मधुश्रावणी: मिथिलाक पारम्परिक हनिमून
२.४.१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)(क्रमसँ पहिल खेप) २.बिपिन झा-चहकैत चौक आ कनैत दलान
२.५.१.डा. राजेन्द्र विमल- साहित्य–सङ्गम गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सुर–ताल २.प्रो. वीणा ठाकुर- जिनगीक जीत उपन्यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर ३. - जगदीश प्रसाद मंडल- कथाक शेष- अर्द्धागिनी ४. - जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- अतहतह
२.६.१.दुर्गा नन्द मंडल- बुढ़िया फूसि २.जितेन्द्र झा- नव विवाहिताक लेल नव उमंग लाबए एहन मधुश्रावणि ३. बेचन ठाकुरक नाटक- बेटीक अपमान आगॉं- ४. नन्द विलास राय- कथा- चौठचन्द्रक दही ५.दुर्गानन्द मंडल- शिव कुमार झा टिल्लू जीक लिखल खोंइछक लेल साड़ी- कथापर दू शब्द
२.७.१.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, जमशेदपुर समीक्षा- मैथिली चित्रकथा २.जितेन्द्र झा- नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल –ग्लानि ३.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ समीक्षा- मिथिलाक बेटी (नाटक)
२.८.१.मनोज झा मुक्ति -महोत्तरीक यूवाके देशव्यापी अभियान २.-सुशान्त झा- मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य
शम्भु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।—सम्पादक
निबंध : “मैथिली साहित्यक आदिकाल” (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी)
निबंधकार : डॉ. शंभु कुमार सिंह
मैथिली साहित्यक आदिकाल
मानव समुदाय सर्वदा सँ समस्या सभक समाधान करबाक लेल साकांक्ष रहल अछि। कोनो भाषाक जन्म कहिया भेल एहि विषयमे किछु कहब कठिने नहि अपितु असंभव सेहो अछि। यद्यपि किछु विद्वान भाषा सभक जन्मपत्री बाहर करबामे व्यस्त रहलाह अछि किन्तु ओ लोकनि बरोबरि एहि दिशामे असफल रहलाह अछि। लिखित उपलब्ध साधनपर एतबे कहल जा सकैछ जे अमुक समयमे अमुक भाषा-शब्द प्रचलित छल। इएह हाल प्रत्येक भाषाक संग अछि।
साहित्यक शरीर अछि भाषा। संवेगात्मक अनुभूति जकरा साहित्यशास्त्रमे रसक आख्या कहल जाइत अछि, भाषाक माध्यमसँ अभिव्यक्त होइछ, ओ तेँ कोनो साहित्य इतिहास सँ संलिष्ट रहैत अछि। विश्वभाषाक इतिहासमे केवल संस्कृते टा एहन विषय अछि जे पाणिनि द्वारा ‘संस्कृत’ भए तेना ने प्रतिष्ठित भेल जे अद्यापि अपन स्वरूप सभ ठाम सभ विषयमे एकरूप स्थिर कएने अछि।
भारतीय साहित्यक आरंभ प्रायः अंधकारमे विलीन अछि। मैथिली साहित्यक संग सेहो इएह चरितार्थ होइत अछि। साहित्यक इतिहासकार मध्य बहुत दिन धरि ई विवादक विषय बनल रहल जे मैथिली साहित्यक उद्भव एवं विकासक प्रारंभ कहिया सँ मानब?
प्राचीन समयसँ मिथिला संस्कृतक केन्द्र रहल अछि। सम्पूर्ण भारत विशेषतः पूर्वांचलक छात्र लोकनि संस्कृत अध्ययनक हेतु मिथिला अबैत छलाह। विद्याक प्रचार-प्रसारक कारणेँ एतए विद्वान लोकनिक संख्या अधिक छल। ई विद्वान लोकनि दर्शन, न्याय, ज्योतिष, गणित, आदिकेँ महत्वपूर्ण मानैत छलाह। फलस्वरूप जनभाषाक उपेक्षा प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूपमे होइते रहलैक। मुदा एतबा होइतहुँ एहिठामक लेखक तथा कविगण समय-समय पर जमभाषामे सेहो किछु रचना करैत छलाह। एहि कारणेँ प्राचीनकालीन मैथिली सामग्री अत्यंत सीमित रूपमे उपलब्ध होइत अछि।
किन्तु जतबा सामग्री मैथिलीक प्रारंभिक कालक अध्ययनक हेतु उपलब्ध अछि तकरा चारि भागमे विभाजित कएल जा सकैत अछि:- 1. शब्द, 2. वाक्यखंड, 3. सूक्ति तथा 4. लोकगीत एवं लोकगाथा। अध्ययनक सुविधाक हेतु एहि सभ वर्ग पर अलग-अलग प्रकाश देल जा सकैछ।
(1) शब्द
भाषा विज्ञानक अनुसार कोनो भाषाक हेतु शब्दक महत्व सर्वाधिक अछि। पहिने शब्दक प्रयोग होइत छैक तखन स्वरूपक। एहि दृष्टिएँ प्रथम कोटिमे ओ सभ ग्रंथ अबैत अछि, जाहिमे मैथिली शब्दक प्रयोग कएल गेल अछि। यद्यपि ओ सभ ग्रन्थ संस्कृतमे लिखल अछि, किन्तु लेखक अपन भावकेँ पूर्ण रूपसँ व्यक्त करबाक हेतु तथा सरल एवं जनसाधारणक बुझबा योग्य बनएबाक हेतु अनेक स्थान पर पर्यायवाची मैथिलीक व्यवहार कएलनि अछि। एहि वर्गमे सर्वप्रथम किछु निबंधकार लोकनि अबैत छथि जे अपना निबंधमे मैथिलीक स्थान देलन्हि। एहि प्रकारक लेखक लोकनिमे नवम् (9वम) शताब्दीक लेखक वाचस्पति मिश्रक नाम सर्वप्रथम लेल जाइत अछि। ई अपन प्रसिद्ध ग्रंथ शाङ्कर भाष्य टीका ‘भामति’ मे निगड़ शब्दवाची मैथिली ‘हरि’ क प्रयोग कएने छथि। ई शब्द देशी थिक आ हमरा लोकनिक ओतए आइ धरि प्रचलित अछि। ई शब्द मैथिलीक अप्पन अछि आ तेना ने पचि गेल अछि जे एकरा एहिसँ फराक करब असंभव छैक। यद्यपि एखनहुँ विद्वान मंडली मध्य ई विवाद अछि जे ई शब्द सन्ताली छैक। शब्द जैँ प्रचलित छलैक तेँ एकरा अपनाओल गेल, अतएव एहि शब्दकेँ मैथिलीक शुद्ध रूप कहब विशेष उपयोगी हैत।
दोसर लेखक छथि 10म् 11हम् शताब्दीक सर्वानन्द। डॉ. सुभद्र झा अपन निबंध (Maithili Words in Sarvanand’s Amarkosh) मे पूर्ण रूपेँ विचार करैत कहैत छथि जे “सर्वदानन्दक ‘अमरकोष’ मे 400 सँ 600 बीचमे शुद्ध मैथिली शब्दक प्रयोग देखबामे अबैत अछि, जकरा मैथिलीक शुद्ध रूप कहल जा सकैछ।” मैथिली केँ असमी एवं बंगला सँ समता रहबाक कारणेँ एहि पर विवाद कएल गेल जे ई शब्द प्राचीन बंगला एवं असमीक प्रारंभिक रूप थिक। किन्तु ई तँ स्वाभाविक थिक जे तखन भाषा अपन निर्माणक स्थितिमे रहल होएत तैँ ओहि समयक तद्युगीन भाषा सँ कमे अंशमे अंतर रहतैक तथा देशगत भिन्नता रहबाक कारणेँ पूर्ण रूपसँ एकर विकास हैब असंभव अछि। ‘अमरकोष’ में प्रयुक्त ई शब्दावली मैथिलीक निज सम्पत्ति थिक जकरा अस्वीकार नहि कएल जा सकैछ।
तृतीय सामग्री हमरा लोकनि केँ पञ्जीमे उपलब्ध होइछ। डॉ. जयकान्त मिश्र एकरा सभसँ प्राचीन मानैत छथि: “The Earliest of these are, of course, the oldest Vernacular names of places and persons found in the early Panji records.” किन्तु एतय एकटा तथ्य विचारसंगत अछि जे पञ्जीक प्रारंभ 1310 ई. मानल गेल अछि, तैँ एहिमे पओल गेल शब्दकेँ वाचस्पति मिश्र एवं सर्वानन्दक पश्चातहिक मानव उचित हैत। पञ्जी सेहो संस्कृतहिमे अछि किन्तु किछु शब्द एहन भेटैत अछि जे मैथिलीक थिक।
शब्द सबहक एहि प्रकारेँ प्रयोग चौदहम एवं पन्द्रहम शताब्दीक अन्य विद्वान सभ यथा चण्डेश्वर ठाकुर, रूचिपति, जगद्धर, वाचस्पति द्वितीय तथा विद्यापति ठाकुर सेहो कएने छथि। डॉ. उमेश मिश्र अपन निबंध शीर्षक “Chandeshwar and Maithili” मे चण्डेश्वर ठाकुर द्वारा प्रयुक्त मैथिली शब्द सभक चर्चा कएने छथि। तथा पुनः ओ “Journal of Bihar Orissa Research Society” 1928 क पृष्ठ संख्या 266 मे “Maithili Words of the 15th Century” शीर्षक निबंधमे रूचिपति एवं जगद्धर द्वारा प्रयुक्त शब्दक चर्चा करैत ओ लिखैत छथि “In this commentary Ruchipati has now and then used words of Maithili, His mother-tongue, in order to give the exact meaning of some of the words of Sanskrit and Prakrit.” उदाहरणस्वरूप किछु शब्दकेँ देखल जा सकैछ:-
संस्कृत मैथिली
कर्तरिल कतरनी
जलग्रह जलढ़री
पलांदु पियाजु
पोत डोंगी
कर्मान्तिक कामत, कमती
विहंगिक बँहगी
सुवासिनी सुआसिन
पर्यङ्क पलंग
पुत्रिक पुतरी
आलवाल थाल, कादो इत्यादि।
डॉ. मिश्र ओहि निबंधमे जगद्धर द्वारा प्रयुक्त शब्द सभक सेहो वर्णन कएलनि अछि। जगद्धरक ‘मालती-माधव’ तथा ‘वेणीसंहार’ दुनू टीकामे मैथिली शब्द पाओल जाइत अछि यथा:-
संस्कृत मैथिली
दोड़दह दोहर
चोर्णकम टोप्पर
ग्रह गोह
अलवालम थाल, कादो
प्राजनम् पैना
यूथिका जूही आदि।
वाचस्पति मिश्र द्वितीय द्वारा लिखित ‘तत्वचिन्तामणि’क अंग्रेजी अनुवादक भूमिकामे सेहो डॉ. उमेश मिश्र सिद्ध कएने छथि जे वाचस्पति मिश्र द्वितीय सेहो अनेक मैथिली शब्दक प्रयोग कएने छथि।
(2) वाक्यखंड
शब्दक अतिरिक्त हमरा लोकनिकेँ मैथिली वाक्यखंड सभक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। जखन भारतवर्षमे अंग्रेजी राज्यक सुदृढ़ स्थापना भए गेल, तखन अंग्रेज लोकनि भारतक क्षेत्रीय भाषा सभक आधुनिक अनुसंधान प्रणालीक अनुसारेँ अध्ययन प्रारंभ कएलनि। एहि क्रममे म. म. हरप्रसाद शास्त्री केँ प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ सभक अनुसंधान करबाक भार भेटलनि। म. म. शास्त्री एहि क्रममे नेपाल गेलाह, ओतए हुनका 1916 ई. मे तीन गोट ग्रंथ भेटलनि, जकरा ओ ‘बौद्धगान ओ दोहा’ नामसँ प्रकाशित करौलनि। उक्त तीनू ग्रंथ थिक (क) दोहाकोष (ख) चर्याचर्य विनिश्चय (ग) डाकार्णव।
एहि ग्रंथ सभक रचनाकाल आठम शताब्दीसँ एगारहम शताब्दी धरि मानल जाइत अछि। ओहि समयमे आधुनिक भाषा सभ विकासोन्मुख छल, किन्तु विकसित नहि भेल छल, तैँ हेतु भाषा-विज्ञानी लोकनि ओहि रचनामे भारतीय पूर्वांचलक प्रायः सभ भाषाक रूप पबैत छथि। सिद्ध लोकनिक विषयमे जखन विशेष अनुसंधान भेल तँ हुनका लोकनिक क्षेत्र गोरखपुर सँ भागलपुर धरि मानल गेल। जे सिद्ध लोकनि जाहि क्षेत्र केँ अपनौलन्हि से हुनका अपन रचनामे ओहि क्षेत्रक भाषाक प्रभाव देखबामे अबैत अछि। मैथिलीक प्रभाव सेहो सिद्ध लोकनिक रचनामे पाओल जाइत अछि। एहि मतक पुष्टि करबाक हेतु निम्न तर्क पर दृष्टि देल जा सकैछ:-
1) सिद्ध लोकनिक चर्चा ज्योतिरीश्वर अपन ‘वर्णरत्नाकर’ मे कएने छथि जाहिसँ अनुमान कएल जाइत अछि जे ओ लोकनि अपन मतक प्रचारार्थ मिथिला अवश्य गेल हेताह।
2) पदक शब्दावली सभक वैज्ञानिक अध्ययन कएलासँ ई सिद्ध होइत छैक जे ओ मैथिलीक अत्यंत सन्निकट अछि।
3) हुनका लोकनिक पदमे जाहि प्रकारक स्थानक वर्णन कएल गेल अछि तकरा मिथिलाक भौगोलिक स्थितिसँ विशेष साम्य छैक।
4) ओहिमे विभक्ति, विशेषण तथा किछु क्रियापद एहन अछि जे मैथिलीमे प्रचुर मात्रामे प्रयोग कएल जाइत अछि।
सिद्ध साहित्यक भाषा, विद्यापतिक कीर्तिलता, कीर्तिपताका, विशुद्ध विद्यापति पदावली तथा ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरक भाषासँ साम्य रखैत अछि। किछु सामान्य विशेषता एहि सभ पदमे पाओल जाइत अछि यथा:- दन्त्य वर्णक प्रधानता, ‘एँ’ क प्रयोग, चन्द्रबिन्दुक एकहि समान प्रयोग, ‘हि’ ‘एँ’ तथा ‘ए’ क ध्वनिक एकहि समान प्रयोग, जे, एहु, तरक, अप्पन, आदि सर्वनामक प्रयोग इत्यादि विशेषता समान अछि।
5) ओहि पद सभमे किछु लोकोक्ति तथा किछु वाक्यखंड एहन प्रयोग कएल गेल अछि जो मिथिलामे एखनहुँ प्रचलित अछि, यथा:- (I) पहिल बियान, (II) बलाद बिआएल गबिया बाँझे (बरद बिआएल गाय रहल बाँझे) (III) बेङ्गसँ साँप बढ़िल जाय (IV) हाक पाड़ई (V) जे जे अएला ते ते गेला (VI) टुटि गेल कन्था इत्यादि।
6) किछु शब्दावली एहन अछि जे मैथिलीक प्राचीन रूप थिक। ओ शब्द सभ एखन विकसित भए दोसर रूप धारण कए लेलक अछि, यथा:-
चर्यापद मध्यकालीन मैथिली आधुनिक मैथिली
आजि आजि आइ
चापी - चापिदेब
तेन्तलि - तेतरि
बिआती बाइति बिअउती
टेंगी - टेंगारी
चगेरा - चङ्गेरा
भणइ भनइ भनथि
सिद्ध साहित्यक प्रधान कविगणमे किछु नाम अछि सरहपा, कान्हपा, भुसुकपा, शबरपा, कुक्करीपा, लुईपा, आदि। जतए धरि हिनक सभक समयक प्रश्न अछि, हिनका लोकनिक समय संवत 817 सँ मानल गेल अछि किएक तँ प्रथम कवि ‘सरहपा’क आविर्भाव काल 817 मानल गेल अछि। एहि तरहेँ हिनका लोकनिक समय 8 सँ 12हम शताब्दी धरि निश्चित कएल गेल अछि।
दोहाकोषक भाषाकेँ डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी शैरसेनी अपभ्रंश मानैत छथि। ‘चर्याचर्य विनिश्चय’ पर सेहो शौरसेनिक प्रभावकेँ ई स्वीकार करैत छथि: The Charyas belong to the early or old N.I.A Stage. Being the first attempt, the speech is not sure of its own forms learns on its stronger, better established Sisters and Aunts.
उपर्युक्त तर्क एवं प्रमाण सभक आधार पर डॉ. सुभद्र झा अपन “Formation of Maithili Language” नामक ग्रंथमे चर्यापदक भाषाकेँ निर्विवाद रूपेँ माथिलीक “छिकाछिकी” शाखाक अन्तर्गत मानैत छथि। किन्तु ई निर्विवाद नहि अछि। एकरा प्राचीन बंगाली, प्राचीन असमियाँ तथा प्राचीन उड़िया सेहो कहल गेल अछि तथापि एतबा विवाद रहितहुँ अधिकांश विद्वान एकर भाषाकेँ प्राचीन मैथिली मानैत छथि। एहि मतक समर्थक छथि-- राहुल सांकृत्यायन, डॉ. के. पी. जायसवाल, म. म. डॉ. उमेश मिश्र, नरेन्द्रनाथ दास, डॉ. सुभद्र झा, श्री शिवनन्दन ठाकुर आदि।
अतएव, निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ जे चर्यापदक भाषा प्राचीन मैथिलीक अत्यंत सन्निकट अछि। कारण जे एहिमे प्रयुक्त वाक्यखंड, जे मैथिलीक थिक, आदिक पूर्ण प्रयोग पाओल जाइत अछि।
(3) सूक्ति
एकर पश्चात् डाकवचनावलीक स्थान अबैत अछि। अतिप्राचीनकालसँ मिथिला कृषि प्रधान मानल जाइत रहल अछि। एतुका भूमिमे ने नदीक आभाव छैक आ ने भूमि उसर सएह छैक। फलस्वरूप खेती पर पूर्ण जोर देल जाइत रहलैक। मिथिलावासी लोकनि ज्योतिषमे सेहो विशेष आस्था रखैत छलाह, फलस्वरूप कृषि एवं ज्योतिष संबंधी नियम आदिक विषयमे लोककेँ शिक्षा देबाक हेतु विद्वान लोकनि तत्कालीन प्रचलित जनभाषामे सूक्ति सभक निर्माण करैत छलाह जाहिसँ अनपढ़ लोक सेहो पूर्णरूपसँ लाभान्वित होइत छलाह। एहि सूक्ति सभक अन्तर्गत डाक, घाघ, आदिक वचन सभ अबैत अछि।
डाकवचनावलीक भाषाकेँ किछु विद्वान चर्यापदहुँ सँ प्राचीन मानैत छथि। कारण जे चर्यापदहि जकाँ एकरहुँ प्रचार उत्तर प्रदेश सहित समस्त पूर्वोत्तर भारतमे भेल। डाकवचनावलीक दू संस्करण मिथिलामे प्रकाशित भेल, कन्हैयालाल कृष्णदास द्वारा मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा सँ। भाषाक दृष्टिसँ दोसर संस्करण बेसी प्रामाणिक कहल जा सकैछ । कारण जे ई एक प्राचीन हस्तलिखित पोथी पर आधारित अछि। एकर भाषा अपभ्रंशसँ विशेष साम्य रखैत अछि। प्राचीन तालपत्रमे जे डाकवचन भटैत अछि से ओहि ‘अवहट्ट’ मे भेटैत अछि, जाहिमे महाकवि विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ विद्यमान अछि। डाकक वचन एखनहुँ मैथिल समाजमे प्रचलित अछि, किन्तु देश कालक व्यवधानसँ हुनक भाषामे अनेक परिवर्तन आबि गेल अछि जाहिसँ ओ आधुनिकताक छाप ल’ नेने अछि। प्राचीन स्वरूपक एकाध उदाहरण थिक:-
मुहूर्त विचार:- तिथि परमाणहि साठि दण्डा, से लए करए बारह खण्डा।
अद्दा, भद्दा, कार्तिक मूल, भनई डाक सबेटा निर्मूल।
तथा, सनिसत्ते शुष्क लए दुई छठि वेहप्फए होइ विरूई,
बुध तीअ दोअसि सूर, मंगल दशमी परिहर दूर,
होए एगादशी सोमवारे, दग्धतिथि फुर गहिअ गोआरे।।
किछु आर उदाहरण:-
साओन पछवा बह दिन चारि
चूल्हिक पाछाँ उपजय सारि
साओन शुक्ला सप्तमी जौं गरजे अधरात
तो जाहू पिया मालवा हम जाएब गुजरात।
डाकक समय केँ ल’ कए विद्वान सभक मध्य एखन धरि मतैक्य नहि अछि। हुनक निवास स्थानक विषय सेहो विवादग्रस्ते अछि। बंगाल, उत्तर प्रदेश, तथा मिथिला, सभ हुनका अपन-अपन स्थानक मानैत अछि। मिथिलामे डाकक संबंधमे अनेक किवदंती प्रचलित अछि। एहिसँ ई अनुमान कएल जाइत अछि जे ई अवश्ये मिथिलाक छलाह। मिथिलामे जे किवदंती प्रचलित अछि ताहि अनुसारेँ ई बराहमिहिरक पुत्र छलाह तथा जातिक गोआर।
कृषि सँ संबंधित डाकक प्रस्तुत वचन अद्यावधि प्रायः प्रत्येक लोकक कण्ठमे निवास क’ रहल अछि:-
थोड़कए जोतिह’ अधिक मटिअबिह
ऊँच कए बान्हिह’ आरि
ताहू पर जँ नहि उपजय तँ
डाककेँ पढ़िह’ गारि।
अथवा
साओन पछवा भादव पुरबा
आसिन बहै ईशान
कातिक कन्ता सिकियो ने डोलै,
कतए कए रखब’ धान?
अथवा
शुक्र दिन केर बादरी, रहे शनिचर छाय
कहे डाक सुनु डाकिनी, बिनु बरसे नहि जाय।।
अथवा
जौं पुरबैया पुरबा पाबै,
सुखले नदिया धार बहाबै
(4) लोकगीत एवं लोककथा
आदिकालक उपलब्ध सामग्रीक रूपमे लोकगीत एवं लोकगाथाक सेहो अपन महत्वपूर्ण स्थान अछि। एहि मे सँ किछु तँ पूर्ण साहित्यिक थिक। एकर एक विशेषता ई अछि जे एहि सभक नायक कोनो अवतारी वा अंशी पुरूष नहि छलाह। एहन रचना सभमे लोरिक, सलहेस बिहुला, गोपीचन्द मरसीयाक गीत सभ अबैत अछि। संसारक प्रत्येक स्थानमे वीरपूजाक भावना वर्तमान छलैक, मिथिला सेहो एहि भावना सँ वंचित नहि छल। उपलब्ध प्रमाणक आधार पर एतबा कहल जा सकैछ जे 13हम 14हम शताब्दीमे ओहि प्रकारक गानक प्रचार एहिठाम छल। कारण जे ज्योतिरीश्वर अपन ग्रंथ ‘वर्णरत्नाकर’ मे लोरिक गीतक चर्चा कएने छथि। अतएव ई सिद्ध होइत अछि जे ई एहिसँ पूर्वक तँ अवश्ये थिक। ई गीत सभ खनहुँ मिथिलामे खूब गाओल जाइत अछि। मात्र जिह्वा पर रहबाक कारणेँ एकर भाषा आधुनिक रूप धारण करैत गेलैक अछि। एहि गीत सभक भाषा अवश्ये प्राचीन मैथिली छल होएतैक, किन्तु दुर्भाग्यवश ओहि प्रकारक गीत सभक संग्रह एकठाम नहि भेल अछि। एहि दिशामे सर्वप्रथम डॉ. जी. ए. ग्रिर्यसन 19म शताब्दीक अन्तमे किछु कार्य कएलन्हि, हिनक संग्रह प्राचीनतम संग्रह मानल जाइत अछि। एकर पश्चात् ‘लोरिक विजय’ पर श्री मणिपद्मक एकगोट निबंध, दिसम्बर 1953 मे ‘वैदेही’ मे प्रकाशित भेल छलनि जाहिमे ओ प्रमाणित कएने छलाह जे लोरिकक गीत मैथिली साहित्यक अमूल्य निधि थिक। लोरिक गाथाक प्रस्तुत पाँतीमे केहन धरावाहिकता तथा भाषाक प्राचीनता अछि से द्रष्टव्य थिक:-
आँगी मे जे झाँगी सोभए
रत्तन लागल हार
झाँगी मे जे मानिक सोभए
हीरा झमकार
से हँसइ जखन दामिनी दमकए
जकरा दिस उठाकए तक्कए
दई करेजा सालि
लोरिकक प्रवाह अपूर्व आ ध्वनि-योजना अत्यधिक ओजस्वी अछि। एकर गायक ई गबैत-गबैत जेना प्रभक्त भए उठैत अछि एवं झूमए लगैत अछि, तथा ताल ठोकि टाहि मारैत अछि। एहि बीचमे कनियो एकरा टोकि दिऔक अथवा स्थिर भावेँ गाब’ कहिऔक तँ गायक झमान भए खसत। मंगलाचरणक ई पंक्ति केहन मोहक अछि:-
“कंठ दीह कोकिला माय आ मधु सन दीह भास”
लोरिकक सदृश मरसीयाक गीतकेँ सेहो देखल जा सकैछ:-
वनमे रोए कोयल जंगलमे रोए फातमा
घरमे रोए दुलहिन अभागलि रे हाय
एक रोए अम्मा दोसर रोवे धन्ना रे हाय
तेसर रोए दूध छारि बलवा रे हाय।
अतएव, ई दृढ़तापूर्वक कहल जा सकैछ जे 13हम 14हम शताब्दी धरि मैथिली भाषामे गीत तथा कथाक सृजन अवश्य होमए लागल छल।
एकरा सभक अतिरिक्त निम्न साक्ष्य सभक सम्यक अध्ययन सेहो कएल जा सकैछ:-
(अ) वर्णरत्नाकर:- एकर पश्चात् वर्णरत्नाकरक स्थान अबैत अछि। एहिठामसँ हमरा लोकनि केँ मैथिली भाषाक क्रमबद्ध प्रगति दृष्टिगत होइत अछि। वर्णरत्नाकर मैथिलीक प्राचीनतम गद्य ग्रंथ थिक। 13हम 14हम शताब्दीमे मैथिली एक विकसित भाषा भए गेल। केवल शब्द, वाक्यखंड तथा किछु लोकगीतहिक नहि अपितु वर्णरत्नाकर सदृश प्रौढ़ गद्य ग्रंथ उपलब्ध सामग्रीमे मैथिलीक पूर्ण विकसित रूप ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरक रूपमे भेटैत अछि। ई 14हम शताब्दीक आदिकाल (1324) क रचना थिक। वर्णरत्नाकरक विषयमे केवल एतबे धरि जोर द’ कए कहल जा सकैछ जे ई प्राचीन उपलब्ध सामग्रीमे मैथिलीक प्रगतिक द्योतक थिक। ई एखन धरि अपन महत्व सँ मिथिला ओ मैथिलीकेँ गौरवान्वित क’ रहल अछि।
(ब) एकर अतिरिक्त प्राचीन मैथिलीक किछु सामग्री ‘प्राकृत पैंगलम’ तथा अन्य अपभ्रंश ग्रंथमे सेहो भेटैत अछि। प्राकृत पैंगलममे लोकभाषाक उदाहरण देल गेल छैक। शिवनन्दन ठाकुरक मत छनि जे एहिमे प्रयुक्त किछु शब्द मैथिलीक थिक।
(स) विद्यापतिक अवहट्ट रचना ‘कीर्तिलता’ तथा ‘कीर्तिपताका’मे प्राचीन मैथिलीक अनेक विशेषता पाओल जाइत अछि, यथा:- क्रियाक स्त्रीलिंग रूप ए, एँ तथा हिं क प्रयोग पूर्वकालिक क्रियाक हेतु तथा ‘ए’ क प्रयोग आदि। एहि लेल ई ग्रंथ सेहो महत्वपूर्ण भ’ जाइत अछि।
एहि सामग्री सभक विषयमे डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी क उक्ति युक्तिसंगत अछि- These specimens allow us to have a glimpses of the language in its formative period.
उपर्युक्त सामग्री सभक समीक्षा कएलासँ ई विषय स्पष्ट भए जाइत अछि जे अभिरूचि एहिठामक लेखकमे 8म शताब्दीसँ प्रारंभ भए गेल छल। एतबा धरि सत्य जे ओहि कालक जे रचना उपलब्ध अछि ताहिमे विशेषतः दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षक सबलता देखबामे अबैत अछि। आन प्रकारक रचना मौखिके रूपमे लोकक समक्ष उद्घाटित होइत रहल अछि तथा अनुमानसँ लोक एकर प्राचीन रूप जानबाक चेष्ठा करैत अछि।
-गजेन्द्र ठाकुर
यू.पी.एस.सी.-३
मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)
२.प्राकृत
संस्कृतसँ पहिने प्राकृत रहए वा बादमे ई विवादक विषय भऽ सकैत अछि कारण ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जाहि प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल। पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर एहि प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर एहि प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि।
अशोकक अभिलेखमे शाहबाजगढ़ी आ मानसेराक अभिलेख उत्तर-पच्छिम, कलसी, मध्य, धौली, जौगड़ पूर्व आ गिरनार दक्षिण पच्छिमक जनभाषाक क्षेत्रीय प्रकारक दर्शन करबैत अछि। राजशेखर प्राकृतकेँ मिट्ठ आ संस्कृतकेँ कठोर कहै छथि (विद्यापति पछाति कहै छथि देसिल बयना सभ जन मिट्ठा)।
प्राचीन प्राकृत पालीकेँ कहल जाइत अछि जाहिमे अशोकक अभिलेख, महवंश आ जातक लिखल गेल। मध्य प्राकृतमे साहित्यिक प्राकृत अबैत अछि। बादक प्राकृतमे अपभ्रंश आ अवहट्ठ अबैत अछि।
मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे मुदा पद्य कहथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह।
प्राकृतमे सुप् तिङ् धातुक संग मिज्झर भऽ जाइत अछि।
प्राकृतमे धातुरूप १-२ प्रकारक (भ्वादिगण जेकाँ) आ शब्दरूप ३-४ (अकारान्त जेकाँ) प्रकारक रहि गेल, माने दुनू रूप कम भऽ गेल। मुदा एहिसँ अर्थमे अस्पष्टता आएल जकर निवारण कारकक चेन्ह कएलक।
चतुर्थी, द्विवचन, लङ् लिट् लुङ् आत्म्नेपद आदिक अभाव भऽ गेल प्रथमा आ द्वितीयाक बहुवचन एक भऽ गेल। ध्वनि परिवर्तन भेल। ऋ, ऐ, औ, य, श, ष आ विसर्गक अभाव भेल (अपवाद मागधीमे य आ श अछि मुदा स नहि)।
अन्तमे आएल व्यंजन लुप्त भेल (ह्रस्व स्वरक बाद दू आ दीर्घ स्वरक बाद एकसँ बेशी व्यंजन नहि रहि सकैत अछि।)
न ण मे, य ज मे आ श, ष स मे परिवर्तित भऽ जाइत अछि।
पदमे उत्तरपदक पहिल अक्षरक लोप भऽ जाइत अछि, मुदा से धातुरूप अछि तखन लोप नहि होइत अछि। जेना आर्यपुत्र= अज्जउत्त मुदा आगतम्= आगदं
अनुदात्त अव्ययक पहिल अक्षरक लोप होइत अछि। जेना च= अ
भू धातुक भ परिवर्तित भऽ ह भऽ जाइत अछि। जेना भवति= होइ
क ख मे आ प फ मे बदलि जाइत अछि। पनस= फणस, क्रीड्= केल
उच्चारण स्थानक परिवर्तनक क्रममे दन्त्य उच्चारण स्थान तालव्यमे बदलि जाइत अछि। जेना त् = च्
मध्यक य लोपित भऽ जाइत अछि। क, ग, च, ज, त, द क सेहो किछु अपवादकेँ छोड़ि लोप होइत अछि। प, ब, व क लोप सेहो कखनो आल होइत अछि। जेना- प्रिय= पिअ, लोक= लोअ, अनुराग= अणुराअ, प्रचुर= पउर, भोजन= भोअण, रसातल= रसाअल, हृदय= हिअअ, रूप= रूअ, विबुध= विउह, वियोग= विओअ
मध्यक क, त, प क्रमसँ ग, द, ब भऽ जाइत अछि। ख, घ, थ, घ, फ, भ ई सभ ह भऽ जाइत अछि। जेना नायकः= णाअगु, आगतः= आगदो, दीप=दीब=दीव। मुख= मुह, सखी= सही, मेघ= मेह, लघुक= लहुअ, यूथ= जूह, रुधिर= रुहिर, वधू= वहू, शाफर= साहर, अभिनव= अहिणव।
कखनो काल मध्यक व्यंजन दोबर भऽ जाइत अछि। जेना एक= एक्क
मध्यक ट, ठ क्रमसँ ड, ढ भऽ जाइत अछि। जेना कुटुम्ब= कुडुम्ब, पठन= पढण
मध्यक प, ब परिवर्तित भऽ व बनि जाइत अछि। जेना दीप= दीव। शबर= सवर।
ड, त, द परिवर्तित भऽ ल बनि जाइत अछि। जेना क्रीडा= कीला, सातवाहन= सालवाहण, दोहद= दोहल।
म परिवर्तित भऽ व बनि जाइत अछि। जेना ग्राम= गाँव।
अन्तिम स्प्रश वर्णक लोप होइत अछि, अन्तिम अनुनासिकमे अनुस्वार नहि होइत अछि, अः बदलि कऽ ओ भऽ जाइत अछि वा ओकर लोप भऽ जाइत अछि।
मोटा-मोटी शब्दक प्रारम्भमे एकेटा व्यंजन आ मध्यमे बेशीसँ बेशी दूटा व्यंजन सेहो द्वित्वमे जेना क्क वा क्ख रूपमे रहैत अछि।
व्यंजनक बलक अनुरूपेँ निम्न प्रकारक क्रम होइत अछि।(अ) कवर्ग, चवर्ग,, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग मे क (सभसँ बेशी बलगर) सँ भ (क्रमसँ कम बलगर) धरि, सभ वर्गक पाँचम वर्ण छोड़ि कऽ। जेना कवर्गक ङ, चवर्गक ञ, टवर्गक ण, तवर्गक न आ पवर्गक म छोड़ि कऽ। फेर (आ) कचटतप वर्गक पाँचम वर्ण। फेर (इ) ल, स, व, य, र। एहिमे समानबलक वर्णमे बादबला वर्ण प्रबल होइत अछि, अन्यथा अधिक बलबला बेशी बलगर होइत आछि। जेना- उत्पल= उप्पल, खड्ग= खग्ग, अग्नि= अग्गि। फेर जे कचटतप वर्गक पाँचम वर्णक ओही वर्गक कोनो दोसर वर्ण होएत तँ पाँचम वर्ण ओहिना रहत, नहि तँ ओकर परिवर्तन अनुस्वारमे भऽ जाएत। जेना क्रौञ्च= कोञ्च, दिङ्मुख= दिंमुह।
दोसर पदक प्रारम्भमे ज्ञ रहलासँ ओ ज्ज बनि जाइत अछि। मनोज्ञ= मणोज्ज।
कचटतप वर्गक बाद श, ष, स रहलासँ च्छ होइत अछि। जेना अप्सरा= अच्छरा, मत्सर= मच्छर।
क्ष बदलि कऽ क्ख भऽ जाइत अछि।जेना दक्षिण= दक्खिण।
शौरसेनीमे क्ष बदलि कऽ क्ख आ मागधीमे च्छ भऽ जाइत अछि। जेना कुक्षि= कुक्खि (शौरसेनी), कुच्छि (मागधी)।
प्राकृतमे ऋ आ लृ स्वर नहि होइत अछि। ऋ बदलि कऽ (अ) रि भऽ जाइत अछि। जेना ऋषि= रिषि, (आ) अ भऽ जाइत अछि। जेना कृत= कद। (इ) इ भऽ जाइत अछि। जेना दृष्टि= दिट्ठि। (ई) उ भऽ जाइत अछि। जेना पृच्छति= पुच्छदि।
ऐ, औ बदलि कऽ ए भऽ जाइत अछि। जेना कौमुदी= कोमुदी।
संयुक्ताक्षरसँ पूर्व ह्रस्व स्वर रहैत अछि।
उ बदलि कऽ अ वा ओ भऽ जाइत अछि। जेना मुकुल= मउल। पुस्तक= पोत्थअ।
ऊ बदलि कऽ ओ भऽ जाइत अछि। जेना मूल्य= मोल्ल।
ए बदलि कऽ इ भऽ जाइत अछि। जेना एतेन= एदिणा।
ओ बदलि कऽ उ भऽ जाइत अछि। जेना अन्योन्य= अण्णुण्ण।
अनुस्वार+ अपि= पि आ अनुस्वार+इति= ति भऽ जाइत अछि। खलु= ख भऽ जाइत अछि।
य् बदलि कऽ इ भऽ जाइत अछि। जेना कथयतु= कधेतु।
प्राकृतमे अन्तिम व्यंजनक लोप भऽ जाइत अछि। व्यंजन सन्धिक मोटा-मोटी अभाव रहैत अछि।
स्वर सन्धिमे सेहो मध्य वर्णक लोप भेलोपर सन्धि नहि होइत अछि।
शब्दरूपमे द्विवचन खतम भऽ गेल। चतुर्थीक रूप षष्ठीमे मिलि गेल। व्यंजन अन्तबला शब्द खतम भऽ गेल।
धातुरूपमे शब्दरूपसँ बेशी अन्तर आएल। व्यंजन अन्तबला धातु खतम भऽ गेल। धातुरूप एक्के रीतिसँ चलए लागल, द्विवचन खतम भऽ गेल, रूपक भिन्नता कम भऽ गेल। आत्मनेपद रूप मोटा-मोटी खतम भऽ गेल। लिट्, लिङ्, लुङ् रूप सेहो मोटा-मोटी खतम भऽ गेल। भूतकाल लेल कृदन्त प्रत्ययक प्रयोग होमए लागल। भ्वादिगण आ चुरादिगणक अलाबे सभ गण खतम भऽ गेल।
शौरसेनीमे द्य, र्ज्, र्य् बदलि कऽ ज्ज् भऽ जाइत अछि।
शौरसेनी आ माहाराष्ट्री- संस्कृतक मध्यक त शौरसेनीमे द भऽ जाइत अछि मुदा माहाराष्ट्रीमे ओ लोपित भऽ जाइत अछि। जेना- संस्कृत- जानाति= शौरसेनी जाणादि= माहाराष्ट्री जाणाइ
संस्कृतक मध्यक थ शौरसेनीमे घ मुदा माहाराष्ट्रीमे ह भऽ जाइत अछि। जेना संस्कृत अथ= शौरसेनी अघ= माहाराष्ट्री अह।
दोसर पदक प्रारम्भमे ज्ञ रहलासँ मागधीमे ञ्ञ बनि जाइत अछि।
मागधीमे श, ष, स ई तीनू परिवर्तित भऽ श; र परिवर्तित भऽ ल; ज परिवर्तित भऽ य बनि जाइत अछि। अकारान्त प्रथमा एकवचनमे ए लगैत अछि। जेना दरिद्र= दलिद्द।
मागधीमे ज बदलि कऽ य भऽ जाइत अछि।
मागधीमे द्य, र्ज्, र्य् बदलि कऽ य्य भऽ जाइत अछि।
मागधीमे ण्य, न्य,ज्ञ,ञ्ज बदलि कऽ ञ्ञ भऽ जाइत अछि।
मागधीमे मध्यक च्छ बदलि कऽ श्च भऽ जाइत अछि।
मागधीमे ष्क= स्क वा श्क, ष्ट= स्ट वा श्ट, ष्प= स्प, ष्फ= स्फ भऽ जाइत अछि।
मागधीमे र्थ बदलि कऽ स्त भऽ जाइत अछि।
विधिलिङ् क प्रयोग जैन प्राकृत- अर्धमागधी आ जैन महाराष्ट्रीमे प्रचलित रहल, आन प्राकृतमे ई मोटा-मोटी खतम भऽ गेल।
संस्कृतक तुम् शौरसेनीमे दुं, मागधीमे सेहो दुं रहैत अछि मुदा महाराष्ट्रीमे उं भऽ जाइत अछि।
प्राकृतक शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्रीक अतिरिक्त पैशाची प्राकृतक सेहो उल्लेख भेटैत अछि। गुणाढ्यक वृहत्कथा एहि प्राकृतमे लिखल गेल जे आब स्वतंत्र रूपसँ उपलब्ध नहि अछि। एकर उल्लेख उद्धरण रूपमे कखनो काल भेटैत अछि। ई पश्चिमोत्तर भारतक प्राकृत छल, उद्धरण रूपमे उपलब्ध साहित्यक अनुसार एहिमे निम्न विशेषता छल। ण बदलि कऽ न भऽ गेल। र बदलि कऽ ल भऽ गेल। ल बदलि कऽ र भऽ गेल। सघोष अघोष बनि गेल। दू स्वरक बीचक ल बदलि कऽ ळ भऽ गेल। स्वरक बीचमे ष बदलि कऽ श वा स, ज्ञ बदलि कऽ न्य आ ण्य बदलि कऽ ञ्ञ भऽ गेल। एहिमे आत्मनेपद आ परस्मैपद दुनू अछि।
पश्चिमोत्तरक खोतानसँ प्राकृत धम्मपद खरोष्ठी लिपिमे दहिनसँ वाम लिखल लेख प्राप्त होइत अछि जाहिमे श, ष, स तीनूक प्रयोग अछि।
मोटा-मोटी प्राकृतमे शब्द-धातुरूपक सरलीकरणक प्रक्रिया दृष्टिगोचर होइत अछि, द्वित्व, मूर्धन्यीकरण, अघोषीकरण आ सघोषीकरण, लकारक बदला कृदन्तक प्रयोग सेहो बढ़ि गेल।
३. अवहट्ट
धीरेन्द्र प्रेमर्षि
मधुश्रावणी : मिथिलाक पारम्परिक हनिमून
भूगोलसँ विलुप्त भऽ चुकल मिथिला जँ एखनोधरि अस्तित्वमे अछि तँ एकरा पाछाँ एक्कहिटा कारण छैक— एहिठामक लोकवेदमे रहल बौद्धिक ऊर्जा आ मैथिल संस्कृतिमे रहल विलक्षणता एवं वैज्ञानिकता। मिथिलामे जीवनक विविध रोमाञ्चक घड़ि एवं महत्त्वपूर्ण क्रियाकलापकेँ सांस्कृतिक आवरण ओढ़ाकऽ धार्मिकता एवं सामाजिकतासँ आवद्ध कएल गेल छैक। लोकव्यवहारमे प्रचलित क्रियाकलापसभसँ मात्र सेहो ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे एकर गर्भमे एखनो बहुतो बहुमूल्य रत्न नुकाएल छैक। एहीसभ कारणे एखनोधरि मैथिल संस्कृति जीवन्त अछि आ मिथिला अस्तित्वमे अछि। आजुक सन्दर्भमे तँ इहो कहब अतिशयोक्ति नहि बुझाइत अछि जे नेपालमे मिथिले एकटा एहन सांस्कृतिक सम्पदा अछि, जकर आङुर धऽकऽ मधेश नामक राजनीतिक क्षेत्र डेगाडेगी दऽ रहल अछि। भारतदिस सेहो कमसँ कम बिहारक जँ बात कएल जाए तँ ओहि७म मिथिला छोडि आन कोनो उल्लेख्य सांस्कृतिक सम्पदाक सर्वथा अभावे देखल जाइत अछि।
आइकाल्हि मात्र धार्मिकता आ परम्परागत संस्कारक रूपमे अधिकांश पावनि–तिहार वा सांस्कृतिक कर्म सीमित होइत गेल पाओल जाइत अछि। मुदा मिथिलाक पावनि–तिहारसभकेँ जँ सूक्ष्मतापूर्वक देखल जाए तँ एहिसभक पाछाँ कोनो ने कोनो उद्देश्य निहित रहल स्पष्ट देखबामे आबि जाइत छैक। एकरासभकेँ आओर बेकछाकऽ देखलापर आजुक समयमे सेहो ई पावनि–तिहार ओतबए सान्दर्भिक आ उपयोगी बुझाइत छैक। साओन मासमे मिथिलाक किछु जातिमे नवविवाहित दम्पतिसभक लेल आयोजन होबऽ वला मधुश्रावणी पावनिकेँ सेहो एही रूपमे लेल जा सकैत अछि। मधुश्रावणी विशेषतः नवविवाहिता स्त्रीसभक लेल आयोजित भेनिहार एकटा एहन धार्मिक अनुष्ठान छियैक, जाहिमे ओसभ धार्मिक रूपेँ तँ विषहरा आ महादेव–पार्वतीक पूजा करैत छथि, मुदा एकर गहिराइमे जा देखलापर स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे मधुश्रावणी मिथिलामे मनाओल जाएवला एकटा परम्परागत प्रकृतिक ‘मधुचन्द्रिका’ अर्थात ‘हनिमून’ छियैक। मधुश्रावणी मिथिलाक ब्राह्मण, कायस्थ, देव, स्वर्णकार आदि जातिमे विशेष रूपसँ मनाओल जाइत अछि।
आधुनिक यौनशास्त्रीलोकनि हनिमूनकेँ वैवाहिक सम्बन्ध सुदृढीकरणक प्रमुख आधार मानैत छथि। तत्कालीन मैथिल विद्वानसभक सेहो एहि पावनिक परम्परा आरम्भ करैत काल इएह मानसिकता रहल होएतनि। प्रायः इएह कारण भऽ सकैत अछि जे मिथिला क्षेत्रमे परम्परागत रूपेँ मधुश्रावणी मनाओल जाएवला ब्राह्मण, कायस्थ, देव आदि जातिमे वैवाहिक सम्बन्ध–विच्छेदक घटना अपेक्षाकृत कम देखबामे अबैत अछि। जाहिरसन बात अछि— जेँ विवाहक बन्धन सक्कत रहैत छैक, तेँ एहिमे आगाँ चलिकऽ दुर्घटना कम होइत छैक। लोक–लाजक भय वा स्त्री जातिक लेल डेग–डेगपर लगाओल जाएवला वर्जना मात्र जँ ‘जबर्दस्ती दाम्पत्यक गाड़ी’ घिचबाक कारण रहितैक तँ मिथिलाक आनो जातिमे वैवाहिक सम्बन्ध ओतबए सुदृढ रहितैक, जतेक मधुश्रावणी मनौनिहार जातिमे।
तहिया एखनजकाँ ‘हनिमून’ क लेल बाहर जएबाक अवस्था नहि छलैक। भऽ सकैत छैक जे यातायातक असुविधा एकर प्रमुख कारण रहल हो। मुदा नवविवाहित दम्पतिकेँ किछु उत्फुल्लता, किछु उन्मुक्तता भेटबाक चाही— एहि बातक निष्कर्ष तत्कालीन विद्वानलोकनि निकालने होएताह। एकरा लेल ओलोकनि कामोद्दीपनक दृष्टिएँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानल जाएवला बरसाती महिना साओनक चयन कएने होएताह। धार्मिकताक सङ्ग आबद्ध कऽ एकरा व्यापकता देल गेल होएतैक। साओनक मधुरताक आभास करएबाक सन्दर्भमे तथा यौन–सम्बन्ध सुदृढीकरणक दृष्टिएँ आवश्यक तत्त्वसभ समाहित कऽ एकरा एकटा परम्परा बना देल गेल होएतैक। एहि नान्हिटा लेखमे वैज्ञानिक दृष्टिएँ मैथिल संस्कृतिमे पाओल जाएवला सम्पूर्ण सार्थक पक्षसभक विस्तृत चर्चा करब सम्भव नहि अछि। मुदा एतबा अवश्य कहल जा सकैत अछि जे मैथिलीक अधिकांश संस्कार, आचार–विचार एवं व्यवहारमे डेग–डेगपर वैज्ञानिक आधारसभक प्रचुरता पाओल जाइत अछि।
यौनविज्ञानक दृष्टिएँ जँ देखल जाए तँ मधुश्रावणी पावनिक अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व अछि। सामान्यतया ई पावनि मनाओल जाएवला जातिसभमे विवाहक बाद लड़का सासुरमे रहैत अछि। परम्पराक जँ बात करी तँ चारि दिनक बाद ओकरासभक ‘चतुर्थी’ अर्थात प्रथम मिलन होइत छैक। एहि चारि दिनधरि वर–कनियाँ दुनूकेँ नोन नहि खाए देल जाइत छैक। चारिम दिन भोजनमे माछ–मासुसन सुरुचिकर एवं तामसी खाद्यवस्तु समाविष्ट रहैत छैक, जे कामोद्दीपनक दृष्टिएँ सेहो विशेष महत्त्व रखैत अछि। एहिठाम संस्कृतिक अन्तर्वस्तुक रूपमे नुकाएल मनोविज्ञान दऽ विचार कएल जा सकैत अछि। वस्तुतः ई चारि दिन वर–कनियाँक रूपमे दू अपरिचित प्राणीकेँ भावनात्मक रूपेँ लग अएबाक लेल देल गेल विशेष अवसर छियैक। कारण, यौनशास्त्रीलोकनिक कहब छनि जे जाधरि स्त्री–पुरुष दुनू भावनात्मक रूपेँ निकट नहि होएत, ताधरि सफल यौन–सम्बन्धक स्थापना नहि भऽ सकैत छैक। समाजमे जहिया प्रेम–विवाहक सम्भावना नहिजकाँ छलैक, तहिया एही भावनात्मक निकटताक लेल ई चारि दिन देल जाइत छलैक। जँ एना नहि रहितैक तँ सामान्यतया आन जातिमे विवाहक प्रातेभने मनाओल जाएवला सुहाग–रातिक लेल ब्राह्मण–कायस्थ–देव आदि जाति किएक चारि दिनधरि उपास रखितथि! शिक्षा–दीक्षाक मामलामे तत्कालीन समयक सर्वाधिक अग्रणी मानल जाएवला एहि जातिसभमे कोनो रूढ़िक कारणे तँ एहन बात नहिएँटा भऽ सकैत छलैक! अस्तु।
विवाहसँ चतुर्थीधरि भावनात्मक रूपेँ लग अएबाक लेल चारि दिनक समय तँ देल जाइत छैक। मुदा अवस्थाजन्य कारणकेँ देखैत एकटा खतरा बनले रहैत छैक। खतरा ई जे आगि आ खढ़क बीच निकटता भेलापर धधरा ने पजरि जाए वा कही युवा मोन बहकि ने जाए! तकरे सावधानीस्वरूप ओकरासभकेँ नोन नहि खाए देल जाइत छैक। नोन नहि खाएल अवस्थामे ओहुना लोक शारीरिक आ मानसिक रूपेँ शिथिल भऽ जाइत अछि। निश्चित रूपेँ अनोनाक अभीष्ट इएहटा भऽ सकैत छैक जे नवविवाहित वर–कनियाँमे आवश्यक तैयारीसँ पूर्वहिँ काम–भावना नहि भड़कि जाइक। चारिम दिनक मधुर–मिलनक लेल फेर नोनक सङ्ग–सङ्ग भोजनमे सेहो विशेष रूपसँ नीक–निकुतक ओरिआओन कएल जाइत छैक। ई भोजन सामग्री शारीरिक रूपसँ वर–कनियाँकेँ तैयार करैत छैक। जखन कि मानसिक रूपेँ उद्वेलित करबाक काज करैत रहैत छैक— साँझ–कोवर आदि गीतमे व्यक्त भेनिहार प्रेम–प्रसङ्ग। समग्र रूपमे बढ़ैत मानसिक–शारीरिक उद्वेलनक भावमे चुहलवाजीक छौँक लगएबाक काज करैत छैक— डहकनक झँसगर पाँतिसभ।
एहि तरहेँ चतुर्थीमे भावनात्मक रूपेँ शारीरिक सम्बन्धकेँ सुदृढ बनएबाक प्रयत्न कएल जाइत छैक। एहिठाम फेर जँ परम्पराक गप्प करी तँ ई देखल जाइत अछि जे पहिने एहि जातिसभमे विवाहक बाद सासुरसँ विदाह भऽकऽ अएलाक बाद वर एक्कहिबेर मधुश्रावणीएमे पुनः सासुर जाइत छल। तेँ विश्वास कएल जा सकैत अछि जे कनियाँ–वरक एहि दोसर मिलनकेँ पुनः शारीरिक सम्बन्धक प्रगाढ़तासँ भावनात्मक सम्बन्ध सुदृढ करबाक सांस्कारिक संयन्त्रक रूपमे विकसित कएल गेल हो।
एहि पावनिमे नवविवाहिता तेरहसँ लऽ पन्द्रह दिनधरि विषहरा आ गौरीक पूजा करैत छथि। एहि पूजाक लेल फूल लोढ़ऽ ओ स्वयं गेल करैत छथि आ सङ्गमे रहैत छनि हुनक सखी–बहिनपासभ। फूल लोढ़ब मूलतः बहाना होइत अछि। असली काज रहैत छैक घुमफिर आ गप्पसप्प। जखने कोनो नवविवाहिता अपन सखी–बहिनपासभक सङ्ग घुमफिर करऽ कतहु जाएत तँ ओकरासभक बीच गप्पक विषय की भऽ सकैत अछि, से सहजहिँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि। निश्चित रूपेँ गप्पक विषय ओकर पति, ओकरासमभक अनुभव आदि–इत्यादि रहैत होएतैक। ई बातचीत यौन–भावनाकेँ तीव्र करबामे आ यौनसम्बन्धी विविध जिज्ञासासभक समाधानमे सेहो सहायक होइत छैक। बादमे पूजा–कालमे वर–कनियाँ दुनूकेँ संगहि राखिकऽ शिव–पार्वतीक विभिन्न प्रसङ्गक बखान करैत यौनसम्बन्धी खिस्सासभ प्रतीकात्मक रूपेँ सुनाओल जाइत छैक। दुनू युवा–मनकेँ प्रेम आ काम–भावना बढ़एबामे ई खिस्सासभ उपयोगी भेल करैत छैक। एकरा बाद फेर विवाह–कालमे बनल कोहबर तँ वर–कनियाँ लेल अजबारले रहैत छैक। आ, ई क्रम निरन्तर तेरहसँ लऽ पन्द्रह दिनधरि चलैत रहैत छैक। निश्चित छैक जे एतबा अवधिमे वर–कनियाँ एक–दोसराक सङ्ग शारीरिक आ मानसिक दुनू दृष्टिएँ बेस लग आबि जाइत छैक, जे कि आजुक आधुनिक वैज्ञानिक समाजक हनिमून आ तत्कालीन परम्परागत मैथिल समाजक मधुश्रावणीक अभीष्ट सेहो छियैक।
मिथिलाक संस्कृतिमे यौनकेँ बड़ बेसी महत्त्व देल गेल छैक। मुदा कतेको लोक एकरा धर्मक ससरफानीमे तेना ने गछाड़िकऽ राखि देने छथिन जे आमलोक आगाँ–पाछाँ किछु सोचिए नहि सकैत अछि। तेँ जखन ई कहल जाइत अछि जे मधुश्रावणी यौनविज्ञानक अभिमञ्चनसम्बन्धी पावनि अछि तँ कतेको मैथिल महामनासभ बमकि उठैत छथि। किएक तँ ओ एहिमे महादेव–पार्वतीसँ बेसी किछु देखिए नहि सकैत छथि। मधुश्रावणीमे पूजित विषहरा (नाग) दू रूपेँ महत्त्व रखैत छथि। साहित्य वा ललितकलामे जे प्रतीकसभ प्रयोग कएल जाइत अछि, ताहिमे माछकेँ स्त्री जननेन्द्रिय, साँपकेँ पुरुष जननेन्द्रिय, काछुकेँ सम्भोग, बाँसकेँ वंश आदि मानल जाइत अछि। नवविवाहिता प्रतीकात्मक रूपेँ विषहराक पूजा करैत पुरुष जननेन्द्रियक महत्त्व बूझैत छथि। दोसरदिस प्रकृति संरक्षणक लेल सेहो साँप महत्त्वपूर्ण अछि। तेँ भलहि ओ विषधर अछि, मुदा ओकर संरक्षण होएबाक चाही, से सन्देश एहिसँ जाइत अछि।
मधुश्रावणीक खिस्सामे सेहो तेहने बातसभ बेसी अबैत छैक। जेना विषहराक जन्मेक सम्बन्धमे उल्लेख अछि— ‘एकबेर महादेव आ पार्वती जलक्रिडा करैत सम्भोग कऽ रहल छलाह। तेहनेमे महादेवक वीर्य स्खलन भऽ गेलनि। ओहिसँ विषहराक जन्म भेल।’ तहिना गौरीकेँ छिनारि बनएबाक प्रसङ्ग सेहो मधुश्रावणीक खिस्सामे आएल अछि। किछु फकड़ामे सेहो एहि तरहक बातसभ आएल अछि। जेना बैरसी आ युवतीबीचक संवादमे कहल गेल अछि— ‘ऊँचे आरि ऊँचे धूर ऊँचे त खरिहान रे, ताहूसँ जे ऊँच देखल गौरीके भथियान रे।’ एही तरहेँ गौरीक ‘आङ’, गौरीक स्तन आदिक वर्णन सेहो बड़ रसगर अन्दाजमे कएल गेल अछि। मैथिल संस्कृतिमे यौनकेँ कतेक महत्त्व देल गेल छैक, तकर अनुमान अहिबक फड़ नामक पकवानक रूप–रंग आ नामसँ सेहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि। तेँ निःशङ्क भऽकऽ कहि सकैत छी जे मधुश्रावणी यौनभावना आ यौनशिक्षाक महापर्व छियैक। साओन मासमे पड़लासँ ई अपन सार्थकताकेँ आओर बेसी पुष्टि करैत अछि। कारण हम एकटा एहन जोड़ीकेँ जनैत छी जे विवाहक डेढ़ दशक गुजरि गेलाक बादो जखन वर्षा होबऽ लगैत छैक तँ कलेजमे पढौनाइ छोड़िकऽ दौड़ल–दौड़ल डेरा पहुँचि जाइत छथि। एहिमे ओहि मित्र दम्पतिसँ बेसी कारगर साओनक मादकता करैत छैक। आखिर एकरे ने मैथिल संस्कृति सहेजने अछि।
आइकाल्हि मात्र सतही दृष्टिएँ देखनिहार किछु तथाकथित महिला अधिकारवादीसभ मधुश्रावणीक क्रममे कनियाँकेँ ‘टेमी’ देल जाएवला रीतिकेँ महिला–हिंसाक एकटा रूप मानैत एकर विरोधो करैत देखल जाइत छथि। एहि विरोधक पाछाँ हमरा एक्कहिटा कारण नजरि अबैत अछि— हुनकासभमे मैथिल संस्कृतिक विशिष्टताक सन्दर्भमे रहल अज्ञानता। टेमी देबाक विधिमे कनियाँक ठेहुनमे पानक पात राखि उपरसँ जरैत टेमीसँ छुआओल जाइत छैक। निश्चित रूपेँ ई सामान्य पीड़ादायक सेहो होइते होएतैक। मुदा की स्त्री जातिकेँ प्रथम संसर्गमे ओ सामान्य पीड़ा नहि होइत छैक? वस्तुतः ई ओकरे एकटा कड़ी छैक, जाहिमे ई सङ्केत देल जाइत छैक जे यौनसम्बन्ध जँ बड़ आनन्ददायक होइत छैक तँ ओहिमे स्त्रीकेँ पीड़ासँ सेहो साक्षात्कार करऽ पड़ैत छैक। एकर पृष्ठभूमिमे एकटा एहू पक्षकेँ लेल जा सकैत छैक जे भऽ सकैछ, पहिने–पहिने मधुश्रावणीएक समयमे वर–कनियाँबीच प्रथम शारीरिक मिलन होइत रहल होइक आ तकरे आभास करएबाक लेल ई प्रथा चलाओल गेल हो।
एकटा दोसर कारण इहो मानल जाइत अछि जे मिथिलामे यवनसभक आक्रमण भेलाक बाद ओकरासभक कुदृष्टि नवकनियाँसभपर बेसी पड़ैत रहैक। ओकरासभसँ बचएबाक लेल कनियाँकेँ कनेक आगिसँ जरा देल जाइक, जाहिसँ ओसभ ओकरादिस ध्यान नहि दिअए। कारण मुसलमानसभ जरनाइकेँ बहुत खराब मानैत अछि। पं. सूर्यकान्त झा ई तर्क आगाँ बढ़बैत कहैत छथि— ‘एही कारणे मुइलाक बादो ओकरासभकेँ जराओल नहि जाइत छैक, गाड़ल जाइत छैक।’ संस्कृतिविद स्व. प्रो. नमोनारायण झाक एहि विषयमे तर्क छनि जे ठेहुनपर कोनो नस एहन रहैत होएतैक, जकरा प्रभावित कएलापर यौनसम्बन्धी ग्रन्थीसभमे सकारात्मक असर पड़ैत होइक आ ताहीक अन्तर्गत ई प्रक्रिया शुरू कएल गेल हो। स्वास्थ्योपचारक चीनी पद्धति अक्यूपङ्चर, अक्यूप्रेसर आदिपर ध्यान देलापर एहू बातमे विश्वास करबाक यथेष्ट आधारसभ बनैत छैक।
टेमीक एकटा बातकेँ लऽकऽ नेपालक मिडिया आ मिथिलाक यथार्थसँ दूर–दूरधरिक कोनो सम्बन्ध नहि रखनिहारि किछु महिलावादीसभ किछु सालपूर्व एक्के टाङपर खूब नाचल रहथि। एहि नामपर ओसभ मधुश्रावणीकेँ मात्र नहि, सम्पूर्ण मैथिल विवाह पद्धतिकेँ बदनाम करबापर लागल छथि। एना देखलापर ओ व्यक्तिसभ हमरा ओहने कोनो अज्ञान नेनाजकाँ लगैत अछि, जे दूटा साँपकेँ आपसमे जोड़ लगैत देखलापर बाप–बाप चिचिया उठैत अछि जे साँपक झगड़ा भऽ रहल छैक। पीड़ा टेमीएटामे नहि होइत छैक। रोग निवारणक लेल लगबाओल जाएवला सुइयामे सेहो पीड़ा होइत छैक। मूह–कानक सिंगार लेल नाक–कान छेदएबामे सेहो पीड़ा होइत छैक। सुन्दर आ हाथ लागल चूड़ी पहिरबामे पर्यन्त पीड़ा होइत छैक। तखन बुझबाक जरूरति ई रहैत छैक जे पीडाक प्रयोजन की? नाक–कानमे भूर कऽकऽ शरीरकेँ खण्डित कएनाइ आ कि नाक–कानमे लटकऽ वला गर–गहनाक सौन्दर्यसँ आनन्दित भेनाइ? टेमीक सन्दर्भमे सेहो इएह बात लागू होइत छैक।
ओहुना टेमी यौनशिक्षाक पावनि मधुश्रावणीक एकटा अङ्ग छियैक। यौनक्रियाक आरम्भ तँ पीड़ासँ होइतहिँ छैक, वात्सायनक कामसूत्रकेँ जँ आधार मानल जाए तँ नखक्षत, दन्तक्षत आदि विधिक चर्चा सेहो अबैत छैक जे नारीक उद्दीपनमे सहयोगी मानल जाइत अछि। एतबए नहि, नारीकेँ जीवनक सर्वाधिक सुखकारी प्रक्रिया सन्तानोत्पादनमे सेहो असह्य पीड़ासँ गुजरऽ पड़ैत छैक। यावत पक्षसभपर विचार करैत गेलापर मधुश्रावणीमे देल जाएवला टेमी पीड़ा पहुँचएबाक उद्देश्यसँ नहि, अपितु स्वस्थकर यौनजीवनक लेल आरम्भहिमे लगाओल गेल टीकाकरणक एकटा प्रक्रिया छियैक। एकरा एहू लेल हिंसा वा प्रताड़नाक रूपमे नहि देखल जा सकैत अछि, किएक तँ ई प्रक्रिया प्रायः नवकनियाँक नैहरमे भेल करैत छैक। नैहरमे कनियाँक काकी, दिदी आदिसँ ओकरा पीडा पहुँचएबाक हिसाबेँ कोनो काज निश्चिते नहि भऽ सकैत छैक।
हँ, टेमीक सङ्ग जोड़िकऽ किछु अनर्गल बातसभक प्रचार अवश्य भऽ रहल छैक। जेना टेमी देल जगहपर जँ फोका भेल तँ पति बेसी मानत। वा ई सतीत्वक अग्निपरीक्षा छियैक। जकरा फोका नहि भेलैक से दुश्चरित्र अछि, आदि–आदि। मुदा ईसभ समयक्रममे जुटैत गेल बकबाससभ छियैक। भऽ सकैछ जे कहियो ककरो टेमी दैत काल बेसी पाकि गेल हेतैक आ फोँका भऽ गेल हेतैक तँ टेमी देबऽ वाली ओकरा भरोस देबऽ दुआरे कहि देने हेतैक जे जकरा जतेक पैघ फोका होइत छैक, तकरा घरवला ततेक बेसी मानैत छैक।
टेमी तहियाक प्रचलन छैक, जहिया मिथिलामे आधुनिक शिक्षाक प्रसार नहि भेल छलैक। ओहि समयमे वर–वधुकेँ यौनशिक्षा देबाक कोनो भरोसगर माध्यम सेहो उपलब्ध नहि छलैक। मुदा आइ युवायुवतीसभ अपन पाठ्यपुस्तकसँ लऽकऽ अन्य अनेको माध्यमसँ सेहो ई शिक्षा आसानीसँ प्राप्त कऽ सकैत छथि। तेँ उपयोगिताक दृष्टिएँ मधुश्रावणी आ मधुश्रावणीक टेमी किछु आवश्यक नहि रहि गेलैक अछि। मुदा हमरासभक संस्कृति लोककल्याणक पक्षकेँ एतेक गहियाकऽ धएने अछि, से बात विश्व समुदायकेँ कहबाक लेल मात्र सेहो एहि तरहक संस्कृतिक संरक्षण आवश्यक छैक। हँ, एहिमे जतऽ कतहु विकृति नजरि आबए, ओहिमे सुधार वा परिमार्जन आवश्यक भऽ जाइत छैक। जेना कि राजविराजमे मैथिल महिला परिषदक अगुआइमे टेमी बन्द करएबाक अभियान चलाओल गेल अछि। ई सर्वथा उचित बात अछि। किएक तँ मिथिलामे कोन चीज कतबाधरि पाच्य अछि आ कतबा अपाच्य अछि, तकर निर्णय करबाक अधिकारी मिथिलेवासीसभ भऽ सकैत छथि। मैथिल नारीकेँ जँ कतहु प्रताडित भेलसन बुझाइत छनि तँ एकरो आवाज मैथिले नारीकेँ उठएबाक चाहियनि। आनकेँ तँ की छैक, कोनो मैथिल महिलाक सीँथमे लागल सिन्दुर देखिकऽ कहि सकैत अछि, ‘बाफ रे बाफ, मिथिलाक नारीपर बड़ अत्याचार होइत छैक। ओकरा पुरुषसभ एतेक प्रताड़ित करैत छैक जे सभ दिन ओकर माथ फुटले रहैत छैक।’
आइकाल्हि आधुनिक विचारधाराक लोकसभ परम्परागत अधिकांश पक्षकेँ अन्धविश्वास वा कुरीतिक रूपमे व्याख्या करैत छथि। मुदा मैथिल संस्कृतिमे बेसी एहने पक्षसभ अछि, जे निरर्थक नहि अछि, पूर्णतः सार्थक अछि। आजुक आधुनिक समाजपर्यन्त एहि संस्कृतिसँ बहुतो कल्याणकारी तत्त्वसभ ग्रहण कऽ सकैत अछि। एहन स्थितिमे संस्कृतिकेँ एक्कहि झटकामे तोड़ि फेकबाक धारणा रखनिहार लोकसभकेँ चाहियनि जे ओ एकबेर अपन ज्ञानचक्षु उघारिकऽ अपन संस्कृतिक सिंहावलोकन करथि, तकरा बादहि एकरा विषयमे कोनो मत बनाबथि। आ, हम तँ ई कहऽ चाहब जे वर्तमान समयमे भयानक आर्थिक तङ्गीसँ गुजरि रहल सम्पूर्ण मिथिलावासीकेँ चाही जे ओ मधुश्रावणीसन जीवन्त पावनिकेँ अङ्गीकार कऽ घरहि बैसल अपन बेटा–पुतहुकेँ, बेटी–जमाएकेँ हनिमूनक मौका उपलब्ध कराबथि, मिथिलाक सांस्कृतिक विशिष्टताक संरक्षण–सम्बर्द्धन करथि।
१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ पहिल खेप) २.बिपिन झा-चहकैत चौक आ कनैत दलान
१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)(क्रमसँ पहिल खेप)
जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।
शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। प्रस्तुत अछि पहिल खेप।- सम्पादक
आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)
(क्रमसँ पहिल खेप)
दुई शब्द
आखर प्रीति केर किछ नहीं बस अहाँक सिनेह थीक जे अहाँ सव अपन पत्रक माध्यम सँ हमरा कोनो रूपे मोन पाड़लौं। एकरा हम कंगालिनक धन जकां नुका के रखने छलौं। जखन मोन उदास हतास उपेक्षित बुझा पड़ैत छल तखन पत्रक ई पेटी निकालि चुपचाप पढैत छलौं आँखि सँ हृदय सँ एहि मे छिरियाल सिनेह के हंसोथि एकटा अविकल आत्मतुष्टि एकटा परमानंदक अनुभूति से मोन प्राण भरैत छलौं। एहि पत्र सवक सोझा हमरा विश्वक सम्पदा सारहीन लागैत अछि। हमर जिनगी मे रक्त संबंध से कम महत्व प्यारक संबंधक नहि रहल। हम जकरा मानलौं सम्पूर्ण प्यार ममता वात्सल्य से ¯सचलौं चाहे ओ देखल होथि वा कि अनदेखाल जानल पहिचानल होथि कि अनचिन्हार मुदा जे समयक एकाई से संशय-असंशय से तर्क वितर्क से एहि सिनेहके जोखलैथ ओ स्वयं अपने आप पाछु हँटि गेलैथ। आय जीवनक एहि संध्या बेला मे एहि पत्र सब के उजागर नै करब ते स्वयं अपनों संग न्याय नै क सकब। किन्तु दुःख एतवे अछि जे हज़ारो हज़ार पत्रक सम्मुख हमर किताबक पÂा बड कम अछि। हम चाहियोके सभ पत्र के यथावत नै छापि सकैत छी। प्रयास केने छी जे प्रायः सभ पत्रक किछ ने किछ पाती के उजागर कै सकी। हम ओही नाम सभ के कृतज्ञता आभार दय सकी। बहुतो से संपर्क टूटी गेल बहुतो के जवाब नहीं दय सकलौं। बेसी लोग के हम देखनो नै छी। ¯कतु पत्रक
माध्यम से हम हुनक छवि अपन मोन मे बसेने छी। आ हरदम प्रेरणा ग्रहण करैत छी। ¯हदी मैथिलीक आ अंग्रेज़ीक सब पाठक लोकनिक पत्र आगू देने छी। बहुतो मे वर्ष ताारीख धूमिल भय गेल छैक कतेको मे तो सेहो नै अछि। पत्र लेखन सुदूर अतीत से आबी रहल छैक। तैंते आदि कवि विद्यापति के कविता के पतिया ले जाइत रे मोरा प्रियतम पास फेर पियतम को पतिया लिखूं जो कोई होई विदेश तन मे मन मे नयन मे ताको कहाँ सन्देश मैथिली मे शीलादाई के चिठी मे एतवे लिखल छैं कहू यो
प्राणनाथ कोना के रहै छी से लिखलनि अछि श्री सोनदाई एहि हरिहर हरिहर कागद पर जन जन के ठोर पर छल। एतवे नहि गीतों मे चंदारे मोरा पतिया लेई जारे प्रियतम को सरिपों पत्र लेखन आत्मविव्यक्तिक सशक्त साधन थीक स्वयं के चिन्हवा लेल अपना के जानवा लेल। यदि केकरो पर तामस उठे ते तत्क्षण ओकर नाम से पत्र लिखी मोनक सब तामस निकालि दी आ कनि काल बाद यदि फेर ओही पत्र के पढ़ी ते लागत कतेक बेदरमत वाला चिठी लिखने छलौं स्वयं पर तामसो उठैत छैक आ हंसियो लागैत छैक। पत्र इएह थीक जाकर अस्तित्व रहि जाइत छैक। सब किछ अतीत भय जाइत छैक मुदा पत्र मे छिरियायल प्रेम कहियो अतीत नहि होयत छै। अपराजित
कुसुम सदृश्य चिर काल धरि मोहित-सम्मोहित करैत रहैत अछि हँ उदास भेला पर की तनाव मे रहला पर जखन मानव लिखैत अछि तै अपन आत्मा के अनावृत कै दैत एैछ। आ ई क्षण सब से साँच क्षण होयत अछि। कोनो कोनो पत्रते राष्ट्रीय निधि बनि जाइत अछि। पंडित जवाहर लाल नेहरू के लिखल पत्र पिताक पत्र पुत्राीक नाम देशक गौरव बनि गेल। महात्मा गाँधीक पत्र सब विदेश मे 2 करोड़ों मे नीलाम भेल। हाले मे ओबामाक पत्र पुत्राीक नाम सार्वजनिक भ गेल। ई एकटा इतिहास अछि। हमर प्रयोजन मात्रा एतवे जे पत्रक कतेक महत्व अछि। अंग्रेज़ीक एकटा बड पैघ विद्वान लिखने अछि जे most difficult in life is to know yourself. प्रत्येक मानव जीवन अपना आप मे एकटा उपन्यास कथा संस्मरण यात्रा नाटक आलोचना-प्रत्यालोचना विश्लेषण समीक्षा आदि के समेटने रहैत छैक अपन जीवन मे मानव कतेको कथा के जन्म दैत अछि। संस्मरण मे जीवैत अछि यात्रा मे चलैत अछि जिनगी भरि नाटके ते करैत अछि विद्वान लोकनि जीवनक एहि खंड के साहित्यिक अभिधा बनाय साहित्यक सृजन करै लागलनि
भनहि ओ कोनो भाषा होय! अभिव्यक्ति के सामर्थ्य हेवाक चाही तैं ओ साहित्यकार बनी जाइत छथि। सौंसे जीवन आंखि मे नाचि जाइत अछि भगलपुर मे जनम साहेबगंज हजारीबागक जंगल मे बाल्यकाल पुनः पापाक बदली सहरसा आ पटना धरिक अश्रांत यात्रा पंद्रह बरिसक आयु मे वालिका वधु डुमरा सहरसाक चालीस गोटेक सामंती संयुक्त परिवार मे सभ से पैघ पुतहु फेर सहरसाक जीवन पतिक वकालत अपन नौकरी राजनीति बालबच्चाक स्कूली पढ़ाई सहरसा जिलाक इमानदार पी पी बनवाक सनेस पतिक हार्ट एटैक इंग्लैंड मे बायपास सर्जरी आ तीन बरिस बाद सब किछुक अंत हम लहास बनि गेल छलौं। रजनी से शेफालिका बनि गेनाय हमर जीवनक अद्भुत प्रक्रिया रहल रजनी एकटा विशाल परिवारक केंद्र बिन्दु स्नेह सिन्धु मे उधियाइत शेफालिका साहित्यक विस्तृत उदधि मे लहरिक छोट सन ज्वार जकां उमड़ैत इतरैत।
एहि दुनू नामक संग चिठी पत्रीक भण्डार हमर मोनक कोन कोन के स्पर्श करैत छल हम एकरा जोगा के राखैत छलौं उजाले अपनी यादों के हमारे संग रहने दो न जाने ¯जदगी की किस गली मे शाम हो जाये हमर अन्हार जिनगी मे इजोत भरयवाला ई पत्र सभ सहरसा एहेन जगह मे एतेक पत्र हमरा नाम से एला पर डाकिया सभ गोटेक ठोर पर एके बात रहैत छल वकील साहेबक कनियाक नाम से कतेक चिठी अबैत छैक एकटा पत्र आयल शेफालिका पुखणयाक पता से। डाकिया हमरा पत्र दै देलक ओकरा हम कहलौं हमर पत्र नै थिक मुदा नहीं मनलक। चिठी खोल लौं ते बंगला मे लिखल छल। ओ हमर जिनगीक संघर्ष काल छल हमर साहित्यिक जिनगीक स्वर्ण काल।
हम छपैत रही आ खूब छपैत रही मैथिलीक कोनो पत्रिका नहीं छल जाहि मे हम नै छलौं। फेर ¯हदी अंग्रेज़ी सब मे हम बराबर छपैत रही जे हमर जीवनक संघर्ष मे एकटा स्पूफखत भरि दैत छल नव उजास नवल विहान कोनो रचनाकार अपन युगक स्थिति परिस्थिति से प्राप्त अनुभव के अपन सृजन मे अभिव्यक्त करैत अछि। जहिना चारुकात घटैत घटना सब जीवन मे नव बाट खेलैत अछि ओहिना बदलैत जीवनमूल्य सँ निःसृत मानवीय संवेदना मानव स्वभाव मानसिक स्थिति आ अवस्थाक विश्लेषण भ जैत छैक। एहि चिठी पत्री सब से। सुगंध फूल मे ते होइतहि अछि स्वप्न मे साँस मे आंखि मे सेहो बसैत अछि। मुदा हम ओकरा स्पर्श नै क सकैत छी। मात्रा अंतर मे अनुभूत करैत छी ओहिना एहि पत्र सबहक स्नेहिल संस्पर्शक सुगंध के हम साँस साँस मे अनुभूत करैत छी
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जमाना बड तीव्र गति सँ भगैत गेल। वैज्ञानिक क्रांति वैचारिक क्रांति सँ देशे नहि समस्त
संसार मे हिलकोर मचि गेल। इंटरनेट मोबाइल एसेमेस आदि समस्त विश्व के एकटा गाम मे बदलि देलक आजुक बच्चा तार लैटि¯नग पफोन काल आदि के नाम नहि जनैत अछि कोना बेर कुबेर राति-बिराति तारक नाम से खराब बातक आशंका से जी थर थर कपैंत रहैत छल ककरा की भ गेलैक आब ते पोस्टोपिफस डाकिया खाली सरकारी काज लेल रहि गेल वैश्वीकरणक एहि युग मे गाम से शहर शहर से देश देश से विदेश सब ठामक संस्कृतिक झलक पत्र मे भेट लागल। कम्युनिकेशनक साधन हमर सबहक आवश्यकता बनि गेल अछि। सड़क पर चलैत आम आदमीक हाथ मे मोबाइल रहैत छैक चाहे ओ कोनो वर्गक होइ या कोनो आयु केर। युवक युवती सड़क पर रेल मे बस मे घंटो घंटा मोबाइल से गप करैत अछि। ¯कतु दिमागक गप दिमाग से कपूर जकां उड़ि
जाइत अछि। ईमेल से पल मे समाचार संसारक एक कोन से दोसर कोन मे पहुंचि जाइत अछि। मुदा पत्र मे जे हृदयक मौलिक अभिव्यक्ति होइत अछि ओ एसेमेस मे नहि भेटैत छैक किन्तु पत्र निजताक सुगंधी से ओत प्रोत रहैत छैक। हुँ अपवाद सभठाम रहैत अछि। हमहू ईमेल सँ पत्र आयल किछ एहि मे द रहल छी जाहि मे जीवन छैक सिनेह छैक। आजुक पीढ़ी कल्पनो नहि क सकैत अछि जे पहिने लोक के कतेक धैर्य छल पत्र लिखवा लेल। खासक पति पत्नीक के। समय तखनो नहि छल अपन अपन परिस्थितिक बेगरता छल। तैं हम पति पत्नीक पत्रक किछ अंश सेहो द रहल छी एहि संग्रह मे। हमर पापा स्व ब्रजेश्वर मल्लिक एकटा ऑफिसर क संगे भावुक संवेदनशील साहित्यकार सेहो छलैथ। अपन ब्याहक बाद पापा हमर माँ स्व अÂपूर्णा मल्लिक के जे पत्र लिखलनि ओ अपना आप मे एकटा साहित्य छल। हम देखने छलों जे एकटा लाल रंगक भेलवेट से मढ़हल कॉपी मे माँ अपना हाथ से पापाक पत्र सब उतारने छलीह जे एकरा पुस्तकाकार मे छपायब ¯कतु पारिस्थितिक एहेन झंझा जीवन मे आयल जे पापा माक सपना पूर्ण नहि भेल ओ कोपी कत गुम भ गेल हम सब भाई बहिनी नुका नुका के कौपी पढ़ैत छलौं लजाइत छलौं सिखैत छलौं साहित्य संवखधत होइत छल। पापाक लिखल 8-10 चिट्ठी क एकटा पफाटल चीटल खंड हमर पत्रक खजाना मे बदरंग पड़ल छल
मेरी अÂी तुम मुझ से दूर हो पर मैं देख रहा हूँ तुम मुझ से दूर कहाँ हो तुम तो मेरी अंतरात्मा मे बसी हो और मैं कल्पनाओं की दुनिया मे तुम्हें खोजता हूँ मेरी अÂी एक मासूम बाला की तरह पलंग पर लेटी है और मैं उसे हौले हौले थपकियाँ देकर सुला रहा हूँ गुनगुना रहा हूँ सो जा राजकुमारी सो जा कभी लगता है मैं बांसुरी बजा रहा हूँ और तू पनघट से बावरी की तरह भागी भागी आ रही हो
तुम्हारा ब्रज
1940
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सब भाई बहन खूब हँसैत छल पापा आ गीत किन्तु हम बुझि गेलों जे पापाक इयैह
भावना हमर अंतरात्मा मे बसल छल वाल्याकाले से। स्यात पापाक एयाह कल्पनाशक्ति इएह स्वप्निल संसार हमर जिनगी बिन गेल छल। हमर अंतर मे एकटा विरहिणी नायिका तुलसी तर दीप नेसैत सतत प्रतीक्षा मे रहैत अछि। एहि मे हम पत्र सबहक दुई खंड केने छी। पहिलुक साहित्यिक पत्र सब जिनका कारण हम आय एहि देहरि पर पहुंचल छी दोसर खंड पारिवारिक थीक जिनका सिनेहक कारण रजनी शेफालिका बनि गेलीह कोन पत्र आगु अछि कोन पाछु ई हमरा स्वयं नहि मोन अछि हमर अस्तव्यस्त जिनगी जकां हमर सभ चीज अस्तव्यस्त रहल। साँच तँ ई अछि जे अखर प्रीत केर किस्त किस्त जीवनक एकटा किस्ते थीक- एहि पत्र मे आयल अपन समस्त हृदय के हम असंख्य धन्यवाद द रहल छी जिनका कारन हमर जीवन ज्योतित रहल। दृष्टि क आपफताब आलम जीके हार्दिक धन्यवाद जे एहि अस्तव्यस्त कागद सभ के जोड़ि आकार देलनि संगही गजेन्द्र ठाकुर जी के दिल्ली एहेन महानगर मे हमरा सहयोग द एही पुस्तक का ई-प्रकाशन केलन्हि हुनक एहि महानता मात्रा धन्यवाद कहि हम स्वयं तुच्छ भ जायब। नागार्जुनक एकटा पांति हमर मोन मानस मे सतत उथल पुथल
मचौने रहैत अछि कौन चाहेगा उसका शून्य मे टकराए यह उच्छवास हो गयी हूँ मैं नहि पाषाण/जिसको डाल दे कोई कहीं भी/करेगा वह कुछ नहि विरोध/ करेगा वह कुछ नहि अनुरोध/ वेदना ही नही जिसके पास/ पिफर उठेगा कहाँ से निःश्वास
शेफाली
परमादरणीया शेफालिका जी
सादर प्रणाम।
किस्त-किस्त जीवन अहाँ तँ सागरजी कें पठेलियनि मुदा घरौआ नारी होयबाक कारणें ई
लाभ हम उठेलौं। हुनकासँ पहिने हमहीं पढ़ि गेलौं 6-7 किस्त मे। हमरा बुझबा मे नहि आबि रहल अछि जे कतय सँ शुरु करी की लिखी की कही हँ एतेक जरूर लिखब जे एहि किताब कें हाथ मे लैत वा किताब दिस तकैत अनेरो आँखि से दहो-बहो नोर झरय लगैए। किए तकर कारण हम अपनो नहि जानि पबैत छी। एहि बेर महाकुंभ मेला लागल अछि। हमरो बहुत परिचित लोकनि सभ महाकुंभ स्नान करैक लेल जाइ गेलीह अछि। हमरो चलै ले कहलनि। हम हिनका सँ पुछल मुदा हिनकर नहिंये सन जबाब पाबी हम चुप भ गेलौं किएक तँ हिनका एहि सभ मे विश्वास किछु कम्मे जकाँ छनि। लेकिन किस्त-किस्त जीवन जकरा हम अहाँक डाइरी कहैत छी पढ़ि गेला सँ मोन मे एकटा एहन सन हिलकोर उठल जे कोनो टा कुंभ स्नान सँ बेसी सुखमय लागल। एकटा बात आर
जे मोनक कोनो दोग मे अहाँक दर्शन करबाक प्रबल इच्छा जागि गेल अछि। ठीके शेफालिका जी जखन हम अहाँके देखब तँ हाथ सँ छुबिें देखक आंगुर से दाबि कें देखब तरहत्थी सँ हँसोथिकें देखब भरि पाँज मे पकड़ि कें देखब चरण मे झुकि कें देखब की सरिपों अहाँ वैह शेफालिका छी जे हमरा माथ पर एखन हाथ रोपने छी
सत्ते विधाताक बड़ पैघ डाड अहाँक रंगीन जीवन पर पड़ल। अहाँ लोकनिक अंतरंगता
हुनको अखरि गेलनि। अहाँ एकटा सफल बेटी निश्छल प्रेयसी सर्वस्व समखपता पत्नी कुशल गृहिणी ममतामयी माय निष्णात लेखिका समाज-सेविका राजनयिक आ डल कमंत बाँधवी आ और की-की ने छी से नहि जनितहुँ जँ ई पोथी नहि पढ़ितहुँ। अहाँ अतुलनीय छी तोहर सरिस एक तोहें माधब मन होइछ अनुमाने ई बात हम एहि लेल लिखलहुँ जे सागरजी अहाँक तुलना महादेवी वर्मा महाश्वेता देवी वगैरह सभ सँ करैत रहैत छथि जे-हो मुदा मैथिली साहित्य कें एकटा अनमोल वस्तु भेटलैक अहाँक ई पोथी। हमरा बुझने एहि पोथीक उचित मूल्यांकन नहि भेलैक अछि। हमरा सन घरेलू महिला लोकनि कै तँ ई पोथी अरवैध कें पढ़वाक चाहियनि। पोथीक भाषा आ शैली
मे गति छैक। एक-दू पेज पढ़लाक बाद हैत नहि जे पढ़ब छोड़ि आर कोनो काज करी। येह एहि कृतिक सफलता भेलैक। 1962 मे जखन वियाह भेल छल तखने सँ मैथिलीक पोथी-पत्रिका पढ़ैत आबि रहल छी। तहिया मिथिला मिहिर मे अहाँक दू जुट्टिðया गुहल केशवला पफोटोक संग अहाँक कविता-कथा संग पढ़ैत रही। बड़ बढ़ियाँ बड़ बेश!
किस्त-किस्त जीवन तँ एकटा विरल रचना अछि। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस क वर्षगांठ
पर हम आग्रह करबनि मैथिलीक भाग्य विधाता लोकनि सँ जे एहन उपाय करथि जे एहि पोथीक अंतर्राष्ट्रीय भाषा मे अनुवाद होइक । आब हम अपन लेखनी कें विराम देबय चाहैत छी एकटा छोट छीन पांतीक संग-
पढ़ि गेलौं ई आत्मकथा
मोन मे भेल उसास
कतेक व्यथित ई बारह मास!
कतेक व्यथित ई बारह मास!!
स्नेहाकांक्षिणी
शैल
संतोषपुर कोलकाता
पत्र पहुँचनामाक सूचना अवश्य दी से आग्रह।
ई पत्र वरीय लेखक लक्ष्मण झा सागर क पत्नी शैल झााक लिखल अछि जे एकटा
गृहिणीक संगे बहुत तरह स मैथिलीक सेवा करैत छथि। इ हमरा बाद मे ज्ञात भेल हुनक हृदयक निश्छल उदगार एहि मे सÂिहित अछि। किस्त-किस्त कोनो घरेलू महिलाक अन्तस्तल के स्पर्श कँ सकैत छैक ई हमर प्रथम अनुभूति ई विश्वक सभ सँ पैघ पुरस्कार हमरा लेल अछि आ किस्त किस्त लेखनक उद्देश्य केर संपूर्णता। हम तँ किछ नहि छी-किन्तु शैल जी स्वयं महान छथि ओहि आवरण सँ हमरा आच्छादित क देलनि-
साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि आ साहित्यकार ओहि दर्पणक शिल्पी। शिल्पी जतेक
विलक्षण हएत छाया ततेक सापफ। कोनो साहित्यिक अध्ययनसँ रचनाकारक मनोवृत्ति स्पष्ट होइत अछि। मैथिली साहित्यिक संग ई विडंबना रहल जे एहिमे वाल साहित्य अर्थनीति आ आत्मकथाक विरल लेखन भेल। मात्रा किछु साहित्यकार एहि विधामे अपन लेखनीक प्रयोग कएलनि। ओहि विरल साहित्कारक मुच्छमे एकटा नाम अछि- डॉ शेफालिका वर्मा। शेफालिका जीक रचना सभमे पारदखशता रहल ओ जे हृदएसँ सोचैत छथि ओकरा अपन कृति उतार िछैत छथि। हुनक रचनामे अंर्तमनक ध्वनि स्पष्ट सुनल आ सकैत अछि। कतहु अन्तर्द्वन्द्व नहि कतहु पूर्वाग्रह नहि। हुनक किछु कृति- विप्रलब्ध अर्थयुग स्मृति रेखा यायावरी आ भावांजलि पढ़लाक बाद हुनक जीवनक वास्तविक रूपक दर्शन कएल जा सकैत अछि। अपन रचना सभकें एकसूत्रामे सहेजि क अपन आत्मकथाक लिखलन्हि किस्त-किस्त जीवन अप्रत्याशित मुदा प्रासंगिक नाम। जीवनक कतेक रूप होइत अछि। बाल वयस्क प्रौढ़ सुख-दुख काम निष्काम यएह थिक एहि रचनाक सार। अपन करूणामयी जीवनक बून-बूनकें आंजुरमे एकत्रित क आत्मकथा लिखलन्हि।
आमुखसँ स्पष्ट होइत अछि जे ओ नित डायरी लिखैत छथि तें अपन किस्त-किस्त
अनुभवके वटोरि लेलनि। वाल-कालक गणित विषयक समस्या हो वा संगीत शिक्षक पंडित वाजपेयी जीक व्यवहारक मूल विश्लेषण सभ विन्दुपर पोथिक पुफजल पÂा जकाँ स्पष्ट प्रस्तुति। युवती वएसमे प्रवेश करैत काल कोनो अनचिनहार युवकक नजरि देखि क अपन ब्रह्यास्त्राक थूक फेकवाक प्रयोग करैत छलीह। ओना एहि अस्त्राक शिकार विवाहसँ पूर्व ललन बावू सेहो भेल छलाह जिनका संग ओ दाम्पत्य सूत्रामे बान्हल गेलीह। नव प्रकारक रक्षा सूत्राक विषय मे पढ़ि अकचका गेलहुँ नीक नहि लागल मुदा एहिसँ रचनाक प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि।
शिव कुमार झा
टिल्लू- किस्त किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा समीक्षा
विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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शेफालिका जी
अहाँक कथा सभ मे तनाव ग्रस्त समााजक मूलभूत समस्याक रोचक वर्णन होइत अछि। युवा पीढ़ी कोना पथभ्रष्ट भ गलत बाट ध लैत अछि नारीक शोषण कोन प्रकारे होइत अछि सभ। लिपिब( केने छी अहाँ। अहाँक कथा सभकें बेर-बेर पढ़बाक मोन होइत अछि
गौरीशंकर राजहंस
भूतपूर्व संसद सदस्य
लोकसभा
आशीर्वाद
अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलन मे कवयित्राी शेफालिका की प्रतिभा से परिचय पाकर मैं जितना प्रसन्न हूँ उतना ही चकित भी हूँ। इतनी छोटी अवस्था मे उन्होंने जो साहित्य मे अन्तर्दृष्टि प्राप्त की है वह उनके स्वखणम भविष्य की अग्रसूचिका है। उनके काव्यसंग्रह विप्रलब्धा का भावोत्कर्ष आज के नवयुग के कवियों के लिए अनुकरणीय है। सम्मेलन के अधिवेशन मे उन्होंने एक सर्वोत्कृष्ट सम्मान भी अखजत किया। उन्हें डा उमेश मिश्र स्मृति स्वर्णपदक से आभूषित किया गया। उनकी काव्य-प्रतिभा भविष्य मे और भी अधिक सम्मान की अधिकारिणी होगी इसमे कोई सन्देह नहीं। मेरा उन्हें हाखदक आशीर्वाद है कि वे भारतीय साहित्य और संस्कृति मे योग देकर और भी बड़े सम्मान और अलंकरण प्राप्त करें और हमारे देश और साहित्य को उन पर अभिमान हो!
डॉ राम कुमार वर्मा
साकेत
इलाहाबाद-2
24 12 78
सौ शेफालिका वर्मा के ँ हम तहिए सँ जनैत छिऐन्ह जहिया ओ दस-गयारह बर्षक बालिका छलीह। हुनक पिता बंधुवर श्री ब्रजेश्वर मल्लिक यदा कदा अपन रानीघाट निवास मे निमंत्रण दैत रहैत छलाह जाहि मे षट्रस ओ नवरस दूहूक समावेश रहैत छलैक। साहित्यगोष्ठीक परिसमाप्ति मधुरेण होईत छलैक। ओहि माधुर्यमय वातावरण मे मेधाविनी कन्याक प्रतिभा-संस्कार विकसित होइत गेलैन्ह। आइ ओ एक सुकुमार शब्द - शिल्पिनी कवयित्राी लेखिकाक रुप मे विख्यात छथि। हम हुनक स्मृति रेखा मे मर्म स्पखशनी भावुकता देखि शुभकामना प्रकट केने रहिऐन्ह जे ओ एक दिन मैथिलीक महादेवी रुप मे प्रसि हेतीह। आय हुनक विप्रलब्धा मे भावनाक कोमलता और करुण रसक परिपाक देखि ओ आशा पल्लवित भ गेल अछि। शेफालिका अपन नाम सार्थक करैत निरंतर शृंगरहारक माला गाँथि वाणी देवीक मुकुट पर अखपत करैत रहथु यैह आशीर्वाद दैत छियैन्ह।
हरि मोहन झा
टिकिया टोली पटना
मिति 17 12 77
श्रीमती शेफालिका वर्माक हस्ताक्षर मे मैथिलीक एकटा एहन कवयित्राीक उदय भेल अछि
जे थोड़बे काल मे साहित्य-जगत पर अपना प्रभाव जमा लेने अछि। हुनक कविता-संग्रह विप्रलब्धता कें देखबाक अवसर हमरा हस्तलेखे रूप मे भेटल छल जखन हम कोनो कवि-गोष्ठी मे सम्मिलित होयबा लेल सहरसा गेल छलहुँ। मंच परक भीड़-भाड़ एवं अस्तव्यस्तता रहितहुँ जे किछु उनटा-पुनटा क देखल आ पुनः कवयित्राीक मुँह सँ सुनल से मोन मुग्ध क लेलक। शेफालिका जीक कविता मे नीवनताक संग-संग मौलिकता अछि। समाजक बदलल परिवेश मे वर्तमान व्यक्ति केर मनोदशा भावना एवं अनुभूति जाहि प्रकारें प्रभावित भेल अछि से विप्रलब्धा क कवयित्राीक द्वारा एकदम आधुानिक संदर्भ मे वाणी पाओल अछि। से ग्रन्थक नाम विप्रलब्धा कोनो रीतिकालीन अतीतक
खाहे जेतेक विज्ञापन करओ मुदा ओर प्रत्येक रचना अपन एक-एक पांती मे युग-बोधक अदम्य स्वर झंकृत क रहल अछि। की भाषा की भाव दुहू मे शेफालिका जीक परतरि नहि! प्रेम-प्रसंग पर हुनक चुटकी व्यंग दाम्पत्य जीवन सँ प्रेरणा ग्रहण करितहुँ कतेक असंपृक्त भ जाइत अछि-से केओ मर्मी व्यक्ति सहजें बूझि सकैत अछि। काव्यक सरसता रखैत किछु एहेन बात कहि देब जे अजगुत लागय-एकाएक चौंका दिए से शेफालिका वर्मा सँ भ सकै। भरल पूरल परिवार छह सन्तान कें जन्म देनिहारि आ तें स्वास्थ्य सँ दुर्बल पेशा सँ वकील पति केँ सब तरहें सुखी करइत नगर आयुक्त क पद-भार ग्रहण करइत ओ कोना काव्य रचना क लैति छथि कोन तरहे गुनगुनयबाक लेल समय निकालि लैति छथि गृहस्थीक जाहि मरूभूमि मे कतेक कवि-कवयित्राीक रस श्रोत सूखी गेल ताही प्रपंच मे हुनक कवि हृदय कोना मात्रा जीविते नहि-सरसता एवं वचन-विदग्धता क प्रचार-प्रसार क रहल अछि से वास्तव मे अभिनन्दनीय बारम्बार वन्दनीय अछि। हुनक नाम शेफालिका क उत्प्रेरक सन्दर्भ। तखन हमर एकटा रचना शेफालिका शीर्षक प्रकाशित भेल छलैक। आ लागले कवयित्राीक जन्म होइत छनि। पिता साहित्य-प्रेमी। तें स्वाभाविके जे अपना नवजात कन्या केर नाम हमर ओहि कविता पर शेफालिका राखि देलनि। एके संग ओ कविताओं ई कन्या-दूनू सार्थक भ गेली। ता देखू-सरस्वतीक कृपा। बालिका भ गेली
कवयित्राी भावुकता सँ भरल ममता सँ ओत-प्रोतऋ आ हमर ओ कविता एक जीवंत काव्य प्रतिमा मे रूपांतरित भ गेल अछि। ई केकर सौभाग्य
आरसी प्रसाद सिंह
एरौत
समस्तीपुर
9 7 75
श्रीमती शेफालिका वर्मा स्वयं साकार विप्रलब्धा छथि। भावनाक एकटा सहज सिहकी मे हिनक अश्रु विन्दु जे झहरि जाईत छनि तही मुक्ता सँ सज्जित आखर मे ई कविताक फूल अंकित करैत छथि। एकटा कलामयी मैथलानी एकटा सिसकैत कवयित्राी आ एकटा भावभिजल व्यक्तित्व हमरा बंगलाक सुप्रसि( कवयित्राी अरुदत्त आ तरुदत्तक झांकी भेटय लागैत अछि हिनक पांती सभ मे।
मणिपद्म
बहेड़ा
सतुआनि 14 4 78
श्रीमती शेफालिका वर्मा आधुिनक मैथिली कविताक पारिजात-पत्र पर अंकित एकटा सिन्दूरी हस्ताक्षर छथि। श्रीमती शेफालिका वर्माक परिगणना ओहि स्कूलक कलाकार मे हेतनि जकर विचार-धारा श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर प्रतिपादित करैत छथि। ई कविता सभ शेफालिका क व्यक्तित्वक निरभ्र-पारदर्शी रूप वेफँ हमरा सभक समक्ष सम्पूर्ण चारुता आ मनोज्ञताक संगे प्रस्तुत करवा मे सफल-समर्थ सि भेल अछि।
मुक्त छंद मे रचित अपन कविता मे जेना शेफालिका नव-अभिनव उपमान आ चित्रा-धर्मी
शब्द-वितान सँ अपना भावक रूप-विन्यास करवा से सफल सि( भेलीह अछि तहिना अपन गीत सभ मे सेहो ओ एक विलक्षण मार्दव आ सौकुमार्य प्रस्तुत कयलनि अछि। हुनक गीत मे नारी सुलभ भावनाक स्वच्छ-स्पफटिक अभिव्यक्ति भेल अछि। हिनक प्राणक अतलता मे सुकुमार भावक जे मधुरिमा आ कमनीयता अपन प्रकाश विकीर्ण करैत अछि तकरा तद्रूपे रमणीय शब्दावली मे प्रस्तुत करवा मे ई सहज समर्थ छथि।
ई कहब आवश्यक नइ जे मैथिली काव्यक विशाल व्यापक संसार मे अनेक कवयित्राी
उत्पन्न भेलीह जिनक काव्य-सुमन सँ ई संसार सुरभित अछि मुदा श्रीमती शेफालिका वर्मा आन कवयित्राी सभ सँ अपन सर्वथा एकटा पृथक् पफराक विलक्षण आ अनुपम स्थान बनौलनि अछि।
डॉ केदारनाथ लाभ
राजेन्द्र कॉलेज छपरा
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अन्तिम साँस सँ पहिने आस रहैत छैक जे कोनो आसरा भेटय ओ साँस जे जा रहल हो तँ रुकि जाय। तहिना मैथिलीक महादेवी प्रो हरिमोहन बाबूक शब्द मे एहि सँग्रह सँ मैथिलीक डुबैत आस के ँ निश्चय बचा लेलन्हि। चि शेफाली मैथिली लेल आब केवल हस्ताक्षरे नहि महत्वपूर्ण दस्तावेज छथि। हुनक कविता पढ़ी प्रत्येक पाठक-पाठिकाक आँखि नोरा जेतन्हि। शब्द के ँ पीड़ा के ँ माध्यम उद्घोष करब ओ पीड़ा के ँ पुनः शब्द से आनब सोझ अग्निपरीक्षा नहि। हमरा हर्ष अछि जे शेफालिका एहि परीक्षा मे सवा सोलह आना खरा भेल छथि।
डॉ सुधाकान्त मिश्र
मंत्राी
मैथिली एकेडमी - इलाहाबाद
मिति 13 7 77
अहाँक कविता सभ खास कय भावा×जलि भाव जगत् केर यात्रा आत्माक लहरि भत्तिक आलोड़न ओहि अदृश्यक दृश्य सृजन की की कहू तत्काल आओर पुनः चिरकाल अवगाहनक वस्तु थीक। हम बूझैत छी ई वास्तविक कविता थीक ,हम ओकर रस मे लुब्ध भ जाइत छी ओकर रसास्वादन करय लगैत छी। तैं जेना प्रथमहि
हमरा आकृष्ट केलक तहिना निरन्तर ई आकृष्ट करत - सेहो पीरीत अनुराग बखानिय तिल तिल नूतन होय। क्षणे क्षणे यन्नवत्यमुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः। एके साँस मे पढ़बा योग्य आ साँस साँस मे अनुभव करबा योग्य जाहि सँ पाठक मीरा बनि जाय- मैं तो गोविन्द के गुराा गाऊँ। एकेक पाँति एकर भाव गुम्पफन भाव लहरिक ओहि अरूपक जे शब्दगत अहाँ आरती सजाओल रचाओल अछि तकर आरती उतारल जायतः हम केवल अपन भावावेग किछु व्यक्त कैल अछि जे शब्दगत रोकने नहि रुकि सकैत अछि। अहाँ अपन डुमरा गामक माटिक नहि भू माताक ओहिना भत्तिफ पूर्राा पूजन कैल अछि जेना अयोध्या के सीमा पार करैत काल स्वयं श्री राम मातृ भूमिक माटि अपना रथ मे राखि पुनः अयोध्याक भूमि वेफँ प्रणाम क तखन आगू दोसर राज्य वा प्रदेश
मे प्रवेश कैलन्हि
जगदीश प्र कर्ण
लहेरियासराय
22 1097
अनेक शुभकामनाओं सहित। शेफालिका जी आप साहित्य की दुनिया मे अपना अलग
अस्तित्व बनाएँ। राजेन्द्र अवस्थी 1/6/83
आयु. शेफालिका जी
अभिमत मैथिली मे किछु दिनसँ कविता के अर्थ भए गेल अछि अव्यस्था-दुरवस्था सत्र
प्रपीड़ित-पराजित आत्माक नपुंसक चीत्कार जेना विपक्ष नेताक भाषण होवा वा अखबारक
अभाव-अभियोग स्तम्भ हो। एहना मे ई मधुगंधी बसात एक टा नबे स्वाद देलक आ एकटा भिन्न वायुमंडल मे लए गेल। एहि मे स्वर तँ ओएह अछि जे कालिदास-विद्यापति-महादेवी वर्मा सँ लए आइ धरि गुंजित होइत आएल अछिऋ किन्तु नव अछि एकर अभिव्यक्ति जे युग-युग मे बदलैत रहल अछि। एके मूल अनुभूतिकेँ अहाँ जे नाना नव-नव रूप देल अछि ताहिसँ भवभूति मन पड़ैत छथि आ हुनके नकल करैत कहि सकैत छी - एका त्रा नामरहिता गहना नुभूतिर्भिन्ना पृथक्-पृथगिवाश्रयते विवर्तान्। मैथिली कविता मे आधुनिक युगक अवतरण विलम्बसँ भेलऋ ता हिन्दी तथा अन्य भाषा
सभ मे कविताक अनेक युग बीति चुकल छल। परिणाम ई भेल जे मैथिली मे रहस्यवादी छायावादी आ रूमानी कविता नाम मात्रो लिखाएल आ चलि पड़ल प्रगतिवाद यथार्थवाद प्रयोगवाद अस्तित्ववाद। एहिसँ मैथिलीक कविताक क्षेत्रा मे जे एकटा खाधि रहि गेल छल तकरा भरबा मे शेफालिका अहाँक ई संग्रह बहुत दूर धरि सफल भेल अछि।
गोविन्द झा
साहित्यकार: अनुवादक: भाषाशास्त्री
हम 1961 क अगस्तक आरम्भ मे एम ए क परीक्षा द गाम चल अयलहुँ। परन्तु ओही
मासक अन्तिम सप्ताह मे मिथिला मिहिर मे शेफालिका मल्लिक वर्मा क नाम सँ पावस-प्रतीक्षा शीर्षक कविता प्रकाशित भेला। ई देखि मोन मे अत्यन्त प्रसन्नता भेल। पुनः अक्टूबर मे शेफालिका मल्लिक वर्मा क दोसर कविता विस्मृत पुफलडाली सेहो प्रकाशित भेलनि। तकर बाद तँ शेफालिकाजी अव्याहत रूप मे मैथिली मे अपन सर्जनात्मक क्षमताक प्रयोग कर लगलीह। हमर मित्रा ललन कुमार वर्मा शेफालिका केँ हमर आग्रहेँ मैथिली मे साहित्य-सर्जनक आग्रह कयलथिन। शेफालिका मैथिली मे रचना कर लगलीह आ आइ ओ मैथिली साहित्य-जगत मे शीर्ष पंक्ति मे आसीन छथि। ई हमरा लेल अवश्ये अविस्मरणीय बात अछि।
श्री रामदेव झा
शेफालिका क पदार्पण मैथिली साहित्यमे ओहि समयमे भेल अछि जखन मैथिली
साहित्यमे महिला-लेखक नाम पर सप्पतो खएबाक स्थिति नइ छल। अहू दृष्टिएं हिनकर सृजनक संज्ञान लेल जएबाक चाही। एहि मे संकलित कविताक विषय मुख्यतः स्त्राी-जीवनक नानाविध अनुभव आ थोड़ेक समाजपरक परिस्थितिसं संब( अछि। पितृसत्तात्मक समाजमे स्त्राीक उपेक्षा नारी जातिकें निम्नतर बुझबाक प्रवृत्ति पर हिनकर कविता हंसैत अछि दहेज प्रथाकें धिक्कारैत अछि भारतक न्यायिक व्यवस्थाक विडम्बनाकें दुत्कारैत अछि। मुदा अपेक्षाकृत अपन प्रेम-कवितामे कवयित्री अइ सभ प्रसंगसं बेसी सफल आ स्पष्ट छथि। कहबाक चाही कि प्रेम-कविता मे हिनकर संवेदना बेसी घनीभूत देखाइत अछि।
देवशंकर नवीन
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नई दिल्ली-110016
मधुगंधी बसात सँ कथा शिल्पक दृष्टि सँ श्रीमती शेफालिका वर्माक कथा पूर्णतः भावपूर्ण होइत अछि। हिनक पचीसो कथा मिथिला मिहिर अग्निपंग तथा आखर आदि प्रत्रिकाक माध्यम मे पाठकक समक्ष उपस्थित भय चुकल अछि।
हिनक कथा मे नारी हृदयक कोमलता औचत्यक दिगदर्शन सभ्यक रूप मे होइत छैक जाहि मे रहैत अछि गतिशील साँसक लय तथा जीवनक आकर्षण बिन्दु के प्रति हृदयक अस्पष्ट मधुर आ गुंजायमान ध्वनि। इ युग युग सें आति रहल नारी सौंदर्यक ओहि रूप कें नहि स्वीकार करैत छथि जकर लक्ष्य विलासिता के प्रदर्शन मात्रा होय छैक। एकरा संगहि ई स्त्राी पुरुषक पारस्परिक आकर्षण केँ सेहो अस्वीकारैत नहि छथि वरण् ओहि आकर्षण केँ मर्यादाक सीमा रेखा मे आब( रहब स्वास्थप्रद मनैत छथि। स्त्राीक रूप मे आकखषत भ पुरुष किछ क देखेवाक अपूर्त सुन्दरताक शृंगार करैत अछि- हिनक एकटा कथाक ई पंक्ति उच्छृंखल प्रणयक प्रति विरोध प्रकट करैत अछि। एहि भौतिकवादी युगक जिनगी आ नारीक कोमल भावुक हृदयक बीच होइत संघर्ष मे इ अनेक कथाक माध्यम से जेना नोरक साँस मिथिला दूत कथा हरियर कागजक एकटा मनःस्थिति सोनामाटी आदि कथाक माध्यम मे बड़ रोचक आ माखमक ढंग से अभिव्यक्त केने छथि। हिनक कथा मे निर्वैयक्तिकता सेल्पफ डिटेचमेट अंग्रेजीक लेखिका जेन ऑस्टेन जकाँ रहैत अछि।हिनक इएह प्रतिभा हिनका मैथिली एकेडमी द्वारा म म उमेश मिश्र स्मृति स्वर्ण पदक देआय 1974 क सर्वश्रेष्ठ गद्य लेखिका कयैलक। हिनक एकटा कथा संग्रह शीघ्रे पाठकक समक्ष उपस्थित होयत। मैथिलीक पाठक बून्ह हिनका सँ बहुत किछ आना रखेत अछि। मैथिलीक आधुनिक लेखिका लोकनि जे काष्यक प्रत्येक विधाक माध्यम सँ अपन अपन प्रतिभाक परिचय देलनि एहि श्रेणी मे श्रीमती शेफालिका वर्मा श्रीमती गौरी मिश्र डॉ श्रीमती इलरानी।
मिथिला मिहिर
ले नीरजा रेणु
रविवार 7 दिसंबर 1965
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मूलतः कवयित्राी साहित्यकार शेफालिका वर्मा मैथिली कथा साहित्य मे एकटा न¯ह
बिसरयवाली मजगुत स्तम्भ छथि। तेँ मैहिला कथाकारक रूप मे ओ अग्रणी लेखिका छथि हुनकर कथा पर कल्पना अरिपन रहैत छन्हि। छोट-छोट वाक्य सुन्दर भाव-बन्ध आ कोमल कोइलीक स्वर सन प्रवाह। शेफालिका वर्माक कथा मे प्रेम केन्द्रविन्दु मे रहत अछि। ओ तीस वर्ष सँ कथा लीखि रहल छथि। हुनकर कथा मे तीस वर्षक अवधि मे जीबैत जन्मैत युवा होइत प्रौढ़ होइत प्रेमक बानगी छन्हि। सफल प्रेेमक उल्लास असफल प्रेमक हाहाकार हेतु हेतु मद्भूत प्रेमक भकजोगनी सँ चोन्हियाइत नीरस जिनगीक आस सभटा छन्हि शेफालिका वर्माक कथा मे। पुफलपाँकी बला प्रदेशक
महीन रसगर माटि केँ जौं न¯ह बिसरबाक होअय तँ शेफालिका वर्माक कथा सदति सँग राखी। श्रीमती शेफालिका वर्मा प्रथम कथा झहरैत नोरः बिजुकैत डोर 1965 मे वैदेही मे
प्रकाशित भेल। हिनक प्रारंभिक कथा सभ जेना नोरक एकटा निसाँस अछि। हिनक पँफसड़ीक दू छोड़ कथा मे स्त्राी जीवनक पराधीनता देखाओल गेल अछि। भारतीय समाज मे स्त्राीक स्थान सदैव नीचेँ रहल। अपन अस्तित्व रक्षाक लेल हुनका पति पति ओ पुत्राक अधीनस्थ रहय पड़ैत छन्हि।
पिताक इच्छाक विरोध नहि कय शैली सौम्य सँ संबंध विच्छेद क लैत छथि। माय बेटीक हृदय केँ जनितो पतिक भय सँ मौन भ जायइत छैक। नारीक सामाजिक स्थितिक आकलने एहि कथा मे भेल अछि। लेखिका अपन नायिकाक पक्ष लैत कहैत छथि माय-बाप एक दिस तँ बेटी केँ संपूर्ण पति भक्तिक उपदेश दैत छथि आ दोसर दिस बेटीक प्रदर्शनी लगाए ओकर बर स्वयं तकैत छथि। फँसरीक दूनू छोर माय बापाक हाथ मे अछि आ गरदनि पँफसल अछि कुमारि कन्याक। आ फँसरीक वैह दूनू छोर पतिक हाथि आबि जाइछ। एकान्त सेवा संपूर्ण समर्पणाक बादो पतिक घर मे ओ अन्नक बोर सन राखल रहैछ आ पति आन जान घर मे मुँह दैत अछि। श्रीमती वर्माक अन्य कथा अर्थयुग मे एकटा जूनियर इंजीनियर द्वारा अनैतिक ढंगे द्रव्योपार्जन कय सुख शांति केँ तिलांजलि देबाक कथा अछि। आलोक बाबूक पत्नी साड़ी गहना आ सुख सुविधाक सभ वस्तुक उभोग करैत छथि मुदा पति सुख सँ वंचित होइत छथि। मानवमूल्यक
उपहास करैत आलोक बाबू कहैत छथि- मानव मूल्य हा-हा-हा। हे उदय मानव मूल्य मात्रा टाका रहि गेल अछि। टाका मे किछु शक्ति छैक तखन ने दोस्त टाकाहि धर्मः टाकाहि धर्मः टाकाहि स्वर्ग क युग सरिपहु आबि गेल अछि।
उषा किरण खाँ
पटना
शेफालिका जी
निष्ठा को जीवन का धर्म रखें। सफल एवं सुखी जीवन की कामना के साथ।
शीला झुनझुनवाला 01 06 83
समालोचनात्मक खुंडी
शेफालिका जी !
अहाँक “उपेक्षित” कविता हमरा पर टोना कय देलक अछि। हम ौत बिसरिये गेल रही जे हमरो बेडिंग अछि। ई कविता पढ़ि काल्हिये सँ हम बेडिंग ताकि रहत छी आ भेटि नहि रहल अछि। भेटिते सूचना देब। अहींक शब्द-एहि समालोचनाक फ्खुंडीय् आदरणीय वकील साहबे कें देखेबन्हि जे कोना अपनेक निश्छल साहित्यिक हृदय-स्नेह स्निग्ध्-वेदना विह्नल-असीम सँ संबंध् जोड़ने कोमलतम भावना हमरा ऊपर निखिलेशो सँ बेशी हावी भै गेल - ईं बात अहाँ सँ बेसी वकील साहेब बुझथिन्ह कियेक त बार आ बेन्च भेने हमरा लोकनि समानर्ध्मी छी - दियाद-गोतिया छी। अनंत वर्ष धरि अपनेक लेखनी साहित्य-ध्रा पर शेफालिकाक वृष्टि करय एतबेक मात्रा हमर शुभकामना।
अस्तु
मर्यादा पुरुषोत्तम कें नाक मे बड़दवला
स्व रामनाथ झा
डी सी एल आर सहरसा
शेफालिका वर्मा के काव्य का मूल स्वर यही वेदना है जो काव्य का मूल उत्स होता है।
वेदना कुंठा नहीं दृष्टि है। वेदना जब दृष्टि बन जाती है तभी ससीम से असीम की ओर
महाभिनिष्कमण होता और साहित्य मे शाश्वत सत्य उद्घाटित होता है। प्रेम की वेदना जब कृष्ण की बाँसुरी की रागिनी बन जाती है तभी राधा की मूर्च्छना मीरा का भजन बन पाती है और इस मूर्च्छना और रागिनी का संबंध सूत्रा है अटूट विश्वास। महादेवी जी अपने परिचय मे कहती हैं- मैं नीर भी दुख की बदली और शेफालिका जी अपना परिचय देती हैं- सांध्य गगन की मैं अकेली तारिका। कवि भी सामाजिक प्राणी होता है-युग की चेतना के शीर्ष बिन्दु पर का जीव। अतः देश काल परिवेश और परिस्थति से आँखें मून्द लेना उन्हें झुठला देना सदा सम्भव नहीं होता। यदा-कदा ही सही सामाजिक विसंगतियों कुरूपताओं और बदलते जीवन-मूल्यों के प्रति दृष्टिक्षेप कवयित्राी की सामाजिक चेतना के प्रति जागरूकता का प्रमणा है। इस युग की सबसे बड़ी विडंबना है- विचारों की संकीर्णता और आचरण और अनैतिकता। कभी कवि बच्चन ने गाया था-
युग बदलेगा किन्तु न जीवन
किन्तु आज- आदमी।
अब आदमी नहीं रहा/उसमे सोचने-समझने की सारी शक्तियाँ/अन्तर्मुखी
हो गई हैं/उसकी सारी संवेदनाएँ/सिर्पफ अपने लिए रह गई हैं/ वह एक सुसंधहीन फूल की तरह है/जो
अपने ही खिलने मे मस्त है।
शेफालिका जी की उपर्युक्त पंक्तियाँ सोसलिज़्ाम और कॉमनिज़्ाम पर सेल्पिफज़्ाम की
करारी चोट है।
कवयित्राी डॉ शेफालिका वर्मा की काव्यानुभूति का पफलक बड़ा ही विस्तृत है। वैयक्तिक
पीड़ा और सामाजिक उत्पीड़न के प्रति उनकी सजगता को देखते हुए हिन्दी-जगत उनसे बहुत-कुछ
अधिक की आशा करता है।
रामेन्द्र कुमार यादव रवि
सांसद कुलपति
बी एन मंडल वि वि मधेपुरा।
शेफालिका
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना जाग तुझको दूर जाना
महादेवी वर्मा 78
Presented with greatest of love to my dearest damsel darling photogenic wife
in the last days of 1983 this book Rajyog is addition to Raj
-Lalan Verma, 24 12 83
16
शेफालिका हमर दृष्टि मे
नारीक रूप मे शेफालिका शक्ति स्वरूपा सेहो छथि जे महिषासुर रूपी दहेज
दानव नारी शोषनक प्रतीक शुम्भ निशुम्भ आ स्त्राी समाज के गर्त मे राखवाक प्रयास करै वाला रक्तबीज के बध करवाक संकल्प नेने छथि आ निर्भीक भ एही लेल सतत प्रयन्तशील रहैत छथि। हुनक क्रांतिकारी हृदय स्यात हुनक जन्म दिन 9aug (quit india movement)भारत छोड़ो आंदोलन से प्रेरित छैक।
एक दिसि प्रेम करुणा आ दया से सहजे पसिजय वाली शेफालिका आ दोसर दिसि क्रांतिकारी शेफालिका दुनू व्यक्तित्व क रस्साकसी मे बढ़ैत साहित्यधर्मी शेफालिका स्वतः एक अद्भुद व्यक्तित्व स्वामिनी बनि गेल छथि जे बुझवा मे कखनहु काल हम सेहो अपना के अक्षम पबैत छी ललन ठीके छैक हिनकर कहब हमरा एकदम कर्मकांड मे विश्वास नै अछि। मृत्यु उपरांत जखन हम बाबूजी बड़का बाबूजी काकाजी सबहक श्रा( कर्म देखलौं पंडित सबहक हाहारोह हुनका छाता देवैक तखन ने वर्षा जेता कतेक तरहक पलंग सेज मच्छरदानी आदि आदि जे देवैक से हुनका स्वर्ग मे भेटतैक! परुहार मे डोमि छल पाइक अभाव मे इलाज माय के नहि करा सकल मुदा जमीन बेचि हुनक श्रा( कइ भोज भात केलक एहि सब से हमरा मोने बड वितृष्णा भ गेल हम हिनका कहियेंक हमरा मरैक बाद अहाँ किछ नै करब बस भिखमंगा सब के खुआ देवैक
ई हँसैत बजैत छलाह बाप रे भिखमंगा हम ते बिकैये जायब हमरा तखन तामस उठे बाद मे बहुत सोची विचैर हिनका से सत लेलों एक सत दुई सत तीन सत 1 आर्य समाज रीति से हमर संस्कार करब-तीन दिन मे खतम 2 केओ केश नहि कटाबे 3 बरखी नै होई सब काज 3 दिन मे पूरा भ जाय तखन ओ जाहि दृष्टि से हमरा तकलैथ जेना हमरा चीन्हि रहल होइथ जेना अपना दे सोचैत हम रहब की नहि रहब किन्तु हम आय धरि हुनक ओ दृष्टि आ तकर बाद मौन मूक हमरा चुपचाप अपन करेजा से सटौने रहलैथ कतेक काल धरि आय जखन हम अगसर छी ते जेना ओ मौन मुखर भ सब किछ बाजि रहल अछि 26 मई 2008 कें हमर आत्मकथा किस्त किस्त जीवनक विमोचन-पटनाक विद्यापति भवन मे मुख्य अतिथि जस्टिस मृदुला मिश्रा द्वारा भेल छल! अध्यक्षता जीवकान्त केने छलाह। विमोचन समारोह क समस्त आयोजन शरदिन्दु चौधरी मध्ुकांत झा एवं पंचानन मिश्रक सहयोग सं केने छलैथ। सोचैत नहि छलौं जे ई समारोह एतेक भव्य होयत। हाल मे लोग खचाखच भरल छल। मंच पर मृदुला जी जीवकांत जीक संगे विजय नारायण मिश्रा राजमोहन झा मधुकान्त जी शरदिन्दु आदि सभ उपस्थित रहैथ। जस्टिस मृदुला मिश्रा जखन बजलीह-ई पुस्तक हम पढ़ लागलौं तँ हमरा लागल हम अपने जीवन पढ़ि रहल छी- सहरसा मे हमर स्कूली जीवन बीतल अछि- हम घरक सभ काज हाथ मे पोथी नेने करैत रहलौं- हमर अंगुर बुक मार्क बनि गेल- आँखि नहि हटैत छल पोथी पर सँ।
शेफालिका जी कें हम पहिने सँ जनैत छलहुँ किन्तु ई नहि जनैत छलौं जे ओ हमर श्वसुर स्व सतीश चन्द्र झा चीफ जस्टिसक संगी ब्रजेश्वर मल्लिकक बेटी छथि। एतेक नीक आ माखमक ई पोथी छैक जकर बड़ाई लेल हमरा शब्द नहि भेटैत अछि- आ हुनक वक्तव्य क एक एक पाती आ हमरा स्नेह-स्नात करैत गेल हमर पुस्तके नहि जेना हम स्वयं सार्थक भ गेलहुँ- मुदा हमर एहि सार्थकताक सुख भोग लेल नहि तँ पापा छलाह नहिते वर्मा जी अपने-रामानंद रमण बासुकी नाथ झा सभ एहि कृतित्वक परिचय देलनि किन्तु पंचानन मिश्र जखन व्यक्तित्व आ कृतित्व पर बाज लगलाह तँ सहरसा मे जखन हम नगर आयुक्त छलौं ओहि प्रसंगक किछ गप सुनाय हमरा चमत्कृत क गेलाह। मोहन भारद्वाज कहलनि- आत्मकथाक अंत नहि- सरिपों हुनक एहि बात पर आत्मकथा किस्त-किस्तक दोसर खंड पत्र मे छिरिया रहल छी।
उषा किरण खाँ शीला चौधरी प्रेमलता प्रेम सरिता झा आदि महिला सशक्तिकरणक बसात सेहो संगे छल- वास्तव मे आत्मकथा किस्त किस्त मात्रा आप बीती नहि जीवनक महत्व पूर्ण घटना सभक उल्लेखे नहि अछि मुदा कोनो घटना कें जीवन-क्रम मे कोन उन्माद मे कोन आवेग मे जीवलहुँ एकर लेखा जोखा सेहो अछि। किस्त किस्त मे हम अपन मानस दृष्टि अपन भाव बोध कें व्यक्त केने छी- लकीरक पफकीर जकाँ आत्मकथा कें रूप नहि देलौं नहि तँ आत्मकथा कें पारम्परिक तटबंध मे बान्हने छी। भ सकैत छैक केओ एकरा उपन्यास बुझैथ केओ एकटा भावुक नारीक संवेदनशील हृदय नगरीक दर्शन ई तँ पाठक जनैथ आय काल्हि जमाना एतेक तीव्र गति सँ भागि रहल छैक जे ककरो लेल ककरो पुफरसत नहि छैक। रिस्ता नाताक संबंध टूटनाय-न्यूक्लियर परिवारक सर्जन-ताहु मे पटान नहि-हम देखलौं एकर एकटा बड़ पैघ कारण अछि सहिष्णुताक
अभाव। खास कय आजुक लड़की मे स्त्राी मे सहवाक शक्ति नहि छैक। नीक बेजा किछ कहु तुरत जबाब द देत। तखन हम चाहलौं अपन जीवन लिखवा लेल-यदि ओ पढ़ि सकैथ- बुझि सकैथ आत्मकथाक पांडुलिपि तैयार करैत काल कतेक तरहक मानसिक व्यवधान आयल आ तखन हम पंचानन जी कें मोन पाड़लौं। ओ सदिखन हमरा प्रेरित करैत रहलाह-इजोत बाँटैत रहलाह-
आदरणीया
अहाँ स्वस्थ-प्रसन्न होएब करब ई अटूट विश्वास एहि ओजह सँ अछि जे मैथिली एखन
अपना आकांक्षा अहाँ लग अवशेष रखनहि अछि मैथिली केँ कोनहुँ लेखिकाक आत्मकथा सँ श्रीसम्पन्न होएवाक पहिल अनुभूतिक प्रतीक्षा थिकैक आ मैथिल समाज केँ एहन नारी रत्नक मूल्यांकन करब बाँकी अछि जकर योगदान परिवार समाज आ राष्ट्र लेल एकहि काल-खण्ड मे पारस्परिक महत्ता रखैत अछि। पछिला मास जमशेदपुरक सेमिनार मे बमुश्किल दस मिनटक गप भेल आ ताहिसँ पहिने 1993 मे राँचीक मैथिली सम्मेलन मे भेंट भेल छल आ एकबेर पटनाक मिथिला मिहिर कार्यालय मे कुशलक्षेम धरि। मुदा बौद्धिक स्तर पर अहाँक कथा-कविताक पाठकीय स्तर पर अहाँक समाज सेवाक प्रत्यक्षदर्शीक स्तर पर हम कम सँ कम साढ़े तीन दशक सँ अधिके अवधि जुड़ल रहलहुँ अछि आगहुँ जुड़ल रही से इच्छा ते अछिये। मिहिर अहाँकेँ कथा संसार मे प्रवेश करबाक
अवसर देने छल। पछाति एकटा आकास हमर पाठकीयता केँ संपुष्ट कयने रहय। ओना मिहिरक पाठीकीय मंच मे कैक हमर अभिमत अहाँक कथा प्रसंग छपल अछि से ने तँ क¯टग अछि आ ने स्मरण। मुदा मोन अछि अगवे कथाक पात्राक संवेदनाक देखार होइत स्पर्श अपन संस्कृति-परिवेशक सम्मानित करैत कथाकारक दृष्टि आ पछिला शताब्दीक सातम दशक धरि अपन कुंठा वेदना आ शोषण केँ खूँट मे बन्हैत मानसिकता।
मोन पड़ैत अछि 1976 । कथा लेखिका गौरी मिश्रक सम्पादकत्व मे साहित्य अकादेमी सँ
प्रकाशित कथा संग्रह पर उठल बबंडर आ मिहिरक विचार मंच छल अखाड़ा। अहाँक कथा चयन केँ हमहूँ ताखकक निर्णय मानने रही। हमरा 1965-70 ई क सहरसा मोन पड़ैत अछि। जिला मुख्यालय रहितो एकदम गमैया वातावरण आ ताहि झांपल परिवेशक बीच सहरसा नगरपालिका आयुक्तक अहाँक दस वर्षीय समाज सेवा। आ समाजक प्रति दायित्व पालनक व्यस्तमतम अवधिमे तँ अहाँ मैथिलीक कथा ओ कविताक मूलाधार केँ लेखिकाक स्तर पर बलिष्ठ बनौलहुँ। स्वराज्यक दू अढ़ाय दशकक उपरान्त जँ निष्पक्ष अनुशीलन होअय तँ कथा ओ काव्य दुनू विधा मे अहाँ छोड़ि क्यो नजरि नहि अवैत अछि। गौरी मिश्र चित्रालेखा देवी लीली रे आदि अगवे कथा लिखैत रहथि। जाहि नीरूजा रेणु केँ साहित्य अकादेमी पछाति पुरस्कृत कयलकन्हि तनिक तँ जन्मो नहि भेल छल। कखनहुँ शरदिन्दु चौधरी सम्पादक समय-सालक कहब 26 03 07/दूरभाष सटीक लगैछ जे अहाँक योगदानक तटस्थ मूल्यांकन लेल काव्य कृति विप्रलब्धा भावांजलि एकटा आकास कथा संग्रह नागफाँस उपन्यास यायावरी यात्रा वृतांत स्मृति रेखा संस्मरण क अतिरिक्त शीघ्र प्रकाश्य अर्थयुग अनाम अनुभूति रजनीगंधा आ बान्ह टुटि गेलैक अतिरिक्त कैक संग्रह मे स्थान पओने रचना पत्रिका मे छिड़िआइल कथा कविता केँ सेहो सोझा पथार लगबय पड़तैक। 1974 मे अहाँक स्मृति-रेखा संस्मरण पोथी बहराएल। हम मैथिलीक संस्मरण विधा मे ओहि काल खण्ड मे लेखिका लोकनिक पोथी तकैत छियन्हि आर कोन-कोन कृति अछि जेना कि पछिला खेप अहाँ कहलहुँ किस्त-किस्त मे शीघ्र अहाँक आत्मकथा प्रकाशित होमय जा रहल अछि। एकर प्रकाशन मैथिली केँ नवीनतम उपलब्धि हैत। कोनहुँ लेखिकाक आत्मकथा पहिले-पहिले मैथिली देखि पाओत। अगिला खाढ़ी अहाँक संघर्ष समर्पण आ दृष्टि सँ नव भूमिका स्थिर क सकत। 1993 मे हमर प्रधान सम्पादकत्व मे हजारीबाग सँ पहिल टेवलायड मैथिली मासिक बागमती दोमोदर टाइम्स प्रकाशित होमय लगल। दोसरहि अंक मे मैथिलीक महदेवी: शेफालिका वर्मा अग्रलेख छपल। मौखिक आ लिखित विरोध भेल की गलत छपल छल हम मानैत छी महादेवी
कोटिक गीतमयता अहाँक काव्य मे नहि अछि बिम्ब आ प्रतीकक विशाल परिधि अहाँ नहि अखजत क सकलहुँ मुदा महादेवी तँ संवेदनात्मकता हृद्यविह्वलता आ स्पर्शजन्यता लेल प्रसिद्धि पओलनि। अहाँक काव्य संसार तँ इएह अनुभूतिजन्यता केँ प्लावित कयने अछि।मैथिली काव्य मंचक कवयित्राीक रूप मे अहाँ छोड़ि पर्याय के बनल अपन प्रान्ते नहि अन्यत्राहुँ अहींने मैथिलीक प्रति आकर्षण जगौलहुँ जतय धरि हमरा बूझल अछि काउबेल्ट क एहि पूर्वी भाग मे स्त्रिागणक सामान्य आयु 69
सँ 73 मानल गेल अछि। अपन जीवनक साढ़े छः दशक बीतैबतो मैथिली लेल अहाँक ऊर्जा उत्साह आ निष्ठा देखि हमरा झुम्पा लाहिरी नेमसेकक - लेखिका मोन पड़ैत छथि।
बंगला लेखिका तसलीमा नसरीनक हेवनि मे एक साक्षात्कार पढ़लहुँ यूरोपीयन देशक
नागरिकता एही कारणे नहि लेलीह जे अपन भाषा बजनिहार क्यों नहि भेटैत छलन्हि आन भाषा मे लिखवाक अन्तरात्मा अनुमति नहि दैत छन्हि। अहूँ आइ सहरसा छोड़ि पटना-दिल्ली रहय लागल हुँ। भगवती अहाँ केँ हिन्दीयो मे यशस्वी बनवाक अर्हता प्रदान कयने थिकीक मुदा अहाँ आइयो तसलीमा बनल छी जकर प्रमाण अछि शीघ्र प्रकाश्य किस्त-किस्त मे। मिथिला सभ दिन मीमांसक भूमि रहल अछि। एतुका साहित्येत्ता बुद्धिजीवी आ पाठकक मनन-चिन्तन मध्य अहाँक चारि दशकक मैथिली सेवा स्थायी परिचित देतनि साहित्यानुभूतिक नवीनता।
सादर।
पंचानन मिश्र
(क्रमसँ दोसर खेप अगिला अंकमे)
२.
बिपिन झा
चहकैत चौक आ कनैत दलान
संक्रमण काल सँ गुजरैत अपन मिथिलांचल आइ अपन क्षीण होइत मर्यादा, सभ्यता एवं संस्कृति कऽ कारण चिन्ताग्रस्त अछि। समस्त विवेकशील बुद्धिजीवी स्तब्ध छथि। मैथिल संस्कार अन्दरे अन्दर विलाप कय रहल अछि! एकर पैघ उदाहरण थीक चहकैत चौक, हँसैत मधुशाला आ कनैत दलान।
कहियो मिथिला कऽ गामक दलान प्रवुद्ध व अनुभवी बुजुर्ग, उद्यमशील आ विवेकी युवा, संस्कारी किशोर आ बच्चा सभ सँ शोभायमान रहैत छल। आँगन मँ गोसाउनिक घर एकटा तीर्थवत् होइत छल। चौक चौराहा सक्रियता एवं मेलमिलापक अड्डा होइत छलै मुदा आई ? नगर पलायन के कारण दलान सुन्न भय गेल। जे व्यक्ति वचलो छथि से दलान क वजाय अन्तःपुर में व्यस्त रहैत छथि। प्रवुद्ध व्यक्ति गाम में अल्पसंख्यक मय गेलाह। प्रत्येक चाँक पर एकटा विदेशी मधुशाला खूजि गेल जतय पैघघरक बच्चा व्यक्ति सम वच्चन साहेबक ग्रन्थक अनुकरण कय रहल छथि। संगहि इशारा में किछु पड़िया वला चीज संहो सूंघि रहल छथि।
इ सर्वत्र व्याप्त वौद्धिक आचार संबंधी प्रदूषण ग्राम समाज के कलुषित करैत-करैत मिथिलाचलक आत्मा नष्ट करवाक उद्यत अछि। आई सबटा बौद्धिक व आचारवान व्यक्ति ग्राम समाज में घुटन महसूस कय रहल छथि एकर जिम्मेदार के छथि ? शायद समस्त समाज।
एहि महामारी कऽ उन्मूलनार्थ समस्त मैथिल समाज के आगा आबय पड़त स्थिति अखनो नियंत्रण में अछि। यदि प्रयास कयल जाय तखनि सब किछु संभव अछि अन्यथा सब सत्यानाशक इंतजार में तैयार रही इ भविष्यक चेतावनी अछि।
आशा अछि से समस्त बौद्धिक समाज एहि समस्या पर चिन्तन करताह आ किछु सामूहिक प्रयासो अवश्य होयत।
१.डा. राजेन्द्र विमल- साहित्य–सङ्गम
गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सुर–ताल २.प्रो. वीणा ठाकुर- जिनगीक जीत उपन्यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर
३. - जगदीश प्रसाद मंडल- कथाक शेष- अर्द्धागिनी ४. - जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- अतहतह
१
—डा. राजेन्द्र विमल
साहित्य–सङ्गम
गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सुर–ताल
गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि नेपालीय मैथिली गीत–संसारक प्रायः सभसँ मूल्यवान उपलब्धि थिकाह— विविधतामय विषयक दृष्टिएँ, संख्यात्मकताक दृष्टिएँ, उच्च काव्यमूल्यक दृष्टिएँ, विविध शिल्प–प्रयोगक दृष्टिएँ, विविध अलङ्कार, गुण, रस, भाषिक प्रयोगक दृष्टिएँ, शैलीगत विविधताक दृष्टिएँ, सामाजिक सचेतताक दृष्टिएँ आ सभसँ बढ़िकऽ मस्तिष्क आ हृदयक सुन्दर सहयात्राक दृष्टिएँ । हिनक गीतसङ्ग्रह ‘कोन सुर सजाबी ?’ क गीतसभमे प्रेमतत्व, व्यङ्ग्यतत्व, वेदनातत्व, नवरसतत्व, उद्बोधनतत्व, आख्यायिका–तत्व, सामाजिक–तत्व, धार्मिक–तत्व, राजनीतिक–तत्व, सांस्कृतिक–तत्व आदि विविध तत्व मिलाकऽ जे कलात्मक रूपाकृति गढ़ल गेल अछि से विलक्षण थिक । हमरा आन गीतकारक किछु गीतक किछु पंक्ति भीतरधरि छूबैत अछि, मुदा धीरेन्द्रक बहुतो गीतक प्रायः सभ पंक्ति मर्मकेँ बेधि जाइत अछि । जीवन–जगतक यथार्थ शक्ति आ सम्भावनाक प्रति अदम्य निष्ठा एवं सजगतासँ पोनगल आन्तरिक आ वाह्य सौन्दर्य जखन सुरमे सजैत अछि तँ जेना चेतनाक लहरिकेँ लयबद्ध कऽ लैत अछि । जीवनक कियारीमे फुलाइछ सत्य आ सौन्दर्यक फूल जे प्रत्येक रूप–रङ्गमे मङ्गलकारी थिक । परिवेशक यथार्थबोध हेतु आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिक विरोधमे ठाढ़ भेल कुण्ठित सौन्दर्यबोधसँ बेसी तकर साहचर्यमे परिमार्जित आ विकसित सौन्दर्य–चेतनाक कारणेँ गीतकारक सहज प्रेमोच्छ्वासो कोनो अदृश्य चन्द्रलोकसँ आएल नहि, हृदय किंवा धरतीसँ उपजल लगैछ ।
कविमे सौन्दर्य–चेतनाक इन्द्रधनुषी रङ्ग यत्र–तत्र–सर्वत्र छलकि उठल अछि से सत्य, मुदा सौन्दर्यक रसग्राह्यता मिथिलाक धरती आ संस्कृतिक प्रति सहज संस्कारक रूपमे विकसित मधुर अनुरागसँ अभिप्रेरित अछि । बहुजन–रञ्जनक सङ्ग बहुजन–मङ्गलक भाव हिनक अनेक गीतक संवेदनाकेँ समसामयिक आ सतत गतिशील सत्यक संवाहक बना देने अछि, मुदा तौँ ओ देश–कालक अन्तर्सत्यसँ आबद्ध अछि । स्पष्ट कही तँ हिनक समकालीनता परिवेशजन्य अन्तरङ्ग क्षणक अभिव्यक्ति थिक । हिनक भाषा, भङ्गिमा, भावबोध, छन्द, लयमे एतेक नवीनता आ ताजापन एहि दोआरे बूझि पड़ैछ जे ओ सद्यःजात कमलक फूलसन टटका अछि, जकर जड़ि भने परम्परामे होइक, मुदा प्रस्फुटन नितान्त मौलिक छैक ।
धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गीतसभकेँ निम्नलिखित कोटिमे वर्गीकृत कएल जा सकैछ— १) श्रम, सङ्घर्ष, आस्थाक गीत २) मानवीय सम्बन्ध आ संवेदनाक गीत ३) सौन्दर्य–चेतना आ प्रीतिक गीत ४) चिन्तनपरक दार्शनिक गीत ५) माटिपानि आ सामाजिक राजनीतिक सचेतताक गीत ।
१. श्रम, सङ्घर्ष, आ आस्थाक गीत ः जीवनक अरण्यमे काँट छैक तँ फूलो छैक, पतझड़ छैक तँ बसन्तो छैक, ग्रीष्म–प्रदाह छैक तँ छाहरिक शीतलतो छैक । जीवनकेँ स्वीकार करबाक लेल ओकर सम्पूर्ण यथार्थकेँ स्वीकार कऽ उत्साहक सङ्ग जीबऽ पड़तैक । विडम्बनापूर्ण जीवनक ई स्वीकृति आ जिजीविषा गीतकारकेँ काँटक बीच फूल खोजबाक प्रेरणा आ उत्साह दैत छन्हि—
चारि दिनक ई जीवन–धाम
हरखक पल ताहूमे बाम
कलिका खोँटिकऽ फेकैत हम
ताकि रहल छी फूलक गाम
ई धरती, एकर उत्सव आ शोक, स्मिति–अश्रु, जय–पराजय प्राणवन्तताक प्रमाण थिकै, तेँ कोनो कल्पना–कुहरमे भटकैत सत्य–सूर्यक खोज करब बतहपनी छैक । सृष्टिक गर्भसँ जनमल सत्य मात्र गीतकारकेँ स्वीकार छन्हि—
सत्यक जननी सृष्टि तमाम
कर्मक सिञ्चन हम्मर काम.....
प्रेमर्षि श्रमहीन जीवनकेँ जिनगीक भ्रम मानैत छथि आ शोषणपर आधारित जीवन–व्यवस्थाक विरुद्ध छाती तानि ठाढ़ भऽ जाइत छथि । शोषणक विरुद्ध केहन घृणा छन्हि प्रेमर्षिक मोनमे—
गामक गाम उजाड़ि बनाओल
महल–अटारी नइ चाही
देशक खून आ गरीबक आहसँ
भरल बखाड़ी नइ चाही
लाखोक धूर निलामीक जनमल
एक जिमदारी नइ चाही.....”
एहन अवस्थामे ओ कहैत छथि— हमरा अपन गरीबियो बरदान लगैए.....
गरीबक जिनगीक केहन मार्मिक शब्दचित्र प्रस्तुत कएने छथि प्रेमर्षि—
पीठकेँ झँपैत छी तँ माथा उघार
माथकेँ झँपैत छी तँ पीठहि उघार
चूनि–चूनि खढ़पात खोँता बनाबी
चुबिते रहि जाए तैयो जिनगीक चार......
२. मानवीय सम्बन्ध आ संवेदनाक गीत ः मनुक्ख अनेक स्तरपर एक–दोसराक रागतन्तुसँ बन्हाएल अछि । नितान्त वैयक्तिक स्तरपर, पारिवारिक स्तरपर, सामाजिक स्तरपर, राष्ट्रिय स्तरपर, अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर, ब्रह्माण्डीय स्तरपर । राग–विरागक ई खेल चिरन्तन थिक, सार्वभौम थिक । जाधरि मनुक्ख जीवित अछि, नेह–छोहक एहि रेशमी बन्धनकेँ तोड़ि फेकब ओकरा हेतु दुःसाध्य थिकै । एहि रागात्मकताकेँ प्रेमर्षि जीवनक स्पन्दन, प्राणज्योति, अपरिहार्य अङ्ग–रङ्ग मानैत छथि—
बीस बरखा टेरलिङिया कुरता
तैपर साटल चेफरी छै
शीतलहरीमे ओक्कर ओढ़ना
पोतीक फेकल केथरी छै
सोना गढ़िकऽ इएह फल पौलक
अपने बनि गेल ताम–सन
वाह बुढ़बा तैयो बाजैए
हम्मर बेटा राम–सन....
अद्वितीय !! ई सम्बन्ध–बन्ध अपराजेय आ अमर रहए, भगवान !!
३. सौन्दर्य–चेतना आ प्रीतिक गीत ः कोनो राजनीतिक वादक झण्डातर बैसि गीतकेँ विज्ञापन वा प्रचारक माध्यम बनबैत अथवा अनुभवशून्य विषयपर शब्दक कलाबाजी देखबैत जीवानुभव वा जीवनसत्यक दिससँ शुतुरमुर्गी शैलीमे आँखि मुननिहार गीतकार नहि थिकाह प्रेमर्षि । तेँ ओजस्वी भावनाक हथौड़ासँ शब्दकेँ लोहारजकाँ पीटि–पीटि सङ्घर्षक हेतु फरसा आ गड़ाँस बनबैत प्रेमर्षि जखन छेनीसँ पदावलीकेँ तरासैत सोनारजकाँ रचि–रचिकऽ पे्रयसीक हेतु कोमल कण्ठहार बनबैत छथि तँ हमरा कृष्णक कुरुक्षेत्रक योद्धारूप आ वृन्दावनक रासलीला रचबैत प्रेमीरूप एक्कहिबेर मोन पड़ि जाइत अछि ।
श्रृङ्गारक दुनू भेद— संयोग आ विप्रलम्भक मोहक चित्रण हिनक गीतमे भेटैत अछि—
प्रेमक घटसँ जते निकाली
जलक हुअए ने अन्त
हमर अहाँकेर प्रेमक चिड़िया
भऽ गेल बेस उड़न्त.......
४. चिन्तनपरक किंवा दार्शनिक मुद्राक गीत ः चिन्तन जखन भावनाक तलपर आबि गाबऽ लगैछ तँ उच्च कोटिक गीतक जन्म होइत छैक । प्रेमर्षिक किछु गीतमे चिन्तनक जे चिनगी दहकैत अछि से जिनगीक चरम सत्यधरि लऽ जाइत अछि—
जीवन थिक मेला दू दिनमा
ई ईष्र्या–द्वेष किए प्राणी
आखिरमे देह गलिए जएतह
बस रहि जएतह अमृत वाणी.....
वन–वन बौआइत अछि
कस्तूरीक टोहमे मृग जहिना
सदिखन औनाइत अछि
माया आ मोहमे मन तहिना.....
५. माटि–पानि आ सामाजिक–राजनीतिक सचेतताक गीत ः धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गीतमे जयदेवक कृत्रिम कलात्मकता नहि, विद्यापति गीतक सहज कलामय तन्मयता अछि । तेँ ई गीतसभ मिथिलाक सुगन्धसँ महमह करैत अछि । मिथिलाकेर व्यथा दहेज, नवका साल पुरने हाल, जनतन्त्रक बहाली, जय हो पेट धरमवीर, हे देखियौ हमर समाजमे, ओ बमभोला, सत्ताक माछ, देशी मुर्गा बिलाइती बोली, जागरण गीत एहि कोटिक गीत थिक । एहि गीतसभमे अत्यन्त तीक्ष्ण व्यङ्ग्य अछि—
बम भोला
छोडूÞ भङगोला
जँ पियब अछि अति आवश्यक
पीबू कोकाकोला.....
मुर्गा देलक बाङ
दुलरिया दारू ला......
पहिने डबरा–खत्ता घुमी
भेटए बस गरचुन्नी
बाँटैत–चुटैत पबैत छलियै
एक्कहि–दूटा कुन्नी
एहिबेर पोखरिक जीरा भेटल
सटि गेल ठोरमे
आब तँ मोन परकि गेल हम्मर
माछक झोरमे...........
दूर्गापूजा डी.पी. बनि गेल
भरदुतिया राखीतर दबि गेल
जुड़शीतल शीतलहरीक मारल
हैप्पी न्यू इयर बस फबि गेल
बम फटाक फुलझड़ीक बीचमे
डूबि गेल हुक्का लोली
देशी मुर्गा बिलायती बोली.....
एहि सभ गीतक उचित मूल्याङ्कन मैथिल संस्कृतिक गवाक्षसँ निरखिकऽ करब बेसी उचित होएत । कारण हुनक गीत–संसार सोरसँ पोरधरि मैथिल संस्कृतिक रङ्गमे सराबोर अछि । एत्तऽ धरि जे उपमोसभ खाँटी मैथिल भूमि, जीवन, समाज वा संस्कृतिसँ लेल गेल अछि—
भेल प्रेमक रौदी एहि जगमे
तेँ धधकए सभतरि दावानल
जुड़शीतलक जल–थपकीसन
बरिसाउ प्रिये कने प्रेमक जल.......
सुच्चा मैथिल गीत थिक— अछिञ्जल–सन पवित्र ! एकटा पाँती देखल जाए—
भौजीकेँ बस कोबरे भाबनि
मुदा दियरसभ आबि सताबनि
भैया बहाने काल भगाबथि
बारहमासा गाबि सुनाबथि.........
गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मादे टिप्पणी दैत नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक उपकुलपति, नेपाली समीक्षाशास्त्रक युगपुरुष, प्रकाण्ड विद्वान प्रा.डा. वासुदेव त्रिपाठी उचिते लिखलैन्हि अछि— “करीब सैँतीसे वर्ष (तत्कालीन) क लहलहाइत उमेरमे अनेक विधा आ क्षेत्रमे रहल हुनक साधना आ तकर विस्तृत आयामक अवलोकन कएलापर हमरालोकनिक मोनमे सहजहिँ महान नेपाली साहित्य–स्रष्टा मोतीराम भट्टक स्मरण भऽ अबैछ ।” मैथिलीक एहि मोतीरामपर मिथिला–मैथिलीक इतिहास सर्वदा गर्व करत से हमर अटल धारणा थिक ।
२.
प्रो. वीणा ठाकुर
अध्यक्ष, मैथिली विभाग
ल.ना.मि.िवश्व विद्यालय दरभंगा।
जिनगीक जीत उपन्यासक समीक्षा- प्रो. वीणा ठाकुर
श्री जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास ‘जिनगीक जीत’ पढ़वाक अवसर भेटल। उपन्यास पढ़ि बुझाएल जे ई उपन्यास तँ वास्तवमे मिथिलाक संस्कृतिक जीत थिक, जीवनक जीत थिक, संस्कारक जीत थिक। जौं एक शब्दमे कहल जाए तँ यएह कहल जा सकैत अछि जे ई ‘लोक’क जीत थिक। जखनहि लोकक जीत थिक तँ स्वभाविक अछि जे एहि उपन्यासक मध्य लोक साहित्यक सुगन्ध चतुर्दिक पसरल हएत।
उपन्यासक कथा मिथिलाक एकटा गाम कल्याणपुरक थिक, जतए जीविकाक मुख्य साधन थिक कृषि, जतए आधुनिक वैज्ञानिक युगक प्रकाश नहि पहुँचल अछि। जतए उच्चतम शिक्षाक लक्ष्य थिक बी.ए. पास करब आओर जतए एकैसम शताब्दी एखन धरि नहि आएल अछि आओर नहि आएल अछि शाइनिंग इंडियाक प्रकाश। उपन्यासकार प्रमुख पात्र छथि नायक बचेलाल, नायिका रूमा, मुख्य पात्र छथि बचेलालक माए सुमित्रा, अछेलाल, अछेलालक पत्नी मखनी इत्यादि। कथा अछि बचेलालक द्वन्द्व एवं द्वन्द्वसँ उपजल अवसादक एवं जीवन संघर्षक, सुमित्राक मिथिलाक नारीक गरिमाक अछेलालक कर्त्तव्य निष्ठताक, संगहि मानवीय संघर्षक, द्वन्द्वक आओर भविष्यक आशा-आकांक्षाक। नायकक मानसिक द्वन्द्व जौं जीवनक सार्थकता लेल अछि तँ नायकक माए सुमिताक दृष्टि स्पष्ट मानवीय गरिमासँ युक्त अछि। नायकसँ एक डेग आगाँ बढ़ि द्वन्द्वसँ मुक्तिक वाद देखबैत प्रकाश पुंज मध्य अछि। नायकक पत्नी रूमाक चरित्रपर प्रकाश नहि देल गेल अछि, ताहि कारणे रूमा उपन्यास मध्य गौण पात्र भऽ गेल छथि।
कोनहुँ समाजक जातीय मनीषा, सामुदायिक चेतना, जातीय बोध मानवीय मूल्य आओर जीवन दर्शनक विविध पक्षमे अवगत होएवा लेल ओकर लोककेँ बुझब आवश्यक। उपन्यासकार एहि उपन्यास मध्य अत्यन्त इमानदारी पूर्वक अपन समाज, मिथिलाक समाज, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा एवं समयक सत्य लिखने छथि। समाजक निम्न वगर्क, कृषक वर्गक जीवनक चित्रण अत्यन्त इमानदारी पूर्वक कएने छथि। उपन्यासकार मिथिलाक वास्तविक चित्रण करवामे सफल भेल छथि, मिथिलाक तात्कालीन दशाक चित्रण कएने छथि तँ मात्र और मात्र अपन भाषा, देश एवं सामािजक दायित्व समाजक प्रति प्रेम एवं प्रतिबद्धताक कारणे हिनकासँ ई उपन्यास लिखवा लेने अछि। यद्यपि कथाक प्रवाह अवरूद्ध अछि तथापि कथा अपन अंकमे देश-समाज, मानव, प्रकृति, संस्कृति, विकृति आदिकेँ समेटि अपन लक्ष्यपर पहुँचवामे सफल भऽ गेल छथि। हिनक उपन्यासमे हिनक व्यक्तित्व पाठकक समक्ष स्पष्ट प्रतीत भेल अछि।
जीवन दर्शन आओर आध्यात्मसँ लऽ कऽ मनुष्यक समस्त राग-विराग ‘लोक’मे विद्यमान अछि। मिथिलाक लोक संस्कृति संवाहक उपन्यास ‘जिनगीक जीत’मे उपन्यासकार जीवनक ओहि सत्यकेँ आत्मसात् करबाक प्रयास कएने छथि जाहिमे जीवनक समस्त ‘सार’ नुकाएल अछि। उपन्यासक मध्यमे उपन्यासकार मनुष्य जीवनक समस्त राग-विराग, आशा-आकांक्षा, दीनता-हीनता, उत्कर्ष-अपकर्षक चित्रित करैत वस्तुत: जीवनक शाश्वत तथ्य- जीवाक इच्छाकेँ उजागर करवामे सफल भेल छथि। वस्तुत: ई उपन्यास ई उपन्यास भाषा अथवा वोलीमे जातीय स्मृतिक आ साहित्यिक रूप थिक जे हमर जातीय चेतना अथवा जातीय वोधकेँ सुरक्षित राखने अछि। मिथिलाक सूच्चा चित्र अंकित करैत उपन्यासकार अपन जीवनानुभवसँ संचित कएल ‘सार’ आओर ‘सत्य’केँ अभिव्यक्त कएने छथि। वस्तुत: ई उपन्यास मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक थिक आओर एकर सार थिक शाश्वत। उपन्यास मध्य प्रकृति, परिवेश, आध्यात्म, समरसता आओर समन्वयक छवि आओर छटा सर्वत्र दृष्टिगोचर होइत अछि।
वर्तमान साहित्यमे ई प्रवृति प्रमुख अछि- एक समाजोन्मुख दोसर व्यक्ति निष्ठा तथा आत्म केन्द्रित। उपन्यासकारक प्रवृति समाजोन्मुख अछि। सम्पूर्ण उपन्यास मध्य मिथिलाक गामक लोकक रहन-सहन, अचार-विचारक चित्रण एतेक सजीव अछि जे पाठककेँ ओहि लोकमे लऽ जाइत अछि, जिनका गाम छुटि गेल छन्हि। उपन्यास मध्य मिथिलाक समाजक चित्र एतेक वास्तविक रूपमे चित्रित्र भेल अछि जे मिथिलाक मािट-पानिक सुगन्धसँ पाठकक हृदय सहजहि आहलादित भऽ जाइत अछि। वर्तमान समएमे गामक लोकक पलायन शहर दिशि भऽ गेल अछि, गाम पाछाँ छूटल जा रहल अछि। मुदा पाठक उपन्यास पढ़ि पुन: गाम घुिर जाइत अछि, गामक स्मृतिसँ पाठक बान्हल रहि जाइत अछि।
सामाजिक प्रश्नक प्रती सजग उपन्यासकार अपन एहि रचनामे सामाजिक जीवनक अर्न्तविरोध, विसंगति एवं परिवेशक चित्रण करैत, सामाजिक प्रश्नक निदान मूलत: व्यक्तिमे ताकवामे सफल भऽ गेल छथि। मिथिलाक ग्रामीण समाजक, निम्न वर्गक एवं कृषक समुदायक मान्यता एवं परम्पराकेँ प्रस्तुत करैत उपन्यासकार उपन्यासकेँ अत्यन्त संवेदय बना देने छथि संगहि एकटा नव संदेश- आशाक संदेश, भविष्य निर्माणक संदेश देवाक सेहो प्रयास कएने छथि। एहि संदेशकेँ उपन्यासकार लोकक भाषामे व्यक्त करैत संकीर्ण एवं अव्यवहारिक पक्षकेँ मानवीय सरोकारसँ जोड़ैत कल्पनाशीलता एवं संवेदन शीलताकेँ केन्द्रमे राखि अपन उदेश्यकेँ चित्रित करवामे सफल भऽ गेल छथि। ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’क ध्वनि बुलंद करैत उपन्यासकार दया, ममता, आस्था, त्याग, परोपकार सदृश मानवीय गुणक पक्षधर प्रतीत होइत छथि। दोसर दिशि एहि गुणकेँ प्राप्तिक दिश निर्देश सेहो कएने छथि। आधुनिक बुद्धिजीवी मानवक कार्य, ज्ञान आओर इच्छाक बीच तालमेलक अभाव आधुनिक जीवनक विडम्बना थिक। मुदा उपन्यासकार मिथिलाक सरल, निश्छल एवं सहज लोकक चित्रण करैत वस्तुत: मिथिला शुद्ध, पवित्र एवं सत्यस्वायनक चित्रण कएने छथि।
उपन्यासक सभसँ पैघ विशेषता थिक समाजक निम्नवर्गक बोलचालक भाषा, लोक संवाद एवं लोकोक्तिक प्रयोगक संग समाजक विषमता एवं विसंगतिपर प्रहार करव। अपन जीवनानुभवकेँ अलग शैली एवं शिल्पक माध्यमसँ निरूपित करवामे उपन्यासकार सफल भऽ गेल छथि। संगहि इहो सत्य जे उपन्यासकारक अर्न्तमन अत्यन्त कोमन तन्तुसँ निर्मित छन्हि तेँ हिनक उपन्यास मध्य ‘रिसेप्टीविटीक’ स्तर बहुत गाढ़ भऽ गेल छन्हि। उपन्यासकार प्रमाणित कऽ देने छथि जे सहज लोक भाषाक माध्यमसँ नहि मात्र अपन अन्तर्परिष्करण सम्भव अछि अपितु प्रकारान्तरसँ मानवीय दायित्वक निर्वहन सेहो।
संवंधक अभावमे मनुष्य सुखा जाइत अछि। मनुष्य अपनामे वंद होएवा लेल नहि बनल अछि। मनुष्यमे जतेक जे अछि, सभ ओकरा अन्यसँ माने दोसरसँ जोड़ैत अछि आ प्रसन्नताकेँ बाँटैत अछि। सम्भत: यएह उपन्यासकारक इष्ट छन्हि। हम हिनक मंगलमय भविष्यक कामना करैत अंतमे मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृद्ध करवा हेतु साधुवाद दैत छियन्हि।
पोथीक नाम- जिनगीक जीत (उपन्यास)
उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, राजेन्द्र नगर दिल्ली।
मूल्य- २५० टाका मात्र।
प्रकाशन वर्ष- सन् २००९
पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स,
वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५
३
जगदीश प्रसाद मंडल
कथाक शेष-
अर्द्धागिनी
विद्यालय भवनक सीढ़ी, जहिठाम ओसारपर चपरासी बैसैत। सीढ़ीसँ एक लग्गी पाछुए पढ़ुआकाका रहथि कि चपरासी उठि कऽ आॅफिस दिस विदा भेल। जे कक्को देखथि। सीढ़ी लग पहुँच आगू तकलनि जे चपरासी घुरि कऽ अबैए आकि नहि। मुदा नहि देखि काकामे पौरूष जगलनि। मनमे उठलनि अखन तँ सेवा निवृत्तो नहिये भेलौंहेँ, तहन किअए अनकर सेवा लेवा लेल मुँह ताकब। सीढ़ीसँ उपर तँ चढ़ि गेलाह मुदा सीढ़ीक ओ प्रश्न जे पछुएने अबै दलनि आगूसँ घेरि लेलकनि। जे (चपरासी) बाबा कहैए, आॅफिसोक सभ भैये, काका कहै छथि मुदा कि से कहने शरीरक शक्तियो घटि-बढ़ि सकैए। जँ से नहि तँ परिवारमे किअए कहल जाइए। नजरि ठनकलनि, अगर बीस बर्खक आधार बना देखै छी तँ उम्र दोबराइत जाइए। उमरे तँ शरीरक शक्तिकेँ घटबै-बढ़बैए। मन हल्लुक भेलनि। मुदा चपरासीक बेवहारसँ मन खटाएले रहलनि। हवा उठि चुकल छल जे आइ चारि बजे पढ़आ काकाकेँ सेवा-निवृत्तिक चिट्ठी भेटतनि। विद्यालयक वातावरणमे सोग पसरि चुकल छल।
स्टाफ रूम पहुँचते एक नहि अनेक तरहक खटका खटकए लगलनि। आन दिनसँ बेवहारो बदलल। मुदा चपरासीबला बेवहार बेसी मनकेँ हौंड़ैत रहनि। कुरसीपर बैसतहि मनमे उठलनि। मुदा तह दैत मनसँ हटौलनि। शिक्षक सबहक बीच गप-सप्पक क्रम सेहो बदलल-बदलल बुझि पड़नि। किछु व्यंग्यबातसँ क्रमकेँ बदलौ चाहथि तँ ओहन बेवहारे नहि छलनि। चालिसँ थाकल रहबे करथि आँखि झल-फलाए लगलनि। गमे-गम नीनो आबि गेलनि। अलिसा कऽ आँखि मूनि लेलनि। आँखि मूनल देखि इशारामे उतरीक चर्चा हुअए लगल। मुदा पढ़ुआ काकाक आँखि बन्न तेँ किछु बुझवे ने करथि।
दू बजि गेल। अढ़ाइ बजे ट्रेन, तेँ स्टाफ सबहक बीच चिल-मिलक कुचकुची जकाँ, देह-हाथ चुल-चुलाए लगलनि। कुरसीक पौआ सबहक अवाजसँ पढ़ुआ काकाक भक्क खुजलनि। बैग लऽ संगी सभ निकलैक उपक्रम करए लगलाह कि आॅफिसक बाड़ाबावू आवि कऽ काकाकेँ कहलकनि- “अपनेक पत्र अछि जे चारि बजेमे देल जाएत, तेँ अपने चिट्ठी लेलाक बादे प्रस्थान करबै?” कहि आॅफिस दिस बढ़ि गेलाह। ठाढ़े प्रणाम कऽ कए संगियो सभ निकलि गेलनि। पिजरामे बन्न सुुग्गा जकाँ पढ़ुआ काका असकरे कोठरीमे बैसल। बड़ाबावूक भाषापर नजरि गेलनि। आन दिनक जे बोली रहैत छलनि ओहिमे किछु कड़ुआहट बुझि पड़ि रहल अछि। भषे नहि अखने कि देखलौं काल्हि धरि सहयोगी सभ अरिआति कऽ पहिने विदा कऽ दैत छलाह तेकर वादे िकयो जाइत छलाह। नौकरीक एससाह भेलनि। जहिया विद्यालयमे सेवा करए एलौं तहिया बच्चा (विद्यार्थी) सभसँ कि संबंध छल। एकठाम खेनाइ, एकठाम रहनाइ आ एकठाम बैसि पढ़ौनाइ। पानि पीवाक इच्छा होइत छलए आ बजै छलौं तँ पानि अननिहारक होड़ लगि जाइत छलए। जे पहिने लोटा पकड़ि पानि अनै छलै ओ अपनाकेँ कुशाग्र बुझैत छलै। मुदा आइ कि देखै छी शिक्षकक आगूमे छात्र सिगरेटक धुँआ उड़बैत अछि। कोना एहेन रोगक प्रवेश शिक्षण-संस्थानमे भेल? जहियेसँ विद्यालय सरकारीकरण भेल तहियेसँ विद्यार्थी पतराए लगल। ओना गाम-गाममे स्कूलो खुजल आ पढ़बैक रूप सेहो बदलल। होइत-हबाइत छात्र-विहीन विद्यालय भऽ गेल। ओना महीनवारी बेतनो नीक बनि गेल। मुदा ओहूमे कमी रहल। महीने-महीना नहि भेट सालक चुकती सालमे हुअए लगल। अखन धरि नोकरीकेँ नोकरी नहि अपन काज बुझै छलौं मुदा आइ बुझि पड़ि रहल अछि जे कतौ बंधनमे जरूर फँसल छी।
चारि बजिते आॅफिसक बाड़ा बावू, आॅफिसक स्टाफक संग, पढ़ुआ काका लग आबि हाथमे चिट्ठी दैत हस्ताक्षर करैले बही आगू बढ़ा देलखिन। जहिना रजिष्ट्री आॅफिसमे हस्ताक्षर केने परिवारक सम्पत्ति टुटैत तहिना पढ़ुआ काकाकेँ नौकरी टुटि रहलनिहेँ। हस्ताक्षर करिते पढ़आ काका हतास भऽ गेलाह। मनमे उठलनि सब किछु हड़ा गेल। जत्ते पढ़ने छलौं ओहिमे सँ पहिने ओते हड़ाएल जेकर उपयोग नहि भेल। जेहो किछु बँचल ओ विद्यार्थी हरेलासँ हरा गेल। जे किछु जीवैक आशा बँचल छल ओहो हड़ा गेल। कि हम एहिठामसँ उठि सोझे असमसाने जाएव आकि......। मन पड़लनि अपना संग किनको हाथो पकड़ने छिअनि कि ने? दू प्राणीक जिनगी कोना चलत? कहैले पेंशन भेटत मुदा पेंशन पेबामे जे लेन-देन छै ओ हमरा बुते कएल हएत। अखन धरि, जहियासँ सरकारी दरमाहा भेटए लगल तहियासँ आॅफिसक बाड़ा बावू आनि कऽ हाथमे जे दइ छलाह ओ चुपचाप जेबीमे रखि पत्नीक हाथमे दऽ दइ छलिएनि। मुदा जेना सुनै छी तेना हमरा बुते कएल हएत। जिनगीक एक्कोटा ब्रत निमाहै जोकर नइ छी। द्वनद्वमे छाती दलकए लगलनि। तहि बीच चपरासी आबि कहलकनि- “कोठरी बन्न करब, अपने प्रस्थान करियौक।” अर्द्धचेत अवस्थामे पढ़ुआ काका कोठरीसँ निकलि पताइत-पताइत ओसारपर एलाह। डेगे ने उठनि। कहुना-कहुना सीढ़ी लग आबि ओङठि कऽ बैसि गेलाह। अर्द्धचेत मनमे विद्यालयक चिट्ठी एलनि। जेबीसँ निकलि पढ़ए लगलथि। सूचना देल जाइत अछि तेसर मासक अंतिम तिथिसँ सेबा-मुक्त होएब। निचला पाँति पढ़ौ नहि लगलथि, मचोड़ि-सचोड़ि चिट्ठीकेँ सीढ़ीक आगूमे फेकि लहरैत मने उठि कऽ विदा भेलाह। मुदा जहिना नदीक किनछड़िक पानिमे पैसैसँ बड़द पाछु पाएर करैत तहिना पढ़ुओ काकाक पाएर आगू-पाछु हुअए लगलनि। मनक लहरिसँ पाएर तनेलनि। आगू बढ़ए लगलाह। विद्यालयक फाटक (गेट) लग पहुँच पाछु धुरि तकलनि तँ बुझि पड़लनि जे जना खंडहर ठाढ़ अछि। मात्र ईंटा-सिमटीक जोड़ल घर। मुदा क्रोध चढ़ले रहनि। फुरेलनि, जहन जीवैक सभ रास्ता बन्न भए रहल अछि तहन मरैयोक तँ ढेरी उपाए अछि, मुदा ओ तँ अपराधक श्रेणीमे औत। जीवैले अपराध कऽ कए कियो मृत्यु प्राप्त करैत अछि मुदा मृत्युले अपराध.....।
बीच रस्तापर आबि क्रोधक लहरिमे आरो ओझरा गेलाह। मुदा मनमे हुबा जगलनि। फुरेलनि, जहन विद्यालय अकाजक श्रेणीक सर्टिफिकेट दइये देलक तहन एक्केटा उपाए अछि जे िजनकर हाथ पकड़ि भार नेने छिअनि हुनक लग पहुँच कहिएनि जे अखने दुनू प्राणी हरिद्वारक रास्ता धड़ू। छोड़ू अइ घर-दुआरकेँ। ओतै कोनो मंदिरक पुजेगरी बनि जाएव आ शिवजीक शरणमे रहि हुनको महेशवाणी सुनब आ अपनो नचारी कहबनि। डमड़ूओ बजाएब आ हुनके जकाँ नचवो करब। तखने एकटा छुछुनरि दहिना भागसँ बामा भाग छुछुआति टपैत रहै कि भक्क खुजलनि। ताबे छुछुनरि ससरि कऽ बामा भाग पहुँच गेल। मनमे शंका भेलनि जे छुछुनरि पाएरमे काटि लेलक। झुकि कऽ तर्जनीक नहसँ टोबए लगलथि। छोटकी चुट्टीक बीख जकाँ बिस-बिसेलनि। मन मानि गेलनि जे छुछुनरि काटि लेलक। सोझ भऽ चारू भाग हियौलनि। काजक बेरि रहने सभ छिड़िआएल रहए। रास्ता खाली। विद्यालय दिशि तकलनि। सभ चलि गेल छलाह। मनमे एलनि छुछुनरिक बीख तँ अपनो झाड़ए अबैए। मनमे खुशी एलनि। मुदा लगले मन बदलि गेलनि। अपन बीख अपना बुते कहाँ झरैत अछि। तँ कि एेठाम पाएर पटकि कऽ मरि जाएव जतऽ मनतरिया भेटत ओतऽ जाँच करा लेब। ताधरि अपने मंत्रसँ काज चलाएब। मंत्र पढ़ैत... सैयाँ-निनावे....दू एक।
मंत्रकेँ चारि चरणमे वाँटि, एक चरण पढ़ि मुँहसँ फुकि दथि। अबैत-अबैत गामक सीमापर पहुँच गेलाह।
परिवारक पहिल पीढ़ीक विशारद पढ़ुआ काका। किसान परिवार। दस बीघा खेती। लाल काकी सेहो किसाने परिवारक। खेतीक सभ लूरि माए-बाप सिखा देने रहनि। किसाने परिवार देखि लाल काकीक पिता कुटुमैती केलनि। ओना पढ़ल बर पाबि दुनू प्राणीक हृदए जुरा गेल रहनि जे लछमीक संग सरस्वतीयो छथि।
जहिना एकटा सीमा टपने एसिया-रूरोपक दू तरहक सब कुछ भेटैत, तहिना पढ़ुआ काकाकेँ सीमा पर अविते बुझि पड़लनि। साओनक मेघ जकाँ मनमे टोपर बान्हि देलकनि। पानि जकाँ बुद्धि पसरि गेलनि। जीवित छी कि मुइल से होशे ने रहलनि। थुस दऽ बैसि रहलाह। मन पड़लनि अकाजक हएव। दुनिया तँ काज करैबलाक छी। कि मृत्यु सय्यापर सजि जाइ? जेहो कनी-मनी आशा पेंशनक होइत सेहो नहिये हएत। जिनगीमे कहियो जइ हाथसँ घुस नै देलौं ओतनो नै निमाहल हएत। मुदा ब्रत तँ जिनगीक पाशापर बैसल अछि। मन राँइ-बाँइ भऽ फाटि गेलनि। पहाड़क झरनासँ झहरैत पानि जकाँ नोर हृदए दिशि बहि गेलनि। हृदए पसीज गेलनि। मन पड़लनि अर्द्धागिनी। पेइतालीस बर्खसँ संग रहनिहारि, जे बृत्ति अछि, ओहिसँ हटल राखैमे ककर दोख भेल? कि हम हुनका साँझो-भोर पढ़ा नहि सकै छलिएनि। जँ से केने रहितौं तँ जिनगी वेलाइग किअए होइत जिनगीक सुख-दुख संगे भोगितहुँ। दू मिलि करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज। माटिक मुरूत बना घरमे छोड़ि देलिएनि। अपनो एते होश नै केलौं जे सए बर्खक जिनगीमे अधडरेड़ेपर कानून अकाजक घोषित कऽ देत। शेष जिनगी कोना चलत? अपनो नै छोटोटा स्कूल बनेलौं जइमे जिनगी भरि सेवारत रहितौं। निराश मनमे सासुर मन पड़लनि। वियाहमे जे जमाए रूसैए से कोन दादाक कमेलहाले रूसैए। मुदा सासु मन पड़ितहि मन मधुआ गेलनि। जँ लोक सासु लग नहि रूसि अपन मनोकामना पूरा करत तँ कतऽ करत? आरो मन पघिल गेलनि। हुनके देल ने कामधेनु पत्नी छथि। मुदा फेरि मनमे उठलनि जे रूसवो तँ कते रंगक होइए। बचकानी आ सियानी रूसव एक्के रंग कोना हएत। तत्-मत् करैत विचारलनि जे सियानी रूसवसँ शुरू करब आ जते निच्चाँ धरि सुतरि जाएत तते निच्चाँ धरि आबि अटकि जाएव। फुड़फुड़ा कऽ उठि घर दिस विदा भेलाह। चारू भर चकोना होइत जे कियो देखे नहि। मुदा से सुतरलनि। घरपर आबि हाँइ-हाँइ कऽ चौकीपर पड़ि गुम्हड़ि कऽ बजलाह- “ई घर मनुक्खक रहैबला छी, एम्हर मकड़ाक झोल लटकल अछि ते ओम्हर िवढ़नी छत्ता लगौने अछि।” कहि रूसि कऽ सिरहौनीपर मूड़ी रखि आँखि तकिते सुति रहलाह। बाड़ीमे काज करैत पत्नी अबैत देखि नेने रहनि। हँसुआ-खुरपी बाड़ियेमे छोड़ि आङन िदस बढ़लीह तँ किछु अवाज बुझि पड़लनि मुदा नीक नहाँति नहि बुझि सकलीह। ओना पढ़ुओ काका मुँह दाबिये कऽ, लोकक दुआरे बजैत रहथि। दोहरा कऽ फेड़ि तरसँ गुम्हरैत बजलाह- “एहेन-एहेन घरमे मरितो रहब तँ कियो खोजो-पुछाड़ि करैबला अछि।”
पढ़ुआ काकाक बात लाल काकी बुझि गेलखिन जे कतौ किछु भेलनिहेँ। दू बीघा हटल अबाजमे लालकाकी बजलीह- “एलौं।”
‘एलौं’ सुिन पढ़ुआ काकाकेँ सबुर भेलनि। लाल काकी मने-मन सोचैत जे पुरूखक लटारम्भ कि धमना लटारम्भ कम होइए जे लगले सोझराएत। अच्छा कनी बौस कऽ शान्त कऽ देवनि। माल-जाल अबैक बेरि अछि करजानमे उपद्रव करत। सएह केलनि।
पत्नीक अबाज सुिन पढ़ुआ काकाकेँ छाती दहलि गेलनि। नाङड़ि सुरैर कऽ विद्यालय घर धड़ौलक। कतौ के ने रहलौं। मन गरमेलनि बमकि कऽ बजलाह- “काल्हिये विद्यालय जा कऽ लिखि कऽ दऽ देबै जे आइयेसँ छुट्टीमे जा रहल छी। मन हुअए तँ मनिआर्डर कऽ रूपैआ पठा दिअए नइ होइ तँ नहि पठबए।” मुदा लगले मन थलथला गेलनि। जना माटि पानिमे मिलि भऽ जाइत। एना पाइयक खेल किअए भऽ रहल अछि। विद्यालयक शिक्षक होइक नाते एहि खेलकेँ किअए ने बुझि रहलौंहेँ। कि अर्थशास्त्र पढ़बक अभाव रहल?
लग अविते लाल काकी बजलीह- “चूड़ा भूजि, नोन-तेल-मरीच मिला कऽ रखने छी नेने आएव?”
लाल काकीक बात सुिन पढ़ुआ काकाक मन मचकी जकाँ झुलए लगलनि। मुदा आससँ दोसर दिस भऽ गेलनि। खिसिया कऽ बजलाह- “हूँ। चूड़ा-तूड़ा नै खाएब। रक्खू अपन चूड़ा-तूड़ा।”
मुस्की दैत लाल काकी उत्तर देलखिन- “हमरे छी अहाँक नै छी?”
पत्नीक बात सुिन मन सिहरि गेलनि। बेरूका सूर्जक रौद जकाँ पढ़ुआ काकाक गरमी कमलनि। बजलाह- “एकटा गप कहए चाहै छी?”
“भरि-भरि राति तँ गप्पे सुनलौं। अखन हाथ धुराएल अछि। हाथ-पाएर धोने अबै छी तखन अंडी तेलसँ घुट्ठियो ससारि देब आ गिरहो फोड़ि देब। मन हल्लुक भऽ जाएत। सदति काल कहैत रहै छी जे मोटर गाड़ी लऽ लिअ। अरामसँ जाएब-आएब। से हम्मर गप थोड़े सुनब। तइकालमे कहब जे मौगी-मेहरीक गप छी।”
लाल काकीक गप सुनि पढ़ुआ काकाक मन आगिमे पकैत भट्टा जकाँ असुआ गेलनि। लजबीजी जकाँ दुनू पीपनी सटि गेलनि। कल पड़ल रोगी जकाँ लाल काकी बुझि सहटि कऽ निकलि ठोकनो बाड़ी पहुँच गेलीह।
अखन धरि पढ़ुआ काकाक जिनगीक देल दस बीघा जमीन अन्हि। अपने जमीनकेँ सोलहन्नी बिसरि गेलाह। खाली गाछी-बँसवारिटा धियानमे रहलनि। किसानक बेटी लाल काकीकेँ खेतीक सोलहो आना लूड़ि। अन्नक खेती बटाइ लगा लेने छथि, पाँच कट्ठा चौमास आ गाछीक सेवा टहल अपने करै छथि। दूटा गाइयो पोसिये लगौने छिथि। जहिसँ सुभ्यस्त भोजन भेटैत। पक्का घर बना सब बेवसथो केनहि छथि।
हँसुआ, खुरपी, कोदारि आङनमे रखि लाल काकी झाड़ू लऽ कऽ आङन बहारि, कलपर पाएर-हाथ धोइ पानि पीवितहि रहथि कि मन पड़लनि पतिक रूसव। मन पड़लनि अपन जिनगी। जाधरि माए-बाप लग रहलौं बच्चा रहलौं, तेँ दुनू गोटेक इच्छा सदति काल यएह रहनि जे धिया-पूता कखनो कानए नहि। तहिना तँ सासुर एलाक बादो भेल। बूढ़ी (सासु) सदति काल कहैत रहै छलीह जे कनियाँ आङनाक मालिक स्त्रीगणे होइत छथि। तेँ आङनकेँ विवाहक मड़वा जकाँ सतरंगा फुल लटकौने रही। यएह मिथिलाक धरोहर छी। एहेन कनियाँक कमी नहि जे बेटा-बेटीसँ लऽ कऽ सासु-ससुर होइत पति धरिक दुखकेँ अपन दुख बुझि सती धर्मक पालन करैत एलीह- सावित्री, दमयन्ती। कड़ुआ कऽ किछु कहब उचित नहि। तहि बीच दरबज्जा परक अवाज सुनलनि। “हे भगवान, जानह तू।”
मने-मन पढ़ुआ काका संबंधमे सोचैत रहति। आमोक गाछी तेहन अछि जे एक तँ दू मासक भोजन, तहूमे सभ साल नहिये। गोटे साल मोजरबे ने करैत, तँ गोटे साल िबजलोकेमे मोजर जरि जाइत। गोटे साल बिहाड़ियेमे आमक कोन बात जे गाछो खसि पड़ैए। गोटे साल तेहन दबाइ रहैए जे मोजरेकेँ जरा दैत अछि। मोटा-मोटी पाँच बर्खपर दू मास आम खा कऽ जीबि सकै छी, वाकी.....?
दरबज्जापर लाल काकीकेँ अवितहि पढ़ुआ काकाक टूटल मन कलपि उठलनि। गोरथारीमे बैसि लाल काकी बजलीह- “पाएर सोझ करू।”
लाल काकीक बात सुिन, जहिना तारक कम्पन्नसँ वीणाक स्वर बनैत तहिना पढ़ुआ काकाक बोल निकललनि- “पाएर नै टटाइए, हृदयक व्यथा छी।”
पतिक बात सुिन फड़कि कऽ चौकीपर सँ उठि लाल काकी मधुआएल स्वरमे बजलीह- “साँचे स्त्रीगणसँ सुनै छी जे पुरूख नङर-कट होइ छथि। कुत्ता जकाँ सदति काल नाङरि टेढ़े रहै छन्हि।”
“जे बुझी।”
“तेँ कि स्त्रीगण अपन पतिकेँ मुइल कुकुड़ जकाँ कि टाँगमे डोरी बान्हि घिसिया कऽ बँसबीट्टीमे फेकि आओत।”
“चौकीपर सँ उठलौं किअए? डाँड़ सोझे बैसू। बामा हाथ तँ दुनू गोटेक एक्के वृत्त करैत तेँ बामा हाथपर हाथ रखि दहिना हाथसँ छाती सहला दिअ।”
पढ़ुआ काकाक व्यथा सुिन लाल काकीक मन कानि उठलनि। जाधरि ओछाइनोपर पड़ल रहताह ताधरि..... सत्ती साध्वी तँ.....।
चौकीपर बैसितहि पढ़ुआ काका आँखिमे आँखि मिला कहलखिन- “सब अंगक दूरी समान अछि। विधाताक बनाओल जिनगीक आधा भाग अहाँ छी।”
“अहाँ छी।”
पढ़ुआ काकाकेँ मन पड़लनि छठियारीक भार। आनन्द-मग्न होइत पत्नीकेँ कहलखिन- “भारी भूल भेल जे आहाँसँ भरि मन कहियो जिनगीक गप नहि केलौं। जेकर प्राश्चित अहाँ मुँहे सुनव।”
अवसर पावि लाल काकी पुछि देलखिन- “अहीं कहू जे आइ धरि कहियो ई बात वुझा देलौं जे दुनू परानी कते दिन जीबि। जते दिन जीबि ओते दिन कहेन जिनगी जीबि। राजा-दैविक कोनो ठेकान छै जे अहीं कहिया मरब आकि हमहीं कहिया मरब? अखन दुनू परानी जीवै छी मुदा इहो तँ भऽ सकै-ए जे एक गोरे जीबी आ एक गोरे मरि जाइ।”
पत्नीक बात सुिन उछलि कऽ चौकीपर सँ ठढ़ होइत बजलाह- “नोकरी छीनि निहत्था केलक मुदा तेँ कि मरि जाएव। जँ अन्हरा-नेंगरा सौंसे जिनगी बना गामक आगिसँ अपन रक्षा कऽ सकैए तहन......।”
४
जगदीश प्रसाद मंडल
कथा
अतहतह
तीन बजे भोरे झामलाल बैग नेने गरजैत चौकपर पहुँचल। ओना एकादशीक चान डुबि गेल रहए मुदा सुरूजक लालीसँ दिशा फरिच्छ हुअए लगल। झामलालकेँ चौकपर अबैसँ पहिने भुटुकिलाल िडबिया बारि चाहक चुल्हि पजारि नेने रहए। पाँच बजे चुल्हिमे आगि पजारैबला अढ़ाइये बजे पजारैक सुरसार करए लगल रहए। तेकर कारण भेल रहए जे पनरह दिनसँ राहड़िक दालिमे रोटी गुड़ि कऽ नहि खेने रहए। तै खातिर खाइये काल दुनू परानीक बीच झगड़ा भऽ गेल रहए। नहि खेने माटियेसँ चारि घुस्सा दाँतमे लगा, कुड़ुड़ कऽ झामलाल दोकानपर पहुँच बाजल- “भुटुकि भाय, रौतुका सोठियाएल छिअ। खेवाक िकछु नहि रखने छह?”
“अच्छा पहिने अधा-अधा कप चाह पीवि लिअ। जहिना अहाँ सोठियाएल छी तहिना हमहूँ छी। आन चीज कि भेटत। बिस्कुट सबमे कोनो लज्जैत रहै छै। मुदा छालही अछि।”
“चलह हुन्डे दाम कहि दहक?”
“सबटा अहीं लऽ लेबै आ अपने?”
“पाइ हम्मर आ खाइमे दुनू गोटे अधा-अधी।” अधा-अधी सुनि भुटुकिलाल उछलि कऽ बाजल- “अधा किलोसँ बेसिये हएत, मुदा अहाँ एक्के पौआक पाइ दिअ।”
“एहनो बुड़िबक जकाँ कियो बजैए। बैग खोलि कऽ देखि लहक। एक किलोक पाइ आ सवा सौ रूपैया उपरसँ देवह। खाली भरि दिन संग पुरह।”
“हम तँ पेट-बोनिया आदमी छी भाय। जतऽ पेट भरत ततऽ रहब।”
“चौकक खर्च हम देलियह आ मालिक तू भेलह। मुदा पहिने खा लाए किएक तँ भरि दिन बहऽ पड़तह।”
अधा-अधा छालहीमे सँ उठा-उठा मुँहोमे दैत आ गप्पो करैत “टटके छालही बुझि पड़ै छह।”
“कौल्हुके छी।”
“छालहीक रस तँ तेसर दिनसँ बनव शुरू होइ छै। मुदा टटकोक अपन रस छै। आइ गामक झंडा गारि देलियह।”
“से की, से की?” बगुला जकाँ मुँह उठा-उठा भुटुकिलाल झामलालसँ पुछलक। पानि पीवि झामलाल बाजल- “हमरा तँ बुझिते छह जे बैग आ मोटरे साइकिलमे कारोबार अछि। मुदा कहुना-कहुना पाँच लाख पीटिये दैत हेबइ। बान्हल तँ अछि नहि। दसटा कम्पनीक एजेंसी रखने छी जेकर जाल सगरे देशमे छै। एते पहुँच रखने छी। जहिना आइ खच्चरपुर बलाक खच्चरपनी झाँड़ि मुता-मुता भरेलौं तहिना ओकर आगि-पानि कथा-कुटुमैतियो ढाठि देबइ। तइले नअ पड़े कि छह।”
“ठीके कहै छी भाय, एहेन-एहेन अगिलह सभकेँ एहिना हुअए।”
चाह पीवि झामलाल बाजल- “भाय, अइपर सँ जे पान सए नम्बर पत्ती देल पान खइतौं तँ आरो बुलन्दी आबि जइतै।”
“भाय, पान तँ तेहन खुआ दैतौं जे जेहेन बुलन्दी चाही तहूसँ सातबर बेसी आबि जाइत। मुदा पानबला छौड़बा अछि मौगियाह। बसन्ती नीन छोड़ी औत। सात बजेसँ पहिने थोड़े औत। ताबे सुपारी आ तमाकुलक पत्ती दऽ काज चला लिअ।”
“तोहूँ भारी इसकी छह। आइ तोरे दरबारमे आसन जमेहब। जना-जना तू कहबह तेना-तेना करब। मुदा एकटा बात अखने अइ दुआरे कहि दइ छियह जे बिरड़ोमे झंडा उड़िया देलियै मुदा ओकरा तँ बाँसमे लगा जमीनमे गाड़ए पड़त की ने?”
“अहाँ खाली बैगक ताला खोलि कऽ रखने रहू एक्के घंटामे चौकक चकचकी देखा दइ छी।”
उतसाहित भऽ झामलाल- “भाय, तोरे सबहक असिरवादसँ दूपाइयो देखै छी आ दूटा लोको लगमे रहै छी। मुदा कमेनाइये-खेनाइटा तँ जिनगी नइ ने छिऐ। फेरि दोहरा कऽ सुन्दरपुरमे जन्म लेब। तेँ जहिना गामक झंडा अकासमे उड़िआएल तहिना बचबैले जे करए पड़त, से करब।”
“अच्छा छोड़ू अगिला बात, अखैन की करब से विचारू।”
“तोहीं बाजह?”
“दूटा चाहबला छी। दूटा पानबला अछि। तीनटा मजरूटी अछि। भरि दिनक खर्च उठा लिअ।”
“मजरूटी की कहलहक?”
“मैजरिटी, एक मजरूटी गाँजा पीआकक अछि। दोसर ताड़ी-पोलिथीनबला अछि आ तेसर इंग्लीस पीआकक अछि।”
“तीनूमे कते खर्च हेतह?”
“अहाँ खाली बैगक मुँहमे हाथ देने ने रहिऔ। सब गप ने कऽ लेब।”
“सब तँ फुट-फुट बैसत तखन रौतुका बात कहबै कना?”
“मामूली लोक सबहक मजरूटी छी। सब कलाकार सबहक छी। जखने चाहक दोकानपर औत आ भरि दिनक मौज-मस्ती गछि लेबइ तखने चौकक ताल देखि लेबइ।”
“किछु कहबहक नइ?”
“कहबै कि मंत्र देबइ। दुइयेटा मंत्र दैक काज छै। अकासमे झंडा उड़ि गेल आ खच्चरपुरबलाकेँ सभ खचड़पनी घोंसारि देलिऐ। माटि दइ छिऐ जे जतऽ फड़िअबैक मन होय फड़िया लिअ हमरा समाजसँ।”
घंटे भरिक पछाति चौकक जुआनी आबि गेल।
क्रमश:
१.दुर्गा नन्द मंडल- बुढ़िया फूसि २.जितेन्द्र झा- नव विवाहिताक लेल नव उमंग लाबए एहन मधुश्रावणि
३. बेचन ठाकुरक नाटक- बेटीक अपमान आगॉं- ४. नन्द विलास राय- कथा- चौठचन्द्रक दही ५.दुर्गानन्द मंडल- शिव कुमार झा टिल्लू जीक लिखल खोंइछक लेल साड़ी- कथापर दू शब्द
१
दुर्गा नन्द मंडल
बुढ़िया फूसि
किछु कहैत संकोच नहि, लाजो नहि होइत अछि जेना निर्लज्ज भऽ गेल छी। आँखिक पानि जेना सुखि पड़ल हो। एहन बुझना जाइत अछि जेना द्वापरेसँ अथार्थ ६३जन्म पहिनहिसँ फूसिक खेती करैत आिव रहल छी, निश्तुकी बाप-पुरखा सेहो एहेने सिद्धस्त खेतिहर हेताह। मुदा उपजा ताहि समएमे कम होइत छल, आ आइ बुझू जे बोड़े कट्ठा फूसि सभठाँ उपजि रहल अछि। आ सभ सभ दिन सभठाम फूसिये फूसि बाजि रहल हो। यर्थातोमे २६जनवरी हो या १५अगस्त, एहनो राष्ट्रीय पावनिक सुअवसरोपर बाजव हमरा लोकनि अपन जन्म सिद्ध अधिकार बुझैत छी। सरकारी वा कोनो गैर सरकारी कार्यालय किएक ने हो, राष्ट्रक सम्मानक अढ़मे अपमान करब हमरा लोकनि नहि विसरि पवैत छी। िसया लैत छी बेस नम्हर-चारि मीटर खादीक एकटा डलगर कुर्त्ता, एक गोट पैजामा आ एकटा गाँधी टोपी। आध सेर सुतरी दू जिस्ता सभ रंगक कागत आ कागतेक बनल प्लेट। उज्जर आ ईंटा रंगक बुकनी, पुरने झंडाकेँ साफ-सुथरा कऽ किछु फूल लऽ सए-पचास झूठाक समक्ष झंडोतोलनक वाद छोड़ए लगैत छी, फूसिक गपौड़ी। अनेने व्यर्थ- किएक तँ आत्मासँ एहेन कोनो गप्प नहि जे स्वीकार करैत हो, मुदा अनेरे ठोर पटपटा-पटपटा अपनाकेँ सूच्चा देश भक्त, कर्मठ, सुयोग्य, इमानदार पदाधिकारी वा कर्मचारी सावित करए लगैत छी- फूसिक बखारी खोलि दैत छी। एकसँ बढ़ि कऽ एक फूसि बजैत छी झुट्ठा सभ थोपड़ी बजवैत अछि। उहो थपड़ी पारए लगैत अछि। फूसिए चन्द्रशेखर आजाद, गाँधी, नेहरू, भगत सिंह, उधम सिंह, सुभाष आदिक नाम लऽ बच्चा सभकेँ फूसलाबए चाहैत छी। फूसिये राष्ट्रक विकासक लेल छिट्टाक-छिट्टा सप्पत किरिया खाइत छी। किरिया खाइत-खाइत ने तँ पेट भरैत अछि आ ने मुँह दुखाइत अछि। एकरो एकटा कारण अछि जे हमरा लोकनि पुस्तैनी झुट्टा छी। सालमे तीन-चारिटा एहेन पावनि तँ जरूर अबैत अछि जे भरि मन फूसि बजैत छी से कोनो की चोरा कऽ नै यौ िचकरि-िचकरि फूसि बजैत छी। आ फूसियाही सभ सुनैत रहैत अछि।
मुदा जखन सेबै-बुनियाँ रूपी प्रसादक तलक लगैत अछि तखने फूसिक सप्पत खा विराम लैत अछि। तत्पश्चात बुनियाँ-भुजिया खा तृप्तिक ढेकार लऽ उगरलाहा बुनियाँ-भुजिया रूमालमे बान्हि अपन-अपन जन्म स्थानपर अबैत छी।
कहूँ जे एहेन तरहक जे व्यर्थ बातक संभाषण करब कहाँ तक उचित? राष्ट्रकेँ ठकब कि अपने ठकाएव नहि थिक। कि फूसि बाजि अपने आपकेँ नहि परतारि रहल छी? राष्ट्र ध्वजक समक्ष लेल यएह सभटा सप्पत साँच अछि आकि बुढ़िया फूसि? सत्ते- ई थिक बुढ़िया फूसि।
२
जितेन्द्र झा
नव विवाहिताक लेल नव उमंग लाबए एहन मधुश्रावणि
बबिता ठाकुर दिल्लीसँ मधुश्रावणी पुजऽ अपन नैहर जनकपुर आएल छथि । भोरसँ साँझधरि पुजेमे अपस्याँत बबिता मिथिलाक सँस्कृति आ परम्परासँ निकजकाँ भिजबाक अवसर भेटल कहैत खुशी व्यक्त करैत छथि ।
तहिना रीमा झा सेहो काठमाण्डूसँ जनकपुरमेँ आविकऽ मधुश्रावणी पुजलनि । एक निजी च्यानलमे समाचारवाचिका रीमा एहि पावनिसँ आत्मीयता जुडल बतबैत छथि । हिनके सभजकाँ बहुतो मैथिल ललना अपन व्यस्त जीनगीक पन्द्रह दिनमे मधुश्रावणीक आनन्द उठौलनि । पढाइ लिखाइ आ पारिवारिक झन्भटिके कतियबैत नवविवाहितासभ गीत नाद आ खिस्सा पिहानीक आनन्द उठौलनि मधुश्रावणी पावनिमे ।
साओन महिनाक रीमझिम वर्षा आ ताहिमे सखी बहिनपा सभक सँग फुल लोढबाक आनन्द शायदे कोनो आन संस्कृतिमेँ होइक ।
नवविवाहिता मैथिल महिलासभक जीवनमेँ नव रोमाञ्च लऽ कऽ आएल मधुश्रावणी । लोककथा आधारित ई मधुश्रावणी वैवाहिक जीवनके एकटा अदभुत आ हृदयस्पर्शी शुरुवात बनल अछि । नवविवाहिता जोडीके एक दोसराके बुझबाक परखबाक अवसर सेहो जुडा दैत अछि ई पाबनि ।
‘पावनि पूजू आज सोहागिन प्राण नाथके संग हे ।
कारी कम्बल झारि गंगाजल काजर सिन्दुर हाथ हे ।
चानन घसू मेहदी पिसू लिखू मैना पात मे ।
पावनि साजी भरि भरि आनल जाही जुही पात मे ।
कतेक सुन्दर साज सजल अछि लिखल मैना पात मे । ’ (पावनिक गीत )
ओना नोकरिहारा वरसभक लेल मधुश्रावणी पावनि फिक्का रहल । कनिञाक संगहि कोहवर घरमेँ बैसकऽ काम दहन आ गौरी महादेवक विवाहक कथा सुनबाक अवसर अमेरिकामे रहल प्रमोद झाके नहि भेटलनि । जनकपुर पिरडियामाइस्थानक प्रमोद वितलाहा अषाढ महिनामे परिणय सुत्रमे बान्हल छलाह । गामसँ कोशो दूर रहल कनिञासभ भलेहि पुजा पुजऽलेल नैहर पँहुच गेलि होथि मुदा वरसभके त मन मसोसिएकऽ रहऽ पडलनि ।
मिथिलामे पण्डिताइयक प्रथाके विपरीत ई पाबनि महिलेद्वारा पुजाओल जाइत अछि । समाजक वा घर परिवारक प्रौढ महिला पवनैतिके ई पाबनि पुजबैत छथि ।
ई पाबनि नवकनिञा अपन नैहरमे पुजैत छथि तेँ विवाहक बाद सासुरक जिम्मेवारीवहनके दायित्वक बीच नैहरक मनोरन्जन सुखदायी भऽ जाइत अछि । पुजावास्ते प्रयोग होबऽबला सभ समानसभ कनिञाक सासुरेसँ अबैत छैक, पुजा नैहरमे मुदा पुजाक वस्तु सासुरक ।
मधुश्रावणी पुजा कोहवर घरमेँ करबाक प्रचलन अछि । वर कनिञाक नितान्त व्यक्तिगत घर कोहवरके मधुश्रावणीलेल निक जकाँ सजाओल जाइत अछि । विवाहक बाद मधुश्रावणीमे वर कनिञा कोहवरके श्रृंगार बनि जाइत अछि ।
‘कोवर कोवर सुनियै हे प्रभु कोवर कोना होइ हे ।
पिसु पिठार लिखू जल पुरहर कोबर एहन होइ हे ।
ताहि कोवर सासु पलंगा ओछाओल ओलरल धीया जमाय हे ।
घुरि सुतु फिरि सुतु ससुरक वेटिया अहाँ घामे गरमी बहुत हे ।
हम नहि घुरबै अहाँक बोलिया पर घर बाज कुवोल हे । ’ (कोबरक गीत )’
साओन इजोरिया पक्षक तृतीया दिन सिन्दुरदान होइत अछि । ई सिन्दुरदान अहिवातक तेसर सिन्दुरदान होइत अछि । एहिसँ पहिने विवाहक राति आ चतुर्थीक भोरमेँे सिन्दुरदान भेल रहैत छै । मधुश्रावणी विवाहके पुर्णता देबऽबला पाबनि बनि गेल अछि ।
मिथिलामेँ विवाहपुर्व वर कनिञा एक दोसरासँ विल्कुल अन्चिन्हार रहैत अछि एहन मे मधुश्रावणी पावनि आ साओनक महिना सामीप्यतालेल सहज अवसर जुटा दैत अछि । कतबो व्यस्त जीवन होइतो प्रायः नवदम्पत्ति एहिमेँ संगहि कथा सुनैत छथि एहिसँ सामाजिक आ पारिवारिक समरसता बढबामेँ मदति भेटैत अछि ।
मधुश्रावणीमेँ सासुरसँ पठाओल गेल दीपक टेमी दगबाक चलन अछि । एहि चलनके सभ गोट अपने तरहसँ देखैत अछि । टेमीक फोँका सौभाग्यक प्रतीक मानैत अछि मैथिल महिला ।
शीतल बहथु समीर, दही दिश शीतल लेथु उसासे ।
शीतल भानु लहुक लहु उगथु शीतल भरल अकासे ।
शीतल सजनि गीत पुनि शीतल शीतल विधि व्यवहारे ।
शीतल मधुश्रावणी विधि हो शीतल वसन श्रृंगारे ।
शीतल घृत शीतल वर वाती शीतल कामिनी आँगे ।
शीतल अगर सुशीतल चानन शीतल आबथु माँगे ।
शीतल कर लए नयन झपावह शीतल देलह पाने ।
शीतल हो अहिवात कुमर संग शीतल जल अस्नाने । ’ (टेमी कालक गीत)
संस्कृतिविद्सभ मिथिलामेँ मुगल शासकके आक्रमणके बाद पतिव्रताक रक्षाके लेल एहन चलन शुरु भेल कहैत छथि ।
बदलैत समयक प्रभाव मधुश्रावणी पावनि पर सेहो देखा रहल अछि । फुल गुलसँ भरल गामघर आब सुनसान प्राय भऽ रहल अछि । एहनमेँ जाही जुही, अगर तगर, नीम दाडिम आ मेहदीक पातसभ सनके वस्तु भेटब कठिन भऽ जाइत अछि । शहर बजारमे रहनिहार पवनैतिन सभके एहन वस्तुक अभाव खटकल करैत छन्हि । फुल लोढीलेल सेहो आव फुलवारी सभ नहि रहि गेल अछि जे रंग विरंगक फुल तोरि सखी बहिनपा डाला सजेबाक प्रतिस्पर्धा कऽ सकथि ।
३
बेचन ठाकुरक नाटक-
बेटीक अपमान आगॉं-
अंक दोसर
दृश्य पहिल-
(स्थान- महेन्द्र पंडितक आवास। महेन्द्र पंडित दीपक चौधरीक नङोटिया संगी। दीपक अपन संगी महेन्द्रक ओहिठाम जा रहला अछि।)
दीपक- महेन्द्र बावू, यौ महेन्द्र बाबू, महेन्द्र बाबू।
महेन्द्र- हँ, हँ आबि रहल छी। कने बरतन गढ़ैमे हाथ लागल अछि। बैसू, तुरत अएलहुँ।
(दीपक बैस जाइत छथि। शीध्र महेन्द्रक प्रवेश होइत छन्हि।)
महेन्द्र- जय रामजी की दोस।
दीपक- जय रामजी की।
महेन्द्र- कहु दोस, आइ केम्हर सूर्य उगलैए, कहु कनिया-बहुरिया ओ धिया-पुताक हाल चाल।
दीपक- दोस, अहाँ एखन धरि नहि बुझलौहुँ। कनिया हमर पौरे साल स्वर्गवास भए गेली। खूनी बेमारी भए गेल छलन्हि। मुदा धिया-पुताक कुशल बढ़िया अछि।
महेन्द्र- बेटा-बेटी कए गोट अछि दोस?
दीपक- कहॉं कोनो बेसी अछि। मात्र तीनिटा बेटे अछि बेटी नहि।
महेन्द्र- तहन तँ जीतल छी दोस। अगबे चानीए अछि।
दीपक- दोस अहॉंकेँ?
महेन्द्र- हमहुँ कोनो बेजाए नहि छी। हमरो चारिटा बेटे अछि।
दीपक- तहन तँ अहॉंकेँ सोने अछि।
महेन्द्र- आब कहु दोस, केमहर-केमहर पधारलहुँ अछि।
दीपक- यएह, बड़का बेटा मोहनक लड़िकीक जोगारमे। अपने गाम-घरमे वा आस-पासमे कोनो नीक लड़कीक नहि अछि?
महेन्द्र- यौ लड़िकीऽ......, लड़िकीक बड़ अभाव देखि रहल छिऐक।हमरा गाममे बेसी लड़िके देखाइत अछि। चौधरी टोलमे एक दिन कियो बजैत छलाह जे हमरा टोलमे नामो लए बेटी नहि अछि। किनको एगो बेटा, किनको दुगो, किनको पाँच गोट।
दीपक- ई तँ समस्या बुझाए रहल अछि दोस। खाइर देखैत छी अपन मामा गाममे जा कऽ। बेस तहन, जय राम जी की।
महेन्द्र- जय रामजी की।
(दीपकक प्रस्थान)
पटाक्षेप
दोसर दृश्य-
(स्थान- सुरेश कामतक मकान। सुरेश कामत दीपक चौधरीक मामा छथिन्ह। दीपक सुरेश ओहिठाम पहुँच रहला अछि। दीपकक ममिऔत भाए सोनू छथि।
दीपक- मामा, मामा, सोनू, सोनू, मामी, मामी।
(दीपक सोर पाड़ैत-पाड़ैत अन्दर घुसैत छथि। फेरि शीध्र मामाक संग प्रवेश। दुनू कुर्सीपर बैस कऽ लड़िका-लड़िकीक संबंधमे गप-सप्प करैत छथि।)
सुरेश- कहऽ भागिन, पहिने घरक हालचाल।
दीपक- मॉं सरस्वतीक किरपासँ आ अपने सबहक चरणक दुआसँ सब ठीके अछि मुदा एक गोट गड़बड़ अछि।
सुरेश- से की भागिन?
दीपक- से यएह जे कनियाक मूइलाक उपरान्त हमरा भनसा-भातमे, घर-गृहस्थीमे बड़ कष्ट होइत अछि। कोनहुँ लड़िकीक सुर-पता अछि मामा श्री अपन बड़का बौआ लेल।
सुरेश- हँ हँ, बलवीर चौधरी एक दिन बजैत छलाह जे हमरा एहि बेर एक गोट कन्यादान केनाइ अछि।
दीपक- तहन बुझियौक ने मामीश्री। लड़िकीकेँ भऽ गेलैक वा नहि। लड़िकी अहॉं देखने दिऐक मामा?
सुरेश- हँ, हँ, जरूर देखने छिऐक। लड़िकी तँ सएमे एक अछि।
दीपक- मामाश्री, कने हुनका एहिठाम जा कऽ बुझियौक।
सुरेश- बेस भागिन, अहॉं घर जाउ। जदि लड़िकीकेँ नहि भेल होएतन्हि, तहन ई कुटमैती अवस्स कराए देब।
दीपक- पार्टी केहेन अछि मामा?
सुरेश- पार्टी गरीबे जकाँ अछि। ओना पहिने हमरा बलवीर चौधरी ओहिठाम जाए दिअ तहन ने।
दीपक- बेस, जाउ मामाश्री।
(सुरेशक प्रस्थान)
पटाक्षेप-
क्रमश:
४
नन्द विलास राय
कथा-
चौठचन्द्रक दही-
आइसँ चौठचन्द्र पावनि चारि दिन अछि। चारिम दिन तँ पावनि हेबे करत। तेँ ओइ दिन दही नै पौरल जाएत। सोमनी जन्मअष्टमीसँ पहिनहि गुरकी हटया बनगामासँ तीनटा छाँछी आ दूटा मटकुरी किन कऽ अनने छलि। सोचलक जे पहिने कीनलासँ बासन सस्ता हएत मुदा से नहि भेल। पॉंचटा माटिक बासन पच्चीस टाकामे भेल। अपना ते नै महिसे छल आने गाइये। सोमनी सोचलक अपना गाए-भैंस नहि अछि तँ की हेतै सौंसे गाममे तँ गाइये-भैंस अछि। की हमरा दस गीलास दूध नै हएत। जौं दूओ-दू गिलास कऽ कए पॉंच गोटे दूध दऽ देलक तैयो पॉंचटा बासनमे दही भऽ जाएत। मरर लेल खीर रान्हैले भजैत ओहिठामसँ एक्को गिलास दूध लऽ आनव केनाहिओ कऽ पावनि कऽ लेब।
सोमनी आ मंगल दू परानी। मंगल दिल्लीमे दालि मिलमे नौकरी करैत। सोमनी गाममे खेती-बाड़ीक काज करति। सेामनी-मंगलक परिवारमे पॉंच गोटे छल। सोमनी, मंगल, बेटा राधे आ बेटी फूलिया, गुलबिया। पॉंचो परानीक नाओपर सोमनी पॉंचटा बासनमे दही पौर चौठी चॉंद महराजकेँ हाथ उठबैत छलि। सोमनी एक बीघा खेत छल। एकटा बरद रखने छल। गामेमे बीतबासँ हरक भॉंज लगौने रहए। नूनू बावूक दस कट्ठा खेतो बटाइ करैत छलि। अपन खेतीक वाद हर बेचीयो लैत छलि। जहिसँ किछु ढउआ सेहो भऽ जाइत छलै। मंगल तँ दिल्लीएमे कमाइत छल तेँ बीतबा सोमनीओक खेतमे हर जोति दैत छल। बीतबाकेँ अपन डेढ़ बीघा खेत छल आ एक बीघा बटाइ करैत छल। तँइ बीतबा सेामनीओक खेत जोति दैत छल। बीतबाकेँ हर जोतैक बदलामे सोमनी बीतबाकेँ खेत रौपि दैत छलि। दुनू गोटेमे मिलानी खुब रहए।
काल्हि चौठचन्द्र छी मुदा आइ सॉंझ धरि सोमनीकेँ कियो एक्को गिलास दूध नहि देलक। जे ओ कोनो बासनमे दैत। ओकर मन घोर-घोर भऽ गेल। ओ बड्ड खौझा गेलि। अपना आंगनमे खौंझाइत बजलि- “हमर बेगरता लोककेँ नै हेतै। जँ गाममे रहब तँ आइ ने काल्हि हमरो बेगरता लोककेँ पड़बे करतै। तहिया मन पाड़ि दैबनि।” माएकेँ खौंझाइत देखि बेटा राधे बाजल- “माए गै चून चून बाबा जे मरल रहथीन तँ हुनकर भोजमे देखलिऐ पाउडरक दही पौरने। चौकोपर दैखै छीऐ जइ चाहबलाकेँ दूध सधि जाइए तँ पाउडरेकेँ घोड़ि कऽ चाह बनबैत अछि। कह ने तँ चौकपर सँ आधा किलो पाउडर आनि दै छिओ। ओकरा खूब कऽ औंट लिहेँ आ बासन सभमे दही पौर लिहेँ।”
बेटाक बात सुनि सोमनी बाजलि- “पोडरबला दूधक दहीसँ पावनि कोना हएत।”
राधे बाजल- “जँ गाए, भैंसक दूध नै भेटलौ तँ की करबीही। पाउडर तँ गाइये महिसिक दूधकेँ बनैत अछि।”
सोमनी गुन-धुन करैत बजली- “ठीक छै। जँ चौठी चॉंद महराज अपना गाए-भैंस नहि देने छथीन तँ पोडरेक दूधसँ पावनि करब। जो भुटकुनक दोकानसँ आसेर नीमनका पाेडर नेने आ। आ हे दू टाकाक जोरनले दहीओ लए लिहेँ।”
राधे चौकपर विदा भेल। ओतएसँ पाउडर बला दूध नेने आएल। ओइ दूधकेँ औट दही पोरलक।
आइ चौठचन्द्र छी। भोरे सोमनी राधेकेँ लोटा दऽ कऽ बीतबा ओहिठाम दूध आनेले पठौलक। बीतबा आइ बैसले अछि किएक तँ पावनि छीऐ। राधेकेँ देखिते बाजल- “लोटा राखि दही दूध खीर रन्हैले हम तोरा माएकेँ गछने छेलिओ मुदा अखन नै हेतौ। सॉंझमे लऽ जहिहेँ।”
सॉंझखन जखन राधे दूध आनैले गेल। बीतबा चाहबला गिलाससँ एक गिलास दूध देलक। दूध देखि सोमनी दुखी भऽ गेलि। सोचलक जे एतबे दूधसँ खीर कोना रान्हल जाएत। मुदा कोनो उपाए नहि। तेँ ओही दूधमे पानि मिला खीर रान्हलक।
सोमनी चौठी चाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलक- “हे चौठी चॉंद महराज जँ हमरा दरवज्जापर एकटा नीक लगहैर गाए भऽ जाएत तँ अगिला साल एक छॉंछी दही आओर देब।”
क्रमश:
५
दुर्गानन्द मंडल, निर्मली
शिव कुमार झा टिल्लू जीक लिखल खोंइछक लेल साड़ी- कथापर दू शब्द-
कथा पढ़ल िचन्तन कएल, बुझना गेल कथा यथार्त परख अछि जेना कथाकार अपनहि एहि स्थितिसँ गुजरल होनि। यदि अनुभव हमर सत्य तँ सार्थकता शत्-प्रतिशत।
एक कात कथाकार विद्यापतिक भूमिकामे छथि मनमे सिनेह छन्हि जे माए कने ओ भूमिका देख लेती तँ हमरा नीक लागत। एम्हर माए ओलतीमे गुम-सुम बैसल छलीह कारण महाअष्टमीक राति एक टूक अखड़ साड़ी नहि रहलाक कारणे ओ भगवतीक खोंइछ काेना भरती? ई जािन बालक मातृत्व प्रेमवश बावूजीक साखपर कपड़ाबला महाजनक दोकानसँ एकटूक साड़ीक पन्नी माएक हाथमे थमा दैत छथिन। माएक टूटैत विश्वास मायक रूपमे नहि अपितु बेगुसरायक बेटी रूपमे स्पष्ट होइत अछि। हाथक चुड़ी टूटव, काँचक किछु कण माएक हाथमे गड़ब आ टप-टप शोनितक आपादान- कविजीक साखपर दाग सदृश्य बुझना गेल। मुदा सत्य जानि अपन अपराध बोधक अनुभव कऽ माए बैस बालककेँ कोरामे लऽ कऽ सिनेह सागर अविरल धारा प्रवाहित केलनि। सारत्व स्वरूप स्वामीक अर्थात कथाकारक बावूजीक आनल लाल रंगक सिफनक सोहनगर साड़ी नहि पहिर बालकक आनल सुती साड़ीसँ भगवतीक ख्ाोंइछ भरब, प्रभु प्रेमक एकटा अलग पराकास्ठाक परिचएकेँ पाठक बन्धु नहि बिसरि सकताह। कथाक सार्थकतापर इजोत छोड़ैत अछि। जे निश्तुकी एकटा माजल कथाकारक कथा बुझना जाइछ। मुदा जँ मॉं.... क जगह कोनो आन उपयुक्त, समुचित शब्दसँ सजवितथि तँ कथामे मैथिली समृद्धता आरो स्पष्ट होइत। शेष सभ चिकनहि चिक्कन। धन्यवाद- ।
१.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, जमशेदपुर
समीक्षा- मैथिली चित्रकथा २.जितेन्द्र झा- नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल –ग्लानि
३.शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ समीक्षा- मिथिलाक बेटी (नाटक)
१
शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, जमशेदपुर
समीक्षा
मैथिली चित्रकथा
आठ वर्ख पहिने ‘मैथिली’ भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे शामिल कएल गेल। कतिपय हर्षित भेलहुँ जे हमरो भाखाकेँ वैधानिक अस्तित्व देल गेल। मोने-मोन ओहि सभ गोटेक प्रति कृतज्ञता आ मंगल कामना करैत छलहुँ जनिक प्रयाससँ ई काज भेल। मुदा! एकटा कचोट अर्न्तमनकेँ हिलकोरि रहल छल जे आगॉं की हएत? अपन भाखाक भविष्य नीक नहि देखि रहल छलहुँ।
एहि व्यथाक सभसँ पैघ कारण छल हमरा सबहक भाषा साहित्यकमे कोनो क्रांतिक आश नहि नजरि आवि रहल छल। वर्तमान पीढ़ी मातृभाषासँ दूर भऽ रहल छलाह। अगिला पीढ़ीक गप्प की कहू? कतेक नेनाकेँ ओलती, चिनुआर, थान, छान-पग्घाक अर्थ बूझल अछि? जौं कोनो अभिभावकसँ पूछैत छी जे नेनासँ अपन वयनामे गप्प किए नै करैत छी तँ जवाब भेटैत अछि जे स्कूल जाएत तँ हिन्दी आ अंग्रेजी नहि बूझत तेँ अखनेसँ सिखा रहल छी। नेनोमे चेतना नहि किएक तँ वाल-साहित्य मैथिलीमे लिखले नहि गेल। जौं किछु अछि तँ ओकर अर्थ कतेक नेना बूझैत छथि। महान लेखक वा कविक श्रेष्ठ भाषामे लिखल रचना हम नहि बूझैत छी तँ हमर धीया-पूता कोना बूझतथि? एहि मध्य मैथिलीमे विदेह-सदेहक पदार्पण भेल। नव रूप, नवल सोच आ सकारात्मक दृष्टिकोणक संग। मौलिक विन्दुपर रचना होअए लागल। उपेक्षितकेँ नव आश भेटल। साहित्य आन्दोलनक एकटा परिणामक चर्च हम पाठकसँ कऽ रहल छी- मैथिली चित्रकथा- श्रुति प्रकाशन दिल्ली द्वारा विदेहक सौजन्यसँ ई पोथी सन् २००८मे बहराएल। एहि पोथीक लेखिका छथि श्रीमती प्रीति ठाकुर। हिनक ई दोसर रचना थिक। विषय पूर्णत: नव, बाल साहित्यक चित्रकथा। हम एहिसँ पूर्व एहि विषयक पोथी मैथिलीमे नहि देखने छलहुँ। एकरा रचना नहि कहल जा सकैछ, किएक तँ एहिमे कोनो साहित्यक सृजन नहि, लोक कथा आ जन-श्रुति जे मिथिलामे पहिनेसँ सुनल जा रहल छल ओकरा चित्रक संग चर्च कएल गेल अछि। एहि प्रकारक जन श्रुति गाम-गाममे बूढ़-पुरानक मुँहसँ बाजल जाइत छल मुदा आव विलीन भऽ रहल अछि। ओहि विलुप्त विषयपर चित्रकथा लिखि प्रीति जी बड्ड नीक काज कएलनि। एहि पोथीमे जे विशेष आ नव सकारात्मक पक्ष देखलहुँ ओ अछि- विषयक आ कथाक चयन। सम्पूर्ण मिथिला एहिमे समाएल छथि। सभ जाति समाजक लोक-कथाक चित्रण कएल गेल अछि। मोती दाइ कथामे रजक जातिक निष्ठाक चित्रण तँ राजा सलहेसमे दूधवंशीक भावनाक व्याख्या। मिथिला दरवारक वोधि-कायस्थक गंगा लाभ मनोरम लागल। बहुरा गोधिन आ नटुआ दलाल बेगूसरायक लोक कथा थिक। पहिने लोकक मानसिकता छल जे बेगूसरायक लोक मैथिली भाषी नहि छथि। हमरो मर्म होइत छल किएक तँ हमर मातृक बेगूसरैए जिलामे अछि। एहि कथाकेँ पढ़ि तिरहुतिया आ दछिनाहाक भेद हियासँ मेटा गेल।
हमरा सबहक समाजक एकटा उपेक्षित जाति छथि- मुसहर। मुसहरोमे दूटा आदर्श पुरूष भेल छलाह दीना आ भद्री। ओहि दीना भद्रीक कथा बड्ड नीक लागल। पहिने बूझैत छलहुँ जे तपस्वी वनवाक लेल वौद्धिकता आ भौतिकता पैघ मापदंड थिक, मुदा आव ई भ्रम दूर भऽ गेल। एहि प्रकारे बहुत रास कथाक चित्रण कएल गेल अछि।
एकबेरि आदरणीय जगदीश प्रसाद मंडल आ बेचन ठाकुर जीक रचना पढ़ि हम लिखने छलहुँ जे ‘विदेह मैिथली साहित्य आन्दोलन’ मैथिली पर लागल जातिवादी कलंककेँ धो देलक। जौं ई गप्प सत्य अछि तँ ओहिमे एहि पोथीक भूमिकाकेँ नहि नजरि अंदाज कऽ सकैत छी। वर्तमान पीढ़ीक लेल प्रेरणादायी आ अगिला पीढ़ीकेँ मैथिलीक प्रति सिनेह जगावए लेल ई पोथी प्रासंगिक अछि। भाषा संपादन नीक लागल। िचत्रक स्तर बड़ सुन्नर आ व्यापक अछि। श्रुित प्रकाशन सेहो धन्यवादक पात्र छथि। नीक कागतक प्रयोग कएलन्हि आ चित्रक रंग संयोजन सेहो सेहंतित लागल।
अंतमे हम प्रीति जीकेँ धन्यवाद दैत छिअनि जे हमरा सबहक बीच एकटा झॉंपल विषएपर लेखनीक प्रयोग कएलनि। आगाँ सेहो हम आशा करैत धन्यवाद ज्ञापन करैत छी।
पोथिक नाम- मैथिली चित्रकथा
प्रकाशन वर्ष- २००९
लेखिका- प्रीति ठाकुर
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, राजेन्द्र नगर- दिल्ली।
दाम- १००टाका मात्र
पोथी प्राप्ति स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स वार्ड न. ६ निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ०९५७२४५०४०५
२
जितेन्द्र झा- नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल –ग्लानि
नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल –ग्लानि-
मैथिली भाषामे उपन्यास विधामे न्युन रचना भऽ रहल कहैत साहित्यकारसभ चिन्ता व्यक्त कएलनि अछि । नेपालसँ मैथिलीमे एखन धरि मात्र चारिटा उपन्यास प्रकाशित भेल कहैत साहित्यकारलोकनि औपन्यासिक कृति लेखन आ प्रकाशन नइँ हएब दुखद रहल मन्तव्य व्यक्त कएलनि अछि ।
राजेश्वर ठाकुर रचित ग्लानि मैथिली राजनीतिक लघु उपन्यासके साओन २७ गते राजधानीक भृकुटीमण्डपमे आयोजित कार्यक्रममे विमोचन कएल गेल । प्राज्ञ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ ठाकुरक प्रथम कृति ग्लानिके विमोचन कएलनि । भ्रमर नेपालीय मैथिली साहित्यकार उपन्यास रचना करबादिस रुचि नइँ देखौने छथि कहलनि । नेपालमेँ कुल १ सय पचासटा मैथिली पुस्तक प्रकाशित अछि जाहिमे उपन्यासक संख्या मात्र चारि रहल हुनक कहब छलनि । उपलब्ध चारिटा उपन्याससेहो आह्लादकारी नइँ रहल टिप्पणी भ्रमरके छलनि ।
राजेश्वर ठाकुर ग्लानिक सम्बन्धमे कहलनि जे उपन्यासक प्रमुख पात्र रमेश अछि जे मधेश आ मधेशीके हक अधिकारके लेल लडऽ चाहैत अछि । गजेन्द्र बाबुके मधेश आन्दोलनमे रमेश नौकरी छोडिकऽ कुदि जाइत अछि मुक्ति कामनाक सँग । पहाडिया शासन प्रवृतिक विरोधीक रुपमे आगु बढैत रहैत अछि रमेश । मुदा सत्ता लिप्सामे डुबि जाइत अछि राजनीतिक व्यक्तित्वसभ । एहन अबस्थामे रमेशके ग्लानि उत्पन्न होइत छैक आ लघु उपन्यासक जन्म होइत अछि ।
ओही अवसरमे मन्तव्य दैत डा रामदयाल राकेश राजेश्वर ठाकुरक ग्लानि कृतिसँ मैथिलीक उपन्यास साहित्यमे एकटा नव अध्याय जुडल कहलनि । कार्यक्रममे सहभागीसभ नेपालीय मैथिलीमे उपन्यास विधामे कलम चलएबादिस साहित्यकारसभके लगबाक आग्रह कएने रहथि । कार्यक्रममे डा गंगा प्रसाद अकेला गोपाल अश्क संचारकर्मी चन्द्रकिशोर झा सहितके व्यक्ति सहभागी रहथि ।
३.
शिव कुमार झा ‘टिल्लू’
जमशेदपुर
समीक्षा-
मिथिलाक बेटी (नाटक)
इसा संवत् सन २००८सँ लऽ कऽ वर्तमान कालकेँ अद्यतन मैथिली साहित्यिक आन्दोलनक क्रांति-काल कहल जा सकैत अछि। एहि अवधिमे रंग-विरंगक साहित्य सरितासँ सजल पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन प्रारंभ भेल अछि। जाहिमे प्रमुख अछि- विदेह ई पत्रिका, विदेह-सदेह, मिथिला दर्शन (पुनर्प्रकाशन), पुर्वोत्तर मैथिल, झारखंडक सनेस, नवारम्भ, मिथिला सृजन आदि-आदि। एहि पत्र-पत्रिकाक प्रयाससँ नव-नव साहित्यकारक प्रवेश मैथिली साहित्यमे भेल। जाहिमेसँ किछु साहित्यकार तँ अपन रचनासँ मिथिलाक मानस पटलपर एहेन स्थान बना लेलनि जाहिसँ हुनका जौं काल पुरूष माने मेन ऑफ टाइम कहल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि हएत। एहि रचनाकारक भीड़मे एकटा साम्यवादी आ बहिर्मुखी प्रतिभासँ सम्पन्न रचनाकार छथि- श्री जगदीश प्रसाद मंडल। हिनक व्यक्तिगत जीवन कोनो रूपक हो मुदा साहित्यिक सृजनशीलतासँ हिनका बहिर्मुखी व्यक्तित्वक व्यक्ति कहल जा सकैत अछि।
हिनक पहिल रचना ‘िवसॉंढ़’ आ ‘भैँटक लावा’ घर-बाहरमे आ दोसर रचना ‘चुनवाली’ मिथिला दर्शनमे प्रकाशित होइते मैथिली पत्रिकाक संपादक मंडलक संग-संग प्रबुद्ध पाठकक मध्य हड़होरि मचि गेल। ‘पहिने आउ आ पहिने पाउ’क आधारपर विदेहक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर हिनक रचना सभकेँ अपन पत्रिकामे छपाबए लेल हथिया लेलन्हि। एहि प्रकारक शब्दक प्रयोग करवाक हमर तात्पर्य अछि जे जगदीश जी कोनो नव रचनाकार नहि छथि, तिरसठि बर्खक माजल साहित्यकार छथि, मुदा हिनक रचनाक प्रदर्शन नहि भेल छल। समग्र रचनासंसार हिनक पुत्र उमेश मंडल जीक कम्प्यूटरमे ओझराएल छल किएक तँ छपयवाक लेल कैंचा कतएसँ अएत?
आदरणीय संपादक गजेन्द्र ठाकुरक विशेष अनुग्रह आ श्रुति प्रकाशनक अधिष्ठाता श्री नागेन्द्र कुमार झा आ श्रीमती नीतू कुमारी जीक कृपासँ हिनक एकसँ वढ़ि कऽ एक रचना हथिया नक्षत्रक गनगुआरि जकॉं पाठकक आगॉं आवि रहल अछि। एहि पुष्पांजलि महक एकटा फूल लऽ हम पाठकक सोझा राखि रहल छी- ‘मिथिलाक बेटी।’ मिथिलाक बेटी एकटा नाटकक नाम अछि। शीर्षकसँ स्पष्ट होइत अछि जे हमरा सभक समाजक वनिताक आस्तित्व आ अस्मितासँ एहि रचनाक संबंध अछि। मुदा....... पोथीक गर्भावलोकनक वाद हमर मोनसँ ई भ्रम भागि गेल। एहिमे समाजक विषमताक स्पष्ट दर्शनक अनुभूति भेल। जगदीश जी साम्यवादी विचार धाराक सम्पोषक छथि, तेँ समाजमे पसरल व्याधिपर श्रमक विजय, श्रमजीवीक विजय, दृष्टिकोणक विजय, इमानक विजय, सम्यक भौतिकताक विजय, वौद्धिक आ चेतनाक विजय देखयवाक प्रयास कएलनि।
पॉंच अंकक एहि नाट्कमे नौ गोट पुरूष पात्र आ पॉंचटा नारी पात्र छथि। रचनाक केन्द्र विन्दु छथि पैंतालीस वर्खक विकट पुरूष पात्र- बावू कर्मनाथ- एकटा प्रशासनिक अधिकारी। विकट एहि दुआरे किएक तँ भ्रष्ट समाजक मध्य कर्तव्यपरायण इमानदार व्यक्ति आ बावू एहि दुअारे किएक तँ अधिकारी छथि। स्नातक उर्तीर्ण कएलाक वाद हिनक पिता सोमनाथ हिनक विवाह एकटा भौतिकवादी परिवारमे पक्का कए लेलनि। द्रव्य, धन धान्य आ बीस विघा जमीनक जुआरिमे। मुदा ओ कर्मनाथ जीक मौन समर्थनक आशमे बैसल छलाह। एहि मध्य जेठ मासक गरमीमे एकटा कायाहीन आ निर्धन व्यक्ति हिनक दलानपर अएलनि। व्यथित आ थाकल अपन कन्याक हेतु वर तकवाक क्रममे सोमनाथक दलानपर अचेत भऽ गेलाह। सोमनाथसँ हुनक व्यथा नहि देखल गेल। ओहि गरीबक कन्यासँ वियाह करवाक लेल आतुर भऽ गेलाह। कालान्तरमे ई वियाह सम्पन्न तँ भऽ गेल मुदा, परिवारमे सामंजस्य नहि रहि सकल। पिता सोमनाथ आ दू भाँइ क्रमश: नूनू आ लालबावू हिनक निर्णएसँ दुखी भऽ गेलनि, किएक तँ कुवेरक भंडारक आशपर कर्मनाथ जी नोन छीटि देलनि। प्रतिभाशाली छात्र कर्मनाथ प्रशासनिक अधिकारी बनि गेलाह परंच हिनक इमान भौतिकतापर भारी पड़ि गेल जाहिसँ नव-नव समस्या उत्पन्न भऽ गेल। पत्नी चमेली, पुत्र फुलेसर आ पुत्री द्वय चम्पा आ जूही- ई अछि हिनक परिवार। भावक सर आ विश्वासक शतदलक संग जीवन क्रम चलैत रहल। िपता सोमनाथ अदूर्दर्शी व्यक्ति छलाह, जाहिसँ अन्य दुनू पुत्र अवण्ड भऽ गेलनि। कर्महीन नूनू आ लालबावू जथा बेचि-बेचि कए कर्मनाथक बरावरि करवाक प्रयास कऽ रहल छलथि। पितासँ महिमा मंडित होएवाक कारणें दुनूक जीवन नारकीय भऽ गेल। परिवारक दशा ओ दिशाकेँ देखि कऽ कर्मनाथक माए आशाक आश टूटि रहल छल। कर्मनाथ जीक पितृ परिवारमे मात्र हिनक माएक व्यक्तित्व सोझराएल छल। किएक नहि रहत, सभ माएक इच्छा होइत अछि हुनक पुत्रक नाओसँ समाज गौरवान्वित होअए।
जगदीश जी एहि नाट्य कथाक नायकक स्पष्ट उद्घोषण नहि कएलनि मुदा, हमर मतसँ एहि नाटकक नायक छथि विकास, एकटा सेवा निवृत्त शिक्षक। आदर्श आ सहज विचार धाराक व्यक्ति श्री विकास अपन समाजक चितंक छथि। मिथिलाक गाम एखनो विकासक धारामे पाछॉं पड़ल अछि। शिक्षाक अभाव, सामाजिक समरसताक अभाव आ साधनक अभावक कारण विकास सन प्रबुद्ध व्यक्तिक ग्राम्य समाजमे आवश्यकता अछि। गामक प्राय: नव आ अधवयस पीढ़ी हुनक छात्र रहलनि अत: हुनक सलाहकेँ मानैत छथि। श्रीचन किसान हाटपर प्रचार करवाक लेल आएल शंकर बीज कंपनीक प्रलोभनमे आवि टमाटरक विदेशी बीआ खरीद लैत छथि। टमाटर उपजाक कोन कथा जे लत्तिओ गलि गेल। श्रीचन संताप आ क्रोधक मारे आकुल छलाह। विकास जी हुनका सान्त्वना दैत कहलनि जे प्रचारक चकाचौंधमे नहि अएवाक चाही अपन स्वदेशी वस्तु ओहि विदेशी समानसँ सोहनगर अछि। विकास जीक प्रयासँ कर्मनाथक पुत्री चम्पाक वियाह रामविलास मिस्त्रीक पुत्र मदनसँ तँए कएल गेल। एहि वियाहकेँ केन्द्र विन्दु मानि एहि पोथीक रचना कएल गेल अछि।
आव प्रश्न उठैत अछि जे एहि पोथीमे नव की भेटल? मिथिलाक बेटी नाट्क ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ सिद्धान्तक आधारपर लिखल गेल अछि। एकटा कर्मठ आ इमानदार व्यक्तिकेँ समाजमे की-की सहय पड़ैत अछि, ओहि परिपेक्ष्यक मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि। कथाक मूलमे कर्मनाथक वियाह क्रममे आएल एकटा गरीब (चमेलीक पिता) व्यक्तिक मनोदशाक प्रस्तुति नीक अछि। ओ व्यक्ति गरीब छथि मुदा ‘चार्वाक दर्शन’क पालक। ‘पेटमे खढ़ नहि सिंहमे तेल’ जेवीमे कैंचा नहि मुदा नौ हन्नाक बटुआ जाहिमे भोगक वस्तु छलिया सुपारी पान आ तमाकू। हमरा सबहक गाममे एहिना होइत अछि, भोजन नहि मुदा, पान अवश्य। पग-पग पोखरि माछ मखान... मधुर बोल मुस्की मुख पान... नेना पढ़लक, नहि पता, कनियाकेँ पथ्य भेटल नहि जनै छी, बेटीक लेल दूध अछि... नहि। मुदा! पान अतिआवश्यक, हाथी मरि गेल, छान आ पग्घा लऽ कऽ बौआ रहल छी। कर्मनाथक अपन पत्नी चमेलीक संग वार्तालापमे ‘खट्टर ककाक तरंग’क दर्शन होइत अछि। गाममे प्रचलित लोकोक्तिक हास्य मुदा, सत्य प्रस्तुति।
कर्मनाथ जीक पुत्रक नाम फुलेसर प्रशासनिक अधिकारी भऽ कऽ एहेन नाम.....। एहिसँ हुनक गामक प्रति सिनेहक झॉंकी भेटैत अछि। गाममे एहने नाम सभ होइत अछि। अपन दुनू पुत्री आ पुत्रकेँ छायावादी रूपमे जीवनक शिक्षा दैत छथि..... कर्मनाथ। एना करव आवश्यक किए तँ एहिसँ जिज्ञासा बढ़ैत अछि। राम विलास सेवा निवृत मिस्त्री छथि। वाल्यकाल साधनक अभावमे, युवावस्था संघर्षमे विता कऽ भौतिक साधन प्राप्त कएलनि। जीवनक अंतिम पड़ावमे माधुरीसँ माने अपन पत्नीसँ अपन जीवन-यात्राक व्याख्यान करैत छथि, आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ। जिनका संग चालीस बर्खक यात्रा कएलनि ओ हिनक जीवन दर्शन नहि जनैत छलीह। हमरा सबहक समाजमे एहि प्रकारक घटना होइते अछि। गरीव नेनपनक वाद सोझे प्रोढ़ भऽ जाइत छथि। जे कर्मवादी छथि हुनक अंतिम अवस्था सुखमय नहि तँ......। अपन कर्मक नावकेँ कलकत्तामे मजवुत कऽ सोझे गाम आवि जाइत छथि। मातृभूमिक प्रति सिनेह, गामेमे गैरेज खोलवाक योजना अछि। चौघारा घर बनाएव, दलान अवश्य रहत, किएक तँ दलान समाजक मर्यादा थिक गामक जीवन शहरसँ सुखमयी अछि। एहि पोथीमे पलायनवादक विरोध कएल गेल अछि।
कर्मनाथक चरित्र पंडित गोविन्द झा लिखित ‘वसात’ नाटकक नायक कृष्णकान्तसँ मिलैत अछि। राम विलास जीवन संघर्षमे विजयी भेलाह तेँ पुत्रक वियाह आदर्श करताह। विकास जीक चरित्र नाटकक लेखक जगदीश बावूसँ मिलैत अछि। साम्यवादी, ग्रामीण सभ्यताक दिग्दर्शक। एहि पोथीमे जातिवादी व्यवस्थाक विरोध कएल गेल अछि। आन गामक स्वजातीयकेँ भोजमे निमंत्रण देवासँ अनिवार्य अछि अपन गामक सभ जातिकेँ आमंत्रित करब। िकएक तँ वेर-कुवेरमे पॉजरि लागल लोक काज दैत छथि, चाहे ओ कोनो जातिक हो।
एहि पोथीमे जीवनक सभ रूपक व्यापक दर्शन कएल गेल अछि। कुलीन व्यक्ति जनिक परिवार नीचॉं मुँहे जा रहल अछि ओहि परिवारक कन्याक वियाह उर्ध्वमुखी साधारण परिवारक पुत्र (जे आव सम्पन्न छथि) हुनकासँ भऽ सकैत अछि। एहि पोथीमे अन्हारपर इजोतक विजय देखाओल गेल अछि। भौतिकतापर बौद्धिकता आ सम्यक जीवनक जीत एहि पोथीक केन्द्र विन्दुमे समेटल अछि पुत्रक वियाहमे तिलक लेवासँ वेसी अछि कुलीन कन्याक चयन। सम्पूर्ण पोथीमे देशज शब्दक प्रयोग कएल गेल अछि। पोथीक अंतिम पृष्ठपर श्री गजेन्द्र ठाकुरक कथन मैथिली साहित्यक इतिहास (जगदीश प्रसाद मंडलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मंडलसँ) पढ़लहुँ पहिने तँ अनसोहॉंत लागल मुदा पोथीक अध्ययन कएलाक पश्चात् हमरा सहज लागल। भाषा अत्यन्त सामान्य मुदा रस, अलंकार आ छंदसँ परिपूर्ण अछि। कलात्मक शैलीमे जगदीश जी अंक-अंकमे अपन दर्शनकेँ सहेजि लेने छथि। हिनक ई रचना कोनो विशेष कथाकार वा नाटक कारसँ प्रभावित नहि। हिनक रचनामे राजकमल जी, पंडित गोविन्द झा, हरिमोहन बावू, धूमकेतु, गुलेरी जी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, ललन ठाकुर सन रचनाकारक शैलीक मिश्रित दर्शन होइत अछि। मिथिलाक बेटी अर्थनीतिसँ प्रभावित अछि मुदा, सम्यक अर्थनीतिसँ। अर्थपर मानवताक विजय, जगदीश जीक विश्वास नीक लागल।
जेना कोनो व्यक्ति पूर्ण नहि भऽ सकैत अछि तहिना कोनो रचनाक संग होइत अछि। ‘मिथिलाक बेटी’पोथीमे किछु त्रुटिक दर्शन सेहो भेल। प्रथमत: एहि पोथीक शीर्षक अप्रासंगिक लागल। बेटी तँ एहि दर्शनक माध्यम मात्र अछि, स्त्रोत नहि। एहिमे मानवीयताक जीत देखाओल गेल अछि बेटीक जीवन तँ घटना मात्र थिक।
एहि नाटकक भाषा सरल मुदा, शनै: शनै: गमनीय अछि तेँ मंचन करवाक योग्य नहि, मुदा एकर कलात्मक मंचन कएल जा कएल जा सकैत अछि।
निष्कर्षत: जगदीश प्रसाद मंडल जी हमरा सबहक बीच एकटा नव जीवनक आयाम लऽ कए आएल छथि। बहुरंगी जीवनक आयाम आ सकारात्मक सोचक आयाम। मानवीय मूल्य एखनो धरि जीवित अछि। एहि तरहक घटना कठिन अछि मुदा असंभव नहि। विश्वास आ कर्मक संग जीवन जीवाक प्रयत्न करवाक चाही। एहि पोथीक शब्द-शब्दमे झंकार अछि। भाषा प्रवाहमयी लागल। प्रकाशन दलक प्रयास नीक, शब्द संयोजन आ संपादन अति उत्तम। धन्यवाद।
पोथीक नाम- मिथिलाक बेटी
रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल
प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन राजेन्द्र नगर दिल्ली।
मूल्य- १६० टाका मात्र।
प्रकाशन वर्ष- सन् २००९
पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल, मोवाइल
न. ९५७२४५०४०५
१.मनोज झा मुक्ति -महोत्तरीक यूवाके देशव्यापी अभियान २.-
सुशान्त झा- मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य
मनोज झा मुक्ति -महोत्तरीक यूवाके देशव्यापी अभियान
‘अपना गामठामक विकास करबाकलेल सरकारी पाई एन.जि.ओ. या आ.एन.जि.ओ.क आवश्यकता नहिं अछि आवश्यकता अछि त सकारात्मक दृष्टिकोणकेँ आ अपना माटिप्रतिक आस्था एवं आत्मबलकेँ’ यैह नारा लऽ कऽ महोत्तरी जिलाक यूवा शंखनाद कएने अछि– देशके सुन्दर बनएवाक अभियानकेँ ।
जौँ पाइयक बलपर विकास भऽ सकैत त नेपालक सभ गाम स्वर्ग भऽ गेल रहैत । नेपालक कोनहुँ स्थान विकाससँ बञ्चित नईं रहैत । सरकार नेपालक प्रत्येक गामें प्रतिवर्ष २० सँ ३० लाख अनुदान दैत अछि जिला विकास समितिक मादे अरबोक बजेट रहैत अछि विकासकलेल से अलग सँ । एकरा अतिरिक्त सभासद सबके क्षेत्र विकासलेल बजेट भेटैत अछि तकर बाते छोडु । तहिना समाज आ देशक विकास हेतु एन.जि.ओ. आ आ.एन.जि.ओ. मार्फत नेपालमे प्रति वर्ष खरबो रुपैया अवैत अछि ताइसँ कतऽके विकास होइत अछि भगवाने जानथु ।
चाहे गामक कोनो पार्टीक नेता हुए जे गामक विकासकलेल गा.वि.स.के प्रतिनिधि बनल करैत छथि या जिला विकास समितिमे पार्टीक प्रतिनिधि बनैत छथि जँ ओसब अपना कर्तव्यप्रति कनिक्को सचेत रहितथि त नेपालक गामसब पूर्ण नहि त बहुत विकसीत भऽगेल रहैत । अपना गामकलेल या जिलाक लेल आएल बजेटमेंसँ कमीशन खाकऽ कागजपर विकासक काज गा.वि.स. सचिव आ जि.वि.स.क एल.डि.यो.सँ करौनिहार नेतेसबके एहि तरहक रवैया अछि तहन कोना भऽ सकत नेपालक विकास ? आश्चर्य त तखन लगैत अछि जखन देश विकासक लेल आएल बजेटके खएनिहार नेतासब अपनाके देश आ जनताक हितैषी आ अगुवा कहैत नईं थकैत अछि । ईमान्दारी आ सत्यपर सँ आम जनताके विश्वास उठाबऽमे नायकक भूमिकामे रहल अधिकांश कमिशनखोर नेताक कारण किछु ईमान्दार एवं नैतिकवान राजनीतिकर्मीसब अनेरे बदनाम भेल करैत अछि । ताँए जरुरी अछि आम जनतामे आत्म विश्वास जगएवाक आ सत्यपर भरोषा बढएवाक । आ एकर शुरुवात कऽ रहल अछि महोत्तरी जिलाक किछु यूवासब ।
महोत्तरीमें अभियानमे लागल यूवाक कहब छन्हि– ‘अपना गामठामक विकास करबाकलेल सरकारी पाई एन.जि.ओ. या आ.एन.जि.ओ.क आवश्यकता नहिं अछि आवश्यकता अछि त सकारात्मक दृष्टिकोणकेँ आ अपना माटिप्रतिक आस्था एवं आत्मबलकेँ’ । ओसब अभियानक शुरुवात कऽ रहल छथि–वृक्षारोपणक काजसँ । जखन हुनकासबसँ जिज्ञासा राखल गेल कि वृक्षेरोपण किया ? त हुनक कहब छन्हि–‘ गामघर या जिलामे जत्र–तत्र व्याप्त भ्रष्टाचारके एक्कहिवेर कम नहि कएल जा सकैय । कोनो गाममे जौँ कोनो विकास निर्माणक काज होइत अछि त स्थानिय नेता कार्यकर्ता या यूवा ओहि काजमे निक जकाँ अभिरुचि लैत अछि । मुदा दुर्भाग्यक बात हूनका सबमेंसँ ९८ प्रतिशत लोकक अभिरुचिक अभिप्राय रहैत छन्हि–कमिशन लेवाक काज चाहे कागजेपर किए नई भऽ जाय । ताँए पहिने काज कएल जाए तकरा बाद कर्मचारी जनता आ नेताके सचेत करबाक काज शुरु हुए ।’
अपना अभियानक शुरुवात ओसब नेपालक गाम–ठाममें वृक्षारोपण क कऽ करऽ चाहैत छथि । हुनकसबहक कहब छन्हि–‘काज ककरो देखयवाकलेल नहिं होएवाक चाही अपना आपसँ इमान्दारिता करैत काज करैत जाउ लोक चाहे जे कहय । जँ नीक काज करबई त दुश्मनो के ई कहैएटा पडतैक जे–‘....ओना त छौंडा बदमाश अछि मुदा काज नीक कऽ रहल अछि ।’ एहि उद्देश्य ल कऽ हमसब जतबे सकब सबहक सहयोगसँ नेपालक कोना–कोनामें वृक्षारोपण करब आ कराएब । ओसब अपना वृक्षारोपणक अभियानमें आम देशवासी सँ एहि तरहक अनुरोध कएल करैत छथि–‘ हमरा सबहक वृक्षारोपणक अभियानमें जँ आँहाँ सहयोग करऽ चाहैत छी त एकटा बाँस दऽ दिय नहिं त एकटा कोनो फूलक या फलक गाछ दऽ दिय । जँ से नहि त एकदिन आबिकए पानि पटा दिय नहिं त सप्ताहमे आधा घण्टा आबिकऽ वृक्षारोपण स्थलमें बैसि जाऊ । जँ आँहाँलग समयक आभाव अछि आँहाँ कर्मचारी छी त अपना गाम गेल वेरमे अपना खेतमे या दरबज्जापर एहि अभियानक नामपर एकटा अपना नीक लागऽबला वृक्ष लगालिय आ नहिं त जँ आहाँके ई अभियान नीक लगैय त कम स कम हमरा अभियानी मीत्रके हौसला बढादिय । हमर स्वार्थ याह अछि जे केओ कतौ गाछ–वृक्ष लगाओत या लगौने हायत त ओकर आक्सिजन हमहुँ लेब आ सबकियो लेत बटोहीके रौदमे छाहरि भेटतैक एवं बहुतो गरीबकेँ घरक आँचकलेल ओकर पात काज औतैक । ताएँ सब गाम–शहरकेँ फूल आ वृक्षसँ सजाबी जतऽ किछुदेर कियो वैसिकऽ स्वच्छ हावा लऽ सकय ।’
तहिना ओ सब कहैत छथि जे जतेक नेताके देखू सब देशे विकासके बात करत । आर्मी पुलिस कर्मचारी देशक या कहु माटिक सपथ खाइत रहत । पत्रकार या बुद्धिजीवि दिन–राति देशक उन्नतिक गप्प करैत नईं थाकत । जे अपनाके जनता कहैत छथि ओ सब दिन–राति नेतासबके गारि पढैत नहिं थकैत छथि जे नेतासब देशके बेच देलक । एकर मतलब जे गारि पढनिहारक भीतर सेहो देश या कहु माटिप्रतिक सिनेह छन्हि ताईमें दू मत नहि । एहि बातक विश्लेषण करैत अभियानी यूवा सब सम्पूर्ण नेपाली सँ एहि तरहें अभियानमे जुटवाक आग्रह करवाक सोंच बनैने छथि–‘सबकियो अपन काज करैत अपना माटिकलेल किछु कऽ सकैत छी । जौँ आहाँ किसान छी सबदिन अपना खेतमे काज करु आ ४÷५ दिनमें एक घण्टाकलेल कोनो दोसर चौरी÷बाधमे टहलि जाऊ आ ककरो खेतक लगाओल बालीमे कोनो प्रकारक रोग या गड़बड़ी देखाइत अछि त सम्बन्धित किसानकेँ सलाह दऽ दियौक । जौँ आँहाँ शिक्षित छी आ अपना कोनो काजमे लागल छी या कर्मचारी छी त अपना ड्यूटीक अतिरिक्त प्रतिदिन÷दूदिनक एक घण्टा नियमित रुपसँ ओतुक्का बच्चाके पढ़ा देल करियौ । एहिं तरहें अपन काजके हर्जा नहिं करैत अपन नियमित जेब खर्चमे कटौति ककऽ अपना धर्तीकलेल बहुत किछु कऽ सकैत छी । जँ हमसब एहि तरहक काज करबैक त विकासक नामपर पाइ हजम करऽबला सबके आँखिमे अवश्य लाज लगतैक आ एकदिन हमरो धर्ती हँसबेटा करतैक ।’
महोत्तरीक यूवाक अभियानक आहाँके नीक लगैय जौं अहुँ एहि अभियानक सहयात्री बनऽ चाहैतछी त जुटि जाऊ आइए सँ आ अहुँ शंकनाद कऽ दिय अपना गाममे वृक्षारोपणक अभियानक संग।
२.सुशान्त झा
मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य
समाद पर मिथिला आ बिहार सं संबंधित लेख पढि कय ओतय चलै बला विकासपरक गतिविधि के अंदाज लागि पाबैये। इम्हर हमर एहेन मैथिल मित्र के संख्या मे बड तेजी सं बृद्धि भेलय जे बिहार या मिथिला के विकास के बारे मे जानय त चाहैत छथि लेकिन जखन समाद पर मैथिली मे लेख पढ़य कहबनि त दिक्कत भय जाय छन्हि। हुनका मैथिली बाजय त अबै छन्हि लेकिन पढ़य नहि आबै छन्हि। ओ हिंदी बड आराम सं पढ़ लैत छथि लेकिन मैथिली पढ़य मे दिक्कत के वजह सं ओ मैथिली साईट पढ़िते नहि छथि। ई बड्ड पैघ समस्या अछि।
देखल जाय त अमूमन जे कोनो भाषा के अपन लिपि जीवित छैक ओकरा पढ़ैबला के कोनो दिक्कत नहि होईत छैक-कारण जे ओ बच्चे सं ओहि भाषा के ओहि लिपि मे पढ़ै के अभ्यस्त होईत अछि। जेना तमिल, तमिल मे लिखल जाईत अछि, त एकटा औसत अंग्रेजीदां तमिलभाषीयो के ओकरा पढ़ै मे कोनो दिक्कत नहि होईत छैक। लेकिन कल्पना करु कि अगर तमिल के देवनागरी मे लिखल जाई त की होयत ? ओ आदमी तमिल त बाजि लेत-चूंकि ओ ओकरा अपन माय या परिवार के अन्य सदस्य के मुंह सं सूनि क सिखलक अछि-लेकिनि ओकरा पढ़ै मे बड्ड दिक्कत हेतैक। ओकरा देवनागरी लिपि सेहो सिखय पड़तै। हमर भाषा संगे येह दिक्कत अछि। मैथिली के अपन लिपि त छैक, लेकिन ओ देवनागरी मे लिखल जा रहल अछि-जाहि लिपि मे हम सब सिर्फ हिंदी पढ़ै के आदी छी। अधिकांश मैथिली बजै बला के मैथिली त आबै छन्हि-कियेक त ओ सुनि कय सिखने छथि लेकिन ओ पढ़ि नै सकै छथि, कियेक त पढ़ैके आदत हुनका हिंदी के छन्हि।
ई बात स्वीकार करय मे हमरा कोनो संकोच नहि जे हमर भाषा हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के शिकार भेल अछि। ई संकट मैथिलिये टा संग नहि, बल्कि हिंदी क्षेत्र के तमाम भाषा जेना अवधी, भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी सबके संगे छै। देखल जाय त भोजपुरी कनी नीक अवस्था मे अछि कारण जे एकरा बाजार सेहो सहयता कय रहल छैक। लेकिन जेना-जेना शहरीकरण बढ़ि रहल अछि देश मे छोट-छोट भाषा आ बोली के स्पेश खत्म भय रहल अछि। देश के एकात्मक स्वरुप के विकास के लेल हिंदी आ अंग्रेजी अनिवार्य बनल जा रहल अछि। हलांकि दक्षिण के प्रांत आ उत्तर मे बंगाल या उड़ीसा अहि स बहुत हद तक मुक्त अछि-ओना संकट ओतहु कम नहि। हमर भाषा मैथिली जनसंख्या के आकार, भौगोलिक स्थिति, प्राचीनता आ व्याकरण के दृष्टिकोण सं कोनो भाषा सं कम नहि लेकिन तैयो हम सब असहाय किये छी-ई एकटा विचारणीय प्रश्न अछि।
हमर दोस्त सब जिनकर जन्म पटना या दिल्ली मे भेलन्हि ओ हिंदी मे बात करैत छथि। हलांकि ओ अपन मां-बाबूजी सं मैथिली बाजि लैत छथि लेकिन अन्य मैथिल भाषी सं ओ हिंदीये मे संवाद करैत छथि। एकर पाछू कोन मानसिकता अछि, कोन कारक एकरा प्रभावित कय रहल अछि, ताहि पर विवेचना आवश्यक।
दोसर बात हीन मानसिकता के सेहो। हम सब अपन संस्कृति के जेना बिसरि गेलहुं अछि। हमरा सब ज्ञान के मतलब अंग्रेजी के जानकारी मानि लेने छी, आ संस्कारित होई के मतलब हिंदी के नीक ज्ञान यानी खड़ी हिंदी के दिल्ली या टीवी के टोन मे बाजै के ज्ञान मानि लेने छी। हमरा अपन प्राचीन परंपरा के ज्ञान सं या त वंचित कयल जा रहल अछि या हम सब खुद अनभिज्ञ भेल जा रहल छी या केयक टा आर्थिक वजह हमरा सबसं अमूल्य समय छीन रहल अछि जे हम सब अपन भाषा या संस्कृति के बारे मे सोची। हमर कैयकटा मैथिल मित्र के ई ज्ञान नहि छन्हि जे सर गंगानाथ झा या अमर नाथ झा के छलाह। हुनका उमेश मिश्र के बारे मे नहि बूझल छन्हि। हुनका सरिसव पाही या बनगाम महिसी के भौगोलिक जानकारी तक नहि छन्हि। हुनका मंडन मिश्र या जनक या मिथिला के प्राचीन विद्रोही विद्रोही परंपरा के बारे मे बिल्कुले पता नहि छन्हि। लोरिक या सलहेस एखन तक यादवे या दुसाध के देवता कियेक छथि ? आ मैथिल के मतलब मैथिल ब्राह्मणे कियेक होईत छैक ? की हम एकात्म मैथिल के रुप मे कोनो प्रश्न के सोचैत छी? अहू सवाल सं टकरेनाई आवश्यक।
इंटरनेट अहि दिसा मे नीक काज कय रहल अछि। एम्हर कयकटा वेबसाईट पर मैथिली या मिथिला के बारे मे नीक जानकारी आबि रहल अछि। लेकिन की एतब काफी अछि ?
एकटा प्रश्न मिथिला राज्य के निर्माण सं सेहो जुड़ल अछि। मिथिला के इलाका अप्पन दरिद्रता, विशालता, भाषाई विशिष्टता के वजह सं राज्य के दर्जा पाबै के पूरा हकदार अछि, लेकिन की सिर्फ मिथिला राज्य बनि गेला सं हमर भाषा के पूरा विकास भय पाओत? हम एतय राज्य बनि गेला के बाद आर्थिक विकास के उम्मीद त कय सकै छी लेकिन की भाषाई आ सांस्कृतिक विकास भय पाओत ? उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ बनि गेला के बादो ओतय के स्थानीय भाषा के की हाल अछि, ई एकटा शोध के विषय भय सकैत अछि। दोसक गप्प, मैथिली के एकरुपता सं जुड़ल अछि। एतय मैथिल भाषी आ ओकर साहित्यकार खुद एकर जिम्मेवार छथि। दरभंगा-मधुबनी के मैथिली के मानक बना कय हम केना पूरा मिथिला के ठीका उठबै के दावा कय सकैत छी ? एखनो दरभंगा-मधुबनी के भाषाई अहं, सहरसा-पूर्णिया आ मधेपुरा बला के अहि आन्दोलन के शंका के दृष्टि सं देखै पर मजबूर कय रहल अछि। हमर ई माननाई अछि जे मैथिली कतौ के हुए, ओकर मूल रुप मे जाबे तक ओकरा स्वीकार नहि कयल जाओत, मिथिला आ मैथिली आन्दोलन के बहुत फायदा नहि हुअ बला।
दोसर बात फेर लिपि के अछि। की हम मिथिला राज्य बनि गेला के बादो मैथिली के मिथिलाक्षर मे लिखि सकब ? की हम देवनागरी सं मुक्त भय सकब ? की हम राष्ट्र के मुख्यधारा सं टकराई के साहस कय सकब...आ दरभंगा-सहरसा के शहरी वर्ग के मैथिली बाजै आ लिखै के लेल मना या प्रेरित कय सकब-ई लाख टका के प्रश्न। देखल जाए त सांस्कृतिक रुप सं हमर मिथिला, बंगाल के बेसी नजदीक अछि, लेकिन हमर राजनीतीक जुड़ाव हिंदी पट्टी सं स्थापित कय देल गेल अछि। इतिहास के अहि आघात सं मुक्ति कोना भेटत, राज्य निर्माण एकटा कदम त भय सकैत अछि, लेकिन हिंदी के इन्फ्रास्ट्रक्चर हमर जनता के मजबूर कय देने अछि जे हम अपन लेखन या पाठन हिंदी मे करी। हमरा ओकर लत लागि गेल अछि आ हमर भाषा सिर्फ बाजै के भाषा बनि कय रहि गेल अछि। तखन उपाय की अछि ?
मैथिली के बारे मे किछु विज्ञ लोक सं जखन चर्चा होईत अछि त कहैत छथि जे 50 या 60 के दशक मे जते मैथिली के आन्दोलन मजबूत छल ओते आब नहि। सर गंगानाथ झा, या अमरनाथ झा या उमेश मिश्र या हरिमोहन बाबू घनघोर मैथिलवादी छलाह। ओ या त अंग्रेजी मे संवाद करैत छलाह या फेर मैथिली मे। ओ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के चीन्ह गेल छलाह- ओ उर्जा एखन कहां देखि रहल छी ?
हमर बहिन कैलिफोर्निया मे रहैत अछि। ओकरा ओतय कयकटा मैथिल टकराईत छथिन्ह जे मैथिलीये मे गप्प करैत छथि। लेकिन ई चेतना भारत मे कहां अछि ? एतय ओ हिंदी कियेक बाजय लगैत छथि ? जे अपनापन ओ अमेरिका मे ताकय चाहैत छथि ओ भारत मे कियेक नहि करैत छथि-एकर कोनो जवाब हमरा नहि सुझाईत अछि।
एम्हर किछु लोग बहुत एलीट भेला के बाद फेर सं अपन रुट सं जुड़ै के कोशिश कय रहल छथि। शायद ओ हॉलीवुड स्टार सबसं प्रेरणा ल रहल होईथि। ओरकुट या फेसबुक पर मिथिला के गामक तस्वीर फेर सं जागि रहल अछि। एकटा महत्वपूर्ण भूमिका मिथिला पेंटिंग के सेहो अछि। लेकिन लेखन या पठन के स्तर पर एखनो लोग मैथिली सं कहां जुड़ि पेला अछि? जाहि भाषा-भाषी के जनसंख्या 2 करोड़ सं ऊपर हुए ओतय कोनो नीक अखबार या पत्रिका कहां देखि रहल छी। तखन त इंटरनेट के धन्यवाद देबाक चाही जे ओ एहि दिसा मे नीक काज कय रहल अछि-कारण जे अहि मे पूंजी कम लगैत छैक।
एकटा उम्मीद ऑडियो-विजुअल माध्म सं अछि लेकिन हमर भाषा ओहू मोर्चा पर भोजपुरी जकां प्रदर्शन नहि कय रहल अछि। हलांकि भोजपुरी के विशाल आबादी आ अंतराष्ट्रीय बाजार ओकरा सहयोग कय रहल छैक लेकिन ओहू सं बेसी महत्वपूर्ण हमरा जनैत ई जे हमर भाषा बेसी क्लासिकल होई के वजह सं अहि मोर्चा पर पिछड़ि रहल अछि। मैथिली भाषा लेखन के परंपरा सं विकसित भेल अछि आ बेसी मर्यादित अछि, जखन की भोजपुरी मे लेखन के परंपरा सं बेसी बाचन के परंपरा छैक। ई क्लासिकल भेनाई हमर भाषा के पोपुलर कल्चर सं काटि कय राखि देने अछि। मिथिला मे संभ्रान्त वर्ग के मैथिली अलग आ आम जन के मैथिली अलग भय गेल छैक। एकर अलावा लेखन के परंपरा होईके कारण एकर लोकगीत आ नाट्य मे एक प्रकारक अश्लीलता या बेवाकपन के बड्ड कमी छैक जे भोजपुरी मे प्रचुर रुप सं छै। ताहि कारणें हमर भाषा मे हाहाकारी रुप सं हिट लोकगीत के कैसेट या फिल्म नहि बनि पबैत अछि। परिणाम ई जे मैथिलियों के दर्शक भोजपुरिये गीत या फिल्म के आनंद बेसी लैत छथि-जे बाजार द्वारा हुनकर बेडरुम तक पहुंचा देल गेल अछि। लोक ‘महुआ’ चैनल त देखैत छथि लेकिन ‘सौभाग्य मिथिला’ के बारे मे कतेक लोक के पता छन्हि ? मैथिली के बाजार नहि बनि पायल अछि। इहो प्रश्न विचारणीय।
तखन हमर भाषा के उम्मीद कतय अछि ? की सिर्फ ‘विल पावर’ आ गार्जियन सबके अतिशय जागरुकताये हमर उम्मीद अछि जे ओ अप्पन बच्चा सबके कम सं मैथिली जरुर सिखाबथु या आओर किछु ?
लगैये हम बेसी निराश भय रहल छी। शायद हमरा एतेक निराश नहि हुअक चाही। जे भाषा हजार साल सं लेखन आ वाचिक परंपरा सं जीवित अछि ओ आगूओ जीवैत रहत। एकर त्राता ओ किछु हजार या लाख लोग नहि छथि जे दरभंगा-पटना या दिल्ली मे आबि क कॉरपोरेट भय गेल छथि-बल्कि ई भाषा करोड़क करोड़ मैथिल भाषी के हृदय मे जीवित अछि जे एखनो कोसी के बाढ़ि आ जयनगर रेलवे लाईन के कात मे पसरल हजारो गाम मे रहैत छथि। हमर ई विवशता अछि जे हमर युवा आबादी, जवान होईते देरी दिल्ली-बंबै भागि जाईत अछि। अबै बला समय मे जखन आर्थिक गतिविधि हमरा इलाका मे पसरत त लोक के पलायन नहि हेतै, लोक अप्पन भाषा मे संवाद करैत रहत। अहि शुभेच्छा के जियबैक लेल हमरा आर्थिक लड़ाई लड़य पड़त। दिल्ली आ पटना के सरकार सं अप्पन हक मांगय पड़त, इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करय पड़त। शायद मिथिला राज्य ओहि दिसा मे एकटा पैघ कदम साबित हुए। कमसं कम मिथिला राज्य के निर्माण के अहि आधार पर जरुर समर्थन करक चाही। आ मैथिल बुद्धिजीवी सबके के अहि आन्दोलन मे अहम भूमिका के निर्वाह करैय पड़तन्हि।