ध्वनि-प्रतिध्वनि
ध्वनि आ प्रतिध्वनि नामक दू टा जुड़वाँ बहिन छली जे कि पहाड़ी इलाकामे रहै छली। ध्वनि स्वभाव सऽ बड्ड शान्त आ निर्मल छलैथ जखन कि प्रतिध्वनि हुनकर विपरीत बहुत चञ्चल आ उपद्रवी छलैथ।ध्वनि हमेशा घरमे अपन माय के काज मे मददि करै छलैथ।प्रतिध्वनि पहाड़ीमे एम्हर उम्हर भागैत रहैत छलैथ।एकदिन प्रतिध्वनि बाहर घुमैत छली तऽ हुन्का एकटा राजकुमार देखेलैन। आे राजकुमार हुन्का बड्ड नीक लगलैन।प्रतिध्वनि आेहि राजकुमार सऽ खूब दाेस्ती केली आ आेकरा घुमाबऽ फिराबऽ लगली कारण आे राजकुमार आेहिठाम ककराे अतिथि बनि कऽ आयल छला।राजकुमार हुन्का सऽ बड्ड प्रसन्न छलाह।
दिन बीतल आ प्रतिध्वनि आेहि राजकुमार सऽ विवाहक माेन बनाबय लगली मुदा एकदिन जखन आे घर गेली तऽ देखली जे आे राजकुमार हुनकर बहिन के विवाहक प्रयाेजन सऽ देख लेल आयल छलैन।राजकुमार हुनकर बहिन ध्वनिके पसन्द कय विवाह कऽ लेला।प्रतिध्वनि के बहुत पैघ आघात पहुॅंचल छलैन।हुन्का बहुत क्षाेभ भेलैन जे लाेक हुनकर दुःख नहिं बुझलकैन।आे पहाड़ी सऽ कूदि कऽ अपन प्राण त्यागि देली।मुदा हुनकर आत्माके मुक्ति नहिं भेटलैन।हुनकर आत्मा पहाड़क खाइर् में अखनाे भटकैत रहै छैन।अखनाे जॅं कियाे पहाड़क खाइर्मे किछु जाेर सऽ बाजैत अछि तऽ प्रतिध्वनि आेहि आवाज के बेर्रबेर बाजै छैथ।
बिपिन कुमार झा
प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन
(बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति)
Ph. D , IIT Mumbai
बिहार विधान सभा चुनाव सम्पन्न भेल। नितीश सरकार ’हाथ’ ओ ’लालटेन’ कें अपन कर्मक समुचित फल हेतु पाछू छोरैत पुनः एक बेर अपन अस्तित्व मे आयल। कलियुग कर्मयुग छैक। ओ अतीतक गप्प करी अथवा वर्तमानक, भारत सनहक गणतन्त्र राष्ट्र मे कर्मक फल जनता द्वारा जनता कें अवश्य भेटैत रहल अछि।
आब प्रश्न ई उठैत अछि जे बिहार केर विकास निरन्तर हो एहि हेतु ई केकर उत्तरदायित्त्व अछि? निश्चित रूप सँ उत्तर होयत नितीश सरकारक। जहाँ तक हमर मन्तव्य अछि ’ई उत्तर एकांगी अछि’ कियाक त { 92,257.51 sq. Kms ग्रामीण क्षेत्र, 095.49 sq. Kms शहरी क्षेत्र, (कुल 94,163.00 sq. Km), कुल जिला-38, कुल आवादी- 8,28,78,796 अधिकतम साक्षरता पटना- 63.82%, कुल विश्वविद्याल- 13, इंजीनियरिंग कालेज-08, प्रबन्धन संस्थान 06, मेडीकल कालेज 08, शोध संस्थान 06, ला कालेज 10, आयुर्वेद महाविद्यालय 05, वेटनरी कालेज- 02, कृषि महाविद्यालय 04, फाइन आर्ट्स महाविद्यालय 02, शोधकेन्द्र 04, अन्य शैक्षिक संस्थान 14)} एहि वृहत क्षेत्र बला राज्य केर विकास क उत्तरदायित्त्व मात्र अस्थायी प्रशासक के ऊपर छोडि पल्ला झाडनाई कतय तक समुचित अछि ई अपन विवेक सँ तय कयल जाय। विकास केर उत्तरदायित्त्व एहि प्रकार सँ निर्धारित कयल जा सकैत अछि।
· प्रशासक (विकासकर्ता कहब विशेष उचित)
o स्थायी
§ सिविल सेवारत पदाधिकारीगण
§ अन्य सहयोगी पदाधिकारीगण
§ जनता स्वयं
· निवासी
· प्रवासी
o अस्थायी
§ चुनाव मे जीतल जनताक प्रतिनिधि
एतय विभाजन किछु विशेष दृष्टि सँ कयल गेल अछि जाहि सँ बिहार अथवा कोनो प्रान्तक विकास केर गप्प केनाई समुचित होयत।
सिविल सेवारत पदाधिकारी केर आचरण यद्यपि निर्दुष्ट मानल जा सकैत अछि मुदा वर्तमान समय मे ई बात कदाचित अप्रासंगिक भय गेल अस्तु एहि तरहक पदाधिकारी सँ एतबा कहब उचित जे राष्ट्र अस्मिता, एकता एवं उत्कर्ष समुचित नीतिनिर्माण सँ संभव छैक जेकर कर्णधार सिविलसेवके होइत छथि, आ यदि ओ अपन उत्तरदायित्व प्रलोभन अथवा भयवश बिसरि जेता तऽ भविष्य की होयत ई सहज बुझल जा सकैत अछि।
जहाँ तक अन्य सहयोगी पदाधिकारी तथा पुलिस प्रशासनक गप्प अछि, यदि अनुचित नहिं मानल जाय तऽ ई कहब अनुचित नहि होयत जे सबहक कर्ता आ हर्ता ई होइत छथि। यदि पुलिस प्रशासन आ कर्मचारी वर्ग ठानि लथि तऽ भ्रष्टाचार 90% धरि समाप्त भय सकत, शिक्षा तथा अन्य सेवा पंगु नै रहत, यात्री पटना स्टेशन सँऽ बस स्टेशन राति मे जायब अनुचित नै बुझत। एकटा उचित काज हेतु हरियर पत्ती नै देखबय पडत, बिना लाइसेंस अथवा कागज के हजारो गाडी सडक पर नै दौडत, डी० एम० सी० एच० मे चिकित्सा मे लापरवाही नै होयत, लोक के अन्यत्र भटकय नै पडत काज लेल। बहुतो एहेन गप्प छैक जेकरा ई पुलिस, कर्मचारी, चिकित्सक सदृश अधिकारी दूर कय सकति छथि।
आब जनता जे मूल निवासी छथि हिनक गप्प। हम नहिं सुधरब ई शपथ खा के कदाचित बैसल छथि। ई अपन हाल नीक जँका बुझैत छथि तैय्यो प्रमाद, प्रलोभन अथवा भयवश अपन कर्तव्य नहिं करता बस अधिकारक गप्प लिअ। दोसर कें चुटकी लेब, टाँग खीचब, ईर्ष्या करब आहा हा परमानन्द दैत छन्हि। आई कोनो तरहें बीत जाय काल्हुक के देखलक? ई हिनकर सोच छन्हि। विकास आ देशक गप्प नै करू ओ त सरकारक काज छियै न!! कतहु क्रिकेट भेल तऽ कान पथता, अपने कोनो खेल मे आगू एता अथवा अपन बच्चा के कोनो क्षेत्र विशेष मे आगू अनता ई तऽ... “की कहू एहेन राज मे हम छी न किछु सम्भव नै अछि”। हँ, ध्यान आयल “पढि लिखि के की हेतै? कोनो नौकरी भेटतै?” ई हिनक सोच छन्हि। गामक चौक पर गाजा आ भांग खायत से बड्ड नीक। कतेक गप्प कहू। हिनको स बस एतबा आग्रह जे अपन कर्तव्य जे छन्हि यथासम्भव ओकर पालन करथु।
हमरा सदृश प्रवासी नागरिक तऽ बेचारे पटना धरि गाम जेबाक जोश रखैत छथि ओकर बाद बिहार नहिं सुधरी वाक्य बजैत छथि। की ई उचित अछि? अपना लेल उत्तर देब सदा मुश्किल होइत अछि। किन्तु ई किछु हिनकर कर्तव्य सेहो छन्हि न? गाम जेबा मे होयब समस्या देखाइत छन्हि मुदा घर मे बच्चा के मूँह सँ मैथिली सुनबा मे बज्रपात होइत छन्हि!! बिहार किं वा मिथिला लेल अहाँ की कयल? अपन पेट तऽ कुकुरो पोसैत अछि। आय NBT मे एकटा समाचार देखल नोएडा केर कम्पनी ल्यूना इरगोनोमिक्स केर मुख्य कार्यकारी अधिकारी मेजर अभिजीत भट्टाचार्य ’पाणिनि’ नामक साफ्टवेयर केर जानकारी देलथि जाहि द्वारा 11 भाषा मे SMS पठा सकैत छी। ई न्यूज एहि दृष्टि सँ महत्त्वपूर्ण जे अपन धरोहर केर रक्षण करबाक सोच जुडल अछि। एहि तरहें गजेन्द्र जी सदृश कतिपय व्यक्ति सराहनीय कार्य कय रहल छथि जे प्रवासी होइतो मिथिला/बिहार केर विकास मे योगदान स्वरूप अछि।
आब बात नितीश सरकारक...। एहि मे कोनो सन्देह नहिं जे नितीश सरकार लालटेन के मडियल रोशनी सँऽ बिहार के जेनरेटर युग मे अनलक (एकर चर्चा आगू करब)। बिहारक विकास गाथा बिहार सरकार केर साइट पर देखल जा सकैत अछि। RTI Doc. जे ओहि साइट पर अछि, जानकारी के बुझबा मे सहायक होयत। 5 वर्षक भीतर 47000 सँ अधिक अपराधी के सजा भेटब, केन्द्रीय योजना क अतिरिक्त ४० से अधिक योजना केर कार्यान्वयन होयब, सडक केर जाल प्रस्तुत होयब, पलायनक दर कम होयब, बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम-2009, 2008-09 मे वार्षिक विकास दर प्रचलित मूल्य पर 24.33% होयब, राज्यक कर राजस्व 2004-05 केर तुलना मे 2009-10 मे 3347 करोड सँ 8130 करोड होयब आदि किछु शुभसंकेत अछि। टीका-टिप्पणी तऽ चलबे करत मुदा एहि बातक प्रतिषेध करब की बिहार विकासक पथ पर अछि, आत्मघाती होयत।
लेकिन...! नितीश सरकार अखनहुँ किछु बात लय कें आलोचना के पात्र अछि जेकरा बिन्दुबार तऽ नहि कयल जा सकैत अछि मुदा सुधार हेतु किछु गप्प जरूर कयल जा सकैत अछि। त आगू सुनू-
अखनहुँ बिहार जे समस्या सँ त्रस्त अछि ओकर समाधान हेतु निम्न बिन्दुगत क्षेत्रक समाधान अपेक्षित अछि-
· शिक्षा- अखनहुँ गुणवत्ता क दृष्टि सँऽ शिक्षा सन्तोषजनक नहि अछि। सुधार अवश्य भेल मुदा अखनहु जरूरत अछि जे शिक्षा मे व्यापक सुधार हो। ताकि विद्यार्थी के अन्य प्रदेश हेतु रुख नहिं करय पडय। शिक्षा मे पारदर्शिता के अभाव अछि। गुणवत्ता के स्थिति एहि बात सँ लगा सकैत छी जे डाक्टरेट के डिग्री ओतय सहजता सँ प्राप्त कय सकैत छी। संस्कृत विश्वविद्यालय सँ स्वर्णपदक प्राप्त व्यक्ति एक पंक्ति संकृत नहिं बाजि सकैत छथि। संस्कृत विद्यालय जाहि हेतु सरकार करोडो खर्च कय रहल अछि ओकर भवन मात्र अछि बाकी सब कागज पर। हरिजन छात्रावास अछि सौ स अधिक कमरा के किन्तु एकहु टा हरिजन आई धरि ओतय नहिं देखल गेल। बहुत रास उदाहरण अछि सबटा नहिं देल जा सकैत अछि।
· सुरक्षा- एहि क्षेत्र मे नितीश सरकारक कदम सराहनीय अछि मुदा अखनि धरि अन्य क्षेत्रक गप्प छोडू राजधानी सुरक्षित नहिं अनुभव कयल जाइत अछि। एहि पर विशेष ध्यानक आवश्यकता अछि।
· संसाधन –
o विद्युत – हम सभ लालटेन युग सँ निवृत्ति लय जेनरेटर युग मे त आबि गेलहु किन्तु बिजली हेतु आइयो दुनिया अन्हार अछि। भगजोगनी आ अतिथि रूपी बिजली रानी के विकास मार्ग मे बाधा हेतु सबसँ पैघ कारक कहल जा सकैत अछि। बिजली केर दुखद स्थितिक उदाहरण हम एना दय सकैत छी- हम अपन प्रथ त्रैमासिक संकृत ई जर्नल जाह्नवी (jahnavisanskritejournal.com) केर तृतीय अंकक लोकार्पण मिथिला मे प्रख्यात साहित्य्क विद्वान प्रो० रामजी ठाकुर सं करायब निश्चित कयल। अस्तु लैप टाप आ इण्टर्नेट सेवा हेतु अपन मोबाइल गाम लय गेलहुं। ओतय बिजली रानी हमरो सँ पैघ अतिथि छली। अन्ततः एक व्यक्ति कें आग्रह कय जेनरेटर पर कोनो तरहें चार्ज कयलहुं आ कार्य सम्पन्न करायल। यदि बिजली व्यवस्था सम्यक हो तऽ गाम आ शहर के चक्कर नहिं रहत। रोजगारक सृजन सेहो होयत।
o यातायात- यातायात केर समस्या अखनो धरि अछि। वाहन संचालक केर अनियमितता ओ भाडा, समय, यात्री क सं बदसलूकी, गाडीक कागज अथवा लाइसेंस लय के हो, प्रशासन अधिकांश समय मौने नहि रहैत अछि अपितु हरियर पती गनबा मे व्यस्त रहैत अछि।
o रोजगार- रोजगार एकटा एहेन बिन्दु अछि जे लोक कें परदेश जेबाक हेतु विवश कयदैत अछि। समाजिकता के नष्ट कय रहल अछि। व्यक्ति अपन भावना मात्र सं सरोकार रखबाक हेतु विवश अछि। अस्तु रोजगार सृजन अत्यावश्यक अछि। आवश्यकता अछि जे टेण्डर आदि केर दलाल सँ दूर स्वच्छ वातावरण मे रोजगारक अवसर जनता के देल जाय। जनता सतत नीक के संग दैत छैक अन्तःकरण सँ मुदा रोजी क चक्कर मे अनुचित काज सेहो करबाक हेतु विवश होइत अछि।
o जागरुकता- अन्त मे नितीश सरकार सँ अपेक्षा जे जनता मे जागरुकता के संचार हो एकर प्रयास कयल जाय। बहुत किछु जनता नहिं बुझबाक कारण अनुचित करैत अछि। किन्तु यदि जागरुकता बढायल जाय तऽ जनता भ्रष्टाचार के संग नहि देत, विविध कार्यक्रम विशेष रूप सँ सफल होयत।
अन्त मे निष्कर्षतः हमर वक्तव्य होयत जे बिहारक उत्कर्ष समग्र सहयोग सँऽ संभव अछि नकि केकरहु पर दोषारोपण सँऽ मानवमात्र मे कमी आ गुण दुनू छैक। अस्तु गुणक आलम्बन कय अपन संविधान एवं संस्कृतिक अनुकूल कर्तव्य कय प्रत्येक व्यक्ति आ संस्था समग्ररूप सँऽ राष्ट्रक उत्कर्ष मे योगदान दी ई सादर निवेदन।
(लेखक IIT मुम्बई कें शोधछात्र छथि। लेख मे निष्पक्ष लेखिनी केर प्रयोग कयल गेल अछि। कोई कोनो आशय के वैयक्तिक तौर पर नहिं ली। प्रस्तुत कतिपय आँकडा बिहार राज्यक साइट सँऽ लेल गेल अछि। लेख सन्दर्भित टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर आमन्त्रित अछि)
विरेन्द्र कुमार यादव
कथा
नाह आओर जिनगी
ग्यारह अगस्त 2010क कोलाहल भरल साँझ। रूदन आ क्रन्दनक आवाज कमल किशाेरक अंगनासँ शुरू भेल आ कम समएमे ई दर्दनाक आ मर्माहतक दृश्य सौंसे गाम पसरि गेल। कियो ककरो ढाढ़स बान्हएबला नहि बचल। सबहक आँखिसँ गंगा-यमुनाक धार जकाँ जल बहए लागल। रधिया छाती पीट-पीट कऽ बाजैत- “जवान बेटीक बिआह कोना होएत? आब असगरे हम की करब? बुढ़ ससुरक गुजर कोना कराएब? हमर हीरा हमरा खोंइछासँ हेराए गेल।”
दिनहिसँ धीया-पुताक मन हर्षित छल जे सांझमे भोज खएबाक लेल जाएब। चारि बजितहि कोशीक कछेर कुआटोल गामक लोक सभ अपन-अपन धीया-पुताकेँ संग कए खएबाक लेल ितलजुगा धारमे ब्रह्मोत्तर घाटपर नाहपर चढ़य लागल। भोज खएबाक उत्साहमे ई सुधि नहि रहल जे छोट नाहपर बेसी गोटे नहि चढ़ि। भोज खएनिहारक लाटमे सँ एक गोटे नाह खेबए लगल। बीच धारमे नाहमे पानि फुलए लागल। लोक सभमे भगदड़ मचि गेल। नाह डुबि गेल। तिलयुगा धार राकस जकाँ मुँहबौने लोक सभकेँ अपना पेटमे समबए लगलीह। आगि जकाँ ई खबर चारू भर पसरि गेल। चारू भरसँ झोल अन्हारिमे लोक सभ दोड़ए लगलाह आ क्षणहिमे हँसैत मनुक्खक लहास पानिसँ लोक सभ छानए लागल। भरि राति लोकसभ लहास छानिते रहि गेल। भोर होइतहि नगरक लोक, पत्रकार, सरकारक अमला-झमला घटना स्थलपर पहुँचए लागल। सौंसे गाम रूदन-क्रन्दन आवाजसँ भरल छल। कतहु सियान, कतहुँ बच्चा, बचीयाक लहास पकड़ि लोक सभ कानैत छल।
कमल किशोरक जवान बेटी मुनियाँ माए रधियासँ कहलथिन्ह- “अहाँ धीरज बान्हु, जिनगीक ठेकान थोड़बे अछि जे के कखन आ कोन विधि मरताह। जनमक संगहि मरण लागल अछि। हमरा सभकेँ यएह लिखल छल। बाबू जीक संग एतबए दिनक छल। एहि दुनियाँमे सभ गोटे अपन-अपन भाग-तकदरीर लए आएल अछि।”
क्रमश:
जितेन्द्र झा
महाकवि विद्यापति अक्षयकोष
नेपालमे मैथिली भाषा, संस्कृतिक संरक्षण, सम्बर्द्धनमे सरकार कतेक उदासिनताक नमूना बनल अछि महाकवि विद्यापति अक्षयकोष । एहिकोषक दयनीय अबस्था बयान कऽरहल अछि जे सरकारी संयन्त्र कतेक संवेदनशील अछि नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाएबला दोसर भाषा मैथिलीक लेल ।
नेपाल सरकारे गत आर्थिक वर्ष व़ि स़ ०६६/०६७ क बजेटमे १ करोड टका अलग कएलक विद्यापति अक्षयकोषलेल । जकर उद्देश्य छल अक्षयकोषक स्थापना आ मैथिली भाषाक विकासमे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करब ।
नेपाल सरकार पहिल बेर बजेट भाषण मार्फत विद्यापतिक सम्मानमे एहि तरहक कोष स्थापनाक घोषणा कएने छल । मूदा बजेट भाषणक १७ महिना बितिगेलाकबादो अक्षयकोषक स्थापना नईं होब सकल अछि । संस्कृति मन्त्रालय अक्षय कोषक भार टारऽ लेल १ करोड राशि बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्क जिम्मा लगा देने अछि । बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गतके एकटा कार्यालय अछि जे धनुषा आ महोत्तरी जिलाक धार्मिक तथा ऐतिहासिक सम्पदा संरक्षण करबाक उद्देश्यसं स्थापित अछि ।
संस्कृति मन्त्रालय अक्षयकोषक काज बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् करत से कहैत कानमे रुइतेल धऽ कऽ सूतिरहल अछि । भाषा संस्कृतिक विकासक सरकारी ठेकेदार संस्कृति मन्त्रालयक अकर्मन्यतासं अक्षयकोष स्वरुप नईं ल सकल अछि ।
संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन कहैत छथि र्अक्षयकोषक राशि फ्रिज होएवाक अबस्थामे पहुंचलाकवाद मन्त्रालय बृहत्तर जनकपुर परिषद्क खातामे पाई पठओलक । एखन बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् आ संस्कृति मन्त्रालयक सझिया खातामे कोषक राशि राखल अछि ।
सिमित दायरा रहल जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्मे कोषक राशि पठाओल जएबाक आलोचना सेहो भऽ रहल अछि । परिषद् समग्र मैथिली भाषीक प्रतिनिधित्व नहि करैत अछि कहैत छथि कोषक पूर्व अध्यक्ष रामचन्द्र झा । झा कहैत छथि परिषद् सभक भावनाके नहि समेटि सकैत अछि । विद्यापति अक्षयकोषक उद्देश्य मैथिली भाषामे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करबाक अछि । बृहत्तर दू जिलामे लक्षित कार्यक्रम करैत अछि, एहनमे बृहत्तरके अक्षयकोष स्थापनाक जिम्मा देनाइ औचित्यहीन रहल भाषा संस्कृतिविद्सभ कहैत छथि ।
परिषद् भ्रष्टाचारमे डुबिगेल आरोप लागि रहल समयमे कोष मूर्त रुप लऽ सकत या नहि कहब कठिन अछि । कोष आकार ग्रहण करए ताहिके लेल संस्कृति मन्त्रालयके कार्यविधि बनाबऽ पडतै, जाहिलेल एखनधरि कोनो काज शुरु नहि भेल अछि । कोषक कार्यविधि आ निर्देशिका नईं भेलाक कारणें कोषक पाई सरकारी खाताक शोभा मात्र बढा रहल अछि । कोषक १ करोड राशि बैंकमे रखैत काल बेशी ब्याज देनिहार बैंकके नहि चुनल गेल कहैत छथि प्राज्ञ रञ्जन । बैंकसभमे पाइके अभाव रहल अबस्थामे बेशी ब्याज लेल बार्गेनिंग हएबाक चाही छल, मुदा मन्त्रालय मनमौजी काठमाण्डू स्थित एक निजी बैंकके शाखामे पाइ राखिदेलक ।
संस्कृति मन्त्रालयक सचिव मोदराज डोटेल कोषक राशि बैंकमे सुरक्षित रहल प्रतिक्रिया देलनि । अक्षयकोषलेल कार्यविधि बनबाक प्रकृया शुरु भऽ गेल डोटेल जनतब देलनि ।
मैथिली भाषाक महाकवि विद्यापति नेपालक राष्ट्रिय विभूति भेलाकबादो हूनक परिचय स्थापित नहि होब सकल अछि । मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल बजेटक अभाव रहल समयमे विद्यापति कोष सेहो अनिर्णयके बन्दी भऽ गेल अछि ।
विद्यापति स्मृति पर्वपर मैथिली भाषा संस्कृति उत्थानक भाषण त बहुत देल करैत छथि कथित बौद्धिक वर्ग । एहिबेरके स्मृति पर्व सेहो ओहने भाषणसभसं बितिगेल ।
महोत्तरी जिलाक बनौलीमे बर्षोसं निर्माणाधीन विद्यापतिद्वार एखनोधरि टकटकी लगौने ठाढ अछि । विद्यापति स्मृति दिवसमे जनकपुरक विदापति चौकपर रहल विद्यापति स्मारकमे घडी रखवाक भाषण सबनेता देलकरैत अछि ,मुदा दशो वर्षक अन्तरालमे घडी लगेवाक कुवत किनको नईं भेलन्हि अछि । भोटक समयमें मैथिली भाषा संस्कृतिक रक्षा एवं विकासक वाचा केनिहार नेतासब मात्र नइभ विद्यापतिक नामपर पेट पोसनिहार सेहो दोषी अछि एहिमे । विद्यापति स्म्ृत्ति पर्व पिण्डदानक पर्व मात्र बनिक रहिगेल अछि ।
बेचन ठाकुर
नाटक- बेटीक अपमान
(अंक तेसर, दृश्य पहिल)
(स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक रोगग्रस्त अवस्थामे माथपर हाथ लेने बैस कऽ खांसि रहल छथि।)
दीपक : (खासैत) आह! ओह! दुनियाँमे कियो ककरो नहि कियो देखनिहार। जा धरि पैरूख छल, ताधरि झूठ-फूस, एम्हर ओम्हर कए बेटा बियाहलहुँ। मुदा आब कतौ कियो नहि। (खांसैत छथि)
(महेन्द्र पंडितक प्रवेश)
महेन्द्र : दोस, बड गड़बड़ स्थितिमे देखि रहल छी अहाँकेँ। एना किएक? की भए रहल गेल?
दीपक : की हएत दोस? कप्पारमे जे धँसल अछि। सएह ने होएत। (खांसैत छथि)
महेन्द्र : बड खाेंखी होइत अछि।
दीपक : की कहु दोस, दम्मा जोर कए देलक। एक्को रत्ती सक्क नहि लगैत अछि। ताहिपर सँ भनसा-भात अपने केनाइ।
महेन्द्र : (आश्चर्यसँ) से किएक? आ पुतौह?
दीपक : पुतौह गेलीह डिल्ली। बेटा नहि मानलक हमर बात।
महेन्द्र : कहु दुनियाँ केहेन छैक? बेटा-बेटी जनमाबैत अदि लोक सुख लए आ आगू दिन लए।
दीपक : मुदा हमर बेटा स्वार्थमे लीन छथि। आब हम ओकर के? दुश्मने ने।
महेन्द्र : एगो गप्प कहु दाेस।
दीपक : अवस्स कहुँ।
महेन्द्र : झांपि-तोपि कऽ दोसर बियाह कए लिअ।
दीपक : मोन तँ होइत अछि दोस। मुदा आब एहि उमरमे लोक की कहत?
महेन्द्र : लोक की कहत? कियो एक्को सांझ भनसा बनाए देतीह की?
दीपक : ई तँ सपनोमे नहि देखि सकैत छी। अपन जनमल तँ अपन होइते नहि अछि आ दोसरक कोन आशा?
महेन्द्र : छोड़ू ई सभ लटारम। दोसर बियाह कए लिअ सभ अपना-अपना लेल हरान अछि।
दीपक : (मुँह चटपटबैत आ खांसैत) दोस, मोन तँ बड्ड होइत अिछ। मुदा नहि, बाबाजी थिकहुँ। लोक की कहत? हम सरस्वती माताक समक्ष सत्त कएने रही। सत्तकेँ हम तोड़िओ सकैत छी। मुदा नहि नहि नहि।
महेन्द्र : नहि तँ दोसर बेटेकेँ बियाहि लिअ।
दीपक : हँ, ई भए सकैत अछि। मोहना तँ गेल आब सोहना जे करए। अहाँक नजरिमे दोस, कोनो लैड़की अछि?
महेन्द्र : एखन नहि अछि। ओना लैड़कीक बड्ड अभावो भए गेल अछि। जदि नजरिमे आबि जाएत तँ अवस्स कहब। एखन जए रहल छी अपन समधीयौर। समधीनकेँ शंकरजी जनम लेलथिन।
दीपक : बेस, तहन जाउ, शंकर जीकेँ दरशन करू गे।
(महेन्द्रक प्रस्थान। दीपक खांसैत-खांसैत बेदम भए जाइत छथि।)
पटाक्षेप
दृश्य- दोसर
(स्थान- दिल्ली। मोहन ओ मंजू बिछौनपर आराम करैत छथि। मुर्गाक बाङ सुनि मंजू उठि कऽ अपन पतिक सेवा कए रहल छथि आ किछु गप-सप्प सेहो कए रहल छथि।)
मंजू : (चिट्ठी निकालि कऽ दैत) स्वामी जी, पिताजीक चिट्ठी काल्हि सांक्षमे अएल छल। लिअ।
मोहन : कने पढ़ियौक ने, की लिखलन्हि अछि।
मंजू : (चिट्ठी पढ़ैत छथि) चिरंजीवी बौआ मोहन, शुभ आशीर्वाद। हमरा बेटा जनमा कऽ की भेल? दम्मासँ तबाह छी। कियो पूछैबला नहि। सोहना ओ गोपला सदिखन नरहेर जकाँ एम्हर-ओम्हर करैत रहैत अछि। तोरा बियाहि कऽ हमरा की भेटल। हँ, एकटा चीज अवस्स भेटल, चिन्ता। खाइर कतउ रहू, नीके रहु।
मोहन : (मंजूसँ चिट्ठी लऽ कऽ फंेकैत) जेहेन करनी तेहन भरनी। देखैत छेलिएनि जे भरि दिनमे एक-एक मुट्ठा बीड़ी पीबि जाइत छथि। तहिपर सँ गांजा सेहो धुकैत छथि। एकर फल हुनका नहि भेटतनि तँ ककरा भेटतनि।
मंजू : स्वीमी, मुदा छथिन्ह तँ ओ जनम दाता। की कहबैन आब हुनका। बुढ़े जकाँ छथि। तहुपर सँ दम्माक तबाही। स्वामीजी, हमर विचार अछि जे दुइ-चारि दिन लेल गाम चलू आ पिता जीकेँ देखि आबी। हुनको मोनमे संतोष हेतन्हि।
मोहन : भोरहि भोर हमरा मोन नहि खिसीआउ। गाम जेबामे माल-पानी खरचा होइत छैक की नहि। बापबला रखने छी तँ चलू।
मंजू : (शांत भऽ) जे कहलहुँ से गलती कएलहुँ।
मोहन : एखन गाम नहि जाएब। एक्के बेर सोहनक बियाहमे।
मंजू : जे मोन हुअए, सहए करू स्वामी।
(संजू कुमारीक प्रवेश। संजू अपन पाहुन ओ बहिनकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत छथि। दुनू माथपर हाथ दए आशीर्वाद दैत दथिन्हि)
मोहन : (संजूसँ) आइ शीताहल नढ़िया जकाँ अहाँ? कोना एतए धरि अहाँ पहुँच पाओलहुँ संजू?
संजू : किएक पाहुन, हमरा अहाँ बुरबक बुझैत छी की? अहुँसँ हम काबिल छी, से बुझि लिअ।
मोहन : हँ हँ, से तँ अहाँ छी। कहु असगरे कोना-कोना एलहुँ?
संजू : गामपर बस धएलहुँ पटना अएलहुँ आ पटनामे राजधानी मकड़ि दिल्ली अएलहुँ। दिल्लीमे टेक्सी पकड़ि अहाँ लग अएलहुँ। नम्बर-पता अहाँ हमरा देनहि रही।
मोहन : खाइर एतेक अचानक अहाँक अएबाक कारण?
संजू : 26 जनवरी नजदीक छैक। ओहिमे परेड देखए हेतु प्रोग्राम अचानक बनि गेल।
मंजू : एहि बीिच लाल किला, इंडिया गेट, ताजमहल, लोटस टेम्पल, चिड़िया घर इत्यादि पाहुन सेहो देखाए आनथुन्ह। आब बुच्ची अहाँ कहिया आएब कहिया नहि।
मोहन : संजू, आब अहाँ बड़ीटा भए गेलहुँ। बियाहमे कनिएटा रही।
संजू : अहाँक विचारसँ हम सभ िदन कनिएटा रही?
मोहन : हँ हँ सएह बुझु। नमहर भेलासँ अहुँकेँ दीदी जकाँ बियाह करए पड़त। बाप-माएकेँ बड्ड खरचा करए पड़त। तैयो बाप-माएकेँ छोड़ि परघर चलि जाएब। नहि तँ हमरे लग सभ दिन रहि जाउ ने संजू।
संजू : एगोमे सुखए कऽ संठी भए गेलहुँ आ दोसरकेँ राखैत छी। डाँरमे दम अछि पहिने? केहेन-केहेन गेल्ला तँ मोंछबला एल्ला। एक्के ठुस्सी मारब तँ मुँह भसकि कऽ पेटमे चलि जाएत।
मंजू : छोड़ू बुच्ची मजाक-तजाक। काल्हि अहाँ पाहुन संगे घुमै लए चलि जाएब।
पटाक्षेप
दृश्य- तेसर
(स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक खांसी करैत आ हकमैत बैसल छथि।)
दीपक : बेटा, बड़का बेटा चिट्ठीक कोनो जबाबो नहि पठेलन्हि। हमर आब कोनो ठेकान नहि। कखन छी, कखन नहि। बेमारी बड जोर कएने जा रहल अछि। (खांसी करैत-करैत बेदम भए जाइ छथि फेर ओ बीड़ी पीबैत छथि।)
सोचने रही जे मझिला बेटाक बियाह कए ली जीबतहि। मुदा हएत की नहि, से कहब कठिन।
(प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश)
प्रदीप : दीपक बाबू, अहाँक हालत बड खराब देखै छी।
दीपक : (कलपि कऽ) सर परणाम।
प्रदीप : प्रणाम-प्रणाम।
दीपक : सर, हम सोचैत रही जे अपना जीबैत बेटा सभकेँ बियाहि ली। मुदा लगैत अछि जे हएत नहि।
प्रदीप : से किएक नहि होएत? हिम्मत जुनि हारू।
दीपक : हिम्मत की हारब सर। अहु अवस्थामे लड़िकी लेल घुमैत-घुमैत, बौआइत-बौआइत, छिछिआइत-छिछिआइत नवका जूताक शोल खिआ गेल जत्तऽ जाउ बेटो, जत्तऽ जाउ बेटे।
प्रदीप : हँ, ई तँ बड़का समस्या अछि लड़िका तँ लड़िकासँ बियाह नहि करत आ लड़िकी भेटैत नहि अछि। दीपक बाबू, बुझैत छिऐक ई किएक भए रहल अछि? दहेज करणे। दहेज दुिनयाक संतुलनकेँ बिगारि देलक आ बिगारि देत। जुग अल्ट्रासाउण्डक भए गेलैए लोक अल्ट्रासाउण्ड करा कऽ बेटीकेँ जेना-तेना नष्ट कऽ दैत छथि। तहन बेटी वा लड़िकी कत्तसँ कत्तसँ आओत? की लड़िकी बरखामे खसत?
दीपक : सर, हमहुँ ओहि अल्ट्रासाउण्डक मारल छी। कोनो लड़िकी अहाँक नजरिमे नहि अछि।
प्रदीप : हँ यौ।
दीपक : जय भगवान, जाय भगवती। कहु कत्त?
प्रदीप : (मोन पाड़ैत) यौ बेलौकमे एक दिन कियो कहने रहथि जे एगो हमरा बियाहैवाली बेटी अछि। (नाक छुबैत) हँ हँ, आब मोन पड़ि गेल। ओ छलाह- हरिश्चन्द्र चौधरी। हुनका एक्केटा बेटीए छनि, बेटा-तेटा नहि।
दीपक : सर, तहन जल्दी बुझिऔक ने। सर, तहन तँ ओ माल-पानी बढ़िया खरच करताह।
प्रदीप : अहाँ बड लोभी छी। सदिखन माल-पानीक जुगारमे रहैत छी। पहिने हमरा बुझऽ दिअ जे लड़िकी छन्हिेँ वा उठि गेलीह। अच्छा रूकु हम घर जाकऽ झामलाल महतोकेँ हुनका ओहिठाम पठबैत छी। हँ की नहि, से हुनके दिया समाद पठा दैत छी। अहाँ असथिर रहु।
(प्रदीपक प्रस्थान दीपक खूब खांसैत-खासैत परेशान छथि।)
दीपक : बड़का बेटामे तँ सोलहन्नी ठकाए गेलहुँ। मुदा मझिलामे सुधि-मुरि ओसुलि लेब। आखिर एक्केटा बेटी छनि आ बेटा छन्हिें नहि हुनका। हुनक सभटा संपत्ति हमरे होएबाक चाही। (खांसैत-खांसैत परेशान)
(झामलालक प्रवेश)
झामलाल : दीपक बाबू, प्रदीप भैया हमरा हिरश्चन्द्रक ओहिठाम लड़िकीक संबंधमे पठौने रहथि। हरिश्चन्द्र बाबूक एखन धरि कुमारिए छथि। मुदा हरिश्चन्द्र बाबूक मोन बड्ड अगघाएल देखलियन्हि। पाँचटा कुटुमकेँ गप-सप्प करैत सेहो देखलिएन्हि। ओ हमरा कहलनि जे हुनका जरूरी हेतनि तँ ओ हमरहि एहिठाम आबि गप-सप्प करताह। हमरा भरि सएओ कुटुम आबैत छथि। हमरा पानि छोड़ि कऽ किछु नहि लगैत अछि। सभटा कुटुमे लेने आबैत छथि।
दीपक : एहेन बात कहलनि ओ?
झामलाल : हँ यौ दीपक बाबू, हम अहाँकेँ फुसि किएक कहब? हमरा ओहिसँ की फेदा? अन्तमे ओ कहलनि जे पियासल इनार लग जाइत अछि, इनार पियासल लग नहि।
दीपक : हारल नटुआ झुटका बिछए। काल्हि हमरा लोकनि हुनका ओहिठाम जाएब। नऽ छऽ कएने आएब। कम्मो-सम्मोमे पटटैक तँ हमरा केनाइ परम आवश्यक अछि।
पटाक्षेप
दृश्य- चारिम
(स्थान- हरिश्चन्द्रक चौधरीक घर। हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमार दलानपर कुर्सीपर बैसि शालिनीक बयाहक संबंधमे गप-सप्प करैत छथि। रमण कुमार हरिश्चन्द्रक मुखिया छथि।)
हरिश्चन्द्रक : मुखिया जी, शालिनीक बियाह हेतु लड़िकाबला सभ हमरा नाकोदम कए देने छथि। एखन धरि सैकड़ौ लड़िकाबला हमरा एहिठाम आबि कऽ गेलाह। मुदा हँ किनको नहि कहलियन्हि।
रमण- हरिश्चन्द्र जी, सभ दिन होत न एक समाना। कोनो समए छल जाहिमे लड़ककीबला लड़िकाबलाकेँ खुशामद करैत छलाह। मुदा आब एहेन समए आबि गेल अछि जाहिमे लड़िकाबला लड़िकीबलाकेॅँ खुशामद करैत छथि। आ एखन किछु नहि भेल। आगु देखब की-की होइत अछि?
(दीपक चाधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, सुरेश कामत, महेन्द्र पंडित अो झामलाल महतोक प्रवेश। हरिश्चन्द्र ओ रमण ठाढ़ भऽ कऽ हिनका लोकनिकेँ बैसाबैत छथि। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती होइत छनि। सभ िकयो बैस कऽ गप-सप्प करैत छथि।)
रमण : (प्रदीपसँ) प्रदीप बाबू, कहु की हाल-चाल?
प्रदीप : सरस्वती माताक कृपासँ बड़-बढ़िया हाल-चाल अछि आओर अपनेक हाल-चाल?
रमण : सभ आनन्द अछि। प्रदीप बाबू, लड़िकाक बाप के छथि?
प्रदीप : (दीपक दिशि इशारा करैत) ओ छथि, दीपक चौधरी।
दीपक : हम छी सरकार, नमस्कार।
रमण : नमस्कार, नमस्कार। दीपक बाबू, अहाँकेँ लड़िकी पसीन छथि?
दीपक : हँ, हम एगो विश्वसनीय सूत्रसँ बुझि लड़िकीसँ संतुष्ट छी।
रमण : हरिशचन्द्रजी, अपनेकेँ लड़िका पसीन छथि?
हरिश्चन्द्र : हँ, हमरो बेलॉकमे प्रदीपे बाबू कहने छलाह जे दीपक बाबूकेँ लड़िका बड नीक छथि। हम हिनकेपर पूर्ण विश्वास राखि लड़िकाकेँ बड नीक मानलहुँ।
रमण : यानी दुनू तरफसँ लड़िका-लड़िकी पसीन छथि। तहन दीपक बाबू, बाजू केना की बियाह-दान करब। बेचारा हरिश्चन्द्र बड गरीब छथि। कौहना कऽ ई बेटीकेँ पढ़ौलनि।
सुरेश : तैयो किछु बजताह ने हरिश्चनद्र बाबू जे की केना ख्रच करब?
हरिश्चन्द्र : हम किछु नहि बाजब। बजताह मुखिए जी। हमरा संबंधमे हुनका सभ किछु बुझल छन्हि।
रमण : हरिश्चन्द्र बाबू खरच करताह। जदि अपने लोकनि ई बुझि कऽ आएल छी तहन अपने सभकेँ ई गरीबक कुटमैती नहि भेल। दीपक बाबू, अपन बेटाक बियाहमे की केना खरच करताह से बाजथु।
सुरेश: दीपक बाबू की बजताह? ओ तँ अपने सबहक सवाल सुनि दंग छथि।
महेन्द्र : यौ सुरेश बाबू, हरिश्चन्द्र बाबू छिरहारा खेलाइ छथि। डुबि कऽ पानि पीबै छथि।
हरिश्चन्द्र : हरिश्चन्द्र बाबू डुबि कऽ पानि की पीताह? रहए तँ छपाए नहि, नहि रहए तँ बिकाइ नहि।
महेन्द्र : नहि रहए तँ बेटी बियाहए लेल किएक चललहुँ।
झामलाल : महेन्द्र बाबू ठीक कहैत छथि। बेटीक बियाह टिटकारीसँ नहि होइत अछि। डाँर मजगूत चाही।
हरिश्चन्द्र : जदि अहींक डाँर मजगूत अछि तँ बेटा बियाहि लिअ आनठाम। (बिगरि कऽ)
प्रदीप : अपने सभ शांत रहु। हल्ला-गुल्ला जुनि करू। मुखियाजी, अपने किछु साकारात्मक बात बाजू।
रमण : हमरा समएक बड अभाव अछि। हम एक बेर बाजि दैत छी- जदि दीपक बाबू गोटेक लाख टका खरच करताह तहन ई लड़की हिनका होएतन्हि। नहि तँ असंभव। एहि अल्ट्रासाउण्डक जुगमे बेटीक बड बेसी अभाव अछि आ बेटाक कोनो अभाव नहि अछि।
प्रदीप : मुखियाजी, हमरा लोकनि एक मिनटमे विचारि कऽ कहि दैत छी।
(प्रदीप, दीपक ओ सुरेश अन्दरमे जा कऽ गप-सप्प करैत छथि।)
सुरेश : आब ओ जमाना नहि रहि गेल जहिमे बेटीबलाकेँ बेटाबला दहेजमे कुहरा दैत छलाह। अल्ट्रासाउण्डक युगमे बेटीक बड अभाव भऽ गेल अछि आओर बेटाबलाकेँ बिआहनाइ मजबूरी अछि तेँ भागीन, हरिश्चन्द्र बाबू कमसँ कम एकाबन हजार टाका तोरासँ लेबे करथुन।
प्रदीप : दीपक बाबू, मामाश्री ठीके कहैत छथि। एकाबनमे ई कुटमैती फाइनल कऽ लिअ।
दीपक : सर, अपने सभ जे जेना कहबैक से हमरा मान्य होएत। चलु फाइनल कऽ लिअ।
(प्रदीप, दीपक, ओ सुरेशक प्रवेश।)
रमण : बाजल जाउ प्रदीप बाबू, की केना विचर भेलैक।द्य
प्रदीप : दीपक बाबूक ओतेक बढ़िया नहि अछि। ओ मात्र अहाँकेँ एकतीस हजार टाका देताह।
रमण : तहन ई कुटमैती अपने सभकेँ नहि भेल। जदि एकावन हजार टाका अपने सभ दऽ सकबनि हतन कुटमैती होएत नहि तँ जय रामजी की।
सुरेश : बेस हमरा लोकनि मािन लेलहुँ।
रमण : मानि लेलहुँ तँ एखन लड़िकीकेँ चढेबैक की बादमे?
सुरेश : बियाहेमे चढ़ए लेब।
रमण : दीपक बाबू, बात पक्का।
दीकप : हँ यौ मुखियाजी पक्का नहि तँ कच्चा।
रमण : प्रदीप बाबू गाइरेन्टर अहींक होमए पड़त।
प्रदीप : बेस, हम तँ छिहे।
रमण : तहन हरिश्चन्द्र बाबू, चाय-पान-नास्ताक ओरिआन जल्दी करू।
(हरिश्चन्द्र अन्दरसँ चाय-पान-नास्ता अनैत छथि। सभ कियो नास्ता, चाय, पान करैत छथि। फेर हाथ मुँह धोइ कऽ सभ कियो अंतीम गप-सप्प करै छथि।)
बियाह कहिया करब दीपक बाबू?
दीपक : जल्दीए राखू। फेर टकोक इन्तजाम करए पड़त ने? दू-चारि दिनमे राखु। आब मुखियाजी चलबाक आज्ञा देल जाउ।
रमण : किएक, समधीन अहाँक प्रतीक्षा करैत हेतीह?
दीपक : ओ हमरा सनक हजारोकेँ प्रतिदिन प्रतीक्षा करैत छथिन। तहन जय रामजी की, मुखियाजी।
रमण : जय रामजी की।
(प्रदीप, सुरेश आ दीपकक प्रस्थान नवस्कार-पातीक पश्चात)
पटाक्षेप
दृश्य- पाँचिम
(स्थान- हरिश्चन्द्र चौधरीक घर। शालिनीक बियाहक पूर्ण तैयारी अछि। जयमालाक मंच सजल अछि। मंचपर बाल्टीनमे जल-लोटा राखल अछि। हरिश्चन्द्रक भाए सुरेन्द्र चौधरी असगरे कुरसीपर बैसि कऽ ओङहाइत छथि आ खैनी खा कऽ छीकैत छथि। मुँहसँ खैनी निकलि जाइत अछि। फेर खैनी खा कऽ नोइस लऽ छीकैत छथि।)
महेन्द्र : आ ऽ ऽ ऽ छी। धूर सार खैनी। बड़ खच्चर छेँ। बाप लागल छौक। आ ऽ ऽ ऽ छीं। कोन खैनी अछि कोन नहि। शायद बापक जनमल खैनी नहि अछि, मएक जनमल अछि। आऽ ऽ ऽ छीं। हमरा किएक तङ करैत छेँ, बौहकेँ कर गे। एखनहि हमर मुँह नानीए दादीएकेँ उकटि देतौक। आऽ ऽ ऽ छीं। बुझि पड़ैत अछि बरियाती दुआरे एना करैत छें। सार खैनी नहितन। बापक बियाह पितीयाक सगाइ देखेबौक। आऽ ऽ ऽ छीं। लागि रहल अछि जे लड़िकाक माए चलितर बुढवाक संग उरहैर गेल। हम तेरा खेबौक नहि सार। मुदा नहि खेबौक तँ तों कानबें तहन। आऽ ऽ ऽ छीं। खैनीक पितीआइननहि तन। माएसँ बियाह कऽ लेबौक। नहि तँ अपन चालि छोड। आऽ ऽ ऽ छीं। सार खैनी मुँहे दाबि देबौक आ गरदनिमे फँसरी लगाए देबौक। मरलें तँ नॉङ साथी, जीलें तँ नाॅङ साथी। आऽ ऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लगैत छिऔक सार पाएर पकड़ैत छऔक सार आब एना करिहें। बेज्जैत भए जाएब। बरयाती आबैत होएत। आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे, एक्के बेर छिऔक ने। अन्तिमे ने। हे हे, एकटा पौआ देबौक आइ। गांंजा देबौक। लुङिया मिरचाइ देबौक। कनियाले सुति देबौक। इज्जत बचाह। प्रतिष्ठा राख। तोरा बगैर हम नहि रहि सकैत छी। हे सार खैनी, तोरा बगैर हमर कनियां एक्को क्षण नहि रहि सकैत छथि। हँ, आब सार मानलक। कतेक कौबला-पाती कएलाक बाद। सार खैनी बड बुधियार अछि। मुदा बापसँ भेँट आइ भेलैक। एतेक दिन बापक साँएसँ होइत छेलैक।
(भटक्का आबाज करैत छथि। बरयाती सभ अन्दरमे। ई अबाज सुनि महेन्द्र तीन-तीन हाथ छरपैत छथि। डरसँ कोने-कोन नुकाइत छथि। बाप रऔ, माए गै करैत छथि। बाल्टीन माथपर राखैत छथि। एहि तरहेँ बरियातीक प्रवेश होइत छनि। सभकेँ बाप रअौ, माए गै करैत पाएर छुबि प्रणाम करैत छथि। बरयातीमे छथिन्ह- दीपक चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, झाामलाल महतो, सुरेश चौधरी, सोहन चौधरी, मोहन चौधरी आओर गोपल चौधरी। चाय-पान-नास्ताक बाद शिघ्र जयमालाक तैयारी होइत अछि।
सुरेश : (सुरेन्द्रसँ) सरकार, जय माला शिघ्र करू।
महेन्द्र : सरकार, हम सरकार नहि थिकहुँ सरकार सभ अन्दर छथि।
मोहन : सरकार सभकेँ बजाए अनियौन्हि।
सुरेन्द्र : बेस, बजाए अनैत छिअनि। (अन्दर जा कऽ आबि।)
सभ कियो आबि रहला अछि।
(हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमारक प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती भेलनि।)
मोहन : (मुखियाजी सँ) मुखियाजी, जय-मालामे किएक बिलंब भए रहल अछि?
रमण : हमरा लोकनिक कोनो बिलंब नहि। अहीं सभकेँ बिलंब अछथ्।
मोहन : की बिलंब?
रमण : यएह जे दीपक बाबू एखन धरि एकावन हजार टाका हरिश्चन्द्र बाबूकेँ नहि देलथिन्ह।
दीपक : हइए लिअ एकावन हजार टाका।
(प्रदीप दीपकसँ एकावन हजार टाका गिनि कऽ मुखिया जीक हाथमे दऽ दैत छथिन्ह।)
रमण : हँ, आब वादा पूर्ण भेल। आब जय-माला अतिशिघ्र होएत।
(हरिश्चन्द्र आ रमण अंदर जाइत अछि। पुन: अन्दरसँ जनानी सभ जय-माला कराबए अबैत छथि। समूहमे शालिनी कुमारी, राधा देवी आओर चारि-पाँच गोट अन्य जनानी छथि। ओ सभ परिछन कऽ जय-माला करौलन्हि। शालिनी, सोहनकेँ पाएर छुबि प्रणाम केलनि। सभ जनानी अन्दर जाइत छथि। तहन सुरेन्द्र चौधरीक प्रवेश।)
सुरेन्द्र : बरयाती सभ, आऽ ऽ ऽ छीं। (खैनी खा कऽ) सार फेरो आबि गेल। सार निरलज आऽ ऽ ऽ छीं। पतित आऽ ऽ छीं। हे सार, कुटुम स्ीा हँसैत होएत। हे सार प्रतिष्ठा आऽ ऽ ऽ छीं। बचा बचा आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लागऽ दैत छिऔक। हे हे आइ राति नवकी समधीन लग लऽ जेबौक। बात मान। (छींक रूकि जाइत अछि।) हँ सार समधीनक लोभमे बात मानलक। बरियाती सभ भोजन सराए रहल अछि। चलै चलू भोजनमे।
(सबहक प्रस्थान)
पटाक्षेप
क्रमश: