फोंका-एक विहगावलोकन
काव्य वैह थिक जे रसिकक हृदयके ँ रसाप्लावित करय, गृहिणी वैह थिक जे अपन पतिके ँ अपन प्रेमपासमे जकरने रहय, भक्त वैह थिक जे भगवानके ँ अपन वषमे कयने रहय आ षत्रु वैह थिक जे मरितो दमधरि ष्षत्रुता नहि छोड़ए। अरसिक वा गँवारके ँ कविता सुनाके ँ की लाभ ? ते ँ ने संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध विद्वान एवं महाकवि वाणभट्ट कहने छथि-अरसिकस्तेषु काव्य निवेदनं षिरसि मा लिख! मा लिख! मा लिख!!
वस्तुतः बानर नारिकेरक स्वाद की बूझत ? गँवार रत्नक महत्वके ँ की परखत ? तहिना अरसिक किंवा गँवारके ँ जँ कोनो कविता सुनयबैक तँ ओ अरण्यरोदने कहाओत, मुर्दाक शरीरपर उबटने लगायब होयत, स्थलपर कमल रोपबे सदृष कहाओत, ऊसर जमीनपर बेस काल धरि वर्षा करबे तुल्य होयत, कुकुरक नाडÛरिके ँ सोझे करब सदृष बुझाओत, बहिरक कानमे जपे करब तुल्य प्रतीत होयत अथवा आन्हरक आगाँमे दर्पणे रखबा सन भान होयत-
अरण्य रुदितं कृतं षवषरीरमुद्वर्तितम्।
स्थलेमारोपितं सुचिरमूसरे वर्षितम्।।
स्वपुच्छमवनावितं वधिरकर्ण जापः कृतो।
धृतोन्धमुखदर्पणः यद्वुधो जनः सेवितः।। (निदर्षनालंकार)
जेना धनंजय नामक पाथरपर घसिकय सोनाक परीक्षा होइत अछि, रणक्षेत्रमे धनुर्धरक परीक्षा होइत अछि, विपत्तिक समयमे गृहिणीक परीक्षा होइत अछि आ श्रीमद्भागवतक अर्थ लगयबामे पण्डितक परीक्षा होइत अछि-
धनंजये हाटक सम्परीक्षा रणांगनां षस्त्रभृतां परीक्षा।
विपत्तिकाले गृहिणी परीक्षा विद्यावतां भागवते परीक्षा।।
तहिना काव्यक परीक्षा काव्यषास्त्र रूपी कसौटीपर कयल जाइत अछि। प्रायः तथाकथित नव कविता लिखनिहार कवि लोकनि हमर एहि मतसँ सहमत नहियो होयताह मुदा वनस्पति कतबो शुद्ध रहय ओ शुद्ध घीक समता नहि कए सकैत अछि।
वस्तुतः श्री कमलाकान्त झाजीक फोंका कविता संग्रह पढ़ि हमरा काव्यषास्त्रक अन्तर्गत पढ़ल शब्दषक्तिक भेद- लक्षणा-व्यंजनाक स्मरण कराए दैत अछि। एहि फोंकामे कुल 89 गोट कविता संगृहीत अछि जाहिमे अधिकांष कवितामे समाजक कोनो ने कोनो विरूपतापर प्रहार कयल गेल अछि, परषासनक कोनो ने कोनो अंगपर निषान साधल गेल अछि आ नेता लोकनिक भ्रष्ट चरित्रके ँ जगजियार कयल गेल अछि-एक शब्दमे जँ कही तऽ चारूकात पसरल भ्रष्टाचारपर व्यंग्यवाणक बौछार कयल गेल अछि। जँ एहि प्रकारक अवघात अभिधामे कयल जाय तँ मारि-पीट, पर-पंचैती, केस-मोकदमा सभ किछु भए जायत मुदा लक्षणा आ व्यंजनाक वाणसँ विद्ध लक्ष्य जालमे फँसल माछ सन छटपटाय लगैत अछि, आहुति युत होमक अग्नि जकाँ धधकि उठैत अछि आ चोटाओल नाग जकाँ फुफकार काटय लगैत अछि मुदा पलटवार नहि कए सकैत अछि। लक्षणा आ व्यंजनाक वाण लोकके ँ कतोक दिन धरि भीतरे भीतर दग्ध करैत रहैत अछि जेना सम्पूर्ण गात्रपर क ड़कल तेल वा घीक पड़ने भेल फोंका लोककें कतोक दिन धरि कुहरबैत रहैत छैक।
कविश्रेष्ठ श्री कमलाकान्त झाजीक कवितामे कोन प्रकारक व्यंग्य निहित अछि से हुनक पंक्तिक अवलोकन विनु कयने अनुभव करब असंभव अछि। हिनक परिचय-नवरत्न शीर्षकमे समाजक प्रसिद्ध नओ पेषाक लोकपर जे व्यंग्य कयल गेल अछि ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य थिक-
डाक्टर-
पैघ डाक्टर वैह थिक चिन्हय सभटा रोग।
अदलि - बदलि औषधि दिअए बाँचि सकए नहि लोग।।
कवि-
असली कवि थिक वैह जे कविता करए अनर्थ।
लाम-काफ बेसी होअए श्रोता बुझए ने अर्थ।।
अफसर-
अफसर बड़का वैह थिक, जनिक पैध हो पेट।
लेट-सेट कखनो पहुँचि, काटथि अनकर घे ँट।।
गायक-
असली गायक वैह थिक, जकर पैध हो तान।
श्रोता सभ उठि हो विदा, बन्द होअए नहि गान।। फोंका-पृ. 40,41
कवि अपन काव्यमे सभसँ पैध निषान सधने छथि भ्रष्ट नेता लोकनिपर। किछु पंक्तिक उल्लेख करब आवष्यक बुझि पडै़त अछि-
राजनीति हुनका लेल वरदान अछि
प्हिने झोपड़ीमे रहैत छलाह
आइ आलीषान मकान अछि।
पुनष्च-
ओ हस्ताक्षरक बदला
अँउठा लगबैत छथि
राजनेता छथि ते ँ
विद्वान कहबैत छथि। फोंका -पृ. 51
राजनेतापर व्यंग्य करैत श्री झा मंत्रीजीकेँ कुकुर धरि कहि देबामे नहि हिचकैत छथि। हिनकहि शब्दमे द्रष्टव्य थिक-
दिल्लीक अषोक पथपर मंत्रीक डेरासँ
एक कुकुर
नालीमे स्वयं जा खसि पड़ल
हल्ला भेल
लोक दौड़ल
कुकुरके ँ निकालल गेल
साबुन, तेल आ सेंट लगाओल गेल।
कुकुरके ँ बैसा पुछल गेल
मंत्रीक आवासक सुख त्यागि
नालीमे बेर-बेर किएक?
कुकुर सहज भावसँ बाजल-
एक बंगलामे एकेटा कुकुर नीक। फोंका पृ.-93
कवि भविष्यद्रष्टा होइत छथि, समाज सुधारक होइत छथि आ सबसँ बेसी निर्भीक होइत छथि। हिनक निर्भीकताक पराकाष्ठा निम्नांकित पंक्तिमे व्यंजित अछि-
मैडमजी पुछलनि
सरदारजी
अहाँ यू. पी. ए.क अर्थ जनैत छी-
ओहिमे हमर
की हैसियत मानैत छी ?
सरदारजी बजलाह
मैडम
यू. पी. ए.क मतलब साफ छै
एहिमे पी. ए. हम छी
बाँकी सभ यू(अहाँ छी) फोंका-पृ.-6
हिनक एहि कविता संग्रहमे एहि प्रकारक व्यंग्य समाजक प्रत्येक वर्गपर अछि जतय कतहु हिनका व्यभिचार, अनाचार आ भ्रष्टाचारक अनुभूति होइत छनि।
हिनक कविता संग्रहमे वक्रोक्ति(अलंकार)क माध्यमे सामान्यो गप्पके ँ तेनाने उपस्थापित कयल गेल अछि जे सुनितहि एक क्षणक हेतु अचंभित भए जाएब, हृदयमे गुदगुदी उठत आ मुहपर स्मितहास अवष्ये टपकि पड़त। अवलोकनीय थिक-
एकटा मित्र पत्नीसँ पुछलथिन
सुनैछी ?
तुलसीदास कहने छथिन
‘ढ़ोल गँवार शूद्र पषु नारी
ई सभ तारण के अधिकारी’
अर्थ बुझै छियै कि बुझाउ
पत्नी बजलथिन
एकर अर्थ तँ एकदम स्पष्ट छै
एहिमे हम छी एक ठाम
आ अहाँ छी चारि ठाम। फोंका-पृ.-44
श्री कमलाकान्त झाजीक कविता संग्रहमे जँ कतहु शृंगारिको वर्णन भेल अछि तऽ ओतहु व्यंग्येक माध्यमसँ। कने एहि अंषपर दृष्टिपात कयल जाय-
क्रुद्ध वॉसक विनती करैत
बजली घिघिया क’
पूर्वाह्नमे लेट एैल रही
कम्पन्सेट क’ देब
खराब नै मानी तँ
साँझमे लेट क’ जैब। फोंका-पृ.-110
हिनक कविता सभमे ठाम-ठाम अलंकारक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। एतय उत्प्रेक्षाक मालाक अवलोकन कयल जाय-
तऽन मल-मल जकाँ, मोन मखमल जकाँ
मूँह चाने जकाँ, दाँत मोती जकाँ । फोंका-पृ.-26
विनोक्ति अलंकार द्रष्टव्य थिक-
बिनु चीनी केर चाह नहि, बिनु जलखइ केर प्लेट।
बिनु सरिसो केर माँछ नहि, बिना धोधि केर सेठ।। फोंका-पृ.-41
पुनरुक्तिप्रकाष-
एक आँखि स्वप्न-मिलन मेला लगौने
एक आँखि विरही चकोर
एक आँखि अपना लए जागल रहैए
एक आँखि हुनका घर चोर। फोंका -पृ.-38
हिनक एहि संग्रहमे एक दिस जँ किछु मात्रिक छंदमे लिखल गेल कविता सभ अछि तऽ दोसर दिस आधुनिक कविक डेगमे डेग मिलबैत पूर्णतः अतुकान्त कविता सेहो अछि। किछु छन्दोबद्ध कविताक उल्लेख एतय कयल जा रहल अछि-
कुण्डलिया-एहि छन्दमे दोहा एवं रोलाक मिश्रण एकटा शर्तक संग रहैत छैक जे दोहाक अंतिम पाद रोलाक आरम्भक पाद बनि जाइत अछि। एतबे नहि दोहा छन्दक आदि भागमे जे पद रहत से रोलाक अंतमे निष्चय देल जायत। एकर पूर्णतः निर्वाह कवि कयने छथि। कने देखल तऽ जाउ-
खादीमे गुण बहुत छै, सभ दिन झॉपय अंग।
छै उज्जर तँ की भेलै, एहिमे सातो रंग।।
एहिमे सातो रंग दाममे सस्ते सस्ता
सभठाँ छै उपलब्ध भेटै भरि बस्ता-बस्ता।
कविगण बाजि उठथि सुनू औ भौतिकवादी
बर्बादीसँ बचू मङा कऽ पहिरू खादी।।
पुचष्च-
खादी केर अछि बढ़ि रहल दिन- दिन दूना रेट।
एकरा अंदरमे दबल भारी भरकम पेट।।
भारी भरकम पेट देषके काला धंधा
भ्रष्टाचारी चोर बजारिक बनल सुगन्धा।
नैयायिक केर न्याय देहपर चढ़िते खादी
सभटा नुका लैछ ई बापू केर खादी।। फोंका-पृ.-108
निष्कर्षतः यैह कहल जा सकैत अछि जे फोंका कविता संग्रह एकटा सफल काव्य संग्रह थिक जकर पाठक किंवा श्रोताके ँ धैर्य आ साहसक संग पारायण व श्रवण करबाक प्रयोजन छनि। फोंका पढ़ि एक बेरि अवष्ये लोकक देह सिहरि उठतैक, मोन उद्वेलित होयतैक आ कुमार्गके ँ छोड़ि सन्मार्गपर चलबाक प्रेरणा भेटतैक। हम एकर कविसँ आग्रह करबनि जे एहने सरस, सुन्दर आ संग्रहणीय रचनासँ मैथिली साहित्यक उद्यानके ँ सुरभित करैत रहथि। इत्यलम्।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।