हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥
यौवनान्माद वशीभूत जनसामान्य केर वचन हो अथवा धीर-गभीर जनक मृदुवचन, प्रियतमा हेतु ’हे हृदयेश्वरी’ एहि पदक प्रयोग सुनि सर्वथा एहि पद केर चिन्तन स्वाभाविक छल।
सामान्यरूपें तऽ ’हृदय’ पदक आशय उरोभागस्थ रक्ताभिसरण आदि कार्य करय बला शरीरावयवविशेष मात्र होइत अछि मुदा प्रश्न ई उठैत अछि जे हृदयेश्वरी पदक सन्दर्भ में की ई आशय स्वीकार कयल जा सकैत अछि? कदाचित नहिं । कियाक तऽ कोनो प्राणी दोसर प्राणीक शरीरावयव विशेषक ’ईश्वरी’ अर्थात नियामिका, संचालिका, प्रेरिका अथवा निर्देशिका कोना भय सकैत छैक? एतय प्रश्न स्वाभाविक रहत जे शिरोभागस्थ हृदय सेहो तऽ शरीरावयव विशेषे अछि..? एकर उत्तर ई देल जा सकैत अछि जे दुनू क स्वभाव एवं कार्यप्रणाली पृथकशः छैक। शिरोभागस्थ मूलतः स्नायु सँ सम्बद्ध छैक; जेकर चर्चा आगू कयल जा रहल अछि।
अस्तु, चिरकाल चिन्तन एहि लेख केर रूप लेलक आओर एहि बिन्दु पर पहुंचल जे ’हृदयेश्वरी’ पद में हृदय केर आशय जनसामान्य द्वारा स्वीकृत आशय सँऽ भिन्न होइत छैक ।
एहि प्रश्नक केर उत्तर भेट गेला पर कि हृदय शब्द सँ उरोभागस्थ एक अंगविशेषमात्र केर बोध नहि होइत अछि; हमर दृष्टि अमरकोष आओर मेदिनीकोष दिस गेल
अमरकोषानुसार ’चित्त’ हृदय केर पर्याय रूप मे स्वीकरणीय अछि[1]। ओतहि मेदिनीकार सेहो एहि तथ्य के स्वीकार करैत छथि[2]। एहि तरहें दुनू कोषकार मस्तिष्क रूप अर्थ स्वीकार करैत छथि।
वैदिकग्रन्थ सेहो एहि तथ्य के समर्थन दैत अछि। शिवसंकल्प सूक्त में मन के हृदयस्थ कहल गेल अछि[3]। योगसूत्र सेहो हृदय केर आशय चित्त सँ लैत अछि[4]। मस्तिष्क सेहो हृदयवत कार्य करैत अछि; अस्तु ओकर अभिधान हृदय देल जा सकैत अछि। शतपथब्राह्मण[5] आओर बृहदारण्यक[6] उपनिषद त्र्यक्षर (हृ, द, य एहि तीन अक्षर) केर एकैकशः व्याख्या करैत अछि। मुण्डकोपनिषद[7] एकरा और स्पष्ट करैत कहैत अछि।
caraचरकसंहिता सेहो हृदय केर वर्णन मस्तिष्क केर आशय सँ करैत अछि।[8]
महाभारतक वनपर्व तऽ एकरा पूर्णतः स्पष्ट कय दैतब अछि जतय युधिष्ठिरसँ कहल जाइत छन्हि जे ’जीवात्मा’ हृदय में रहैत उत्तम अधम बुद्धि के विभिन्न द्रव्य सँ जोरैत अछि[9]।
एवं प्रकारें देखैत छी जे हृदय पद सँ ’उरस्थ हृदय’ शिरस्थ हृदय’ आओर नाभी[10] आशय लेल जाइत अछि।
एतय आवश्यक अछि जे उरोभागस्थ हृदय एवं शिरस्थ हृदय में अन्तर स्पष्ट कयल जाए। उरोभागस्थ हृदयक कार्य अछि-
· प्रत्येक अंग सँ अशुद्ध रक्त केर आहरण
· धमनी द्वारा शुद्धरक्तक प्रदान करब
· मस्तिष्क के सदा क्रियाशील राखब
शिरस्थ हृदयक कार्य अछि-
· संवेदक ज्ञानतन्तु द्वारा ज्ञानक आहरण
· कार्यतन्तु द्वारा कर्मेन्द्रिय के कार्यप्रदान करब
· सतत गतिशीलता कायम राखब अर्थात नियन्त्रण राखब
Contin…
Bipin Jha
www. bipinjha.webs.com IIT, Bombay
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[1] चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः। अमरकोष
[2] हृदयं मानसे वुक्करसोरपि नपुंसकं...। मेदिनीकोष
[3] हृत्प्रतिष्ठं यदजिरंजविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजु० ३४.६
[4] हृदये चित्संवित...। योग० ३.३४
[5] शतपथब्राह्मण १४.८.४.१
[6] बृहदा० १४.८.४.१
[7] भिद्यते हृदयग्रन्थिः ...। मुण्डकोपनिषद, २.८
[8] आत्मनः श्रेष्ठमायतनं हृदय...। चरक० निदान० ८.३
[9] स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः।
बुद्धिं द्रव्येषु सृजति विविधेषु परावराम॥ महा० वन० १८१.२२
[10][10] उपयुक्तस्याहारस्य सम्यक...। सुश्रुत० सूत्रस्थान १४
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१.मुन्ना जी- अधिकार २.बेचन ठाकुर-बेटीक अपमान- दृश्य पाचिम
१
मुन्ना जी
मुन्नाजी (उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल लघुकथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो लघुकथा, कथा, क्षणिका आ लघुकथा सम्बन्धी किछु आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली लघुकथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत।
अधिकार
रूक.....।
ऊँक नै लगा सकै छै तोँ।
रामरीत पासवानक मुइला पछाति, भरि गामक लोक ओकर अंगनासँ दुरा धरि सोहरल छल। विधवाकेँ सांत्वना देवाक लेल।
मुदा, ओकर दियाद वादकेँ लगलै कठाइन।
दरअसल, मालिक मुक्तारक ई भीड़ तऽ जुटल रहै बजरंगीक सहयोगमे। बजरंगी, रामरीतक छोट भाए, मालिक–मुक्तारक पाछु चटुआ आ अखनुक वार्ड सदस्य।
ओ भैयारी निभेवाक नै, घरारी हड़पवाक फेरमे छल, किएक तऽ रामरीतकेँ बेटा नै छलै।
ओकर नजरि रहै रामरीतक छः कट्ठा घरारीपर तेँ सभकेँ जुटा लेने छल, गवाहक रूपमे, भविष्यक लेल। आ लहास उठेवासँ पहिने फरमान सुना देने छल– आगि जे देतै आ श्राद्ध जे करतै, घरारीक अधिकारी तऽ उएह ने हेतै।
समवेत स्वीकृतिये मुड़ी डोलल छल–हँ.....।
चलु–चलु लहास उठवै जाऊ, बेशी विलम्ब नीक नै।
बजरंगी, कोहा उठावऽ।
नै, किन्नहुँ नै। विधवाक आक्रोशक स्वरकेँ सुनि सभ शांत भऽ गेल।
मंजुला, कोहा उठा आ आगि ले। अपन पिताक हृदयक एक मात्र टुकड़ी अछि ओ। आगि उएह देत।
ठीक छै, चलु.....।
मुखाग्नि हमही देब पिता हमर छथि, हुनक अंश हम छी, बजरंगी कक्का तऽ हुनक सम्बन्धी मात्र छथिन।
ईह....., जेना रामरीतक बेटा रहथिन, अधिकार जताबऽ एलीहे। दबल स्वर भीड़क बीचमे सँ सुनएल।
बेटा नै छी तेँ कि, हम तऽ हुनके रक्तबीचक पदार्पण छी। ओ निपुत्र छथि, मुदा निःसंतान नै।
आइ सँ अही रेवाजक शुरूआत बुझू।
आ संग के देतौ?
निपुतराहा सभ।
२
बेचन ठाकुर
बेटीक अपमान
दृश्य पाचिम-
(स्थान- बलवीर चौधरीक घर। बलवीर चौधरी एकटा पंचायत शिक्षक छथि। हिनक पत्नी सुनीता देवी छथिन्ह। मंजू आ संजू हुनक सुपुत्री। बलवीर आओर सुनीता रविकेँ आपसी गप-सप्प कए रहल छथि।)
सुनीता- स्वामी, एगो बेटा अपनो सभकेँ रहितए।
बलवीर- एहेन बात किएक बाजलहुँ अहॉं? कि हमरा लोकनि नि:सन्तान छी? की बेटी बेटासँ कम होइछ? अपना अपना जगहपर कियो ककरोसँ कम नहि होइछ।
सुनीता- स्वामी, मोन होय अए जे एगो बेटा होएताए। मुदा आब कोन उपाए?
बलवीर- यै, अहॉं मोनकेँ किएक बौआबैत छी एतेक? जहन बुझैत छी जे ऑपरेशन कराए लेने छी, तखन बेकार मोनकेँ भरमेनाइ।
सुनीता- से तँ ठीके कहैत छी मुदा।
बलवीर- मुदा की? मुदा तुदा छोड़ू। यै, बेटा बेटी जनमेलासँ नहि होइत अछि। ओकर प्रतीक्षा चाही प्रतीक्षा अऍं यै, अपन मंजू आ संजूक आगू किनक बेटा कोनो कलामे टीक सकैत छथि। रूप आ गुणमे ओ सभ किनकोसँ कम अछि? एना अपने आपपर घमंड नहि करबाक चाही। अपना सभ दुनू परानीमे गप करैत छी।
सुनीता- यौ, संतोषम परम सुखम्। अपन दुनू बेटीकेँ खूब मोनसँ पढ़ाए-लिखाए कऽ डाक्टर-इंजिनियर, एस.पी. कलक्टर बनाउ आ समाजमे खूब प्रतीक्षा पाउ। बहुते जनमा कए कुक्कुर-बिलारि जकॉं रोडपर ढहना कऽ कोन प्रतीक्षा, कोन फेदा?
बलवीर- थैंक्स यू वेरी मच, सुनीता। आब अहॉं लाइनपर अएलहुँ। एहिना सदिखन बुद्धि विवेकसँ काज करी।
पटाक्षेप-
छठम दृश्य क्रमश:
जितेन्द्र झा