधार, विवाह-कुरीति, अस्पृश्यता, शिक्षा आ ग्रामजीवनक समस्या उठाओल गेल अछि। 'मनुष्यक मोल'मे एक बाल-विधवाक आत्महत्याक कारुणिक यथार्थ अछि; 'बिहाड़ि'मे अछूतोद्धारक चेतना अछि, जतय शोषित वर्ग बाबू-भैयाक बेगारी करबासँ मना कऽ हड़ताल करैत अछि। लेखक हुनकर कथा-विधिक महत्त्व एहि बातमे देखैत छथि जे ओ पुराण अथवा धर्मग्रन्थसँ कथावस्तु नहि लैत, अपन समकालीन समाजसँ लैत छथि — उपाख्यानक उपदेशात्मक परम्परासँ हटि समाजक जीवित विकृतिपर प्रहार करब हुनकर उपलब्धि अछि।
एहि निबन्धमे रमानन्द झा 'अनुभूति-अभिव्यक्ति-सत्य-सम्प्रेषण'क शृङ्खला स्थापित करैत छथि — 'अनुभूतिक अभिव्यक्तिमे सत्यक सम्प्रेषण रहैछ, सत्यक सम्प्रेषणमे जीवन आ परिवेशक यथार्थ व्यञ्जित रहैछ।' ई 'व्यञ्जना'-पद प्रत्यक्षतः आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक स्मरण करबैत अछि — साहित्यक सार्थकता वाच्यार्थमे नहि, व्यङ्ग्यार्थमे अछि। संगहि 'काल-प्रवाहमे प्रमाणित होएब'क कसौटी कालातीत-मूल्यक अवधारणासँ मेल खाइत अछि। 'मनुष्यक मोल' आ 'विवाह'क कर्तृत्व-विवाद (जयकान्त मिश्र आ श्रीश एकरा 'भोल'क रचना मानने रहथि)क समाधान करैत रमानन्द झा भाषा-प्रयोगक समाजशास्त्रीय पाठ प्रस्तुत करैत छथि — 'बिहाड़ि' कथामे रौदी-कामातिक हिन्दी-मिश्रित बोली 'अशिक्षितपर अन्य भाषाक प्रभाव'केँ व्यञ्जित करैत अछि। ई भाषिक-यथार्थवादक सूक्ष्म आलोचनात्मक बोध थिक।
स्त्री-पात्र, बालविवाह, विधवापन आ घरेलू उत्पीड़नक चित्रण करुण रस उत्पन्न करैत अछि। कथा-भाषा सरल, लोकानुकूल आ विनोदपूर्ण अछि। 'आमक गाछी' सन छोट कथामे अनावश्यक विस्तारक अभाव आ रहस्यपूर्ण अन्त आधुनिक कथाक निकट लैत अछि।
१०. कवीश्वरी हरिलताक वैष्णवता
एहि निबन्धक विशिष्टता ई जे रमानन्द झा एक स्त्री-रचनाकार — कवीश्वरी हरिलता (मोदवती, जन्म १९०३ ई॰) — क साहित्य-साधनाकेँ प्रकाशमे अनैत छथि, जे विदेह समान्तर इतिहासक लैङ्गिक पुनरुद्धारक अग्रगामी सङ्केत थिक। हरिलताक जीवन-वृत्त — मात्र चारि वर्षक अवस्थामे विवाह, अल्पवयमे वैधव्य आ पतिक विक्षिप्तता, 'स्त्रीगण लेल पढ़ब निषिद्ध छलैक' तथापि 'सासु आदिसँ चोरा कऽ अक्षर सिखब' — ई सभटा नारी-अस्मिताक संघर्ष-गाथा थिक।
हुनक 'भजनमालिका' (१९३७ ई॰) वैष्णव सगुण भक्तिक उत्कृष्ट निदर्शन अछि। भक्ति-काव्यशास्त्रीय दृष्टिसँ रमानन्द झा हरिलताक 'निराकारकेँ अप्राप्त मानि सगुण-आराधना'केँ वैष्णव-परम्पराक अनुरूप सिद्ध करैत छथि — पलनामे झूलैत, अँगनामे ठुमुकैत, वृन्दावनमे गाय चरबैत सगुण-कृष्णक चित्रण 'श्रुति-मधुरता आ रस-प्रचुरता'सँ युक्त। हुनक गीतमे भक्तिक छओ अङ्ग — आनुकूल्य-संकल्प, प्रातिकूल्य-वर्जन, रक्षण-विश्वास, गोप्तृत्व-वरण, आत्मनिक्षेप, कार्पण्य — आ माधुर्य रस प्रवाहित अछि। बाल-वैधव्यक असह्य पीड़ाकेँ ओ कृष्ण-भक्तिक मधुर रसमे रूपान्तरित कऽ देलीह। ई भक्ति-रस आ वात्सल्य-रसक शास्त्रीय विवेचन थिक।
११. कविवर श्यामानन्द झाक काव्य-वस्तु
लेखक श्यामानन्द झाक काव्यकेँ राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक आ व्यावहारिक चारि वर्गमे पढ़ैत छथि आ 'युग-सचेत कवि'क अवधारणा प्रस्तुत करैत छथि। कविक आक्रोश व्यक्तिगत नहि, तत्कालीन राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक असमानता, भाषिक अपमान आ सामाजिक उदासीनतासँ उत्पन्न अछि — 'जरि जाय जेँ जजाते करिते पटाय की हो' सन आक्रोशक पाछाँ तात्कालिक परिवेशक कारुणिक स्थिति अछि। गान्धी-युगीन राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पतनक विरुद्ध सामन्ती वर्गक उदासीनता — 'कोउ नृप होहिं हमे का हानी' — क तीक्ष्ण व्यङ्ग्यात्मक चित्रण भेटैत अछि।
हुनकर कविता भारतीय स्वाधीनता, मैथिलीक रक्षा, आर्थिक समानता, सामाजिक जागरण आ सांस्कृतिक पुनरुत्थानक आह्वान करैत अछि। ओ अङ्ग्रेजी आ हिन्दीक अन्धभक्त उच्च वर्गपर व्यङ्ग्य करैत लिखैत छथि जे लोक अपन भूषण-वसनकेँ छोड़ि विद्यापतिक नामसँ कान छिपबैत अछि आ "टोप ओ नेकटाय"पर लोट-पोट रहैत अछि — ई सांस्कृतिक दासताक विरुद्ध उद्घोष थिक। 'देश सेवा हित छदामो बाहर होएब दुर्लभ ... सोम होथि छदाम लय' — ई विदग्ध व्यङ्ग्य कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्तक वाक्य-वक्रताक प्रमाण थिक। रस-दृष्टिसँ एहिमे करुण आ वीरक सङ्ग सामन्ती वृत्तिक प्रति बीभत्स-भावक सामञ्जस्य अछि; मार्क्सवादी दृष्टिसँ ई पूँजी-केन्द्रीकरण आ वर्ग-विषमताक प्रत्यक्ष साहित्यिक आलोचना थिक। गरीबी, वस्त्र, भोजन, आवास आ पारिवारिक भारक वर्णन हुनकर सामाजिक दृष्टिक प्रमाण अछि।
हुनक 'मैथिल सन्देश' आ 'मैथिली गीत-चन्द्रिका'मे राष्ट्रप्रेम आ लोक-संस्कृतिक समन्वय अछि। व्यावहारिक गीतमे सोहर, नामकरण, उपनयन, विवाह, कोबर, समदाउन आ अन्य संस्कारक समावेश लोकजीवनक काव्यात्मक अभिलेख रचैत अछि। शृङ्गार, हास्य, भक्ति आ लोकरीतिक समन्वय हुनकर काव्य-वस्तुकेँ व्यापक बनबैत अछि।
१२. बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता
एहि निबन्धमे रमानन्द झा साहित्य-समीक्षाक सीमा लाँघि पत्रकारिता-इतिहासक क्षेत्रमे प्रवेश करैत छथि। लक्ष्मीपति सिंह (१९०७–१९७२)केँ लेखक साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक, संस्कृतिकर्मी आ मैथिली पत्रकारिताक संस्थापक-पुरुषक रूपमे देखैत छथि — 'एक विधामे बान्हल नहि, एक भाषामे नहि'। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुरक शिष्यत्वसँ प्राप्त साहित्य-सर्जनाक मन्त्रकेँ ओ जीवनभरि मातृभाषा-सेवामे लगौलनि आ प्रवासी-मैथिलकेँ मिथिलासँ जोड़बाक आजीवन प्रयास कएलनि।
हुनकर योगदान केवल अपन लेखन धरि सीमित नहि। दुर्लभ रचनाक सम्पादन, प्रकाशन, लेखकक प्रोत्साहन आ पत्रिकाक माध्यमसँ पाठक-समुदायक निर्माण मैथिली सार्वजनिक क्षेत्रक विकासक आधार बनल। ओ मैथिली पत्रकारिताकेँ राजनीतिक आ आर्थिक दासतासँ मुक्त कऽ आत्मनिर्भर बनेबाक वकालत कएलनि आ स्पष्ट कएलनि जे मैथिलीक पत्र-पत्रिका केवल साहित्यिक एकाधिकार नहि, अपितु समाचार आ जन-सरोकारक माध्यम होएबाक चाही। निबन्धक अन्तिम अंश मैथिली समाचार-पत्रक भविष्य-सम्बन्धी दूरदर्शी विश्लेषण थिक — विज्ञापन, संवाददाता-प्रतिनिधित्व, सम्पादकीय नीति आ पाठक-आधारक अभावमे मैथिलहुकेँ आन भाषाक पत्रपर निर्भर रहबाक विवशता। ई मीडिया-समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि अपन युगसँ आगाँ थिक।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टिसँ पत्रकारिता लेखक आ पाठकक बीच जीवित संवाद स्थापित करैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे सम्पादक साहित्यक पार्श्व-पात्र नहि, स्मृति आ पाठकत्वक निर्माता छथि।
१३. कविचूड़ामणि मधुपक गीत-साहित्य
काशीकान्त मिश्र 'मधुप'क गीति-साहित्यक विवेचन एहि संग्रहक सर्वाधिक रसशास्त्रीय निबन्ध थिक। 'गीत भावाश्रित होइछ, हृदयपर ओकर प्रभाव तत्काल पड़ैछ, रागात्मिका वृत्तिक तार झनझना उठैछ' — ई विवेचन प्रत्यक्षतः भरतमुनिक रस-निष्पत्ति आ अभिनवगुप्तक रस-चर्वणाक मैथिली पुनराख्यान थिक; 'नादब्रह्मकेँ जगबैत' गीत-साधनाक अवधारणा भारतीय संगीत-दर्शनक नादब्रह्म-सिद्धान्तसँ जुड़ैत अछि। मधुपकेँ 'घसल अठन्नी सोनाकेँ घसि कऽ हीरा' बनौनिहार आ 'विद्यापति ओ मीरा'क स्वरमे बजनिहार कहि (मणिपद्मक शब्दमे) रमानन्द झा गीति-परम्पराक शीर्ष-स्थान दैत छथि।
मधुपक गीत-संसारमे शृङ्गार, भक्ति, गृहस्थजीवन, नारी-आदर्श, सामाजिक शिक्षा आ सांस्कृतिक संस्कारक मेल अछि। गीत केवल पढ़बाक वस्तु नहि, कण्ठस्थ करबाक, गाबयबाक आ सामुदायिक रूपसँ अनुभव करबाक रचना अछि — 'लोक-जीवनमे गीतक अत्याज्यता' (आँगन, दलान, खेत, खरिहान, कोबर, सिमरिया-घाट)क ई मूल्याङ्कन भट्टनायकक साधारणीकरण-सिद्धान्तक उत्तम प्रयोग थिक। जखन मैथिल युवा वर्ग सिनेमाक गीतक धुनपर पागल छल, तखन मधुपजी मैथिली भाषाकेँ विलुप्त होएबासँ बचेबाक लेल सिनेमाक तर्जपर मैथिली गीत लिखलनि — विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ ई जनभाषाकेँ जीवित रखबाक एकटा लोकतन्त्रवादी, जमीनी प्रयास छल। 'वट-सावित्री' जकाँ पावनिक कथाकेँ ओ गीतक रूप देलनि जाहिसँ नीरसता समाप्त भेल, स्त्री आ बालक धरि कथा पहुँचल आ लोक-कण्ठमे मैथिली स्थापित भेल — ई गीतक सामाजिक प्रयोगशीलता देखबैत अछि।
रस-दृष्टिसँ मधुपक गीतमे भक्ति, विप्रलम्भ शृङ्गार आ करुणाक समन्वय अछि। ध्वनि-दृष्टिसँ गृहस्थ आदर्शक भीतर स्त्रीक सामाजिक भूमिका, परिवारक नैतिक अनुशासन आ लोकपरम्पराक संरक्षण निहित अछि।
१४. भट्टीकाव्यक परम्परा आ मधुपजी
ई निबन्ध कृतिक सभसँ साहसी सैद्धान्तिक अध्याय थिक आ संस्कृतक शिक्षाप्रद काव्यपरम्परा तथा मैथिली काव्यक अन्तर्सम्बन्धक खोज करैत अछि। भट्टीकाव्यमे कथा केवल रसास्वाद लेल नहि, व्याकरण, अलङ्कार, छन्द आ भाषाज्ञानक शिक्षण लेल सेहो प्रयुक्त अछि; मधुपजीक काव्यमे एहि शिक्षणपरक परम्पराक आधुनिक मैथिली रूप देखल गेल अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ ज्ञान आ आनन्दक एकता एहि अध्यायक प्रमुख सूत्र अछि — काव्य नितान्त उपदेश होइत तँ रसहीन भऽ जाइत; नितान्त मनोरञ्जन होइत तँ शैक्षिक प्रयोजन लुप्त भऽ जाइत। मधुपक उपलब्धि एहि द्वन्द्वमे समन्वय स्थापित करब अछि।
'कोबर-गीत'क रचनाकेँ आधार बनाय रमानन्द झा एक निर्भीक प्रश्न उठबैत छथि — 'कविता कथी लेल लिखल जाइत अछि?' आ स्पष्ट उत्तर दैत छथि — 'यश' आ 'अर्थ'; कोनो कवि एहि दुनू शर्तक सीमासँ बाहर नहि। ई घोषणा साहित्यक शुद्धतावादी आदर्शवादकेँ चुनौती दैत ओकर भौतिक-आर्थिक आधारकेँ उद्घाटित करैत अछि — जे स्पष्टतः मार्क्सवादी साहित्य-समाजशास्त्रक अन्तर्दृष्टि थिक। प्रसङ्ग ई जे विद्यालयक अनुदान बचेबाक विवशतामे — कुमार गंगानन्द सिंह आ राजपण्डित बलदेव मिश्रक दबावमे — मधुपजीकेँ महाराज कामेश्वर सिंहक 'कोबर गीत' लिखय पड़लनि। 'कोबर-गीत'केँ 'युगीन विवशताक द्योतक' कहि रमानन्द झा एक जटिल नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्नक सामना करैत छथि — कवि अपन आत्माक प्रतिकूल किएक लिखैत छथि? ओ स्वीकार करैत छथि जे मधुपक 'कवित्व-शक्ति ततेक प्रखर छल जे अनिश्चित विषयोपर सेहो दिव्य-मार्मिकता आबि जाइत छलैक।' ई प्रयोजन आ प्रतिभाक द्वन्द्वक ईमानदार विवेचन थिक। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय संस्कृत आ मैथिलीकेँ स्वामी-दास सम्बन्धमे नहि, संवादशील परम्परामे रखैत अछि।
१५. काञ्चीनाथ झा 'किरण'क कथा-जगत
किरण (१९०६–१९८९)केँ रमानन्द झा तृतीय दशकक संक्रान्ति-कालक प्रतिनिधि कथाकार मानैत छथि — विद्यापतीय कल्पनालोकसँ हटि 'देसिल वयना'क यथार्थ दिस उन्मुख। हुनक कथा-जगत ('चन्द्रग्रहण', 'धर्मरत्नाकर', 'समाजक चित्र') सामाजिक विषमता, जाति, श्रम, धर्मान्धता, सत्ता, स्त्री आ मनुष्यक नैतिक सङ्घर्षक कथा-जगत अछि। लेखक हुनकर रचनामे समाजक अँधार परतकेँ भेदयवला आलोचनात्मक प्रकाश देखैत छथि। 'चन्द्रग्रहण'मे प्राकृतिक घटनापर अन्धविश्वासक आड़मे होइत व्यभिचार आ ठगी उजागर अछि; 'धर्मरत्नाकर'मे राम किसन जकाँ शोषित रैयतक हाहाकार आ धर्मरत्नाकर बाबू साहेबक पाखण्ड बेनकाब कएल गेल अछि।
'जाड़क पालामे ठिठुरैत नाङट नेना', 'लाज झँपबा लेल व्याकुल तरुणी', 'स्कूलक फीस लेल दौड़ करैत देशक भविष्य' — ई सभ बिम्ब यथार्थवादी करुण-रसक तीव्र सम्प्रेषण थिक। पाठक-प्रतिक्रिया-सिद्धान्तक दृष्टिसँ किरणक कथाक विस्फोट-क्षण — 'कल्पनाक मचकीपर आस लगैत काल यथार्थसँ सरोकार छूटि जाएब' — केँ रमानन्द झा जाहि सूक्ष्मतासँ पकड़ैत छथि, ओ रूपवादी अपरिचितीकरणक बोधक परिचायक थिक।
मार्क्सवादी दृष्टिसँ किरण सुविधा-सम्पन्न वर्ग आ श्रमजीवी वर्गक अन्तर उजागर करैत छथि; दलित दृष्टिसँ सामाजिक प्रतिष्ठाक ब्राह्मणवादी निर्धारण प्रश्नाङ्कित होइत अछि; नारीवादी दृष्टिसँ स्त्रीक जीवन केवल गृहस्थ आदर्शक उदाहरण नहि, स्वतन्त्र सामाजिक अनुभवक क्षेत्र बनैत अछि। किरणक कथा लोकमङ्गलवादी अछि, मुदा उपदेश मात्र नहि — पात्रक अन्तर्विरोध, विडम्बना आ सामाजिक असंगति कथाकेँ जीवित बनबैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे किरण मिथिलाक गौरवगानक बदला मिथिलाक भीतरक विषमता देखबैत छथि।
१६. मैथिली उपन्यासक आलोकमे 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र
ई निबन्ध कृतिक सर्वाधिक आधुनिक-आलोचनात्मक अध्याय थिक आ मैथिली उपन्यासमे स्त्री-पात्रक परिवर्तनशील रूपक अध्ययन करैत अछि। किरणक 'चन्द्रग्रहण' (१९३२)क रजनी आ सुषमासँ लऽ कऽ 'रूपा' (१९८८) धरिक नारी-पात्रक विकास-रेखाकेँ रमानन्द झा समाज-सुधार-आन्दोलनक ऐतिहासिक पृष्ठभूमिसँ जोड़ि विश्लेषित करैत छथि — 'जेना-जेना परिवेशमे सुधारात्मक-आन्दोलनात्मक चेतना प्रखर होइत गेल, उपन्यासक चरित्र-निर्माणमे तकर प्रभाव पड़ैत रहल।' ई साहित्य आ समाजक द्वन्द्वात्मक सम्बन्धक उत्कृष्ट नव-ऐतिहासिकतावादी पाठ थिक।
सामाजिक सुधार-आन्दोलन, शिक्षा आ आधुनिक चेतनाक प्रभावसँ 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र पारम्परिक मौनता छोड़ि नूतन व्यक्तित्व ग्रहण करैत अछि। नारीक अन्तःकामना, प्रेम, विरह, देहबोध, निर्णय आ सामाजिक दायित्व कथाक सक्रिय अङ्ग बनैत अछि; वातावरण आ नायिकाक अन्तःस्थितिक समान्तर विन्यास मनोवैज्ञानिक गहराई उत्पन्न करैत अछि। नारीवादी समीक्षाक दृष्टिसँ ई निबन्ध कृतिक सर्वाधिक अग्रगामी अछि — किएक तँ रमानन्द झा पण्डित-वर्गक ओहि पाखण्डकेँ उघारैत छथि जकर 'समस्त उपदेश अनके लेल' होइत छैक, आ जे मेला-ठेलामे अपहृत नारीकेँ सेहो शिक्षासँ वञ्चित रखैत अछि। 'रचनाकारक व्यक्तित्वक आक्रामकता'केँ चरित्र-निर्माणमे देखब — ई अभिव्यञ्जनावादी आलोचना थिक। स्त्रीकेँ केवल त्यागमूर्ति अथवा कुलरक्षिका नहि, इच्छाशील आ विचारशील मनुष्यक रूपमे देखबाक ई प्रयास महत्त्वपूर्ण अछि।
१७. प्रो॰ हरिमोहन झा एवं हुनक 'चर्चरी'
मैथिलीक सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य-व्यङ्ग्यकार हरिमोहन झा (१९०८–१९८४)क 'चर्चरी' एक विधाक पोथी नहि — एहि संग्रहमे कथा, एकाङ्की, छायारूपक, पत्र, दलानक गप्प, पोखरिक गप्प, प्रहसन आ सांस्कृतिक निबन्ध सम्मिलित अछि। 'चर्चरी'क एहि विविध-विधात्मक स्वरूपकेँ व्यञ्जन-सम्मिलित 'चर्चरी' (भोज्य-पदार्थ)क रूपकसँ उद्घाटित करब — ई नामकरण-मूलक विश्लेषण चतुर अछि। लेखक एकरा पारम्परिक कथा अथवा निबन्ध नहि, स्वतन्त्र गप्प-विधाक रूपमे पहचानैत छथि — हुनक रचना-संसार ('चर्चरी', 'खट्टर ककाक तरंग', 'प्रणम्य देवता') मैथिलीमे गप्प-विधाक प्रवर्तन कएलक। हास्य-व्यङ्ग्य आ वक्रोक्तिक माध्यमसँ ओ थोथा पाण्डित्य, रूढ़िवाद आ सामाजिक पाखण्डपर प्रहार कएलनि। हुनक 'पाँच पत्र' जकाँ रचना रस-सिद्धान्तक दृष्टिसँ करुण रसक उत्कृष्ट निदर्शन थिक, जे पति-पत्नीक बदलैत रागात्मक सम्बन्ध आ युग-बोधकेँ मार्मिक रूपेँ प्रस्तुत करैत अछि; 'रेलक झगड़ा' जकाँ प्रहसनमे आधुनिक शिक्षाक वायुसँ सिहकल परिवारक हास्यपूर्ण चित्रण अछि।
हरिमोहन झाक सभसँ पैघ उपलब्धि मैथिलीमे विशाल पाठक-समुदायक निर्माण अछि। मैथिल समाजक हास्यप्रिय संस्कारकेँ ओ साहित्यिक रूप देलनि आ पाठककेँ साहित्य दिस आकर्षित कएलनि। भारतीय हास्यरस आ पाश्चात्य व्यङ्ग्य-दृष्टि एहि रचनामे एकत्र होइत अछि; गप्पक मिश्रित विधागत स्वरूप लोकक मौखिक कथन, शास्त्रीय विनोद आ आधुनिक मुद्रित साहित्यक बीच सेतु बनबैत अछि।
संगहि ई निबन्ध संग्रहक सर्वाधिक असहमति-प्रधान निबन्धमे एक थिक। रमानन्द झा हरिमोहन झा-सन कैननी लेखकक सीमाकेँ निर्भीकतासँ रेखाङ्कित करैत छथि — 'अधिकांश रचना पढ़लापर विचारक उन्मेष नहि होइछ, वैचारिक मन्थन नहि होइछ, मात्र गुदगुदी लगैछ, एक बेर हँसा गेलापर ओकर प्रभाव बिला जाइछ।' ई कैनन-केन्द्रित मूल्याङ्कनक विरुद्ध विदेह-प्रतिमानक पुनर्मूल्याङ्कन-साहसक अग्रदूत थिक — लोकप्रियताकेँ साहित्यिक श्रेष्ठताक पर्याय नहि मानब।
१८. कविवर यात्रीक स्तम्भ-लेखन
यात्री (नागार्जुन)क स्तम्भ-लेखनकेँ साहित्यिक विधाक रूपमे प्रतिष्ठित करैत रमानन्द झा मैथिली पत्रकारिता आ साहित्यक अन्तःसम्बन्धकेँ उद्घाटित करैत छथि। प्रारम्भिक पत्र-पत्रिकाक उद्देश्य मातृभाषा-सेवा आ सामाजिक कुरीतिक निदान छल; पाठकीय स्तम्भ लेखक, सम्पादक आ पाठकक बीच वैचारिक संवाद स्थापित करैत छल। 'यत्र तत्र सर्वत्र', 'यत्किंचित' आ 'चिन्तन-अनुचिन्तन' सन स्तम्भमे यात्री राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, भाषा आ संस्कृतिपर तात्कालिक टिप्पणी करैत छथि; 'चोआ-काका' सन व्यङ्ग्य-पात्रक विकास धरिक विश्लेषण एहि निबन्धमे अछि। यात्रीक 'तेज दृष्टिक सीमा-रेखासँ छोटसँ छोट घटनाक बाहर नहि रहब' — ई व्यङ्ग्यकारक सर्वग्राही दृष्टिक स्वीकृति थिक।
यात्री अपन स्तम्भक माध्यमसँ शासक वर्गक वाक्जाल, मिथिलाञ्चलक आर्थिक उपेक्षा आ भाषा-साम्राज्यवादक तीक्ष्ण आलोचना कएलनि। ओ हिन्दीकेँ सम्पर्कभाषाक सम्मान दैतहुँ ओकर नामपर मैथिली आ अन्य भाषाक अधिकार छीनबाक विरोध करैत छथि। स्तम्भक भाषा तीक्ष्ण, व्यङ्ग्यपूर्ण, संवादात्मक आ पात्रप्रधान अछि। विधा-विस्तारक दृष्टिसँ ई निबन्ध साहित्येतिहासकेँ अखबारी गद्य दिस उन्मुख करैत अछि आ मैथिली गद्यमे राजनीतिक व्यङ्ग्य तथा सामाजिक चिन्तनक एकटा नव प्रतिमान रेखाङ्कित करैत अछि।
१९. कविवर आरसी
आरसी प्रसाद सिंह (जन्म १९११ ई॰) मैथिली आ हिन्दी दुनू भाषामे सर्जन करैत छलाह, मुदा मैथिलीमे हुनकर मुख्य परिचय गीतकारक अछि। 'शेफालिका', 'माटिक दीप', 'पूजाक फूल' आ 'सूर्यमुखी'क माध्यमसँ हुनकर काव्य-यात्रा राष्ट्रीयता, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक चेतना आ जन-अधिकार धरि विस्तृत होइत अछि। हुनकर प्रारम्भिक गीतमे राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता, त्याग आ भारतीय समन्वित संस्कृतिक स्वर अछि — ओ नव युगक नव निर्माण आ कोटि-कोटि भारतवासीकेँ ऐक्य-सूत्रमे बान्हबाक आह्वान करैत छथि; बादक कवितामे मिथिलाक शोषण, भाषिक अधिकार, बाढ़, राजनीतिक भ्रष्टाचार आ जनाक्रोश मुखर होइत अछि।
रूपवादी दृष्टिसँ आरसीक विशेषता गीतात्मकता, बिम्ब, अनुप्रास, इन्द्रियबोध आ कोमल भावप्रवाह अछि। एहि निबन्धक विशेष शक्ति इन्द्रियबोध-विश्लेषणमे अछि — हरसिंगार आ सुमनमे रस-गन्ध, पवनमे स्पर्श, सुरभि-धारमे रस-गन्ध-नादक सम्मिश्रण — ई विभिन्न इन्द्रियबोधक सम्मिश्रण-विश्लेषण पाश्चात्य आधुनिक काव्य-समीक्षाक परिष्कृत उपकरण छी; भारतीय दृष्टिसँ ई गुण-रीति (माधुर्य-गुण) आ अलङ्कार-विवेचनक क्षेत्र थिक। 'शेफालिका'सँ 'सूर्यमुखी' धरिक यात्रा वैयक्तिक सौन्दर्यचेतनासँ सामाजिक चेतना दिस बढ़ैत कविक विकास अछि।
२०. उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ हुनक कविता
संग्रहक अत्यन्त विस्तृत निबन्धमे सँ ई एक 'आयल वसन्त'क अमर गीतकार मोहनकेँ समर्पित अछि। मोहनजीक कविता स्मृति, प्रकृति, वसन्त, गीतात्मकता आ जीवन-सङ्घर्षक सम्मिलित संसार अछि। 'आयल वसन्त' सन गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी कण्ठस्थ रहल, जाहिसँ कविता पाठ्यपुस्तकक बाहर जीवित सामुदायिक स्मृति बनल। रमानन्द झा एतय आत्मकथात्मक शैली — छात्र-जीवनमे श्रीरामचन्द्र बाबूक कक्षामे गीत-श्रवण, 'मिहिर'-कार्यालयमे मोहनक अनवरत कर्मशीलताक स्मरण — अपनबैत छथि, जे समीक्षाकेँ संस्मरणात्मक आत्मीयता दैत अछि।
मोहनक मातृभाषा-प्रेम — 'घरक गोसाउनि झँखथि अन्हारेँ, मन्दिर बारब दीप?', 'गाम नोत नहि, नोत बेलाही' — क माध्यमसँ भाषिक अस्मिताक तीक्ष्ण चेतना उद्घाटित होइत अछि। 'जखन मैथिली सूपक भाँटा भेल संकटापन्न, की राष्ट्रीयता? देश-भक्ति की?' — ई पदावली भाषा आ राष्ट्रीयताक अन्तःसम्बन्धकेँ प्रश्नाङ्कित करैत अछि।
मोहनजीक जीवन आर्थिक अभाव, शिक्षाक संघर्ष, प्रवास, रोजगार-अभाव आ मुद्रणालयक श्रमसँ बनल। एहि कारण हुनकर कविता केवल प्रकृतिक माधुर्य नहि, श्रमशील जीवनक भीतर सौन्दर्य बचायबाक प्रयत्न अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ मुद्रणालयक प्रूफ-संशोधक सेहो साहित्येतिहासक निर्माता छथि — ओ केवल दोसरक पोथी सुधारैत नहि, अपन समयक भाषिक रूप, वर्तनी आ साहित्यिक संस्कृतिक संरक्षक बनैत छथि।
२१. शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'
उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' (जन्म १९१७ ई॰) मैथिली भाषाक शुद्ध, देशज आ स्वाभाविक रूपक पक्षधर कथाकार छथि। 'विडम्बना' आ 'भजना भजले'क विवेचनमे रमानन्द झा मात्रा बनाम गुणवत्ताक सैद्धान्तिक प्रश्न उठबैत छथि — 'ढाकीक-ढाकी लिखेलेपर जँ कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत नहि भऽ सकल ... तँ जीवन-कालहिमे रचनाकार अप्रासङ्गिक घोषित भऽ जाइत अछि।' ई रूपवादी गुणवत्ता-केन्द्रित मूल्याङ्कन थिक; व्यासक कथाक 'बासितेवासि नहि, टटका बनल रहब' — कालातीत ताजगी — क कसौटी कालातीत-मूल्यक अवधारणासँ मेल खाइत अछि।
हुनकर कथा भाषा-प्रयोग, सामाजिक व्यङ्ग्य, नैतिक विडम्बना आ ग्रामजीवनक जीवित संवादक कारण विशिष्ट अछि। शुद्धतावाद हुनका लेल केवल शब्दक छनोट नहि, सांस्कृतिक प्रतिरोध अछि — बाहरी भाषिक प्रभावक बीच मैथिलीक अपन वाक्य-विन्यास, लोकोक्ति, उच्चारण आ भावभूमि बचायब मातृभाषाक अस्मिता बचायब छल। रूपवादी दृष्टिसँ हुनकर कथा-भाषा पात्रक सामाजिक स्तर आ मानसिकता निर्माण करैत अछि; उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ भाषिक शुद्धताक आग्रह स्वाभिमानक प्रतीक अछि।
२२. पं॰ राजेश्वर झा : व्यक्तित्व ओ कृतित्व
राजेश्वर झा (१९२२–१९७७) शोधकर्ता, नाटककार, कथाकार, सम्पादक, प्रकाशक आ संस्थापकक रूपमे अत्यन्त सक्रिय छलाह। हुनकर कृतिकेँ अनुसन्धानपरक, ऐतिहासिक-पौराणिक आ सर्जनात्मक तीन वर्गमे बाँटल गेल अछि — 'मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास', 'मैथिली साहित्यक आदिकाल', 'अवहट्टक उद्भव ओ विकास' आदि हुनकर शोधपरक कृति अछि। एहि विवेचनमे रमानन्द झा एक गम्भीर पद्धतिगत घोषणा करैत छथि — 'साहित्यकारक व्यक्तित्वकेँ बूझब सर्वप्रथम आवश्यक अछि, विना व्यक्तित्व बूझने कृतित्वक तहमे जाएब सम्भव नहि।' ई जीवनीमूलक समीक्षाक स्पष्ट प्रतिपादन थिक। राजेश्वर बाबूक आर्थिक विपन्नताक अछैत प्रतिवर्ष पोथी-प्रकाशन आ लोककेँ लिखबाक लेल प्रेरित करब — एहि प्रेरक भूमिकाकेँ रमानन्द झा कृतित्वसँ बेसी मूल्यवान् मानैत छथि ('तराजूक पलरापर व्यक्तित्व भरिगर भऽ जएतनि')। संस्था-निर्माताक ई मूल्याङ्कन विदेह-आन्दोलनक संस्था-केन्द्रित दृष्टिक पूर्वाभास थिक।
अध्यायक विशेषता ई अछि जे लेखक प्रशंसापर रुकैत नहि। राजेश्वर झाक साहित्येतिहासक काल-विभाजन, ईसापूर्व सहस्राब्दीसँ मैथिली साहित्यक आरम्भ आ अवहट्टसम्बन्धी अनेक निष्कर्षकेँ प्रमाणहीन कहैत छथि। औचित्य आ ऐतिहासिक पद्धतिक दृष्टिसँ ई अध्याय 'अखियासल'क सर्वाधिक सन्तुलित आलोचनामे सँ एक अछि — व्यक्तिक श्रमक सम्मान आ हुनकर निष्कर्षक कठोर परीक्षण एकसाथ सम्भव अछि।
२३. ललितक कथामे परिवेशक संक्रान्त जीवन
ललितक कथाकेँ रमानन्द झा स्वातन्त्र्योत्तर मोहभङ्गक साहित्यिक दस्तावेजक रूपमे व्याख्यायित करैत छथि — स्वतन्त्रतापूर्व आशा आ स्वतन्त्रतापरान्त मोहभङ्गक बीचक संक्रमण: 'आशाक किरण निराशामे बदलि गेलैक, लाबनि टूटि कऽ खसि पड़लैक।' प्रथम निर्वाचनमे धुरफन्दी, स्वार्थान्धता, धन, जाति आ जातिवादक नग्न-नाच, नकली नेता, गरीब मतदाता आ भ्रष्ट विकास-योजना — ई सभ सामाजिक परिवेशक यथार्थ बनैत अछि। ई मार्क्सवादी-यथार्थवादी समीक्षाक उत्कृष्ट प्रयोग थिक, जे साहित्यकेँ राष्ट्रीय-राजनीतिक यथार्थक संक्रमणशील प्रतिबिम्ब मानैत अछि।
मार्क्सवादी दृष्टिसँ 'प्रतिनिधि' सन कथा सुविधा-भोगी शासक वर्ग आ अधिकार-विहीन गरीबक द्वन्द्व उद्घाटित करैत अछि — श्रमकेँ हीन बुझनिहार शिक्षित युवक अन्ततः शारीरिक श्रमक महत्त्व स्वीकारैत अछि। 'लड़ाइ'-कथामे द्वैध-मानसिकता आ दू पीढ़ीक वैचारिक स्तर तथा दायित्वबोधक विश्लेषण अछि। 'रमजानी', 'मृत्युञ्जय', 'ओभरलोड', 'दू चित्र' आदि कथामे परम्परा-विघटन, रोजगार-संकट, धार्मिक पाखण्ड, देहगत आवश्यकता, अस्तित्वगत भार आ सामन्ती मानसिकताक अवशेष अछि।
२४. धीरेन्द्रक कथाक सामाजिक सन्दर्भ
अध्याय सामाजिक सन्दर्भक सैद्धान्तिक व्याख्यासँ आरम्भ होइत अछि आ एहिमे रमानन्द झा अपन सर्वाधिक परिष्कृत सैद्धान्तिक प्रतिपादन प्रस्तुत करैत छथि — 'सामाजिकता थिक समाजरूपी नेहाइपर पीटि तैयार रूपाकृति; नेहाइ थिक व्यक्ति-मन आ सामाजिक-मनक द्वन्द्व।' ई व्यक्ति-मन बनाम सामाजिक-मनक द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त कृतिक बौद्धिक शिखर थिक — जे मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद आ मनोविश्लेषणात्मक समीक्षाक संगमसँ निर्मित अछि। लेखकक वैयक्तिक अनुभव तखन सामाजिक बनैत अछि जखन पाठकक सुप्त अनुभवकेँ जागृत कऽ सामूहिक मनक प्रतिनिधित्व करए — रचनाकारक अनुभवक 'समाजक अनुभव भऽ पएब, समाजक दर्पण भऽ पएब' कलाक प्रतिबिम्ब-सिद्धान्तक सुस्पष्ट मैथिली अभिव्यक्ति थिक।
धीरेन्द्रक कथामे शिक्षित बेरोजगारी, सिफारिश, भ्रष्ट नियुक्ति, सत्यक अवमूल्यन, गरीबक श्रमक अपहरण आ वर्गीय शोषणक चित्र अछि। 'मनुख बिकाइत' आ 'गीध'क प्रतीक आधुनिक समाजमे मनुष्यक वस्तुकरण आ शक्तिशाली द्वारा निर्बलक भक्षण व्यक्त करैत अछि — मार्क्सवादी दृष्टिसँ 'गीध' पूँजी आ सत्ता द्वारा श्रमजीवी शरीरक उपभोगक रूपक अछि। साधारणीकरणक दृष्टिसँ बेरोजगार युवकक निजी वेदना देशक लाखों युवकक वेदना बनैत अछि। धीरेन्द्रक कथाक 'आँखिक डबडबाएब'केँ समान-तत्त्व आ शिल्पक रूपमे विवेचित करब सूक्ष्म रूपवादी अवलोकन थिक, यद्यपि एतय समीक्षक भावुकता आ शिल्पक भेद-रेखापर अपन असमंजस स्वयं स्वीकार करैत छथि।
२५. प्रभासक कथा-यात्रा
संग्रहक अन्तिम आ सर्वाधिक दीर्घ निबन्ध प्रभास कुमार चौधरी (जन्म १९४१ ई॰)केँ समर्पित अछि। रमानन्द झा एतय एक व्यापक प्रभाव-अध्ययन करैत छथि — मैथिली कथापर संस्कृत, अङ्ग्रेजी आ बङ्गला, तीन साहित्यक प्रभावक विश्लेषण। ई तुलनात्मक साहित्यक पद्धतिगत प्रयोग थिक, जे संग्रहकेँ ऐतिहासिक वर्णनसँ उठाय सैद्धान्तिक तुलनाक स्तरपर लऽ जाइत अछि।
प्रभासक दू दशकक कथा-यात्राकेँ क्रमिक यात्रा मानि लेखक हुनकर जीवन-दृष्टि, सामाजिक चेतना आ कथन-पद्धतिमे भेल परिवर्तनक परीक्षण करैत छथि — कथाकारक 'घरसँ चलि, गाममे घुमि, क्रमशः भावगत निर्लिप्तता आ निष्क्रियता-बोध धरि पहुँचब'क विकास-रेखा। आर्थिक विपन्नता, समाजक स्वार्थ, गरीबक उपेक्षा आ तथाकथित सम्भ्रान्त वर्गक अमानवीयता हुनकर कथाक मुख्य विषय बनैत अछि। प्रभासक कथा-यात्रा व्यक्ति-केन्द्रित अनुभवसँ व्यापक सामाजिक संरचना दिस बढ़ैत अछि — पात्र प्रारम्भमे परिस्थितिक शिकार बुझाइत अछि, मुदा धीरे-धीरे शोषणक संरचनाकेँ पहचानय लगैत अछि। ई लेखकीय चेतनाक विकासात्मक अध्ययन समीक्षकक परिपक्व दृष्टिक द्योतक थिक। संग्रहक समापन एहि आधुनिकतम कथाकारपर होएब 'प्रथम'सँ 'समकालीन' धरिक यात्राकेँ पूर्ण करैत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ प्रभासक कथा इतिहासक विजय-घोष नहि, उपेक्षित मनुष्यक दैनिक पराजय, संघर्ष आ आत्मरक्षाक इतिहास लिखैत अछि।
उत्तरार्ध : अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
एहि मूल्याङ्कनक दोसर आधा भाग पूर्णतः 'अखियासल'क सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकटकेँ समर्पित अछि। ई आलोचनात्मक कठोरता कोनो अवमूल्यन नहि, अपितु कृतिक ऐतिहासिक महत्त्वक गम्भीर स्वीकृतिक अनिवार्य अङ्ग थिक — एक अग्रगामी ग्रन्थक सीमाक निर्मम विवेचन उपरान्तहि ओकर उत्तराधिकारी प्रयास अपन दिशा निर्धारित कऽ सकैत अछि।
१. श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' अध्यायक सीमा
'चन्द्रप्रभा'केँ प्रथम कथा-संग्रह मानबाक तर्क महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा उपलब्ध पाण्डुलिपि अपूर्ण अछि। सम्पूर्ण पाठ, रचनाकाल, पाठान्तर आ लेखकक अन्तिम रूपक अभावमे 'प्रथम' पद सावधानीसँ देल जाएबाक चाही। अध्याय ऐतिहासिक महत्त्वपर अधिक केन्द्रित अछि; कथा सभक पृथक कथानक, चरित्र, कथावाचक, समय-विन्यास आ भाषिक संरचनाक निकट परीक्षण कम अछि। संस्कृत नीति-कथा परम्परासँ समानता देखाओल गेल अछि, मुदा समानता, प्रभाव, रूपान्तरण आ मौलिकताक स्पष्ट भेद सर्वत्र नहि राखल गेल। संगहि, विदेह-दृष्टिसँ ई सेहो कहल जा सकैछ जे 'चन्द्रप्रभा'क कथा-संसार मुख्यतः संस्कृत ग्रन्थक छायामे पलल-बढ़ल अछि; एहिमे जमीनी लोक-जीवन आ वञ्चित वर्गक यथार्थवादी चित्रणक अभाव अछि, आ नीति-उपदेशक प्राधान्य रस-निष्पत्तिमे बाधक बनैत अछि। आरम्भिक होयबाक गौरव कृतिक कलात्मक सीमाकेँ ओझल नहि करबाक चाही।
२. जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर' अध्यायक सीमा
अध्याय 'रामेश्वर'केँ प्रथम मौलिक उपन्यास सिद्ध करबाक दिशामे प्रबल अछि, मुदा 'प्रथम'क प्रमाण लेल समकालीन प्रकाशन-सूची, विज्ञापन, पाण्डुलिपि आ अन्य सम्भावित उपन्यासक व्यवस्थित तुलना अपेक्षित छल। रामेश्वरक अपराधकेँ सामाजिक विवशतासँ व्याख्यायित करब युक्तिसंगत अछि, मुदा पत्नीपर अविश्वास, हिंसक प्रवृत्ति आ डकैतीमे सक्रिय सहभागिताक नैतिक उत्तरदायित्व कम प्रश्नाङ्कित भेल अछि। अन्तमे पुत्रसँ पुनर्मिलन आ चरित्र-परिवर्तन अत्यन्त आकस्मिक अछि — मनोवैज्ञानिक रूपान्तरणक क्रमिक प्रक्रिया अनुपस्थित रहने समाधान अतिनाटकीय बुझाइत अछि। मार्क्सवादी निकषपर सेहो ई कहल जा सकैछ जे अन्ततः उपन्यासकार रामेश्वरक हृदय-परिवर्तन करा कऽ वर्ग-संघर्षकेँ एकटा नैतिक आदर्शवादमे बदलि दैत छथि — क्रान्तिक सम्भावनाकेँ सुधारवादक पानिसँ निझा देल जाइछ। स्त्री-पात्र पार्वतीक पीड़ा अछि, मुदा हुनकर स्वाधीन दृष्टि सीमित अछि।
३. 'सुमति' अध्यायक सीमा
अध्याय पूर्ववर्ती आलोचकक मतक सङ्ग संवाद करैत अछि, मुदा 'सुमति'क सम्पूर्ण कथानक, पात्र-संरचना, दृष्टिबिन्दु आ भाषा-विन्यासक पर्याप्त प्रत्यक्ष विश्लेषण नहि करैत अछि। ऐतिहासिक महत्त्व आ 'सफल आधुनिक उपन्यास' होयबाक दावा बीच तनाव अछि — जखन कथानक असंगठित, चरित्र अस्पष्ट आ प्रस्तुति अपरिपक्व अछि, तखन 'सफलता'क कसौटी स्पष्ट होयबाक चाही। नारीवादी दृष्टिसँ एकटा गम्भीर प्रश्न ई जे सुमतिक शिक्षाक एकमात्र उद्देश्य देखाओल गेल अछि — खसैत सासुरकेँ सम्हारब आ परिवारकेँ कर्जसँ मुक्त करब; एतय नारीक अपन कोनो स्वतन्त्र सत्ता वा आकाङ्क्षा नहि अछि, ओ पितृसत्तात्मक परिवारक उद्धारकक भूमिका धरि सीमित अछि। 'उचित वक्ता' रूपेँ कथावाचकक बेर-बेर हस्तक्षेप उपन्यासक संरचनात्मक स्वायत्ततेकेँ खण्डित करैत अछि, जकरा जयकान्त मिश्र 'अपरिपक्व शिल्प' कहने छथि; भाषा निबन्धात्मक अछि, जाहिमे तुलसीदासक चौपाइक भरमार अछि — ई काव्य-दोष थिक। सामाजिक सुधारक विषय अपनहि कलात्मक श्रेष्ठताक प्रमाण नहि — कथा-वस्तु महत्त्वपूर्ण होइतहुँ ओकर प्रस्तुति, चरित्रगत जटिलता आ आन्तरिक अनिवार्यता समान रूपसँ आवश्यक अछि।
४. 'निर्दयी सासु' अध्यायक सीमा
कथा स्त्री-उत्पीड़नक प्रश्न उठबैत अछि, मुदा सासुकेँ 'निर्दयी' खलपात्र बनाओलापर पितृसत्ताक व्यापक संरचना व्यक्तिगत क्रूरतामे सीमित भऽ सकैत अछि। सासु स्वयं कोन सामाजिक दबाव, आर्थिक भय, विवाह-व्यवस्था आ प्रतिष्ठा-बोधक उत्पाद छथि — एहि प्रश्नक पर्याप्त विवेचन नहि अछि। पुतोहुक चरित्र करुणाक पात्र बनैत अछि, मुदा ओकर प्रतिरोध, इच्छाशक्ति, स्त्री-समुदायक सहयोग आ वैकल्पिक जीवन-सम्भावना कम विकसित अछि — नायिका शारदा सम्पूर्ण कथामे प्रायः मूक अछि, आ वञ्चित-विमर्शक यक्ष प्रश्न — की उपाश्रित बाजि सकैत अछि? — एतय पूर्णतः प्रासङ्गिक अछि। एकाङ्गी आ सपाट चरित्र-निर्माण संरचनावादी दृष्टिसँ सेहो सीमा थिक। नारीवादी दृष्टिसँ स्त्रीकेँ केवल पीड़िता बनायब सेहो प्रतिनिधित्वक सीमा अछि।
५. बिसरल साहित्यसेवी जनार्दन झासम्बन्धी सीमा
अध्यायक अभिलेखीय उद्देश्य प्रशंसनीय अछि, मुदा सीमित सामग्रीपर आधारित जीवन-विवेचन कतेको स्थानपर अनुमानपर निर्भर अछि। 'जानकी परिणय'क सांस्कृतिक विवरणक चर्चा अछि, मुदा काव्यक छन्द, भाषा, अलङ्कार, कथन-गति आ पात्र-निर्माणक विस्तार कम अछि। विस्मृत लेखककेँ पुनः प्रतिष्ठित करबाक उत्साहमे कृतिक वास्तविक कलात्मक सीमा कहियो-कहियो गौण भऽ जाइत अछि — इतिहासमे स्थान देब आ उच्च साहित्यिक मूल्य देब एके बात नहि।
६. त्रिलोचन झासम्बन्धी अध्यायक सीमा
लेखक स्वयं स्वीकार करैत छथि जे त्रिलोचन झाक सामग्री बिखरल आ अल्प उपलब्ध अछि। एहि कारण अध्याय जीवनीपरक पुनर्निर्माण अधिक, कृति-आधारित आलोचना कम बनि जाइत अछि। मातृभाषा-प्रेम, संगठन आ समाजसेवाक प्रशंसा पर्याप्त अछि, मुदा हुनकर विशिष्ट साहित्यिक शैली, भाषिक प्रयोग, विधागत क्षमता आ विचारक अन्तर्विरोध कम स्पष्ट अछि। मिथिलाक गौरव पुनः प्राप्त करबाक आह्वान कहियो-कहियो रोमानी अतीतवाद दिस जा सकैत अछि — समाजक वर्ग-भेद आ जाति-भेदकेँ ओझराय केवल भावनात्मक एकताक आह्वान अव्यावहारिक बनि सकैछ। प्राचीन गौरवक सङ्ग जातिगत विषमता, स्त्री-बहिष्कार आ सामाजिक रूढ़िक आलोचना सेहो समान रूपसँ आवश्यक छल।
७. यदुवरसम्बन्धी अध्यायक सीमा
यदुवरक राष्ट्रीय आ भाषिक चेतनापर अधिक बल देल गेल अछि; काव्यक रूप, छन्द, ध्वनि, बिम्ब, वक्रोक्ति आ वैयक्तिक स्वरक विश्लेषण अपेक्षाकृत कम अछि। मातृभाषा-जागरणक कविता कतेको स्थानपर घोषणात्मक आ उपदेशात्मक भऽ सकैत अछि — 'जय जय जयति मैथिल जाति' सन पङ्क्तिमे अभिधाक प्राधान्य अछि, ध्वन्यार्थ कम — आ अध्याय प्रचारात्मकता आ काव्यात्मकताक अन्तर स्पष्ट नहि करैत अछि। 'मैथिल' समुदायकेँ एकरूप मानल गेल अछि; जाति, वर्ग, लिङ्ग आ क्षेत्रानुसार मैथिल अनुभवक भिन्नतापर विचार कम अछि। भाषिक अस्मिता सभ मैथिल लेल एके रूपेँ अनुभवित होइत अछि — ई मान्यता प्रश्नास्पद अछि। आदर्शवादक अतिरेकमे मिथिलाक सामन्ती व्यवस्थाक ठोस आलोचनाक अभाव सेहो एकटा सीमा थिक।
८. द्विजवरसम्बन्धी अध्यायक सीमा
कवि-सेनानीक सक्रिय जीवन निश्चय महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा जीवनीक वीरता काव्यक स्वतन्त्र आलोचनापर भारी पड़ैत अछि। राजनीतिक सक्रियता अपनहि उत्कृष्ट काव्यक प्रमाण नहि — कविता सभक भाषा, छन्द, प्रतीक, वैचारिक जटिलता आ कलात्मक स्थायित्वक अधिक निकट विश्लेषण आवश्यक छल। राष्ट्रीयताकेँ निर्विवाद लोकमङ्गलक मूल्य मानि लेल गेल अछि; राष्ट्रवादक भीतर वर्ग, जाति, धर्म आ लैङ्गिक असमानता सेहो रहि सकैत अछि। स्वदेशी आ चरखाक सामाजिक अर्थ अछि, मुदा आधुनिक आर्थिक संरचनासँ ओकर सम्बन्ध आलोचनात्मक रूपसँ नहि खोलल गेल। 'छूतहर'मे शोषितक बात अछि, मुदा ई क्रान्तिकारी चेतनाक बदला गान्धीवादी सुधारवादी परिधि धरि सीमित रहि जाइछ आ छन्द-बद्धता कतहु-कतहु यथार्थकेँ कुण्ठित करैत अछि।
९. कुमार गंगानन्द सिंहसम्बन्धी सीमा
लेखक स्वयं देखबैत छथि जे कथाकारक कतेको कथा लक्ष्य-प्रधान अछि — पहिने नैतिक निष्कर्ष स्थिर होइत अछि, तकर बाद पात्र आ घटना जोड़ल जाइत अछि। एहि कारण कथा जीवनक स्वाभाविक जटिलताक बदला उदाहरण बनि जाइत अछि। अनेक कथामे दीर्घ कालखण्ड, अनावश्यक मोड़, घटनाक विस्तार आ अन्तमे सम्पूर्ण समाधान कथा-प्रभावकेँ कमजोर करैत अछि — लेखक सेहो 'विवाह' आ 'बिहाड़ि'क तन्तुवाय फलकि जाएब स्वीकारैत छथि। सामाजिक सुधारक आग्रह रहितहुँ जाति-उन्मूलन आधा बाटपर रुकि जाइत अछि — अस्पृश्यताविरोधी कथा दलित पात्रकेँ पूर्ण सामाजिक समानता धरि नहि लऽ जाइत अछि आ 'बिहाड़ि'क सुधार अन्ततः उच्च वर्गक अनुकम्पापर निर्भर रहैत अछि। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ 'पञ्च परमेश्वर'मे विरुद्ध हेत्वाभासक स्थिति अछि — एक दिस सुधारक बात आ दोसर दिस ग्राम-पञ्चायतकेँ ई उपदेश जे "सामन्त आ जमीन्दारक आमोद-प्रमोदमे व्याघात नहि करबाक चाही" — सुधारक गप्प करैत शोषक वर्गक सुख-शान्तिक वकालत। स्त्री-पात्रक संख्या सेहो कम अछि।
१०. हरिलतासम्बन्धी अध्यायक सीमा
एहि निबन्धक सीमा ई जे समीक्षक हरिलताक वैधव्य-जनित वेदनाकेँ मात्र 'ईश्वरोन्मुखता'क कारण मानि लैत छथि, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावनाकेँ अनदेखा कऽ दैत छथि। एक सशक्त नारीवादी पाठ एतय सम्भव छल — बाल-विवाह, वैधव्य, स्त्री-शिक्षाक निषेधक विरुद्ध चोरा कऽ अक्षर सीखबाक संघर्ष — मुदा विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति धरि सीमित रहि गेल। मनोविश्लेषणक दृष्टिसँ ई प्रश्न सेहो उठैत अछि जे भक्ति एतय सामाजिक यथार्थसँ पलायनक साधन तँ नहि बनल — भौतिक यन्त्रणाकेँ आध्यात्मिक रहस्यवादमे रूपान्तरित कऽ सामाजिक अधिकारक प्रश्नकेँ स्थगित कऽ देब। ई दुनू सम्भावित पाठ — भक्ति-रसक शास्त्रीय आस्वाद आ सामाजिक प्रतिरोधक अपठित सम्भावना — क बीचक तनावकेँ निबन्ध नहि खोलैत अछि।
११. श्यामानन्द झासम्बन्धी अध्यायक सीमा
अध्यायक शीर्षक 'काव्य-वस्तु' अछि आ लेखक स्पष्ट करैत छथि जे ओ कला-पक्षक बदला वस्तु-पक्षक अध्ययन करैत छथि। एहि कारण छन्द, बिम्ब, ध्वनि, वाक्य-विन्यास, अलङ्कार आ शैलीक समुचित मूल्याङ्कन छूटि जाइत अछि। सांस्कृतिक पुनरुत्थानक विचारमे 'आर्य संस्कृति'क आदर्शीकरण अछि; एहि संस्कृतिक भीतर जाति, स्त्री-अधिकार आ सामाजिक बहिष्कारक प्रश्न कम उठैत अछि। विदेशी प्रभाव अथवा देवनागरीक प्रयोगकेँ कतेको स्थानपर षड्यन्त्रक रूपमे देखल गेल अछि — भाषिक परिवर्तनक जटिल सामाजिक, मुद्रणगत आ शैक्षिक कारण सेहो विचारणीय छल। व्यङ्ग्य कतहु-कतहु व्यक्तिगत आक्रोश आ नारामे बदलि जाइछ, जाहिसँ ध्वनि क्षीण भऽ जाइछ।
१२. लक्ष्मीपति सिंह आ पत्रकारितासम्बन्धी सीमा
अध्याय व्यक्तित्वक स्नेहपूर्ण स्मरण अधिक अछि, पत्रकारिताक संस्थागत इतिहास कम। पत्रिकाक प्रसार-सङ्ख्या, आर्थिक आधार, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, सम्पादकीय नीति आ पाठकीय प्रतिक्रिया सम्बन्धी तथ्य सीमित अछि। महिला पाठिका, ग्रामीण ग्राहक, मुद्रक, वितरक आ सहयोगी लेखकक भूमिका स्पष्ट नहि होइत अछि। पत्रकारिता आ साहित्यिक सम्पादनक सीमा सेहो अधिक स्पष्ट होयबाक चाही — समाचार, विचार, साहित्य, संस्था-सूचना आ सामाजिक अभियानक पृथक कार्यप्रणालीक विश्लेषण कएल जा सकैत छल। संगहि, मैथिली पत्रकारिताक 'वैसाखी'पर ठाढ़ रहबाक जे स्वीकृति अछि, ओकर विश्लेषणमे आर्थिक संकटपर जतेक जोर अछि, वैचारिक शून्यता आ सत्तासँ प्रश्न करबाक साहसक अभावपर ओतेक नहि।
१३. मधुपक गीत-साहित्यक सीमा
अध्याय मधुपक गीतक सामाजिक आ सांस्कृतिक उपयोगितापर बल दैत अछि, मुदा धुन, मात्रा, ताल, गायन-परम्परा आ प्रदर्शन-सन्दर्भक विस्तृत विश्लेषण कम अछि। सावित्री, पतिव्रता आ गृहस्थ आदर्शक स्त्री-छवि पितृसत्तात्मक आदर्शकेँ पुष्ट करि सकैत अछि — स्त्रीक शिक्षा आ नैतिक सामर्थ्यक प्रशंसा अछि, मुदा ओकर आत्मनिर्णय, इच्छा आ वैकल्पिक जीवनक प्रश्न सीमित अछि। गीतक लोकप्रियता आ साहित्यिक स्थायित्व अलग-अलग कसौटी अछि — कण्ठस्थता काव्य-मूल्यक महत्त्वपूर्ण सङ्केत अछि, मुदा एकमात्र प्रमाण नहि।
१४. भट्टीकाव्य परम्परासम्बन्धी सीमा
संस्कृत भट्टीकाव्य आ मधुपक काव्यक बीच सम्बन्ध रोचक अछि, मुदा प्रत्यक्ष पाठगत समानता, अनुकरण, रूपान्तरण आ स्वतन्त्र विकासक स्पष्ट प्रमाण अधिक चाही। शिक्षणपरक काव्यकेँ परम्परागत निरन्तरताक रूपमे देखब कतेको भिन्न काल, भाषा आ पाठक-समुदायकेँ एकरूप बना सकैत अछि। व्याकरण अथवा अलङ्कार सिखयबाक प्रयोजन कहियो काव्यक रसात्मक स्वतन्त्रताकेँ सीमित करैत अछि — अध्याय एहि तनावकेँ पर्याप्त कठोरतासँ नहि परखैत अछि। सभसँ गम्भीर प्रश्न औचित्य-सिद्धान्तक — 'आत्माक प्रतिकूल' रचनाकेँ 'व्यक्तिसँ पैघ समाज'क तर्कसँ उचित ठहराएब भाव-औचित्यक मूल-भङ्गक प्रश्न अनुत्तरित छोड़ि दैत अछि; प्रयोजन-प्रेरित रचनाक सौन्दर्यशास्त्रीय स्थिति की हएत, ताहिपर सैद्धान्तिक स्पष्टता नहि भेटैत अछि। विदेह ज्ञानमीमांसाक कठोरतम निकषपर तँ राज्याश्रयमे लिखल 'कोबर गीत' दरबारी विवशताक द्योतक थिक — जनभाषाक गीतकार जखन राजस्तुति लिखय लेल बाध्य कएल जाइत छथि, तखन ज्ञानमीमांसीय साहस आ शब्द-प्रमाण दुनू आहत होइत अछि — यद्यपि रमानन्द झाक 'युगीन विवशता'क सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या एहि प्रकरणक ऐतिहासिक जटिलताकेँ सेहो रेखाङ्कित करैत अछि।
१५. किरणक कथा-जगतसम्बन्धी सीमा
किरणक सामाजिक प्रगतिशीलताक प्रशंसा कतेको स्थानपर कथाक औपचारिक विश्लेषणकेँ पाछाँ छोड़ि दैत अछि। कथानक, कथावाचक, दृष्टिबिन्दु, समय, मौन आ प्रतीकक विस्तार अपेक्षित अछि। मार्क्सवादी अथवा सुधारवादी निष्कर्ष सभ कथापर समान रूपसँ लागू कएलापर रचनाक अन्तर्विरोध, अस्पष्टता आ बहुअर्थकता घटि सकैत अछि। किरणक 'मैथिल दृष्टि' कोन सामाजिक स्थानसँ बनैत अछि — ब्राह्मण, दलित, स्त्री, किसान अथवा नगरवासी सभक दृष्टि एक होइत अछि कि नहि — ई प्रश्न कम उठैत अछि। नव्य-न्यायक दृष्टिसँ 'चन्द्रग्रहण'क तर्क-पद्धतिमे सव्यभिचार हेत्वाभासक स्थिति देखल जा सकैछ — अन्धविश्वासक खण्डन लेल 'विधर्मी द्वारा अपहरण' सन अतिनाटकीय आ साम्प्रदायिक रङ्गवला तर्कक सहारा — जँ अपहरण नहि होइत, तँ की गङ्गा-स्नान-सम्बन्धी अन्धविश्वास उचित छल? तर्कक ई शिथिलता कथाक प्रगतिशील अभिप्रायकेँ कमजोर करैत अछि।
१६. 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्रसम्बन्धी सीमा
स्त्री-पात्रक नूतनता पहचानल गेल अछि, मुदा स्त्रीक मूल्याङ्कन कतेको स्थानपर त्याग, शील, प्रेम आ पारिवारिक दायित्वक परम्परागत कसौटीसँ होइत अछि। नायिकाक कामना आ देहबोधक चर्चा अछि, मुदा स्त्रीक आर्थिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति-अधिकार, शिक्षा, श्रम आ सार्वजनिक जीवनमे सहभागिताक प्रश्न सीमित अछि। कथा-वाचकक पुरुष-दृष्टि आ पात्रक अपन स्वरमे स्पष्ट अन्तर करब आवश्यक छल — लेखकद्वारा स्त्रीकेँ बजाओल जाएब आ स्त्रीक स्वतन्त्र आत्मकथन समान नहि।
१७. 'चर्चरी' अध्यायक सीमा
गप्पकेँ स्वतन्त्र विधा मानबाक तर्क सर्जनात्मक अछि, मुदा विधाक अनिवार्य लक्षण, सीमा, संरचना आ कथा-निबन्ध-प्रहसनसँ भेद व्यवस्थित रूपसँ निर्धारित नहि अछि। हरिमोहन झाक हास्य कहियो सामाजिक विद्रूपताक सूक्ष्म परीक्षणक बदला पात्रक उपहास बनि जाइत अछि — हास्यक लक्ष्य प्रायः कमजोर, ग्रामीण, स्त्री अथवा रूढ़िवादी पात्र बनलापर सत्ता-विरोधी व्यङ्ग्यक धार मन्द भऽ सकैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ ई सेहो कहल गेल अछि जे हरिमोहन झा समाजक ऊपरी सतहपर चोट करैत छथि — कर्मकाण्ड आ पण्डिताइपर — मुदा सामन्ती आर्थिक आधारपर प्रहार नहि करैत छथि; केवल हँसी-ठट्ठासँ समाजक गम्भीर घाउक चिकित्सा असम्भव। लेखक स्वयं पूर्ववर्ती आलोचकक — प्रो॰ जयदेव मिश्र आ डा॰ जयकान्त मिश्रक — ई मत उद्धृत करैत छथि जे हरिमोहन बाबू पुरान मूल्यकेँ तँ तोड़ि देलनि, मुदा कोनो नव आ रचनात्मक जीवन-मूल्य स्थापित नहि कऽ सकलाह — ई वैचारिक शून्यताक प्रश्न उठबैत अछि, आ ई सेहो जे दोष खोजबाक अत्यधिक आग्रह उदात्त सांस्कृतिक मूल्यकेँ क्षति पहुँचबैत अछि आ विकल्प प्रस्तुत नहि करैत।
१८. यात्रीक स्तम्भ-लेखनक सीमा
स्तम्भ तात्कालिक घटनापर लिखल जाइत अछि, तेँ ओकर अनेक सन्दर्भ समय बीतलापर अस्पष्ट भऽ जाइत अछि; सम्पूर्ण पत्रिका, समाचार आ पाठकीय प्रतिक्रिया बिना टिप्पणीक आशय अधूरा रहि सकैत अछि। यात्रीक प्रथम पुरुषक तीक्ष्ण स्वर स्तम्भकेँ जीवन्त बनबैत अछि, मुदा कतेको स्थानपर व्यक्तिगत निर्णय, व्यङ्ग्य अथवा आक्रोश विश्लेषणपर भारी पड़ि सकैत अछि। स्तम्भ-लेखनक विधागत सीमा सेहो अछि — तात्कालिक प्रतिक्रियासँ आगाँ बढ़ि ई कोनो दीर्घकालीन सैद्धान्तिक विकल्प नहि दऽ पबैत अछि। तीनू स्तम्भ कम अवधिक लेल चलल; एहि कारण यात्रीक स्तम्भ-चिन्तनक दीर्घकालीन विकासक्रम निर्धारित करब कठिन अछि। उपलब्ध सामग्रीक आलोचनात्मक सम्पादन आ कालानुक्रमिक प्रकाशन आवश्यक अछि।
१९. आरसीसम्बन्धी अध्यायक सीमा
आरसीक विशाल काव्ययात्राकेँ राष्ट्रीयता, मिथिला-प्रेम, सामाजिकता आ गीतात्मकताक प्रमुख सूत्रमे समेटल गेल अछि, मुदा चरणानुसार वैचारिक परिवर्तनक अधिक सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव छल। प्रारम्भिक राष्ट्रीय कविता कहियो घोषणात्मक अछि — प्रखर राष्ट्रवादक शोरमे कतहु-कतहु मिथिलाक आन्तरिक वर्ग-संघर्ष आ सीमान्तकृत समाजक सूक्ष्म यथार्थ दबा जाइत अछि आ कविता प्रचार दिस झुकि जाइत अछि। मिथिलाक प्राकृतिक सौन्दर्यक वर्णन आदर्शीकृत अछि, जखन यथार्थमे बाढ़, गरीबी आ पलायन सेहो समान रूपसँ वर्तमान छल। छायावाद आ रहस्यवादक प्रभाव उल्लेखित अछि, मुदा आरसी एहि प्रभावकेँ कोना मैथिली अनुभवमे रूपान्तरित करैत छथि, तकर तुलनात्मक परीक्षण कम अछि।
२०. मोहनजीसम्बन्धी अध्यायक सीमा
अध्याय संस्मरणात्मक आत्मीयतासँ भरल अछि। एहि आत्मीयतासँ व्यक्तित्व जीवन्त बनैत अछि, मुदा आलोचनात्मक दूरी घटैत अछि। जीवन-सङ्घर्ष, गरीबी आ उदार स्वभावक वर्णन विस्तृत अछि; काव्य-संग्रह, पाठान्तर, छन्द, बिम्ब, भाषा आ विचार-विकासक व्यवस्थित विश्लेषण अपेक्षाकृत कम। 'आयल वसन्त'क लोकप्रियता सम्पूर्ण काव्य-व्यक्तित्वक प्रतिनिधि नहि भऽ सकैत अछि — कम प्रसिद्ध, कमजोर अथवा विचारात्मक कविता सभक परीक्षण रहितए मूल्याङ्कन अधिक सन्तुलित होइत।
२१. उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'सम्बन्धी सीमा
भाषिक शुद्धतावाद मातृभाषा-स्वाभिमानक साधन भऽ सकैत अछि, मुदा कठोर रूपमे ओ भाषा-संकरता, नवशब्द, शहरी अनुभव आ बदलैत बोलचालकेँ अस्वीकार करि सकैत अछि। भाषा जीवित समाजक सङ्ग बदलैत अछि — प्रत्येक बाहरी शब्द अपवित्र आ प्रत्येक पुरान शब्द शुद्ध नहि होइत अछि; शुद्धताक कसौटी के निर्धारित करत — ई प्रश्न आवश्यक अछि। कथाकारक भाषा-साधनाक प्रशंसा अछि, मुदा कथानक, चरित्र, मनोविज्ञान आ सामाजिक दृष्टिक सीमापर समान विस्तार नहि — भाषा कथा-साहित्यक प्रमुख तत्त्व अछि, किन्तु एकमात्र तत्त्व नहि। संगहि एतय एक आलोचनात्मक अन्तर्विरोध सेहो अछि — रमानन्द झा व्यासक कथाकेँ 'समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होएब' आ 'परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहब'केँ गुण मानैत छथि, जखन कि अन्यत्र (गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण, ललित, धीरेन्द्रक विवेचनमे) ओ यथार्थ-संवेदना आ परिवेश-सम्पृक्तिकेँ सर्वोच्च मूल्य मानैत छथि — मूल्य-मानदण्डक अस्थिरताक ई स्पष्ट प्रमाण थिक, जकर विस्तृत विवेचन आगाँ पद्धतिगत सीमामे कएल गेल अछि।
२२. राजेश्वर झासम्बन्धी अध्यायक सीमा
ई अध्याय स्वयं अत्यन्त आलोचनात्मक अछि, मुदा कतेको स्थानपर खण्डनक स्वर अत्यधिक कठोर बनि जाइत अछि। शोधकर्ताक ऐतिहासिक परिस्थिति, उपलब्ध स्रोत आ समयक पद्धतिगत सीमा सेहो ध्यानमे राखल जा सकैत छल। राजेश्वर झाक निष्कर्ष प्रमाणहीन अछि — ई देखाओल गेल, मुदा वैकल्पिक काल-विभाजन अथवा अवहट्ट-विकासक पूर्ण प्रतिमान प्रस्तुत नहि कएल गेल। व्यक्तित्व आ कृतित्वक परिचयक बाद त्रुटि-सूची विस्तृत अछि; श्रेष्ठ शोध, उपयोगी सङ्कलन अथवा सफल नाटकक निकट पाठ कम अछि। आलोचना केवल असहमति नहि, उपयोगी अंशक पुनर्स्थापन सेहो होयबाक चाही। संगहि राजेश्वर झाक निधनक शोक-प्रसङ्गमे आत्मीयता-जनित भावुकता आलोचनात्मक दूरीकेँ प्रभावित करैत अछि।
२३. ललितक कथासम्बन्धी अध्यायक सीमा
अध्याय सामाजिक, राजनीतिक, अस्तित्ववादी, लैङ्गिक आ धार्मिक अनेक प्रश्न एकत्र करैत अछि। एहि विस्तारसँ कतेको कथाक विशिष्ट रूप आ सौन्दर्य पाछाँ पड़ि जाइत अछि। यौनिक इच्छाकेँ जैविक आवश्यकता कहि धार्मिक-नैतिक बन्धनसँ मुक्त करबाक व्याख्या एकाङ्गी भऽ सकैत अछि — इच्छा सत्ता, सहमति, लैङ्गिक असमानता आ भावात्मक सम्बन्धसँ सेहो जुड़ल अछि। कथा सभकेँ युगक प्रत्यक्ष दस्तावेज मानल गेल अछि; साहित्य यथार्थक प्रतिलिपि नहि — चयन, कल्पना, प्रतीक आ कथन-दृष्टिद्वारा निर्मित रूप अछि। लेखक आ पात्रक विचारमे भेद आवश्यक अछि।
२४. धीरेन्द्रक कथासम्बन्धी सीमा
सामाजिक सन्दर्भक सैद्धान्तिक प्रस्ताव महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा प्रत्येक कथाकेँ वर्ग-शोषण, बेरोजगारी आ सामाजिक अन्यायमे सीमित करलापर रचनाक मनोवैज्ञानिक, भाषिक आ प्रतीकात्मक स्तर घटि सकैत अछि। 'गीध'क प्रतीक प्रभावशाली अछि, मुदा प्रतीकक अनेक सम्भावित अर्थक बदला एक निश्चित वर्गीय अर्थपर बल देल गेल अछि। कथाक भाषा, संवाद, मौन, कथा-वाचकक दूरी, अन्तक अनिश्चितता आ पाठकीय सहभागिताक अधिक विश्लेषण अपेक्षित छल। सामाजिक विषयक प्रासङ्गिकता स्वतः कलात्मक सिद्धिक प्रमाण नहि।
२५. प्रभासक कथा-यात्राक सीमा
'यात्रा' शब्द क्रमिक विकासक भाव उत्पन्न करैत अछि, मुदा प्रत्येक लेखकक सर्जना सरल रेखामे आरम्भिकसँ परिपक्व दिस नहि बढ़ैत अछि — बादक रचना सदैव पहिलसँ श्रेष्ठ हो, ई आवश्यक नहि। जीवनी आ सामाजिक परिवेशकेँ कथा-विकासक प्रमुख कारण मानल गेल अछि; साहित्यिक प्रभाव, पत्रिकाक सम्पादकीय नीति, पाठक-वर्ग, विधागत प्रयोग आ आत्मसमीक्षाक भूमिका कम स्पष्ट अछि। प्रभासक चुनल कथा सभक आधारपर सम्पूर्ण कथा-दृष्टि निर्धारित करब सीमित निष्कर्ष भऽ सकैत अछि — अप्रकाशित, दुर्लभ अथवा कम सफल कथा सेहो समग्र मूल्याङ्कन लेल आवश्यक अछि।
पद्धतिगत संकट : समग्र सीमाक विस्तृत विवेचन
सीमा १ : संकलनात्मक असंगति आ संरचनात्मक एकसूत्रताक अभाव
कृतिक सर्वप्रथम आ सर्वाधिक मौलिक सीमा ओकर उत्पत्ति-प्रक्रियामे निहित अछि। ई पचीस निबन्ध सन् १९७२ सँ १९८९ धरि विभिन्न पत्र-पत्रिकामे विभिन्न अवसरपर, विभिन्न पाठक-वर्गकेँ ध्यानमे राखि, स्वतन्त्र रूपेँ लिखल गेल छल। एकरा एकठाम राखि 'ग्रन्थ' बना देलासँ एक अन्तर्निहित असंगति उत्पन्न होइत अछि — कतहु व्यक्तित्व-प्रधान (त्रिलोचन झा, राजेश्वर झा), कतहु कृति-प्रधान ('सुमति', 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र), कतहु विधा-प्रधान (स्तम्भ-लेखन), कतहु प्रवृत्ति-प्रधान (यदुवर, द्विजवर) समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्धकेँ नहि बान्हैत अछि। फलतः पाठककेँ बेर-बेर सन्दर्भ-परिवर्तन करय पड़ैत अछि। रूपवादी दृष्टिसँ ई संरचनात्मक शिथिलता थिक — ग्रन्थमे कोनो आरोह-अवरोह-युक्त तार्किक प्रगति नहि। अध्याय-क्रम प्रायः लेखक-जन्मक कालक्रमपर आधारित बुझाइत अछि, मुदा ई क्रम सेहो असंगत अछि — किछु निबन्ध अत्यन्त लघु, किछु अत्यन्त दीर्घ, बिना कोनो घोषित तर्कक। एक सुनियोजित ग्रन्थमे जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होइत अछि, से एहिमे अनुपस्थित अछि — प्रत्येक निबन्धक अन्तमे मात्र मूल प्रकाशन-स्रोत आ तिथि देल अछि, जे संकलनक जोड़ा-जाड़ी प्रकृतिकेँ उघारि दैत अछि। अध्याय सभक विस्तार, पद्धति आ आलोचनात्मक गहराई समान नहि।
सीमा २ : 'अनुपलब्धता'क आवर्ती स्वीकृति — समीक्षाक आधारभूत दुर्बलता
कृतिक सर्वाधिक गम्भीर पद्धतिगत संकट ई जे लगभग प्रत्येक प्रारम्भिक निबन्धमे समीक्षक स्वयं मूल रचनाक 'अनुपलब्धता'केँ स्वीकार करैत छथि। 'चन्द्रप्रभा'क प्रसङ्गमे — 'चन्द्रप्रभाक अध्ययन-विश्लेषण नीक जकाँ नहि कएल जा सकल अछि, एकर प्रमुख कारण थिक अनुपलब्धता'; त्रिलोचन झाक प्रसङ्गमे — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध अछि'; यदुवरक प्रसङ्गमे — 'यदुवरक प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल अछि'; बिसरल जनार्दन झाक प्रसङ्गमे — 'पत्र-पत्रिकोमे जे रचना प्रकाशित भेल होएत, आब सर्वसुलभ नहि अछि।'
एतय एक गहन विरोधाभास उत्पन्न होइत अछि — जँ मूल कृति समीक्षककेँ स्वयं उपलब्ध नहि छल, तँ ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधारपर सम्भव? बहुत ठाम समीक्षा वस्तुतः द्वितीयक स्रोतपर — जयकान्त मिश्रक मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झाक शोध-प्रबन्ध, अन्य समीक्षकक उद्धरणपर — आश्रित भऽ जाइत अछि। रमानन्द झा स्वयं स्वीकार करैत छथि जे अधिकांश परवर्ती समीक्षकक 'सामग्रीक सीमा जयकान्त मिश्रक इतिहासे अछि' — मुदा ई आरोप स्वयं हुनकहुपर आंशिक रूपेँ लागू होइत अछि। पाठ-केन्द्रित समीक्षाक दृष्टिसँ ई एक मौलिक दुर्बलता थिक — पाठ बिना समीक्षा।
विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमानक दृष्टिसँ ई सीमा अत्यन्त शिक्षाप्रद थिक। समान्तर इतिहासक पहिल दायित्व अभिलेखीकरण आ पाठ-सुलभीकरण थिक — मूल पाठकेँ डिजिटल/मुद्रित रूपेँ सर्वसुलभ केने बिना ओकर पुनर्मूल्याङ्कन असम्भव। रमानन्द झा एहि आवश्यकताकेँ बेर-बेर रेखाङ्कित तँ करैत छथि ('सर्वसुलभ भेलेपर विशेष प्रकाश पड़ि सकत'), मुदा ओ स्वयं ओहि अभिलेखीय कार्यकेँ सम्पन्न नहि कऽ पबैत छथि — किएक तँ ओहि डिजिटल-पूर्व युगमे ई व्यक्तिगत श्रमसँ असम्भव-प्राय छल। इएह अभिलेखीय रिक्तताकेँ विदेह-आन्दोलन अपन ई-पत्रिका, पोथी-संग्रह आ पञ्जी-अभिलेखीकरणसँ भरबाक प्रयास करैत अछि। तात्पर्य — 'अखियासल'क सभसँ पैघ सीमा इएह ओकर सभसँ पैघ ऐतिहासिक सार्थकता थिक : ई ओहि रिक्तताकेँ नामाङ्कित करैत अछि जकरा भरब परवर्ती पीढ़ीक दायित्व बनि जाइत अछि।
सीमा ३ : मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
गम्भीर सैद्धान्तिक दृष्टिसँ कृतिक सर्वाधिक विचारणीय दोष ओकर मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता थिक। रमानन्द झा एक निबन्धमे जाहि गुणकेँ सर्वोच्च मानैत छथि, दोसरमे ओकरे विपरीतकेँ प्रशंसित करैत छथि —
(क) गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्रक विवेचनमे समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवनक प्रतिबिम्बनकेँ सर्वोच्च मूल्य मानल गेल अछि; किन्तु व्यासक कथाकेँ ठीक एहि कारणेँ प्रशंसित कएल गेल जे ओ समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होइत अछि आ परिवर्तित युग-जीवनक विकृतिसँ अप्रभावित रहैत अछि। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध थिक — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनहु गुण, कखनहु ओकर अभाव गुण।
(ख) हरिमोहन झाक हास्यकेँ 'विचारक उन्मेष नहि करब'क कारणेँ न्यून मूल्य देल गेल, किन्तु मधुपक गीतकेँ 'तत्काल हृदय-प्रभाव' आ आनन्दक कारणेँ उच्च मूल्य देल गेल — जखन कि गीत सेहो प्रायः वैचारिक मन्थन नहि, अपितु भाव-तात्कालिकतापर आश्रित होइत अछि। तत्काल-प्रभाव कखनहु गुण (गीत), कखनहु दोष (हास्य)।
(ग) 'कोबर-गीत' सन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचनाकेँ 'व्यक्तिसँ पैघ समाज'क तर्कसँ उचित ठहराओल गेल, किन्तु क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचारक दृष्टिसँ आत्माक प्रतिकूल रचना भाव-औचित्यक मूल-भङ्ग थिक — समीक्षक एतय सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान नहि कऽ पबैत छथि।
ई अस्थिरता एहि कारणेँ अछि जे रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता नहि अपनबैत छथि। ओ प्रसङ्गानुसार कखनहु प्रभाववादी, कखनहु समाजशास्त्रीय, कखनहु जीवनीमूलक, कखनहु रूपवादी दृष्टि अपनबैत छथि। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक दिस लचीलापन दैत अछि, तँ दोसर दिस मूल्याङ्कनकेँ अप्रत्याशित आ असंगत बना दैत अछि।
सीमा ४ : सैद्धान्तिक अनुशीलनक अभाव — शास्त्रीय शब्दावलीक अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झाक समीक्षामे रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूपेँ विद्यमान अछि, तथापि ओ एहि शास्त्रीय प्रतिमानकेँ कतहु सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरणक रूपमे प्रयोग नहि करैत छथि। 'व्यञ्जित', 'सम्प्रेषण', 'भावाश्रित' सन शब्द तँ अबैत अछि, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्यक नाम आ हुनक सिद्धान्तक व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित अछि। ओहिना, पाश्चात्य सिद्धान्तक कतहु नामोल्लेख अथवा सुविचारित प्रयोग नहि भेटैत अछि। एहिसँ एक द्वैध स्थिति उत्पन्न होइत अछि। एक दिस ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षाकेँ सुपाठ्य, सम्प्रेषणीय आ पत्रकारीय-सुलभ बनबैत अछि — जे ओकर मूल प्रकाशन-सन्दर्भ (पत्रिका)क अनुकूल छल। मुदा दोसर दिस ई अकादमिक गहनताक अभाव उत्पन्न करैत अछि। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक तँ अछि, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम अछि। एक समान्तर इतिहासकेँ दीर्घकालिक वैधता प्रदान करबा लेल जे सुदृढ़ सैद्धान्तिक आधार आवश्यक होइत अछि, से एहिमे अविकसित रहि जाइत अछि।
सीमा ५ : परिप्रेक्ष्यक सीमा — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
समाजशास्त्रीय आ उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ कृतिक एक गम्भीर सीमा ओकर सामाजिक परिप्रेक्ष्यक संकीर्णतामे अछि। पचीस निबन्धमे चौबीस पुरुष-रचनाकारकेँ समर्पित अछि; मात्र एक (हरिलता) स्त्री-रचनाकारकेँ। ओहूमे हरिलताक विवेचन मुख्यतः वैष्णव भक्ति धरि सीमित रहि जाइत अछि। स्त्री अधिकतर पात्र अथवा प्रेरणाक रूपमे उपस्थित छथि, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचकक रूपमे कम — स्त्री-लेखिकाक स्वतन्त्र साहित्यिक इतिहास पर्याप्त विकसित नहि।
ओहिना, विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तरसँ अबैत छथि। मिथिलाक दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्पराक — मौखिक साहित्य, गीत-नाद-परम्पराक अनाम रचयिता — रचनाकार एहि समान्तर इतिहाससँ प्रायः अनुपस्थित रहि जाइत छथि; जाति आ वर्गक प्रश्न उठैत अछि, मुदा दलित समुदायक आत्मस्वर सीमित अछि। ई सीमा युग-सापेक्ष थिक (जे उपलब्ध अभिलेख प्रायः उच्च-वर्णक छल), तथापि विदेह समान्तर-प्रतिमानक पूर्ण जनतान्त्रिक समावेशिताक कसौटीपर 'अखियासल' आंशिक रूपेँ अपूर्ण रहि जाइत अछि। समान्तर इतिहासक अर्थ मात्र बिसरल उच्चवर्णीय रचनाकारक पुनरुद्धार नहि, अपितु समग्र हाशियाक — दलित, स्त्री, लोक, मौखिक — पुनःस्थापना थिक; एहि व्यापक अर्थमे रमानन्द झाक परियोजना एक आरम्भ मात्र थिक, पूर्णता नहि।
सीमा ६ : पाठ-प्रामाणिकता आ सम्पादकीय अशुद्धिक प्रश्न
कृतिमे उद्धृत पद्यांश आ गद्यांशक पाठ-प्रामाणिकता सन्दिग्ध रहि जाइत अछि। किएक तँ स्वयं समीक्षक स्वीकार करैत छथि जे बहुतो रचना पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल आ अनुपलब्ध अछि, तेँ उद्धृत अंशक मूल पाठसँ तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव छल। परवर्ती सम्पादन आ मुद्रण-प्रक्रियामे एहि पाठक शुद्धता आओर संकटग्रस्त भऽ सकैत अछि — उपलब्ध प्रतिमे वर्तनी-अस्थिरता आ मुद्रण-दोष सेहो विद्यमान अछि। एक विश्वसनीय समान्तर इतिहास लेल पाठ-समीक्षा आ आलोचनात्मक संस्करणक अनुशासन अनिवार्य थिक, जकर अभाव एहि आरम्भिक कृतिमे स्वाभाविक अछि। 'प्रथम' आ 'मौलिक' सन पद लेल अधिक कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास आवश्यक अछि; निष्कर्ष जँ सीमित सामग्रीपर आधारित हो, तँ अनुमानकेँ प्रमाणक स्थान नहि लेबाक चाही।
सीमा ७ : आत्मीयता-जनित प्रशंसाक अतिरेक आ आलोचनात्मक दूरीक अभाव
अनेक निबन्धमे — विशेषतः लक्ष्मीपति सिंह, मोहन आ राजेश्वर झा-सम्बन्धी अध्यायमे — समीक्षक आ विवेच्य रचनाकारक बीच व्यक्तिगत आत्मीयता समीक्षाकेँ संस्मरणात्मक श्रद्धाञ्जलिक रूप दऽ दैत अछि। मोहनक स्मरण, लक्ष्मीपति सिंहक विहुँसैत आकृतिक भावुक चित्रण, राजेश्वर झाक निधनक शोक — ई सभटा भावनात्मक रूपेँ मार्मिक तँ अछि, मुदा एहिसँ आलोचनात्मक दूरी भङ्ग होइत अछि। वस्तुनिष्ठ समीक्षाक दृष्टिसँ ई प्रशंसा-पूर्वाग्रह थिक, जे मूल्याङ्कनक निष्पक्षताकेँ प्रभावित करैत अछि। अपवाद-स्वरूप हरिमोहन झा-सम्बन्धी निबन्धमे समीक्षक जे आलोचनात्मक साहस देखबैत छथि, से समस्त संग्रहमे समान रूपेँ उपस्थित नहि अछि। जीवनी कतहु-कतहु कृतिक विश्लेषणपर आ विषयवस्तु रूप-सौन्दर्यपर भारी पड़ैत अछि।
सीमा ८ : समान्तर इतिहास-प्रतिमानक अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्ततः, विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमानक दृष्टिसँ सर्वाधिक मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहासक अवधारणाकेँ व्यवहारमे तँ जीबैत छथि, मुदा ओकरा सिद्धान्तक रूपमे स्पष्टतः प्रतिपादित नहि करैत छथि। 'दू कोटिक साहित्यकार'क सिद्धान्त एकर सर्वाधिक निकट थिक, मुदा ओ मुख्यधाराक कैननक — जयकान्त मिश्रक इतिहासक — विकल्प अथवा विरोध नहि, अपितु ओकर पूरक बनि रहि जाइत अछि। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्रकेँ प्रामाणिक आधार मानि हुनकहि सूचनापर आश्रित रहैत छथि, जखन कि समान्तर इतिहासक असली दायित्व मुख्यधाराक कैननक आधार-मान्यताकेँ स्वयं प्रश्नाङ्कित करब थिक। तात्पर्य — 'अखियासल' समान्तर इतिहासक सामग्री तँ प्रस्तुत करैत अछि, मुदा ओकर सैद्धान्तिकी अविकसित छोड़ि दैत अछि। ई कैननकेँ विस्तारित करैत अछि, मुदा कैनन-निर्माणक शक्ति-संरचनाकेँ विखण्डित नहि करैत अछि। इएह ओहि कार्यक रिक्तता थिक जकरा विदेह-आन्दोलन अपन घोषित सैद्धान्तिकी, संस्थागत अभिलेखीकरण आ जनतान्त्रिक समावेशितासँ पूर्ण करबाक प्रयास करैत अछि।
संगहि ई सेहो कहबाक चाही जे मातृभाषा-प्रेम पोथीक ऊर्जा अछि, मुदा कतेको स्थानपर ई प्रेम सांस्कृतिक गौरववाद अथवा बाहरी प्रभावक प्रति अत्यधिक संशयमे बदलि जाइत अछि — जखन कि भाषा सदैव सम्पर्क, मिश्रण आ परिवर्तनसँ विकसित होइत अछि; आ राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था कतहु-कतहु प्रश्नरहित मूल्य बनि जाइत अछि।
समग्र आलोचनात्मक निर्णय
पोथीक प्रमुख उपलब्धि
'अखियासल'क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि — साहित्यिक इतिहासक विस्मृत स्थान सभपर प्रकाश देब। ई पोथी पूछैत अछि —
• मैथिली कथाक वास्तविक आरम्भ कतयसँ मानल जाए?
• प्रभाव आ अनुवादमे की अन्तर अछि?
• 'प्रथम' कृति निर्धारित करबाक प्रमाण की हो?
• दुर्लभ पाण्डुलिपि इतिहाससँ कोना बाहर भऽ जाइत अछि?
• पत्रिका, सम्पादक आ प्रकाशक साहित्य निर्माणमे की भूमिका निभबैत छथि?
• राष्ट्रीय आन्दोलनमे मैथिली साहित्यकारक योगदान किएक विस्मृत भेल?
• हास्यक लोकप्रियताक भीतर सामाजिक अन्याय ओझल तँ नहि?
• भाषिक शुद्धता आ भाषिक विकासक बीच कोन सम्बन्ध अछि?
• स्वतन्त्रताक बाद गरीब, बेरोजगार आ श्रमिकक जीवन किएक नहि बदलल?
• साहित्यकारक वैयक्तिक अनुभव कोना सामाजिक अनुभव बनैत अछि?
ई प्रश्न पोथीकेँ साधारण व्यक्तित्व-कृतित्व सङ्ग्रहसँ ऊपर उठबैत अछि।
भारतीय साहित्यशास्त्रक दृष्टिसँ
पोथी रसक सामाजिक विस्तार करैत अछि। करुणा केवल पात्रक दुःखपर आँसू बहायब नहि, दुःखक सामाजिक कारण खोजब अछि। वीरता केवल रणभूमिमे नहि, मातृभाषा-रक्षा, सत्यक पक्ष आ शोषण-विरोधमे अछि। हास्य केवल मनोरञ्जन नहि, सत्ता आ रूढ़िक मुखौटा उतारबाक साधन अछि। ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार अनेक कृतिक भीतर प्रत्यक्ष कथासँ अधिक महत्त्वपूर्ण अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ अछि। औचित्य-सिद्धान्त लेखककेँ इतिहासक दावा, विधागत नामकरण आ चरित्रक विश्वसनीयता परखबाक आधार दैत अछि। मुदा शास्त्रीय निकषपर मुख्यधाराक अनेक आरम्भिक रचनाक सीमा सेहो स्पष्ट होइत अछि — नीति आ उपदेशक भरमारसँ रसभङ्ग, अभिधाक प्राधान्यसँ ध्वनिक क्षय, आ नारा बनैत कवितामे वक्रोक्तिक विनाश।
पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ
'अखियासल'मे नव-इतिहासवादी आ मार्क्सवादी प्रवृत्ति विशेष प्रखर अछि। साहित्य सत्ता, धन, जाति, भाषा, संस्था आ सामाजिक आन्दोलनसँ जुड़ल अछि। ललित आ धीरेन्द्रक कथा-विवेचन अस्तित्वगत संकट, वर्गीय शोषण आ आधुनिक मनुष्यक निरर्थकता उद्घाटित करैत अछि। नारीवादी दृष्टि उपस्थित अछि — विशेषतः 'निर्दयी सासु', 'सुमति' आ 'चन्द्रग्रहण'क विवेचनमे — मुदा ओकर पूर्ण सम्भावना (जेना हरिलताक प्रतिरोधी पाठ) अविकसित रहि जाइत अछि। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ मातृभाषा-विमुखता, हिन्दी-अङ्ग्रेजीक प्रभुत्व आ मैथिलीक सार्वजनिक क्षेत्रसँ निष्कासन पोथीक स्थायी चिन्ता अछि।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ
'अखियासल' मैथिली साहित्यक वैकल्पिक वंशावली बनबैत अछि। एहि वंशावलीमे —
• श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा',
• जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर',
• रासबिहारी लाल दास आ 'सुमति',
• जनसीदन आ बिसरल जनार्दन झा सन साहित्यसेवी,
• त्रिलोचन झा सन मातृभाषानुरागी,
• यदुवर आ द्विजवर सन जागरणकारी कवि,
• हरिलता सन संघर्षशील कवीश्वरी,
• लक्ष्मीपति सिंह सन सम्पादक,
• मधुप आ मोहन सन गीतकार,
• यात्री सन स्तम्भकार,
• व्यास सन भाषिक शुद्धतावादी,
• राजेश्वर झा सन संस्था-निर्माता,
• किरण, ललित, धीरेन्द्र आ प्रभास सन सामाजिक कथाकार
— एकहि विस्तृत इतिहासमे स्थान पबैत छथि। ई इतिहास मिथिलाकेँ राजवंश अथवा पाण्डित्यक केन्द्र मात्र नहि मानैत अछि। एहि मिथिलामे भूखल बालक, अत्याचारित पुतोहु, बेरोजगार युवक, शोषित किसान, मातृभाषा-विहीन शिक्षित वर्ग, मुद्रणालयक श्रमिक आ विस्मृत सम्पादक सभ उपस्थित छथि।
उपसंहार : आरम्भक गरिमा आ रिक्तताक उत्तराधिकार
'अखियासल'क महत्त्व अन्तिम निर्णय देबामे नहि, मैथिली साहित्यक इतिहासपर पुनर्विचार करबामे अछि। ई पोथी प्रतिष्ठित इतिहासक सामने वैकल्पिक प्रश्न राखैत अछि। लेखक साहित्यक चमकैत शिखर मात्र नहि देखैत छथि; ओ नीचाँ दबाओल ईंट, टूटल पाण्डुलिपि, पुरान पत्रिका, भूखल पात्र, उपेक्षित भाषा आ विस्मृत साहित्यसेवीकेँ सेहो देखैत छथि। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुरसँ लऽ कऽ प्रभास कुमार चौधरी धरि साहित्यमे यथार्थवाद, राष्ट्रवाद आ समाज-सुधारक क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होइछ, आ संगहि — जखन एहि सम्पूर्ण रचना-संसारकेँ समान्तर इतिहास-दृष्टि, नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा आ पाश्चात्य-भारतीय काव्यशास्त्रक कठोर निकषपर कसल जाइछ — तखन एकर ढाँचागत, वैचारिक आ सैद्धान्तिक सीमा सेहो उजागर होइत अछि: सामन्ती मानसिकताक अवशेष, सुधारवादक सीमा, पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह आ वञ्चित वर्गक प्रामाणिक स्वरक अभाव। साहित्य तखनहि पूर्णतः समान्तर आ प्रामाणिक बनि सकैछ जखन ओ राज्याश्रय आ सामन्ती वर्चस्वसँ मुक्त भऽ, शोषितक यथार्थकेँ बिना कोनो हेत्वाभासकेँ, पूर्ण ज्ञानमीमांसीय साहसक सङ्ग प्रस्तुत करए।
एकर श्रेष्ठता ओतए अछि जतए —
• लेखक अभिलेख खोजैत छथि,
• प्रचलित भूल सुधारैत छथि,
• विस्मृत लेखककेँ पुनः उपस्थित करैत छथि,
• सामाजिक जीवन आ साहित्यक सम्बन्ध खोलैत छथि,
• प्रशंसा करितो आलोचनात्मक दूरी रखैत छथि,
• मातृभाषा आ जनजीवनकेँ साहित्येतिहासक केन्द्र बनबैत छथि।
एकर सीमा ओतए अछि जतए —
• अनुमान प्रमाणक स्थान लैत अछि,
• जीवनी कृतिक विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि,
• विषयवस्तु रूप-सौन्दर्यकेँ ढाँकि दैत अछि,
• मूल्य-मानदण्ड अस्थिर भऽ जाइत अछि,
• राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था प्रश्नरहित मूल्य बनि जाइत अछि,
• स्त्री, दलित आ निम्नवर्गक आत्मस्वर पर्याप्त स्वतन्त्रता नहि पबैत अछि।
समग्र मूल्याङ्कनक निष्कर्ष ई जे 'अखियासल' अपन युगक एक अग्रगामी, साहसी आ ऐतिहासिक दृष्टिसँ अपरिहार्य कृति थिक, जकर मौलिकता ओकर सीमासँ अभिन्न रूपेँ जुड़ल अछि। एकर गुण — प्रथम-अन्वेषणक साहस, बिसरल रचनाकारक पुनरुद्धार, समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि, 'दू कोटिक साहित्यकार'क मौलिक सिद्धान्त, आ मैथिली साहित्येतिहासकेँ व्यक्ति-केन्द्रित कैननसँ मुक्त कऽ जन-केन्द्रित बनएबाक प्रयास — ई सभटा एकरा मैथिली आलोचनाक एक कोसिला-प्रस्तर बनबैत अछि। संगहि एकर सीमा — संकलनात्मक असंगति, मूल पाठक अनुपलब्धता, मूल्य-मानदण्डक अस्थिरता, सैद्धान्तिक अनुशीलनक अभाव, परिप्रेक्ष्यक संकीर्णता, पाठ-प्रामाणिकताक संकट, आत्मीयता-जनित पूर्वाग्रह आ समान्तर इतिहासक अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण — ई सभटा कोनो व्यक्तिगत न्यूनता नहि, अपितु ओहि मुद्रण-सीमित, डिजिटल-पूर्व, संस्था-विहीन युगक संरचनात्मक बाध्यताक प्रतिफल थिक।
इएह द्वैध — गुण आ सीमाक अभिन्नता — 'अखियासल'केँ विदेह समान्तर इतिहास-आन्दोलनक एक पूर्व-रूप बनबैत अछि। जे रिक्तताकेँ रमानन्द झा नामाङ्कित करैत छथि — सर्वसुलभता, अभिलेखीकरण, पुनर्मूल्याङ्कन — ओहि रिक्तताकेँ भरब परवर्ती पीढ़ीक ऐतिहासिक दायित्व बनि जाइत अछि। एहि अर्थमे, कृतिक सभसँ पैघ सीमा इएह ओकर सभसँ पैघ उत्तराधिकार थिक। 'आँखि' ओहि दृष्टिक थिक जे बिसरल पाठकेँ देखबाक साहस केलक, आ 'साल' ओहि युगक थिक जाहिमे ओहि दृष्टिकेँ पूर्ण करबाक साधन अनुपलब्ध छल — 'अखियासल' नाम स्वयं एहि द्वैधक व्यञ्जना करैत अछि। तथापि मैथिली आलोचना आ साहित्येतिहासमे 'अखियासल'क स्थान महत्त्वपूर्ण अछि। ई पोथी इतिहासक बन्द कपाट खोलि कहैत अछि जे साहित्यक वास्तविक परम्परा केवल प्रसिद्ध नामक सूची नहि — ओ स्मृति, विस्मृति, संघर्ष, भाषा, संस्था, पाठक आ जनजीवनक संयुक्त समान्तर इतिहास अछि।
परिशिष्ट : संग्रहक अध्याय-सूची (मूल प्रकाशन-स्रोत सहित)
|
क्रम |
अध्याय / विवेच्य रचनाकार |
मूल प्रकाशन-स्रोत ओ तिथि |
|
१ |
मैथिलीक पहिल कथाकार पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' |
मिथिला मिहिर, १८ अगस्त १९८५ |
|
२ |
मैथिलीक प्रथम उपन्यासकार पं॰ जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर' |
मिथिला मिहिर, मार्च १९७७ |
|
३ |
रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास 'सुमति' |
हालचाल, १/१९८६ |
|
४ |
जनार्दन झा 'जनसीदन' आ 'निर्दयी सासु' |
मिथिला मिहिर, जून १९८२ |
|
५ |
पं॰ जनार्दन झा — एक बिसरल साहित्यसेवी |
मिथिला मिहिर दैनिक, २९-७-१९८५ |
|
६ |
पं॰ त्रिलोचन झा (बेतिया) — बिसरल मातृभाषानुरागी |
भाखा, सितम्बर १९८७ |
|
७ |
राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर' |
भाखा, १९८८ |
|
८ |
कवि-सेनानी छेदी झा 'द्विजवर' |
मिथिला मिहिर दैनिक, अगस्त १९८५ |
|
९ |
कुमार गंगानन्द सिंहक कथा-संवेदना |
मिथिला मिहिर, २४-१०-१९७६ |
|
१० |
कवीश्वरी हरिलताक वैष्णवता |
मैथिली प्रकाश, सितम्बर १९७२ |
|
११ |
कविवर श्यामानन्द झाक काव्य-वस्तु |
मिथिला मिहिर, २३-११-१९७५ |
|
१२ |
बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता |
बसात, प्रवेशांक १९८४ |
|
१३ |
कवि चूड़ामणि मधुपक गीति-साहित्य |
मिथिला मिहिर, अक्टूबर १९८७ |
|
१४ |
भट्टीकाव्यक परम्परा आ मधुपजी |
मिथिला मिहिर, १२/१९८७ |
|
१५ |
काञ्चीनाथ झा 'किरण'क कथा-जगत |
मिथिला मिहिर, मइ १९७७ |
|
१६ |
मैथिली उपन्यासक आलोकमे 'चन्द्रग्रहण'क नारी-पात्र |
अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद्, १९८९ |
|
१७ |
प्रो॰ हरिमोहन झा एवं हुनक 'चर्चरी' |
मैथिली अकादमी पत्रिका, मार्च १९८४ |
|
१८ |
कविवर यात्रीक स्तम्भ-लेखन |
मिथिला मिहिर |
|
१९ |
कविवर आरसी |
मैथिली अकादमी पत्रिका, १९८२ |
|
२० |
उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ हुनक कविता |
मैथिली अकादमी पत्रिका, १९८९ |
|
२१ |
शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' |
मिथिला मिहिर |
|
२२ |
पं॰ राजेश्वर झा — व्यक्तित्व ओ कृतित्व |
मिहिर, १९७८ |
|
२३ |
ललितक कथामे परिवेशक संक्रान्त जीवन |
मिहिर, १९७५ |
|
२४ |
धीरेन्द्रक कथाक सामाजिक सन्दर्भ |
जून १९८८ |
|
२५ |
प्रभासक कथा-यात्रा |
मिथिला मिहिर, १९८६ |
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
1. रमानन्द झा 'रमण', अखियासल, भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.), मैसूर, १९९५।
2. जयकान्त मिश्र, अ हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर (मैथिली साहित्यक इतिहास)।
3. करुणाकान्त झा, शोध-प्रबन्ध (मैथिली साहित्य-सम्बन्धी), 'अखियासल'मे उद्धृत।
4. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग १, https://www.videha.co.in/new_page_1.htm
5. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २७, https://www.videha.co.in/new_page_27.htm
6. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २८, https://www.videha.co.in/new_page_28.htm
7. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग ९०, https://www.videha.co.in/new_page_90.htm
8. गजेन्द्र ठाकुर, रचना-सङ्कलन, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm
9. मूल निबन्ध सभक प्रथम-प्रकाशन पत्र-पत्रिका : मिथिला मिहिर, मिथिलामोद, भाखा, मैथिली अकादमी पत्रिका, बसात, हालचाल, मैथिली प्रकाश तथा अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन/परिषद्क स्मारिका (१९७२–१९८९)।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
विदेहमे सभठाम ताकू / Search all Videha
Static full-text search · Pagefindलेखक/शीर्षक/अंक/वर्ष — खोज-विधा; शेष बटन विदेह-खण्ड फिल्टर। Author/Title/Issue/Year are search modes; the remaining buttons filter indexed Videha sections. Static Pagefind index — no search server. रोमन/IAST शब्दक ठीक परिणाम नहि भेटलापर ध्वन्यात्मक (phonetic) फॉलबैक स्वतः चलत। PDF-अभिलेख बटन archive.org/VidehaAndSadeha क जीवन्त सूची (सभ अंक + सदेह) मे ताकत — अंक-संख्या (जेना ४४५) लिखितहि सोझे PDF भेटत।